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5. परमेश्वर के साथ कोई एक सामान्य सम्बन्ध कैसे स्थापित कर सकता है?

2018-03-20 18

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तहेदिल से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; जब वे परमेश्वर के वचनों के संपर्क में आते हैं, तो परमेश्वर का आत्मा का उन पर भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्‍हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना होगा, और अपने हृदय को उसके सामने शांत करना होगा। अपने पूरे हृदय को परमेश्वर की स्तुति में डुबोकर ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हो। यदि लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते हैं और उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं, और अगर उनका दिल उन्हें महसूस नहीं करता है और वे परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ नहीं मानते हैं, तो जो कुछ भी वे कर रहे हैं उससे केवल परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, और ये धार्मिक व्यक्तियों का केवल व्यवहार है—ये परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

आज पवित्र आत्मा के वचन पवित्र आत्मा के कार्य का गतिविज्ञान हैं और इसके दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य का निरंतर प्रबोधन, पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति है। और आज पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति क्या है? यह आज परमेश्वर के कार्य और एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में दर्ज होने में लोगों का नेतृत्व करना है। ...

सबसे पहले, तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में उड़ेल देना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के अतीत के वचनों का अनुसरण नहीं करना चाहिए, और न तो उनका अध्ययन करना चाहिए और न ही आज के वचनों से उनकी तुलना करनी चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूरी तरह से परमेश्वर के वर्तमान वचनों में अपना दिल उड़ेल देना चाहिए। अगर ऐसे लोग हैं जो अभी भी अतीत काल के परमेश्वर के वचन, आध्यात्मिक किताबें, या प्रचार-प्रसार के अन्य विवरणों को पढ़ना चाहते हैं, जो आज पवित्र आत्मा के वचनों का पालन नहीं करते हैं, तो वे सभी लोगों में सबसे अधिक मूर्ख हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। यदि तुम आज पवित्र आत्मा का प्रकाश स्वीकार करने के लिए तैयार हो, तो फिर अपने दिल को आज परमेश्वर की उक्तियों में उड़ेल दो। यह पहली चीज़ है जो तुम्हें हासिल करनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के विषय का समाधान करना चाहिए। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध के बिना परमेश्वर में विश्वास करने का महत्व खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के द्वारा ही किया जा सकता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करना या उसका इनकार न करना, बल्कि उसके प्रति समर्पित रहना, और इससे बढ़कर इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादों को रखना, स्वयं के बारे में न सोचते हुए हमेशा परमेश्वर के परिवार की बातों को सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में सोचना, फिर चाहे तुम कुछ भी क्यों न कर रहे हो, परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और परमेश्वर के प्रबंधनों के प्रति समर्पण करना। परमेश्वर की उपस्थिति में तुम जब भी कुछ करते हो तो तुम अपने हृदय को शांत कर सकते हो; यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते हो, फिर भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्‍यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। अभी देर नहीं हुई है, परमेश्वर की इच्छा का स्वयं पर प्रकट होने की प्रतीक्षा करो, और फिर तुम इसे अभ्यास में लाओ। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब तुम्हारा संबंध लोगों के साथ भी सामान्य होगा। सब कुछ परमेश्वर के वचनों पर स्थापित है। परमेश्वर के वचनों को खाने और उन्हें पीने से परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य करो, अपने दृष्टिकोणों को सही रखो, और ऐसे कार्यों को न करो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हों या कलीसिया में विघ्न डालते हों। ऐसे कार्यों को न करो जो भाइयों और बहनों के जीवनों को लाभान्वित न करें, ऐसी बातों को न कहो जो दूसरे लोगों के जीवन में योगदान न दें, निंदनीय कार्य न करो। सब कार्यों को करने में न्यायी और सम्माननीय बनो और उन्हें परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुति योग्य बनाओ। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर होती है, फिर भी तुम अपने लाभों का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार को लाभान्वित करने को सर्वोच्च महत्त्व दे सकते हो, और धार्मिकता को पूरा कर सकते हो। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

