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दस कुंवारियों के दृष्टान्त से प्रबोधन

बहन मु झेन,

आपको प्रभु में शांति मिले! आपका पत्र पाकर मैं बहुत खुश हूँ। आपने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि प्रभु के आगमन का दिन निकट है, आप स्वेच्छा से पवित्रशास्त्र पढ़ रही हैं, अधिक प्रार्थना भी कर रही हैं, और प्रभु के लिए अधिक कार्य कर रही हैं ताकि आप उन बुद्धिमान कुंवारियों में से एक हो सकें जो प्रभु के आगमन की सतर्कता से प्रतीक्षा करती हैं। हालाँकि, इन बातों ने आपकी आध्यात्मिक तीक्ष्णता को न तो तेज किया है, न ही प्रभु के प्रति आपके विश्वास या प्रेम को बढ़ाया है। आप इस बारे में भ्रमित हैं कि क्या इस तरह से तलाशने से आप एक बुद्धिमान कुंवारी के रूप में गिनी जा सकती हैं और यह जानना चाहती हैं कि प्रभु का स्वागत करने के लिए आपको किस प्रकार का अभ्यास करना चाहिए। बहन मु झेन, आपने जो प्रश्न उठाया है, वह इस बात के लिए महत्वपूर्ण है कि हम प्रभु का स्वागत कर सकते हैं या नहीं। हम सभी बुद्धिमान कुंवारी बनना चाहते हैं जो प्रभु की वापसी का स्वागत कर सकते हैं और उसके साथ स्वर्ग के राज्य के भोज में भाग ले सकते हैं—कोई भी मूर्ख कुंवारी नहीं बनना चाहता है जो प्रभु द्वारा अलग कर दी जाती है, लेकिन वास्तव में किस तरह का अभ्यास करना बुद्धिमान कुंवारी जैसा बनना है? मैं इस मुद्दे के बारे में अपनी व्यक्तिगत समझ साझा करना चाहती हूँ—मुझे उम्मीद है कि यह आपके लिए मददगार होगी।

प्रभु यीशु ने कहा है, "तब स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। उनमें पाँच मूर्ख और पाँच समझदार थीं। मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया; परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया" (मत्ती 25:1-4)। पवित्रशास्त्र से हम देख सकते हैं कि बुद्धिमान कुंवारी वे लोग हैं जो सतर्कता के साथ प्रभु के आने का इंतजार करते हैं, लगातार अपनी कुप्पी के लिए तेल तैयार करते हैं; वे अंततः प्रभु की वापसी का स्वागत करते हैं और स्वर्ग के राज्य के भोज में भाग लेते हैं। बहुत से भाई-बहन इस अंश को पढ़ते हैं और इसे इस तरह समझते हैं: पवित्रशास्त्र को अक्सर पढना, सतर्क होकर प्रार्थना करना, प्रभु के मार्ग पर चलना, खुद को