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VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन

VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन

(I) परमेश्वर के अधिकार पर वचन

1. जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ्‍य प्रगट होने, और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। इससे निरपेक्ष कि उसने किस रीति से उनको सृजित किया था, इससे निरपेक्ष कि उसने उन्हें क्यों सृजित किया था, परमेश्वर के वचनों के कारण ही सभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और स्थिर बनी रहीं और यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रगट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के लिए सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल किया और मानवजाति के लिए उपयुक्त जीवन्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय पद्धतियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही श्वास प्राप्त करने वाली थी। दूसरे शब्दों में, मानवजाति की सृष्टि से पहले, मानवजाति से भिन्न सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ, ऐसी वस्तुओं में प्रकट हुआ जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही विशाल थीं और छोटे से छोटे पशुओं और पक्षियों में, हर प्रकार के कीड़े-मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे, जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे, उनमें प्रकट हुआ। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक की वंशवृद्धि सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण हुई और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताने लगा। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे उस जीवन व चेतना को दर्शाने लगे थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें अलग-अलग रूपों और संरचना के द्वारा दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल अचल पदार्थ प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, पुनः उत्पन्न करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान भी दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँ जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया है। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपके रहना नहीं है और किसी आकार में सीमित नहीं होता; वह विश्व के संचालन को अधिकार में रखता है और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखता है और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली-भाँति सँभाल सकता है जिससे वे परमेश्वर की सेवा कर सकें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके साथ सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है और-तो-और, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है और यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या तहस-नहस नहीं किया जा सकता है और न ही उस में किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान की जगह नहीं ले सकता और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा नहीं लिया जा सकता है और उसे किसी भी गैर-सृजित प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को देखिए। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ्‍य नहीं है और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य क्यों नहीं है उसका कारण है क्योंकि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, हालांकि वे परमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यद्यपि वे परमेश्वर की कुछ सामर्थ्‍य धारण किए हुए हैं जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने और सब वस्तुओं के ऊपर सर्वोच्चता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता को कोई गैर-सृजित प्राणी नहीं ले सकता है और उसी प्रकार कोई गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान नहीं ले सकता। क्या तुमने बाइबल में परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? और परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था और इस प्रकार उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं और इस प्रकार, इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है और उनका शासक भी। उन में से हर एक के बीच में—भले ही वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ्‍य के हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान ले सके। उन्‍हें कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलने वाले सत्‍य और वास्तविकताएँ हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

2. मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—सभी ग्रह, आकाश के सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन नियमित रूप से अपनी कक्षा में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे इसमें कितने ही वर्ष लगते हों। कौन सा ग्रह कौन से निश्चित समय में कहाँ जाता है; कौन सा ग्रह कौन सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन सा ग्रह कौन सी कक्षा में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें जरा सी भी ग़लती के बिना आगे बढ़ती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी सख्त तरतीब का अनुसरण करती हैं, उन में से सभी का सटीक आँकड़ों के द्वारा वर्णन किया जा सकता है; वे पथ जिस पर वे यात्रा करते हैं, उनकी कक्षाओं में परिभ्रमण की उनकी गति और तरतीब, वे समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, उन्हें विशेष नियमों के द्वारा परिमाणित किया जा सकता है और उनकी व्याख्या की जा सकती है। युगों से ग्रहों ने इन नियमों का पालन किया है, और ज़रा सा भी विचलन नहीं किया है। कोई भी शक्ति उनकी कक्षाओं या साँचों को नहीं बदल सकती है या उनको बाधित नहीं कर सकती है जिनका वे अनुसरण करते हैं। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को नियन्त्रित करते हैं और वह सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार के द्वारा पूर्वनियत किया जाता है, वे सृजनकर्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन स्वयं ही करते हैं। बृहद स्तर पर, कुछ साँचों, कुछ आँकड़ों, और साथ ही कुछ अजीब और अवर्णनीय नियमों या घटनाओं का पता लगाना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृजनकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और व‍ह हर चीज़ पर प्रभुत्व रखता है, और इसके अतिरिक्त सृजनकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव-विज्ञानी, खगोलशास्त्री, और भौतिक-विज्ञानी उत्तरोत्तर अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और साँचे जो उनकी गतिविधियों को आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रण किया जाता है। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के तरतीबों के बीच एकमात्र शक्तिशाली परमेश्वर ही है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि उसके असली चेहरे को कोई नहीं देख सकता है, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताक़त उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और साथ ही स्वीकार अवश्य करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है। और वे प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली नहीं हैं, बल्कि एक प्रभु और स्वामी के द्वारा आदेशित की जाती हैं। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें बृहद स्तर पर मनुष्यजाति महसूस कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़ियाँ, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सभी मौसम जिनका वह अनुभव करता है, सभी चीज़ें जो पृथ्वी पर पाई जाती हैं, जिनमें पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य शामिल हैं, ये सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं, उन सब के जीवन कुछ नियमों द्वारा शासित होते हैं, और वे उनके साथ बने रहते हुए बढ़ते हैं और बहुगुणित होते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है, परमेश्वर के अधिकार के कारण। या, दूसरे शब्दों में, तो परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण; क्योंकि स्वयं परमेश्वर यह सब करता है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मन है जो इन नियमों को उत्पन्न करता है; ये उसके विचार के अनुसार स्थानांतरित होंगे एवं बदलेंगे, और ये सभी स्थानांतरण और बदलाव उसकी योजना के वास्ते घटित होंगे और गायब होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

3. परमेश्वर ने उन सभी चीज़ों को देखा जिन्हें उसने बनाया था जो उसके वचनों के कारण अस्तित्व में आईं और बनी रहीं और धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगीं। उस समय, परमेश्वर ने अपने वचनों के द्वारा जो विभिन्न चीज़ें बनाई थीं, और जिन विभिन्न कार्यों को पूरा किया था, क्या वह उनसे सन्तुष्ट था? उत्तर है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" तुम लोगों को क्या लगता है? इससे क्या प्रकट होता है कि "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"? यह किसकी ओर संकेत करता है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर ने जो योजना बनाई थी और जो निर्देश दिये थे उन्हें और उन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए, जिन्हें पूरा करने की उसने व्यवस्था की थी, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य और बुद्धि थी। जब परमेश्वर ने हर एक कार्य को पूरा कर लिया, तो क्या वह दु:खी हुआ? उत्तर अभी भी यही है "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, उसने कोई खेद महसूस नहीं किया, बल्कि वह सन्तुष्ट था। इसका मतलब क्या है कि उसे कोई खेद महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसकी सामर्थ्‍य और बुद्धि पूर्ण है, और यह कि सिर्फ उसकी सामर्थ्‍य के द्वारा ही ऐसी पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब कोई मुनष्य कार्य करता है, तो परमेश्वर के समान, क्या वह देख सकता है, कि वह अच्छा है? क्या हर काम जो मनुष्य करता है उसमें पूर्णता होती है? क्या मनुष्य किसी काम को एक ही बार में पूरी अनंतता के लिए पूरा कर सकता है? जैसा कि मनुष्य कहता है, "कुछ भी पूर्ण नहीं होता, बस थोड़ा बेहतर होता है," ऐसा कुछ भी नहीं है जो मनुष्य करे और वह पूर्णता को प्राप्त कर ले। जब परमेश्वर ने देखा कि जो कुछ उसने बनाया और पूर्ण किया वह अच्छा है, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई हर वस्तु उसके वचन के द्वारा स्थिर हुई, कहने का तात्पर्य है कि, जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," तब जो कुछ भी उसने बनाया उसे चिरस्थायी रूप में स्वीकृति मिल गई, उनकी किस्मों के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया गया, और उन्हें पूरी अनंतता के लिए एक दृढ़ स्थिति, उद्देश्य, और कार्यप्रणाली दी गई। इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं के बीच उनकी भूमिका, और वह यात्रा जिन से उन्हें परमेश्वर की सभी वस्तुओं के प्रबन्धन के दौरान गुज़रना था, उन्हें परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियुक्त कर दिया गया था और वे बदलने वाले नहीं थे। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी वस्तुओं को दिया गया स्वर्गीय नियम था।

"परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," इन सामान्य, कम महत्व के शब्दों की कई बार उपेक्षा की जाती है, परन्तु ये स्वर्गीय नियम और स्वर्गीय आदेश हैं जिन्हें सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप है, जो अधिक व्यावहारिक और अति गंभीर है। अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ क्रमानुसार और निरन्तर बने रहने वाला था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा जीवित हुईं और मर भी गईं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रही और कोई भी वस्तु छूटी नहीं! यह व्यवस्था बिलकुल उसी घड़ी शुरू हो गई थी जब "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है," और वह बना रहेगा और जारी रहेगा और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के लिए उस दिन तक कार्य करता रहेगा जब तक वह सृष्टिकर्ता के द्वारा रद्द न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सब वस्तुओं को बनाने और सब वस्तुओं के अस्तित्व में आने की आज्ञा की काबिलियत में प्रकट हुआ, बल्कि सब वस्तुओं पर शासन करने और सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखने और सब वस्तुओं में चेतना और जीवन देने और इसके अतिरिक्त, सब वस्तुओं को पूरी अनंतता के लिए बनाने की उसकी योग्यता में भी प्रगट हुआ था जिसे वह अपनी योजना में बनाना चाहता था ताकि वे एक ऐसे संसार में प्रगट हो सकें और अस्तित्व में आ जाएँ जिन्हें उसके द्वारा एक पूर्ण आकार और एक पूर्ण जीवन संरचना और एक पूर्ण भूमिका में बनाया गया था। यह भी इस तरह से सृष्टिकर्ता के विचारों में प्रकट हुआ जो किसी विवशता के अधीन नहीं था और समय, अंतरिक्ष और भूगोल के द्वारा सीमित नहीं किए गए थे। उसके अधिकार के समान, सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय बनी रहेगी। उसका अधिकार सर्वदा उसकी अद्वितीय पहचान का एक निरूपण और प्रतीक बना रहेगा और उसका अधिकार हमेशा उसकी अद्वितीय पहचान के अगल-बगल बना रहेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

