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12. परमेश्वर के कार्य के तीनों चरण, मानवजाति का उद्धार करने के लिए किस प्रकार गहरे होते जाते हैं?

2017-11-08 17

परमेश्वर के वचन से जवाब:

मानवजाति के प्रबंधन करने के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, जिसका अर्थ यह है कि मानवजाति को बचाने के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है। इन चरणों में संसार की रचना का कार्य समाविष्ट नहीं है, बल्कि ये व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण हैं। संसार की रचना करने का कार्य, सम्पूर्ण मानवजाति को उत्पन्न करने का कार्य था। यह मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं था, और मानवजाति को बचाने के कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखता है, क्योंकि जब संसार की रचना हुई थी तब मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं की गई थी, और इसलिए मानवजाति के उद्धार का कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मानवजाति को बचाने का कार्य केवल मानवजाति के भ्रष्ट होने पर ही आरंभ हुआ, और इसलिए मानवजाति का प्रबंधन करने का कार्य भी मानवजाति के भ्रष्ट हो जाने पर ही आरम्भ हुआ।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

इस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य का महत्व, उद्देश्य, और चरण, पूरी पृथ्वी पर उसके कार्य का सूत्रपात करने के लिए थे, जो, इस्राएल को इसका केन्द्र लेते हुए, धीरे-धीरे अन्य जाति-राष्ट्रों में फैलते हैं। यही वह सिद्धांत है जिसके अनुसार वह तमाम विश्व में कार्य करता है—एक प्रतिमान स्थापना करना, और तब तक उसे फैलाना जब तक कि विश्व के सभी लोग उसके सुसमाचार को ग्रहण न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी, और वे जीवन की मूल आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समझते थे, किन्तु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है, या मनुष्य के लिए उसकी इच्छा को नहीं जानते थे, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानते थे कि समस्त सृष्टि के प्रभु का सम्मान कैसे करें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या पालन करने के लिए नियम और व्यवस्थाएँ थी, और कि क्या ऐसा कार्य था जो सृजित किए गए प्राणी को सृष्टा के लिए करना चाहिए: आदम के वंशज इन बातो के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और यह कि पत्नी को अपने पति के प्रति समर्पण करना चाहिए और उस मानव प्रजाति को बनाये रखना चाहिए जिसे यहोवा ने सृजित किया था। दूसरे शब्दों में, ये लोग, जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या समस्त सृष्टि के प्रभु को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल नहीं था और उनके बीच कभी-कभार ईर्ष्या और कलह उत्पन्न हो जाता था, तथापि उन्हें समस्त सृष्टि के प्रभु, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीज़ों को खाना और यहोवा की चीज़ों का आनन्द लेना जानते थे, किन्तु वे यहोवा का आदर करना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि यहोवा ही वह एक है जिसकी उन्हें घुटने टेककर आराधना करनी चाहिए। इसलिए वे उसका सृजन कैसे कहे जा सकते थे? यदि ऐसा हुआ होता, तो इन वचनों का क्या हुआ होता, "यहोवा समस्त सृष्टि का प्रभु है" और "उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसकी महिमा कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके" —क्या ये व्यर्थ में नहीं बोले गए होते? जिन लोगों में यहोवा के लिए आदर नहीं है वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे कैसे उसकी महिमा की अभिव्यक्तियाँ बन सकते थे? क्या यहोवा के ये वचन कि "मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया" तब दुष्टात्मा—शैतान के हाथों में हथियार नहीं बन जाते? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन के लिए अपमान का एक चिह्न नहीं बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद यहोवा ने आदम के समय से नूह के समय तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जब जल प्रलय ने दुनिया को नष्ट कर दिया उसके बाद ही ऐसा हुआ कि उसने औपचारिक तौर पर उन इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरम्भ किया जो नूह के और आदम के भी वंशज थे। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल के सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया जब वे इस्राएल के तमाम देश में अपना जीवन जीते थे, और इस तरह मानवजाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में अपना श्वास फूँकने में समर्थ है ताकि उसके पास परमेश्वर का जीवन हो सके, और मिट्टी में उठ कर एक सृजित किए गए मानव प्राणी बन सके, बल्कि मानवजाति पर शासन करने के लिए मानवजाति को भस्म कर सकता था, और मानवजाति को शाप दे सकता था और अपने राजदण्ड का उपयोग कर सकता था। तब भी, क्या उन्होंने देखा था कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता था, और मानवजाति के बीच दिन के घंटों और रात के घंटों के अनुसार बात कर सकता था और कार्य कर सकता था। उसने कार्य सिर्फ इसलिए किया था ताकि उसके जीवधारी जान सकें कि मनुष्य धूल से आया जिसे परमेश्वर द्वारा उठाया गया, और इसके अलावा यह कि मनुष्य उसके द्वारा बनाया गया था। न केवल इतना, बल्कि उसने इस्राएल में जो कार्य आरम्भ किया था वह इस आशय से था कि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा के सुसमाचार को प्राप्त कर सकें, ताकि विश्व में सभी सृजित प्राणी यहोवा का आदर करने और उसे महान होना ठहराने में समर्थ हो सकें। यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरम्भ नहीं किया होता, बल्कि उसके बजाए, मनुष्यों को बनाने के बाद, उन्हें पृथ्वी पर निश्चिन्त जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की शारीरिक प्रकृति के कारण (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीज़ों को कभी नहीं जान सकता है जिन्हें वह देख नहीं सकता है, जिसका अर्थ है, कि वह नहीं जानेगा कि यहोवा ने मानवजाति को बनाया है, और इस बात को तो बिल्कुल नहीं जानेगा कि उसने ऐसा क्यों किया है), वह कभी नहीं जानेगा कि यह यहोवा था जिसने मानवजाति को बनाया है अथवा कि वह समस्त सृष्टि का प्रभु है। यदि यहोवा ने अपने स्वयं के आनन्द की वस्तु होने के लिए मनुष्य का सृजन किया होता और उसे पृथ्वी पर रखा होता, और फिर एक अवधि तक मनुष्यों को मार्गदर्शन देने के लिए उनके बीच रहने की अपेक्षा ऐसे ही अपने हाथों की धूल झाड़ कर चला गया होता, तब उस स्थिति में सारी मानवता वापस शून्यता की ओर लौट गयी होती; यहाँ तक कि स्वर्ग और पृथ्वी और उसकी बनाई हुई असंख्य चीज़ें, और समस्त मानवजाति, शून्यता की ओर लौट गयी होती और इसके अलावा शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। इस तरह से यहोवा की यह इच्छा कि "पृथ्वी पर, अर्थात्, उसके सृजन के बीच में, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान होना चाहिए" टूटकर बिखर गई होती। और इसलिए, मानवजाति को बनाने के बाद, वह उनके जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने, और उनके बीच में से उनके साथ बात करने में समर्थ था, सब कुछ अपनी इच्छा को साकार करने, और अपनी योजना को प्राप्त करने के लिए था। जो कार्य उसने इस्राएल में किया वह केवल उस योजना को क्रियान्वित करने के अभिप्राय से था जिसे उसने सभी चीज़ों की रचना करने से पहले निर्धारित किया था, और इसलिए सबसे पहले इस्राएलियों के मध्य उसका कार्य करना और उसका सभी चीज़ों का सृजन करना एक दूसरे से असंगत नहीं थे, बल्कि दोनों उसके प्रबन्धन, उसके कार्य और उसकी महिमा के वास्ते थे, और उसके मानवजाति के सृजन के अर्थ को और अधिक गहरा करने के लिए थे। उसने नूह के बाद दो हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन किया, जिस दौरान उसने मानवजाति को यह समझना सिखाया कि समस्त सृजन के प्रभु यहोवा का किस प्रकार आदर करें, अपने जीवन को कैसे चलाएँ और कैसे जीवन बिताएँ, और सबसे बढ़कर, किस प्रकार यहोवा के गवाह के रूप में कार्य करें, कैसे उसे आज्ञाकारिता प्रस्तुत करें, और उसका सम्मान करें, और यहाँ तक कि कैसे दाऊद और उसके याजकों के समान संगीत के साथ उसकी स्तुति करें।

