सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

एक ईसाई के रूप में, नियमित रूप से सभाओं में भाग लेने अवहेलना नहीं की जा सकती!

शियाओगाओ

आध्‍यात्मिक प्रश्नोत्तर में शामिल होने वाले भाई-बहनों को मेरा नमस्कार,

मैं दिन के वक्‍़त काम करके बहुत थक जाती हूँ, और इस कारण रात में ठीक से सो नहीं पाती। नतीजतन, मैं सभाओं में समय पर पहुँच पाने को तैयार नहीं हूँ। मैं सीमित होकर रहना पसंद नहीं करती। मुझे लगता है कि आध्‍यात्मिक ज़रूरतें होने पर ही अगर मैं अपने भाई-बहनों से चर्चा करने के लिए मिल सकूं, तो वह ठीक रहेगा। मैं यह जानने को उत्‍सुक हूँ कि इस समस्या का कारण क्‍या है। इसका समाधान मैं किस प्रकार करूं।

एन जिंग

नमस्‍ते एन जिंग बहन,

आपने कहा कि आप समय पर सभा में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं और आप ऐसा महसूस करती हैं कि जब आपकी आध्‍यात्मिक ज़रूरतें होंगी, तभी आप अपने भाई-बहनों को चर्चा करने के लिए तत्परता से खोजेंगी। हम ऐसा सोच सकते हैं क्‍योंकि हम परमेश्‍वर में सच्‍चे विश्‍वास के सही मायनों और सभाओं के महत्‍व को नहीं समझते। प्रभु का धन्यवाद। मैं इस पहलू पर अपनी समझ के बारे में थोड़ी बात करूंगी। यह चर्चा आपके लिए उपयोगी होगी, ऐसी आशा करती हूँ।

