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38. स्वभाव का परिवर्तन कैसे प्रकट होता है?

2019-09-10 0

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों के साथ चलता है या नहीं और असली समझ तुझमें है या नहीं। यह तुम लोगों की पूर्व की समझ से अलग है। स्वभाव परिवर्तन के विषय में पहले जो तेरी समझ थी वह ये थी की तू, जो आलोचना करने को इतना तत्पर है, परमेश्वर द्वारा अनुशासित किये जाने के कारण अब लापरवाही से नहीं बोलता है। पर यह परिवर्तन का सिर्फ एक पहलू है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है पवित्र आत्मा के दिशा निर्देश में रहना: परमेश्वर की हर बात का अनुसरण कर और हर आज्ञा का पालन कर। लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे उन्हें नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं। पहले स्वभाव में बदलाव की बात मुख्यतः खुद को त्यागने, शरीर को कष्ट सहने देने, अपने शरीर को अनुशासित करने, और अपने आप को शारीरिक प्राथमिकताओं से दूर करने के बारे में होती थी—यह एक तरह का स्वभाव परिवर्तन है। आज, सभी जानते हैं कि स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति परमेश्वर के मौजूदा वचन को मानने में है, और साथ ही साथ उसके नए कार्य को सच में में समझने में है। इस प्रकार परमेश्वर के बारे में लोगों की पुरानी विचारधारा मिटाई जा सकती है और वे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं। केवल यही है स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वो वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं" से उद्धृत

लोग अच्छी तरह से व्यवहार कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, और सिद्धांत सत्य के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता। जिन लोगों ने अपने स्वभाव परिवर्तन का अनुभव किया है, वे इससे अलग हैं। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में बदलाव का अनुभव किया है उन्होने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाओं को प्रकट किया जाता है, तो वे विवेकी बन सकते हैं और देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। स्वभाव में परिवर्तन के बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और जब चीज़ों को पूरा किया जाता है, तो वे सत्य का आपेक्षिक सटीकता के साथ अभ्यास करते हैं और उनकी भ्रष्टता अक्सर प्रकट नहीं होती है। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है वे ख़ासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्म-तुष्टि और दंभ नहीं दिखाते हैं। जो भ्रष्टता प्रकट की जाती है उसमें से वे काफ़ी कुछ समझ-बूझ लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता है। मनुष्य का क्या स्थान है, कैसे उचित व्यवहार करना है, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना है, क्या कहना और क्या नहीं कहना है, और किन लोगों के साथ क्या कहना और क्या करना है, इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। यही कारण है कि ऐसा कहा जाता है कि इन प्रकार के लोग अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं। जो लोग अपने स्वभाव को बदलते हैं, वे वास्तव में एक मनुष्य के समान जीवन जीते हैं, और वे सत्य धारण करते हैं। वे हमेशा चीज़ों को सत्य के अनुरूप देखने और कहने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं उसमें सैद्धांतिक होते हैं; वे किसी व्यक्ति, मामले या चीज़ के प्रभाव के अधीन नहीं होते, और उन सभी के पास अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य के सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनके स्वभाव सापेक्षिक रूप से स्थिर होते हैं, वे असंतुलित नहीं होते, और चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्य को सही ढंग से करना है और कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए काम करना है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि सतही तौर पर स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए क्या किया जाए—उनमें आंतरिक स्पष्टता होती है कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसे न लगें कि वे कुछ बहुत अच्छा कर चुके हैं, लेकिन जो कुछ भी वे करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और इसके व्यावहारिक परिणाम होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके पास निश्चित रूप से बहुत सच्चाई होती है—इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोणों और कार्यों में उनके उसूलों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों के पास सच्चाई नहीं है, उनके स्वभाव मेंबिल्कुल कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ होता है। कहने का अर्थ यह नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति को जिसे अपनी मानवता के अभ्यास में बहुत अधिक अनुभव है, उसके स्वभाव में बदलाव अवश्य ही होगा; ऐसा तब होता है जब किसी व्यक्ति की प्रकृति के भीतर रहे शैतानी विषों में से कुछ विष परमेश्वर के ज्ञान और सत्य की उनकी समझ के कारण बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को शुद्ध कर दिया जाता है और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य व्यक्ति के भीतर जड़ जमा लेता है, उसका जीवन बन जाता है, और उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वह एक नया व्यक्ति बन जाता है, और इसीलिए उसका स्वभाव बदल जाता है। स्वभाव में परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि उनके बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हैं, कि वे अभिमानी थे लेकिन अब उनके शब्द तर्कसंगत हैं, कि वे पहले किसी की भी नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं—ये बाहरी परिवर्तन स्वभाव के परिवर्तन नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के परिवर्तन में ये अवस्थाएँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि उनका आंतरिक जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उसके भीतर के कुछ शैतानी विष हटा दिए जाते हैं, व्यक्ति का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया है, और इसमें से कुछ भी सांसारिक चीज़ों के जैसा नहीं है। वह स्पष्ट रूप से बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विषों को देखता है; उसने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इससे उसके जीवन के मूल्य बदल गए हैं—यह सबसे मौलिक परिवर्तन है और यही स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर" से उद्धृत

