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प्रश्न 27: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?

2018-03-20 102

उत्तर:

बहुत से लोगों का विश्वास है कि बाइबल प्रभु की प्रतिनिधि है, परमेश्वर की प्रतिनिधि है और प्रभु में विश्वास करने का अर्थ बाइबल में विश्वास करना है, और बाइबल में विश्वास करना प्रभु में विश्वास करने के समान है। वे बाइबल को परमेश्वर के समान दर्जा देते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो परमेश्वर को नहीं मानते पर बाइबल को मानते हैं। वे बाइबल को सर्वोच्च मानते हैं और परमेश्वर के स्थान पर बाइबल को रखने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे धार्मिक नेता भी हैं जो मसीह को नहीं मानते पर बाइबल को मानते हैं, और दावा करते हैं कि प्रभु के दूसरे अवतरण का उपदेश देने वाले लोग पाखंडी और विधर्मी हैं। यहां ठीक-ठीक मुद्दा क्या है? यह स्पष्ट है, कि धार्मिक विश्व ऐसे बिंदु तक धंस गया है जहां वे केवल बाइबल को ही मानते हैं और प्रभु के लौटने पर विश्वास नहीं करते—उन्हें कोई नहीं बचा सकता। इससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि धार्मिक विश्व यीशु-विरोधियों का ऐसा समूह बन चुका है जो परमेश्वर का विरोध करता है और परमेश्वर को अपना शत्रु मानता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कई धार्मिक नेता पाखंडी फारसी हैं। विशेष रूप से वे जो यह दावा करते हैं कि "प्रभु के दूसरे अवतरण का उपदेश देने वाले लोग पाखंडी और विधर्मी हैं," वे सभी मसीह-विरोधी और अविश्वासी हैं। लगता है कि बहुत से लोग जानते ही नहीं कि परमेश्वर में विश्वास रखने का सही अर्थ क्या है। वे इस अस्पष्ट परमेश्वर में अपने विश्वास को परंपरावादी पंथ कहते हैं और परमेश्वर के स्थान पर बाइबल तक में विश्वास करते हैं। यहां तक कि वे अंत के दिनों के मसीह के देहधारण को भी नहीं मानते और उनकी निंदा करते हैं। वे मसीह की बताई किसी भी सच्चाई को अनदेखा और नज़रंदाज़ कर देते हैं। यहां समस्या क्या है? यह काफ़ी गहरा प्रश्न है। जिन दिनों में प्रभु यीशु अपना काम कर रहे थे, यहूदियों का रवैया भी बिल्कुल ऐसा ही था। अपना कार्य करने के लिए मसीह के प्रकट होने से पहले, उनकी आस्था बाइबल पर थी। कोई नहीं कह सकता था कि किसकी आस्था सच्ची थी और किसकी झूठी, और निश्चय ही कोई नहीं बता सकता था कि कौन वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर रहा था और कौन उनका विरोध कर रहा था। ऐसा क्यों हुआ कि जब प्रभु यीशु देहधारी हुए और अपना कार्य किया, हर इंसान का खुलासा हो गया? इसी में परमेश्वर का सर्वशक्तिमान होना तथा उनकी बुद्धिमत्ता स्थित है। जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, प्रकट होते हैं और अपना कार्य करते हैं, तो बुद्धिमान कुँवारियाँ उनकी वाणी सुनती हैं और परमेश्वर के पदचिह्न का करीब से अनुसरण करती हैं इस प्रकार, स्वाभाविक रूप से, उन्हें परमेश्वर के सिंहासन के सामने लाया जाता है। जहाँ तक मूर्ख कुँवारियों का प्रश्न है, क्योंकि वे बाइबल पर जोर देते हैं और पहचान नहीं पाते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह ही वास्तव में परमेश्वर हैं, वे इस प्रकार प्रकट होते हैं और त्यागे जाते हैं। अभी के लिये वे अपने तथाकथित विश्वास से अभी भी चिपके हुए हैं, किंतु जब बड़ी आपदाएँ आएँगी, तो वे बिलखते और दाँत पीसते हुए समाप्त हो जाएँगे। इससे हम देख सकते हैं, कि जो केवल बाइबल से चिपक कर रहते हैं और सत्य को स्वीकार करने में असफल रहते हैं, जो केवल परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन देहधारी मसीह को स्वीकार करने में असफल रहते हैं वे सब अविश्वासी हैं और परमेश्वर के द्वारा निश्चित रूप से हटा दिये जाएँगे। यही सत्य है। आइए देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर इसके बारे में क्या कहते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "उस समय से जब बाइबल थी, प्रभु के प्रति लोगों का विश्वास, बाइबल के प्रति विश्वास रहा है। यह कहने के बजाए कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने की अपेक्षा की उन्होंने बाइबल पढ़नी आरम्भ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरम्भ कर दिया है; और यह कहने की अपेक्षा कि वे प्रभु के सामने वापस आ गए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने वापस आ गए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो कि यह परमेश्वर है, मानो कि यह उनका जीवन रक्त है और इसे खोना अपने जीवन को खोने के समान होगा। लोग बाइबल को परमेश्वर के समान ही ऊँचा देखते हैं, और यहाँ तक कुछ ऐसे भी हैं जो इसे परमेश्वर से भी ऊँचा देखते हैं। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बिना हैं, यदि वे परमेश्वर का एहसास नहीं कर सकते हैं, तो वे जीवन जीते रह सकते हैं—परंतु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों और कथनों को खो देते हैं, तो यह ऐसा है मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (1)")।

"उनके लिये मेरे अस्तित्व का दायरा मात्र बाइबल तक ही सीमित है। उनके लिए, मैं बस बाइबल के समान ही हूँ; बाइबल के बिना मैं भी नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल भी नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाओं पर कोई भी ध्यान नहीं देते, परन्तु इसके बजाय, पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर बहुत अधिक और विशेष ध्यान देते हैं, और उनमें से कई एक तो यहाँ तक मानते हैं कि मुझे मेरी चाहत के अनुसार, ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जब तक वह पवित्रशास्त्र के द्वारा पहले से बताया गया न हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत अधिक महत्वपूर्ण तरीकों से देखते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूं उसकी तुलना बाइबल की आयतों के साथ करते हैं, और उसका उपयोग मुझे दोषी ठहराने के लिए करते हैं। वे जिसकी खोज कर रहे हैं वह मेरे अनुकूल होने का रास्ता या ढंग नहीं है, या सत्य के अनुकूल होने का रास्ता नहीं है, बल्कि बाइबल के वचनों की अनुकूलता में होने का रास्ता है, और वे विश्वास करते हैं कि कोई भी बात जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के अनुकूल होने के मार्ग की खोज नहीं की? उनमें पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का जुनून सवार हो गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और कार्य की विधियों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। ये वे लोग नहीं थे जो सत्य को खोज रहे थे, बल्कि ये वे लोग थे जो कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों का पालन करते थे; ये वे लोग नहीं थे जो सत्य की खोज करते थे, बल्कि ये वे लोग थे जो बाइबल में विश्वास करते थे। दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे?