प्रभु के काम में लगाना और सुसमाचार का प्रसार करना, यही तेल तैयार करना है। जो लोग इन सभी चीजों को करते हैं वे बुद्धिमान कुंवारी हैं और जब प्रभु लौटेंगे तो वे निश्चित रूप से प्रभु के साथ भोज में शामिल होंगे। लेकिन प्रभु वास्तव में जिन्हें बुद्धिमान कुंवारी के रूप में संदर्भित करते हैं, क्या वे सच में ऐसे ही हैं? आइए मुड़कर फरीसियों पर एक नज़र डालें—वे लगातार मसीहा के आने की उम्मीद कर रहे थे, और उनका स्वागत करने के लिए, वे न केवल पवित्रशास्त्र से बहुत परिचित थे और व्यवस्था और आज्ञाओं को बनाए रखते थे, बल्कि विश्वासियों के लिए अक्सर पवित्रशास्त्र की व्याख्या और प्रार्थना भी करते थे। वे पृथ्वी के अंतिम छोर तक यहोवा परमेश्वर के सुसमाचार को भी फैलाया करते थे। तो उस तरह की समझ के आधार पर, फरीसियों के क्रियाकलापों को बुद्धिमान कुंवारियों द्वारा तेल तैयार किये जाने के रूप में गिना जाना चाहिए, और उन्हें निश्चित रूप से मसीहा का स्वागत करने और परमेश्वर के उद्धार पाने में सक्षम होना चाहिए था। लेकिन क्या वाकई ऐसा ही था? जब प्रभु यीशु कार्य करने और बोलने के लिए देह बन गए, तब फरीसियों के दिल में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा की पूरी तरह कमी थी, यह देखकर भी कि उनके वचनों और कार्यों में सामर्थ्य और अधिकार हैं, वे परमेश्वर से आए हैं, उन्होंने खुले दिमाग से उनकी खोज और जांच नहीं की, बल्कि यह सोचकर अपनी-अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर अड़े रहे कि जो कोई मसीहा नहीं कहलाता वह प्रभु नहीं है। उन्होंने प्रभु के कार्यों और वचनों को उस समय के पवित्रशास्त्रों की सीमाओं के भीतर बांध दिया, प्रभु के कार्यों और वचनों की यह कहकर निंदा की कि वे पुराने नियम की सीमा के बाहर हैं, इस तरह उन्हें खारिज कर दिया। उन्होंने पागलपन के साथ अफवाहों को गढ़ा, कलंक लगाया, और प्रभु यीशु की ईशनिंदा की, अंत में उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर का अभिशाप और दंड अर्जित किया। फरीसियों के परमेश्वर के प्रतिरोध के तथ्यों से हम देख सकते हैं कि सिर्फ पवित्रशास्त्र पढ़ना, प्रार्थना में सतर्क रहना, प्रभु के मार्ग पर चलना, और प्रभु के लिए काम करना एक बुद्धिमान कुंवारी बनने के रूप में नहीं गिना जाता है।