जब भी तुम कुछ करते हो, तो तुम्हें यह जांचना आवश्यक है कि क्या तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह निम्नतम मापदंड है। जब तुम अपनी प्रेरणाओं को जाँचते हो, तो यदि उनमें ऐसी प्रेरणाएँ मिल जाएँ जो सही न हों, और यदि तुम उनसे फिर सकते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, और जो दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जब भी कुछ करते या कहते हो, तो तुम्हें अपने हृदय को सही रखना, और धर्मी बनना चाहिए, और अपनी भावनाओं में नहीं बहना चाहिए, या तुम्हारी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करना चाहिए। ये ऐसे सिद्धांत हैं जिनमें परमेश्वर के विश्वासी स्वयं आचरण करते हैं। एक व्यक्ति की प्रेरणाएँ और उसका महत्व छोटी बातों में प्रकट हो सकता है, और इस प्रकार, परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले उनकी अपनी प्रेरणाओं और परमेश्वर के साथ उनके संबंध का समाधान करना आवश्यक है। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाओगे, और केवल तभी तुम में परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपने वांछित प्रभाव को पूरा कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि लोग अपने हृदयों में परमेश्वर को रख सकेंगे, और व्यक्तिगत लाभों को नहीं खोजेंगे, अपने व्यक्तिगत भविष्य (अर्थात् शरीर के बारे में सोचना) के बारे में नहीं सोचेंगे, बल्कि वे जीवन में प्रवेश करने के बोझ को रखेंगे, सत्य का अनुसरण करने में अपना सर्वोत्तम प्रयास करेंगे, और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित रहेंगे। इस प्रकार से, जिन लक्ष्यों को तुम खोजते हो वे सही हैं, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करते समय, हमें कहाँ से शुरू करना चाहिए? परमेश्वर से प्रार्थना करते समय दिल से बात करना सबसे महत्वपूर्ण बात है। उदाहरण के लिए, प्रार्थना में तुम कहते हो, "हे परमेश्वर, मैं देखता हूँ कि मेरे कई भाई-बहन तेरे लिए खुद को समर्पित करते हैं, लेकिन मेरी हैसियत बहुत छोटी है। मैं अपनी आजीविका, अपने भविष्य के बारे में सोचता हूँ और सोचता हूँ कि क्या मेरा शरीर भविष्य में कठिनाइयों का सामना कर पाएगा। मैं सब कुछ नहीं त्याग सकता। मैं वाकई तेरे कर्ज में हूँ। उनके पास इतना बड़ा कद कैसे हो सकता है? हम समान प्रकार के परिवारों से आते हैं। मगर वे खुद को परमेश्वर के लिए पूरे समय खपा सकते हैं, मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता? मुझमें सत्य की बहुत कमी है। मैं हमेशा अपने शारीरिक इच्छाओं की चिंता करता हूँ। मेरे पास पर्याप्त आस्था नहीं है। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तू मुझे प्रबुद्ध करे, मुझे रोशन करे, मुझे वास्तव में तुझ पर विश्वास करने और तेरे लिए जल्द से जल्द खुद को खपाने में सक्षम बना।" यह दिल से बात करना है। यदि तुम हर दिन, दिल से, इस तरह परमेश्वर के साथ संवाद करते हो, तो उसे पता चलेगा कि तुम ईमानदार हो और उसे मूर्ख बनाने या चिकनी चुपड़ी बातों में फंसाने और उसे धोखा देने की कोशिश नहीं कर रहे हो। तब पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करने का यही अर्थ है। हम रचनाएं हैं, और वह सृष्टिकर्ता है। रचना जब अपने सृष्टिकर्ता के सामने खड़ी हो तो उसके पास क्या-क्या होना चाहिए? उसके पास सच्ची आज्ञाकारिता, स्वीकृति, विश्वास और आराधना होनी चाहिए। हमें अपने दिल पूरी तरह से परमेश्वर को दे देना चाहिए। उन्हें उसे अगुवाई करने, शासन करने और योजना बनाने देना चाहिए। इस तरह प्रार्थना करना और तलाश करना सही है। परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करने का यही अर्थ है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (XIV) में "परमेश्वर के वचन 'परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' के बारे में धर्मोपदेश और संगति (I)" से उद्धृत