"और आज के लोगों के विषय में क्या कहें? मसीह सत्य को बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चय ही स्वर्ग में प्रवेश प्राप्त करने और अनुग्रह को पाने के लिए उसे मनुष्य के मध्य में से बाहर निकाल देंगे। वे निश्चय ही बाइबल के हितों की सुरक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को भी नकार देंगे, और निश्चय ही वापस देह में लौटे मसीह को बाइबल के अस्तित्व को अनंतकाल तक सुनिश्चित करने के लिए फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। कैसे मनुष्य मेरे उद्धार को ग्रहण कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है, और मेरे प्रति उसका स्वभाव ही इतना विरोध से भरा है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए")।

प्रभु में विश्वास रखने का मतलब क्या है? बाइबल में विश्वास करने का अर्थ क्या है? बाइबल और प्रभु के बीच क्या संबंध है? पहले कौन आया, बाइबल या प्रभु? तो फिर वह कौन है जो उद्धार का कार्य करता है? क्या बाइबल प्रभु के द्वारा किये जाने वाले कार्य की जगह ले सकती है? क्या बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व कर सकती है? यदि हम बाइबल पर अंधा विश्वास करें और बाइबल की आराधना करें, तो क्या इसका मतलब यह है कि हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उनकी आराधना करते हैं? क्या बाइबल का अनुसरण करना परमेश्वर के वचन का अभ्यास करने और अनुभव करने समान है? क्या बाइबल का अनुसरण करने का आवश्यक रूप से यही मतलब है कि हम प्रभु का अनुसरण कर रहे हैं? इसलिए यदि हम बाइबल को हर चीज के पहले रखें, तो क्या इसका मतलब यह है कि हम प्रभु को महान मानकर उनकी आराधना करते हैं, कि हम प्रभु का आदर करते हैं और उनके प्रति आज्ञाकारी हैं? कोई भी इन मुद्दों के सत्य को नहीं देखता है। हजारों सालों तक, लोग बाइबल की अंधवत् आराधना करते आ रहे हैं और बाइबल को वही दर्जा दे रहे हैं जो वे प्रभु को देते हैं। कुछ लोग तो बाइबल का उपयोग प्रभु और उनके कार्यों के बदले में भी लेते हैं, लेकिन कोई भी प्रभु को सच में नहीं जानता और उनके प्रति आज्ञाकारी नहीं है। बाइबिल का अनुसरण करने के कारण ही, फरीसियों ने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। मुद्दा क्या था? क्या बाइबल को समझने का मतलब परमेश्वर को जानना है? क्या बाइबल का अनुसरण करने का मतलब परमेश्वर का अनुसरण करना है? फरीसी बाइबल की टीकाओं के विशेषज्ञ थे, लेकिन परमेश्वर को नहीं जानते थे। इसके बजाय, उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया जिन्होंने सत्य व्यक्त किया और छुटकारा दिलाने का कार्य किया। क्या यह एक तथ्य नहीं है? वास्तव में परमेश्वर को सच में जानने का मतलब क्या है? क्या सिर्फ बाइबल की व्याख्या करने और बाइबल के ज्ञान को समझने में सक्षम होना ही परमेश्वर को जानने के रूप में अर्हता प्राप्त करना है? यदि यही मसला है, तो फरीसियों ने क्यों प्रभु यीशु की निंदा की और उनका विरोध किया जबकि उसी समय उन्होंने बाइबल की व्याख्या भी की? इस बात की कुंजी कि क्या कोई सच में परमेश्वर को जानकर उनकी आज्ञा का पालन कर पाता है यह है कि क्या वह देहधारी मसीह को जानता और उनकी आज्ञा का पालन करता है या नहीं। समस्त मानवजाति पर देहधारी परमेश्वर प्रकट होते हैं, यही वह है जिसे अधिकांश लोग महसूस करने में असफल रहते हैं। फरीसियों पर प्रभु यीशु का श्राप इस तथ्य का एक प्रमाण है कि परमेश्वर धार्मिकता के साथ हर किसी के साथ व्यवहार करता है। जैसा की स्पष्ट है, यदि हम प्रभु की आज्ञा पालन और उनकी आराधना नहीं करते हैं बल्कि केवल बाइबल में अंधविश्वास करते हैं और उसकी उपासना करते हैं तो हमें ईश्वर का अनुमोदन नहीं मिलेगा है। यदि किसी व्यक्ति का विश्वास पूरी तरह से बाइबल के पालन में हो और उसके दिलों में प्रभु के लिए कोई स्थान नहीं हो, यदि वो प्रभु को महान मान कर उनकी आराधना नहीं कर सकता हो और उनके वचनों का अभ्यास नहीं कर सकता हो, यदि वो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन को स्वीकार करने और उसका पालन करने में असमर्थ हो, तो क्या ऐसा मनुष्य एक पाखंडी फरीसी नहीं है? क्या ऐसा मनुष्य मसीह विरोधी नहीं है, एक ऐसा मनुष्य नहीं है जिसने यीशु को अपना दुश्मन बना लिया है? इसलिए, यदि हम केवल बाइबल से चिपका रहते हैं, तो इसका निश्चित रूप से यह मतलब नहीं है कि हमने सत्य और जीवन को पा लिया है। बाइबल का अंधवत् अनुसरण और आराधना करना गलत है, ऐसा करके निश्चित रूप से किसी को भी प्रभु का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। देहधारी परमेश्वर सत्य व्यक्त करते हैं हम मनुष्यों को शुद्ध करने, बचाने और शैतान के प्रभाव से मुक्त करने के लिए ताकि हम परमेश्वर की आज्ञापालन कर सकें, उनकी आराधना कर सकें और अंत में परमेश्वर द्वारा जीत लिये जा सकें। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य व अर्थ है। हमारे विश्वास की कुंजी सत्य को तलाशना, और प्रभु के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है। केवल इसी प्रकार हम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करेंगे और परमेश्वर को जानेंगे। तब, हम प्रभु पर श्रद्धा रखने और प्रभु को अपने दिलों में महिमामंडित करने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, हमें उन पर सच्चा विश्वास होगा और सच्चाई से उनकी आज्ञा का पालन करेंगे। यही प्रभु में विश्वास करने का सच्चा अर्थ है। केवल इसी तरह से विश्वास का अभ्यास करके हमें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त होगा। इससे, हर कोई साफ-साफ देखता है कि बाइबल में विश्वास करना परमेश्वर में विश्वास करने के समान नहीं है। तो परमेश्वर और बाइबल के बीच क्या संबंध है? इस प्रश्न के संदर्भ में, प्रभु यीशु ने स्पष्ट कहा है। कृपया यूहन्ना के सुसमाचार अध्याय 5 पद 39-40 पर जाएँ: "तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।" प्रभु यीशु के वचनों से, यह बहुत स्पष्ट है कि बाइबल परमेश्वर की केवल एक गवाही है, वह अतीत में किए गए परमेश्वर के कार्य का अभिलेख मात्र है। बाइबिल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, क्योंकि बाइबल में परमेश्वर के वचनों और कार्य का सीमित वृतांत है। परमेश्वर के वचनों और कार्य का सीमित वृतांत परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? परमेश्वर सृष्टिकर्ता है जो सब कुछ भरता है, वह सभी चीजों का स्वामी है। परमेश्वर का जीवन असीम और अक्षय है। मनुष्य कभी परमेश्वर की विपुलता और महानता की थाह नहीं ले सकता है। और बाइबल में पाए जाने वाले परमेश्वर के वचनों और कार्य का सीमित अभिलेख परमेश्वर के जीवन के विशाल समुद्र की एक केवल बूंद है। बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकती है? बाइबल परमेश्वर के बराबर कैसे हो सकती है? परमेश्वर मनुष्य को बचाने का कार्य कर सकते हैं, क्या बाइबल मनुष्य को बचाने के लिए कार्य कर सकती है? परमेश्वर सत्य व्यक्त कर सकते हैं, क्या बाइबल ऐसा कर सकती है? परमेश्वर किसी भी समय मनुष्य को प्रबुद्धता दे सकते हैं, ज्योतिर्मय कर सकते हैं, और उसका मार्गदर्शन कर सकते हैं, क्या बाइबल ऐसा कर सकती है? बिल्कुल नहीं! तो, बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है। कुछ लोग बाइबल को परमेश्वर के बराबर रखते हैं और सोचते हैं कि बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है। क्या यह परमेश्वर के महत्व को कम करना और ईशनिंदा नहीं है? यदि हम परमेश्वर के कार्य के स्थान पर बाइबल का उपयोग करते हैं, तो यह परमेश्वर को इनकार करना और उनसे विश्वासघात है। परमेश्वर परमेश्वर हैं, बाइबल बाइबल है। बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है, ना ही वह परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकती है। बाइबल परमेश्वर के कार्य का अभिलेख मात्र है। बाइबल के अंदर परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे परमेश्वर के जीवन स्वभाव की अभिव्यक्ति हैं, और परमेश्वर की इच्छा दर्शा सकते हैं। लेकिन परमेश्वर के कार्य का हर चरण केवल उस युग के दौरान मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपेक्षा और इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। वे अन्य युगों में परमेश्वर के वचनों और कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। क्या अब आप सभी इस पर स्पष्ट हैं?

