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XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

(I) परमेश्वर में विश्वास पर वचन

1. परमेश्वर में सच्चा विश्वास करने का अर्थ सिर्फ़ बचाए जाने के लिए उस पर भरोसा करना नहीं है और इसका अर्थ एक अच्छा व्यक्ति होना तो उससे भी कम है। इसका अर्थ मनुष्य के समान आचरण रखने के लिए परमेश्वर में विश्वास करना भी नहीं है। दरअसल, लोगों को अपने विश्वास करने को सिर्फ इस विश्वास के रूप में नहीं देखना चाहिए कि एक परमेश्वर है, और उसके बाद कुछ और नहीं; ऐसा नहीं है कि तुम को केवल यह विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वरसत्य, मार्ग और जीवन है, और इसके अलावा कुछ भी नहीं। न ही ऐसा है कि तुम परमेश्वर को केवल स्वीकार करो, और बस यह विश्वास कर लो कि परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है, कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, कि परमेश्वर ने दुनिया में सभी चीजें बनाई हैं, कि परमेश्वर अद्वितीय है और परमेश्वर ही सर्वोच्च है। यह केवल इतना नहीं है कि तुम इन तथ्यों पर विश्वास करो; परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम्हें—तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व और तुम्हारे पूरे दिल के साथ—परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए, अर्थात तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए ताकि परमेश्वर तुम्हें अपनी सेवा में इस्तेमाल कर सके, और यह कि तुम्हें उसके लिए सेवा करने में खुशी होनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर की खातिर कुछ भी करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि केवल परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए लोगों को ही उस में विश्वास करना चाहिए। असल में, सभी मानव जाति को परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए, उसकी ओर ध्यान देना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि मानव जाति परमेश्वर द्वारा ही बनायी गई थी। यह अब सार के मुद्दे को छूता है। यदि तुम हमेशा कहते हो, "क्या हम अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं? क्या हम बचाए जाने की खातिर परमेश्वर में विश्वास नहीं करते?" जैसे कि मानो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास करना किसी सतही मामले की तरह हो, केवल कुछ हासिल करने के लिए हो, तो परमेश्वर में विश्वास करने का तुम्हारा दृष्टिकोण यह नहीं होना चाहिए।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है" से उद्धृत

2. "परमेश्वर पर विश्वास" का अर्थ, यह विश्वास करना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर पर विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे बढ़कर यह बात है कि परमेश्वर है, यह मानना परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक प्रभाव के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर पर सच्चे विश्वास का अर्थ इस विश्वास के आधार पर परमेश्वर के वचनों और कामों का अनुभव करना है कि परमेश्वर सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखता है। इस तरह से तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त हो जाओगे, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करोगे और परमेश्वर को जान जाओगे। केवल इस प्रकार की यात्रा के माध्यम से ही तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास करने वाला कहा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

3. आज, परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट करने के लिए: यह परमेश्वर में विश्वास है जिसकी वजह से तुम परमरेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हो, उससे प्रेम कर सकते हो, और उस कर्तव्य को कर सकते हो जो एक परमेश्वर के प्राणी द्वारा की जानी चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर के प्रेम का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, या यह ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर कितने आदर के योग्य हैं, कैसे अपने सृजन किए गए प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—यह वह न्यूनतम है जो तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास में धारण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह के जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है, प्राकृतिकता के जीवन से परमेश्वर के अस्तित्व के जीवन में बदलना है, यह शैतान के अधिकार क्षेत्र से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीवन जीना है, यह देह की आज्ञाकारिता को नहीं बल्कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ होना है, यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने की अनुमति देना है, परमेश्वर को तुम्हें पूर्ण बनाने और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने की अनुमति देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इस वजह से है ताकि परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण कर सको, और परमेश्वर की योजना को संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेतों और चमत्कारों को देखने के उद्देश्य से नहीं होना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की तलाश के लिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने, और पतरस के समान, मृत्यु तक परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही वह सब है जो मुख्यतः प्राप्त करने के लिए है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, केवल उसके बाद ही तुम उसका आज्ञा पालन कर सकते हो। केवल यदि तुम परमेश्वर को जानते हो तभी तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और इस लक्ष्य को प्राप्त करना ही वह एकमात्र लक्ष्य है जो परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में मनुष्य को रखना चाहिए। यदि, परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में, तुम सदैव संकेतों और चमत्कारों को देखने का प्रयास करते रहते हो, तब परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप में परमेश्वर के वचन को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। केवल उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाना और उन्हें अपने स्वयं के भीतर पूरा करना, परमेश्वर के लक्ष्य की प्राप्ति है। परमेश्वर पर विश्वास करने में, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने की, और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम बिना कोई शिकायत किए परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो, परमेश्वर की अभिलाषाओं का विचार कर सकते हो, पतरस के समान हैसियत प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली को धारण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुमने परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर ली है, और यह इस बात की द्योतक होगी कि तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए गए हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से उद्धृत

