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XII परमेश्वर की अपेक्षाओं, प्रोत्साहनों, सांत्वनाओं और चेतावनियों पर वचन

XII परमेश्वर की अपेक्षाओं, प्रोत्साहनों, सांत्वनाओं और चेतावनियों पर वचन

(II) मनुष्य के प्रति परमेश्वर के प्रोत्साहनों और सांत्वनाओं पर वचन

20. चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए यह हमें परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचनों, उसके कथनों को तलाशने के योग्य बनाता है—क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर के द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं। जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश में, तुम लोगों ने उन वचनों की उपेक्षा कर दी है कि "परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।" और इसलिए, बहुत से लोग, सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं, और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो और भी कम स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर ग़लती है! परमेश्वर के प्रकटन का मनुष्य की धारणाओं के साथ समन्वय नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर मनुष्य के आदेश पर तो बिल्कुल प्रकट नहीं हो सकता। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसे उसके बारे में मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, वह अपने कार्य के बारे में किसी भी व्यक्ति को सूचित तो बिल्कुल नहीं करता। परमेश्वर के इस स्वभाव को हर व्यक्ति को पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने, परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को सबसे पहले अपनी धारणाओं को त्याग देना चाहिए। तुम लोगों को यह माँग करनी ही नहीं चाहिए कि परमेश्वर ऐसा या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी अवधारणाओं तक सीमित नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूछना चाहिए कि तुम लोगों को परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश कैसे करनी है, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना है, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना है; मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और सत्य को धारण नहीं करता है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना, और आज्ञापालन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है" से उद्धृत

21. जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य व्यक्त होता है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी होगी। केवल वे लोग ही परमेश्वर की वाणी को सुन पाएँगे जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और केवल इस तरह के लोग ही परमेश्वर के प्रकटन को देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को एक ओर रख दो! शांत हो जाओ और इन शब्दों को सावधानीपूर्वक पढ़ो। यदि तुम सच्चाई के लिए तरसते हो, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम उसकी इच्छा और उसके वचनों को समझोगे। "असंभव" के बारे में तुम लोग अपनी राय को अलग रखो! लोग जितना अधिक मानते हैं कि कुछ असंभव है, उतना ही अधिक होने की संभावना होती है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से ऊँची उड़ान भरती है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से ऊँचे हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमाओं से परे जाता है। जितना अधिक कुछ असंभव होता है, उतना ही अधिक उसमें सच्चाई होती है जिसे खोजा जा सकता है; कोई चीज़ मनुष्य की धारणा और कल्पना से जितनी अधिक परे रहती है, उसमें परमेश्वर की इच्छा उतनी ही अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही वह स्वयं को कहीं भी प्रकट क्यों न करता हो, परमेश्वर तब भी परमेश्वर है, और उसके प्रकटन के स्थान या तरीके की वजह से उसका सार कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर के पदचिह्न चाहे कहीं भी हों उसका स्वभाव वैसा ही बना रहता है, और चाहे परमेश्वर के पदचिह्न कहीं भी क्यों न हों, वह समस्त मनुष्यजाति का परमेश्वर है, ठीक वैसे ही जैसे कि प्रभु यीशु न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, बल्कि वह एशिया, यूरोप और अमेरिका के सभी लोगों का, और इससे भी अधिक समस्त ब्रह्मांड का एकमात्र परमेश्वर है। तो आइए हम परमेश्वर की इच्छा की खोज करें और उसके कथनों में उसके प्रकटन की खोज करें, और उसके पदचिह्नों के साथ तालमेल रखें! परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकटन समकालिक रूप से विद्यमान रहते हैं, उसका स्वभाव और पदचिह्न मनुष्यजाति के लिए हर समय खुले हैं। प्यारे भाइयो और बहनो, मुझे आशा है कि इन वचनों में तुम लोग परमेश्वर के रूप को देख सकते हो, और यह कि तुम उसके पदचिह्नों का अनुसरण करना शुरू कर सकते हो जब तुम एक नए युग में आगे बढ़ते हो, और उस सुंदर नए स्वर्ग और पृथ्वी में प्रवेश करते हो जिसे परमेश्वर ने उन लोगों के लिए तैयार किया है जो उसके प्रकटन का इंतजार करते हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है" से उद्धृत

22. मैं सभी देशों, राष्ट्रों और यहाँ तक कि उद्योग के लोगों से विनती करता हूँ, कि परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, इस प्रकार परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च, और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ और सम्पूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीवन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से जैसे आदम और हव्वा, जो मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा बनाए गए थे, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य उफ़नती हुई लहरों के समान है। उसे कोई नहीं रोक सकता है, और कोई भी उसके क़दमों को थाम नहीं सकता है। केवल वे लोग ही जो उसके वचनों को सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करके उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त कर सकते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं वे ज़बर्दस्त आपदा और उचित दण्ड के अधीन किए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

23. यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह निंदा का एक संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार नहीं करना चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष तक न पहुँचें; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और निश्चिन्त न बनें। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या उसकी निंदा करते हैं, ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, तुम विश्वास करते हो कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो तुम्हारे दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर तुम्हें उसमें इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, तुम बड़े प्रकाश को प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, "यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है," अथवा "यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।" जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंत के दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की तुम लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि तुम लोग धोखे से डरते हो, इसलिए तुम लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार करे। क्या यह एक बड़ी दयनीय स्थिति नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दण्डित किए जाओगे, और आशीषों के बिना होगे। यदि तुम ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करो! उतावले और अविवेकी न बनो, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझो। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करो और अपने स्वयं के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से उद्धृत

24. कई लोगों को परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में बुरी अनुभूति है, क्योंकि मनुष्य को यह बात स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर देह बन जाएगा। तथापि, मैं तुम्हें अवश्य बता दूँ कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत अधिक होता है और मनुष्य के मन इसे स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। क्योंकि मनुष्य पृथ्वी पर मात्र कीड़े-मकौड़े हैं, जबकि परमेश्वर सर्वोच्च है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्डे के सदृश है जो केवल कीड़े-मकोड़ों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का ही आसवन है। मनुष्य निरंतर परमेश्वर के साथ झगड़ा करता रहता है, जिसके लिए मैं कहता हूँ कि यह स्वतः-प्रमाणित है कि कौन अंत में नुकसान सहेगा। मैं तुम सभी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम लोग अपने आप को स्वर्ण की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मत समझो। यदि अन्य लोग परमेश्वर के न्याय को स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं स्वीकार कर सकते हो? तुम दूसरों की अपेक्षा कितने ऊँचे खड़े हो? यदि दूसरे लोग सत्य के आगे अपने सिर झुका सकते हैं, तो तुम भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हो? परमेश्वर के कार्य का संवेग अविरल है। वह तुम्हारे द्वारा दिए गये "सहयोग" के वास्ते न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और तुम इतने अच्छे अवसर को चूकने पर असीम पछतावे से भर जाओगे। यदि तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है, तो बस आकाश में उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा तुम पर "न्याय पारित करने" की प्रतीक्षा करो! तुम्हें अवश्य पता होना चाहिए कि सभी इस्राएलियों ने यीशु को ठुकराया और अस्वीकार किया था, मगर यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य अभी भी ब्रह्माण्ड के सिरे तक फैल रहा है। क्या यह एक वास्तविकता नहीं है जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले बनाया? यदि तुम अभी भी यीशु के द्वारा स्वर्ग में उठाए जाने का इंतज़ार कर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ज़िद्दी अवांछित व्यक्ति हो।[क] यीशु तुम जैसे किसी भी झूठे व्यक्ति विश्वासी को स्वीकृत नहीं करेगा जो सत्य के प्रति निष्ठाहीन है और केवल आशीषों की ही माँग करता है। इसके विपरीत, वह तुम्हें दस हज़ार वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

25. मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के लिए कई सत्य दिए हैं। पहले के मुकाबले आज तुम लोग अधिक समझदार हो, बहुत से सिद्धांतों को समझते हो कि किसी व्यक्ति को कैसे होना चाहिए, और आस्थावान लोगों में जो सामान्य ज्ञान होना चाहिए, वह तुम लोगों में है। अनेक वर्षों में तुम लोगों ने यही सब अर्जित किया है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से इंकार नहीं करता हूं, लेकिन मुझे यह भी स्पष्ट कहना है कि मैं इन कई वर्षों में तुम्हारी अवज्ञा और विद्रोहों को भी नकार नहीं सकता, क्योंकि तुम में से कोई संत तो है नहीं, बिना किसी अपवाद के तुम लोगों को भी शैतान ने भ्रष्ट किया है, और तुम भी मसीह के शत्रु रहे हो। अब तक तुम लोगों के उल्लंघनों और तुम्हारी आज्ञालंघनों की संख्या अनगिनत है, यही वजह है कि मैं हमेशा तुम्हारे सामने अपने आपको दोहराता रहा हूं। मैं तुम्हारे साथ इस तरह पेश नहीं आना चाहता, लेकिन तुम्हारे भविष्यों की खातिर, तुम्हारी मंज़िलों की खातिर मैंने जो कुछ कहा है, उसके बारे में एक बार फिर से कहूंगा। मुझे आशा है कि तुम लोग मुझे ध्यान से सुनोगे, और मेरे हर शब्द पर विश्वास करोगे, इसके अलावा, मेरे शब्दों की गहराई और महत्व को समझोगे। मैं जो कुछ भी कहूँ उस पर संदेह न करो, या मेरे शब्दों को तुम लोग जैसे लेना चाहो लो और उन्हें दरकिनार कर दो, जो मेरे लिये असहनीय होगा। मेरे शब्दों को परखो मत, न उन्हें हल्के में लो, न ऐसा कुछ कहो कि मैं हमेशा तुम लोगों को फुसलाता हूँ, और न ही ऐसा कुछ कहो कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है वह सही नहीं है। ये सब मुझे सहन नहीं होता। क्योंकि तुम लोग मुझे और मेरी कही गई बातों को संदेह की नज़र से देखते हो, जिन बातों को मैं तुम लोगों से इतनी गंभीरता से कहता हूँ: उसे तुम लोग आत्मसात नहीं करते। मेरी कही बातों को दर्शन-शास्त्र से जोड़कर मत देखो, न उन्हें कपटी लोगों की झूठ के साथ जोड़ो, और न ही मेरे शब्दों की अवहेलना करो। भविष्य में शायद मेरी तरह बताने वाला, या इतनी उदारता से बोलने वाला, या एक-एक बात को इतने धैर्य से समझाने वाला तुम लोगों को और कोई नहीं मिलेगा। इन अच्छे दिनों को तुम लोग केवल याद करते रह जाओगे, ज़ोर-ज़ोर से सुबकोगे, अथवा दर्द से कराहोगे, या फिर उन अंधेरी रातों में जीवन-यापन कर रहे होगे जहाँ सत्य या व्यवस्थित जीवन का अंश-मात्र भी नहीं होगा, या नाउम्मीदी में बस इंतज़ार कर रहे होगे, या फिर ऐसा भयंकर पश्चाताप कर रहे होगे कि जिसका तुम लोगों के पास कोई उत्तर नहीं होगा...। ये जितनी अलग-अलग संभावनाएँ मैंने तुम लोगों को बताई हैं, इनसे वस्तुत: तुम में से कोई नहीं बच पाएगा। उसकी वजह है कि तुम में से कोई भी परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं करता। तुम लोग व्यभिचार और बुराई में डूब चुके हो। ये चीज़ें तुम्हारी आस्था, तुम्हारे अंतर्मन, आत्मा, तन-मन में घुल-मिल गई हैं। इनका जीवन और सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि ये चीज़ें इनके विरुद्ध जाती हैं। मुझे तुम लोगों को लेकर बस यही आशा है कि तुम लोगों को प्रकाश-पथ पर लाया जाए। मेरी एक मात्र यही कामना है कि तुम लोग अपना ख्याल रख पाओ, अपने गंतव्य पर इतना अधिक बल न दो कि अपने व्यवहार तथा आज्ञालंघन की ओर से उदासीन हो जाओ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "उल्लंघन मनुष्य को नरक में ले जाएगा" से उद्धृत

26. आज, तू केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकता है कि तुझ पर किस प्रकार विजय पायी गयी है, बल्कि तुझे उस पथ पर भी विचार करना होगा जिस पर तू भविष्य में चलेगा। तू सिद्ध बनाया जा सके, इसके लिए तेरे पास आकांक्षाएँ और साहस अवश्य होना चाहिए, और तुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि तू असमर्थ है। क्या सत्य की भी अपनी पसंदीदा चीज़ें होती हैं? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? यदि तू सत्य के पीछे पीछे चलता है, तो क्या यह तुझे अभीभूत कर सकता है? यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा रहता है, तो क्या यह तुझे मार कर नीचे गिरा देगा? यदि यह सचमुच में तेरी आकांक्षा है कि तू जीवन का अनुसरण करे, तो क्या जीवन तुझसे बच कर निकल जाएगा? यदि तेरे पास सत्य नहीं है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि सत्य तुझे नज़रंदाज़ करता है, बल्कि इसलिए है क्योंकि तू सत्य से दूर रहता है; यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि न्याय के साथ कुछ न कुछ गड़बड़ी है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तू विश्वास करता है कि यह तथ्यों से अलग है; कई सालों तक जीवन का पीछा करते हुए भी यदि तूने जीवन प्राप्त नहीं किया है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि जीवन के पास तेरे लिए कोई सद्विचार नहीं है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तेरे पास जीवन के लिए कोई सद्विचार नहीं है, और तूने जीवन को स्वयं से दूर कर दिया है; यदि तू ज्योति में जीता है, लेकिन ज्योति को पाने में असमर्थ रहा है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि ज्योति के लिए तेरे ऊपर चमकना असंभव है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तूने ज्योति के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया, और इसलिए ज्योति तेरे पास से खामोशी से चली गई है। यदि तू अनुसरण नहीं करता है, तो केवल यह कहा जा सकता है कि तू फालतू कचरा है, तेरे जीवन में साहस बिल्कुल नहीं है, और तेरे पास अंधकार की ताकतों का विरोध करने के लिए हौसला नहीं है। तू बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर है! तू शैतान की उन ताकतों से बचने में असमर्थ है जो तुझे जकड़ लेती हैं, तू केवल इस प्रकार का सकुशल और सुरक्षित जीवन जीना और अपनी अज्ञानता में मरना चाहता है। जो तुझे हासिल करना चाहिए वह है विजय पा लिए जाने का तेरा अनुसरण; यह तेरा परम कर्तव्य है। यदि तू इस बात से संतुष्ट है कि तुझ पर विजय पा ली गयी है, तो तू ज्योति की अस्तित्व को दूर हटा देता है। तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

