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X राज्य के युग के संविधान, प्रशासनिक नियमों और धर्मादेशों पर उत्कृष्ट वचन

X राज्य के युग के संविधान, प्रशासनिक नियमों और धर्मादेशों पर उत्कृष्ट वचन

1. जिस कार्य की मैंने योजना बनायी है वह एक पल भी रुके बिना आगे बढ़ता रहता है। राज्य के युग में प्रवेश करके, और तुम लोगों को मेरे लोगों के रूप में मेरे राज्य में ले जा कर, मेरी तुम लोगों से और भी माँगें होगी; अर्थात्, मैं तुम लोगों के सामने उस संविधान को लागू करना आरंभ करूँगा जिससे मैं इस युग पर शासन करूँगा:

चूँकि तुम सभी मेरे लोग कहलाते हो, इसलिए तुम्हें मेरे नाम को महिमा देने में सक्षम होना चाहिए, अर्थात्, परीक्षण के बीच गवाही देनी चाहिए। यदि कोई मुझे धोखा देने की कोशिश करता है और मुझसे सत्य को छुपाता है, या मेरी पीठ पीछे अपकीर्तिकर व्यवहारों में शामिल होता है, तो उसे यथोचित कार्यवाही का इन्तजार करने के लिए, मेरे घर से बिना किसी अपवाद के, खदेड़ दिया जाएगा, बाहर निकाल दिया जाएगा। जो लोग अतीत में मेरे प्रति अविश्वसनीय और अवज्ञाकारी रहे हैं, और आज पुनः खुलेआम मेरी आलोचना करने के लिए उठे हैं, उन्हें भी मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा। जो मेरे लोग हैं उन्हें लगातार मेरी जिम्मेदारियों की चिंता करनी चाहिए और साथ ही मेरे वचनों को जानने की तलाश करनी चाहिए। केवल इस तरह के लोगों को ही मैं प्रबुद्ध करूँगा, और वे निश्चय ही, कभी भी ताड़ना को प्राप्त न करते हुए, मेरे मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन रहेंगे। जो, मेरी ज़िम्‍मेदारियों की चिंता करने में असफल रहते हुए, अपने खुद के भविष्य को बनाने की योजना पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, अर्थात, वे जो अपने कार्यों के द्वारा मेरे हृदय को संतुष्ट करने का लक्ष्य नहीं रखते हैं बल्कि इसके बजाय भौतिक वस्तुओं की भीख माँगते हैं, मैं इन भिखारी-जैसे प्राणियों का उपयोग करने से पूरी तरह इनकार करता हूँ, क्योंकि वे जब से पैदा हुए हैं, वे कुछ नहीं जानते कि मेरी जिम्मेदारियों की चिंता करने का क्या अर्थ है। वे विकृत समझ वाले लोग हैं; ऐसे लोग मस्तिष्क के "कुपोषण" से पीड़ित हैं, और उन्हें कुछ "पोषण" के लिए घर जाने की आवश्यकता है। इस प्रकार के लोगों का मेरे पास कोई उपयोग नहीं है। मेरे लोगों के बीच, प्रत्येक के लिए मुझे जानना अंत तक पूरे किए जाने वाले अनिवार्य कर्तव्य के रूप में मानना आवश्यक होगा, जैसे कि भोजन करना, पहनना, और सोना, कुछ ऐसा जिसे कोई एक पल के लिए भी कभी नहीं भूलता है, ताकि मुझे जानना अंत में एक ऐसा परिचित कौशल बन जाए जैसे कि भोजन करना, कुछ ऐसा जिसे तुम अभ्यस्त हाथ से सहज ही करते हो। जहाँ तक उन वचनों की बात है जो मैं बोलता हूँ, हर एक को अवश्य अत्यधिक निश्चितता और पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ग्रहण करना चाहिए; इसमें कोई भी बेपरवाही भरे आधे-अधूरे-उपाय़ नहीं हो सकते हैं। जो कोई भी मेरे वचनों पर ध्यान नहीं देता है उसे सीधे मेरा विरोध करने वाला माना जाएगा; जो कोई भी मेरे वचनों को नहीं खाता, या उन्हें जानने की तलाश नहीं करता है, उसे मुझ पर ध्यान नहीं देने वाला माना जाएगा, और उसे मेरे घर के द्वार से सीधे बाहर कर दिया जाएगा। क्योंकि, जैसा कि मैंने अतीत में कहा है, कि मैं बहुत अधिक की नहीं, बल्कि थोड़े से चुने हुए लोगों की ही अभिलाषा करता हूँ। सौ लोगों में से, यदि कोई एक भी मेरे वचनों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम है, तो मैं इस एक को प्रबुद्ध और रोशन करने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए अन्य सभी को स्वेछा से ठुकरा दूँगा। इससे तुम देख सकते हो, कि यह अनिवार्य रूप से सत्य नहीं है कि बड़ी संख्या ही मुझे व्यक्त कर सकती है, मुझे जी सकती है। मैं जो चाहता हूँ वह है गेहूँ (भले ही दाने पूरे भरे न हों) न कि जंगली दाने (भले ही दाने प्रशंसनीय रूप से भरे हुए हों)। उन लोगों के लिए जो तलाश करने की परवाह नहीं करते हैं बल्कि इसके बजाय एक शिथिल तरीके से व्यवहार करते हैं, उन्हें स्‍वेच्‍छा से चले जाना चाहिए; मैं उन्हें अब और देखना नहीं चाहता हूँ, अन्‍यथा वे मेरे नाम को अपमानित करते रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 5" से उद्धृत