4. क्योंकि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन पर अमल नहीं कर सकते या वास्तविकता उत्पन्न नहीं कर सकते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना, परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह, तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में रहो तो क्या यह विश्वास माना जायेगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास रखना वास्तव में क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, सम्प्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर दोनों तरफ परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार इन्सान को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "राज्य का युग वचन का युग है" से उद्धृत

5. आज, तुम्हें सही रास्ते पर नियत अवश्य होना चाहिए क्योंकि तुम व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो। परमेश्वर में विश्वास करके, तुम्हें सिर्फ़ आशीषों को ही नहीं खोजना चाहिए, बल्कि परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रबुद्धता और तुम्हारी स्वयं की खोज के माध्यम से, तुम उसके वचन को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में एक सच्ची समझ को विकसित कर सकते हो, और परमेश्वर के लिए एक सच्चा प्रेम रख सकते हो जो तुम्हारे हृदय से आता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम सबसे अधिक सच्चा है, इतना कि उसके लिए तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट नहीं कर सकता है या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सकता है। तब तुम परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर से संबंध रखते हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और तब दूसरा कोई तुम पर कब्जा नहीं कर सकता है। तुम्हारे अनुभव, तुमने जो मूल्य चुकाया है, और परमेश्वर के कार्य के कारण, तुम परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम को विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दिए जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीते हो। सिर्फ़ जब तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर मुक्त हो जाते हो तभी तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया, समझे जा सकते हो। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य को अवश्य खोजना चाहिए। यह तुम लोगों में से हर एक का कर्तव्य है। किसी को भी चीज़ें जैसी हैं उनसे आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दोहरे मन वाले नहीं हो सकते या इसे हल्के में नहीं मान सकते हो। तुमको हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके वास्ते सब कुछ करना चाहिए। और जब तुम कुछ बोलते या करते हो, तो तुमको परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" से उद्धृत