4. स्वयं अधिकार का वर्णन परमेश्वर की सामर्थ्‍य के रूप में किया जा सकता है। पहले, यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ्‍य दोनों सकारात्मक हैं। उनका किसी नकारात्मक चीज़ से कोई संबंध नहीं है, किसी भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी से जुड़े हुए नहीं हैं। परमेश्वर अपनी सामर्थ्‍य से किसी भी तरह की चीज़ की सृष्टि कर सकता है जिनके पास जीवन और चेतना हो, यह परमेश्वर के जीवन के द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर जीवन है, इस प्रकार वह सभी जीवित प्राणियों का स्रोत है। इसके आगे, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों को परमेश्वर के हर एक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात् परमेश्वर के मुँह के वचनों के अनुसार अस्तित्व में आना, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जीना और प्रजनन करना, उसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन करता और आज्ञा देता है और उस में कभी भी कोई भूल नहीं होगी, कभी नहीं। किसी व्यक्ति या तत्व में ये चीज़ें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता ही ऐसी सामर्थ्‍य को धारण करता और रखता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता का अनोखापन है। इस प्रकार, इसके बावजूद कि वह शब्द स्वयं "अधिकार" है या इस अधिकार का सार, प्रत्येक को सिर्फ सृष्टिकर्ता के साथ ही जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान व सार का एक प्रतीक है, यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत को दर्शाता है; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी भी व्यक्ति या तत्व को "अधिकार" शब्द के साथ जोड़ा नहीं जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का अर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

5. क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? सबसे पहले, क्या परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ्‍य में कोई अन्तर है? और वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों की तुलना करते समय मनुष्य की सामर्थ्‍य को अकसर अधिकार समझ लिया जाता है। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या लोग असावधानी से इनकी अदला-बदली करने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग ऐसा करते हैं इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में कोई समाधान चाहते हो तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ्‍य और परमेश्वर के अधिकार का ज़िक्र नहीं करोगे।

मनुष्य की सामर्थ्‍य किस की ओर संकेत करती है? सरल रीति से कहें तो यह एक योग्यता या कुशलता है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा को अतिविशाल मात्रा में फैलाने या पूरा करने में सक्षम बनाती है। क्या इसे अधिकार माना जा सकता है? मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ कितनी भी बड़ी या हितकारी हों, उस व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके पास अधिकार है; कम से कम, इस प्रकार का फूलना और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के हँसी-ठट्ठे का महज एक प्रदर्शन है, ज़्यादा से ज़्यादा यह एक हँसी-ठिठोली है जिसमें शैतान अपने स्वयं के पूर्वज के समान कार्य करता है जिससे परमेश्वर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके।

अब तुम परमेश्वर के अधिकार को किस तरह से देखते हो? अब चूँकि इन शब्दों पर सहभागिता की जा चुकी है, तुम्हारे पास में परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान होना चाहिए। अतः मैं तुम लोगों से पूछता हूँ: परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ्‍य का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीज़ों के मध्य, तुमने किस में परमेश्वर के अधिकार को देखा है? तुमने उसे कैसे देखा है? मनुष्यों के द्वारा अनुभव किए जाने वाली चार ऋतुओं के सन्दर्भ में, क्या कोई बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, शीत ऋतु के मध्य आपस में परिवर्तन के नियमों को बदल सकता है? बसंत ऋतु में वृक्ष-फलते हैं; ग्रीष्म ऋतु में वे पत्तों से भर जाते हैं; शरद ऋतु में वे फल उत्पन्न करते हैं और शीत ऋतु में पत्ते झड़ते हैं। क्या कोई इन नियमों को पलट सकता है? क्या यह परमेश्वर के एक पहलू को प्रतिबिम्बित करता है? परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी है? वह किस वजह से अस्तित्व में बना हुआ है? यह वास्तव में परमेश्वर के वचन के कारण, परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में बना हुआ है। जिस वायु को परमेश्वर ने बनाया था क्या व‍ह अब भी अस्तित्व में बनी हुई है? क्या वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेता है परमेश्वर से आयी है? क्या कोई उन चीज़ों को दूर कर सकता है जो परमेश्वर से आती हैं? क्या कोई उनके सार और कार्य को पलट सकता है? क्या कोई परमेश्वर के द्वारा नियुक्त रात और दिन को, परमेश्वर के आदेशानुसार रात व दिन के नियम में गड़बड़ी कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कुछ कर सकता है? भले ही तुम रात में न सोओ, रात को दिन के समान लो, तो भी यह रात का समय ही है; तुम अपनी दिनचर्या बदल सकते हो, लेकिन तुम रात और दिन के परिवर्तन के नियम को बदलने में असमर्थ हो—और इस प्रमाणित सच्चाई को किसी भी व्यक्ति के द्वारा पलटा नहीं जा सकता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या कोई बैल की तरह शेर से भूमि जुतवा सकता है? क्या कोई हाथी को गधे में बदलने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई मुर्गी को बाज के समान आकाश में हवा में लहराने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई भेड़िऐ को भेड़ के समान घास खिलाने में सक्षम हो सकता है? (नहीं।) क्या कोई मछली को सूखी भूमि पर रहने के योग्य बनाने में सक्षम हो सकता है? यह मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता है। और क्यों नहीं? क्योंकि परमेश्वर ने मछलियों को पानी में रहने की आज्ञा दी है, इस प्रकार वे पानी में रहती हैं। वे भूमि पर जीवित रहने में सक्षम नहीं हैं, वे मर जाएँगीं; वे परमेश्वर की आज्ञाओं की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीज़ों के पास उनके अस्तित्व के लिए नियम और सीमा है, हर एक के पास उनका स्वयं का अंतःज्ञान है। इन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया है, किसी मनुष्य के द्वारा उन्हें पलटा और उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर जंगल में ही रहेगा, वह बैल के समान, जो मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के लिए काम करता है, कभी भी पालतू और विश्वासयोग्य नहीं हो सकता। यद्यपि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं और दोनों के पास चार पैर हैं, वे ऐसे जीव हैं जो साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग-अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें दो प्रकार से बाँटा गया है, उनमें से प्रत्येक के पास उनका अपना सहज ज्ञान है, इस प्रकार उन्हें कभी भी आपस में बदला नहीं जाएगा। यद्यपि मुर्गी के पास दो पैर है और बाज के समान पंख भी हैं, फिर भी वह कभी हवा में उड़ नहीं पाएगी। वह ज़्यादा से ज़्यादा एक पेड़ पर उड़ सकती है—और यह उसके सहज ज्ञान के द्वारा निर्धारित किया गया है। ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है, पर यह सब कुछ परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं के कारण हुआ है।

आज के मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को "प्रगतिशील" कहा जा सकता है, मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को "प्रभावशील" कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत लगातार बढ़ती जा रही है, परन्तु एक अति-महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ हैः मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुकी है, चन्द्रमा पर चल चुकी है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, ऊँची जीवन-शैली जी चुकी है, फिर भी, मानवजाति किसी प्राणी को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र—यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति ने कितनी भी ऊँचाइयों को क्यों न छू लिया हो, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती, वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ तय कर दी हैं; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ-वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक-दूसरे की सरहदों का अतिक्रमण नहीं सकते, वे तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहेगा, वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि किसी कार्य को कैसे करे, जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर निर्भर नहीं है; न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है, बल्कि उसे परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है। यह तथ्य है जिसे मनुष्य नकार नहीं सकता। स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें, विश्व, सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य हैं—वे सभी परमेश्वर की अधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार और सृष्टि की उत्पत्ति के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं और परिवर्तित होते हैं। कोई व्यक्ति या तत्व अपने नियमों को नहीं बदल सकता, न ही अपने स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वह कार्य करता है उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए और परमेश्वर के अधिकार के कारण ही नष्ट हो जाते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

6. परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उसके अधिकार के कारण, और उसके प्रबन्धन के कारण, सभी चीज़ें अस्तित्व में आती हैं और नष्ट हो जाती हैं। कुछ चीज़ें चुपके से आती हैं और चली जाती हैं, और मनुष्य नहीं बता सकता है कि वे कहाँ से आई थीं या उन नियमों का आभास नहीं कर सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं, और वह उन कारणों को तो बिलकुल नहीं समझ सकता है कि क्यों वे आती हैं और चली जाती हैं। यद्यपि मनुष्य वह सब कुछ देख, सुन, या अनुभव कर सकता है जो सभी चीज़ों के बीच घटित होती हैं; यद्यपि इन सब का मनुष्य पर असर पड़ता है, और यद्यपि मनुष्य अवचेतन रूप से असाधारणता, नियमितता, या विभिन्न घटनाओं की विचित्रता का आभास करता है, तब भी वह सृजनकर्ता की इच्छा और उसके मन के बारे में कुछ नहीं जानता है जो उनके पीछे होता है। उनके पीछे अनेक कहानियाँ हैं, और अनेक छिपी हुई सच्चाईयाँ हैं। क्योंकि मनुष्य सृजनकर्ता से दूर भटक गया है, क्योंकि वह इस तथ्य को नहीं स्वीकार करता है कि सृजनकर्ता का अधिकार सभी चीज़ों पर शासन करता है, इसलिए वह उस हर एक चीज़ को कभी नहीं जानेगा और समझेगा जो उसकी संप्रभुता के अधीन होती है। क्योंकि अधिकांश भागों में, परमेश्वर का नियन्त्रण और संप्रभुता मानवीय कल्पना, मानवीय ज्ञान, मानवीय समझ, और जो कुछ मानव-विज्ञान प्राप्त कर सकता है उन सीमाओं से बहुत बढ़ कर है, इसलिए सृजन की गई मानवजाति की क्षमताएँ इससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