परमेश्वर के साथ उचित सम्बन्ध कैसे स्थापित करें? बहुत से सिद्धांत इसमें शामिल हैं। पहला यह है कि तुम्हें परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में विश्वास करना होगा, तुम्हें विश्वास करना होगा कि परमेश्वर के सभी वचनों को पूरा किया जाएगा। यही आधार है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करते हो, तो यह नहीं चलेगा, क्योंकि इससे वास्तविक विश्वास की कमी दिखाई देती है; परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करने में विफलता वास्तविक विश्वास की कमी दर्शाती है। दूसरा, तुम्हें अपना दिल परमेश्वर को देना होगा और परमेश्वर को सभी चीजों में अधिकार लेने देना होगा। तीसरा, तुम्हें परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार करना होगा, और यह महत्वपूर्ण है। यदि तुम अपनी प्रार्थनाओं और सहभागिता, अपने कार्यों और शब्दों के बारे में परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता कैसे कर सकते हो? क्या तुम उसे बता सकते हो कि तुम्हारे दिल में क्या है? जब तुम बोलते हो, तो तुम केवल अपने लिए प्रार्थना करते हो; जब तुम बोलते हो, तो तुम जो कहते हो वह झूठ के साथ मिश्रित होता है, बुरे इरादे रखता है, और दिखावे और झूठ से भरा हुआ है। यदि तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार नहीं करते हो, तो क्या तुम इन चीज़ों को पहचान सकते हो? एक बार जब तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार कर लेते हो, तो जब तुम गलत बातें कहते हो, निरर्थक शब्दों को कहने के बाद, वादे करने के बाद, तुम तुरंत सोचते हो, "अरे, क्या मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे रहा हूँ? यह परमेश्वर से झूठ बोलने जैसा क्यों लगता है?" यही परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार करना है, और इसी कारण से यह इतना महत्वपूर्ण है। चौथा, तुम्हें सभी चीजों में सत्य तलाशना सीखना होगा। शैतान के दर्शन पर भरोसा न करो, और तुम्हें लाभ होता है या नहीं, इस पर आधारित चीजें मत करो। तुम्हें सत्य का अर्थ निकालते हुए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, फिर तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए। व्यक्तिगत लाभों या नुकसानों की परवाह किये बिना, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए और सत्य कहना चाहिए, साथ ही एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए। नुकसान उठाना एक तरह का आशीर्वाद है; जब तुम नुकसान उठाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का और अधिक आशीष मिलता है। अब्राहम का कई बार फायदा उठाया गया, और लोगों से अपने संवाद के दौरान वह हमेशा समझौता किया करता था। यहाँ तक कि उसके सेवकों ने भी शिकायत की, "आप इतने कमज़ोर क्यों हैं? आइए उनसे लड़ें!" उस समय अब्राहम ने क्या सोचा? "हम उनके साथ नहीं लड़ेंगे। सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और थोड़ा सा नुकसान उठाने में कुछ भी बुरा नहीं है।" नतीजतन, परमेश्वर ने अब्राहम को और भी आशीष दिया। क्या यदि सत्य का अभ्यास करने के कारण, तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ के विषय में नुकसान भुगतना पड़ा है, और तुम परमेश्वर को दोष नहीं देते हो, तो परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा। पाँचवाँ, तुमको सभी चीजों में सत्य का पालन करना सीखना होगा, यह भी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति सत्य के अनुसार चीजें कहता है उसकी पहचान के बावजूद, चाहे जो व्यक्ति ऐसा कहता है उसके हमारे साथ अच्छे रिश्ते हों या न हों, और चाहे हम उसके साथ कैसे भी व्यवहार करते हों, जब तक उसकी बातें सत्य के अनुसार है, हमें उसका पालन करना चाहिए और वह जो कहता है उसे स्वीकार करना चाहिए। यह क्या दर्शाता है? यह दिखाता है कि मनुष्य के पास ऐसा दिल है जो परमेश्वर का सम्मान करता है। यदि कोई व्यक्ति सत्य के अनुसार बात करने वाले तीन-चार साल के बच्चे का पालन कर सकता है, तो क्या यह व्यक्ति किसी भी तरह से घमंडी है? क्या यह कोई ऐसा है जो अहंकारी है? वह बदल गया है, उसका स्वभाव बदल गया है ...छठा, अपने कर्तव्यों को पूरा करने में परमेश्वर के प्रति वफादार रहो। सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों को कभी न भूलो। यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाओगे। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करता है, तो वह कचरा है, और वह शैतान से संबंधित है। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर के लोगों में से एक हो, क्योंकि यही वह पहचान है। यदि तुमने अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पूरा कर लिया है, तो तुम एक योग्य प्राणी हो; यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असफल रहे, तो तुम एक योग्य प्राणी नहीं हो, और तुम्हें परमेश्वर की मंजूरी नहीं मिलेगी। इसलिए, यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में परमेश्वर के प्रति वफादार हो, यदि तुम फिर परमेश्वर के संपर्क में आते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें आशीष नहीं दे सकता? क्या परमेश्वर तुम्हारे साथ नहीं हो सकता? सातवाँ, सभी चीजों में परमेश्वर के पक्ष में रहो, परमेश्वर के साथ दिल और मन से एक होकर रहो। अगर तुम्हारे माता-पिता कुछ ऐसा कहते हैं जो सत्य के अनुसार नहीं है, जो परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है और परमेश्वर का विरोध करता है, तो तुम्हें परमेश्वर के पक्ष में खड़े होने में सक्षम होना चाहिए, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ तर्क-वितर्क करना चाहिए, उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए, उनकी बातों को मानने से इनकार कर देना चाहिए। क्या यह गवाही देना नहीं है? क्या यह शैतान को शर्मिंदा कर सकता है? (हाँ, कर सकता है।) ...यदि मनुष्य इन सात सिद्धांतों का पालन कर सकता है, तो वह परमेश्वर की मंजूरी प्राप्त कर सकता है और तभी परमेश्वर के साथ उसका रिश्ता पूरी तरह से सामान्य होगा। ये सात सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (XIV) में "परमेश्वर के वचन 'परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' के बारे में धर्मोपदेश और संगति (IV)" से उद्धृत

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