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परमेश्वर हमें परीक्षण और शुद्धिकरण का अनुभव क्यों करने देते हैं?

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सूचीपत्र

परीक्षण और शुद्धिकरण परमेश्वर के सबसे बड़े अनुग्रह हैं

क्या भौतिक अनुग्रह जीवन में बढ्ने में हमारी सहायता कर सकते हैं?

परीक्षण और शुद्धिकरण के माध्यम से कैसे गुज़रें

कई ईसाई भ्रमित महसूस करते हैं: परमेश्वर प्रेम हैं और वह सर्वशक्तिमान हैं, तो वह हमें कष्ट सहने क्यों देते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि उन्होंने हमें त्याग दिया है? यह प्रश्न मुझे हमेशा उलझन में डाल दिया करता था, लेकिन हाल ही में, प्रार्थना और खोज के माध्यम से, मैंने थोड़ा प्रबोधन और प्रकाश प्राप्त किया है। इससे परमेश्वर के प्रति मेरी गलतफहमी दूर हो गई है, और मुझे यह समझ में आ गया है कि दु:ख का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर हमें दरकिनार कर रहे हैं, बल्कि परमेश्वर द्वारा बहुत सावधानी से इसकी व्यवस्था की गई है ताकि हमें शुद्ध किया और बचाया जा सके। ये परीक्षण और शुद्धिकरण हमारे लिए परमेश्वर के सबसे बड़े अनुग्रह हैं!

परीक्षण और शुद्धिकरण परमेश्वर के सबसे बड़े अनुग्रह हैं

परमेश्वर कहते हैं, "उस तिहाई को मैं आग में डालकर ऐसा निर्मल करूँगा, जैसा रूपा निर्मल किया जाता है, और ऐसा जाँचूँगा जैसा सोना जाँचा जाता है। वे मुझ से प्रार्थना किया करेंगे, और मैं उनकी सुनूँगा। मैं उनके विषय में कहूँगा, 'ये मेरी प्रजा हैं,' और वे मेरे विषय में कहेंगे, 'यहोवा हमारा परमेश्‍वर है'" (जकर्याह 13:9)। "देख, मैं ने तुझे निर्मल तो किया, परन्तु चाँदी के समान नहीं; मैं ने दु:ख की भट्ठी में परखकर तुझे चुन लिया है" (यशायाह 48:10)। और 1 पतरस 5:10 में, यह कहा गया है, "अब परमेश्‍वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिसने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दु:ख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा।"