7. "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यजाति को बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने इन शब्दों को कहा, एक इंद्रधनुष मनुष्य की आँखों के सामने प्रगट हो गया, जहाँ वो आज तक मौजूद है। हर किसी ने ऐसे इंद्रधनुष को देखा है और जब तुम उसे देखते हो तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसे प्रगट होता है? विज्ञान इसे साबित करने में या उसके स्रोत को ढूँढ़ने में या उसके उद्गम स्थान को पहचानने में नाकाम है। क्योंकि इंद्रधनुष उस वाचा का चिन्ह है जो सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच में बांधी गयी थी; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, यह मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया गया था, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। अपने वचनों को कहने के बाद यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता है। मनुष्य और अपनी प्रतिज्ञा के साथ अपनी वाचा में बने रहने के लिए सृष्टिकर्ता ने अपनी विशिष्ट पद्धति का उपयोग किया और इस प्रकार उसने वाचा के चिन्ह के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग किया जिसे उसने एक स्वर्गीय आदेश और व्यवस्था ठहराया है जो हमेशा अपरिवर्तनीय बना रहेगा, भले ही वह सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानवजाति के संबंध में। फिर भी, ऐसा कहना ही होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था, सभी चीज़ों की सृष्टि के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और सच्चा प्रकटीकरण है और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य असीमित है; उसके द्वारा इंद्रधनुष को एक चिन्ह के रूप में इस्तेमाल करना सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता और विस्तार है। अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए यह परमेश्वर द्वारा किया गया एक और कार्य था और अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जो वाचा बाँधी थी यह उसका एक चिन्ह था। उसने मनुष्य को बताया कि उसने क्या करने का संकल्प लिया है और यह भी कि वह किस रीति से पूर्ण और प्राप्त होगा और इस तरह से परमेश्वर के मुख के वचनों से वह विषय पूरा हो गया। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ्‍य है और आज इन वचनों के बोले जाने के कई हज़ार साल बाद भी मनुष्य परमेश्वर के मुख से बोले गए इंद्रधनुष को देख सकता है। क्योंकि परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के कारण, इंद्रधनुष बिना किसी बदलाव और परिवर्तन के आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बना हुआ है। इस इंद्रधनुष को कोई भी हटा नहीं सकता है, कोई भी इसके नियमों को बदल नहीं सकता है। यह सिर्फ परमेश्वर के वचनों के लिए ही अस्तित्व में बना हुआ है। यह बिलकुल सही अर्थ में परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन के समान ही भला है और उसका वचन पूरा होगा और जो कुछ पूरा हो गया है वह सर्वदा बना रहेगा।" ऐसे वचन यहाँ पर साफ-साफ अभिव्यक्त हुए हैं और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्पष्ट चिन्ह और गुण है। ऐसा चिन्ह और गुण सृजित किए गए प्राणियों में से किसी के भी पास नहीं है और न ही देखे गए हैं और न ही इसे गैर-सृजित प्राणियों में से किसी के भी पास देखा गया है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर में है और केवल सृष्टिकर्ता के द्वारा धारण की गई पहचान और सार को अन्य जीवधारियों से पृथक करता है। इसके अलावा, परमेश्वर को छोड़, सृजित या गैर-सृजित प्राणियों में से कोई भी, परमेश्वर के ठहराये चिन्ह से आगे नहीं बढ़ सकता है।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के साथ वाचा बाँधना एक अति महत्वपूर्ण कार्य था। एक ऐसा कार्य था जिसका उपयोग वह मनुष्य तक एक सच पहुँचाने और मनुष्य को अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था और आखिर में उसने एक अद्वितीय पद्धति का इस्तेमाल करते हुए, मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए एक विशिष्ट चिन्ह का उपयोग किया, जो मनुष्य के साथ बांधी गयी वाचा का एक चिन्ह था। अतः क्या इस वाचा का ठहराया जाना एक बड़ी घटना थी? और वह घटना कितनी बड़ी थी? वास्तव में यही वह बात है जो इस वाचा को विशेष बनाती हैः यह एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच या एक समूह और दूसरे समूह के बीच या एक देश और दूसरे देश के बीच ठहराई गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण मानवजाति के बीच ठहराई गई वाचा है और यह तब तक प्रमाणित बनी रहेगी जब तक सृष्टिकर्ता सब वस्तुओं का उन्मूलन न कर दे। इस वाचा का प्रतिपादन करने वाला सृष्टिकर्ता है और इसको बनाए रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानवजाति के साथ ठहराई गई इंद्रधनुष की वाचा की सम्पूर्णता सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य हुए संवाद के अनुसार पूर्ण और प्राप्त हुई थी और आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बनी हुई है। सृजित जीवधारी समर्पण करने, आज्ञा मानने, विश्वास करने, प्रशंसा करने, गवाही देने और सृष्टिकर्ता के अधिकार की स्तुति करने के सिवाए और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और के पास ऐसी वाचा को ठहराने का अधिकार नहीं है। इंद्रधनुष का प्रकटीकरण बार-बार मानवजाति के लिए घोषणा करता है और उसके ध्यान को सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य बांधी गयी वाचा की ओर खींचता है। सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य ठहराई गयी वाचा के निरन्तर प्रकटीकरण में, इंद्रधनुष या वाचा को प्रगट नहीं किया जाता, वरन सृष्टिकर्ता के अपरिर्वतनशील अधिकार को प्रगट किया जाता है। बार-बार इंद्रधनुष का प्रकटीकरण छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के ज़बर्दस्त और अद्भुत कार्यों को दर्शाता है और उसी समय यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का अतिआवश्यक प्रतिबिम्ब है और वह कभी नहीं बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक और पहलू का प्रकटीकरण नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

8. उत्पत्ति 18:18 में "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी।" इसे पढ़ने के बाद, क्या तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को महसूस सकते हो। क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की असाधारणता का एहसास कर सकते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता का एहसास कर सकते हो? परमेश्वर के वचन निश्चित हैं। परमेश्वर सफलता में अपने आत्मविश्वास के कारण या इसके प्रदर्शन के लिए इन वचनों को नहीं कहता है; बल्कि, उसका इन्हें कहना परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं और एक आज्ञा है जो परमेश्वर के वचन को पूरा करती है। यहाँ पर दो अभिव्यक्तियाँ हैं जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर ने कहा, "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी," तो क्या इन वचनों में अनिश्चितता का कोई तत्व है? क्या चिंता की कोई बात है? क्या इस में भय की कोई बात है? परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों में "निश्चय होगा" और "होगा" जैसे शब्दों के कारण, इन तत्वों ने, जो खास तौर से मनुष्यों के लिए हैं और अक्सर उन में प्रदर्शित होते हैं, सृष्टिकर्ता से कभी कोई रिश्ता नहीं बनाया है। किसी को शुभकामना देते समय कोई इन शब्दों का इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं करेगा, किसी में यह हिम्मत नहीं होगी कि ऐसी निश्चितता के साथ किसी दूसरे को एक महान और सामर्थी जाति बनने की आशीष दे या प्रतिज्ञा करे कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसमें आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने अधिक निश्चित होंगे, उतने ही अधिक वे किसी चीज़ को साबित करेंगे—और वह कोई चीज़ क्या है? वे साबित करेंगे कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है कि उसका अधिकार इन कामों को पूरा कर सकता है और उनका पूरा होना अनिवार्य है। परमेश्वर अपने हृदय में निश्चित था, उसे किसी बात का कोई संकोच या संन्देह नहीं था, उन सब बातों के विषय में भी जिनके द्वारा उसने अब्राहम को आशीष दी थी। इसके आगे, इसकी सम्पूर्णता उसके वचन के अनुसार पूरी हो जाएगी और कोई भी ताकत उसकी पूर्णता को बदलने, बाधित करने, चोट पहुँचाने या परेशान करने में सक्षम नहीं होगी। जो हुआ उसके बावजूद, परमेश्वर के वचनों की पूर्णता और उपलब्धि को कोई भी रद्द नहीं कर सकता है। यह सृष्टिकर्ता के मुँह से बोले गए वचनों की सामर्थ्‍य है और सृष्टिकर्ता का अधिकार है जो मनुष्य के इन्कार को सह नहीं सकता है! इन शब्दों को पढ़ने के बाद भी, क्या तुम लोगों के मन में सन्देह है? इन वचनों को परमेश्वर के मुँह से कहा गया था और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्‍य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार को और प्रमाणित तथ्यों की पूर्णता की अनिवार्यता को, किसी भी सृजित किए गए प्राणी और गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और न ही कोई सृजित प्राणी और गैर-सृजित प्राणी उससे बढ़कर उत्कृष्ट हो सकता है। केवल सृष्टिकर्ता ही मानवजाति के साथ ऐसे अन्दाज़ और ऊँची और नीची आवाज़ में बात कर सकता है और तथ्यों ने साबित किया है कि उसकी प्रतिज्ञाएँ खोखले शब्द या बेकार की घमण्ड की बातें नहीं हैं, बल्कि अद्वितीय अधिकार का प्रदर्शन हैं जिससे कोई व्यक्ति, वस्तु या पदार्थ बढ़कर नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

9. जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा" तो यह वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी और "इंद्रधनुष की वाचा" के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा भी थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, मनुष्य चाहे इसे किसी भी नज़रिए से देखे और इसे कितना महत्व दे, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार शब्दशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और विचारधारा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचनों को बदला नहीं जाएगा और न ही किसी व्यक्ति, वस्तु या तत्व में हुए बदलाव के कारण इसे पलटा जाएगा। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य है, वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है या कुछ भी को शून्य बना सकता है और वह जीवित वस्तुओं से लेकर मृत वस्तुओं तक, सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है और इस प्रकार परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह सुनने में मनुष्य को परियों की कहानी के समान बहुत बढ़िया लगता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं रहता और न ही यह परियों की कहानी होता है। बल्कि यह एक सच्चाई है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसकी तारीफ करते हो? क्या ये तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंश अनगिनत थे? और कितने अनगिनत? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" इतने अनगिनत जितना परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे संसार में सब जातियों और प्रदेशों में फैल गए थे? और इस तथ्य को किसने पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों के कहे जाने के सैकड़ों और हज़ारों सालों बाद भी परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए और निरन्तर सच साबित हो रहे थे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आरंभ में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द ही हो गया और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया और उसकी प्राप्ति और सम्पूर्णता में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव त्वरित थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार के दूसरे पहलू को देखने की मंजूरी दी और उसने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के उस अधिकार को देखने की अनुमति दी जिसका अनुमान लगाना सम्भव नहीं और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अत्‍युत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