2. अब मैं अपने राज्‍य की प्रशासकीय आज्ञाओं की घोषणा करता हूं: सभी बातें मेरे न्‍याय के अंतर्गत हैं, सभी बातें मेरी धार्मिकता के अंतर्गत हैं, सभी बातें मेरे प्रताप के अंतर्गत हैं, और सभी के प्रति धार्मिकता अमल में लाई जाती है। जो यह कहते हैं कि वे मुझमें विश्‍वास रखते हैं परंतु अपने हृदयों में मेरे प्रतिकूल होते हैं, या जिनके हृदयों ने मेरा त्‍याग कर दिया है, वे निकाल बाहर किए जाएंगे, परंतु यह मेरे यथोचित समय पर होगा। जो मेरे विषय में व्‍यंग्‍यात्‍मक ढंग से बात करते हैं, परंतु इस तरह कि वह लोगों के ध्‍यान में न आए, वे तुरंत मृत्‍यु को प्राप्‍त होंगे (वे आत्‍मा, देह और जीवात्‍मा में मर जाएंगे)। ऐसे सभी जो मेरे प्रियजनों पर अत्‍याचार करते हैं अथवा उनसे रूखा व्यवहार करते हैं, मेरा कोप उनका तत्‍काल न्‍याय करेगा। अर्थात् जिनके हृदय मेरे प्रियजनों के प्रति ईर्ष्‍यालु हैं और जो यह सोचते हैं कि मैं धार्मिक नहीं हूं वे उन्‍हें दे दिए जाएंगे जिनका न्‍याय करना मुझे पसंद है। (उन्हें भी जिनमें बुद्धिमत्‍ता का अभाव है) ऐसे सभी जो सभ्‍य, सरल और सच्‍चे हैं और जो एकचित्‍त होकर मेरे प्रति खरे हैं, वे सभी मेरे राज्‍य में रहेंगे। जो प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे, यानी ऐसे सच्‍चे लोग जिनमें बुद्धिमत्‍ता और गहरी समझ का अभाव है, वे मेरे राज्‍य में सामर्थ्‍य रखेंगे। मगर वे भी ऐसे व्‍यवहार और टूटन से गुज़रे हैं। वे प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे, यह परम तथ्‍य नहीं है, बल्कि इन बातों से मैं सभी को अपनी सर्वशक्तिमत्‍ता और अपनी बुद्धिमत्‍ता दिखाऊंगा। उन सभी को जो मुझ पर संदेह करते हैं, मैं निकाल बाहर करूंगा, मैं उनमें से किसी एक को भी नहीं चाहता ( जो ऐसे समय में भी मुझ पर संदेह करते हैं उनसे मैं घृणा करता हूं)। संपूर्ण कायनात में जो कृत्‍य मैं करता हूं, मैं सच्‍चे लोगों को अपने कार्य की अद्भुतता प्रदर्शित करूंगा, इस प्रकार उनकी बुद्धिमत्‍ता, गहरी समझ और उत्‍तम बुद्धि विकसित करूंगा और अपने अद्भुत कर्मों के द्वारा मैं छली लोगों को एक ही पल में विनष्‍ट कर दूंगा। सभी पहिलौठे पुत्र जिन्‍हें मेरा नाम पहले स्‍वीकार करना था (यानी वे पवित्र और निष्‍कलंक, सच्‍चे लोग) वे ही सर्वप्रथम राज्‍य में प्रवेश करेंगे और मेरे साथ सभी राष्‍ट्रों और लोगों पर शासन करेंगे, राजाओं के रूप में राज्‍य में शासन करेंगे साथ मिलकर सभी राष्‍ट्रों और सभी लोगों का न्‍याय करेंगे (मतलब राज्‍य के सभी प‍हिलौठे पुत्र, और कोई नहीं)। सभी राष्‍ट्र और सभी लोग के मध्य जिनका न्‍याय हो चुका है और जो पश्‍चाताप कर चुके हैं वे मेरे राज्‍य में प्रवेश करेंगे और मेरे लोग बन जाएंगे, और जो हठीले तथा जिन्‍हें पछतावा नहीं है, वे अथाह कुण्‍ड में फेंक दिए जाएंगे (चिरकाल के लिए विनष्‍ट होने हेतु)। राज्‍य का न्‍याय अंतिम बार होगा और यह दुनिया का मेरी ओर से पूर्ण शुद्धिकरण होगा। उसके पश्‍चात कोई भी अन्‍याय, कोई भी व्‍यथा, कोई भी अश्रु, कोई भी आहें और नहीं रहेंगी और इसके अतिरिक्‍त कोई दुनिया भी न रहेगी। सभी मसीह के प्रत्‍यक्षीकरण होंगे, सभी मसीह का राज्‍य होंगे। ऐसी महिमा होगी! ऐसी महिमा होगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 79" से उद्धृत