6. अब, सभी लोगों ने देख लिया है कि जो कोई परमेश्वर की सेवा करता है, उसे न केवल यह जान लेना चाहिए कि परमेश्वर के वास्ते कैसे कष्ट सहना है, बल्कि उससे भी ज्यादा, उसे यह समझ लेना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करना, उसे प्यार करने की तलाश करने के प्रयोजन से है। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उपयोग, सिर्फ तुम्हें शुद्ध करना या तुम्हें पीड़ित करवाना नहीं है, बल्कि उसके कार्यों को तुम्हें ज्ञात करवाना है, मानव जीवन के सच्चे महत्व को ज्ञात करवाना है, और विशेष रूप से तुम्हें यह ज्ञात करवाना है कि परमेश्वर की सेवा करना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना, अनुग्रह का आनन्द लेने के बारे में नहीं है बल्कि उसके प्रति तुम्हारे प्रेम के कारण कष्ट सहने के बारे में अधिक है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना का भी आनन्द अवश्य लेना चाहिए—तुम्हें इन सभी चीज़ों का अनुभव अवश्य करना चाहिए। तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता को अपने अंदर अनुभव कर सकते हो, और तुम अपने साथ परमेश्वर को व्यवहार करते हुए तथा उसके न्याय का अनुभव भी कर सकते हो। इस प्रकार, तुम सभी पहलुओं का अनुभव करते हो। परमेश्वर ने तुम पर न्याय का काम किया है, और उसने तुम पर ताड़ना का काम भी किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया है, लेकिन इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम भागना चाहते हो, तो परमेश्वर का हाथ तब भी तुम्हें झटके से खींचता है। यह सब तुम्हें यह ज्ञात कराने के लिए है कि मनुष्य के बारे में सब कुछ परमेश्वर की दया पर निर्भर है। तुम सोच सकते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना कष्ट सहने के बारे में है, या उसके लिए कई चीजें करना है, या तुम्हारी देह की शान्ति के लिए है, या इसलिए है कि तुम्हारे साथ सब कुछ ठीक रहे, सब कुछ आरामदायक रहे—परन्तु इनमें से कोई भी ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसे परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों में होना चाहिए। यदि तुम ऐसा विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर की धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, और उसकी अद्भुतता और अगाधता इन सभी बातों को मनुष्यों को अवश्य समझना चाहिए। इस समझ का उपयोग व्यक्तिगत अनुरोधों, और साथ ही व्यक्तिगत आशाओँ और तुम्हारे हृदय की अवधारणाओं से छुटकारा पाने के लिए करो। केवल इन इन्हें दूर करके ही तुम परमेश्वर के द्वारा माँग की गई शर्तों को पूरा कर सकते हो। केवल इसी के माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना उसे संतुष्ट करने के वास्ते और उस स्वभाव को जीने के लिए है जो वह अपेक्षा करता है, ताकि इन अयोग्य लोगों के समूह के माध्यम से परमेश्वर के कार्य और उसकी महिमा को प्रदर्शित किया जा सके। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए और उन लक्ष्यों के लिए जिन्हें तुम्हें खोजना चाहिए, यही सही दृष्टिकोण है। परमेश्वर पर विश्वास करने का तुम्हारा सही दृष्टिकोण होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, और सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यवहारिक कर्मों को देखने, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उनके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यवहारिक कार्य को देखने में सक्षम होने की आवश्यकता है। अपने वास्तविक अनुभवों के द्वारा, लोग बस इस बात की सराहना कर सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है, उनके प्रति उसकी क्या इच्छा है। यह सब उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करने के लिए है। अपने भीतर की अशुद्धता और अधार्मिकता से मुक्ति पाओ, अपने गलत इरादों को उतार फेंको, और तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास उत्पन्न कर सकते हो। केवल सच्चा विश्वास रख कर ही तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर सकते हो। तुम केवल अपने विश्वास की बुनियाद पर ही परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर सकते हो। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना उसके प्रति प्रेम को प्राप्त कर सकते हैं? चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम इसके बारे में नासमझ नहीं हो सकते हो। कुछ लोगों में जोश भर जाता है जैसे ही वे देखते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना उनके लिए आशीषें लाएगा, परन्तु सम्पूर्ण ऊर्जा को खो देते है जैसे ही वे देखते हैं कि उन्हें शुद्धिकरणों को सहना पड़ेगा। क्या यह परमेश्वर पर विश्वास करना है? अंतत:, अपने विश्वास में परमेश्वर के सामने तुम्हें पूर्ण और अतिशय आज्ञाकारिता हासिल करनी होगी। तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परन्तु फिर भी उससे माँगें करते हो, तुम्हारी कई धार्मिक अवधारणाएँ हैं जिन्हें तुम छोड़ नहीं सकते हो, तुम्हारे व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें तुम जाने नहीं दे सकते हो, और तब भी देह में आशीषों को खोजते हो और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी देह को बचाए, तुम्हारी आत्मा की रक्षा करे—ये सब गलत दृष्टिकोण वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि धार्मिक विश्वास वाले लोगों का परमेश्वर पर विश्वास होता है, तब भी वे स्वभाव-संबंधी बदलाव का प्रयास नहीं करते हैं, परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते हैं, और केवल अपने देह के हितों की ही तलाश करते हैं। तुम में से कई लोगों के विश्वास हैं जो धार्मिक आस्थाओं की श्रेणी से सम्बन्धित हैं। यह परमेश्वर पर सच्चा विश्वास नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों पास उसके लिए पीड़ा सहने वाला हृदय और स्वयं को त्याग देने की इच्छा होनी चाहिए। जब तक वे इन दो शर्तों को पूरा नहीं करते हैं तब तक यह परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं माना जाता है, और वे स्वभाव संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। केवल वे लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर के ज्ञान की तलाश करते हैं, और जीवन की खोज करते हैं ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से उद्धृत