हम परमेश्वर के वचनों और धर्मशास्त्र से देख सकते हैं कि हमें कष्ट सहने देने में परमेश्वर की इच्छा है और यह पूरी तरह से हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए है; यह परमेश्वर द्वारा हमें दिया गया एक अनमोल खज़ाना है। परीक्षण और शुद्धिकरण के हम पर आने से पहले, हम सभी सोचते हैं कि हम ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के मार्ग पर चलते हैं, हममें से कुछ को तो यह भी लगता है कि परमेश्वर के लिए त्यागने, स्वयं को खपाने, श्रम करने, काम करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने से, हम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील हैं। हम वे लोग हैं जो उन्हें सबसे अधिक प्यार करते हैं, और हम उन्हें सबसे अधिक समर्पित हैं। हम मानते हैं कि चाहे कोई भी नकारात्मक और कमज़ोर हो जाए या परमेश्वर के साथ विश्वासघात करे, हम कभी ऐसा नहीं कर सकते। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब हमें, नौकरी खोने या आर्थिक तंगी जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो हम परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करते हैं, अपना विश्वास खो देते हैं, यहाँ तक कि उनके लिए खुद को खपाने को तैयार नहीं होते हैं। जब दुर्भाग्य हमारे परिवारों पर आ पड़ता है या कुछ आपदा आती है, तो हम अभी भी इसलिए परमेश्वर के बारे में शिकायत कर सकते हैं क्योंकि कोई बात हमारे व्यक्तिगत हितों से टकराती है। हम अपनी बात रखने के लिए बहस करते हैं, लड़ाई करते हैं, और गंभीर मामलों में, परमेश्वर को धोखा देते हैं, अपने विश्वास को त्याग देते हैं। परमेश्वर ने कई अवसरों पर कहा है कि उनकी अपेक्षा है कि हम उनके मार्ग का पालन करें, उन्होंने यह माँग की है, "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख" (मत्ती 22:37)। लेकिन हम हमेशा अपने शारीरिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए जोड़-तोड़ करते रहते हैं, इन्हें परमेश्वर के लिए अपने प्रेम से ज़्यादा सँजोते हैं। जब परमेश्वर हमारी धारणाओं के अनुसार कार्य करते हैं, तो हम उन्हें धन्यवाद देते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं, लेकिन जब वे ऐसा नहीं करते हैं, तो हम परमेश्वर के बारे मे गलतफहमी और शिकायतों को पाल लेते हैं, यहाँ तक कि उनके साथ विश्वासघात भी कर बैठते हैं। इससे पता चलता है कि शैतान ने हमें कितनी गहराई तक भ्रष्ट किया है। हम हमेशा अपने विश्वास में आशीष पाने की कोशिश करते हैं, जो कि सार रूप में परमेश्वर के साथ लेन-देन करने का प्रयास करना है—ऐसा करना वास्तव में स्वार्थ से भरा है, नीचता है और पूरी तरह से तर्कविहीन है! इस बिंदु पर, हम अपने भीतर के उन शैतानी स्वभावों के बारे में कुछ सच्ची समझ हासिल कर सकते हैं जो परमेश्वर की खिलाफत और विरोध करते हैं, साथ ही साथ अपने विश्वास में हम जो गलत उद्देश्य और धारणाएं रखते हैं उसके बारे में भी थोड़ी समझ भी पा सकते हैं। हम देख सकते हैं कि हम जिसे जीते हैं वह परमेश्वर की अपेक्षा के आस-पास भी नहीं है, और हम पूरी तरह से परमेश्वर का आशीष और अनुमोदन प्राप्त करने के अयोग्य हैं। इसी तरह, ऐसे परीक्षणों और शुद्धिकरण के माध्यम से, हम परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता का अनुभव कर सकते हैं, और महसूस कर सकते हैं कि परमेश्वर में हमारी आस्था में कितनी मिलावट है। यदि हम आशीष पाने के इरादे से उन पर विश्वास करना जारी रखते हैं, तो हम केवल परमेश्वर को हमसे घृणा और नफ़रत करने को मजबूर करेंगे। परीक्षणों के माध्यम से उजागर होने के बाद, हम देख सकते हैं कि हमारा भ्रष्टाचार बहुत बड़ा है और हमारी कमियाँ भी बहुत हैं, और इस प्रकार हम प्रार्थना में परमेश्वर के सामने आना शुरू कर सकते हैं, उनके वचनों को पढ़ सकते हैं, और फिर मनन-चिंतन करके अपने भीतर के उन स्थानों को जान सकते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हैं। हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के तरीकों की खोज कर सकते हैं, उनके लिए गवाही दे सकते हैं, और अनजाने में ही हम परमेश्वर के साथ अधिक घनिष्ठ संबंध विकसित कर लेते हैं। इस तरह के अनुभव के बाद, हम न केवल खुद के बारे में और परमेश्वर के स्वभाव के बारे में थोड़ी समझ को प्राप्त करते हैं, बल्कि हम और अधिक स्थिर और परिपक्व हो जाते हैं। हमारे आवेगी, अभिमानी, स्वार्थी, और कपटपूर्ण स्वभाव को नीचे लाया जाता है, तभी हम वास्तव में समझ सकते हैं कि भले ही परीक्षण और शुद्धिकरण से हमें कुछ शारीरिक पीड़ा होती है, लेकिन यह जो फल हममें उत्पन्न करता है वो है उद्धार और शुद्धि पाना, जो हमारे जीवन के लिए बहुत ही लाभदायक और शिक्षाप्रद हैं।