बाइबल के अंदर की कहानी के संबंध में, मुझे लगता है कि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर से कुछ अंश को देख सकते हैं। "बाइबल की सच्चाई को कोई नहीं जानता हैः कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख, और परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और तुम्हें परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों की कोई समझ नहीं देता है। जिस किसी ने भी बाइबल को पढ़ा है वह जानता है कि यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को प्रलेखित करता है। पुराना विधान इस्राएल के इतिहास और सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के अंत तक यहोवा के कार्य का कालक्रम से अभिलेखन करता है। नया विधान पृथ्वी पर यीशु के कार्य को, जो चार सुसमाचारों में है, और साथ की पौलुस के कार्य को भी अभिलिखित करता है; क्या वे ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (4)")।

"उस से पहले, इस्राएल के लोग केवल पुराना नियम ही पढ़ते थे। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग की शुरुआत में लोग पुराना नियम पढ़ते थे। नया नियम केवल अनुग्रह के युग के दौरान ही प्रकट हुआ था। जब यीशु काम करता था तब नया नियम मौजूद नहीं था; उसके पुनरूत्थान और स्वर्गारोहण के बाद ही लोगों ने उसके कार्य को दर्ज किया या लिखा था। केवल तब ही सुसमाचार की चार पुस्तकें...। जो कुछ उन्होंने दर्ज किया है, ऐसा कहा जा सकता है, वह उनकी शिक्षा और उनकी मानवीय योग्यता के स्तर के अनुसार था। जो कुछ उन्होंने दर्ज किया था वे मनुष्यों के अनुभव थे, और प्रत्येक के पास दर्ज करने या लिखने और जानने के लिए अपने स्वयं के माध्यम थे, और प्रत्येक का लिखित दस्तावेज़ अलग था। इस प्रकार, यदि तुम परमेश्वर के रूप में बाइबल की आराधना करते हो तो तुम बहुत ही ज़्यादा नासमझ और मूर्ख हो। तुम आज के लिए परमेश्वर के वचनों को क्यों नहीं खोजते हो? केवल परमेश्वर का कार्य ही मनुष्य को बचा सकता है। बाइबल मनुष्य को बचा नहीं सकती है, वे हज़ारों सालों तक इसे पढ़ सकते हैं और फिर भी उनमें ज़रा सा भी परिवर्तन नहीं होगा, और यदि तुम बाइबल की आराधना करते हो तो तुम पवित्र आत्मा के कार्य को कभी प्राप्त नहीं करोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (3)")।

"लोग धुन और विश्वास के साथ बाइबल के समीप जाते हैं, और बाइबल की भीतरी कहानी या सार के बारे में कोई भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकता है। इसलिए आज, जब बाइबल की बात आती है तो लोगों के पास अभी भी जादुईगिरी का एक अवर्णनीय एहसास है; और उस से भी बढ़कर, वे उससे बुरी तरह से ग्रस्त हैं, और उस पर विश्वास करते हैं। आज, हर कोई बाइबल में अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणियों का पता लगाना चाहता है, वह यह खोज करना चाहता है कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर क्या कार्य करता है, और अंत के दिनों के क्या लक्षण हैं। इस तरह से, बाइबल की उनकी आराधना और उत्कट हो जाती है, और यह जितना ज़्यादा अंत के दिनों के नज़दीक आती है, उतना ही ज़्यादा वे बाइबल की भविष्यवाणियों को विश्वसनीयता देने लगते हैं, विशेषकर उनको जो अंत के दिनों के बारे में हैं। बाइबल में ऐसे अन्धे विश्वास के साथ, बाइबल में ऐसे भरोसे के साथ, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की कोई इच्छा नहीं होती है। अपनी अवधारणाओं के अनुसार, लोग सोचते हैं कि केवल बाइबल ही पवित्र आत्मा के कार्य को ला सकती है; केवल बाइबल में ही वे परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं; केवल बाइबल में ही परमेश्वर के कार्य के रहस्य छिपे हुए हैं; केवल बाइबल—न कि अन्य पुस्तकें या लोग—परमेश्वर के बारे में हर बात को और उनके कार्य की सम्पूर्णता को स्पष्ट कर सकती है; बाइबल स्वर्ग के कार्य को पृथ्वी पर ला सकती है; और बाइबल युगों का आरंभ और अंत दोनों कर सकती है। इन अवधारणाओं के साथ, लोगों का पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की ओर कोई झुकाव नहीं होता है। अतः इस बात की परवाह किए बिना कि अतीत में बाइबल लोगों के लिए कितनी मददगार थी, यह परमेश्वर के नवीनतम कार्य के लिए एक बाधा बन गई है। बाइबल के बिना, लोग अन्य स्थानों पर परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं, फिर भी आज, उसके कदमों को बाइबल के द्वारा 'रोक लिया' गया है, और उसके नवीनतम कार्य को बढ़ाना दोगुना कठिन, और एक मुश्किल संघर्ष बन गया है। यह सब बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों एवं कथनों, और साथ ही बाइबल की विभिन्न भविष्यवाणियों की वजह से है। बाइबल लोगों के मनों में एक आदर्श बन चुकी है, यह उनके मस्तिष्कों में एक पहेली बन चुकी है, वे मात्र यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि परमेश्वर बाइबल से अलग भी काम कर सकता है, वे यह विश्वास करने में बिल्कुल असमर्थ हैं कि लोग बाइबल के बाहर भी परमेश्वर को पा सकते हैं, और वे यह बिलकुल भी विश्वास करने में सक्षम नहीं हैं कि परमेश्वर अंतिम कार्य के दौरान बाइबल से दूर जा सकता है और एक नए सिरे से शुरू कर सकता है। यह लोगों के लिए अकल्पनीय है; वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते हैं, और न ही वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। लोगों द्वारा परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में बाइबल एक बहुत बड़ी बाधा बन चुकी है, और इसने परमेश्वर के लिए इस नए कार्य का विस्तार करना कठिन बना दिया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (1)")।