तो आखिर बुद्धिमान कुंवारी होना क्या है? आइये बाइबल के एक अंश पर नज़र डालते हैं: "आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)। प्रभु के वचनों से हमें पता चलता है कि बुद्धिमान कुंवारियां वे लोग हैं जिनके दिल में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है और प्रभु के आगमन का स्वागत करने के मामले में, वे प्रभु की वाणी को सुनने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यदि वे सुनते हैं कि किसी ने गवाही दी है कि प्रभु वापस आ गये हैं, और कार्य कर रहे हैं और वचनों का उच्चारण कर रहे हैं, तो जो लोग बुद्धिमान कुंवारियाँ के समान हैं वे आँखें बंद करके फैसला नहीं करेंगे। इसके बजाय, वे इसकी सक्रिय रूप से तलाश और जाँच करेंगे, गंभीरता से इस पर विचार करेंगे, और इससे वे प्रभु की वाणी को पहचानने में, उनकी वापसी का स्वागत करने में, परमेश्वर के सिंहासन के आगे उठाये जाने में, और स्वर्ग के राज्य के भोज में भाग लेने में सक्षम होंगे। यह बाइबल में सामरी स्त्री की कहानी की तरह है। जब उसने प्रभु यीशु को यह कहते सुना, "क्योंकि तू पाँच पति कर चुकी है, और जिसके पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं। यह तू ने सच ही कहा है" (यूहन्ना 4:18)। उसने प्रभु के वचनों से पहचान लिया कि प्रभु यीशु मसीह हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानती थी कि केवल परमेश्वर ही सभी चीजों को स्पष्टता से समझ सकता है और उन रहस्यों को उजागर कर सकता है जिन्हें लोग छिपाते हैं—वे उस स्त्री के सभी कर्मों को सामने लाये, परमेश्वर के अलावा, किसी अन्य के पास उस प्रकार का अधिकार और सामर्थ्य नहीं है। इस तरह उसने प्रभु यीशु को मसीह के रूप में पहचाना और जाना कि वही वो मसीहा थे जो आने वाला था। जैसा कि बाइबल में लिखा है कि सामरी स्त्री ने भीड़ से कहा: "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिसने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया। कहीं यही तो मसीह नहीं है?" (यूहन्ना 4:29)। इससे हम यह देख सकते हैं कि सामरी स्त्री की बुद्धि परमेश्वर की वाणी को समझने की उसकी क्षमता में है। जब उसने सुना कि यह परमेश्वर की वाणी है, तो वह इसे स्वीकार करने में सक्षम हुई, और इस तरह प्रभु यीशु का उद्धार प्राप्त किया। बाइबल हमें दिखाती है कि पतरस, नतनएल और अन्य लोग भी प्रभु यीशु की कही गई बातों के माध्यम से परमेश्वर की वाणी को पहचानने में सक्षम हो गये थे, और उन्होंने तय किया कि प्रभु ही स्वयं परमेश्वर थे। यही कारण है कि प्रभु का पालन करने के लिए उन्होंने वो सब कुछ त्याग दिया जो उन्हें त्यागने की आवश्यकता थी—इस तरह का व्यक्ति एक बुद्धिमान कुंवारी है। हालाँकि, जो लोग फरीसियों की तरह ही घमंडी हैं, जो परमेश्वर की वाणी नहीं सुन सकते हैं, जो परमेश्वर की वाणी सुनते तो हैं, लेकिन उसकी तलाश नहीं करते हैं या उसे स्वीकार नहीं करते हैं, या जो सत्य से घृणा और उसे अस्वीकार तक कर देते हैं, वे सभी मूर्ख कुंवारियाँ हैं और प्रभु द्वारा उनका निकाला और हटाया जाना तय है।