परमेश्‍वर में सच्‍चे विश्‍वास का क्‍या अर्थ है

हम सभी जानते हैं कि प्रारंभ में परमेश्‍वर ने मनुष्‍य को इसलिए बनाया ताकि मनुष्‍य पृथ्‍वी पर परमेश्‍वर का सम्मान और आराधना कर सके। प्रभु यीशु ने कहा था: "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है" (मत्‍ती 22:37-38)। प्रभु के विश्वासियों के रूप में, हम सभी को परमेश्वर पर आस्‍था रखने, उनकी आराधना करने और परमेश्‍वर से सामान्‍य संबंध बनाए रखने को प्राथमिकता देनी चाहिए। सभाएँ, प्रार्थना, सत्‍य का संवाद, भजन गाना और परमेश्‍वर का गुणगान करना, परमेश्‍वर से सामान्‍य संबंध बनाने के तरीके हैं। ईसाइयों के रूप में, कम-से-कम ये चीज़ें करना तो हमारे लिए नितांत आवश्यक है। परमेश्‍वर के वचन कहते हैं: "'परमेश्वर पर विश्वास' का अर्थ, यह विश्वास करना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर पर विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे बढ़कर यह बात है कि परमेश्वर है, यह मानना परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करना नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक प्रभाव के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर पर सच्चे विश्वास का अर्थ इस विश्वास के आधार पर परमेश्वर के वचनों और कामों का अनुभव करना है कि परमेश्वर सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखता है। इस तरह से तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त हो जाओगे, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करोगे और परमेश्वर को जान जाओगे। केवल इस प्रकार की यात्रा के माध्यम से ही तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास करने वाला कहा जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से)। "कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। …वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म की शौकिया रुचि के रूप में मानते हैं, परमेश्वर के साथ महज एक आध्यात्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं… परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें")। इससे हम यह देख सकते हैं कि अगर परमेश्‍वर में हमारी आस्‍था सिर्फ़ मौखिक स्‍वीकृति और अपने हृदय में विश्‍वास करने तक ही सीमित है, और हम सत्‍य का अनुसरण नहीं करते हैं, परमेश्‍वर के वचनों को अनुभव नहीं करते हैं और उन्‍हें अमल में नहीं लाते हैं, बल्कि आस्‍था को केवल आध्‍यात्मिक पोषण या एक शगल मानते हैं, तो यह परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करना नहीं हुआ। परमेश्‍वर इस प्रकार की आस्‍था की प्रशंसा नहीं करते। परमेश्‍वर के सच्‍चे विश्‍वासियों को नियमित रूप से परमेश्‍वर के समक्ष आना चाहिए, परमेश्‍वर से अक्‍सर प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्‍वर के वचन पढ़ने चाहिए, अक्सर सभाओं में हिस्‍सा लेना चाहिए और परमेश्‍वर के अधिक से अधिक सत्‍य को समझना चाहिए। साथ ही साथ, उन्‍हें परमेश्‍वर के वचनों को वास्‍तविक जीवन में ढालना चाहिए। उनका मानना है कि हर दिन जो कुछ भी होता है वह परमेश्‍वर के नियंत्रण और उनकी व्‍यवस्‍था के अनुसार होता है। ख़ास तौर पर जब वे किसी ऐसी बात का सामना करते हैं जो उनकी धारणाओं से मेल नहीं खाती और जब वे ख़ुद की भ्रष्‍टता को उजागर करके उसे छोड़ने में सक्षम नहीं हो पाते। वे परमेश्‍वर के समक्ष आ पाते हैं और परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप स्‍वयं के विषय में आत्‍म-चिंतन कर पाते हैं। परमेश्‍वर द्वारा व्‍यवस्थित वातावरण में वे ऐसे सभी सबक सीख पाते हैं जो उन्‍हें सीखने चाहिए और उन सत्‍यों को जान पाते हैं जिनमें उन्‍हें प्रवेश करना चाहिए और जिन्‍हें अमल में लाना चाहिए। उसके बाद परमेश्‍वर की आवश्‍यकता के अनुसार वे उन्‍हें वाकई अमल में ला सकते हैं, अपने शैतानी भ्रष्‍ट स्‍वभाव को छोड़ सकते हैं, एक सामान्‍य मानवता को जी सकते हैं और अंत में परमेश्‍वर की सच्‍ची समझ, आज्ञाकारिता और उनके प्रति प्रेम को प्राप्‍त कर सकते हैं। केवल इसी प्रकार से परमेश्‍वर के कार्य और वचनों को अनुभव करना ही परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करना है। हम परमेश्‍वर की स्‍वीकृति तभी प्राप्‍त कर सकते हैं जब हम परमेश्‍वर में इस प्रकार विश्‍वास करें। अगर हम ऐसा करते हैं, तो अंत में, हम परमेश्‍वर के राज्‍य में लाए जाएंगे। इसके विपरीत, अगर हमारी आस्‍था में परमेश्‍वर के साथ एक सामान्‍य संबंध रखना, नियमित रूप से सभाओं में भाग लेना, प्रार्थना करना, सत्‍य का संवाद करना और परमेश्‍वर के वचनों को अमल में लाना, शामिल नहीं है; अगर यह मात्र खाली समय को भरने के लिए रखी जाने वाली आस्‍था है, और अगर परमेश्‍वर में कुछ सालों तक विश्‍वास करने के बाद भी हमारे भ्रष्‍ट स्‍वभाव में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है, और अगर हममें परमेश्‍वर की सच्‍ची समझ नहीं है, तो परमेश्‍वर इस तरह की आस्‍था को स्वीकार नहीं करते। इसमें और अविश्‍वासियों की आस्‍था में कोई अंतर नहीं है। अगर हमारी आस्‍था इस तरह की है, तो भले ही हम अंत तक इस प्रकार विश्‍वास करते रहें, हम परमेश्‍वर की स्वीकृति और उद्धार प्राप्‍त नहीं कर पाएँगे।