"आख़िरकार, कौन बड़ा हैः परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुसार क्यों होना चहिए? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे बढ़ने का कोई अधिकार नहीं है? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता है और अन्य काम नहीं कर सकता है? यीशु और उनके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त का पालन करना होता और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना होता, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाए उसने पाँव धोए, सिर को ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पीया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं से अनुपस्थित नहीं हैं? यदि यीशु पुराने विधान का सम्मान करता, तो उसने इन सिद्धांतो का विरोध क्यों किया? तुम्हें जानना चाहिए कि पहले कौन आया था, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (1)")।

इस संदर्भ में सत्य को ढूँढ़ना और खोजना कि क्या बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है और बाइबल तथा परमेश्वर के बीच क्या संबंध है अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले हमें जानना चाहिए: परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है? जैसा कि हम सब जानते हैं, परमेश्वर सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है, सभी चीजों का शासक है। परमेश्वर वह है जो वो है, और असीम रुप से सर्वशक्तिशाली और बुद्धिमान है। केवल परमेश्वर ही मानवजाति को बचा सकता है और उसका मार्गदर्शन कर सकता है। केवल परमेश्वर ही मानवजाति का भाग्य निर्धारित कर सकता है। यह एक व्यापक रूप से अभिस्वीकृत तथ्य है। बाइबल कैसे बनी थी? जब परमेश्वर ने अपना कार्य पूरा कर लिया, तो उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए मनुष्यों ने अपनी गवाहियाँ और अनुभव लिखे, और ये गवाहियाँ और अनुभव बाद में बाइबल बनाने के लिए संकलित किए गए। यही सत्य है। इसी कारण से हम पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि बाइबल केवल परमेश्वर के अतीत में किए गए कार्य का अभिलेख मात्र है, यह परमेश्वर के कार्य की गवाही से अधिक कुछ नहीं है। बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है, और ना ही वह मनुष्य को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर का स्थान ले सकती है। यदि हमारा विश्वास केवल बाइबल पढ़ने पर ही आधारित है न कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने पर, तो हमें कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं होगा और बचाया नहीं जाएगा। क्योंकि परमेश्वर का उद्धार कार्य वर्तमान में चल रही गतिविधि है। इसलिए, हमें परमेश्वर के कार्य के एक या दो चरणों पर असामान्य रूप से आसक्त नहीं होना चाहिए। हमें परमेश्वर के कार्य के पदचिन्हों का तब तक पालन करना चाहिए जब तक कि परमेश्वर मनुष्य जाति को बचाने के अपने कार्य को पूरा न कर लें। केवल इसी तरह से शायद हमें ईश्वर के द्वारा पूर्ण उद्धार प्राप्त हो सके और हम अपनी सुखद मंज़िल में प्रवेश कर सकें। परमेश्वर की प्रबंधकारणीय योजना में कार्य के तीन चरण शामिल हैं: व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग, और राज्य के युग का कार्य। व्यवस्था का युग वह युग था जब परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्थाओं का उपयोग किया था। अनुग्रह का युग तब था जब परमेश्वर ने मानवजाति पर छुटकारा दिलाने का कार्य किया। प्रभु यीशु को सूली पर लटकाया गया था ताकि मानवजाति को शैतान की प्रभुता के क्षेत्र से छुटकारा दिलाया जाए, उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा किया जाए, और उन्हें परमेश्वर के सामने आने, परमेश्वर से प्रार्थना करने, और उनके साथ बातचीत करने के योग्य बनाया जाए। जहाँ तक राज्य के युग में न्याय के कार्य का सवाल है, यही वह कार्य है जो समस्त मानवजाति को अच्छी तरह से शुद्ध करने, बचाने, और परिपूर्ण करने के लिए है। अगर मानवजाति केवल व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के कार्य से ही गुजरे लेकिन अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करने में असफल रहे, तो वह अच्छी तरह से परमेश्वर के द्वारा बचायी और जीती नहीं जाएगी। हम सभी देख सकते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु का कार्य केवल मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। इस युग में, परमेश्वर में विश्वास करने से हमें मात्र हमारे पापों से माफ किए जाने, परमेश्वर से प्रार्थना करने, और परमेश्वर के समस्त अनुग्रह का आनंद की अनुमति मिली, लेकिन हम इस युग में शुद्धता हासिल नहीं कर सके। ऐसा क्यों है? क्योंकि हम अंदर से पापी स्वभाव के हैं, और हम अक्सर पाप करते हैं, परमेश्वर से द्वन्द और उनका विरोध करते हैं, प्रभु यीशु ने वादा किया कि वे वापस आएँगे, और सभी सत्यों को व्यक्त करेंगे जो अंतिम दिनों में मानवजाति को बचाते हैं ताकि उन सभी को शुद्ध किया जाए जो परमेश्वर की वाणी सुनते हैं और परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष लाए जाते हैं। ठीक जैसे कि प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य यूहन्ना के पद की संपूर्ण पूर्ति हैं: "जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा।" तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर वर्तमान में अंतिम दिनों में न्याय के कार्य में लगे हुए हैं, और उन सभी को शुद्ध करने व परिपूर्ण बनाने में लगे हुए हैं जो उनके सिंहासन के समक्ष आ गये हैं। यानी कि, वो उन बुद्धिमान कुँवारियों को विजेताओं में परिपूर्ण कर रहे हैं जो उनकी वाणी सुनकर उनकी तरफ वापस लौटे हैं और वह उनको परमेश्वर के राज्य में लाया जायेंगे। यह तथ्य कि परमेश्वर उद्धार कार्य को तीन चरणों में पूरा करते हैं हमें यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर हमेशा मानवजाति का मार्गदर्शन करने और उसे बचाने के लिये कार्य करते रहते हैं। परमेश्वर के कार्य का हर चरण पिछले चरण से और उन्नत एवं और गहरा होता है। जहाँ तक बाइबल का प्रश्न है, यह हम परमेश्वर के विश्वासियों के लिये हमारे लिये एक आवश्यक किताब से अधिक कुछ नहीं है। मानवजाति के मार्गदर्शन और उसे बचाने के लिए, बाइबल परमेश्वर के कार्य को नहीं कर सकती है।