अब हम इन तथ्यों से समझते हैं कि बुद्धिमान कुंवारी होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर की वाणी को सुनने में सक्षम होना—यही उन्हें बुद्धिमान बनाता है। प्रकाशितवाक्य अध्याय 2 और 3 में, "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" इसका उल्लेख कई बार किया गया है और प्रकाशितवाक्य 3:20 में लिखा है: "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ।" हम इन भविष्यवाणियों से देख सकते हैं कि अंत के दिनों में प्रभु अपनी वापसी पर अधिक वचनों को कहेंगे, इस कारण प्रभु के वचनों को ध्यान से सुनने में और उनकी वाणी को पहचानने में सक्षम होना बेहद जरूरी है। यह इस बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न से भी संबंधित है कि क्या हम प्रभु का स्वागत करने में सक्षम होंगे और उनके सिंहासन से समक्ष उठाये जा सकेंगे। तो फिर, हम परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचान सकते हैं? आइए हम परमेश्वर की वाणी को समझने के कई सिद्धांतों पर संगति करें।

1. परमेश्वर द्वारा कही गयी हर बात सत्य है। यह लोगों को वो पोषण दे सकता है जिनकी उन्हें ज़रूरत है, यह उन्हें अभ्यास का पथ भी दे सकता है

प्रभु यीशु कहते हैं, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)। और यूहन्ना के सुसमाचार के अध्याय 1 पद संख्या 1-2 में लिखा है, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।" इसके अतिरिक्त यूहन्ना 1:4 में लिखा है: "उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।" परमेश्वर स्वयं ही सत्य, मार्ग और जीवन है, और उनके द्वारा व्यक्त सभी वचन सत्य हैं। वे मानवजाति के लिए उनकी आवश्यकतानुसार भरण-पोषण और उन्हें अभ्यास का पथ प्रदान कर सकते हैं। व्यवस्था की युग पर नज़र डालने पर हम देखते हैं कि, तब मनुष्य यह नहीं समझ पाते थे कि जीवन क्या है, न ही उन्हें पता था कि परमेश्वर की आराधना कैसे करनी है। इसीलिए परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से आज्ञाएँ जारी कीं, ताकि लोग आज्ञाओं का पालन कर सकें, अपने जीवन में मार्गदर्शन पा सकें, और सीख सकें कि परमेश्वर की आराधना कैसे करनी है। जैसा कि दस आज्ञाओं में कहा गया है: "तेरा परमेश्‍वर यहोवा, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश में से निकाल लाया है, वह मैं हूँ। मुझे छोड़ दूसरों को परमेश्‍वर करके न मानना। ...तू उनको दण्डवत् न करना और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्‍वर यहोवा जलन रखनेवाला ईश्‍वर हूँ, और जो मुझसे बैर रखते हैं उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं उन हज़ारों पर करुणा किया करता हूँ" (व्यवस्थाविवरण 5:6-7, 9-10)। "तू हत्या न करना। तू व्यभिचार न करना। ...तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना। तू न किसी की पत्नी का लालच करना, और न किसी के घर का लालच करना, न उसके खेत का, न उसके दास का, न उसकी दासी का, न उसके बैल या गदहे का, न उसकी किसी और वस्तु का लालच करना" (व्यवस्था विवरण 5:17-18, 20-21)। व्यवस्थाओं और आज्ञाओं ने लोगों को बताया कि वे परमेश्वर द्वारा बनाए गए हैं और उन्हें उनकी आराधना करनी चाहिए; उन्होंने यह भी सीखा कि व्यवस्थाओं और आदेशों का उल्लंघन करना पाप है। परमेश्वर ने लोगों को यह भी बताया कि यदि पाप करने पर बलिदान कैसे चढ़ाना है, यह न करने पर उन्हें किस तरह की सजा मिलेगी। उस समय के लोगों को सत्य का भरण-पोषण प्राप्त हुआ और फिर उन्हें अभ्यास का एक विशिष्ट मार्ग मिला। लोगों के जीवन और व्यवहार अधिक से अधिक नियमित हो गए, वे उचित मानवता का जीवन जीने लगे। अनुग्रह के युग में जब प्रभु यीशु कार्य करने के लिए आये, तो उन्होंने उस समय के लोगों की जरूरतों को लक्षित करते हुए बहुत कुछ कहा, उन्हें पापस्वीकार और पश्चाताप करना, दूसरों को क्षमा करना और उनके प्रति सहिष्णु होना सिखाया, उन्हें प्रकाश और नमक बनना सिखाया। एक बार जब लोग सत्य समझ गए तो मुश्किलों का सामना करने पर उनके पास अभ्यास के नए पथ थे, इससे उन्हें अपने जीवन के लिए भरण-पोषण मिलता था—वे अब व्यवस्था द्वारा बंधे नहीं थे। उदाहरण के तौर पर, पतरस ने प्रभु यीशु से पूछा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" (मत्ती 18:21)। यीशु ने पतरस को उत्तर दिया, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक" (मत्ती 18:22)। यहाँ हम देख सकते हैं कि प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किये गये सभी वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं; वे लोगों की ज़रूरत के अनुसार पोषण देते हैं और उन्हें अभ्यास का मार्ग देते हैं। यह परमेश्वर के वचनों की एक विशिष्टता है।

2. परमेश्वर के सभी वचनों अधिकार और सामर्थ्य हो और वे उनके स्वभाव को अभिव्यक्त करते हैं