हम इसे तमाम युगों के दौरान संतों को हुए अनुभवों में भी देख सकते हैं। परमेश्वर ने मूसा का उपयोग करने से पहले, 40 वर्षों के लिए जंगल में मूसा को तपाया था। उस समय के दौरान, मूसा ने सभी तरह की कठिनाइयों को सहन किया, वहाँ उसके साथ बोलने वाला कोई नहीं था, और उसे अक्सर जंगली जानवरों और कठोर मौसम का सामना करना पड़ता था। उसका जीवन लगातार खतरे में था। निश्चित रूप से ऐसे कठोर वातावरण में उसने बहुत पीड़ा झेली। शायद कुछ लोग पूछें, "क्या परमेश्वर सीधे ही मूसा का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे? उन्हें पहले मूसा को 40 साल के लिए जंगल में भेजने की क्या ज़रूरत थी?" इसमें हम परमेश्वर की उदारता को देखते हैं। हम जानते हैं कि मूसा न्याय की भावना रखने वाला एक सीधा-सादा व्यक्ति था, लेकिन उसकी प्रवृत्ति और रुझान अपनी धार्मिकता से प्रेरित होकर आवेश मे आकर काम करने की थी। जब उसने मिस्र के एक सैनिक को इस्राइलियों को मारते देखा, तो उसने उस सैनिक के सिर पर पत्थर से वार कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। मूसा का पैदाइशी मिजाज़ और वीर भावना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं थी, इसलिए यदि परमेश्वर ने सीधे ही उसका उपयोग किया होता, तो उसने अपने कार्यों में इन अभिलक्षणों पर निर्भर रहना जारी रखा होता और जो काम उसे सौंपा गया था—इस्राएलियों को मिस्त्र से बाहर निकालना—उसे पूरा करने में कभी सक्षम नहीं होता। यही कारण है कि परमेश्वर ने मूसा को 40 वर्षों तक जंगल में रखा, ताकि वह परमेश्वर के उपयोग के लिए अधिक उपयुक्त हो सके। ऐसे कठिन, हिंसक वातावरण में, मूसा न केवल परमेश्वर से लगातार प्रार्थना और उनका आह्वान कर रहा था, बल्कि उसने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और प्रभुत्व को देखा, और अपने जीवित रहने के लिए परमेश्वर पर भरोसा किया। उसके प्राकृतिक, तेज़-मिजाज़ तत्व दूर हो गए थे, और उसने परमेश्वर के प्रति वास्तविक विश्वास और समर्पण विकसित कर लिया। इसलिए, जब परमेश्वर ने मूसा को अपना आदेश सौंपने के लिए बुलाया, अर्थात इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाने के लिए बुलाया, तो मूसा बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार करने और पालन करने में सक्षम हो गया, और परमेश्वर के मार्गदर्शन के साथ, उसने सुचारू रूप से परमेश्वर के आदेश का क्रियान्वन किया।