बाइबल परमेश्वर के कार्यों का एक अभिलेख मात्र है। जब परमेश्वर ने एक कार्य पूरा कर लिया था, तो मनुष्य ने उनके वचनों और कार्य को लेखों में अभिलिखित किया और ये संकलित लेख बाइबल बन गये। यद्यपि बाइबल हमारे विश्वास के लिए अपरिहार्य है, किंतु केवल पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करके ही हम बाइबल और सत्य को वास्तव में समझ सकते हैं। यह सच है। इसलिए, प्रभु में विश्वास के लिए हमें मेमने के पदचिन्हों का बारीकी से अनुसरण करने, परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। केवल इसी तरह हम पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर द्वारा उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं। अगर हम केवल बाइबल को पढ़ते हैं लेकिन अंतिम दिनों के परमेश्वर के वचनों और कार्य को स्वीकार करने में असफल रहते हैं, तो हमें शुद्ध नहीं किया जा सकता और बचाया नहीं जा सकता है। वास्तव में, यदि परमेश्वर के सभी वचनों को बाइबल में अभिलिखित कर भी लिए गए होते, तब भी पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, हम परमेश्वर के वचन को समझने और जानने में असमर्थ होते हैं। सत्य को समझने के लिए, हमें परमेश्वर के वचनों का अनुभव और अभ्यास अवश्य करना चाहिए, हमें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त होगी। केवल इसी प्रकार हम परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हैं, सत्य को समझ सकते हैं और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। तथ्य यह साबित करने के लिए काफी हैं कि हमारे उद्धार की कुंजी पवित्र आत्मा का कार्य, पवित्र आत्मा द्वारा परिपूर्णता है। अब, पवित्र आत्मा कौन है? क्या पवित्र आत्मा स्वयं परमेश्वर नहीं है? बाइबल अतीत में परमेश्वर के कार्य का अभिलेख मात्र है। तो यह कैसे स्वयं परमेश्वर का स्थान ले सकती है? इसलिए जैसा कि मैंने कहा है, केवल परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकते हैं, बाइबल मनुष्य को बचाने में अक्षम है। यदि किसी का विश्वास केवल बाइबिल का अनुसरण करने में है और परमेश्वर के अंतिम दिनों के वचनों और कार्य को स्वीकार करने में नहीं है, यदि वो ईश्वर के कार्य की गतिका अनुसरण नहीं करता है, तो उसे त्याग दिया जाएगा व हटा दिया जाएगा। व्यवस्था के युग में, बहुत सारे लोग थे जो प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करने में असफल रहे, उन्हें हटा दिया गया। जो प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ रहते हैं उन्हें भी त्याग दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। यह कहा जा सकता है कि ये मनुष्य अंधे हैं और परमेश्वर को नहीं जानते हैं। उनके लिए बस यही बचता है कि वे आने वाली आपदाओं की मार को विलाप करते हुए और अपने दाँत पीसते हुए सहें।

अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा सत्य को व्यक्त करके किया गया न्याय का कार्य ही मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर की प्रबंधकारणीय योजना का मुख्य कार्य है। यह मानवजाति को अच्छी तरह से शुद्ध करने, बचाने और परिपूर्ण करने के परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण भी है। सही है! इसलिए यदि हम बाइबल में वर्णित कार्यों के केवल प्रथम दो चरणों को ही पकड़े रहते हैं लेकिन अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा किये गये शुद्धिकरण और उद्धार कार्य को स्वीकार करने में असफल रहते हैं, तो हमें कभी बचाया नहीं जाएगा और हम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करेंगे। चाहे कितने ही सालों तक हम लोगों का परमेश्वर पर विश्वास रहा हो, वह सब शून्य हो जाएगा, क्योंकि हम सब जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम-समय के उद्धार को अस्वीकार करते हैं, परमेश्वर के विरोधी होते हैं, हम पाखंडी फरीसी हैं। इस बारे में तो बिल्कुल भी संशय नहीं है। भले ही फरीसियों ने बाइबल के आधार पर प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकार कर दिया और अंतिम दिनों में, पादरियों और बुज़ुर्गों ने बाइबल के आधार पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार किया, लेकिन उनके तर्क ठहरते नहीं हैं। क्योंकि वह अपने तर्कों को परमेश्वर के वचनों पर आधारित करने के बजाये बाइबल के अक्षर पर आधारित करते हैं। चाहे उन के पास कितने ही तर्क हों, जो भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को स्वीकार करने में असफल रहता है वह परमेश्वर का विरोधी और विश्वासघाती है। परमेश्वर की निगाह में, वे सब कुकर्मी हैं, परमेश्वर उन्हें कभी भी अंगीकार नहीं करेंगे। अंतिम दिनों के परमेश्वर के कार्य द्वारा उजागर हुए इन ईसाविरोधियों और अविश्वासियों को आने वाली आपदाओं के दंड को विलाप करते हुए और दाँत पीसते हुए सहना पड़ेगा। परमेश्वर के द्वारा उन्हें हमेशा के लिए त्यागा और हटाया जा चुका है, और उन्हें दुबारा कभी भी परमेश्वर को देखने और उनका अनुमोदन प्राप्त करने का मौका नहीं मिलेगा। यह सत्य है। यहाँ, हम एक तथ्य समझ सकते हैं: बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है, और परमेश्वर के कार्य का स्थान निश्चित रुप से नहीं ले सकती है। परमेश्वर परमेश्वर है, बाइबल बाइबल है। क्योंकि हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इसलिए हमें अवश्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना चाहिए और परमेश्वर के कार्य की गति का अनुसरण करना चाहिए, हमें अवश्य अंतिम दिनों में परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहिए, और परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों को स्वीकार करके उनका अनुसरण अवश्य करना चाहिए। यही ईश्वर में विश्वास करने का सही अर्थ है। हर बार जब कार्य करने के लिये परमेश्वर देहधारी बनते हैं तो, उन्हें उन लोगों को त्यागना और हटाना पड़ता है जो केवल बाइबल का अनुसरण करते हैं लेकिन परमेश्वर को पहचानने और उनकी आज्ञापालन करने में विफल रहते हैं। इसलिए, हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, कि "परमेश्वर पर विश्वास बाइबल से मेल खाना चाहिए, बाइबल का पालन करना ही परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करना है, बाइबल ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती है" ऐसे दावे शुद्ध भ्रांतिपूर्ण है। जो कोई भी ऐसे दावे करता है वह अंधा है और परमेश्वर को नहीं जानता है। अगर मनुष्य बाइबल को सबसे ऊपर रखता और परमेश्वर के स्थान पर बाइबल का उपयोग करता है, तो क्या यह फरीसियों के मार्ग पर चलना नहीं होगा? फरीसियों ने परमेश्वर के विरोध में बाइबल का अनुसरण किया, जिसके परिणाम स्वरुप वे परमेश्वर के श्राप को प्राप्त हुए। क्या यह तथ्य नहीं है?