दो हज़ार वर्षों से पूर्व जिस दौरान यहोवा ने अपना कार्य किया, मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और, लगभग समस्त मानवजाति चरित्रहीनता में पतित हो गई थी, जल प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, वे स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई तक पहुँच गए थे; जिसमें उनके हृदय यहोवा से रिक्त थे, उसके मार्ग से तो और भी अधिक रिक्त थे। उन्होंने उस कार्य को कभी नहीं समझा था जिसे यहोवा करने जा रहा था; उनमें समझ का अभाव था, और ज्ञान तो बिलकुल भी नहीं था, और, एक साँस लेती हुई मशीन के समान, वे मनुष्य, परमेश्वर, संसार और सदृश चीज़ों से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान बहुत से प्रलोभनों में व्यस्त थे, और बहुत सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा का अपमान करती थी, लेकिन क्योंकि वे अनभिज्ञ थे इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ित या अनुशासित नहीं किया था। केवल जलप्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, यहोवा विधिवत् रूप से नूह के सामने प्रकट हुआ और इन कुल 2,500 वर्षों में, उसने उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया, और व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जलप्रलय में जिन्दा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुआई की। वह इस्राएल में कार्य पर था, अर्थात्, 2,000 वर्षों तक विधिवत रूप से इस्राएल में कार्य पर था, और 500 वर्षों तक एक ही समय में इस्राएल और उसके बाहर कार्य पर था, जो साथ मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "व्यवस्था के युग में कार्य" से