10. परमेश्वर का अधिकार रूक-रूककर नहीं जगमगाता, ना ही वह आता-जाता है और कोई नहीं माप सकता कि उसका अधिकार कितना विशाल है। चाहे कितना भी समय बीत जाए, जब परमेश्वर किसी मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहती है और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार के विधान को धारण करेगी और मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति को बार-बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह के वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक क्या, उसके अधिकार के द्वारा प्राप्त सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है और उस में कुछ भी दोष नहीं है। दूसरे शब्दों में उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार और सभी कार्य जो उसने पूरे किये हैं, वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य को बताने में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को प्राप्त करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार-चढ़ाव आए हों—यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी-अभी बोला गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति से करता है, लगातार सुधि ले सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है, इससे निरपेक्ष कि प्रतिज्ञा क्या है, इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना लम्बा समय लगेगा, उसका दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि-इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा और इसे साकार किया जाएगा और उसके पूर्ण होने या साकार होने में उसे ज़रा-सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

11. परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद, परमेश्वर वहाँ खड़ा न रहा जहाँ पर वह था, न ही उसने अपने सन्देशवाहकों को काम पर लगाकर यह देखने के लिए इन्तज़ार किया कि इसका परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा तो परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन के अधीन, सभी चीज़ें उस कार्य के साथ मेल खाने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था और लोगों, चीज़ों और तत्वों को तैयार किया गया जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य है कि जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन बोले गए, परमेश्वर के अधिकार ने पूरी भूमि पर काम करना प्रारम्भ कर दिया और उसने अब्राहम और अय्यूब से की गई प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने और उन्हें पूरा करने के लिए एक क्रम ठहरा दिया, इसी बीच उसने सब के लिए हर प्रकार की उचित योजना बनाई और तैयारियाँ की जिसे पूरा करने की उसने योजना बनाई थी जो हर एक कदम और हर एक मुख्य चरण के लिए जरूरी था। इस दौरान, परमेश्वर ने न केवल अपने सन्देशवाहकों को कुशलता से इस्तेमाल किया, बल्कि सभी चीज़ों को भी कुशलता से इस्तेमाल किया जिन्हें उसके द्वारा बनाया गया था। कहने का तात्पर्य है कि वह दायरा जिसके भीतर परमेश्वर के अधिकार को इस्तेमाल किया गया था उसमें न केवल सन्देशवाहक शामिल थे, वरन, वे सभी चीज़ें भी शामिल थीं, जिन्हें उस कार्य के मेल में कुशलता से उपयोग किया गया था जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशेष रीतियाँ थीं जिनके तहत परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल किया गया था। तुम लोगों की कल्पनाओं में, कुछ लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती हैः परमेश्वर के पास अधिकार है, सामर्थ्‍य है और इस प्रकार परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में रहने की ज़रूरत है या एक ही स्थिर जगह में रहने की जरूरत है और किसी विशेष कार्य को करने की जरूरत नहीं है, परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य उसके विचारों के भीतर ही पूरा होता है। कुछ लोग यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी थी, फिर भी परमेश्वर को और कुछ करने की जरूरत नहीं थी, और उसके लिए मात्र अपने वचनों को कहना ही काफी था। क्या ऐसा वास्तव में हुआ था? साफ तौर पर नहीं! यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी उसका अधिकार सही और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी बनाई सभी चीज़ों, सभी चीज़ों पर उसके नियन्त्रण और उस प्रक्रिया में प्रकाशित और साकार हो रहे हैं, जिनके द्वारा वह मानवजाति की अगुवाई और उनका प्रबन्धन करता है। हर पद्धति, हर दृष्टिकोण और मानवजाति और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता का हर विवरण और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीज़ों की उसकी समझ-उन सभी ने शाब्दिक रूप से यह साबित किया है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्‍य निरन्तर और सभी चीज़ों में प्रदर्शित और प्रकाशित हुए हैं। ये प्रकटीकरण और प्रकाशन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बात करते हैं, क्योंकि वह अपने कार्य को जारी रखने और सभी चीज़ों को आज्ञा देने, हर घड़ी सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल कर रहा है, उसके अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान स्वर्गदूत या परमेश्वर के सन्देशवाहक नहीं ले सकते। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि वह किस प्रकार की आशीषों को अब्राहम और अय्यूब को देगा—यह परमेश्वर पर निर्भर था। भले ही परमेश्वर के सन्देशवाहकों ने व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब से मुलाकात की, फिर भी उनकी गतिविधियाँ परमेश्वर के वचन के अनुसार थीं, परमेश्वर के अधिकार के अधीन थीं और वे परमेश्वर की संप्रभुता के भी अधीन थे। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर के सन्देशवाहकों को अब्राहम से मिलते हुए देखता है, यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से बाइबल के लेखों में कुछ करते हुए नहीं देखता है, वास्तव में, परमेश्वर स्वयं ही अधिकार और सामर्थ्‍य का सचमुच में उपयोग करता है और यह किसी मनुष्य से कोई सन्देह बर्दाश्त नहीं करता! यद्यपि तुम देख चुके हो कि स्वर्गदूतों और सन्देशवाहकों के पास बड़ी सामर्थ्‍य होती है, उन्होंने चमत्कार किए हैं या परमेश्वर के आदेशानुसार कुछ चीज़ों को किया है, उनके कार्य मात्र परमेश्वर के आदेशों को पूरा करने के लिए होते हैं, किसी भी अर्थ में परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या वस्तु के पास सभी चीज़ों को बनाने और सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है, न ही वे उन्हें धारण करते हैं। इस प्रकार कोई मनुष्य और वस्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार का इस्तेमाल या उसे प्रकट नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

12. आओ हम पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें: "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, उसने बस एक बात कहीः "हे लाज़र, निकल आ!" तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु के द्वारा बोली गयी एक पंक्ति के कारण पूरा हुआ था। इस अवधि के दौरान, प्रभु यीशु ने कोई वेदी स्थापित नहीं की, और उसने कोई अन्य गतिविधि नहीं की। उसने बस एक बात कही। क्या इसे एक चमत्कार कहा जाएगा या एक आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम लोग इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो तो, निस्संदेह तुम लोग इसे तब भी एक चमत्कार ही कह सकते हो। हालाँकि, इसे किसी आत्मा को मृत से वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है, और कोई जादू-टोना तो बिल्कुल भी नहीं। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, एक छोटा सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार, और उसकी क्षमता है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति के मरने का अधिकार है, और उसकी आत्मा का उसके शरीर को छोड़ने और अधोलोक में, या जहाँ कहीं भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है, और मृत्यु के बाद वह कहाँ जाता है—यह सब परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह इसे किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है। वह मनुष्यों, घटनाओं, पदार्थों, अंतरिक्ष, या स्थान के द्वारा विवश नहीं होता है। यदि वह इसे करना चाहता है तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन, और उसके अधिकार के द्वारा जीवित रहते हैं और मरते हैं। वह एक मृत व्यक्ति का पुनरुत्थान कर सकता है—यह भी कुछ ऐसा है जिसे वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृतक में से वापस लाने जैसा कुछ किया, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान को दिखाने के लिए, तथा मनुष्य और शैतान को जानने देने के लिए प्रमाण देना था कि मनुष्यजाति की सभी चीज़ें, और मनुष्यजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर के द्वारा निर्धारित होते हैं, और यह कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी हमेशा की तरह, उसने इस भौतिक संसार को जिसे देखा जा सकता है और साथ ही आध्यात्मिक संसार को जिसे मनुष्य देख नहीं सकते हैं, अपने नियंत्रण में बनाए रखा था। यह इसलिए था कि मनुष्य और शैतान जान लें कि मनुष्यजाति का सब कुछ शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मनुष्यजाति का जीवन और उनकी मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु के द्वारा लाज़र का पुनरूत्थान—इस प्रकार का दृष्टिकोण मनुष्यजाति को शिक्षा और निर्देश देने के लिए सृजनकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था जिसमें उसने मनुष्यजाति को निर्देश देने, और मनुष्यों के भरण पोषण के लिए अपनी क्षमता और अधिकार का उपयोग किया था। सभी चीज़ों के उसके नियंत्रण में होने के सत्य को मनुष्यजाति को देखने देने का यह सृजनकर्ता का एक वचनों से रहित तरीका था। यह व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मनुष्यजाति को यह बताने का उसका एक तरीका था कि उसके माध्यम के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मनुष्यजाति को इस प्रकार का मूक निर्देश देने का उसका उपाय सर्वदा बने रहता है—यह अमिट है, और इसने मनुष्य के हृदय को एक आघात और प्रबुद्धता दी है जो कभी धूमिल नहीं हो सकती है। लाज़र के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की—इसका परमेश्वर के हर एक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह ऐसे प्रत्येक व्यक्ति में जो गहराई से इस घटना को समझता है, इस समझ को, दर्शन को मज़बूती से जड़ देता है कि केवल परमेश्वर ही मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

13. यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है और अपने वचनों के प्रति सच्चा बना रहता है। उसकी कड़ाई और उसके कार्यों के सिद्धांत सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बाधा पहुँचाई है, जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के अनुसार होता है, ठीक उसके अनुसार होता है जो कुछ उसके मुँह से निकला था, वह अपनी योजना के क्रम और उद्देश्य का अनुसरण करता है। ऐसा कहने की कोई आवश्यकता नहीं है, जिन चीज़ों पर परमेश्वर शासन करता है वे भी सिद्धांतों का पालन करती हैं, उसके अधिकार के प्रबन्धों से कोई मनुष्य या चीज़ बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण दण्ड भुगतते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता के अधिकार को बदला नहीं जा सकता है और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार को दिखाया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। चाहे स्वर्ग और पृथ्वी किसी बड़े उथल-पुथल से गुज़रें, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी अदृश्य नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और उल्लंघन न किए जा सकने वाले अधिकार का सार है और यह सृष्टिकर्ता की वही अद्वितीयता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

14. तुम प्रतिदिन कहाँ जाओगे, तुम क्या करोगे, तुम किस व्यक्ति का या चीज़ का सामना करोगे, तुम क्या कहोगे, तुम्हारे साथ क्या होगा—क्या इसमें से किसी की भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं को पहले से नहीं देख सकते हैं, और जिस प्रकार वे विकसित होती हैं उसको तो बिलकुल भी नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। जीवन में, पहले से देखी न जा सकने वाली ये घटनाएँ हर समय घटित होती हैं, और ये प्रतिदिन घटित होने वाली घटनाएँ हैं। ये दैनिक उतार-चढ़ाव और तरीके जिन्हें वे प्रकट करते हैं, या ऐसे तरीके जिनके द्वारा वे घटित होते हैं, मानवजाति के लिए निरन्तर अनुस्मारक हैं कि कुछ भी बस यूँ ही नहीं होता है, यह कि विकास का मार्ग जो ये चीज़ें अपनाती हैं उसे, और उनकी अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। हर घटना सृजनकर्ता की ओर से मनुष्यजाति को दी गई झिड़की को सूचित करती है, और यह सन्देश भी देती है कि मानवजाति अपने भाग्य को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, साथ ही हर घटना मानवजाति की अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की निराधार, व्यर्थ महत्वाकांक्षा और इच्छा का खण्डन है। ये मानव जाति के कान के पास एक के बाद एक मारे गए जोरदार थप्पड़ों के समान हैं, जो लोगों को पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती हैं कि अंत में कौन उनके भाग्य पर शासन और नियन्त्रण करता है। और जब मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ लगातार नाकाम और ध्वस्त होती हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से उस चीज़ के लिए एक अचैतन्य स्वीकृति पर आ जाते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखा है, और स्वर्ग की इच्छा और सृजनकर्ता की संप्रभुता की वास्तविकता की स्वीकृति पर आ जाते हैं। सम्पूर्ण मानवजीवन के भाग्य के इन दैनिक उतार-चढ़ावों से, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृजनकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता हो; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता हो कि "सृजनकर्ता के अधिकार से आगे बढ़ा नहीं जा सकता है," जो इस शाश्वत सत्य को सूचित नहीं करता हो कि "सृजनकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

15. बड़ा होने के मार्ग में कोई व्यक्ति जब लोगों का सामना करता है, और जिन चीजों के सम्पर्क में व‍ह आता है, वे सभी अनिवार्य रूप से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी व्यवस्था से जुड़े होते हैं। लोग इस प्रकार के जटिल पारस्परिक सम्बन्धों को पहले से नहीं देख सकते हैं, और न ही वे उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं या उनकी थाह पा सकते हैं। बहुत सी अलग-अलग चीज़ों और बहुत से अलग-अलग लोगों का उस परिवेश पर प्रभाव पड़ता है जिसमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है, और कोई मनुष्य सम्बन्धों के इतने विशाल जाल की व्यवस्था और आयोजन करने में समर्थ नहीं है। सृजनकर्ता को छोड़ कर कोई व्यक्ति या चीज़ भी अनेक प्रकार के अलग-अलग लोगों, घटनाओं, और चीज़ों के रंग-रूप, उपस्थिति, तथा उनके लुप्त होने को नियन्त्रित नहीं कर सकती है, और यह केवल सम्बन्धों का इतना विशाल जाल ही है जो किसी व्यक्ति के विकास को सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत किए गए अनुसार आकार देता है, अनेक प्रकार के परिवेशों का निर्माण करता है जिनमें लोग बड़े होते हैं, तथा सृजनकर्ता के प्रबंधन के कार्य के लिए आवश्यक अनेक भूमिकाओं की रचना करता है, लोगों के लिए ठोस और मज़बूत बुनियाद डालता है ताकि वे सफलतापूर्वक अपने ध्येयों को पूरा करें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

16. कोई व्यक्ति ऐसे लोगों या कारकों का चुनाव नहीं कर सकता है जिनकी नसीहतों और प्रभाव के अधीन वह बड़ा होता या होती है। कोई यह चुनाव नहीं कर सकता है कि वह कौन सा ज्ञान या कौशल हासिल करता है, और वह कौन सी आदतें निर्मित करता है। इस पर किसी का कोई वश नहीं है कि कौन उसके माता-पिता और सगे सम्बन्धी हैं, वह किस प्रकार के परिवेश में बड़ा होता है; लोगों, घटनाओं, और अपने आस-पास की चीज़ों के साथ उसके रिश्‍ते, और वे किस प्रकार उसके विकास को प्रभावित करते हैं, ये सब उसके नियन्त्रण से परे है। तो, इन चीज़ों तो कौन तय करता है? कौन इनकी व्यवस्था करता है? चूँकि इस मामले में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होता है, चूँकि वे अपने लिए इन चीज़ों का निर्णय नहीं ले सकते हैं, और चूँकि वे स्वाभविक रूप से आकार नहीं लेती हैं, तो स्पष्ट है कि इन सब चीज़ों की रचना सृजनकर्ता के हाथों में है। कहने की कोई आवश्कता नहीं कि ठीक जैसे सृजनकर्ता हर एक व्यक्ति के जन्म की विशेष परिस्थितियों की व्यवस्था करता है, वैसे ही वह उन विशिष्ट परिस्थितियों की भी व्यवस्था करता है जिनमें कोई व्यक्ति बड़ा होता है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं, और उस के आस-पास की चीज़ों में परिवर्तन लाता है, तो उस व्यक्ति का बड़ा होना और उसका विकास आवश्यक रूप से उन्हें भी प्रभवित करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का जन्म गरीब परिवारों में होता है, किन्तु वे धन सम्पत्ति के साथ बड़े होते हैं; अन्य लोग समृद्ध परिवारों में जन्म लेते हैं किन्तु अपने परिवारों के सौभाग्य के पतन का इस तरह से कारण बनते हैं, कि वे गरीब परिवेश में बड़े होते हैं। किसी का भी जन्म नियत नियमों के द्वारा शासित नहीं होता है, और कोई भी व्यक्ति परिस्थतियों की अनिवार्य, नियत श्रृंखला के अधीन बड़ा नहीं होता है। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिनका कोई व्यक्ति अनुमान लगा सकता है या नियन्त्रण कर सकता है; ये उसके भाग्य के परिणाम हैं, और उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित होते हैं। निस्संदेह, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें सृजनकर्ता के द्वारा किसी व्यक्ति के भाग्य के लिए पूर्वनियत किया जाता है, उन्हें उस व्यक्ति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के द्वारा, और उसके लिए उसकी योजनाओं के द्वारा, निर्धारित किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

17. जब कोई अपने माता-पिता को छोड़ देता है और स्वावलंबी हो जाता है, तो जिन सामाजिक स्थितियाँ का वह सामना करता है, और उसके लिए उपलब्ध कार्य व जीवनवृत्ति का प्रकार दोनों भाग्य द्वारा आदेशित होते हैं और उनका उसके माता-पिता के साथ कोई लेना देना नहीं होता है। कुछ लोग महाविद्यालय में अच्छे मुख्य विषय चुनते हैं और अंत में स्नातक के पश्चात् एक संतोषजनक नौकरी पाते हैं, और अपने जीवन की यात्रा में पहली विजयी छलांग लगाते हैं। कुछ लोग कई विभिन्न कौशलों को सीखते और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और फिर भी ऐसी नौकरी नहीं ढूँढ़ पाते हैं जो उनके अनुकूल हो या अपने पद को नहीं पाते हैं, जीवनवृत्ति तो बिलकुल नहीं पाते हैं; अपनी जीवन यात्रा के आरम्भ में वे अपने आप को हर एक मोड़ पर कुंठित, परेशानियों से घिरा हुए, अपने भविष्य को निराशाजनक और अपने जीवन को अनिश्चित पाते हैं। कुछ लोग स्वयं को कर्मठतापूर्वक अपने अध्ययनों में लगा देते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा पाने के अपने सभी अवसरों से बाल-बाल चूक जाते हैं, और कभी सफलता हासिल नहीं करने के लिए भाग्य के द्वारा निर्दिष्ट होते हैं, अपनी जीवन यात्रा में उनकी सबसे पहली आकांक्षा विशाल शून्य में गायब हो जाती है। न जानते हुए[क] कि आगे का मार्ग निर्बाध है या पथरीला, वे पहली बार महसूस करते हैं कि प्रभावित करने वाली कितनी चीज़ों से मनुष्य की नियति भरी हुई है, और इसलिए वे आशा और भय के साथ जीवन का सम्मान करते हैं। कुछ लोग, बहुत अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होने के बावजूद, पुस्तकें लिखते हैं और बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं; कुछ, यद्यपि पूरी तरह से अशिक्षित होते हैं, फिर भी व्यवसाय में पैसा कमाते हैं और परिणामस्वरूप स्वयं का खर्च वहन करने में समर्थ होते हैं...। कोई व्यक्ति कौन सा व्यवसाय चुनता है, कोई व्यक्ति कैसे जीविका अर्जित करता है: क्या लोगों का इस पर कोई नियन्त्रण है कि वे अच्छा चुनाव करते हैं या बुरा चुनाव? क्या वे उनकी इच्छाओं एवं निर्णयों के अनुरूप होते हैं? अधिकांश लोग चाहते हैं कि वे कम काम करें और अधिक कमा सकें, धूप और बरसात में परिश्रम न करें, अच्छे कपड़े पहनें, हर जगह जगमगाएँ और चमकें, दूसरों से ऊँचा उठें, और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाएँ। लोगों की इच्छाएँ बहुत उत्तम होती हैं, किन्तु जब लोग अपने जीवन की यात्रा में अपना पहला कदम उठाते हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे समझ में आने लगता है कि मनुष्यों के भाग्य कितने अपूर्ण है, पहली बार सचमुच में यह तथ्य उनकी समझ में आता है कि, यद्यपि कोई व्यक्ति अपने भविष्य के लिए सुस्पष्ट योजना बना सकता है, यद्यपि कोई साहसिक कल्पनाओं को आश्रय दे सकता है, फिर भी किसी के पास भी अपने सपनों को साकार करने की योग्यता या सामर्थ्य नहीं होती है, और कोई भी अपने स्वयं के भविष्य को नियन्त्रित करने की स्थिति में नहीं होता है। किसी व्यक्ति के सपनों और उन सच्चाईयों के बीच हमेशा कुछ दूरी रहेगी जिनका उसे सामना करना होगा; चीज़ें वैसी कभी नहीं होती हैं जैसा कोई व्यक्ति चाहता है कि वे हों, और जब ऐसी सच्चाईयों से सामना होता है तो लोग कभी भी संतुष्टि या तृप्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग अपनी स्वयं की नियति को बदलने के प्रयास में, हर संभव हद तक जाएँगे, वे अपनी जीविका और भविष्य के वास्ते बहुत अधिक प्रयास करेंगे और बड़े-बड़े बालिदन करेंगे। किन्तु अंत में, भले ही वे अपने सपनों और इच्छाओं को अपने स्वयं के कठिन परिश्रम के माध्यम से साकार कर सकते हैं, फिर भी वे अपने भाग्य को कभी बदल नहीं सकते हैं, और भले ही वे कितने ही दृढ़ निश्चय के साथ कोशिश क्यों न करें वे कभी भी उससे आगे नहीं बढ़ सकते हैं जो नियति ने उन्हें आवंटित किया है। योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं की परवाह किए बिना, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता है। कोई किस व्यवसाय की खोज करता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, ये उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