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

लोग परमेश्वर में अपने विश्वास के द्वारा जीवन प्राप्त करते हैं या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि वे सत्य को प्राप्त करते हैं या नहीं। यदि वे ऐसा करते हैं, तो उन्होंने वास्तव में परमेश्वर को जान लिया है; केवल उन लोगों ने जो ऐसा कर चुके हैं, वास्तव में जीवन प्राप्त किया है। वे लोग जो वास्तव में परमेश्वर को नहीं जानते हैं, सत्य को प्राप्त नहीं कर पाए हैं; इसलिए ऐसे लोगों ने जीवन को हासिल नहीं किया है। यह निश्चित है, किसी भी संदेह से परे है। तो वास्तव में सत्य को पाने का क्या मतलब है? इसके लिए मसीह के बारे में जानना आवश्यक है, क्योंकि वह मनुष्यों के बीच सम्पूर्ण सत्य को व्यक्त करने वाला देहधारी परमेश्वर है। सत्य परमेश्वर के जीवन से उत्पन्न होता है, और यह पूरी तरह से मसीह की अभिव्यक्ति है, जिसका सार सत्य, मार्ग और जीवन है। सिर्फ मसीह के पास सत्य और जीवन का सार है, इसलिए उसे जानना और पा लेना सत्य को प्राप्त करने का एकमात्र वास्तविक तरीका है। इससे यह स्पष्ट है कि निष्ठावानों में, केवल वे लोग जिन्होंने मसीह को जाना और पाया है, उन्होंने ही वास्तव में जीवन को पाया है, परमेश्वर को जाना है, और अनन्त जीवन को हासिल कर लिया है। यह बात बाइबल में लिखे इस कथन को बिल्कुल सटीक तरीके से पूरा करती है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है" (यूहन्ना 3:36)। पुत्र में विश्वास करने का तात्पर्य निस्संदेह देहधारी मसीह का अनुसरण करने से है। उन लोगों में से जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, केवल जो मसीह को सत्य, मार्ग और जीवन के रूप में पहचानते हैं, वे ही वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, उन्हें ही बचाया और पूर्ण किया जा सकता है; केवल वे ही परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करेंगे। जो कोई परमेश्वर पर विश्वास करता है, फिर भी मसीह से इनकार कर सकता है, उसका विरोध या उसका त्याग सकता है, वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जो विश्वास तो करता है, लेकिन परमेश्वर का विरोध करता है और उसे धोखा देता है। इस तरह, वह उद्धार या पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम नहीं होगा। यदि कोई परमेश्वर पर विश्वास करता है लेकिन बस आँखें मूँद कर बाइबल की आराधना करते है और उसकी गवाही देते हुए मसीह का विरोध करता है या उससे घृणा करता है, तो उस व्यक्ति ने पहले से ही मसीह-विरोधी होने के पथ पर कदम रख दिया है और परमेश्वर का शत्रु बन गया है। एक वास्तविक मसीह-विरोधी होने के नाते, इस तरह के व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा दंडित और शापित किया जाएगा, और अंत में उसका विनाश और बर्बादी निश्चित है। विश्वसनीय व्यक्ति के लिए, यह सबसे गंभीर विफलता और दुख है।

ऐसे कई लोग हैं जो केवल बाइबल के अनुसार स्वर्ग के एक अस्पष्ट परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन जो यह नहीं मानते कि परमेश्वर देह बन सकता है, मसीह के देहधारी परमेश्वर बनने, भ्रष्ट इंसान के उद्धारकर्ता बनने, या मनुष्यों को बचाने वाले एक व्यावहारिक परमेश्वर बनने की बात तो छोड़ ही दो। ऐसे लोग नहीं जानते कि मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है; इतना ही नहीं, वे मसीह के अनुरूप भी नहीं बन सकते। वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जो सत्य से ऊब जाते हैं और उसके प्रति घृणा महसूस करते हैं। हम सब बाइबल में पढ़ सकते हैं कि यहूदियों के मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों ने परमेश्वर पर आजीवन विश्वास किया, फिर भी देहधारी यीशु को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, यहाँ तक कि उन्होंने यीशु मसीह को मृत्यु तक क्रूस पर चढ़ा दिया। नतीजतन, वे ऐसे लोग बन गए जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया और उसे धोखा दिया, और इसलिए उससे शाप और सजा प्राप्त की। अपने आजीवन विश्वास के बावजूद, वे परमेश्वर के आशीर्वाद और वचन को प्राप्त करने में असमर्थ थे। यह कितना दयनीय और दुखद था! इस प्रकार, लोग अपने विश्वास में सफल होते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उन्होंने मसीह को जाना और प्राप्त किया है। इस मामले का मूल यह है कि क्या उन्होंने मसीह के द्वारा प्रकट किए गए सभी सत्यों को स्वीकार किया है, और आज्ञाकारिता के साथ परमेश्वर के समूचे कार्य का अनुभव किया है; मुद्दा यह है कि क्या वे मसीह के अनुकूल होने तक उसकी प्रशंसा कर सकते हैं और उसकी गवाही दे सकते हैं। यही वह महत्वपूर्ण बात है जो कि परमेश्वर पर उनके विश्वास की सफलता या असफलता को निर्धारित करती है। बहरहाल, कई लोग इस बात से सहमत नहीं हैं; वे बाइबल को सर्वोपरि मानते हैं, और यहां तक कि वे इसका उपयोग अपने दिल में परमेश्वर को हटाने के लिए भी करते हैं। जब देहधारी परमेश्वर कार्य करने के लिए आता है, ये लोग वास्तव में मसीह को नकार सकते हैं, उसे अस्वीकार कर सकते हैं, और उसका विरोध कर सकते हैं। यदि मसीह के वचन और कार्य बाइबल के कुछ नियमों के अनुरूप नहीं हैं, तो ये लोग उसकी निंदा करने, उसे अस्वीकार करने और उसका त्याग करने की हद तक चले जाते हैं। यह कहना सही होगा कि परमेश्वर पर विश्वास करने की जगह वे बाइबल में विश्वास करते हैं। उनकी दृष्टि में, बाइबल ही उनका प्रभु, उनका परमेश्वर है। ऐसा लगता है कि उनके लिए परमेश्वर, उनका प्रभु, बाइबल में है, और यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार, वे मानते हैं कि सत्य वह है जो बाइबल के साथ पूर्ण सहमति में हो, और जो कुछ भी बाइबल से हटकर है, वह सत्य नहीं हो सकता। वे बाइबल को सभी सत्यों से बढ़कर मानते हैं; बाइबल से भटक जाना सत्य से भटकना होगा, क्योंकि जो बाइबल में लिखा है केवल वही सच है। वे मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य और कथन केवल वही हैं जो बाइबल के पन्नों में दर्ज हैं; वे बाइबल से हटकर उसके किये हुए किसी भी कार्य या कथन को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। ऐसे लोग उन यहूदी मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों के समान होते हैं, जो केवल बाइबल को जानते थे, लेकिन परमेश्वर को ज़रा भी नहीं मानते थे; और वे देहधारी मसीह के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तो और भी कम इच्छुक थे। उन्होंने बाइबल और मसीह को एक दूसरे के विरुद्ध भी खड़ा कर दिया था, वे इस बात से बिलकुल ही अनजान थे कि वही सत्य, मार्ग और जीवन है; इसके बजाए, उन्होंने बाइबल को ऊंचा उठाया, उसकी गवाही दी और मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ दिया, जिसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर का विरोध करने के राक्षसी पाप कर डाले। इस तरह, संभव है कि उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया हो, लेकिन उन्हें बचाया नहीं गया; इसके विपरीत, वे परमेश्वर के शत्रु बन गए, और उसकी सजा और शाप पाने के भागी बने। यह उन लोगों का प्रत्यक्ष परिणाम है, जो धर्म के तहत परमेश्वर पर विश्वास करते थे, जो मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा बहकाये गए और नियंत्रित किये गए थे, और जिन्होंने मसीह-विरोधी बनने की राह पर कदम रख दिया था। यह दर्शाता है कि प्रभु यीशु ने जो कहा वह सच है: "अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे" (मत्ती 15:14)। ऐसे लोगों को निश्चित रूप से बचाया या पूर्ण नहीं किया जा सकता है।