3. अब मैं तुम लोगों के लिए अपने प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करता हूँ (घोषणा के दिन से प्रभावी होंगे, भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ देंगे):

मैं अपने वादों को पूरा करता हूँ, और सब कुछ मेरे हाथों में है: जो कोई भी संदेह करेगा, वह निश्चित रूप से मारा जाएगा। किसी भी लिहाज के लिए कोई जगह नहीं है। वे, मेरे हृदय से नफ़रत को हटाते हुए, तुरंत पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे। (इससे यह पुष्टि होती है कि जो कोई भी मारा जाता है, वह अवश्य मेरे राज्य के सदस्यों में से एक नहीं होगा, और शैतान का वंशज होगा)।

ज्येष्ठ पुत्रों के रूप में तुम लोगों को अपनी खुद की स्थिति को बनाए रखना चाहिए और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करना चाहिए, और दखलंदाज व्यक्ति नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को मेरी प्रबंधन योजना के लिए खुद को अर्पित कर देना चाहिए, हर जगह जहाँ भी तुम जाओ, तुम्हें मेरी अच्छी गवाही देनी चाहिए और मेरे नाम की महिमा करनी चाहिए। शर्मनाक चीज़ें मत करो, बल्कि मेरे सभी पुत्रों और लोगों के लिए एक उदाहरण बनो। एक पल के लिए भी असंयमित मत हो: सभी के सामने तुम्हें, कभी ख़ुशामदी न बनते हुए, बल्कि सिर उठाकर कदम बढ़ाते हुए, अवश्य हमेशा मेरे ज्येष्ठ पुत्रों की पहचान के साथ दिखाई देना चाहिए। मैं तुम लोगों से मेरे नाम की महिमा करने के लिए कह रहा हूँ, मेरे नाम को अपमानित करने के लिए नहीं। जो लोग ज्येष्ठ पुत्र हैं, उनमें से प्रत्येक का अपना कार्य है, और वे सब कुछ नहीं कर सकते हैं। यही वह ज़िम्मेदारी है जो मैंने तुम लोगों को दी है, और जिससे जी नहीं चुराया जाए, और तुम लोगों को स्वयं को अवश्य अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी शक्ति से उस काम को पूरा करने के लिए समर्पित करना चाहिए, जो मैंने तुम्हें सौंपा है।

इसके बाद, समस्त ब्रह्मांडीय दुनिया में, मेरे सभी पुत्रों और मेरे सभी लोगों की चरवाही करने का कर्तव्य मैंने अपने ज्येष्ठ पुत्रों को सौंपा दिया है, और जो कोई भी अपने पूरे हृदय और पूरे मन से उसे पूरा नहीं कर सकता है, मैं उसे ताड़ना दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है—मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को भी नहीं छोड़ूँगा या उनके साथ हल्के में नहीं चलूँगा।

यदि मेरे पुत्रों या मेरे लोगों में से कोई ऐसा व्यक्ति है जो मेरे ज्येष्ठ पुत्रों में से किसी एक का भी उपहास और अपमान करता है, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा क्योंकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र स्वयं मेरा प्रतिनिधित्व करते हैं, और कोई व्यक्ति उनके साथ जो करता है, वह मेरे साथ भी करता है। यह मेरे प्रशासनिक आदेशों में से सबसे गंभीर आदेश है। मेरे पुत्रों और मेरे लोगों में से जो कोई भी इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध, मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को उनकी इच्छाओं के अनुसार मेरी धार्मिकता को प्रशासित करने देता हूँ।