18. जन्म और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा, बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बस एक औपचारिक परिवेश प्रदान करना है, क्योंकि सृजनकर्ता के पूर्वनियोजन के अलावा किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कोई भी इस चीज़ को नियन्त्रित नहीं कर सकता है कि किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा; इसे बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित किया जाता है, और यहाँ तक कि किसी के माता-पिता भी उसके भाग्य को नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है, और हर किसी का अपना स्वयं का भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को नहीं टाल सकते हैं या उस भूमिका पर जरा सा भी प्रभाव नहीं डाल सकते हैं जिसे वह जीवन में निभाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना नियत किया जाता है, और वह परिवेश जिसमें वह बड़ा होता है, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए उन पूर्व शर्तों से बढ़कर और कुछ नहीं हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के जीवन के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके बीच कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका को ग्रहण करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के जीवन जीने के परिवेश में अपनी भूमिका को निभाता है ये पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, कोई भी अन्य वस्तुनिष्ठ स्थितियाँ किसी व्यक्ति के ध्येय को प्रभावित नहीं कर सकती हैं, जो सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया जाता है। सभी लोग बड़े होने के अपने स्वयं के विशेष परिवेश में परिपक्व होते हैं, तब धीरे-धीरे, उत्तरोत्तर, जीवन में अपने स्वयं के मार्गों में चल पड़ते हैं, उन नियतियों को पूरा करते हैं जिन्हें सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए नियोजित किया गया था, स्वाभाविक रूप से, अनायास ही मानवजाति के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में अपने स्वयं के पदों को ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के वास्ते, उसकी संप्रभुता के वास्ते, सृजित किए गए प्राणियों के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना शुरू करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

19. यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पूर्ववर्ती जीवन पर नियत था, तो उसकी मृत्यु उसकी नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके ध्येय का आरम्भ है, तो उसकी मृत्यु उसके उस ध्येय के अन्त को चिह्नित करती है। चूँकि सृजनकर्ता ने किसी व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय निर्धारित किया है, इसलिए स्पष्ट है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति अकस्मात पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अप्रत्याशित नहीं होती है, और जन्म और मृत्यु दोनों ही उसके पिछले और वर्तमान जीवन से आवश्यक रूप से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति की जन्म और मृत्यु की परिस्थितियाँ सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित की जाती हैं; यह किसी व्यक्ति की नियति है, और किसी व्यक्ति का भाग्य है। जैसे किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, वैसे ही हर एक व्यक्ति की मृत्यु भी विशेष परिस्थितियों के एक भिन्न समुच्चय में होगी, इसलिए लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और उनकी मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग मज़बूत और स्वस्थ्य होते हैं और फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमज़ोर और बीमार होते हैं फिर भी अपने बुढ़ापे तक जीवित रहते हैं, और शान्तिपूर्वक मर जाते हैं। कुछ अप्राकृतिक कारणों से नष्ट हो जाते हैं, और अन्य प्राकृतिक कारणों से। कुछ घर से दूर अपने जीवन को समाप्त करते हैं, अन्य अपने प्रियजनों के साथ उनके सानिध्य में अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं। कुछ अधर में मरते हैं, अन्य धरती के नीचे। कुछ पानी के नीचे डूब जाते हैं, अन्य आपदाओं में खो जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ...हर कोई एक शानदार जन्म, एक शानदार ज़िन्दगी, और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी स्वयं की नियति का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, कोई भी सृजनकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। मनुष्य अपने भविष्य के लिए सभी प्रकार की योजनाएँ बना सकता है, परन्तु कोई भी अपने जन्म के तरीके और समय की और संसार से अपने प्रस्थान की योजना नहीं बना सकता है। यद्यपि लोग मृत्यु को टालने और उसका प्रतिरोध करने की भरसक कोशिश करते है, फिर भी, उनके जाने बिना, मृत्यु ख़ामोशी से पास चली आती है। कोई नहीं जानता है कि वह कब मरेगा या वह कैसे मरेगा, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानता है कि वह कहाँ मरेगा। स्पष्ट रूप से, न तो मानवजाति, न ही इस प्राकृतिक संसार में कोई प्राणी, जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य रखता है, परन्तु केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य रखता है, जिसका अधिकार अद्वितीय है। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु प्राकृतिक संसार के कुछ नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृजनकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का एक परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

20. तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के दौरान भले ही किसी भी प्रकार से संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए चिह्नित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह तरीका है जिससे उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण और शासन करता है। यह वही अजेयता है, नियन्त्रण और शासन का वही रूप है, जो उन नियमों के लिए ज़िम्मेदार है जो सभी चीज़ों के जीवन पर हुक्म चलाते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से घुमाते रहते हैं और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर या गहराई से तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य की वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुमने परमेश्वर के वचन का कितना अनुभव किया है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करता है। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करते हैं या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है; सभी परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप हर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है और उनकी व्यवस्था करता है। मनुष्यों के बदलने की वजह से यह नहीं बदलेगा, और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र है, और समय, अंतरिक्ष, और भूगोल में किन्ही भी परिवर्तनों के द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका वास्तविक सार है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या नहीं, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या नहीं, यह मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को ज़रा सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी प्रवृत्ति क्यों न अपनाए, यह बस इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है। भले ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न कर सकते हो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को शासित करता है; भले ही तुम उसकी संप्रभुता को नहीं जान सकते हो, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र हैं, वे मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंदों के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। यदि स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त जाएँ, तब भी उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया था। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक तथ्य है; यह आदि काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