बाइबल में एक ऐसा वचन शामिल है जो मसीह के सार को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है। प्रभु यीशु ने कहा था, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)। इन वचनों के द्वारा, प्रभु यीशु ने ठीक निशाने पर तीर मारा था, और परमेश्वर में विश्वास के सबसे बड़े रहस्य को प्रकट किया था—अर्थात यह तथ्य कि केवल मसीह को जानने और मसीह को प्राप्त करने से ही लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि परमेश्वर स्वयं मसीह के रूप में देह धारण करके ही इंसान को पूरी तरह से बचा सकता है। अपनी भेड़ों को स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए, केवल मसीह ही एकमात्र रास्ता है, और केवल देहधारी मसीह ही वह व्यावहारिक परमेश्वर है जो मनुष्यों के लिए उद्धार ला सकता है। यदि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो केवल मसीह को स्वीकार कर और उसका अनुसरण करते हुए ही वे उद्धार और पूर्णता के पथ पर कदम रख सकते हैं। यही एकमात्र तरीका है जिससे वे ऐसे लोग बन सकते हैं जो स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करते हैं, और फलस्वरूप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं। इससे, यह समझा जा सकता है कि परमेश्वर के विश्वासियों के लिए मसीह के देहधारण को स्वीकार करना और उसका पालन करना ज़रूरी है, ताकि वे बचाए और पूर्ण किये जा सकें और इस तरह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त सकें। परमेश्वर ने लोगों को स्वयं पर विश्वास करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए यही तरीक़ा पूर्वनिर्धारित किया है। इस प्रकार, यह सवाल कि क्या वे लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, मसीह को जानते हैं और क्या उन्होंने मसीह को प्राप्त किया है, वास्तव में अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसका उनकी मंज़िल और उनके परिणाम पर सीधा असर पड़ता है।

ज्यों ही हम प्रभु यीशु के उस कार्य का स्मरण करते हैं जो उसने उस समय किया जब वह धरती पर अनुग्रह के युग की शुरूआत करने आया था, तो हम देख सकते हैं कि धर्म के विश्वासियों में से कोई भी उसके बारे में न तो जानता था और न ही उसका अनुसरण करता था। यह बात मुख्य याजकों, शास्त्रियों और यहूदी धर्म के फरीसियों के लिए विशेष रूप से सच थी, जिनमें से सभी ने मसीह को पहचानने या स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। इसके अलावा, इन लोगों ने बाइबल में लिखी गई बातों के मुताबिक प्रभु यीशु को नकारा, उसके बारे में राय बनायी और उसकी निंदा की। यहाँ तक कि उन्होंने उसे क्रूस पर भी चढ़ा दिया, इस प्रकार उन्होंने परमेश्वर का विरोध करने का घिनौना पाप किया और उन लोगों के लिए आदर्श बन गए जो पिछले दो हज़ार वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, परन्तु उसका विरोध करते हैं और उसे धोखा देते हैं, और जिन्हें इसलिए परमेश्वर की सजा और शाप को भुगतना पड़ा है। असल में, इसके पहले, प्रचार के दौरान, प्रभु यीशु को पहले ही इस वास्तविक तथ्य का बोध हो गया था कि धार्मिक दुनिया सारतः परमेश्वर के विरोध में थी, और उसने बड़ी सटीकता के साथ, परमेश्वर के विरुद्ध फरीसियों के प्रतिरोध की जड़ और सार को सीधे ही उजागर कर दिया: "और उसके वचन को मन में स्थिर नहीं रखते, क्योंकि जिसे उसने भेजा तुम उसका विश्‍वास नहीं करते। तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:38-40)। प्रभु यीशु के वचनों ने परमेश्वर में विश्वास करते हुए भी परमेश्वर का विरोध करने वाले धार्मिक समुदाय की सच्चाई और सार को उजागर किया है। इसके साथ ही, उन वचनों ने बाइबल और मसीह के बीच के संबंध के सार पर भी प्रकाश डाला है। निस्संदेह, यह उन लोगों के लिए एक बड़ा उद्धार है जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। हालांकि, आज के धार्मिक समुदाय में, अधिकांश लोग अभी भी आँखें मूँद कर बाइबल पर विश्वास करते हैं, उसकी आराधना करते हैं, और गवाही देते हैं, उसे मसीह और मसीह की गवाही से ऊपर का दर्जा देते हैं। यह बात उन धार्मिक अगुवाओं और पादरियों के लिए विशेष रूप से सही है, जो फरीसियों की तरह, अंत के दिनों के देहधारी मसीह द्वारा व्यक्त किये गए सत्य के बावजूद उसके बारे में राय बनाते रहते हैं, उसका तिरस्कार और निंदा करना जारी रखते हैं। उनके ये कार्य मसीह को दूसरी बार क्रूस पर चढ़ाए जाने की चरम त्रासदी की हद तक पहुँच गए हैं, और उन्होंने बहुत पहले परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है। इसका परिणाम महाविनाशकारी है, क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने पहले ही चेतावनी दी थी, "जो परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाते हैं उनके लिए संताप" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "दुष्टों को निश्चय ही दण्ड दिया जायेगा")। इसलिए बाइबल और मसीह के बीच एक स्पष्ट संबंध स्थापित करना पूरी तरह से आवश्यक है ताकि सभी लोग बाइबल के साथ सही ढंग से पेश आ सकें, मसीह को स्वीकार कर सकें, और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए उसके कार्य का अनुपालन कर सकें।