7. परमेश्वर में विश्वास करने का मनुष्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका विश्वास सिर्फ़ वचनों में है, और परमेश्वर उसके व्यावहारिक जीवन में कहीं भी विद्यमान नहीं है। वास्तव में, सभी मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर के लिए कई प्रार्थनाएँ मनुष्य के मुख से तो आती हैं, किन्तु परमेश्वर के लिए उसके हृदय में बहुत थोड़ी सी ही जगह है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और अपने आप को परीक्षाओं में जान ले। अन्यथा, सभी मनुष्य प्रधान दूत के वंशज बन जाएँगे, और निरंतर भ्रष्ट बनते चले जाएँगे। परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के दौरान, कई व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ दिए जाते हैं, जैसे-जैसे वह लगातार परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किया जाता है। अन्यथा, कोई भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है, और मनुष्य में उस कार्य को करने का परमेश्वर के पास कोई रास्ता नहीं है जो उसे करना चाहिए। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। सिर्फ़ इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य में अपना जीवन कार्य कर सकता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कह सकता है। जैसे कि परमेश्वर इसे देखता है, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम सिर्फ़ अपने स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो परन्तु सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते हो, तब भी यह प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" से उद्धृत

8. तू परमेश्वर में विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, और इस प्रकार तुझे अपने ह्रदय में परमेश्वर से प्रेम करना होगा। तुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर फेंकना होगा, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना होगा, और परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना होगा। चूँकि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, तुझे हर एक चीज़ को उसके लिए अर्पण करना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या मांग नहीं करनी चाहिए, और तुझे परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति को हासिल करना चाहिए। चूँकि तुझे सृजा गया था, तो तुझे उस प्रभु की आज्ञा का पालन करना चाहिए जिसने तुझे सृजा था, क्योंकि तू स्वाभाविक रूप से स्वयं के ऊपर प्रभुता नहीं रखता है, और तेरे पास अपनी नियति को नियन्त्रित करने की योग्यता नहीं है। चूँकि तू ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है, तो तुझे पवित्रता एवं बदलाव की खोज करनी चाहिए। चूँकि तू परमेश्वर का एक प्राणी है, तो तुझे अपने कर्तव्य से चिपके रहना चाहिए, और अपने स्थान को बनाए रखना चाहिए, और तुझे अपने कर्तव्य की हद को पार नहीं करना होगा। यह तुझे विवश करने के लिए नहीं है, या सिद्धान्तों के माध्यम से तुझे दबाने के लिए नहीं है, परन्तु ऐसा पथ है जिसके माध्यम से तू अपने कर्तव्य को निभा सकता है, और जिसे हासिल किया जा सकता है—और हासिल किया जाना चाहिए—उन सभी लोगों के द्वारा जो धार्मिकता को अंजाम देते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