बाइबल में अय्यूब की कहानी भी है। अय्यूब परीक्षा से होकर गुज़रा जिसमें उसकी संपत्ति छीन ली गयी, उसके बच्चों को मार दिया गया, और उसके पूरे शरीर पर फोड़े हो गए, लेकिन अपनी पीड़ा के बावजूद उसने कभी अपनी ज़ुबान से पाप नहीं किया; उसने परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत नहीं की, बल्कि अपने हृदय में परमेश्वर की हर बात को स्वीकार कर लिया। वह परमेश्वर की इच्छा को खोजने में भी सक्षम रहा, और अंततः उसने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" (अय्यूब 1:21) और "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?" (अय्यूब 2:10)। वह इन बातों को कहने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास, भय और समर्पण पर निर्भर था, और इस तरह परमेश्वर के लिए साक्षी बना रहा। अय्यूब इस तरह के बड़े परीक्षणों से गुज़रते हुए भी गवाही देने में सक्षम इसलिए था क्योंकि वह मानता था कि परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करते हैं, और उसकी संपत्ति और बच्चे सभी उसे परमेश्वर द्वारा दिए गए थे, इसलिए उन्हें ले लेने का अधिकार भी परमेश्वर को ही है। सृजित जीव होने के नाते, उसे स्वीकार करना और समर्पित होना चाहिए। सृजित प्राणी के स्थान पर खड़ा होने की अय्यूब की क्षमता और बेशर्त सृष्टिकर्ता का पालन करना, परमेश्वर के लिए गवाही देना था। बाद में परमेश्वर एक तूफान में अय्यूब को दिखाई दिए, अय्यूब ने परमेश्वर की पीठ को देखा, परमेश्वर को अपने मुंह से उससे बात करते हुए सुना; उसने परमेश्वर की सच्ची समझ हासिल की। अय्यूब ने एक ऐसा इनाम हासिल किया, जो उसने सहज माहौल में कभी हासिल नहीं किया होता, और यह परीक्षण और शुद्धिकरण के माध्यम से अय्यूब को दिया गया सबसे बड़ा आशीष था। जैसे अय्यूब ने अपने मित्रों को अपने परीक्षणों के बाद बताया, "जब वह मुझे ता लेगा तब मैं सोने के समान निकलूँगा" (अय्यूब 23:10)।

यह हमें दिखाता है कि परीक्षण और शुद्धिकरण वास्तव में हमारे लिए परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक प्रेम है। केवल उनके माध्यम से ही हम परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए और बचाये जा सकते हैं, जिससे हम ऐसे लोग बनेंगे जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं। यही कारण है कि परमेश्वर हम पर इन चीज़ों को पड़ने की अनुमति देते हैं।

परमेश्वर हमें परीक्षण और शुद्धिकरण का अनुभव क्यों करने देते हैं?

क्या भौतिक अनुग्रह जीवन में बढ्ने में हमारी सहायता कर सकते हैं?

अक्सर, हममें परमेश्वर के अच्छे इरादों की समझ की कमी होती है, हम आशा करते हैं कि जैसा हम चाहते हैं, चीजें वैसी ही होंगी। विशेष रूप से हम परीक्षण और शुद्धिकरण से गुज़रने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इसके बजाय, हम अपने जीवन या अपने प्रियजनों के जीवन में किसी भी दुर्घटना के बिना, पूरी तरह से शांतिपूर्ण जीवन की आशा करते हैं। हम चाहते हैं कि सब कुछ सुचारू रूप से हो और हम परमेश्वर के आशीष और अनुग्रह का आनंद लें। लेकिन क्या हम कभी इस बात पर विचार करते हैं कि एक आरामदायक माहौल हमें अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने दे सकता है या नहीं? क्या भौतिक आशीष वास्तव में हमें परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व को जानने में मदद कर सकते हैं? अगर हम केवल उनकी दया और अनुग्रह का आनंद लेते हैं, तो क्या इससे उनमें हमारा विश्वास बढ़ सकता है, क्या इससे हम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और समर्पण विकसित कर सकते हैं? परमेश्वर के वचन कहते हैं, "शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास असफल हो गया है। परमेश्वर ने शरीर में अनुग्रह के कार्य के एक चरण को पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य के अनुभवों में वह परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को सिद्ध बनाने में असमर्थ हैं, और उसे प्रकट करने में भी असमर्थ है जो मनुष्य में भ्रष्ट है, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, ना उसके प्रेम और विश्वास को सिद्ध बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता" ("केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")।