हम सभी जानते हैं कि शुरुआत में, परमेश्वर ने आकाश, पृथ्वी और सभी चीजों को बनाने के लिए वचनों का उपयोग किया था। जिस पल उसने कुछ कहा, वैसा ही हुआ, जैसा कि भजन संहिता 33:9 में लिखा है: "क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया।" पुराने नियम के युग में, परमेश्वर ने वादा किया था कि अब्राहम के वंशज आकाश में तारों और समुद्र के किनारे की रेत की तरह होंगे, और सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा कि परमेश्वर ने वादा किया था। यहाँ तक कि अब भी, अब्राहम के वंशज दुनिया के हर कोने में हैं, और परमेश्वर की कही हुई हर एक बात एक-एक करके पूरी हो गयी है। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के एक ही कथन द्वारा हवाओं और समुद्रों को शांत किया जा सकता था, और "हे लाज़र, निकल आ!" (यूहन्ना 11:43), इन वचनों से वह लाजर अपनी कब्र से बाहर चलकर आ गया, जो चार दिनों से मृत था। यह सब परमेश्वर के वचनों के अधिकार और प्रताप के कारण है। प्रभु यीशु ने यह भी कहा है, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा" (यूहन्ना 11:25-26)। "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है" (यूहन्ना 3:36)। "मैं तुम से सच कहता हूँ कि मनुष्यों की सन्तान के सब पाप और निन्दा जो वे करते हैं, क्षमा की जाएगी, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरुद्ध निन्दा करे, वह कभी भी क्षमा न किया जाएगा: वरन् वह अनन्त पाप का अपराधी ठहरता है" (मरकुस 3:28-29)। प्रभु यीशु के वचनों में सामर्थ्य और अधिकार है; वे लोगों के दिल और दिमाग को पूरी तरह से आश्वस्त करने में सक्षम हैं, और हम उनके भीतर परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं। परमेश्वर के वचन न केवल सभी चीजों को निर्देशित और उन पर शासन करते हैं, बल्कि वे हमें जीवन और सत्य प्रदान करने में सक्षम हैं। वे हमसे आशीर्वाद का भी वादा कर सकते हैं, वे उन सभी को शाप दे सकते हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका विरोध करते हैं। परमेश्वर के वचन हमें दिखाते हैं कि वह अपने पर विश्वास और उनसे प्रेम करने वालों के साथ दया और प्रेम से पेश आते हैं, जबकि जो लोग विद्रोही और उनके विपरीत हैं, वे उनके प्रताप और क्रोध को देखते हैं। हम परमेश्वर के धर्मी, अलंघनीय स्वभाव को देख सकते हैं—परमेश्वर के सभी वचन, उनके स्वभाव और स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं। इससे भी अधिक, वे सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार को लिए हुए हैं। यही कारण है कि, यह निर्धारित करने का प्रयास करते हुए कि कोई आवाज़ परमेश्वर की वाणी है या नहीं, हमें यह देखना चाहिए कि क्या उन शब्दों में सामर्थ्य और अधिकार हैं, क्या वे परमेश्वर के स्वभाव के साथ उनके स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।

3. परमेश्वर के वचन उनके प्रबन्धन कार्य के पीछे के रहस्यों को उजागर कर सकते हैं

प्रभु यीशु कहते हैं, "वैसा ही जगत के अन्त में होगा। मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करनेवालों को इकट्ठा करेंगे, और उन्हें आग के कुण्ड में डालेंगे, जहाँ रोना और दाँत पीसना होगा। उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य के समान चमकेंगे। जिसके कान हों वह सुन ले" (मत्ती 13:40-43)। "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। प्रभु यीशु ने हमें बताया कि दुनिया के अंत में, परमेश्वर अच्छाई को बुराई से अलग करने के लिए स्वर्गदूतों को भेजेंगे, सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार बाँटा जाएगा: गेहूं से जंगली पौधों को, बुरे नौकरों से अच्छे नौकरों को, मूर्ख कुंवारियों से बुद्धिमान कुंवारियों को अलग किया जायगा। केवल स्वर्गिक पिता के निर्देशों का पालन करने वाले ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। इसके अलावा, प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की है कि वह निश्चित रूप से वापस आयेंगे, अंत के दिनों में मनुष्य का पुत्र न्याय का काम करेगा और आपदा से पहले विजेताओं का एक समूह बनायेगा। उन्होंने बताया कि परमेश्वर का निवास मानवों के बीच है, और मसीह का राज प्रकट होगा। ये सभी रहस्य ऐसी चीजें हैं जो मनुष्य होने के नाते हममें से कोई भी नहीं जानता है, न ही हम में से कोई भी उन्हें समझाने में सक्षम होता, तो प्रभु यीशु ने ये बातें क्यों कहीं? इसका कारण यह है कि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर हैं—वह स्वर्ग के परमेश्वर हैं, और केवल परमेश्वर ही जानते हैं कि किस प्रकार के लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, परमेश्वर अंत के दिनों में कैसे कार्य करते हैं, और मानवजाति की मंज़िल और परिणाम क्या होगा। केवल परमेश्वर द्वारा कही गयी बातें ही परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के रहस्यों को प्रकट कर सकती हैं। प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। यह स्पष्ट है कि जब प्रभु लौटेंगे तो वह उन सभी सत्य को कहेंगे, जिनकी मनुष्य होने के नाते हमें आवश्यकता है और मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन योजना के रहस्यों को खुले तौर पर प्रकट करेंगे। बुद्धिमान कुंवारियों के पास एक दिल और एक आत्मा होती है, और जब वे परमेश्वर के वचनों को सुनती हैं, तो वे निश्चित रूप से उन शब्दों से उनकी वाणी को पहचान लेंगी।