9. परमेश्वर में किसी मनुष्य के विश्वास की अत्यंत मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसके पास एक सच्चा हृदय हो, और वह स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर दे, एवं सचमुच में आज्ञा का पालन करे। जो चीज़ किसी मनुष्य के लिए सबसे अधिक कठिन है वह है, सच्चे विश्वास के बदले में अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह सारा सत्य अर्जित कर सकता है, और परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकता है। इसे ही उन लोगों के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है जो असफल होते हैं, और उनके द्वारा इसे अर्जित करना और भी ज़्यादा कठिन है जो मसीह को नहीं ढूंढ सकते हैं। क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूरी रीति से समर्पित करने में अच्छा नहीं है; क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि मनुष्य ने सत्य को देखा तो है किन्तु उसे नज़रंदाज़ करता है और अपने स्वयं के पथ पर चलता है, क्योंकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ का अनुसरण करने की कोशिश करता है जो असफल हो चुके हैं, क्योंकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग की अवहेलना करता है, इस प्रकार, मनुष्य हमेशा असफल हो जाता है, उसे हमेशा शैतान के छल द्वारा ठग लिया जाता है, और वह स्वयं के जाल में फंस जाता है। क्योंकि मनुष्य मसीह को नहीं जानता है, क्योंकि मनुष्य सत्य को समझने एवं अनुभव करने में निपुण नहीं है, क्योंकि मनुष्य पौलुस का अति आराधक है और स्वर्ग का अत्यंत लोभी है, क्योंकि मनुष्य हमेशा मांग करता है कि मसीह उसकी आज्ञा माने और परमेश्वर को आदेश देता रहता है, इस प्रकार ऐसे बड़े शख्स और ऐसे लोग जिन्होंने संसार के उतार-चढ़ाव का अनुभव किया है वे अभी भी नश्वर हैं, और परमेश्वर की ताड़ना के मध्य अब भी मरते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे एक दुखद मौत मरते है, और उनका परिणाम—उनकी मृत्यु—औचित्य के बगैर नहीं होती है। क्या उनकी असफलता स्वर्ग की व्यवस्था के लिए कहीं अधिक असहनीय नहीं होती है? सत्य मानव के संसार से आता है, फिर भी वह सत्य जो मनुष्य के मध्य है उसे मसीह के द्वारा पहुंचाया गया है। इसका उद्गम मसीह से होता है, अर्थात्, स्वयं परमेश्वर से, और इसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है। फिर भी मसीह सिर्फ सत्य ही प्रदान करता है; वह यह निर्णय लेने के लिए नहीं आता है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण में सफल होगा या नहीं। इसका अर्थ है कि वास्तव में सत्य में सफलता या असफलता मनुष्य के अनुसरण पर निर्भर करती है। उस सत्य में मनुष्य की सफलता या असफलता का मसीह के साथ कभी कोई वास्ता नहीं होता है, बल्कि इसके बजाय निश्चय ही इसका निर्धारण उसके अनुसरण के द्वारा होता है। मनुष्य की मंज़िल एवं उसकी सफलता या असफलता को परमेश्वर के सिर पर नहीं मढ़ा जा सकता, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उस कर्तव्य से सम्बन्धित है जिसे परमेश्वर के जीवधारियों को निभाना चाहिए। अधिकांश लोगों के पास पौलुस एवं पतरस की खोज एवं नियति का थोड़ा सा ज्ञान ज़रूर होता है, फिर भी लोग पतरस एवं पौलुस के परिणाम से ज़्यादा और कुछ नहीं जानते हैं, और वे पतरस की सफलता के पीछे के रहस्य से, और उन कमियों से अनजान हैं जिसके परिणामस्वरूप पौलुस असफल हुआ। और इस प्रकार, यदि तुम लोग उनके अनुसरण के सार के आर-पार देखने में पूरी तरह से असमर्थ हो, तो तुम लोगों में से अधिकांश का अनुसरण अभी भी असफल होगा, और यदि तुम लोगों में से कुछ ही लोग सफल होंगे, तब भी वे पतरस के बराबर नहीं होंगे। यदि तेरे अनुसरण का पथ सही पथ है, तो तेरे पास सफलता की आशा है; यदि जिस पथ पर तूने सत्य का अनुसरण करते हुए कदम रखा है वह ग़लत पथ है, तो तू सर्वदा के लिए सफलता के अयोग्य होगा, और तू भी पौलुस के समान उसी अन्त को प्राप्त करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

10. सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जाने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन पतरस का जीवन बन सकते थे और सत्य से संबंधित थे, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ" से उद्धृत

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