27. यदि तेरी खोज का उद्देश्य सच्चाई की तलाश करना नहीं है, तब भी तू इस अवसर का लाभ उठा सकती है और इसकी सफलता का प्रयास करने के लिए दुनिया में लौट सकती है। तेरा समय वास्तव में इस तरह से बर्बाद करने योग्य नहीं है—क्यों अपने आप को यातना दो? क्या तू सुंदर दुनिया में सभी प्रकार की चीजों का आनंद नहीं उठा सकती है? धन, खूबसूरत महिलाएँ, हैसियत, घमंड, परिवार, बच्चे, इत्यादि—क्या दुनिया के ये सभी उत्पाद वे सर्वोत्तम चीजें नहीं हैं जिनका तू आनंद ले सकती है? एक ऐसे स्थान की खोज में जहाँ तू खुश रह सकती है यहाँ इधर-उधर भटकने का क्या उपयोग है? मनुष्य के पुत्र को अपना सिर रखने के लिए कहीं जगह नहीं है, तो तुझे आराम की जगह कैसे मिल सकती है? वह तेरे लिए आराम की सुन्दर जगह कैसे बना सकता है? क्या यह संभव है? मेरे न्याय के अतिरिक्त, आज तू केवल सत्य पर शिक्षाएँ प्राप्त कर सकती है। तू मुझ से आराम प्राप्त नहीं कर सकती है और न ही तू उस सुखद आशियाने को प्राप्त कर सकती है जिसके बारे में तू दिन-रात सोचती रहती है। मैं तुझे दुनिया की दौलत प्रदान नहीं करूँगा। यदि तू निष्कपटता से अनुसरण करती है, तो मैं तुझे संपूर्णता में जीवन का मार्ग देने, तुझे पानी में वापिस आयी एक मछली की तरह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। यदि तू निष्कटता से अनुसरण नहीं करती है, तो मैं यह सब वापस ले लूँगा। मैं अपने मुँह के वचनों को उन लोगों को देने को तैयार नहीं हूँ जो आराम के लालची हैं और मात्र सूअरों और कुत्तों जैसे हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?" से उद्धृत

28. परमेश्वर का एक निष्क्रिय अनुयायी मत बन, और उसका अनुसरण मत कर जो विचित्र है। अत्यधिक शितिल होने से तू अपने ऊपर अधिकार खो देगा और तू जीवन में समय बर्बाद करेगा। तुझे स्वयं को ऐसी शिथिलता और निष्क्रियता से छुड़ाना है, और सकारात्मक चीज़ों का अनुसरण करने और अपनी स्वयं की कमज़ोरियों पर विजय पाने में कुशल बनना है, ताकि तू सत्य को प्राप्त कर सके और सत्य को जी सके। तेरी कमज़ोरियों के विषय में कोई डरने की बात नहीं है, और तेरी कमियां तेरी सबसे बड़ी समस्या नहीं है। तेरी सबसे बड़ी समस्या, और तेरी सबसे बड़ी कमी है कि तू न गर्म है और न ठण्डा है और तुझमें सत्य की खोज की इच्छा की कमी है। तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या है तुम लोगों की डरपोक मानसिकता जिसके द्वारा तुम लोग चीज़ें जैसी हैं वैसी ही रहने से खुश हो, और तुम लोग निष्क्रियता से इन्तज़ार करते हो। यह तुम लोगों की सबसे बड़ी बाधा है, और सत्य का अनुसरण करने में तुम लोगों का सबसे बड़ा शत्रु है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

29. इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, काम में मशगूल होकर दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत की कगार पर पहुँचने के बाद वे अंतत: देख पाते हैं कि उनमें सच्ची गवाही की कमी है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिनमें मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा बनी रहती है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" से उद्धृत

30. जब वसंत की गर्मी आएगी और फूल खिलेंगे, जब स्वर्ग के नीचे सब कुछ हरे रंग से ढक जाएगा और पृथ्वी पर सभी चीजें यथास्थान होंगी, तो सभी लोग और चीजें धीरे-धीरे परमेश्वर की ताड़ना में प्रवेश करेंगी, और उस समय पृथ्वी पर परमेश्वर के समस्त कार्य का अंत हो जाएगा। परमेश्वर पृथ्वी पर अब और कार्य नहीं करेगा या नहीं रहेगा, क्योंकि परमेश्वर का महान कार्य पूरा हो गया होगा। क्या लोग इस कम समय के लिए अपनी देह को अलग रखने में अक्षम हैं? कौन सी बातें मनुष्य और परमेश्वर के बीच के प्रेम को चीर सकती हैं? कौन मनुष्य और परमेश्वर के बीच प्यार को खींच कर अलग करने में समर्थ है? क्या यह माता-पिता, पति, बहनें, पत्नियाँ, या पीड़ादायक शुद्धिकरण है? क्या अंतःकरण की भावनाएँ मनुष्य के अंदर परमेश्वर की छवि को मिटा सकती हैं? क्या एक-दूसरे के प्रति लोगों के आभार और कार्यकलाप उनका स्वयं का किया है? क्या मनुष्य के द्वारा उन्हें सुलझाया जा सकता है? कौन अपने आप की रक्षा करने में समर्थ है? क्या लोग स्वयं का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं? जीवन में मजबूत लोग कौन हैं? कौन मुझे छोड़ने और अपने दम पर जीने में समर्थ है? बार-बार, परमेश्वर क्यों कहता है कि सभी लोग आत्म-चिंतन का कार्य करें? परमेश्वर क्यों कहता है, "किसकी कठिनाई उसके स्वयं के हाथों के द्वारा व्यवस्थित की गई है?"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय अध्याय 24 और अध्याय 25" से उद्धृत

31. हो सकता है तुम कहोगे कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और इस प्रकार के न्यायदण्ड से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता को देखने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानवजीवन की महत्ता को कभी समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते। इससे भी कम तुम्हें इस बात का ज्ञान हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के इच्छुक हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्यायदण्ड से अलग करते हो, तो वह क्या है, जो तुम्हें प्राप्त होगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्यायदण्ड से एक बार अलग हो कर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम "इस स्थान" को छोड़ते हो, तो जिस से तुम्हारा सामना होगा, वह शैतान के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर घाव हैं? तुम्हारा सामना असहनीय दिन और रात से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिय कि आज तुम इस न्यायदण्ड से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? वह क्या होगा जो तुम्हारे मार्ग में आएगा? क्या यह वास्तव में वही शांगरी-ला हो सकता है, जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस रीति से भागने के द्वारा तुम बाद में आने वाली उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो? आज के बाद, क्या तुम कभी इस प्रकार का सुअवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त करने के योग्य हो पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान प्रसन्न जीवन और तुम्हारा छोटा सा मिला-जुला परिवार-क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल का प्रतिस्थापन कर सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें एक उत्तम सौदा प्राप्त होता है, तो यह वही सबकुछ है जो तुम्हें-एक सृष्ट प्राणी-को प्राप्त होना चाहिए और यही तुम्हें प्राप्त भी होना चाहिए था। इस रीति से जीता जाना तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए अत्यन्त लाभकारी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से उद्धृत

32. जो मेरे वचन से बाहर जी रहे हैं, परीक्षा के दुःखों से भाग रहे हैं, क्या वे सभी संसार में उद्देश्यहीन नहीं भटक रहे हैं? वह मेरी सांत्वना के वचनों से बहुत दूर, पतझड़ के पत्तों के सदृश इधर-उधर फड़फड़ा रहे हैं, उनके पास आराम के लिए कोई जगह नहीं है और उन्हें मेरे वचनों की सांत्वना तो बिल्कुल भी नहीं है। यद्यपि मेरी ताड़ना और शुद्धिकरण उनका पीछा नहीं करते हैं, तब भी क्या वे ऐसे भिखारी नहीं हैं जो स्वर्ग के राज्य के बाहर सड़कों पर, एक जगह से दूसरी जगह उद्देश्यहीन भटक रहे हैं? क्या संसार सचमुच में तुम्हारे आराम करने की जगह है? क्या तुम लोग मेरी ताड़ना से बच कर संसार से संतुष्टि की धीमी सी भी मुस्कुराहट प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग वास्तव में अपने क्षणभंगुर आनंद का उपयोग कर सकते हो, अपने हृदय के खालीपन को ढकने के लिए जिसे कि छुपाया नहीं जा सकता है? तुम लोग अपने परिवार में किसी को भी मूर्ख बना सकते हो, मगर तुम मुझे कभी भी मूर्ख नहीं बना सकते हो। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास अत्यधिक अल्प है, तुम अभी भी ऐसी किसी भी खुशी को पाने के लिए शक्तिहीन हो जो जीवन को प्रदान करती है। मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ: बेहतर होगा कि अपना आधा जीवन ईमानदारी से मेरे वास्ते बिताओ, बजाय इसके कि अपने पूरे जीवन को साधारण कोटि में और देह के लिए अल्प मूल्य का कार्य करने में सक्रिय रखते हुए और उन सभी दुःखों को सहन करते हुए जो एक व्यक्ति के लिए सहन करना मुश्किल है। अपने आप को इतना अधिक बहुमूल्य समझना और मेरी ताड़ना से भागना कौन सा उद्देश्य पूरा करता है? केवल अनंतकाल की शर्मिंदगी, अनंतकाल की ताड़ना का फल भुगतने के लिए मेरी क्षणिक ताड़ना से अपने आप को छुपाना कौन से उद्देश्य को पूरा करता है? मैं वस्तुतः अपनी इच्छा के प्रति किसी को भी नहीं झुकाऊँगा। यदि कोई व्यक्ति सचमुच में मेरी सभी योजनाओं के प्रति समर्पण करने का इच्छुक है, तो मैं उसके साथ ख़राब बर्ताव नहीं करूँगा। परन्तु मैं अपेक्षा करता हूँ कि सभी लोग मुझमें विश्वास करें, बिल्कुल वैसे ही जैसे अय्यूब ने मुझ यहोवा में विश्वास किया था। यदि तुम लोगों का विश्वास थोमा से बढ़कर होगा, तब तुम लोगों का विश्वास मेरी प्रशंसा प्राप्त करेगा, अपनी ईमानदारी में तुम लोग मेरा परम सुख पाओगे, और निश्चित रूप से तुम लोग अपने दिनों में मेरी महिमा को पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है" से उद्धृत

33. अधिकांश लोग "निरंतर आगे देखने वाले" और अतृप्त रहते हैं; उन सभी की परमेश्वर के वर्तमान चिंतित इरादों की समझ में कमी है, इसलिए उन सभी को भाग जाने के विचार आते हैं। वे हमेशा एक जंगली घोड़े की तरह अपनी लगाम फेंक कर जंगल में घूमने निकल जाना चाहते हैं, लेकिन कम ही ऐसे लोग हैं जो कनान की अच्छी भूमि में बसकर मानव जीवन के मार्ग की तलाश करना चाहते हैं। दूध और शहद बहने वाली भूमि में प्रवेश कर लेने के बाद, अगर लोग इसका आनंद न लें, तो वे और क्या चाहते हैं? सच कहूं तो, कनान की अच्छी भूमि के बाहर हर जगह जंगल ही जंगल है। यहां तक कि जब लोग आराम के स्थान में प्रवेश करते हैं तो भी वे अपने कर्तव्य को पूरा करने में असमर्थ रहते हैं; क्या वे वेश्या नहीं हैं? यदि तुमने इस माहौल में परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण करने का अवसर गंवा दिया है, तो तुम्हें शेष दिनों में पश्चाताप होगा; तुम्हें अत्यंत पछतावा महसूस होगा। तुम मूसा की तरह हो जाओगे जो केवल कनान की भूमि को देखता रहता था और उसका आनंद नहीं ले पाया था, अपनी खाली मुट्ठी ज़ोर-से दबाता था और पछतावे से भरकर मृत्यु को प्राप्त हो गया था—क्या तुम्हें नहीं लगता है कि यह शर्मनाक है? क्या तुम्हें नहीं लगता कि दूसरों द्वारा स्वयं का मज़ाक उड़ाया जाना एक शर्मनाक बात है? क्या तुम तैयार हो कि दूसरे तुम्हें अपमानित करें? क्या तुम्हारे पास वह दिल नहीं जो अपने लिए अच्छा काम करने की कोशिश करे? क्या तुम नहीं चाहते कि तुम एक सम्माननीय और ईमानदार व्यक्ति बनो जिसे परमेश्वर ने पूर्ण किया है? क्या तुम वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें संकल्प की कमी है? तुम दूसरी राहों पर चलने के लिए तैयार नहीं हो, लेकिन तुम उस मार्ग पर भी चलने के लिए तैयार नहीं हो जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है? क्या तुम स्वर्ग की इच्छा के विरुद्ध जाने की हिम्मत रखते हो? चाहे तुम्हारा कौशल जितना भी महान हो, क्या तुम वास्तव में स्वर्ग को अपमानित कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मार्ग... (7)" से उद्धृत

34. ताड़ना के माध्यम से परमेश्वर लोगों पर विजय हासिल नहीं करना चाहता; वह हमेशा उंगली पकड़कर लोगों को आगे नहीं ले जाना चाहता। वह चाहता है कि लोग उसके वचनों का पालन करें और अनुशासित ढंग से काम करें, और इस माध्यम से उसकी इच्छा को पूरा करें। लेकिन लोगों को कोई शर्म नहीं है और वे लगातार उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। मेरा मानना है कि हमारे लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम उसे संतुष्ट करने का सबसे आसान तरीका, अर्थात, उसकी सभी व्यवस्थाओं का पालन करें, और यदि तुम वास्तव में इसे प्राप्त कर सकते हो तो तुम पूर्ण कर दिए जाओगे। क्या यह एक आसान, हर्षित बात नहीं है? उस राह पर चलो जिसपर तुम्हें चलना चाहिए, बिना दूसरों की बातों पर ध्यान दिए या बहुत अधिक सोचे हुए। क्या तुम्हारा भविष्य और भाग्य तुम्हारे हाथों में है? तुम हमेशा भाग जाते हो और एक सांसारिक पथ लेना चाहते हो, लेकिन तुम बाहर क्यों नहीं निकल पाते? ऐसा क्यों है कि तुम कई सालों तक चौराहे पर अनिश्चित खड़े रहते हो और एक बार फिर से इसी राह को चुनते हो? कई वर्षों तक भटकने के बाद, ऐसा क्यों है कि स्वयं के बावजूद भी इस घर में वापस आ गए हो? क्या यह केवल तुम्हारा स्वयं का मामला है? इस धारा में जितने भी लोग उपस्थित हैं, यदि तुम इस पर विश्वास नहीं करते हो, तो बस मेरी यह बात सुनो: यदि तुम छोड़ने की योजना बना रहे हो, तो बस प्रतीक्षा करके देखो कि क्या परमेश्वर तुम्हें इसकी अनुमित देता है, और देखो कि पवित्र आत्मा किसी प्रकार तुम्हें प्रभावित करता है—इसे स्वयं से अनुभव करो। अगर मैं स्पष्टता से कहूँ तो, चाहे तुम दुर्भाग्य से क्यों न पीड़ित हो, तुम्हें इस धारा में भुगतना पड़ेगा, और अगर कोई पीड़ा है, तो तुम्हें आज यहां भुगतना होगा और तुम कहीं और नहीं जा सकते हो। क्या तुम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हो? तुम कहाँ जाओगे? यह परमेश्वर का प्रशासनिक आदेश है। क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर द्वारा इस समूह का चयन करना अर्थहीन है? परमेश्वर के कार्य में आज, वह आसानी से क्रोधित नहीं होता, लेकिन अगर लोग उसकी योजना को बाधित करना चाहते हैं तो वह एक झटके में अपना स्वभाव बदल सकता है और उसे उज्ज्वल से बदली में परिवर्तित कर सकता है। इसलिए, मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम शांत हो जाओ और परमेश्वर के उद्दश्यों के सामने झुक जाओ, ताकि वह तुम्हें पूरा कर सके। एक चतुर व्यक्ति बनने का यही एक तरीका है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मार्ग... (7)" से उद्धृत

35. क्या ताड़ना और न्याय के बाद जीत लिए जाने के लिए तू अनुसरण करता है, या ताड़ना और न्याय के बाद शुद्ध, सुरक्षित और सँभाले जाने के लिए अनुसरण करता है? तू इनमें से किसका अनुसरण करता है? क्या तेरा जीवन अर्थपूर्ण है, या अर्थहीन और बिना किसी मूल्य का है? तुझे शरीर चाहिए, या तुझे सत्य चाहिए? तू न्याय की इच्छा करता है या राहत की? परमेश्वर के कार्यों का इतना अनुभव करने के बाद, और परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को देखने के बाद, तुझे किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए? तुझे इस पथ पर किस प्रकार चलना चाहिए? तू परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को व्यवहार में कैसे ला सकता है? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ने तुझ पर कोई असर डाला है? तुझमें परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है कि नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि तू किसे जीता है, और तू किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता है! तेरे होंठ कहते हैं कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, फिर भी तू उसी पुराने और भ्रष्ट स्वभाव को जीता है; तुझमें परमेश्वर का कोई भय नहीं है, और तेरे पास विवेक तो बिलकुल भी नहीं है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं? क्या वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार करते हैं? तू कहता है कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है और उस पर विश्वास करता है, फिर भी तू अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ता है। तेरे कार्य में, तेरे प्रवेश में, उन शब्दों में जो तू बोलता है, और तेरे जीवन में परमेश्वर के प्रति तेरे प्रेम का कोई प्रकटीकरण नहीं है, और परमेश्वर के प्रति कोई आदर नहीं है। क्या यह एक ऐसा इंसान है जिसने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है? क्या ऐसा कोई इंसान पतरस के समान हो सकता है? क्या वे लोग जो पतरस के समान हैं उनके पास केवल ज्ञान होता है, परन्तु वे उसे जीते नहीं हैं? आज, वह कौन सी शर्त है जिसके अनुसार मनुष्य को एक वास्तविक जीवन बिताना है? क्या पतरस की प्रार्थनाएँ उसके मुँह से निकलने वाले शब्दों से बढ़कर और कुछ नहीं थे? क्या वे उसके हृदय की गहराईयों से निकले हुए शब्द नहीं थे? क्या पतरस ने केवल प्रार्थना की थी, और सत्य को व्यवहार में नहीं लाया था? तेरा अनुसरण किसके लिए है? तुझे परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय के दौरान अपने आपको किस प्रकार सुरक्षित और शुद्ध रखना चाहिए? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से मनुष्य को कोई लाभ नहीं है? क्या सारा न्याय सज़ा है? क्या ऐसा हो सकता है कि केवल शांति एवं आनन्द, और केवल भौतिक आशीषें एवं क्षणिक राहत ही मनुष्य के जीवन के लिए लाभदायक हैं? यदि मनुष्य एक सुहावने और आरामदेह वातावरण में रहे, बिना किसी न्यायिक जीवन के, तो क्या उसे शुद्ध किया जा सकता है? यदि मनुष्य बदलना और शुद्ध होना चाहता है, तो उसे सिद्ध किए जाने को कैसे स्वीकार करना चाहिए? आज तुझे कौन सा पथ चुनना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

36. तुम्हारा परमेश्वर के शब्दों के न्याय, ताड़ना, प्रहार, और शुद्धिकरण को स्वीकार करने में सक्षम होना, और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, समय की शुरुआत में परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था, और इस प्रकार जब तुम्हें प्रताड़ित किया जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है, और तुम सब के भीतर जो आशीर्वाद दिए गए हैं उन्हें कोई भी दूर नहीं कर सकता है, और जो सब तुम सभी को दिया गया है वह कोई भी छीन कर नहीं ले जा सकता है। धर्म के लोग तुम सब के साथ तुलना में ठहर नहीं सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं हैं, और तुम सब धार्मिक सिद्धांत से लैस नहीं हो, परन्तु चूँकि परमेश्वर ने तुम सभी के भीतर कार्य किया है, तुम लोगों ने सारे युगों में अन्य किसी से भी ज्यादा लाभ पाया है—और इसलिए यह तुम लोगों का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। इस वजह से, तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक समर्पित होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति और भी अधिक निष्ठावान। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को संभालना होगा, और परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करने के लिए अपने कद को तैयार करना होगा। परमेश्वर द्वारा दी गई जगह में तुम्हें दृढ़ खड़ा होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का अनुसरण करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा विजित होना चाहिए और अंततः परमेश्वर का एक गौरवपूर्ण गवाही बनना चाहिए। इन संकल्पों में से कितने तुम्हारे पास हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त होगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से उद्धृत

37. यह उन सभी भाइयों और बहनों के लिए है जिन्होंने मेरी आवाज़ सुनी है: तुम लोगों ने मेरे सख्त न्याय की आवाज़ सुनी है और तुमने चरम पीड़ा को सहन किया है। बहरहाल, तुम सभी को पता होना चाहिए कि मेरी कठोर आवाज़ के पीछे मेरे इरादे छिपे हुए हैं! मैं तुम सभी को अनुशासित करता हूँ ताकि तुम सब को बचाया जा सके। तुम सब को पता होना चाहिए कि मेरे प्यारे पुत्रों की खातिर, मैं तुम सभी को अनुशासित करूँगा, तुम सभी की काट-छाँट करूँगा और तुम सब को जल्द ही पूर्ण कर दूँगा। मेरा दिल बहुत उत्सुक है, लेकिन तुम सब मेरे दिल को नहीं समझते हो और तुम मेरे वचन के अनुसार कार्य नहीं करते हो। ...मेरा इरादा यह है कि मैं उन लोगों को चाहता हूँ जो उत्कंठा से मुझे चाहते हैं, और केवल उन्हें जो सच्चे दिल से मेरी खोज करते हैं, मुझे प्रसन्न कर सकते हैं—उन्हें मैं निश्चित रूप से अपने हाथों का सहारा दूँगा और यह सुनिश्चित करूँगा कि उन्हें किसी भी आपदा का सामना न करना पड़े। जो लोग वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं वे परमेश्वर के दिल का ध्यान रखेंगे और मेरी इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार होंगे। तो, तुम सभी को जल्द ही वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए और मेरे वचन को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करना चाहिए—यह मेरा सबसे बड़ा दायित्व-भार है। यदि सभी कलीसियाएँ और संत वास्तविकता में प्रवेश करते हैं और वे सब मेरे साथ सीधे सहभागिता करने में सक्षम होते हैं, मेरे साथ आमने-सामने हो सकते हैं, और सत्य और धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हैं, केवल तभी वे मेरे प्यारे पुत्र हैं, तभी वे वो लोग हैं जिनसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, और उन को मैं सभी महान आशीर्वाद प्रदान करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 23" से उद्धृत

38. सभी लोगों को परमेश्वर के वचनों के कारण शुद्ध किया गया है। यदि देह-धारी परमेश्वर ना होता तो मानव जाति उस तरह से पीड़ित होने के लिए धन्य नहीं होती। इसे इस तरीके से भी देखा जा सकता है-वे लोग जो कि परमेश्वर के वचनों की परीक्षाओं को स्वीकार करने में सक्षम हैं, वे धन्य लोग हैं। लोगों की मूल क्षमता, उनके व्यवहार और परमेश्वर के प्रति उनकी अभिवृत्ति के आधार पर, वे इस प्रकार की शुद्धता प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। क्योंकि उनका उत्थान परमेश्वर द्वारा किया गया है, इसलिए उन्होंने इस आशीर्वाद का आनंद लिया है। लोग कहते थे कि वे परमेश्वर के चेहरे को देखने या उसके वचनों को सुनने के योग्य नहीं थे। आज यह पूरी तरह से परमेश्वर के उत्थान और उसकी दया के कारण है कि लोगों ने उसके वचनों की शुद्धि प्राप्त की है। यह हर एक व्यक्ति को आशीर्वाद है जो अंत के दिनों में रह रहा है—क्या तुम लोगों ने इसका व्यक्तिगत अनुभव किया है? किन पहलुओं पर लोगों को पीड़ित होना चाहिए और असफलताओं का सामना करना चाहिए यह परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है, और यह लोगों की अपनी आवश्यकताओं पर आधारित नहीं है। यह बिल्कुल सत्य है। हर आस्तिक को परमेश्वर के वचनों की परीक्षाओं से गुजरने की और उसके वचनों के भीतर पीड़ित होने की क्षमता होनी चाहिए। क्या यह ऐसा कुछ है जिसे तुम लोग स्पष्ट रूप से देख सकतेहो? तो तुम्हारेद्वारा उठायी गयी पीड़ाएं आज के आशीर्वाद के साथ बदल दी गयी हैं; अगर तुम परमेश्वर के लिए पीड़ित नहीं होतेहो, तो तुम उसकी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते हो। हो सकता है तुमने अतीत में शिकायत की हो, परन्तु तुमने चाहे कितनी ही शिकायत की हो परमेश्वर को तुम्हारे बारे में वह याद नहीं है। आज आ गया है और कल के मामलों को देखने का कोई कारण नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है" से उद्धृत

39. परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति के रूप में, तुम को यह समझना चाहिए कि आज, इन अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य और अपने अंदर परमेश्वर की योजना के सारे कार्यों को ग्रहण करके, तुमने वास्तव में परमेश्वर के महान उत्कर्ष और उद्धार को पा लिया है। समस्त ब्रम्हांड में परमेश्वर के सारे कार्यों में इसी एक जनसमूह पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उसने अपने सभी प्रयास तुम लोगों के लिये समर्पित किये और तुम्हारे लिये सब कुछ बलिदान किया है, उसने समस्त ब्रम्हांड में पवित्र आत्मा के सभी कार्यों को वापस लेकर तुम्हें सौंप दिया है। यही कारण है कि मैं कहता हूं, तुम सभी सौभाग्यशाली हो। और यही नहीं, उसने अपनी महिमा इज़राइल से, अर्थात उसके चुने हुए लोगों सेहटाकर तुम लोगों को दी है, ताकि वह अपनी योजना के उद्देश्यों को तुम्‍हारे जनसमूह के द्वारा पूर्ण रूप से प्रकट कर सके। इस कारण तुम सभी वे लोग हो जो परमेश्वर की विरासत को पाएंगे, और इससे भी अधिक परमेश्वर की महिमा के वारिस बनेंगे। संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाइयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को पूरा करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस समूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों की पीड़ा, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव के कारण परमेश्वर अपना शुद्धिकरण का कार्य करता और जीतता है ताकि इससे वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी प्राप्त करे जो उसके कार्यों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस सूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं, यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से उद्धृत

40. निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे सामने प्रकट करूंगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है, कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएं, हैं न? आज हर किसी को कड़वे परीक्षणों का सामना करना होगा, अन्यथा तुम लोगों के पास जो मुझे प्यार करने वाला दिल है वह मजबूत नहीं होगा और मेरे लिए तुम्हारा प्यार सच्चा नहीं होगा। यहां तक कि यदि मामूली परिस्थितियां भी होंगी, तो भी सभी को उनसे गुज़रना होगा, बस वे कुछ हद तक भिन्न होंगी। परिस्थिति मेरे आशीषों में से एक है, मेरा आशीष प्राप्त करने के लिए कितने हैं जो मेरे सामने घुटने टेकते हैं? बेवकूफ़ बच्चे! तुम्हें हमेशा महसूस होता है कि कुछ भाग्यशाली वचन मेरा आशीष हैं, फिर भी तुम्हें यह नहीं लगता कि कड़वाहट मेरे आशीषों में से एक है। जो लोग मेरी कड़वाहट को बांटेंगे वे निश्चित रूप से मेरी मिठास भी साझा करेंगे। यह मेरा वादा है और तुम लोगों को मेरा आशीष है। खाने और पीने और आनंद लेने में संकोच न करो। जब अंधेरा गुज़र जाएगा, तब रोशनी होगी। सुबह होने से पहले सबसे अधिक अंधेरा होता है; इस समय के बाद धीरे-धीरे उजाला हो जाएगा, और बाद में सूर्य उदय होगा। डरो मत या कायर मत बनो। आज मैं अपने बेटों का समर्थन करता हूं और उनके लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता हूं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 41" से उद्धृत

41. आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं। और इस प्रकार, उद्धार की आज की विधि अतीत की विधि के विपरीत है। आज, धर्मी न्याय तुम लोगों को बचाता है, और तुम लोगों में से प्रत्येक को स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा साधन है, और निर्मम ताड़ना तुम लोगों के लिए सर्वोच्च उद्धार लाती है—और इस ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उनकी सर्वसंभाव्यता और विवेक का एहसास किया है; इसके अलावा, तुमने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान के द्वारा उठाए गये महिमा और सम्पत्ति के आनंद की तुलना में कहीं अधिक विपुल हैं! इस बारे में विचार करें: यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को निंदित करना और सज़ा देना होता, न कि तुम लोगों को बचाना, तो क्या तुम लोगों के दिन इतने लंबे समय तक टिकते? क्या तुम, मांस और रक्त के ये पापी प्राणी, आज तक जीवित रहते? यदि यह केवल तुम लोगों को दंड देने के लिए होता, तो मैं क्यों शरीर धारण करता और इस तरह के कठिन कार्य की शुरूआत करता? क्या तुम नश्वर-मात्र को दंडित करने में एक वचन भर कहने का समय नहीं लगेगा? क्या तुम लोगों को निंदित करने के बाद अभी भी तुम लोगों को नष्ट करने का मेरा मन होगा? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सलीब पर चढ़ने का उपयोग कर सका था? क्या मेरा धर्मी स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह आज्ञाकारी बनाने के लिए अनुकूल नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूर्ण रूप से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

42. भविष्य में, तुम चाहे आशीषित हो या श्रापित, यह तुम्हारे आज के निष्पादित किए गए कार्य पर आधारित होगा। यदि तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाना है तो यह बिलकुल अभी इसी युग में होगा; भविष्य में दूसरा कोई अवसर न होगा। अभी, परमेश्वर तुम लोगों को सच में पूर्ण करना चाहता है, और यह कोई कहने की बात नहीं है। भविष्य में, चाहे कोई भी परीक्षा तुम लोगों के सामने आए, चाहे कुछ भी घटनाएँ घटें, या तुम लोगों पर कोई भी मुसीबत आ पड़े, परमेश्वर तुम सब को पूर्ण करना चाहता है—यह एक निश्चित और असंदिग्ध सत्य है। इसे कहाँ से देखा जा सकता है? इस सत्य से कि युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर के वचन ने ऐसी महान ऊँचाई को कभी प्राप्त नहीं किया जैसी आज है—यह सर्वोच्च क्षेत्र में प्रविष्ट हो चुका है, और सारे मनुष्यों में पवित्र आत्मा का कार्य आज अभूतपूर्व है। पिछली पीढ़ियों में मुश्किल से किसी ने इसे अनुभव किया होगा। यहाँ तक कि यीशु की पीढ़ी में आज के प्रकाशन नहीं थे; तुम लोगों से बोले गए वचनों ने महान ऊँचाईयाँ प्राप्त कर ली हैं, जो बातें तुम सब समझते हो, और जिन बातों का तुम सब अनुभव करते हो। तुम सब परीक्षाओं और ताड़नाओं के मध्य से हटते नहीं हो, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर का कार्य एक अभूतपूर्व वैभव तक पहुँच चुका है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य कर सकता है और यह कोई ऐसी बात भी नहीं जिसे मनुष्य बनाए रखता है, बल्कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य के अनेक तथ्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करना चाहता है, और वह निश्चित रूप से तुम सब को पूर्ण करने में सक्षम है। यदि तुम सब इसकी झलक देखने में सक्षम हो, यदि तुम सब यह नई खोज प्राप्त करने में सक्षम हो, तब तुम सब यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा नहीं करोगे, बल्कि इसके स्थान पर, तुम सब परमेश्वर को इसी युग में स्वयं को पूर्ण करने की अनुमति दोगे। इस प्रकार, तुम सब प्रत्येक अपना अत्यधिक परिश्रम करो और कोई भी प्रयास न छोड़ो ताकि तुम सब परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में" से उद्धृत

43. वर्तमान धारा में, हर एक व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्रेम करता है उसके पास परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण किए जाने का अवसर होता है। भले ही वे युवा हों या वृद्ध, जब तक वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसके लिए सम्मान रखते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य रहेंगे। परमेश्वर लोगों को उनके भिन्न भिन्न कार्यों के अनुसार पूर्ण करता है। जब तक तू अपने सामर्थ्य में सब कुछ करता है और अपने आपको परमेश्वर के कार्य हेतु समर्पित करते है तो तू उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य रहेगा। वर्तमान समय में तुम लोगों में से कोई भी पूर्ण नहीं है। कभी कभी तुम लोग एक प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हो और कभी कभी दो प्रकार के कार्य करने में सक्षम होते हो; जब तक तुम लोग अपना सारा सामर्थ्य परमेश्वर को दे देते हो और अपने आपको उसके लिए खपा देते हो, तब अंत में तुम सब परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में" से उद्धृत

44. परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान, जो भी बचाए जा सकते हैं, उन्हें अधिकतम सीमा तक बचाया जाएगा, उनमें से किसी को भी त्यागा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर का कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय के दौरान, जो लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने में असमर्थ हैं, वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञापालन करने में असमर्थ हैं, दण्ड के पात्र होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—मनुष्य के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोलता है जो उसकी समझ में नहीं आते हैं, ताकि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाओं को समझ सके, ताकि उसके पास परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की परिस्थिति हो। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, और लोगों को इस वजह से दण्ड नहीं देता है कि वे थोड़ा विद्रोही हैं, क्योंकि अब उद्धार के कार्य का समय है। यदि हर विद्रोही व्यक्ति को दंडित किय गया होता, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिला होता; उन सभी को दंडित किया गया होता और वे अधोलोक में गिर गए होते। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उसे स्वयं को जानने देना और परमेश्वर की आज्ञापालन करने देना है; यह वचनों के न्याय के माध्यम से उन्हें दंडित किए जाने के लिए नहीं है। वचनों के कार्य के समय के दौरान, बहुत से लोग अपना विद्रोहीपन और अपनी अवज्ञा दिखाएँगे, और वे देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी अवज्ञा दिखाएँगे। लेकिन वह इस वजह से इन सभी लोगों को दंडित नहीं करेगा, इसके बजाय वह उन लोगों को केवल त्याग देगा जो मूलभूत रूप से भ्रष्ट हैं और जो बचाए नहीं जा सकते हैं। वह उनके शरीरों को शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनके शरीरों को समाप्त कर देगा। जिन लोगों को छोड़ दिया जाएगा, वे अनुसरण करते रहेंगे और व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करते रहेंगे। यदि अनुसरण करने के समय वे अभी भी व्यवहार और काट-छाँट को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और वे और भी अधिक पतित हो जाएँगे, तब इन लोगों ने उद्धार का अपना अवसर गँवा दिया होगा। प्रत्येक व्यक्ति जिसने वचनों द्वारा जीता जाना स्वीकार कर लिया है उसके पास उद्धार के प्रचुर अवसर होंगे। इन लोगों में से प्रत्येक का परमेश्वर द्वारा उद्धार उनके प्रति परमेश्वर की अत्यंत उदारता दिखाता है, जिसका अर्थ है कि उनके प्रति अत्यधिक सहिष्णुता दिखायी जाती है। जब तक लोग गलत रास्ते से पीछे लौटते हैं, जब तक वे पश्चाताप कर सकते हैं, तब तक परमेश्वर उन्हें अपने द्वारा उद्धार प्राप्त करने का अवसर देंगे। जब लोग पहले परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करते हैं, तो परमेश्वर को उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं होती है, बल्कि इसके बजाय उन्हें बचाने के लिए वे वह सब कुछ करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई जगह नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें अलग कर देगा। परमेश्वर किसी को दंडित करने में इस वजह से धीमा है क्योंकि वह उन सभी को बचाना चाहता है जिन्हें बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें ज्ञान प्रदान करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, और उन्हें मार डालने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता है। लोगों को बचाने के लिए वचनों का उपयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

45. भले ही परमेश्वर मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करता है, फिर भी इससे पहले कि मनुष्य के हृदयों को अन्ततः जागृत किया जाए, एक लम्बा मार्ग है जिस पर चलना है। मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो कि परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, यह कि परमेश्वर उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं हर एक व्यक्ति को बिना किसी सन्देह के, और बिना किसी बोझ को वहन किए हुए, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने की खोज करने के मार्ग पर अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहूँगा। चाहे तुमने कोई भी ग़लतियाँ क्यों न की हो, चाहे तुम कितनी दूर तक भटक क्यों न गए हो या तुमने कितने अधिक अपराध क्यों न किए हों, परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में इन्हें अपने साथ वहन किए जाने वाले बोझ या अतिरिक्त सामान मत बनने दो: निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। चाहे यह कभी भी घटित क्यों न होता हो, परमेश्वर का हृदय जो कि मनुष्य का उद्धार है वह कभी नहीं बदलता है: यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

46. वे जो बुरी तरह से दुख में हैं सर्वशक्तिमान उन पर करुणा दिखाता है। साथ ही, वह उन लोगों से ऊब चुका है जो होश में नहीं है, क्योंकि उसे उनसे प्रत्युत्तर पाने में लंबा इंतजार करना पड़ा है। वह खोजने की इच्छा करता है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है। वह तुम्हें भोजन-पानी देना चाहता है, जगाना चाहता है, ताकि तुम फिर और भूखे और प्यासे न रहो। जब तुम थके हो और इस संसार में खुद को तन्हा महसूस करने लगो तो, व्याकुल मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, रखवाला, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारे ऊपर नज़र रखे हुए है, वह तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में बैठा है। वह उस दिन की प्रतीक्षा में है जब तुम्हारी याददाश्त एकाएक लौट आयेगी: और इस सत्य को पहचान लेगी कि तुम परमेश्वर से ही आए हो, किसको पता किस तरह और किस जगह बिछड़ गए थे, किसको पता किस मोड़ पर सड़क के किनारे बेहोश पड़े थे, और फिर अनजाने में किस मोड़ पर "पिता" मिल जाए। और फिर तुम्हें यह भी एहसास है कि सर्वशक्तिमान निरंतर साथ रहा है, लगातार नज़र रखता रहा है, तुम्हारे लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा है। वह बेसब्री से कामना करता रहा है, बिना प्रत्युत्तर के आस लगाये प्रतीक्षा करता रहा है। उसका निरंतर प्रतीक्षा करना अनमोल है, और यह मनुष्य के हृदय और उसकी आत्मा के लिए है। संभवतः यह निरंतर प्रतीक्षा अनिश्चित है, शायद यह प्रतीक्षा अपनी अंतिम बेला में है। परंतु तुम्हें ठीक से जान लेना चाहिए कि तुम्हारा हृदय और तुम्हारी आत्मा इस क्षण कहाँ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना" से उद्धृत

47. परमेश्वर का प्रेम और दया उसके प्रबंधकारणीय कार्य के हर ब्यौरे में व्याप्त होती है और इससे निरपेक्ष कि लोग परमेश्वर की भली मंशा को समझ पा रहे हैं या नहीं, वह अभी भी अथक रूप से अपने कार्य में लगा हुआ है जो वह पूरा करना चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझ रहे हैं, परमेश्वर जो कार्य कर रहा है, उसके लाभ और सहायता को हर व्यक्ति भलीभाँति समझ सकता है। भले ही आज तुम परमेश्वर के द्वारा प्रदत्त प्रेम या जीवन को महसूस नहीं कर पा रहे हो, परन्तु जब तक तुम परमेश्वर को न छोड़ो, और सत्य के अनुसरण के अपने इरादों को न छोड़ो, तो एक न एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब परमेश्वर की मुस्कान तुम पर प्रगट होगी। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य का लक्ष्य शैतान के चंगुल में फंसी हुई मानवजाति को उबारना है, न कि मानवजाति को छोड़ना है जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट हो चुकी है और परमेश्वर के विरूद्ध खड़ी हुई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" से उद्धृत

फुटनोट:

क. ए पीस ऑफ़ डेडवुड: एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—"सहायता से परे"।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

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