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धर्म-शास्त्रों के संबंध में, प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "यह वही है जो मेरी गवाही देता है"। यहाँ पर परमेश्वर का वचन बहुत स्पष्टता के साथ कहा गया था; बाइबल उसके बारे में गवाहियों का एक संकलन मात्र है। हम सभी जानते हैं कि बाइबल परमेश्वर के कार्य के पहले दो चरणों का वास्तविक आलेख है। दूसरे शब्दों में, यह परमेश्वर के कार्य के उन पहले दो चरणों की गवाही है, जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी तथा मानव सहित सभी चीज़ों की रचना के बाद इंसान के मार्गदर्शन और उद्धार को निश्चित किया गया है। बाइबल को पढ़ने से, हर कोई यह समझ सकता है कि व्यवस्था के युग में किस तरह परमेश्वर ने मनुष्य का नेतृत्व किया और उन्हें उसके सामने जीवन जीना और उसकी आराधना करना सिखाया। हम यह भी समझ सकते हैं कि अनुग्रह के युग में किस तरह परमेश्वर ने इंसान को छुटकारा दिलाया और उन सभी को उनके पिछले पापों के लिए माफ़ कर दिया, साथ ही उनके लिए शांति, आनन्द और सभी प्रकार का अनुग्रह प्रदान किया। इससे न केवल लोग यह समझ सकते हैं कि परमेश्वर ने इंसान की रचना की थी, बल्कि यह कि उसने उनका निरंतर मार्गदर्शन किया और फिर उन्हें छुटकारा भी दिलाया। इसी दौरान, परमेश्वर ने इंसान के लिए प्रावधान किया है और उनकी सुरक्षा भी की है। इसके अलावा, हम बाइबल की भविष्यवाणियों में पढ़ सकते हैं कि अंत के दिनों में, परमेश्वर के वचन उसकी प्रजा का न्याय करने और उन सब को शुद्ध करने के लिए आग की तरह जलेंगे। वे इंसान को समस्त पापों से बचाएंगे और हमें शैतान के अंधेरे प्रभाव से बच निकलने में मदद करेंगे ताकि हम पूरी तरह से परमेश्वर की ओर लौट जाएँ और अंततः उसके आशीर्वाद और उसके वादों की विरासत को पा सकें। परमेश्वर का यही तात्पर्य था जब उसने कहा था, "यह वही है जो मेरी गवाही देता है"। इसलिए, जिस किसी ने भी सच्चाई से बाइबल को पढ़ा है, वह परमेश्वर के कुछ कार्यों को समझ सकता है और उसके अस्तित्व, उसकी सर्वशक्तिमत्ता और उसके ज्ञान को पहचान सकता है, जिसके द्वारा परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी पर सब कुछ रचा है, जिसके द्वारा वह सभी चीज़ों पर अपना प्रभुत्व रखता है और सब कुछ नियंत्रित करता है। इस प्रकार, परमेश्वर पर विश्वास करने में, परमेश्वर को जानने में और विश्वास के मार्ग पर यानी जीवन के उचित मार्ग पर कदम रखने में, बाइबल लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। जो कोई ईमानदारी से परमेश्वर पर विश्वास करता है और सत्य से प्रेम करता है, वह बाइबल पढ़ कर जीवन में एक लक्ष्य और दिशा पा सकता है, और परमेश्वर में विश्वास करना, उस पर भरोसा करना, उसकी आज्ञा मानना और उसकी आराधना करना सीख सकता है। ये सब परमेश्वर के लिए बाइबल की गवाही के प्रभाव हैं; यह एक निर्विवाद तथ्य है। बहरहाल, प्रभु यीशु ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु की भी व्याख्या की, जब उसने कहा, "तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है" "फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" ये शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हैं! जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, अगर वे सत्य और जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, तो केवल बाइबल की गवाही पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है; उन्हें सत्य और जीवन प्राप्त करने के लिए मसीह के पास भी आना चाहिए। इसका कारण यह है कि केवल वही सत्य को व्यक्त कर सकता है, इंसान को छुटकारा दिला सकता है, और इंसान को बचा सकता है। परमेश्वर वह है जो हमें जीवन देता है। बाइबल उसके सामर्थ्य का स्थान नहीं ले सकती, पवित्र आत्मा के कार्य की तो बात ही नहीं है, और यह परमेश्वर की ओर से मनुष्य को जीवन नहीं दे सकती है। केवल मसीह को स्वीकार कर और उसे मानकर ही हम पवित्र आत्मा का कार्य हासिल कर सकते हैं और सत्य और जीवन को प्राप्त कर सकते हैं। अगर लोग व्यावहारिक देहधारी परमेश्वर को स्वीकार किए बिना केवल बाइबल में ही विश्वास करते हैं, तो वे जीवन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे, क्योंकि बाइबल परमेश्वर नहीं है; यह केवल परमेश्वर के कार्य की गवाही है। परमेश्वर पर विश्वास करने में, हमें यह समझना चाहिए कि इंसान को बचाने के उसके कार्य के कुछ चरण हैं; इंसान को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए कार्य के तीन चरण अत्यंत आवश्यक हैं, ताकि वे वास्तव में परमेश्वर के पास लौट सकें और उसके द्वारा प्राप्त किये जा सकें। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का हर चरण, जिसका मनुष्य अनुभव करता है, उसके लिए उद्धार का एक हिस्सा ले आता है। केवल पवित्र आत्मा के कार्य का निकटता से अनुसरण करते हुए और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव करके ही हम परमेश्वर के प्रचुर और पूर्ण उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर में अपने विश्वास के द्वारा, व्यवस्था के युग के दौरान इस्राएलियों को केवल परमेश्वर के वादे का आनंद मिल सका। अगर उन्होंने यीशु मसीह के उद्धार को स्वीकार नहीं किया होता, तो उनके पापों को माफ़ नहीं किया जा सकता था, परमेश्वर द्वारा दी गई शांति, प्रसन्नता और भरपूर अनुग्रह का आनंद तो उन्हें और भी नहीं मिल सकता; यही सच है। अगर लोग केवल अपने पापों की माफ़ी की खातिर प्रभु यीशु द्वारा दिए गए छुटकारे को और साथ ही परमेश्वर के कई अनुग्रहों को स्वीकार करते हैं, फिर भी अंत के दिनों में उसके न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे सत्य या जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हैं, न ही वे अपने जीवन-स्वभाव में परिवर्तन ला सकेंगे। इस तरह, वे परमेश्वर के वादों को विरासत में पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे। परमेश्वर के कार्य का हर चरण अपना फल लेकर आता है। एक बार में परमेश्वर के कार्य एक ही चरण पूरा होता है, और ये सभी चरण एक दूसरे के पूरक हैं; किसी एक एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता। वे धीरे-धीरे पूर्णता की ओर ले जाते हैं। अगर किसी ने परमेश्वर के कार्य के चरणों में से किसी एक को स्वीकार नहीं किया, तो वह व्यक्ति उसके उद्धार के केवल एक अंश को प्राप्त कर सकता है, न कि सभी को। यह भी एक तथ्य है। यदि लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार किए बिना केवल बाइबल में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के विरोधी और विश्वासघाती हो जाएंगे। नतीजतन, वे परमेश्वर के अंतिम उद्धार के पूरक को खो चुके होंगे। दूसरे शब्दों में, जो लोग केवल प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं और अंत के दिनों में उसकी वापसी-अर्थात सर्वशक्तिमान परमेश्वर-द्वारा लाए गए उद्धार को स्वीकार नहीं करते हैं, उनका विश्वास बीच राह में ही समाप्त हो जाएगा, और सब कुछ व्यर्थ हो जाएगा। यह कितना दयनीय होगा! कितना दुखद होगा! इसलिए, देहधारी मसीह को स्वीकार नहीं करने का परिणाम जीवन प्राप्त करने में असमर्थ होना है। केवल बाइबल में विश्वास करने से लोग बचाये नहीं जा सकते, न ही वे जीवन प्राप्त कर सकते हैं, और न ही कभी वे परमेश्वर को जान पाएँगे, क्योंकि बाइबल परमेश्वर नहीं है; यह केवल उसकी गवाही है। इस प्रकार, अगर लोग मसीह को स्वीकार किए बिना केवल बाइबल में विश्वास करते हैं, तो उन्हें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं मिल सकता है। नतीजतन, वे परमेश्वर द्वारा बचाये नहीं जा सकते; वे केवल उसके द्वारा हटाये जा सकते हैं। यह संदेह से परे और निश्चित है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे बाइबल पढ़कर समझा जा सकता है। इसके अलावा, यह इस बात का मुख्य कारण भी है कि धार्मिक अगुवा और पादरी परमेश्वर पर विश्वास करके भी क्यों परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो उनके विश्वास में उन्हें विफलता की ओर ले जाती है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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