मैं धीरे-धीरे उस व्यक्ति का परित्याग कर देता हूँ जो छिछोरेपन से मेरा सम्मान करता है; केवल मेरे भोजन, कपड़े और नींद पर ध्यान केंद्रित करना; केवल मेरे बाह्य मामलों में भाग लेना और मेरी ज़िम्मेदारी पर विचार नहीं करना; और अपने स्वयं के कार्य को सही ढंग से पूरा करने पर ध्यान नहीं देना। यह उन सभी पर निर्देशित है जो सुन सकते हैं।

जो कोई भी मेरे लिए सेवा करने का काम समाप्त कर लेता है, उसे आज्ञाकारी ढंग से वापस हट जाना चाहिए और कोई शोर नहीं मचाना चाहिए। सावधान रह, अन्यथा मैं तुझसे निपटूँगा। (यह अतिरिक्त है।)

अब से मेरे ज्येष्ठ पुत्र लौह-दण्ड को उठाएँगे और सभी राष्ट्रों और लोगों पर शासन करने के लिए, सभी राष्ट्रों और लोगों की बीच चलने के लिए, और सभी राष्ट्रों और लोगों के बीच मेरे न्याय, मेरी धार्मिकता और मेरे प्रताप को कार्यान्वित करने के लिए, मेरे अधिकार को निष्पादित करना शुरू करेंगे। मेरे पुत्र और मेरे लोग मुझसे डरेंगे, बिना रुके मेरी स्तुति करेंगे, मेरी जयजयकार करेंगे, मेरी महिमा करेंगे क्योंकि मेरी प्रबंधन योजना पूरी हो गई है और मेरे ज्येष्ठ पुत्र मेरे साथ शासन कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 88" से उद्धृत

4. आज मनुष्य के लिए इन बातों का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है: तुम्हें अवश्य परमेश्वर को धोखा नहीं देना चाहिए या परमेश्वर से ऐसा कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है। तुम अपने सामने परमेश्वर के सम्मुख कोई भी गंदी या अहंकारी बात नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिए, अपने भले कार्यों और अच्छे वचनों और अच्छे भाषणों के द्वारा अपनी आँखों के सामने परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे। तुम परमेश्वर के सामने अनादरपूर्वक कर्म नहीं करोगे। तुम उन सारे वचनों का पालन करोगे जो परमेश्वर के मुँह से बोला जाता है और उसके वचनों का प्रतिरोध, विरोध, या उसके वचनों पर विवाद नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों का वह अर्थ नहीं लगाओगे जैसा तुम्हें उचित लगेगा। तुम्हें अपनी जिह्वा के प्रति सतर्क रहना चाहिए ताकि इसे तुम्हें शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं का शिकार होने का कारण बनने से बचा सको। तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट सीमा का उल्लंघन करने से बचने के लिए तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। ऐसा करना तुममें परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से अहंकारी और आडंबरपूर्ण वचनों को कहने का कारण बनेगा, और इसलिए तुम परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाओगे। तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से नहीं दोहराओगे, कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ, और शैतान तुम्हें मूर्ख बनाए। तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्यों का आज्ञापालन करोगे। भले ही तुम उसको न समझ पाओ, किंतु तुम उस पर आलोचनात्मक राय नहीं बनाओगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का उल्लंघन नहीं करेगा। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ भी नहीं कर सकते हो। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते हो—ऐसा करना मार्ग से भटकना है। परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर कोई भी व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है; तुम्हारे वचनों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में, तुम मनुष्य की स्थिति में स्थिर हो। इसका पालन किया जाना है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, यह किसी के द्वारा भी परिवर्तनीय नहीं है, और ऐसा करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "नये युग की आज्ञाएँ" से उद्धृत

5.

(परमेश्वर के वचन के चुनिंदा अवतरण)

दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए

1) मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए।

2) तुम्हें ऐसा कुछ भी करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक हो, और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए हानिकारक हो। तुम्हें परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही, और परमेश्वर के कार्य का समर्थन करना चाहिए।

3) परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ, और समस्त सम्पत्ति ऐसी भेंटें हैं जो मनुष्य के द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटो का आनन्द याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता है, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनन्द के लिए हैं, परमेश्वर इन भेंटों को केवल याजकों के साथ ही साझा करता है, और उनके किसी भी अंश का आनन्द उठाने के लिए अन्य कोई भी योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और भौतिक चीजों सहित, जिनका आनन्द लिया जा सकता है) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं। इसलिए, इन चीज़ों का मनुष्य के द्वारा आनन्द नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनन्द उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि, यहूदा एक ग़द्दार होने के अतिरिक्त, जो कुछ रुपयों की थैली में डाला जाता था, उससे स्वयं की भी सहायता करता था।

4) मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और इसके अतिरिक्त, उसमें भावनाएँ हैं। अपने आप में, परमेश्वर की सेवा करते समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को एक साथ मिलकर काम करना निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते हुए पाए जाते हैं, उन्हें, बिना किसी अपवाद के, निष्कासित कर दिया जाएगा—किसी को भी छूट नहीं है।

5) तुम परमेश्वर की आलोचना नहीं करोगे, और न ही परमेश्वर से संबंधित बातों पर यूँ ही विचार-विमर्श करोगे। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा मनुष्य को करना चाहिए, और वैसे ही बोलना चाहिए जैसे मनुष्य को बोलना चाहिए, तुम्हें अपनी सीमाओं को बिल्कुल भी पार नहीं करना चाहिए और न ही अपनी सीमाओं का उल्लंघन करना चाहिए। अपनी स्वयं की ज़ुबान पर लगाम लगाओ और अपने स्वयं के पदचिह्नों के बारे में सतर्क रहो। यह सब तुम्हें ऐसा कुछ भी करने से रोकेगा जो परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करता है।

6) तुम्हें वही करना चाहिए जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को धारण करना चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अयोग्य हो, और परमेश्वर के घर में रहने के अयोग्य हो।

7) कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञा मानने के अलावा, हर चीज में तुम्हें उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है। यहाँ तक कि जरा सा अतिक्रमण भी अस्वीकार्य है। तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में पूर्ण होना चाहिए, और सही या ग़लत का विश्लेषण बिल्कुल नहीं करना चाहिए; क्या सही या ग़लत है इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। तुम्हें स्वयं केवल सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता अवश्य करनी चाहिए।

8) जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं ठहराना चाहिए या किसी व्यक्ति पर श्रद्धा नहीं रखनी चाहिए; तुम्हें पहला स्थान परमेश्वर को और दूसरा स्थान उन लोगों को देना चाहिए जिनकी तुम श्रद्धा करते हो, और तीसरा स्थान अपने आपको नहीं देना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं लेना चाहिए, और तुम्हें लोगों को—विशेष रूप से उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य, उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

9) तुम्हारे विचार कलीसिया के कार्य के बारे में होने चाहिए। तुम्हें अपनी स्वयं की शारीरिक इच्छाओं की उपेक्षा कर देनी चाहिए, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक होना चाहिए, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के काम के लिए समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के काम को पहले स्थान पर और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए। यह एक सन्त की शालीनता है।

10) सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं रखते हैं (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारा पति या तुम्हारी पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता, इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है, और इसकी संख्या को ऐसे लोगों से पूरा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो प्रसन्नतापूर्वक विश्वास नहीं करते हैं उन्हें कलीसिया के भीतर बिल्कुल भी नहीं ले जाना चाहिए। यह आज्ञा सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और एक दूसरे को स्मरण दिलाना चाहिए, और कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं करते हैं, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें अवश्य किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं दिया जाना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं, और कलीसिया में उनके प्रवेश पर किसी भी आवश्यक तरीके से रोक अवश्य लगायी जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया में समस्या आती है, तो तुम स्वयं निर्वासित कर दिये जाओगे या तुम अपने ऊपर प्रतिबंध लगवा लोगे। संक्षेप में, इस मामले में हर किसी का एक उत्तरदायित्व है, किन्तु तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, अथवा व्यक्तिगत बदला लेने के लिए इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

6. कहने का अर्थ है कि लोगों को कई कर्तव्यों का अवश्य पालन करना चाहिए जो उन्हें करने चाहिए। इसी का लोगों को पालन करना चाहिए और इसे ही अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। पवित्रात्मा को वह करने दो जो पवित्रात्मा के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए; मनुष्य उसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता है। मनुष्य को उस पर दृढ़ रहना चाहिए जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, जिसका पवित्रात्मा से कोई संबंध नहीं है। यह कुछ नहीं बल्कि वह है जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, और आज्ञा के रूप में उसका पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे कि पुराने विधान की व्यवस्था का अनुपालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, किंतु फिर भी बहुत से वचन, व्यवस्था के युग के प्रकार के हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए, और उन्हें केवल पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने पर भरोसा करके पूरा नहीं किया जाता है, बल्कि वे वचन हैं जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए: तुम लोग व्यवहारिक परमेश्वर के कार्य की आलोचना नहीं करोगे। तुम लोग उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। परमेश्वर के सामने, तुम लोग अपना स्थान बनाए रखोगे और स्वच्छंद नहीं होगे। तुम लोगों को वाणी से संयमित होना चाहिए, और तुम लोगों के वचनों और कार्यों को परमेश्वर द्वारा गवाही के लिए व्यक्ति की व्यवस्थाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही का आदर करना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के कार्य और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर के वाणी और कथनों के लक्ष्य की नकल नहीं करोगे। बाह्य रूप से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का स्पष्ट रूप से विरोध करता हो। प्रत्येक व्यक्ति को इसका और इससे अधिक का पालन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "नये युग की आज्ञाएँ" से उद्धृत

