सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

II अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

II अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

1. परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर के द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, और न ही वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने, और परमेश्वर की ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपान्तरण परमेश्वर के कई भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में इस तरह के बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसका अनुसरण करने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपान्तरण यह दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है, और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह, और एक ऐसा व्यक्ति बन गया है जो परमेश्वर के समान विचारों को साझा करने वाला है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, और उस समस्त कार्य की जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है गवाही दे। जो लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही परिशुद्ध और वास्तविक होती है, और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँटसे गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसी तरह वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का भी उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है, और जिन्होंने इस तरह उसकेआशीषों को प्राप्त कर लिया है। उसे अपने मुँह से उसकी स्तुति करने के लिए मनुष्य की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जो उसके द्वारा बचाए नहीं गए हैं। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर को जानते हैं, और केवल वे लोग ही जिनके स्वभाव को रूपान्तरित कर दिया गया है उसकी गवाही देने के योग्य हैं। परमेश्वर अपने नाम को मनुष्य को जानबूझकर शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं" से उद्धृत

2. तुम सबों को परमेश्वर की इच्छा को समझना और देखना चाहिये कि परमेश्वर का कार्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। आज का कार्य उन लोगों का परिवर्तन करना है जो भ्रष्ट हो चुके हैं, और अत्यधिक सुन्न हो चुके हैं, और उन्हें शुद्ध करना है जो सृजन के बाद शैतान के मार्ग पर चल पड़े हैं, यह आदम और हव्वा का सृजन करना नहीं, प्रकाश की सृष्टि या अन्य सभी पेड़ पौधों और पशुओं के सृजन की तो बात ही दूर है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सके और वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को परिवर्तित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है, यह उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए है जो परमेश्वर के नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की अंदरूनी कहानी यही है। तुमको यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। अपने कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यही परमेश्वर के कार्य का पूरा महत्व है। इन वचनों से, क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य बहुत आसान है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से उद्धृत

3. अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि, जब तक स्वयं परमेश्वर का युग नहीं आ जाता है तब तक परमेश्वर जो कार्य करेगा वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवन के बारे में पूछताछ करना नहीं, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण किया है वे लोग हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए, ऐसा हर एक व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, वह परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक है। दूसरे शब्दों में, हर कोई जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वही परमेश्वर के न्याय का पात्र है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

4. न्याय का कार्य परमेश्वर का स्वयं का कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर के द्वारा किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना न्याय है, इसलिए यह निर्विवाद है कि तब भी परमेश्वर मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होता है। अर्थात्, अंत के दिनों में, मसीह पृथ्वी के चारों ओर मनुष्यों को सिखाने के लिए और सभी सत्यों को उन्हें बताने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

5. इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ है, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जीतने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे यही निहित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

6. अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को करता है, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; बल्कि वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए समझ से परे हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा पूरे होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

7. न्याय का कार्य प्रतिनिधिक है, और किसी निश्चित व्यक्ति के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता है। इसके बजाए, यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करने के द्वारा, देह में प्रकट परमेश्वर अपने कार्य का उपयोग संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है, जिसके पश्चात् यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य भी इस प्रकार ही है। परमेश्वर किसी निश्चित किस्म के व्यक्ति या लोगों के किसी निश्चित समूह का न्याय नहीं करता है, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है—उदाहरण के लिए, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या उसके विरुद्ध मनुष्य का अनादर, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान, इत्यादि। जिसका न्याय किया जाता है वह परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध का सार है, और यह कार्य अंत के दिनों के विजय का कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिसकी गवाही मनुष्य के द्वारा दी जाती है वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसकी बीते समयों के दौरान मनुष्य के द्वारा कल्पना की गई थी। देहधारी परमेश्वर के द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है" से उद्धृत

8. मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए यह वचनों के इस कार्य का प्रयोग कया जायेगा; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना, निर्दयी श्राप और प्रकटीकरण का प्रयोग किया जायेगा; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मानवता की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विशिष्टता दर्शाने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह उन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं। शब्द मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो इस जीत लिए जाने को स्वीकार करते हैं, उन्हें इन वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना आवश्यक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से उद्धृत

9. मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के सिवाए और कुछ नहीं सोचता है, यह कि वह उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर की खोज करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता है। और इसलिए, मनुष्य पर विजय में, मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और ऐसी सभी चीज़ों को जो परमेश्वर की उसकी आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं हटा दिया जाना चाहिए। ऐसा करने से, मनुष्य पर विजय के प्रभावों को प्राप्त कर लिया जाएगा। परिणामस्वरुप, मनुष्य पर शीघ्रातिशीघ्र विजय में यह ज़रूरी है कि सबसे पहले मनुष्य की अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाओं और भयंकर कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और, इसके माध्यम से, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के प्रेम को प्रकट करने, और मानवीय जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के प्रेम की शुद्धि होती है, कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किन्तु सभी प्राणियों के प्रति परमेश्वर के रवैये में, वह सिर्फ जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता है; इसके बजाय, वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के वास्ते, और मनुष्य की प्राचीनतम, मूल सदृशता पुनः-प्राप्त करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि, मनुष्य पर विजय पाने के बाद, परमेश्वर मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता, और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मनुष्यजाति का प्रबंधन नहीं होता, न ही मनुष्य पर विजय उसके उद्धार के वास्ते होती। मनुष्य पर विजय पाना और अन्ततः एक अद्भुत मंज़िल पर उसके आगमन के बाद उसे सिर्फ प्राप्त करना ही उद्धार के समस्त कार्य के केन्द्र में होता है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक खूबसूरत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं जिन्हें सभी प्राणियों के द्वारा धारण किया जाना चाहिए, और वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता के द्वारा किया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" से उद्धृत

10. विजयी कार्य द्वारा मुख्य रूप से यह परिणाम हासिल करने का प्रयास किया जाता है कि मनुष्य की देह को विद्रोह से रोका जाए, अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, और वह परमेश्वर का होने के लिए संकल्प करे। मनुष्य का मिजाज़ या देह कैसे परिवर्तित होते हैं, यह निर्धारित नहीं करता कि उस पर विजय प्राप्त की गई है या नहीं। बल्कि, जब मनुष्य की सोच, उसकी चेतना और उसकी भावना बदलती है—अर्थात, जब उसकी पूरी मनोवृत्ति में बदलाव होता है—तब परमेश्वर उस पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। जब तुम आज्ञा का पालन करने का संकल्प ले लेते हो और एक नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में अपनी धारणाओं या इरादों को लाना बंद कर देते हो, और जब तुम्हारा मस्तिष्क सामान्य रूप से सोच सकता हो, यानी, जब तुम परमेश्वर के लिए तहेदिल से प्रयास करने में जुट सकते हो—तो इस प्रकार का व्यक्ति वह होता है जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से उद्धृत

11. जीते जाने के अन्तिम चरण का उद्देश्य लोगों को बचाना और लोगों के अन्त को भी प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की विकृति को भी प्रकट करना है और इस प्रकार उन्हें पश्चाताप करवाना, उन्हें ऊपर उठाना और जीवन और मानवीय जीवन के सही मार्ग की खोज करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा उनके भीतरी विद्रोहीपन को प्रदर्शित करना है। परन्तु, यदि लोग अभी भी पश्चाताप करने के अयोग्य हैं, अभी भी मानव जीवन के सही मार्ग को खोजने में असमर्थ हैं और अपनी भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में अयोग्य हैं, तब वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने के लिए बचाई न जा सकने योग्य वस्तुएँ बन जाएँगे। लोगों को बचाना और उनका अन्त भी दिखाना-यह बचाए जाने की महत्ता है। अच्छे अन्त, बुरे अन्त-वे सभी जीतने वाले कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब जीतने वाले कार्य के दौरान प्रकट किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से उद्धृत

12. जो जीत लिए जाने का कार्य तुम सब लोगों में किया गया है वह गहनतम महत्त्व रखता है: एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को सिद्ध करना है, अर्थात उन्हें विजेताओं के समूह में सिद्ध करना, पूर्ण किए गए लोगों के प्रथम समूह में, अर्थात प्रथमफलों के रूप में। दूसरी ओर, यह सृष्ट प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेने देना है, परमेश्वर के महानतम उद्धार को, और परमेश्वर के पूर्ण उद्धार को प्राप्त करने देना है, यह मनुष्य को न केवल दया और प्रेमपूर्ण करुणा का आनन्द लेने देना है, परन्तु और अधिक महत्वपूर्ण रीति से ताड़ना और न्याय का अनुभव लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक, परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए घृणा नहीं है। यहाँ तक कि ताड़ना और न्याय, जो तुम देख चुके हो, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम; यह प्रेम लोगों का मानवजीवन के सही मार्ग पर सन्दर्शन करता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष साक्ष्य देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने के लिए एक आधार रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य मानवीय जीवन के सही मार्ग पर लोगों का सन्दर्शन करना है, ताकि वे मनुष्यजाति का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है। ऐसे सन्दर्शन के बिना तुम एक रिक्त जीवन जीने के योग्य ही होगे, मात्र एक मूल्यहीन और निरर्थक जीवन जीने के योग्य होगे और यह जानोगे ही नहीं कि एक सामान्य व्यक्ति कैसे बनना है। यह मनुष्य को जीत लिए जाने का गहनतम महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से उद्धृत

13. परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं, "यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है?" ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है—और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से उद्धृत

14. परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्य को अतीत में शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, उसने मनुष्य को सिद्ध बनाने का कार्य किया था। शरीर का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर के द्वारा बताई गईं वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम करो, ताकि तुम शरीर के सार को जान लो; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है ताकि तुम जागृत हो जाओ, कि वह तुम्हें अनुमति दे कि तुम अपने भीतर की कमियों को जान लो, और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—वे सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और धर्मी स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए है, और परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से उद्धृत

15. आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, और तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन जान लो कि तुम्हारी निंदा इसलिए है कि तुम स्वयं को जान सको। निन्दा, अभिशाप, न्याय, ताड़ना—ये सब इसलिए हैं ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो जाए, और, इसके अलावा, ताकि तुम अपने महत्व को जान सको, और देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धर्मी हैं, और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, कि वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वही धर्मी परमेश्वर है जो मनुष्य को प्यार करता है, और मनुष्य को बचाता है, और जो मनुष्य का न्याय करता और उसे ताड़ित करता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम दीन-हीन हैसियत के हो, और यह कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परन्तु यह नहीं जानते हो कि परमेश्वर आज तुम में जो न्याय कर रहा है और ताड़ना दे रहा है उसके माध्यम से परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट कर देना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव करने का कोई मार्ग नहीं है, आगे जारी रखने में सक्षम तो तुम बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने, या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, श्राप देने, ताड़ना देने, और बचाने के लिए हो आया है। अपनी 6000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वे मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का अंत स्पष्ट करें—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए है, यह सब उन लोगों को पूरी तरह से पूर्ण बनाने, और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण में लाने के उद्देश्य है जो उसे प्रेम करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

16. तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करो। यह सब कुछ मनुष्य में कार्य करने के लिए किया गया है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर, जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार दुःख क्यों उठाए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे। चूंकि तुम नहीं जानते कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है या कैसे जीना है, और तुम इस दुराचारी और पापमय स्थान में जीते हो और दुराचारी और अशुद्ध दानव हो, वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होने देना नहीं चाहता; न ही वह चाहता कि तुम्हें शैतान की इच्छानुसार कुचले जाते हुए इस प्रकार के अशुद्ध स्थान में रहने दे, या तुम्हें नरक में गिर जाने दे। वह मात्र तुम्हारे इस समूह को प्राप्त करना और तुम सब को पूर्णतः बचाना चाहता है। यही तुम में जीत लिए जाने के कार्य को करने का मुख्य उद्देश्य है—यह मात्र उद्धार के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से उद्धृत

17. भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है; यदि नहीं, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित रूप से नहीं आता। अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, तुम लोगों पर जो पड़ता है वह कुछ वचन ही है जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होता है, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, तुम लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना, या तुम लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

18. जो कार्य अब किया जा रहा है वह लोगों से शैतान का त्याग करवाने, उनके पुराने पूर्वजों का त्याग करवाने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य मानवता के भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना है और लोगों को जीवन का सार समझने में समर्थ बनाना है। ये बार-बार के न्याय मनुष्य के हदयों को छेद देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्य पर प्रभाव डालता है और उनके हृदयों को घायल करने के आशय से है ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, और परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ तथा इस शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई मानवजाति को जान जाएँ। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होते हैं, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इन अत्यधिक भ्रष्ट और गहराई से धोखा देने वाले लोगों की आत्माओं को जगाना इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य है। मनुष्य की कोई आत्मा नहीं है, अर्थात्, उसकी आत्मा बहुत समय पहले मर गई है और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि एक परमेश्वर है और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः किस प्रकार से जानने में समर्थ हो सकता है कि वह पृथ्वी पर इस दुष्ट नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जानने में समर्थ हो सकेगा कि उसका यह सड़ा हुआ शव, शैतान की भ्रष्टता के माध्यम से, मृत्यु के अधोलोक में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकेगा कि पृथ्वी पर प्रत्येक चीज़ मानवजाति के द्वारा काफी समय पहले ही सुधार किए जाने से परे तक बर्बाद कर दी गई है? और वह संभवतः कैसे जान सकेगा कि आज सृष्टा पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट लोगों के एक समूह को ढूँढ़ रहा है जिसे वह बचा सकता है? मनुष्य के द्वारा हर संभव शुद्धिकरण और न्याय का अनुभव करने के बाद भी, उसकी सुस्त चेतना नाममात्र को ही उत्तेजित होती है और लगभग पूरी तरह से उदासीन रहती है। मानवता इतनी पतित है! यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, किन्तु यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा है। यदि इस तरह से मनुष्यों का न्याय ना हो, तो कोई भी परिणाम नहीं निकलेगा और मनुष्य को दुर्भाग्य की खाई से बचाना नितान्त असम्भव हो जाएगा। यदि यह कार्य न हो, तो लोगों का अधोलोक से बाहर निकलना बहुत ही कठिन हो जाएगा क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान के द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। तुम लोगों को बचाने के लिए, जो कि पतन की गहराईयों में डूब चुके हो, तुम लोगों को सख़्ती से पुकारने, तुम्हारा सख़्ती से न्याय करने की आवश्यकता है, और केवल तभी तुम लोगों के बर्फ जैसे ठंडे हृदयों को जगाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है" से उद्धृत

19. यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर को दंड देने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इसने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य बनाने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है। इस कार्य के लिए उठाया गया प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के अनुसार है, और तुम सब पर कोई भी असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यद्यपि तुम अभी इसे स्पष्ट रीति से देखने में अयोग्य हो, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हूँ, यद्यपि तुम विचार करते रहते हो कि मैं प्रतिदिन तुम्हें ताड़ना देता और तुम्हारा न्याय करता और प्रतिदिन तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुम से घृणा करता हूँ, और यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो वह ताड़ना और न्याय है, वास्तव में तो वह सब तुम्हारे लिए प्रेम है और तुम्हारे लिए एक बड़ी सुरक्षा भी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से उद्धृत

20. तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाने का, मनुष्यों को पूरा करने और मनुष्यों को जीतने काकेवल यह परिणाम हुआ है कि तलवारें और उनके देह के लिए मार-काट, और साथ आई हैं अंतहीन पीड़ा, आग की जलन, निर्दयी न्याय, ताड़ना और अभिशाप, साथ ही असीम परीक्षण भी। ऐसी है अन्दर की कहानी और सच्चाई मानव के प्रबंधन के कार्य की। फिर भी, इन सब बातों का उद्देश्य मनुष्य के देह के विरोध में है, और शत्रुता के भालों की सभी नोकें निर्दयता से मनुष्य के देह के प्रति निर्देशित हैं (क्योंकि मनुष्य मूल रूप से निर्दोष था)। ये सब उसकी महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए हैं। इसका कारण यह है कि उसका कार्य पूरी तरह से केवल मानव जाति के लिए ही नहीं है, बल्कि यह पूरी योजना के लिए है और मानव जाति को बनाते समय उसकी जो मूल इच्छा थी, उसे पूरा करने के लिए है। इसलिए, शायद नब्बे प्रतिशत लोग जिन्हें अनुभव करते हैं, वे हैं पीड़ाएँ और अग्नि-परीक्षाएँ, लेकिन वो मीठे और खुशहाल दिन बहुत कम या बिलकुल नहीं हैं जिसके लिए मनुष्य के देह तड़पते हैं, और परमेश्वर के साथ खूबसूरत शामों को बिताकर उनके खुशहाल पलों का देह में आनंद लेने के लिए वे और भी अधिक असमर्थ हैं। देह भ्रष्ट है, इसलिए मनुष्य का देह जो देखता है या जिसका भोग करता है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं जो मनुष्य को पसंद नहीं है, और यह ऐसा है मानो इसमें साधारण विवेक-बुद्धि की कमी हो। इसका कारण यह है कि वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करेगा जो मनुष्य को प्रिय नहीं है, जो मनुष्य के अपराधों को बर्दाश्त नहीं करता है, और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपने स्वभाव को पूरी तरह प्रकाशित करता है चाहे जिस किसी माध्यम की आवश्यकता पड़े, इस तरह शैतान के साथ उसके छह हजार वर्षों के युद्ध के कार्य को समाप्त करते हुए—वह कार्य जो समग्र मानव-जाति की मुक्ति और पुराने शैतान के विनाश का है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य" से उद्धृत

21. जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान—अर्थात्, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—अडिग रहने में समर्थ हैं, ये वे लोग होंगे जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; इसलिए, जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, वे सब शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और केवल परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद ही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग ही जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जो शेष बचेंगे वे शुद्ध किए जाएँगे, और जब वे मानवजाति के उच्चतर राज्य में प्रवेश करेंगे तो एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था, और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवाएँ भी दी थीं, परंतु जब अंतिम दिन आएगा, तो उन्हें तब भी उनकी अपनी दुष्टता, अवज्ञा व छुटकारा न पाने की योग्यता के कारण दूर और नष्ट कर दिया जाएगा। भविष्य के संसार में उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा, और भविष्य की मानवजाति के बीच उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

ठोस रंग

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

स्क्रॉल की दिशा

II अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

गति

II अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य पर उत्कृष्ट वचन