अनुग्रह के युग में, मनुष्य पहले से ही शैतान की भ्रष्टता से गुज़र चुका था, और इसलिए समस्त मानवजाति को छुटकारा देने के कार्य हेतु, अनुग्रह की भरमार, अनन्त सहनशीलता और धैर्य, और उससे भी बढ़कर, मानवजाति के पापों का प्रयाश्चित करने के लिए पर्याप्त बलिदान की आवश्यकता थी ताकि इसके प्रभाव तक पहुँचा जा सके। अनुग्रह के युग में मानवजाति ने जो देखा वह मानवजाति के पापों के प्रायश्चित के लिए मेरी भेंट मात्र था, अर्थात्, यीशु। वे केवल इतना ही जानते थे कि परमेश्वर दयावान और सहनशील हो सकता है, और उन्होंने केवल यीशु की दया और करूणामय-प्रेम को देखा था। ऐसा पूरी तरह से इसलिए था क्योंकि वे अनुग्रह के युग में रहते थे। और इसलिए, इससे पहले कि उन्हें छुटकारा दिया जा सके, उन्हें कई प्रकार के अनुग्रह का आनन्द उठाना था जो यीशु ने उन्हें प्रदान किए थे; केवल यही उनके लिए लाभदायक था। इस तरह, उनके द्वारा अनुग्रह का आनन्द उठाने के माध्यम से उन्हें उनके पापों से क्षमा किया जा सकता था, और यीशु की सहनशीलता और धीरज का आनन्द उठाने के माध्यम से उनके पास छुटकारा पाने का एक अवसर भी हो सकता था। केवल यीशु की सहनशीलता और धैर्य के माध्यम से ही उन्होंने क्षमा पाने का अधिकार प्राप्त किया और यीशु के द्वारा दिए गए अनुग्रह की भरमार का आनन्द उठाया—वैसे ही जैसे कि यीशु ने कहा था, “मैं धार्मिकों को नहीं बल्कि पापियों को छुटकारा दिलाने, पापियों को उनके पापों से क्षमा किए जाने की अनुमति देने आया हूँ।” यदि यीशु मनुष्य के अपराधों के न्याय, अभिशाप, और असहिष्णुता के स्वभाव के साथ देहधारी होता, तो मनुष्य के पास छुटकारा पाने का अवसर कभी नहीं होता, और वह हमेशा के लिए पापी रह गया होता। यदि ऐसा हुआ होता, तो छः-हज़ार-सालों की प्रबन्धन योजना व्यवस्था के युग में रुक गई होती, और व्यवस्था का युग छः-हज़ार-साल बढ़ गया होता। मनुष्य के पापों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई होती और पाप बहुत दारुण हो गए होते, और मानवजाति के सृजन का कोई अर्थ नहीं रह गया होता। मनुष्य केवल व्यवस्था के अधीन ही यहोवा की सेवा करने में समर्थ हो पाता, परन्तु उसके पाप सबसे पहले सृजन किए गए मनुष्यों से बढ़कर हो गए होते। जितना ज़्यादा प्रेम यीशु ने मानवजाति को उसके पापों को क्षमा करते हुए और उन पर पर्याप्त दया और करूणामय-प्रेम लाते हुए किया, उतना ही ज़्यादा मानवजाति ने बचाए जाने, खोई हुई भेड़ कहलाने, की क्षमता प्राप्त की जिन्हें यीशु ने बड़ी कीमत देकर वापिस खरीदा था। शैतान इस काम में गड़बड़ी नहीं डाल सकता था, क्योंकि यीशु ने अपने अनुयायियों के साथ इस तरह से व्यवहार किया था जैसे एक करूणामयी माता अपने नवजात को अपने आलिंगन में लेकर करती है। वह उन पर क्रोधित नहीं हुआ या उनका तिरस्कार नहीं किया, बल्कि सांत्वना से भरा हुआ था; वह उनके बीच कभी भी अचानक बहुत क्रोधित नहीं हुआ; बल्कि उनके पापों के साथ धैर्य रखा और उनकी मूर्खता और अज्ञानता के प्रति आँखें मूँद ली, यह कह कर कि, "दूसरों को सत्तर गुना सात बार क्षमा करो।" इसलिए उसके हृदय ने दूसरों के हृदयों को रूपांतरित कर दिया। यह इसी तरह से था कि लोगों ने उसकी सहनशीलता के माध्यम से अपने पापों से क्षमा प्राप्त की।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से