7. तुम लोगों को उस चीज़ को अपने हृदय में रखना चाहिए जो मैं तुम लोगों को बताता हूँ, तुम लोगों को अवश्य मेरे वचनों के माध्यम से मेरे हृदय को समझना चाहिए और मेरी ज़िम्मेदारी के प्रति विचार करना चाहिए, और उससे तुम लोग मेरी सर्वशक्तिमत्ता को जान लोगे और मेरे व्यक्तित्व को देखोगे। क्योंकि मेरे वचन बुद्धि के वचन हैं और कोई भी मेरे वचनों के पीछे के सिद्धांतों या कानूनों को नहीं समझ सकता है। लोग सोचते हैं कि मैं छल और कुटिलता का अभ्यास करता हूँ और वे मेरे वचनों के माध्यम से मुझे नहीं जानते हैं, किन्तु इसके विपरीत वे मेरे विरुद्ध निंदा करते हैं। वे बहुत अंधे और अज्ञानी हैं! और उनके पास किसी भी तरह की कोई समझ नहीं है। हर एक वाक्य जो मैं कहता हूँ उसमें अधिकार और न्याय होता है और कोई भी उन्हें बदल नहीं सकता है। एक बार मेरे वचन निर्गत हो जाने पर, चीज़ें मेरे वचनों के अनुसार संपन्न हो जाएँगी, और यह मेरा स्वभाव है। मेरे वचन अधिकार हैं और जो भी उन्हें संशोधित करते हैं, वे मेरी ताड़ना को अपमानित करते हैं और मुझे उन्हें अवश्य मार गिराना होगा। गंभीर मामलों में वे अपने स्वयं के जीवन पर बर्बादी लाते हैं और वे अधोलोक में जाते हैं, या अथाह गड्ढे में जाते हैं। यही एकमात्र तरीका है जिसमें मैं मानवजाति से निपटता हूँ और मनुष्य के पास इसे बदलने का कोई तरीका नहीं है—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। इसे याद रखना! किसी को भी मेरे आदेश को अपमानित करने की अनुमति नहीं है; यह अवश्य मेरी इच्छा के अनुसार किया जाना चाहिए! अतीत में, मैं तुम लोगों के प्रति बहुत नरम था और तुमने केवल मेरे वचनों का सामना किया था। लोगों को मार गिराने के बारे में मैंने जो वचन बोले थे, वे अभी तक घटित नहीं हुए हैं। किन्तु आज से, उन सभी लोगों पर सभी आपदाएँ (ये मेरे प्रशासनिक आदेशों के संबंध में) एक-एक करके पड़ेंगी जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं है। तथ्यों का आगमन अवश्य होना चाहिए, अन्यथा लोग मेरे कोप को देखने में सक्षम नहीं होंगे बल्कि बार-बार लंपट होंगे। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक कदम है और यही वह तरीका है जिसमें मैं अपने कार्य का अगला कदम करता हूँ। मैं इसे तुम लोगों से अग्रिम में कहता हूँ ताकि तुम लोग सदैव के लिए अपराध करने और तबाही को भुगतने से बच सको। अर्थात्, आज से मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोगों को ऐसा बना दूँगा कि वे मेरी इच्छा के अनुसार अपनी उचित जगह लेंगे, और मैं उन्हें एक-एक करके ताड़ना दूँगा। मैं उनमें से एक को भी दोषमुक्त नहीं करूँगा। तुम लोग बस फिर से लंपट होने की हिम्मत तो करो! तुम लोग बस फिर से विद्रोही होने की हिम्मत तो करो! मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं लेशमात्र भी भावनाओं से रहित सभी के लिए धार्मिक हूँ, और यह इस बात को दिखाने का काम करता है कि मेरे स्वभाव को अपमानित अवश्य नहीं किया जाना चाहिए। यह मेरा व्यक्तित्व है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। सभी लोग मेरे वचनों को सुनते हैं और सभी लोग मेरे गौरवशाली चेहरे को देखते हैं। सभी लोगों को अवश्य पूर्णतया और सर्वथा मेरा आज्ञापालन करना चाहिए—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। ब्रह्मांड के छोरों पर सभी लोगों को मेरी प्रशंसा करनी चाहिए, मुझे गौरवान्वित करना चाहिए, क्योंकि मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, क्योंकि मैं परमेश्वर का व्यक्तित्व हूँ। कोई भी मेरे वचनों और कथनों को, मेरे भाषण और आचरण को नहीं बदल सकता है, क्योंकि ये केवल मेरे अकेले के मतलब के मामले हैं, और ऐसे हैं जिन्हें मैंने सदैव धारण किया है और जो सदैव के लिए अस्तित्व में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 100" से उद्धृत