4. परमेश्वर के वचन मनुष्यों की भ्रष्टता और अंदरूनी विचारों को प्रकाश में लाते हैं

मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया है और वे उसकर दिल गहनतम गहराइयों को जानते हैं। हमारे दिल के बिल्कुल भीतर के विचारों की नाड़ी पर उनकी उँगलियाँ हैं—शैतान द्वारा हमारी भ्रष्टता को केवल परमेश्वर के वचन उजागर कर सकते हैं और हमारे दिल की गहराइयों में छिपी भ्रष्टता को प्रकाश में ला सकते हैं। यह कुछ ऐसा है जो कोई मनुष्य नहीं कर सकता है। ठीक जैसा की प्रभु यीशु ने कहा, "जो मनुष्य में से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरे बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्‍टता, छल, लुचपन, कुदृष्‍टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती हैं। ये सब बुरी बातें भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं" (मरकुस 7:20-23)। शैतान द्वारा भ्रष्ट होने के बाद हमने अपने अहंकार, कुटिलता, छल, स्वार्थ, घृणात्मकता, बुराई, लालच पर, अपने शब्दों, कामों, और क्रियाओं में अन्य शैतानी स्वभावों पर और दूसरों के साथ बातचीत पर भरोसा करना शुरू कर दिया। जब किसी और के शब्द या काम हमारे स्वयं के चेहरे, स्थिति, या हितों पर चोट करने लगते हैं, तो हम साज़िश करने में लग जाते हैं, हम ईर्ष्यालु और झगड़ालू हो जाते हैं, यहाँ तक कि हम उस व्यक्ति से नफरत भी करने लगते हैं। अगर हम लंबे समय तक चीजों को त्यागते हैं, अपने आप को प्रभु के लिए खपाते हैं और उनके लिए कड़ी मेहनत करते हैं, तो हम महसूस करना शुरू कर देते हैं कि हम अब कुछ लाभ उठा सकते हैं। हम परमेश्वर से पुरस्कार और आशीष मांगना शुरू कर देते हैं, और महसूस करते हैं कि यह कुछ ऐसा है जिसके हम हकदार हैं। जब कोई चीज हमारी धारणाओं के विपरीत होती है (जैसे कि घर में आर्थिक परेशानी, जीवन में दुर्भाग्य, आपदाएं या विपत्तियां) तब भी हम परमेश्वर को गलत समझते हैं और दोष देते हैं। कभी-कभी हम उनका खंडन या विरोध भी करते हैं। यदि परमेश्वर इन भ्रष्टाचारों और विद्रोहों को उजागर नहीं करते, तो हम स्वयं को जानने में पूरी तरह से असमर्थ रहते, हम अभी भी यह मानते हुए अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के भीतर जीते रहते कि हमारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं। क्या यह स्वयं और दूसरों को मूर्ख बनाना और खुद को गुमराह करना नहीं होगा? प्रभु यीशु ने हमारे सभी भ्रष्टाचारों का खुलासा किया, एकमात्र इसी के द्वारा हमने अपने स्वयं के शैतानी स्वभावों की सही समझ प्राप्त की है, और शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने का सच देखा है। केवल इसी माध्यम से हम अपने भ्रष्ट स्वभावों को निकाल फेंकने में बेहतर ढंग से समर्थ हुए हैं।