21. जब कभी भी शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है या निरंकुश क्षति में संलग्न होता है, तो परमेश्वर बेपरवाही से चुपचाप नहीं देखता रहता है, ना ही वह अपने चुने हुओं की उपेक्षा करता है या उन्हें अनदेखा करता है। शैतान जो कुछ भी करता है वह बिलकुल स्पष्ट है और परमेश्वर के द्वारा समझा जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि शैतान क्या करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रवृत्ति को उत्पन्न करता है, परमेश्वर वह सब जानता है जिसे शैतान करने का प्रयास कर रहा है, और परमेश्वर उन लोगों को नहीं छोड़ता है जिन्हें उसने चुना है। इसके बजाए, कोई ध्यान आकर्षित किए बिना, गुप्त रूप से, चुपचाप, परमेश्वर वह सब करता है जो आवश्यक है। जब परमेश्वर किसी पर कार्य करना आरम्भ करता है, जब वह किसी को चुन लेता है, तो वह इसकी घोषणा किसी को नहीं करता है, न ही वह इसकी घोषणा शैतान को करता है, कोई भव्य भाव प्रदर्शन तो बिलकुल नहीं करता है। वह बस बहुत शान्ति से, बहुत स्‍वाभाविक रूप से जो ज़रूरी है उसे करता है। सबसे पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; उस परिवार की पृष्ठभूमि किस प्रकार की है, कौन तुम्हारे माता-पिता हैं, कौन तुम्हारे पूर्वज हैं—यह सब पहले से ही परमेश्वर के द्वारा तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, ये उसके द्वारा आवेग पर लिए गए निर्णय नहीं थे, बल्कि इसके बजाए यह ऐसा कार्य था जिसे लम्बे समय पहले शुरू किया था। जब एक बार परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवार का चुन लेता है, तो वह उस तिथि को भी चुनता है जब तुम्हारा जन्म होगा। वर्तमान में, जब तुम रोते हुए इस संसार में जन्म लेते हो तो परमेश्वर देखता है, तुम्हारे जन्म को देखता है, तुम्हें देखता है जब तुम अपने पहले शब्दों को बोलते हो, तुम्हें देखता है जब तुम लड़खड़ाते हो और डगमगाते हुए अपने पहले कदमों को उठाते हो, और सीखते हो कि कैसे चलना है। पहले तुम एक कदम लेते हो फिर दूसरा कदम लेते हो ... अब तुम दौड़ सकते हो, अब तुम कूद सकते हो, अब तुम बात कर सकते हो, अब तुम अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो। जैसे-जैसे मनुष्य बड़ा होता है, शैतान की निगाह उनमें से प्रत्येक पर जम जाती हैं, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। परन्तु अपने कार्य को करने में, परमेश्वर कभी भी मनुष्य, घटनाओं या चीज़ों, अन्तराल या समय की सीमाओं से पीड़ित नहीं हुआ है; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और वही करता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। बड़े होने की प्रक्रिया में, हो सकता है कि तुम कई चीज़ों का सामना कर सकते हो जो तुम्हारी पसन्द की न हों, बीमारियों एवं कुंठाओं का सामना कर सकते हो। परन्तु जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम्हारा जीवन और तुम्हारा भविष्य सख्ती से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। परमेश्वर तुम्हें एक विशुद्ध गारंटी देता है जो सम्पूर्ण जीवन भर बनी रहती है, क्योंकि वह, तुम्हारी रक्षा करते हुए और तुम्हारी देखभाल करते हुए, बिलकुल तुम्हारे बगल में ही है। इस बात से अनजान, तुम बड़े होते हो। तुम नई-नई चीज़ों के सम्पर्क में आने लगते हो और इस संसार को और इस मानवजाति को जानना आरम्भ करते हो। तुम्हारे लिए हर एक चीज़ ताज़ी और नयी होती है। तुम जो पसन्द करते हो उसे करना तुम्हें अच्छा लगता है। तुम अपनी स्वयं की मानवता के भीतर रहते हो, अपने स्वयं के जीवन के दायरे में भीतर जीते हो, और तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जरा सी भी अनुभूति नहीं होती है। परन्तु जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और तुम्हें देखता है जब तुम आगे की ओर हर कदम उठाते हो। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञान सीखते हो, या विज्ञान का अध्ययन करते हो, तो एक कदम के लिए भी परमेश्वर ने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा है। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान हो, इस संसार को जानने और उसके सम्पर्क में आने के दौरान, तुमने अपने स्वयं के आदर्शों को स्थापित कर लिया है, तुम्हारे अपने स्वयं के शौक, तुम्हारी स्वयं की रूचियाँ हैं, और तुम ऊँची महत्वाकांक्षाओं को भी आश्रय देते हो। तुम प्रायः अपने स्वयं के भविष्य पर विचार करते हो, प्राय: रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारा भविष्य कैसा दिखना चाहिए। परन्तु मार्ग पर चाहे कुछ भी क्यों न होता हो, परमेश्वर स्पष्ट आँखों से सब कुछ देखता है। हो सकता है कि तुम स्वयं अपने अतीत को भूल गए हो, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कोई नहीं है जो उससे बेहतर तुम्हें समझ सकता है। तुम बड़े होते हुए, परिपक्व होते हुए, परमेश्वर की दृष्टि के अधीन रहते हो। इस अवधि के दौरान, परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुछ ऐसा है जिसका कोई कभी एहसास नहीं करता है, कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें इसके बारे में नहीं बताता है। तो, सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कहा जा सकता है कि यह एक गारंटी है कि परमेश्वर एक व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, तो उसे यह करना ही होगा, और यह कार्य मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्या तुम जानते हो ये क्या है? क्या तुम लोग यह जानते हो? ऐसा लगता है कि तुम लोगों के पास इसके बारे में कोई अनुभूति नहीं है, या इसके बारे में कोई धारणा नहीं है, तो मैं तुम लोगों को बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर ने तुम पर बहुत सा कार्य सम्पन्न किया है, परन्तु हर चीज़ जो उसने की है वह उसका तुम्हें विस्तृत विवरण नहीं देता है। परमेश्वर ने जानने की तुम्हें अनुमति नहीं दी, और उसने तुम्हें नहीं बताया। हालाँकि, मनुष्य के लिए, हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह महत्वपूर्ण है। परमेश्वर के लिए, यह कुछ ऐसी चीज़ है जो उसे अवश्य करनी चाहिए। उसके हृदय में कोई महत्वपूर्ण चीज़ है जो उसे करने की आवश्यकता है जो इन चीज़ों में से किसी से भी कहीं बढ़कर है। वह है, जब मनुष्य पैदा हुआ था उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर को उनकी सुरक्षा की गारंटी अवश्य देनी चाहिए। इन वचनों को सुनने के बाद, हो सकता है कि तुम लोग ऐसा महसूस करो मानो कि तुम लोगों की समझ में पूरी तरह से नहीं आता है, यह कहो कि, "क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?" तो "सुरक्षा" का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ शांति समझते हो या हो सकता है कि तुम लोग इसका अर्थ कभी भी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छी तरह से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना समझते हो। परन्तु अपने हृदय में तुम लोगों को अवश्य जानना चाहिए कि यह उतना सरल नहीं है। तो पृथ्वी पर यह क्या चीज़ है जिसके बारे में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए सुरक्षा का क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में तुम लोगों की सुरक्षा की गारंटी है? नहीं। तो वह क्या है जो परमेश्वर करता है? इस सुरक्षा का अर्थ यह है कि तुम्हें शैतान के द्वारा निगला नहीं जा रहा है। क्या यह महत्वपूर्ण है? तुम्हें शैतान के द्वारा निगला नहीं जाता है, तो क्या यह तुम्हारी सुरक्षा से सम्बन्धित है, या नहीं? यह तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से सम्बन्धित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता है। जब एक बार तुम शैतान के द्वारा निगल लिए जाते हो, तो न तो तुम्हारी आत्मा और न ही तुम्हारा शरीर अब और परमेश्वर से संबंधित है। परमेश्वर तुम्हें अब और नहीं बचाएगा। परमेश्वर इस तरह की आत्माओं को त्याग देता है और इस तरह के लोगों को छोड़ देता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो परमेश्वर को करनी है वह है तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी देना, यह गारंटी देना कि तुम शैतान के द्वारा निगले नहीं जाओगे। यह काफ़ी महत्वपूर्ण है, है न? तो तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे सकते हो? लगता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया को महसूस नहीं कर सकते हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

22. शैतान की कभी भी यह हिम्मत नहीं हुई है कि वह परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करे, इसके अतिरिक्त, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेशों और विशेष आज्ञाओं को सावधानीपूर्वक सुना है, उनका पालन किया है, उनको चुनौती देने की कभी हिम्मत नहीं की है, वास्तव में, परमेश्वर की किसी आज्ञा को कभी खुल्लमखुल्ला पलटने की हिम्मत नहीं की है। वे सीमाएँ ऐसी ही हैं जिन्हें परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित किया, इस प्रकार शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने की हिम्मत नहीं की है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है कि परमेश्वर के प्रति कैसा आचरण करें, परमेश्वर को कैसे देखें, शैतान के पास मानवजाति से कहीं अधिक स्पष्ट समझ है, इस प्रकार, आत्मिक संसार में, शैतान परमेश्वर के अधिकार व उसके स्थान को बिलकुल साफ-साफ देखता है, उसके पास परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार के इस्तेमाल के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ है। उन्हें नज़रअन्दाज़ करने की हिम्मत वह बिलकुल भी नहीं करता है, न ही वह उन्हें किसी भी तरीके से तोड़ने की हिम्मत करता है, न ही वह ऐसा कुछ करता है जिससे परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन हो, वह किसी भी रीति से परमेश्वर के क्रोध को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता है। यद्यपि वह स्वभाव से बुरा और घमण्डी है, फिर भी उसने परमेश्वर के द्वारा उसके लिए निर्धारित सीमाओं को लाँघने की कभी हिम्मत नहीं की है। लाखों सालों से, वह कड़ाई से इन सीमाओं पालन करता रहा है, परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए हर आज्ञा और आदेश का पालन करता रहा और कभी उस निशान के पार पैर रखने की हिम्मत नहीं की। यद्यपि वह डाह करने वाला है, तो भी शैतान पतित मानवजाति से ज़्यादा "चतुर" है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान को जानता है, अपनी सीमाओं को भी जानता है। शैतान के "आज्ञाकारी" कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य स्वर्गीय आदेश है जिनका उल्लंघन शैतान के द्वारा नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर के अधिकार और अद्वितीयता के कारण सभी चीज़ें क्रमागत रीति से बदलती और बढ़ती हैं, क्योंकि मानवजाति परमेश्वर द्वारा निर्धारित जीवन-क्रम के भीतर रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं, कोई व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था में उथल-पुथल नहीं कर सकता है, कोई व्यक्ति या वस्तु इस नियम को बदलने में सक्षम नहीं है-क्योंकि वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों, सृष्टिकर्ता के आदेश और अधिकार से आते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