परमेश्वर के वचन बिलकुल स्पष्ट हैं। यदि हम केवल परमेश्वर की दया और अनुग्रह का आनंद लेने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो न केवल हम अपने भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं हो पाएंगे, बल्कि हम अपने जीवन में आगे नहीं बढ़ेंगे, न ही हमारा विश्वास, प्रेम और आज्ञाकारिता संभवतः पूर्ण की जाएगी। बाइबल कहती है, "निश्‍चिन्त रहने के कारण मूढ़ लोग नष्‍ट होंगे" (नीतिवचन 1:32)। यदि हम बिना किसी परीक्षण या शुद्धिकरण के एक आरामदायक माहौल में जीते रहते हैं, तो हमारा दिल धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर हो जाएगा और हम जीव संबंधी आराम के लिए अपने लालच के परिणामस्वरूप पतित हो जाएंगे। हम भोजन से भरे हुए अपने पेट और चिंताओं से खाली अपने मन के साथ अपने भ्रष्ट स्वभावों के भीतर जीते रहेंगे, अंततः हम कुछ भी नहीं पाते हैं, अपने जीवन को बर्बाद करते हैं। यह एक अभिभावक होने के जैसा है—यदि आप हमेशा अपने बच्चे को दुलारते हैं और वे कुछ भी गलत करें तो क्षमा करते हैं, सहनशील बने रहते हैं, तो आखिर कब वह बच्चा अपने नकारात्मक लक्षणों को बदलकर परिपक्व होगा? तो, एक आरामदायक माहौल हमारे जीवन में विकास के लिए बिल्कुल फायदेमंद नहीं है; इसके विपरीत, यह हमें देह भोग के लिए लालची बनाता जाएगा, हम बस परमेश्वर की कृपा और आशीष की मांग करेंगे, और अधिक स्वार्थी, लालची, दुष्ट और धोखेबाज बनेंगे। यदि हम अपने भ्रष्ट स्वभाव से बचना चाहते हैं और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनना चाहते हैं, तो हम परमेश्वर के अनुग्रह, आशीष और आरामदायक माहौल में परमेश्वर पर विश्वास करने से संतुष्ट नहीं हो सकते हैं, लेकिन हमें अधिक परीक्षणों और शुद्धिकरण से भी गुज़रना चाहिए। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा पा सकते हैं और परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किए जा सकते हैं।

परीक्षण और शुद्धिकरण के माध्यम से कैसे गुज़रें

परमेश्वर के वचन कहते हैं, "जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करनी चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को बिना लड़खड़ाने या मिटने देते हुए बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मनसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारी वास्तविक कद-काठी क्या है, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास अवश्य होना चाहिए, और तुममें देह को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से तुम्हें व्यक्तिगत रूप से कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। तुममें स्वयं पछतावा करने वाला हृदय भी अवश्य होना चाहिए, कि अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाए थे, और अब स्वयं पछतावा करने में समर्थ होने चाहिए। इन में से किसी भी एक का अभाव नहीं हो सकता है और परमेश्वर इन चीजों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुममें इन शर्तों का अभाव है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है" ("पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए")।

परमेश्वर के वचन हमें अभ्यास का मार्ग देते हैं। जब हम कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो परमेश्वर के कार्य के प्रति हमारा रवैया महत्वपूर्ण है और इसका सीधा संबंध इससे है कि क्या हम परमेश्वर के लिए गवाही दे सकेंगे, और उनके द्वारा शुद्ध किए और बचाए जा सकेंगे। अगर हम भ्रष्ट शैतानी स्वभावों पर भरोसा करते हैं, परीक्षण और शुद्धिकरण से गुज़रते हुए शारीरिक आराम के लिए लालच करते हैं, हमेशा अपने स्वयं के हितों के लिए विचारते और योजना बनाते हैं, तो बहुत संभावना है कि हम परमेश्वर के प्रति शिकायत करेंगे; हम उनके खिलाफ लड़ेंगे और उनका विरोध करेंगे, यहाँ तक कि परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह या विरोध करने के काम करेंगे। तो हम शैतान के लिए हंसी के पात्र हैं, इस तरह हम अपनी गवाही पूरी तरह से खो देते हैं। लेकिन अगर हम कठिनाइयों से गुज़रते हुए परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने और उसे समर्पित होने में सक्षम हैं, और उनके भीतर अपने लिए परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं की तलाश करते हैं, अगर हम देह का मोह त्याग सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, परमेश्वर के लिए गवाही देने और देह में पीड़ा सहने को वरीयता देते हैं, अगर हम परमेश्वर के प्रति प्रेम और उन्हें संतुष्ट करने की इच्छा के साथ इन परिस्थितियों का अनुभव कर सकते हैं, तो हम इन परीक्षणों से गुज़रते हुए और अधिक सत्य को समझने में सक्षम होंगे, हमारे भ्रष्ट स्वभावों को परमेश्वर द्वारा शुद्ध किया जा सकता है, और हम वे लोग बन सकते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं।