स्वभाव में बदलाव की एक विशेषता होती है। वो यह है कि, सत्य को स्वीकार करने और उन चीज़ों को मानने में सक्षम होना जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। चाहे कोई भी तुम्‍हें सुझाव दे—चाहे वे युवा हों या बूढ़े, चाहे तुम्‍हारी उनसे अच्छी तरह से पटती हो, चाहे तुम लोगों के बीच कोई शिकायत हो—जब तक कि वे कुछ ऐसा कहते हैं जो सही है, सत्य के अनुरूप है, और परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए फायदेमंद है, तब तक तुम इसे ग्रहण और स्वीकार कर सकते हो। तुम्‍हें किसी भी अन्य कारकों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह उस विशेषता का पहला पहलू है। दूसरा यह है कि किसी समस्‍या का सामना होने पर सत्य की खोज करने में सक्षम होना। उदाहरण के लिए, तुम किसी नई समस्या का सामना करते हो जिसे कोई भी नहीं समझता है, तो तुम सत्य की तलाश कर सकते हो, यह देख सकते हो कि बातों को सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप बनाने के लिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुम्‍हें क्या करना चाहिए। एक और विशेषता है परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना। तुम्‍हें परमेश्वर की इच्छा के बारे में कैसे मननशील होना चाहिए यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किस प्रकार अपने कर्तव्य को कर रहे हो और इस कर्तव्य में परमेश्वर की तुमसे क्या अपेक्षाएँ हैं। तुम्‍हें इस सिद्धांत को अच्‍छी तरह समझ लेना चाहिए। अपना कर्तव्‍य परमेश्‍वर की अपेक्षानुसार पूरा करना चाहिए, और इसे परमेश्‍वर को संतुष्‍ट करने के लिए करना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्‍वर की इच्‍छा भी समझनी चाहिए, और तुम्‍हारे कर्तव्‍य का वांछित परिणाम क्‍या है, एवं तुम्‍हे ज़िम्‍मेदारी और आस्‍थापूर्ण रूप से कार्य करना चाहिए। ये सभी परमेश्‍वर की इच्‍छा के प्रति विचारशील होने के तरीके हैं। यदि तू यह नहीं जानता है कि जो तू कर रहा है, उसमें परमेश्वर की इच्छा पर कैसे मननशील हुआ जाए, तो उसे पूरा करने के लिए, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तुझे कुछ खोज अवश्य करनी चाहिए। अगर आप इन तीन सिद्धांतों को अमल में ला सकें, आप उनके सहारे जिस तरह वास्तव में जी रहे हैं, उसे माप सकें, और अभ्यास के मार्ग को खोज सकें, तो फिर आप सैद्धांतिक तरीके से मामलों को संभाल रहे होंगे। चाहे आपका सामना जिस किसी भी बात से हो, या चाहे आपको जिस किसी भी समस्या से निपटना पड़ रहा हो, आपको हमेशा तलाश करनी चाहिये कि आपको किन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, उनमें से प्रत्येक में क्या विवरण शामिल हैं, उन्हें अमल में कैसे लाया जाये ताकि आप सिद्धांतों का उल्लंघन न करें। एक बार जब आप में इन बातों की स्पष्ट समझ होगी, तो आप स्वाभाविक रूप से सत्य पर अमल कर पाएँगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य को अभ्यास में ला कर ही तू भ्रष्ट स्वभाव के बंधनों को त्याग सकता है" से उद्धृत

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