23. यद्यपि शैतान अय्यूब को लालच भरी नज़रों से देख रहा था, परन्तु बिना परमेश्वर की इजाज़त के उसके पास अय्यूब के शरीर के एक बाल को भी छूने की हिम्मत नहीं थी। यद्यपि वह स्वाभाविक रूप से बुरा और निर्दयी है, किन्तु परमेश्वर के द्वारा उसे आज्ञा दिये जाने के बाद, शैतान के पास उसकी आज्ञा में बने रहने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। इस प्रकार, जब शैतान अय्यूब के पास आया तो भले ही वह भेड़ों के बीच में एक भेड़िए के समान उन्माद में था, परन्तु उसने परमेश्वर द्वारा तय की गई सीमाओं को भूलने की हिम्मत नहीं की, जो कुछ भी उसने किया उसमें उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने की हिम्मत नहीं की, शैतान को परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से दूर जाने की हिम्मत नहीं हुई—क्या यह सत्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचन का विरोध करने की हिम्मत नहीं करता। शैतान के लिए, परमेश्वर के मुँह का हर एक वचन एक आदेश है, एक स्वर्गीय नियम है, परमेश्वर के अधिकार का प्रकटीकरण है—क्योंकि परमेश्वर के हर एक वचन के पीछे, उनके लिए जो परमेश्वर के आदेशों को तोड़ते हैं, जो स्वर्गीय व्यवस्थाओं की आज्ञा का पालन नहीं करते और विरोध करते हैं, परमेश्वर का दण्ड निहित है। शैतान स्पष्ट रीति से जानता है कि यदि उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ा तो उसे परमेश्वर के अधिकार के उल्लंघन करने, और स्वर्गीय व्यवस्थाओं का विरोध करने का परिणाम स्वीकार करना होगा। ये परिणाम क्या हैं? ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है, वास्तव में ये परमेश्वर के द्वारा उसे दिए जाने वाले दण्ड हैं। अय्यूब के खिलाफ शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का एक छोटा-सा दृश्य था, जब शैतान इन कार्यों को अन्जाम दे रहा था, तब वे सीमाएँ जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया था और वे आदेश जिन्हें उसने शैतान को दिया था, जो कुछ शैतान करता है उन सब के पीछे के सिद्धांतों की महज एक छोटी-सी झलक थी। इसके अतिरिक्त, इस मामले में शैतान की भूमिका और पद परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में उसकी भूमिका और पद का मात्र एक छोटा-सा दृश्य था, शैतान के द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की महज एक छोटी-सी तस्वीर थी कि किस प्रकार शैतान ने परमेश्वर के प्रबन्धन कार्य में परमेश्वर के विरूद्ध ज़रा-सा भी विरोध करने का साहस नहीं किया। ये सूक्ष्म दर्शन तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में से ऐसा कोई व्यक्ति या चीज़ नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गीय कानूनों और आदेशों का उल्लंघन कर सके, और किसी व्यक्ति या तत्व की इतनी हिम्मत नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा स्थापित की गयी इन स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को तोड़ सके, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति या तत्व नहीं है जो उस दण्ड को पलट सके या उससे बच सके जिसे सृष्टिकर्ता उसकी आज्ञा न मानने वाले लोगों को देगा। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को बना सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें प्रभाव में लाने की सामर्थ्‍य है, किसी व्यक्ति या तत्व के द्वारा मात्र सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय सामर्थ्‍य है, यह सामर्थ्‍य सभी चीज़ों में सर्वोपरि है, इस प्रकार, यह कहना नामुमकिन है कि "परमेश्वर सबसे महान है और शैतान दूसरे नम्बर में है।" सृष्टिकर्ता को छोड़ जिसके पास अद्वितीय अधिकार है, और कोई परमेश्वर नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

24. शैतान हज़ारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट करता आया है। उसने बेहिसाब मात्रा में बुराइयाँ की हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी धोखा दिया है और संसार में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य का ग़लत इस्तेमाल किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य को बहकाया है और ऐसे-ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने बार-बार परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को भ्रमित और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के अधीन सभी चीज़ें और जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित नियमों और व्यवस्थाओं के अनुसार निरन्तर बने हुए हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान का बुरा स्वभाव और अनियन्त्रित विस्तार बहुत ही गन्दा है, बहुत ही घिनौना और नीच है और बहुत ही छोटा और दुर्बल है। यद्यपि शैतान उन सभी चीज़ों के बीच भ्रमण करता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा बनाया गया है, फिर भी वह परमेश्वर की आज्ञा के द्वारा ठहराए गए लोगों, वस्तुओं या पदार्थों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। कई हज़ार साल बीत गए हैं, अभी भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए उजियाले और वायु का आनन्द उठाता है, स्वयं परमेश्वर के द्वारा फूँके गए श्वास के द्वारा साँस लेता है, अभी भी परमेश्वर के द्वारा सृजित किए गए फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीड़े-मकौड़ों का आनन्द उठाता है और परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई सभी चीज़ों का मज़ा लेता है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे का स्थान ले रहे हैं; चार ऋतुएँ हमेशा की तरह बदल रही हैं; आसमान में उड़ने वाले कलहँस इस शीत ऋतु मे उड़ जाएँगे और अगले बसंत में फिर वापस भी आएँगे; जल की मछलियाँ नदियों और झीलों को—जो उनका घर है कभी भी नहीं छोड़ती, ज़मीन के कीटपतंगे (शलभ) गर्मी के दिनों में दिल खोलकर गाते हैं; घास के झींगुर शरद ऋतु के दौरान हवा के साथ समय-समय पर धीमे स्वर में गुनगुनाते हैं; कलहँस समूहों में इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बाज एकान्त में अकेले ही रहते हैं, शेरों के कुनबे शिकार करके अपने आपको बनाए रखते हैं; बारहसिंघा घास और फूलों से दूर नहीं जाते...। सभी चीज़ों के मध्य हर प्रकार के जीवधारी चले जाते हैं फिर आ जाते हैं और फिर चले जाते हैं, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन होते हैं—परन्तु जो बदलता नहीं है वह है उनका सहज ज्ञान और ज़िन्‍दा रहने के नियम। वे परमेश्वर के प्रयोजन और परमेश्वर के पालन-पोषण के अधीन जीते हैं, कोई उनके सहज ज्ञान को बदल नहीं सकता है, न ही कोई उनके ज़िन्दा रहने के नियमों में बाधा डाल सकता है। यद्यपि मानवजाति को, जो सभी चीज़ों के बीच में जीवन बिताती है, शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जल, परमेश्वर द्वारा बनाई गई वायु, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों को ग्रहण न करने का निर्णय नहीं ले सकता है, मनुष्य फिर भी जीवित रहता है और परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस समयकाल में बढ़ता रहता है। मनुष्य का अन्तःज्ञान नहीं बदला है। मनुष्य अभी भी देखने के लिए आँखों पर, सुनने के लिए कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने हृदय पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों इत्यादि पर निर्भर है; परमेश्वर ने सब प्रकार का सहज ज्ञान मनुष्य को दिया है जिससे वह इस बात को स्वीकार कर सके कि परमेश्वर का प्रयोजन अपरिवर्तनीय बना रहता है, वे योग्यताएँ जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है कभी भी नहीं बदली हैं, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की मानवजाति की योग्यता नहीं बदली है, मानवजाति की आध्यात्मिक ज़रूरत नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता के द्वारा उद्धार पाने हेतु मानवजाति की लालसा नहीं बदली है। अपनी उत्पत्ति का पता लगाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है। मनुष्य की वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहता है और जिसने शैतान के द्वारा किए गए रक्तरंजित विध्वंस को सहा है। यद्यपि शैतान ने मानवजाति पर अत्याचार किये हैं, और वह अब सृष्टि के प्रारम्भ के आदम और हव्वा नहीं रही, बल्कि ऐसी चीज़ों से भर गई है जो परमेश्वर के विरूद्ध हैं, जैसे ज्ञान, कल्पनाएँ, विचार, इत्यादि और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भर गई है, इस कारण परमेश्वर की दृष्टि में मानवजाति अभी भी वही मानवजाति है जिसे उसने सृजित किया था। परमेश्वर अभी भी मानवजाति पर शासन करता और उसकी योजना बनाता है, मानवजाति परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित पथक्रम के अनुसार अभी भी जीवन बिताती है, इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में, मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, महज गंद में लिपटी हुई, गुड़गुड़ाते हुए पेट के साथ, ऐसी प्रतिक्रियाओं के साथ जो थोड़ी धीमी हैं, ऐसी यादों के साथ जो इतनी अच्छी नहीं हैं जितना वे हुआ करती थीं और थोड़ी प्राचीन हैं—परन्तु मनुष्य के सारे कार्य और सहज ज्ञान पूरी तरह सुरक्षित है। यह वह मानवजाति है जिसे परमेश्वर बचाने की इच्छा करता है। इस मानवजाति को सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी है, सृष्टिकर्ता की आवाज़ को सुनना है, वह खड़ी होकर इस आवाज़ के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगी। इस मानवजाति को सृष्टिकर्ता के रूप को देखना है और वह अन्य सभी चीज़ों की परवाह नहीं करेगी, सब कुछ छोड़ देगी, जिससे अपने आपको परमेश्वर के प्रति समर्पित कर सके और अपने जीवन को भी उसके लिए दे देगी। जब मानवजाति का हृदय सृष्टिकर्ता के हृदय में महसूस किए गए वचनों को समझेगा तो मानवजाति शैतान को ठुकराकर सृष्टिकर्ता की ओर आ जाएगी; जब मानवजाति अपने शरीर से गन्दगी को पूरी तरह धो देगी, एक बार फिर से सृष्टिकर्ता के प्रयोजन और पालन पोषण को प्राप्त करेगी, तब मानवजाति की स्मरण शक्ति पुनः वापस आ जाएगी और इस बार मानवजाति सचमुच में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में वापस आ चुकी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

25. मानवजाति और विश्व के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, उन्हें सृजनकर्ता के अधिकार से धुनकर अलग नहीं किया जा सकता है। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता मनुष्य की समझ में आते हैं; जीवित बचे रहने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के शासन का एहसास करता है; सभी चीज़ों के भाग्य से वह उन तरीकों के बारे में निष्कर्ष निकालता है जिनसे सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; और मानवजाति और सभी चीज़ों के जीवन चक्रों में मनुष्य सचमुच में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है और सचमुच में इस बात को देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी पार्थिव कानूनों, नियमों, और संस्थानों, तथा अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों का स्थान ले लेती हैं। इसके आलोक में, मानवजाति यह पहचानने के लिए बाध्य हो जाती है कि किसी भी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है, यह कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनियत की गई घटनाओं और चीज़ों के साथ कोई भी शक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है या उन्हें बदल नहीं सकती है। यह इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन है कि मनुष्य और सभी चीज़ें पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन बिताती हैं और बढ़ती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "न जानते हुए" वाक्यांश नहीं है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

ठोस रंग

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

स्क्रॉल की दिशा

VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन

गति

VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन