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VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन

VII अद्वितीय परमेश्वर स्वयं को जानने पर उत्कृष्ट वचन

(III) परमेश्वर की पवित्रता पर वचन

38. अपने हृदय के अंतर्तम भाग से जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता, परमेश्वर का दोषरहित सार है और परमेश्वर का निःस्वार्थ प्रेम है, यह जान लोगे कि जो कुछ परमेश्वर मनुष्य को देता है वह निःस्वार्थ है, और तुम लोग यह जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता निष्कलंक और अनिन्द्य है। परमेश्वर के ये सार मात्र ऐसे वचन नहीं हैं जिसे वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ खामोशी से और ईमानदारी से निपटने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या मत-संबंधी है और यह निश्चित रूप से एक प्रकार का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर के स्वयं के कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन है और परमेश्वर के स्वरूप का प्रकटित सार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

39. तुम चीज़ों पर परमेश्वर का दृष्टिकोण वैसा नहीं देखोगे जैसा मनुष्य का होता है, और इसके अलावा, तुम चीज़ों को सँभालने के लिए उसे मनुष्य के दृष्टिकोण, उनके ज्ञान, उनके विज्ञान या उनके दर्शनशास्त्र या मनुष्य की कल्पना का उपयोग करते हुए नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है वह सत्य से जुड़ा होता है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य कोई आधारहीन कल्पना नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर के सार और उसके जीवन के कारण परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए हैं। क्योंकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज़ का सार, सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है वह लोगों के लिए जीवन शक्ति और प्रकाश लाती है; यह लोगों को सकारात्मक चीज़ों को और उन सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता को देखने देती है और मनुष्य को रास्ता दिखाती है ताकि वे सही राह पर चलें। ये चीज़ें परमेश्वर के सार की वजह से निर्धारित की जाती हैं और ये परमेश्वर के सार की पवित्रता के कारण निर्धारित की जाती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" से उद्धृत

40. परमेश्वर की जिस पवित्रता के बारे में मैं बात करता हूँ वह किसकी ओर संकेत करता है? एक पल के लिए इस बारे में सोचें। क्या परमेश्वर की सत्यता ही उसकी पवित्रता है? क्या परमेश्वर की विश्वसनीयता ही उसकी पवित्रता है? क्या परमेश्वर की निःस्वार्थता ही उसकी पवित्रता है? क्या परमेश्वर की विनम्रता ही उसकी पवित्रता है? क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम ही उसकी पवित्रता है? परमेश्वर मनुष्य को मुफ़्त में सत्य और जीवन प्रदान करता है—क्या यही उसकी पवित्रता है? यह सब कुछ जिसे परमेश्वर प्रकट करता है वह अद्वितीय है; यह भ्रष्ट मानवजाति के भीतर मौजूद नहीं होता है, न ही इसे वहाँ देखा जा सकता है। इसका ज़रा सा भी नामोनिशान मनुष्य की भ्रष्टता की शैतान की प्रक्रिया के दौरान, न शैतान के भ्रष्ट स्वभाव में और न ही शैतान के सार या उसकी प्रकृति में देखा जा सकता है। परमेश्वर का समस्त स्वरूप अद्वितीय है और केवल स्वयं परमेश्वर का ही इस प्रकार का सार है, केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के सार को धारण करता है। ...पवित्रता का सार सच्चा प्रेम है, परन्तु इससे भी अधिक यह सत्य, धार्मिकता और प्रकाश का सार है। "पवित्र" शब्द केवल तभी उपयुक्त है जब इसे परमेश्वर के लिए लागू किया जाता है; सृष्टि में कुछ भी पवित्र कहलाने के योग्य नहीं हो सकता है। मनुष्य को यह अवश्य समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

41. "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, 'तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्‍य मर जाएगा।'" इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा में क्या शामिल है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, वहाँ सभी किस्म के पेड़ों के फल मौजूद थे। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी सन्देह के अपनी इच्छा के अनुसार खाया जा सकता है। यह एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। यह चेतावनी मनुष्य को बताती है कि वह किस वृक्ष के फल को नहीं खा सकता है? उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से फल नहीं खाना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तब क्या होगा? परमेश्वर ने मनुष्य से कहाः यदि तुम इसे खाओगे तो निश्चित ही मर जाओगे। क्या ये वाक्य स्पष्ट हैं? यदि परमेश्वर ने तुम सब से यह कहा होता किन्तु तुम लोग यह नहीं समझ पाते कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम सब इसे एक नियम या एक आज्ञा के रूप में मानते जिसका पालन किया जाना चाहिए? इसका पालन किया जाना चाहिए, है न? परन्तु मनुष्य इसका पालन करने योग्य है या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य से बिलकुल साफ़-साफ़ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, और जिसे उसे नहीं ख़ाना चाहिए उसे खाने के क्या परिणाम होंगे। क्या तुमने परमेश्‍वर द्वारा कहे इन संक्षिप्त वचनों में परमेश्वर के किसी स्वभाव को देखा है? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? क्या इनमें कोई छलावा है? क्या इनमें कोई झूठ है? क्या इनमें कुछ धमकी भरी है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सत्‍यता से और सच्चाई से मनुष्य को बताया था कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, जो स्पष्ट और सरल है। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन स्‍पष्‍ट हैं? क्या किसी अटकलबाज़ी की ज़रूरत है? (नहीं।) अनुमान लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक झलक में ही उनका अर्थ स्पष्ट है, जैसे ही तुम इन्‍हें देखते हो तुम इसे समझ जाते हो। यह बिल्कुल स्पष्ट है। यानी परमेश्वर जो कुछ वह कहना चाहता है, जो कुछ वह अभिव्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें परमेश्वर व्यक्त करता है वे स्पष्ट, सरल एवं साफ हैं। उनमें कोई गुप्त इरादे या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं होता। उसने सीधे मनुष्य से बात की और बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के इन वचनों से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी है, और उसका हृदय सच्चा है। उसमें ज़रा भी झूठ नहीं है; उन चीज़ों के साथ जिन्हें तुम लोग नहीं खा सकते, ये वचन तुमसे यह नहीं कह रहे कि जो खाने लायक है उसे तुम लोग नहीं खा सकते या ऐसा नहीं कह रहे हैं कि "ऐसा करके देखो क्या होता है"। उसके कहने का अभिप्राय यह नहीं है। परमेश्वर जो कुछ हृदय में सोचता है वही कहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से उद्धृत

42. परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा ही मानवजाति के जीवन की अगुवाई की है। चाहे मानवजाति को आशीष देना हो, उन्हें व्यवस्था एवं अपनी आज्ञाएँ देना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियम नियत करना हो, क्या तुम लोग जानते हो कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का इच्छित लक्ष्य क्या है? पहला, क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह मानवजाति की भलाई के लिए है? तुम लोग सोच सकते हो कि यह वाक्य अपेक्षाकृत व्यापक एवं खोखला है, किन्तु विशेष रूप से कहें, तो क्या सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह एक सामान्य जीवन जीने के प्रति मनुष्य की अगुवाई एवं मार्गदर्शन के लिए नहीं है? चाहे यह ऐसा है जिससे मनुष्य उसके नियमों को माने या उसकी व्यवस्था का पालन करे, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का लक्ष्य है कि वह शैतान की आराधना न करे, और शैतान के द्वारा आहत न हो; यही मूलभूत बात है, और यही वह काम है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाओं एवं नियमों को लिया था और ऐसे प्रावधान किए थे जो हर ऐसे पहलू का समावेश करते थे जिनकी कल्‍पना की जा सकती हो। ये प्रावधान सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानवजाति को संजोता, पोषण करता और बहुत प्रेम करता है। क्या स्थिति ऐसी ही नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के कोई गुप्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह लक्ष्य सही एवं सकारात्मक है? (हाँ।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने कौन-कौन से प्रावधान किए हैं, उसके कार्य के दौरान उन सब का प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे उसके मार्ग की अगुवाई करते हैं। अतः क्या परमेश्वर के मन में कोई स्‍वार्थपूर्ण विचार चल रहे हैं? जहाँ मनुष्य की बात आती है तो क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के अतिरिक्त उद्देश्य हैं, या क्या वह किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? (नहीं।) बिलकुल भी नहीं। परमेश्वर जैसा कहता है वैसा करता है, और वह अपने हृदय में भी इसी तरह से सोचता है। इसमें कोई मिलावटी उद्देश्य नहीं है, कोई स्‍वार्थपूर्ण विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता है, बल्कि निश्चित तौर पर बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के पूरी तरह से सब कुछ मनुष्य के लिए करता है। यद्यपि उसके पास मनुष्य के लिए योजनाएं एवं इरादे हैं, फिर भी वह खुद के लिए कुछ नहीं करता है। वह जो कुछ भी करता है उसे विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए, मानवजाति को बचाने के लिए, और मानवजाति को गुमराह होने से बचाने के लिए करता है। अतः क्या यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? क्या तुम इस बहुमूल्य हृदय का लेशमात्र संकेत भी शैतान में देख सकते हो? (नहीं।) तुम शैतान में इसका एक भी संकेत नहीं देख सकते। हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है वह सहज रूप से प्रगट हो जाती है। जिस तरह से परमेश्वर कार्य करता है, उसे देखकर क्या लगता है, वह किस प्रकार कार्य करता है? क्या परमेश्वर इन व्यवस्थाओं एवं अपने वचनों को लेता है और सोने के अभिमंत्रित छल्‍लों[क] के समान प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर कसके बांध कर इन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है। वह समझाता है और प्रोत्साहन देता है।) क्या वह धमकाता है? क्या वह तुमसे गोल-मोल बात करता है? (नहीं।) जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करे? (वह ज्योति चमकाता है।) वह तुम पर एक ज्योति चमकाता है, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है और तुम्‍हें क्या करना चाहिए। इन तरीकों से जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, तुम्हें क्या लगता है परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है? क्या इनसे तुम्हें ऐसा महसूस होता है कि परमेश्वर तुम्हारी समझ से परे है? (नहीं।) तो इनसे तुम्हें कैसा महसूस होता है? परमेश्वर विशेष रूप से तुम्हारे बहुत करीब है, तुम्हारे बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करता है, जब वह तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तो तुम परमेश्वर के मिलनसार स्वभाव, एवं तुम्‍हारे प्रति उसके सम्‍मान को महसूस करते हो, और तुम महसूस करते हो कि वह कितना प्यारा है, और कितना स्नेही है। किन्तु जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तुम्हारा न्याय करता है एवं तुम्हें अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का उपयोग करता है? क्या वह शब्दों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह वातावरण एवं लोगों, मामलों, एवं चीज़ों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) यह अनुशासन किस स्तर तक पंहुचता है? क्या यह उस स्तर तक पहुंचता है जहाँ शैतान मनुष्य को नुकसान पहुंचाता है? (नहीं, यह उस स्तर तक पहुंचता है जिसे मनुष्य सह सकता है।) परमेश्वर सौम्यता, प्रेम, कोमलता एवं परवाह करते हुए ऐसे तरीके से कार्य करता है जो विशेष रूप से नपा-तुला और उचित है। उसका तरीका तुम में तीव्र भावनाओं को उत्पन्न नहीं करता है, यह कहते हुए कि, "इसे करने के लिए परमेश्‍वर को मुझे अनुमति देनी चाहिए" या "उसे करने के लिए परमेश्वर को मुझे अनुमति देनी चाहिए" परमेश्वर तुम्हें कभी भी उस किस्म की तीव्र मानसिकता या तीव्र भावनाएं नहीं देता है जो चीज़ों को असहनीय बना देती हैं। यह बात सही है न? यहाँ तक कि जब तुम न्याय एवं ताड़ना के विषय में परमेश्वर के वचनों को ग्रहण करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार एवं सामर्थ्‍य को महसूस करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अलंघनीय है? (हाँ।) क्या ऐसे समय में तुम परमेश्वर से दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से भय महसूस होता है? नहीं, बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भययुक्त सम्मान महसूस करते हो। क्या लोग परमेश्वर के कार्य के कारण इन सब चीज़ों को महसूस नहीं करते हो? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएं होतीं? (नहीं।) परमेश्वर मनुष्य की निरन्तर आपूर्ति के लिए, एवं मनुष्य को सहारा देने के लिए अपने वचनों, अपने सत्‍य एवं अपने जीवन का उपयोग करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य निराश होता है, तब निश्चित तौर पर परमेश्वर कठोरता से यह कहते हुए बात नहीं करता है कि, "निराश मत हो। तुम निराश क्यों हो? तुम किस कारण कमज़ोर हो? ऐसा क्या है जिसके विषय में तुम कमज़ोर हो? तुम कितने कमज़ोर हो और हमेशा इतने निराश रहते हो। जीने से क्या मतलब है? मर जाओ!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) पर परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता है। परमेश्वर के इस रीति से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार-तत्व, परमेश्वर की पवित्रता का सार-तत्व। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, और उसके द्वारा मनुष्य को संजोकर रखने और उसका पोषण करने को, एक या दो वाक्य में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य के डींग हांकने के द्वारा घटित होती है बल्कि यह ऐसी चीज़ है जिसे परमेश्वर वास्तविक तौर पर अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार-तत्व का प्रकाशन है। क्या ये सभी तरीके जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है वे मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता को देखने की अनुमति दे सकते हैं? इन सभी तरीकों में जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर सम्‍पादित करना चाहता है, जिनमें विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, जिसे वह मनुष्य को समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई दुष्टता या धूर्तता देखी है? (नहीं।) अतः जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, साथ-ही-साथ परमेश्वर का सारा सार-तत्व जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अब तक जिसके विषय में हमने बात की है, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते है? (हाँ।) वह सब कुछ जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, जिसमें परमेश्वर के वचन शामिल हैं, वे विभिन्न तरीके जिनके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को बताता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को स्मरण कराता है, वह जिसकी वह सलाह देता है एवं उत्साहित करता है, यह सब एक सार-तत्व से उत्पन्न होता है: यह सब परमेश्वर की पवित्रता से उत्पन्न होता है। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर नहीं होता, तो कोई मनुष्य उस कार्य को, जिसे वह करता है, करने के लिए उसका स्थान नहीं ले सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से उद्धृत

43. अब अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के साथ, वह मनुष्य को यूँ ही अब और अनुग्रह एवं आशीषें प्रदान नहीं करता है जैसा कि उसने शुरुआत में किया था, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है। कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिसका उन्होंने अनुभव किया है? उन्होंने परमेश्वर के प्रेम को, परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को देखा है। इस समय, परमेश्वर मनुष्य का और अधिक भरण पोषण करता है, उसे सहारा देता है, और प्रबुद्ध करता है और उसका मार्गदर्शन करता है, ताकि वे धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगें, उसके बोले वचनों को और उस सत्य को जानने लगें जिसे वह मनुष्य को प्रदान करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होंगे, जब वे हतोत्साहित होंगे, जब उनके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होगा, तब परमेश्वर उन्हें सान्त्वना, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि छोटी कद-काठी वाले मनुष्य धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्य को पा सकें, सकारात्मकता में उठ सकें और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सकें। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं या उसका विरोध करते हैं, या वे अपनी स्वयं की भ्रष्टता को प्रकट करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें ताड़ना देने में और उन्हें अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति, हालाँकि, परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस तरीके से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बड़ा होता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ सत्‍य जानने लगता है, सकारात्मक चीज़ें क्या हैं और नकारात्मक चीज़ें क्या हैं यह जानने लगता है, यह जानने लगता है कि बुराई क्या है और अंधकार क्या है। परमेश्वर हमेशा मनुष्य को ताड़ित एवं अनुशासित नहीं करता है, न ही वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाता है। बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति का, भिन्न-भिन्न तरीकों से, उनके विभिन्न चरणों में और उनके भिन्न-भिन्न स्‍तरों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीज़ें और बड़ी क़ीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत या इन चीज़ों के बारे में जिन्हें परमेश्वर करता है कुछ भी महसूस नहीं करता है, फिर भी वह जो कुछ करता है उसे वास्तविकता में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम सच्चा हैः परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा से बचता है, जबकि मनुष्य की दुर्बलता के प्रति, परमेश्वर समय-समय पर अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और उनके भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, मनुष्य को प्रबुद्ध करना एवं उसका मार्गदर्शन करना ये सब मानवजाति को सत्य के सार को और भी अधिक जानने देते हैं, और उत्तरोत्तर यह जानने देते हैं कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्‍या है, और कैसे आगे के मार्ग पर चलना है। ये सभी कार्य जो परमेश्वर करता है वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो यह उद्देश्य क्या है? क्यों परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन तरीकों का उपयोग करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है और उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर जो देखना चाहता है वह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। ये तरीके जिन्हें वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है मनुष्य के हृदय को निरन्तर जागृत करने, मनुष्य की आत्मा को जागृत करने, मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि वे कहाँ से आए हैं, कौन उनका मार्गदर्शन कर रहा है, उनकी सहायता कर रहा है, उनका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को अब तक जीवित रहने दिया है; वे मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि सृष्टिकर्ता कौन है, उन्हें किसकी आराधना करनी चाहिए, उन्हें किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता है, इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान लेता है, परमेश्वर के हृदय को समझ लेता है, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ लेता है। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब वे एक पतित जीवन एवं भ्रष्ट स्वभाव को अब और जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर की संतुष्टि में सत्य की खोज करने की इच्छा करते हैं। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो वे शैतान के साथ स्पष्ट रूप से सम्बन्ध तोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, शैतान के द्वारा अब और हानि नहीं पहुँचाए जाते है, उसके द्वारा अब और नियंत्रित नहीं होते या मूर्ख नहीं बनाए जाते हैं। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के कार्य में और उसके वचनों में सकारात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय और बुराई को त्यागने को प्राप्त करता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

44. अपने लम्बे जीवनभर में, मूलत: प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक ख़तरनाक परिस्थितियों का सामना किया है और वह अनेक प्रलोभनों से होकर गुज़र चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान बिलकुल तुम्हारे बगल में है, उसकी आँखें लगातार तुम्हारे ऊपर जमी रहती हैं। उसे यह अच्छा लगता है जब तुम पर आपदा आती है, जब तुम पर विपदाएँ पड़ती हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है, और उसे अच्छा लगता है जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते हो। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, वह लगातार तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ मनुष्य के पास है—शान्ति और आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा—सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन है, और वह हर प्राणी के भाग्य का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है। परन्तु क्या परमेश्वर को अपने पद की कोई बढ़ी हुई अवधारणा है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं? तुम्हें ऐसा कहते हैं "मैं सबसे महान हूँ, वह मैं हूँ जो तुम लोगों की ज़िम्मेदारी लेता है, तुम लोगों को मुझ से अवश्य दया की भीख माँगनी चाहिए और अवज्ञा के लिए मृत्युदंड दिया जाएगा"। क्या परमेश्वर ने कभी मानवजाति को इस प्रकार से धमकी दी है? (नहीं।) क्या उसने कभी कहा है कि "मानवजाति भ्रष्ट है इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं उनसे कैसा व्यवहार करता हूँ, कैसा भी मनमाना व्यवहार काम करेगा; मुझे उनके लिए चीज़ों को बहुत अच्छे ढंग से व्यवस्थित करने की आवश्यकता नहीं है"। क्या परमेश्वर इस तरह से सोचता है? क्या परमेश्वर ने इस तरीके से कार्य किया है? (नहीं।) इसके विपरीत, प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का बर्ताव सच्चा एवं ज़िम्मेदारीपूर्ण है, यहाँ तक कि उससे भी अधिक ज़िम्मेदार जितना तुम स्वयं के प्रति हो। क्या ऐसा नहीं है? परमेश्वर व्यर्थ में नहीं बोलता है, न ही वह घमंड से ऊँचाई पर खड़ा होता है और न ही वह मनुष्य को मूर्ख बनाकर काम चलाता है। इसके बजाय वह ईमानदारी एवं खामोशी से उन चीज़ों को करता है जो उसे स्वयं करने की आवश्यकता है। ये चीज़ें मनुष्य के लिए आशीषें, शान्ति एवं आनन्द लाती हैं। ये मनुष्य को शांति एवं प्रसन्नता से परमेश्वर की दृष्टि के सामने और उसके परिवार में लाती हैं; और उचित तर्क और विचार के साथ वे परमेश्वर के सामने रहते हैं और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारते हैं। तो क्या परमेश्वर अपने कार्य में कभी भी मनुष्य के साथ धोखेबाज़ रहा है? क्या उसने कभी उदारता का झूठा प्रदर्शन किया है, कुछ हँसी-मजाक के साथ मनुष्य को मूर्ख बनाया है, फिर मनुष्य की ओर पीठ कर ली है? क्या परमेश्वर ने कभी कहा कुछ है और फिर किया कुछ और है? (नहीं।) क्या परमेश्वर ने तुम्हें यह कहते हुए कभी खोखले वादे किए हैं और शेखी बघारी है कि वह तुम्हारे लिए ऐसा कर सकता है या वैसा करने के लिए तुम्हारी सहायता कर सकता है, और फिर गायब हो गया है? (नहीं।) परमेश्वर में कोई छल नहीं है, और कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है और जो कुछ वह करता है वह वास्तविक होता है। वही एकमात्र है जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं, एकमात्र परमेश्वर है जिसे लोग अपना जीवन एवं अपना सर्वस्व सौंप सकते हैं। चूँकि परमेश्वर में कोई छल नहीं है, तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर ही सबसे अधिक ईमानदार है? (हाँ।) निश्चित रूप से हम कह सकते हैं, है न? यद्यपि, इस शब्द के बारे में अभी बात करें तो, जब इसे परमेश्वर पर लागू किया जाता है तो यह अत्यंत हल्‍का, बहुत मानवीय है, इस बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि ये मानवीय भाषा की सीमाएँ हैं। यहाँ परमेश्वर को ईमानदार कहना थोड़ा सा अनुचित लगता है, परन्तु फिलहाल हम इसी शब्द का उपयोग करेंगे। परमेश्वर विश्वासयोग्य एवं ईमानदार है। तो इन पहलुओं के बारे में बात करने का हमारा क्या आशय है? क्या हमारा आशय परमेश्वर और मनुष्य के बीच भिन्नताओं और परमेश्वर और शैतान के बीच भिन्नताओं से है? हम ऐसा कह सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का एक भी नामोनिशान नहीं देख सकता है। क्या ऐसा कहने में मैं सही हूँ? क्या मुझे इसके लिए एक आमीन मिल सकता है? (आमीन!) हम शैतान की किसी भी बुराई को परमेश्वर में प्रकट होते हुए नहीं देखते हैं। वह सब जो परमेश्वर करता है और प्रकट करता है वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद एवं सहायक है, वह पूरी तरह से मनुष्य का भरण-पोषण करने के लिए किया जाता है, वह जीवन से भरपूर है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक और मार्ग पर चलने के लिए एक दिशा देता है। परमेश्वर भ्रष्ट नहीं है और इसके अलावा, इस वक्त हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे देखते हुए, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर में मानवजाति की कोई भ्रष्टता नहीं है और मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव या शैतान के सार के समतुल्य या समरूप कुछ नहीं है, तो इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर कोई भ्रष्टता प्रकट नहीं करता है, और उसके कार्य में उसके स्वयं के सार का प्रकाशन ही हमारे लिये आवश्यक इस बात की पूरी पुष्टि है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। क्या तुम लोग इसे देखते हो? अब, परमेश्वर के पवित्र सार को जानने के लिए, फिलहाल आइए हम इन दो पहलुओं पर नज़र डालें: 1) परमेश्वर में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है; 2) मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को स्‍वयं परमेश्वर के सार को देखने देता है और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक है। क्योंकि वे जो चीज़ें जिन्हें परमेश्वर के कार्य का हर तरीका मनुष्य के लिए लाता है सभी सकारात्मक चीज़ें हैं। सबसे पहले, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य ईमानदार हो—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को बुद्धि देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को भले एवं बुरे के बीच पहचान करने में सक्षम बनाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को मानवीय जीवन का अर्थ एवं मूल्य समझने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को सत्य के अनुसार लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के सार के भीतर देखने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? (हाँ, यह है।) और इन सब का परिणाम यह है कि मनुष्य शैतान के द्वारा अब और धोखा नहीं खाता है, शैतान के द्वारा अब और उसे लगातार नुकसान नहीं पहुँचाया जाता है या उसके द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोगों को शैतान की भ्रष्टता से अपने आप को पूरी तरह से स्वतन्त्र होने देते हैं, और इसलिए वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