कुछ समय पहले मेरे परिवार में कुछ परेशानियां आ गईं थीं—मेरे पति ने हमारे बिज़नेस में अपना सप्लायर खो दिया था, मेरे बच्चे को नौकरी में कठिनाई हो रही थी, और बिज़नेस में लगातार समस्याएं आ रहीं थीं। मैं वास्तव में परेशान और निराश थी और मैं परमेश्वर के खिलाफ कुड़कुड़ाने से खुद को नहीं रोक पा रही थी। मैंने महसूस किया कि मैंने हर दिन परमेश्वर के लिए कड़ी मेहनत करते हुए, सुसमाचार को साझा करने के लिए सड़कों पर घूमती रही और खुद को खपाया, तो मेरे परिवार में ये चीज़ें क्यों हो रही हैं? परमेश्वर ने मेरे परिवार की रक्षा कैसे नहीं की? उस दौरान, मैंने पवित्रशास्त्र पढ़ने में कम समय बिताया, भले ही मैंने सभाओं में भाग लेना और काम करना जारी रखा, लेकिन मेरा दिल हमेशा कड़वाहट से भरा रहता था और मुझे नहीं पता था कि उस माहौल में मेरे लिए परमेश्वर की इच्छा क्या थी।

फिर, मैंने खोजते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की, और उनके द्वारा कहे ये वचन पढ़े: "कितने लोग केवल इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनको चंगा करूँगा? कितने लोग सिर्फ इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपने सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँगा? और कितने लोग बस मुझसे शांति और आनन्द प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग सिर्फ और अधिक भौतिक सम्पत्ति मांगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं, और कितने लोग सिर्फ इस जीवन को सुरक्षित गुज़ारने के लिए और आने वाले संसार में सुरक्षित और अच्छे से रहने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं लेकिन आने वाले संसार में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं करते हैं? जब मैंने अपने क्रोध को नीचे मनुष्यों के ऊपर भेजा और सारे आनन्द और शांति को ले लिया जो उसके पास पहले से था, तो मनुष्य सन्देहास्पद हो गया। जब मैंने मनुष्य को नरक का कष्ट दिया और स्वर्ग की आशीषों को वापस ले लिया, तो मनुष्य की लज्जा क्रोध में बदल गई। जब मनुष्य ने मुझसे कहा कि मैं उसको चंगा करूँ, तो मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसके प्रति घृणा का एहसास किया, मनुष्य मेरे सामने से चला गया और दुष्टतापूर्ण दवाइयों और जादू टोने के मार्ग को खोजने लगा। जब मैंने मनुष्य का सब-कुछ ले लिया जिसको उसने मुझ से मांगा था, तो मनुष्य बिना किसी नाम-निशान के गायब हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर विश्वास करता है क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह रखता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत कुछ है" ("तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?")।

परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए, मैं अपना रोना नहीं रोक पायी—मुझे बहुत दु:ख हुआ, पीड़ा हुई और साथ ही मैंने शर्मिंदगी महसूस की। मैंने देखा कि विश्वास का मेरा दृष्टिकोण पूरा गलत था, मेरा विश्वास सिर्फ आशीष और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए था। जब परमेश्वर ने मुझे आशीष दिया, तो मैंने उत्साह से बाहर निकलकर सुसमाचार को साझा किया और खुद को खपाया, न ही कठिनाइयों से डरी और न ही थकावट से। लेकिन जब मेरे परिवार में कठिनाई आने लगी, तो मैंने कमज़ोरी और नकारात्मकता में रहना शुरू कर दिया, मेरे परिवार की रक्षा नहीं करने के लिए परमेश्वर के बारे में शिकायतें मन में लाना और उन्हें दोषी ठहराना शुरू कर दिया। मैंने अपने दिल में परमेश्वर के खिलाफ एक दीवार खड़ी कर दी। मुझे खुद से यह पूछते हुए थोड़ा आत्म-मंथन करना था कि, "मेरी मेहनत परमेश्वर के प्यार को चुकाने के लिए नहीं है, बल्कि सिर्फ परमेश्वर के आशीष के बदले में है—क्या यह परमेश्वर के साथ लेन-देन नहीं है? इस तरह का विश्वास—जो गलत प्रेरणाओं और मिलावट से भरा है—परमेश्वर की मंजूरी कैसे पा सकता है? मैं परमेश्वर की सांस में लगातार सांस ले रही थी, उनके द्वारा सृजित सूरज और बारिश का आनंद ले रही थी, और उनके द्वारा बनाई गये पृथ्वी के उदार-दान पर जी रही थी, लेकिन परमेश्वर को प्रतिदान देने का बिलकुल नहीं सोच रही थी। इसके बजाय, मैं सिर्फ परमेश्वर से निरंतर मांग कर रही थी। क्या इसमें विवेक का पूरी तरह से अभाव नहीं है?" तभी मैंने देखा कि परमेश्वर में इस तरह का विश्वास करना कितना नीच और घृणित है—परमेश्वर की आराधना करते हुए मैं सृजित जीव के स्थान में बिल्कुल नहीं थी। मुझे यह भी समझ में आया कि परमेश्वर का आज्ञाकारी होने के लिए, मुझे पहले एक सृजित प्राणी की जगह में खड़ा होना था, और सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करें, चाहे वह दें या लें लें, मुझे अपनी बात मनवाने के लिए बहस न करते हुए, आज्ञा का पालन करना और समर्पित होना होगा। केवल यही वो विवेक है जिससे एक सृजित प्राणी को सम्पन्न होना चाहिए। एक बार यह समझ लेने के बाद मैंने परमेश्वर से यह वादा किया कि मेरे पति या मेरे बेटे की कार्य की स्थितियों में चाहे जो भी हो, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पित होने के लिए तैयार रहूँगी और परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करूँगी। एक बार इन सब का एहसास होने के बाद मैंने बहुत मुक्त महसूस किया और धीरे-धीरे अपनी नकारात्मक स्थिति से बाहर आ गयी। मैं अब इन मुद्दों से परेशान या विवश नहीं थी, बल्कि शांति से काम करने और प्रभु के लिए खुद को खपाने में सक्षम थी।

इस अनुभव ने मुझे वास्तव में दिखाया कि जीवन में हमारी वृद्धि के लिए परीक्षण और शुद्धिकरण कितने अधिक लाभकारी हैं। भले ही हम उनसे गुज़रते हुए थोड़ा पीड़ित होते हैं, हम जीवन में बहुत कीमती ख़ज़ाने को प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर के लिए हमारा विश्वास और प्यार बढ़ता है। मुझे यकीन है कि सभी भाई-बहन जो परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हैं, वे अब परमेश्वर के सच्चे इरादों को समझते हैं, वे अब परमेश्वर के बारे में गलतफहमी नहीं रखते हैं, और वे बिना परेशान हुए, किसी भी कठिनाई का सामना करने में सक्षम होंगे। भविष्य में हम जिन भी परीक्षणों या अवांछनीय चीजों का सामना करते हैं, उसमें हम परमेश्वर के सामने खुद को शांत कर सकें, उनकी इच्छा की तलाश कर सकें और सत्य की तलाश कर सकें। इस तरह हम परीक्षण और शुद्धिकरण के माध्यम से परमेश्वर द्वारा हमें दिये गए आशीष का अनुभव कर सकते हैं! परमेश्वर को धन्यवाद!

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