कलीसिया का जीवन आवश्‍यक है

अगर हम समय पर सभाओं में शिरकत करने को तैयार नहीं हैं, तो इससे यह संकेत मिलता है कि हम कलीसिया के जीवन के महत्‍व को नहीं समझते। हक़ीक़त में, कलीसिया का जीवन, परमेश्‍वर के वचनों पर चर्चा करने और सत्‍य में प्रवेश करने का हमारा जीवन है। साथ ही, यह पवित्र आत्‍मा के कार्य को अनुभव करने और परमेश्‍वर के प्रेम का आनन्‍द लेने का भी जीवन है। सत्‍य को समझना, सत्‍य में प्रवेश करना और परमेश्‍वर का उद्धार पाना, पूरी तरह से वे परिणाम हैं जो पवित्र आत्‍मा के कार्य से प्राप्‍त किए जाते हैं। कलीसिया में हमारे जीवन के माध्‍यम से, जहाँ हम सेवकाई और एक-दूसरे का पोषण करते हैं, अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह करते हैं और परमेश्‍वर की गवाही देते हैं, केवल इसी तरीके से हम आसानी से पवित्र आत्‍मा का कार्य और परमेश्‍वर की पूर्णता प्राप्‍त कर पाएँगे। दूसरे शब्‍दों में कहें तो, अपनी आस्‍था के संबंध में परमेश्‍वर की स्वीकृति और उनके उद्धार को पाना पूरी तरह कलीसिया के सामान्‍य जीवन से गूँथा हुआ है। बाइबल में यह कहा गया है: "और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो" (इब्रानियों 10:25)। प्रभु यीशु ने कहा था: "फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी। क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" (मत्‍ती 18:19-20)। इससे, हम यह देख सकते हैं कि ईसाइयों के रूप में कलीसिया का जीवन जीना, परमेश्‍वर की हमसे एक माँग है। चूँकि हमारी स्‍वयं की क्षमता ही सीमित है और हमारे पास सत्‍य को ग्रहण करने का अंग नहीं है, इसलिये परमेश्‍वर के वचनों के सत्‍य और रहस्‍यों को समझना बहुत मुश्किल होता है। हालाँकि हम बहुत सारे शाब्दिक अर्थ समझते हैं, हम परमेश्‍वर के इरादों और मनुष्‍य से परमेश्‍वर की अपेक्षाओं को बहुत कम समझते हैं। परंतु अगर हम निरंतर कलीसिया के जीवन में हिस्‍सेदारी करते रहें, अपने भाई-बहनों के साथ प्रार्थना करते रहें, परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ते और अपनी स्‍वयं की समझ को व्‍यक्‍त करते रहें, परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करके उन्‍हें स्‍वीकार करते रहें, तो हम पवित्र आत्‍मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्‍त कर सकेंगे। हम और अधिक प्रकाश और प्रतिफल प्राप्‍त करेंगे, हम परमेश्‍वर के इरादों और अनुरोधों को अधिक स्‍पष्‍टता से समझ पाएँगे, और हमारे अनुशीलन का मार्ग और अधिक खुला हो जाएगा। यह विशेष रूप से तब अधिक सही है जब हम परमेश्‍वर के वचनों को नहीं समझते या कई कठिनाइयों का सामना करते हैं। अगर हम अपने भाई-बहनों के साथ परमेश्‍वर के अनुसरण में सहयोग करते हैं, परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हैं और हमारे बीच पवित्र आत्‍मा का कार्य होता है, तो हम परमेश्‍वर के वचनों के गूढ़ रहस्‍यों को समझ पाएँगे। इससे हमारी सभी परेशानियों और कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा क्‍योंकि हम सत्‍य को समझते हैं। जितनी अधिक समस्‍याएँ हम अपने कली‍सिया के जीवन में हल करते हैं, उतना ही अधिक हम सत्य को समझ और पा सकते हैं। इस तरह, हम सांसारिक घटनाक्रम से और अधिक दुःखी नहीं होंगे। हमारे जीवन सहज और उदार हो जाएँगे। इसके पश्‍चात्, जो भी घटनाएँ हमारे समक्ष आएंगी, उन सभी का हम परमेश्‍वर के इरादों और अपेक्षाओं के अनुरूप सामना कर पाएँगे। धीरे-धीरे परमेश्‍वर के वचन सभी स्थितियों से निपटने के लिए हमारे सिद्धांत और दिशानिर्देश बन जाएँगे। पवित्र आत्‍मा के मार्गदर्शन में हम परमेश्‍वर के उद्धार के मार्ग पर चलेंगे।

अगर हम कलीसिया के जीवन में शिरकत नहीं करते हैं, अगर हम अपनी ओर से परमेश्‍वर से कभी-कभार ही प्रार्थना करते और उनके वचन पढ़ते हैं, तो पवित्र आत्‍मा के कार्य की हमारी उपलब्धि बहुत सीमित रहेगी। पवित्र आत्‍मा के कार्य के बिना, हम सत्‍य को नहीं समझ पाएँगे, न ही हम सत्‍य की वास्तविकता में प्रवेश कर पाएँगे। मुश्किलों और कठिनाइयों से सामना होने पर, चूँकि हम परमेश्‍वर के इरादों को नहीं समझते, तो अक्‍सर हमें न तो यह पता रहेगा कि करना क्‍या है, न ही यह कि हम सत्‍य को अमल में कैसे लाएँ। अगर हम समय-समय पर कुछ भी करने के लिए अपनी ही धारणाओं और कल्‍पनाओं पर भरोसा करते हैं, तो हम ऐसे कृत्‍य करेंगे जो परमेश्‍वर के इरादों का उल्‍लंघन करते हैं और यहाँ तक कि परमेश्‍वर के स्‍वभाव को अपमानित भी करते हैं। हम पवित्र आत्‍मा की उपस्थिति को तो खो ही देंगे, इतना ही नहीं, परमेश्‍वर के उद्धार से भी हम वंचित हो जाएँगे। परमेश्‍वर के वचन कहते हैं: "यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वर्तमान काम को नहीं समझ सकते हो; तुम हमेशा महसूस करते हो कि यह तुम्हारी धारणाओं की अनुरूपता में नहीं है, और तुम उनका अनुसरण करने के लिए तैयार हो, लेकिन तुम में आंतरिक सहज प्रवृत्ति का अभाव है। तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर वर्तमान में क्या कर रहा है, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते हैं तो पवित्र आत्मा अपना काम नहीं कर सकता है, और यदि लोगों के पास सहयोग का दिल नहीं है, तो वे पवित्र आत्मा के काम को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। …यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते हैं और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते हैं, तो परमेश्वर उन चीजों को दूर कर देंगे जो कभी उनके पास थी। अंदर से, लोग हमेशा आसानी के लोभी होते हैं और बल्कि उस चीज का आनंद लेंगे जो पहले से ही उपलब्ध है। वे कोई भी कीमत चुकाए बिना परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये मानव जाति के भीतर अनावश्यक विचार हैं। किसी भी मूल्य का भुगतान किए बिना जीवन प्राप्त करना—क्या कभी भी कुछ इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास करता है, तो उसे एक मूल्य अवश्य चुकाना चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है। यह ऐसा कुछ है जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यद्यपि तुम इस सब का एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो तुम्हें इस पर टिके अवश्य रहना चाहिए, और इस बात की परवाह किए बिना कि परीक्षण कितने बड़े हैं, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य रिश्ते को जाने नहीं दे सकते हो। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया जीवन को बनाए रखने, और भाइयों और बहनों के साथ रहने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब भी तुम्हें सच्चाई की तलाश करनी चाहिए। यह आध्यात्मिक जीवन के लिए न्यूनतम है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए")। परमेश्‍वर के वचनों से, हम देख सकते हैं कि एक सामान्‍य आध्‍यात्मिक जीवन हमारे लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। प्रार्थना करना, परमेश्‍वर के वचन पढ़ना और सभाओं में शामिल होना, सभी एक आध्‍यात्मिक जीवन का अंग हैं। अगर हम इनका पालन करने में असमर्थ होते हैं, तो हम पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं पा सकेंगे। भले ही हमारे हृदय परमेश्‍वर का अनुकरण करना चाहें, हममें आस्‍था नहीं रहेगी। इसलिए, चाहे हमारी कामकाजी ज़िंदगी कितनी ही व्‍यस्‍त क्‍यों न हो, और हमारे भौतिक शरीर कितने ही थके हुए क्‍यों न हों, हमें परमेश्‍वर के साथ अपने सामान्‍य संबंधों को खोना नहीं चाहिए। कम-से-कम हमें एक सामान्‍य आध्‍यात्मिक जीवन तो जीना ही चाहिए। परिस्थितियों का सामना करते समय, हमें परमेश्‍वर के समक्ष रहना चाहिए, सत्‍य की खोज करनी चाहिए और सत्‍य पर अमल करना चाहिए। जब हम यह सब करेंगे केवल तभी हमारे आध्‍यात्मिक जीवन सुदृढ़ होंगे। केवल तभी हमारे पास एक ऐसा मार्ग होगा जिस पर हम परिस्थितियों का सामना होने पर चल सकते हैं।