45. अब परमेश्वर के सार की तुम लोगों की बोधात्मक समझ को तब भी इसे सीखने, इसकी पुष्टि करने, इसे महसूस करने और इसका अनुभव करने के लिए एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता है, जब तक कि तुम लोग अपने हृदय के अंतर्तम भाग से परमेश्वर की पवित्रता को परमेश्वर के दोषरहित सार, और परमेश्वर के निःस्वार्थ प्रेम को न जान लो, यह न जान लो कि यह सब जो परमेश्वर मनुष्य को देता है वह निःस्वार्थ है, तो तुम लोग यह जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता निष्कलंक और अनिन्द्य है। परमेश्वर के ये सार मात्र ऐसे वचन नहीं हैं जिसे वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ खामोशी से और ईमानदारी से निपटने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या मत-संबंधी है और यह निश्चित रूप से एक प्रकार का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर के स्वयं के कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन है और परमेश्वर के स्वरूप का प्रकटित सार है। मनुष्य को इस सार को जानना और इसे समझना चाहिए, क्योंकि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है और हर वचन जो वह कहता है उसका हर एक व्यक्ति के लिए बड़ा मूल्य एवं बड़ा महत्व होता है। जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में इन शब्दों "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के सच्चे अर्थ का अनुभव कर सकते हो। तुम अब और कल्पना नहीं करोगे कि तुम अन्य मार्गों पर चलना चुन सकते हो, और तुम उस हर एक चीज़ के साथ विश्वासघात करने की इच्छा नहीं करोगे जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के आरपार उज्जवल, और सही मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो, केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक मानवता को जी सकते हो, सत्य को धारण कर सकते हो, सत्य को जान सकते हो, और केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सत्य से जीवन को प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की क्षति और नियन्त्रण से मुक्त कर सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम अब और कष्ट नहीं सहो: यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है, केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वही तुम्हारे लिए सभी चीज़ों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजित या सृजित नहीं किया गया प्राणी प्राप्त नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई भी सृजित या सृजित नहीं किया गया प्राणी परमेश्वर के इस प्रकार के सार को धारण नहीं कर सकता है, इसलिए किसी भी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

फुटनोट:

क. "दी इन्कैन्टेशन ऑफ द गोल्डन हूप" प्रसिद्ध चीनी उपन्यास "जर्नी टू द वेस्ट" की ओर संकेत करता है, जिसमें भिक्षु ज़ुयानज़ैंग वानर राजा को अपने वश में लाने के लिए एक अभिमंत्रित सोने के छल्ले का उपयोग करता है जिसे वानर राजा के सिर पर रख कर जादुई रूप से कस कर उससे असहनीय दर्द उत्पन्न किया जा सकता है। यह क्रमशः लोगों को बांधने के लिए रूपकालंकार बन गया है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

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