8. तुम लोगों में से प्रत्येक को मेरे प्रशासनिक नियमों के बारे में अंतर्दृष्टि होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा, तो तुम लोगों को ज़रा भी भय न होगा और तुम सब मेरे सामने लापरवाह रहोगे, और तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं क्या सिद्ध करना चाहता हूँ, मैं किसे पूर्ण करना चाहता हूँ, मैं क्या हासिल करना चाहता हूँ या किस तरह के व्यक्ति की मेरे राज्य को आवश्यकता है।

मेरे प्रशासनिक आदेश इस प्रकार हैं:

1) चाहे तुम कोई भी हो, यदि तुम अपने दिल में मेरा विरोध करते हो, तो तुम्हारा न्याय किया जाएगा।

2) जिन लोगों को मैंने चुना है, उन्हें किसी भी गलत विचार के लिए तुरंत अनुशासित किया जाएगा।

3) मैं उन लोगों को एक तरफ़ कर दूँगा जो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं। मैं उन्हें लापरवाही से बोलने और काम करने दूँगा और अंत में, मैं उन्हें पूरी तरह से दंडित करूँगा और उनसे निपटूंगा।

4) जो मुझ पर विश्वास करते हैं, मैं उनकी देखभाल करूँगा और हर समय उनकी रक्षा करूँगा। सदा के लिए मैं उद्धार के मार्ग का उपयोग करके उनके लिए जीवन की आपूर्ति करूँगा। इन लोगों के पास मेरा प्यार होगा और वे निश्चित रूप से न तो गिरेंगे, न ही अपनी राह से भटकेंगे। उनकी कोई भी कमज़ोरी अस्थायी होगी, और मैं निश्चित रूप से उसे याद नहीं रखूँगा।

5) वे लोग जो विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन जो वास्तव में विश्वास नहीं करते हैं—अर्थात जो लोग विश्वास करते हैं कि एक परमेश्वर है, लेकिन जो मसीह की तलाश नहीं करते हैं, पर जो विरोध भी नहीं करते हैं—इस तरह के लोग सबसे दयनीय होते हैं, और अपने कार्यों के माध्यम से मैं उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाऊंगा। अपने कार्यों के माध्यम से, मैं इस प्रकार के लोगों को बचाऊंगा और उन्हें वापस लाऊंगा।

6) ज्येष्ठ पुत्रों को, जो मेरे नाम को स्वीकार करने वाले पहले थे, आशीष मिलेगी! मैं निश्चित रूप से तुम सब को सबसे अच्छी आशीषें प्रदान करूँगा और तुम लोग जी भर कर आनंद लोगे; कोई भी इसमें बाधा डालने की हिम्मत नहीं करेगा। सब कुछ तुम्हारे लिए पूरी तरह से तैयार किया गया है, क्योंकि यह मेरा प्रशासनिक आदेश है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 56" से उद्धृत