परमेश्‍वर के समक्ष रहना और परमेश्‍वर की सुरक्षा प्राप्‍त करना।

प्रभु यीशु ने कहा था: "क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है" (मत्ती 11:30)। प्रभु यह अपेक्षा करते हैं कि हम सहजता और मुक्‍त भाव से जीवन जी सकें। वे हमें लौकिक संसार के साथ बंध कर पीड़ा सहते हुए जीते नहीं देखना चाहते। तो ऐसा क्‍यों है कि हम कामकाज की थकान के कारण सभाओं में शिरकत करना नहीं चाहते? दरअसल, इस तरह के विचार शैतान से पैदा होते हैं। उनके भीतर शैतान की दुष्‍ट चालें समाहित होती हैं। परमेश्‍वर कहते हैं: "परमेश्वर इंसानों में जो करना चाहता है बिल्कुल उसे ही शैतान नष्ट करना चाहता है, और शैतान जो नष्ट करना चाहता है, वह बिल्कुल भी छुपे बिना मनुष्य के माध्यम से व्यक्त होता है। ...मानवजाति में शैतान का विध्वंस भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत होता है—वे अधिकाधिक भ्रष्ट हो रहे हैं तथा उनकी स्थिति नीचे और नीचे डूबती रही है। यदि यह पर्याप्त भयानक होती है, तो उन्हें शैतान के द्वारा कब्जे में लिया जा सकता है" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "पंद्रहवें कथन की व्याख्या" से लिया गया)। शैतान परमेश्‍वर का शत्रु है। वह हर तरह से परमेश्‍वर का विरोध करता है और वह अक्‍सर हमारी कमज़ोरियों को निशाना बनाकर उन पर हमला करता है। साथ ही, क्‍योंकि हम बहुत गहराई तक शैतान के द्वारा भ्रष्‍ट हो चुके हैं, हम शैतान के विष से भरे हुए हैं। हम धन-संपत्ति, प्रसिद्धि, हैसियत और दैहिक सुख, वगैरह की चाह रखते हैं। वह हमें दैहिक सुखों में मगन कर, शारीरिक लालसाओं में उलझाने का कारण बनता है। वह परमेश्‍वर के साथ हमारे सामान्‍य संबंधों में बाधा डालता है, और हमें परमेश्‍वर से दूर करता है और उनसे विश्‍वासघात कराता है। उसका अंतिम उद्देश्‍य हमें पूरी तरह निगल जाना है। अगर हम हमेशा ख़ुद से ही हार मान कर अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करें, तो हम परमेश्‍वर से अधिक-से-अधिक दूर होते जाएंगे। तब शैतान की योजना सफल हो जाएगी। हम सकारात्‍मक बातों को पसंद नहीं करते। यदि हम नियमित रूप से परमेश्‍वर से जुड़े न रहें, तो बहुत आसानी से हम शैतान के जाल में फँस कर, संसार के दुष्‍ट प्रचलनों का अनुसरण कर सकते हैं, इस हद तक स्‍वच्‍छंदता से व्‍यभिचार कर सकते हैं जिससे परमेश्‍वर के इरादों का उल्‍लंघन होता है और उनके मन में हमारे लिए घृणा पैदा हो सकती है। सभाएँ, परमेश्‍वर के साथ जुड़ने के लिए हमारे मौके हैं। वे परमेश्‍वर और हमारे बीच के फासले को समाप्‍त कर देती हैं और हमें अक्‍सर परमेश्‍वर के समक्ष रहने, परमेश्‍वर की परीक्षा को स्‍वीकार करने तथा उनकी देखभाल और सुरक्षा को पाने की गुंजाइश देती हैं। जब परमेश्‍वर के साथ हमारा संबंध सामान्‍य हो जाता है तो हमारी आत्‍माएं प्रखर हो जाती हैं और हम परमेश्‍वर की पसंद और नापसंद के विषयों में भेद कर पाते हैं। जब हालातों से हमारा सामना होता है, तो हम परमेश्‍वर के साथ खड़े हो पाते हैं, और अपनी भौतिक प्राथमिकताओं के पीछे जाकर ऐसा कुछ नहीं करते जो परमेश्‍वर के विपरीत हो या उनका विरोध करता हो। फलस्‍वरूप, हमें परमेश्‍वर का और अधिक आशीष प्राप्‍त होता है। इसलिए, परमेश्‍वर की स्वीकृति और उद्धार पाने के लिए कलीसिया का जीवन बहुत महत्‍वपूर्ण है। जब हमारी आस्‍था कमज़ोर हो और हमारी स्थिति असामान्‍य हो, हमें और अधिक परमेश्‍वर के समक्ष आना चाहिए, उनसे प्रार्थना करनी चाहिए और उन पर भरोसा करना चाहिए। हमें कलीसिया का जीवन नहीं छोड़ना चाहिए। साथ ही साथ, हमें परमेश्‍वर के सामने उन्‍हें संतुष्‍ट करने के लिए संकल्‍प करना चाहिए। जब हम परमेश्‍वर से इस प्रकार सहयोग करते हैं तो शैतान की युक्तियों का हम पर कोई असर न होगा और वह आतंकित होकर भाग जाएगा। एक बार परमेश्‍वर के साथ हमारा संबंध सामान्‍य हो जाए, तो सभाओं में शामिल होना हमें बाध्‍यता नहीं लगेगी। इसके विपरीत, सभाओं में शिरकत करना हमें परमेश्‍वर से जुड़ने और उनके प्रेम का आनंद लेने का एक मार्ग प्रतीत होगा।

परमेश्‍वर के मार्गदर्शन का धन्‍यवाद! बहन एन जिंग, आज की हमारी सहभागिता हम यहीं पर रोकते हैं। मुझे उम्‍मीद है कि जो समझ मैंने आपके साथ आज साझा की है वह आपके लिए लाभकर होगी। अगर आपके और कोई सवाल हैं, तो हम उन पर साथ मिलकर चर्चा कर सकते हैं।

आध्‍यात्मिक प्रश्‍नोत्‍तर।

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