और तो और, परमेश्वर के वचन प्रकाश हैं। जो कुछ भी अंधकार और बुराई है, वह परमेश्वर के वचनों के प्रकाश से प्रकट होगा, और शैतान की सभी चालें भी उनके वचनों के माध्यम से सामने आती हैं। फरीसियों की तरह ही, जो यहूदी विश्वासियों की नज़र में परमेश्वर की भक्ति करने वाले नज़र आते थे—लेकिन प्रभु यीशु उनके प्रेम के स्वभाव और सार को देख सकते थे जो कि अधर्मी था और सत्य से घृणा करने वाला था। उन्होंने यह कहते हुए उन लोगों को उजागर किया, "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं" (मत्ती 23:27)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो" (मत्ती 23:15)। केवल प्रभु यीशु के वचनों के प्रकटन के माध्यम से ही हम यह महसूस करने में सक्षम हुए कि इंसान होने के नाते, हम केवल दूसरों के बाहरी दिखावे को देख सकते हैं, लेकिन परमेश्वर हमारे दिलों की गहराई में देख सकते हैं। वह हमारी प्रकृति और सार में देख सकते हैं; वह देख सकते हैं कि किसके पास सच्चा विश्वास है, कौन सिर्फ तृप्ति चाहता है, और कौन सत्य से घृणा करता है। परमेश्वर को इन सबकी समझ है। परमेश्वर के वचनों से जो उजागर होता है उससे ही हम फरीसियों की प्रकृति, पाखंडी होने और परमेश्वर के शत्रु होने के सार पर सच्चा विवेक प्राप्त कर सकते हैं।

परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता के कथन हैं। वे सत्य, मार्ग और जीवन की अभिव्यक्तियाँ हैं और वे हमें वह सब प्रदान कर सकते हैं जिसकी हमें ज़रूरत है। वे हमारी सभी कठिनाइयों और समस्याओं को हल कर सकते हैं, हमें अभ्यास का मार्ग दिखा सकते हैं। परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य और अधिकार होते हैं, वे सभी रहस्यों को खोल सकते हैं। वे मनुष्य के भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं, वे मनुष्य के अधर्म का न्याय करते हैं और हमें बुराई से बचाते हैं। ये सभी अद्वितीय विशेषताएं हैं जो केवल परमेश्वर के वचन ही धारण करते हैं। जब हम अन्य आवाज़ों से परमेश्वर की वाणी में अंतर बताने के सिद्धांतों को समझ लेते हैं, तो जब हम परमेश्वर के कथनों को सुनेंगे तो हम इसे अपनी आत्मा के भीतर महसूस कर पाएंगे। हम यह देख पाएंगे कि परमेश्वर के वचन ऐसी चीजें हैं जो कोई भी इंसान नहीं कह सकता है और उनके भीतर ऐसे रहस्य हैं जो लोग अपने आप नहीं समझ सकते हैं। जब हमारे पास इस तरह की भावना होती है, तो हमें परमेश्वर के वचन को ध्यान से देखना चाहिए, गंभीरता से खोजना, जांचना चाहिए। जब हम यह निर्धारित कर लेते हैं कि यह परमेश्वर की वाणी है, सत्य की अभिव्यक्ति है, हमें इसे स्वीकार करना चाहिए और इसे समर्पित होना चाहिए। यह बुद्धिमान कुंवारी बनने का एकमात्र तरीका है, यह वो एकमात्र तरीका है जिससे हम प्रभु की वापसी का स्वागत कर पाएंगे।

सिस्टर मु झेन, मुझे आशा है कि यह संगति आपके लिए मददगार रही है, और मुझे आशा है कि हम सभी बुद्धिमान कुंवारियाँ बन सकें जो बहुत सावधानी से लौटे हुए प्रभु की वाणी की तलाश करती और सुनने का प्रयास करती हैं। इस तरह हम जल्द से जल्द प्रभु का स्वागत कर सकते हैं और उनके साथ भोज में शामिल हो सकते हैं!

प्रभु के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता का धन्यवाद!

सिएन

24 मई, 2018

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