9. मेरा न्याय हर एक के लिए आता है, मेरे प्रशासनिक आदेश हर एक को छूते हैं, और मेरे वचन और मेरा व्यक्तित्व हर किसी के लिए प्रकट होते हैं। यह मेरे आत्मा के महान कार्य का समय है (इस समय जिन लोगों को आशीष मिलेगा और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे उन्हें अलग किया जाता है)। मेरे वचनों के सामने आते ही, मैंने उन लोगों को अलग कर दिया है जिन्हें आशीष मिलेगा और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे। यह सब अत्यंत स्पष्ट है और मैं इसे एक नज़र में देख सकता हूँ। (यह मेरी मानवता के संबंध में बोला जाता है, इसलिए यह मेरे पूर्वनियतन और चयन के विपरीत नहीं है।) मैं पहाड़ों और नदियों और सभी चीजों पर, ब्रह्मांड के अन्तरिक्ष में घूमता हूँ, हर जगह को देखता हूँ और हर स्थान को शुद्ध करता हूँ, ताकि उन अशुद्ध स्थानों और असंयमी भूमियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और मेरे वचनों के कारण जल कर शून्य हो जाएगा। मेरे लिए, सब कुछ आसान है। यदि अभी वह समय होता जो मैंने दुनिया को नष्ट करने के लिए पूर्वनियत किया था, तो मैं इसे एक वचन से निगल सकता था, लेकिन अभी वह समय नहीं है। इससे पहले कि मैं यह कार्य करूँगा, सभी को तैयार अवश्य रहना चाहिए, ताकि मेरी योजना अस्तव्यस्त और मेरा प्रबंधन बाधित न हो। मुझे पता है कि इसे उचित तरीके से कैसे करना है: मेरे पास मेरी बुद्धि है और मेरे पास मेरी अपनी व्यवस्था है। लोगों को अवश्य एक अँगुली भी नहीं हिलानी चाहिए—मेरे हाथ से नहीं मारे जाने के लिए सावधान रहो; यह पहले से ही मेरे प्रशासनिक आदेशों को स्पर्श करता है। इससे कोई व्यक्ति मेरे प्रशासनिक आदेशों की कठोरता को देख सकता है, और कोई मेरे प्रशासनिक आदेशों के सिद्धांतों को देख सकता है, जिसमें दो पहलू शामिल हैं: एक ओर तो मैं उन सभी को मारता हूँ जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं और जो मेरे प्रशासनिक आदेशों को अपमानित करते हैं; दूसरी ओर, अपने कोप में मैं उन सभी को शाप देता हूँ जो मेरे प्रशासनिक आदेशों को अपमानित करते हैं। ये दोनों पहलू अपरिहार्य हैं और मेरे प्रशासनिक आदेशों के कार्यकारी सिद्धांत हैं। चाहे लोग कितने ही वफादार क्यों न हों, सभी के साथ इन दोनों सिद्धांतों के अनुसार, बिना भावना के व्यवहार किया जाता है। यह मेरी धार्मिकता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है और मेरे प्रताप और मेरे कोप को दर्शाने के लिए पर्याप्त है, जो सभी पार्थिव चीज़ों, सभी सांसारिक चीज़ों और उन सभी चीज़ों को भस्म कर देगा जो मेरी इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। मेरे वचनों में रहस्य छुपे हैं, और मेरे वचनों में रहस्यों को भी प्रकट किया गया है, इसलिए मानव धारणा में, मानव मन में, मेरे वचन सदैव समझ से बाहर हैं और मेरा हृदय सदैव अथाह है। दूसरे शब्दों में, मुझे मनुष्यों को अवश्य उनकी धारणाओं और सोच से बाहर करना होगा। यह मेरी प्रबंधन योजना का सबसे महत्वपूर्ण अंश है। मुझे अपने ज्येष्ठ पुत्रों को पाने के लिए और उन चीजों को पूरा करने के लिए जो मैं करना चाहता हूँ इसे इसी तरह से अवश्य करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 103" से उद्धृत

10. किन्तु जब तक पुराना संसार निरन्तर बना रहता है, मैं सारे विश्व में खुले तौर पर अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करते हुए, अपने प्रचण्ड प्रकोप को इनके राष्ट्रों के ऊपर तेजी से फेंकूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करता है उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए विश्व की तरफ अपने चेहरे को घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ को सुनती है, और उसके बाद उन सभी कार्यों को देखती है जिसे मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं, अर्थात्, जो मनुष्य के कार्यों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन नीचे गिर जाएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और मेरे कारण सूर्य और चन्द्रमा को नया बना दिया जायेगा—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। विश्व के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से विभक्त कर दिया जाएगा और मेरे राष्ट्र के द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसकी वजह से पृथ्वी के राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राष्ट्र बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता हो; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा, और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। विश्व के भीतर मनुष्यों में, वे सभी जो शैतान से संबंध रखते हैं उनका सर्वनाश कर दिया जाएगा; वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें जलती हुई आग के द्वारा नीचा दिखाया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी इस धारा के अन्तर्गत हैं, बाकियों को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो, भिन्न-भिन्न अंशों में, धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीत लिए जा कर मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। समस्त मानवता अपने-अपने स्वभाव का अनुसरण करेगी, और जो कुछ उसने किया है उससे भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ प्राप्त करेगी। वे जो मेरे विरूद्ध खड़े हुए हैं सभी नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कार्यों में मुझे शामिल नहीं किया है, वे अपने आपको दोषमुक्त करने के ढंग के कारण, पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर बने रहेंगे। मैं अपने महान कार्य की समाप्ति की घोषणा करने के लिए पृथ्वी पर अपनी ध्वनि आगे करते हुए अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 26" से उद्धृत

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