इस चरण को ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार, और साथ ही अनुशासन तथा वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर के अधर्मों को प्रकट करने के लिए पूरा किया जाता है, ताकि बाद में उसे बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने पर्याप्त अनुग्रह का आनन्द उठाया और उसने पहले से ही इस अनुग्रह का अनुभव कर लिया है, और इस लिए मनुष्य के द्वारा इसका अब और आनन्द नहीं उठाया जाना है। ऐसा कार्य अब चलन से बाहर हो गया है तथा अब और नहीं किया जाना है। अब, मनुष्य को वचन के द्वारा न्याय के माध्यम से बचाया जाता है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसे परिष्कृत करने के पश्चात्, उसके परिणामस्वरूप उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह उन वचनों की वजह से नहीं है जिन्हें मैंने कहा है? कार्य के प्रत्येक चरण को समूची मानवजाति की प्रगति और उस युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य का अपना महत्व है; इसे अंतिम उद्धार के लिए, मानवजाति की भविष्य में एक अच्छी नियति के लिए, और अंत में मनुष्य को उसके प्रकार के अनुसार विभाजित करने के लिए, किया जाता है।

अंत के दिनों का कार्य वचनों को बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जो चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों पर हुए थे। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना करने के साथ ही दुष्टात्माएँ मनुष्य से निकल जाती थी, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा किया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु बस वह कार्य, कि किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकला जा सकता है, उसमें नहीं किया गया था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना रहा था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अज्ञात और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा यह विश्वास किया कि वह दाऊद का पुत्र है और उसके एक महान भविष्यद्वक्ता और उदार प्रभु होने की घोषणा की जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र के छोर को छू कर ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। हालाँकि, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं समझ सका और न ही मनुष्य यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई के इत्यादि। शेष मनुष्य भले कर्म और उनका ईश्वरीय प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक अच्छा विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। उन्होंने बस पाप किए थे, फिर परिवर्तित स्वभाव की ओर बिना किसी मार्ग वाले निरंतर चक्र में पाप-स्वीकारोक्ति की थी; अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया था? नहीं! इसलिए, उस चरण के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाता है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर नहीं जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उनके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए कहता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)" से

मनुष्य के उद्धार के कार्य में, तीन चरणों को सम्पन्न किया जा चुका है, कहने का तात्पर्य है कि शैतान की सम्पूर्ण पराजय से पहले शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभक्त किया गया है। फिर भी शैतान के साथ युद्ध के सम्पूर्ण कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करने, और मनुष्य के लिए पापबलि बनने, मनुष्य के पापों को क्षमा करने, मनुष्य पर विजय पाने, और मनुष्यों को सिद्ध बनाने के माध्यम से इसके प्रभावों को हासिल किया जाता है। सच तो यह है कि शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि मनुष्य का उद्धार है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है ताकि वह परमेश्वर के लिए गवाही दे सके। इसी रीति से शैतान को पराजित किया जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलकर ही शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाता है, अर्थात्, जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाता है, तो लज्जित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस रीति से, मनुष्य को पूरी तरह से बचाया लिया जाएगा। और इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का मूल-तत्व शैतान के साथ युद्ध है, और शैतान के साथ युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिम्बित होता है। अंतिम दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य पर विजय पानी है, शैतान के साथ युद्ध में अंतिम चरण है, और साथ ही शैतान के प्रभुत्व से मनुष्य के सम्पूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आन्तरिक अर्थ है मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप, इंसान का सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौटेगा। इस रीति से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इस प्रकार, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के लिए परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना, मनुष्य का सम्पूर्ण उद्धार अन्ततः असंभव होगा, शैतान की सम्पूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानवजाति कभी अपनी बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश करने में, या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरुप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार के कार्य को समाप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केन्द्रीय भाग मानवजाति के उद्धार के लिए है। एकदम आरंभ में मानवजाति परमेश्वर के हाथों में थी, परन्तु शैतान के प्रलोभन एवं भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान के द्वारा बांधा गया था और वह उस दुष्ट जन के हाथों में पड़ गया था। इस प्रकार, शैतान वह लक्ष्य बन गया था जिसे परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य में पराजित किया जाना था। क्योंकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन की पूंजी (सम्पदा) है, यदि मनुष्य का उद्धार करना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान के द्वारा बन्दी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है जो उसके मूल एहसास को पुनः स्थापित करता है, और इस रीति से मनुष्य को, जिसे बन्दी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य को शैतान के प्रभाव एवं दासता से स्वतन्त्र किया जाता है, तो शैतान शर्मिन्दा होगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा और शैतान को हरा दिया जाएगा। और क्योंकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से स्वतन्त्र किया गया है, इसलिए मनुष्य इस सम्पूर्ण युद्ध का लूट का सामान बन जाएगा, और जब एक बार यह युद्ध समाप्त हो जाता है तो शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दण्डित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मनुष्य के उद्धार के सम्पूर्ण कार्य को पूरा कर लिया जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

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