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VIII मानवजाति को शैतान कैसे भ्रष्ट करता है, इसे प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

VIII मानवजाति को शैतान कैसे भ्रष्ट करता है, इसे प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

1. जब अभी तक इस पृथ्वी का अस्तित्व नहीं था, तब प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार क्षेत्र था; और यही अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर के विरुद्ध और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात इसलिए किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना और परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर होना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति द्वारा परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवाना और परमेश्वर के बजाय अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत सी चीज़ें हैं जो उसका आज्ञापालन करती थीं; स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मानते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मानते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थी जबकि आदम और हव्वा उसका आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से अधिक बढ़कर होना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। बाद में उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो तब विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से उद्धृत

2. सबसे पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा का सृजन किया, और उसने साँप का भी सृजन किया। सभी चीज़ों में साँप सर्वाधिक विषैला था; उसकी देह में विष था, और शैतान उस विष का उपयोग करता था। यह साँप ही था जिसने पाप करने के लिए हव्वा को प्रलोभित किया। हव्वा के बाद आदम ने पाप किया, और तब वे दोनों अच्छे और बुरे के बीच भेद करने में समर्थ हो गए थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से उद्धृत

3. आओ हम "सर्प के द्वारा स्त्री को प्रलोभन" देने के विषय में बातचीत करें। यह सांप कौन है? (शैतान।) शैतान ने परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना में विषमता के माध्‍यम से तुलना प्रदान करने की भूमिका निभाई है ... हम उसके शब्दों एवं कार्यों से देखेंगे कि शैतान कैसे काम करता है, वह मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, उसका स्‍वभाव किस प्रकार का है और उसके हाव-भाव किसके समान है। अतः स्त्री ने सर्प से क्या कहा था? जो कुछ यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा था उसने उसे सांप के सामने दोहराया। जो कुछ उसने कहा था उसे देखते हुए, क्या उसने उन सबकी पुष्टि की जो परमेश्वर ने उससे कहा था? वह इसकी पुष्टि नहीं कर सकती थी, क्‍या वह ऐसा कर सकती थी? एक ऐसे प्राणी के रूप में जिसका नया-नया सृजन किया गया था, उसके पास भले एवं बुरे को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, न ही उसमें उसके आस पास की किसी भी चीज़ को जानने की योग्यता थी। अगर हम उन शब्दों को देखें जो उसने सर्प से कहे थे तो उसने परमेश्वर के वचनों के सही होने की पुष्टि नहीं की थी; ऐसा उसका रवैया था। अतः जब सर्प ने देखा कि परमेश्वर के वचनों के प्रति स्त्री का कोई निश्चित रवैया नहीं है, तो उसने कहा, "तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या इन शब्दों में कुछ ग़लत है? इस वाक्य को पढ़ने के बाद, क्या तुम लोगों को सर्प के इरादों का कोई आभास मिला? कि सर्प के इरादे क्या हैं? (मनुष्य को पाप करने के लिए लुभाना।) वह उस स्त्री को लुभाना चाहता है ताकि वह परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुनने से उसे रोके, लेकिन उसने इसे सीधे तौर पर नहीं कहा। अतः हम कह सकते हैं कि वह बहुत ही चालाक है। वह अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुंचने के लिए धूर्त एवं कपटपूर्ण तरीके से इसके अर्थ को व्यक्त करता है जिसे वह मनुष्य से छिपाकर अपने अंदर रखता है—यह सर्प की धूर्तता है। शैतान ने सदा इस प्रकार से ही बातचीत और कार्य किया है। वह किसी तरह की पुष्टि किए बिना कहता है "निश्चित नहीं।" परन्तु इसे सुनने के बाद, इस अबोध स्त्री का हृदय द्रवित हो गया। सर्प प्रसन्न हो गया चूँकि उसके शब्दों ने इच्छित प्रभाव पैदा किया था—यह सर्प का धूर्त इरादा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से उद्धृत

4. जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थीं। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। और इसलिए, मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए, सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांतों को व्यक्त करने के लिए कई सामाजिक वैज्ञानिक, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ उत्पन्न हो गए, जिन्होंने इस सच्चाई की अवहेलना की कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है। इस तरह, जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है वे बहुत ही कम रह गए, और वे जो विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं उनकी संख्या और भी अधिक बढ़ गई। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथकों और पौराणिक कथाओं के रूप में मानते हैं। लोग, अपने हृदयों में, परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति कि परमेश्वर का अस्तित्व है और सभी चीज़ों पर प्रभुत्व धारण करता है, उदासीन बन जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रह जाते हैं। मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ...कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण करता और उसे सँवारता है। और इस तरह, मनुष्य की जानकारी में न रहते हुए, मानव सभ्यता मनुष्यों की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गयी है, और कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रह कर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतों को हवा देते हैं। क्योंकि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए शासक और समाजशास्त्री अपना कितना दिमाग ख़पाते हैं, परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना, यह किसी लाभ का नहीं है। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता है, क्योंकि मनुष्य का जीवन कोई नहीं बन सकता है, और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता है जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी सुख हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य निश्चित रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और यह नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा। इस संसार में, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या तुम एक स्वंतत्र देश में या बिना मानव अधिकार वाले देश में रहते हो, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा अयोग्य हो। चाहे तुम एक शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज की इच्छा से बच कर भागने में सर्वथा अक्षम हो। खालीपन के व्याकुल करने वाले अनुभव से बचकर भागने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। इस प्रकार की घटनाएँ जो समस्त मानवजाति के लिए साधारण हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

5. विज्ञान जो करता है वह है कि यह लोगों को इस भौतिक जगत की वस्तुओं को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा मात्र को सन्तुष्ट करता है; यह मनुष्य को उन नियमों को नहीं देखने देता है जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान के द्वारा उत्तर पाता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के मन को केवल इस भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से हर चीज़ का उत्तर मिल गया है, इसलिए जो कुछ भी मामला उठ खड़ा होता है, वे अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर उसे साबित या स्वीकृत करने का प्रयास करते हैं। मनुष्य का हृदय विज्ञान से ग्रस्त हो जाता है और उसके द्वारा इस हद तक बहक जाता है जहाँ मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने, और यह विश्वास करने का अब और मन नहीं होता है कि सभी चीज़ें परमेश्वर से ही आती हैं, और उत्तरों को पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर ही देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? कोई व्यक्ति विज्ञान में जितना अधिक विश्वास करता है, वह यह मानते हुए कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है, उतना ही अधिक बेहूदा हो जाता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते हैं और यह विश्वास नहीं करते हैं कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कुछ लोग जिन्होंने कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाएँगे या किसी मुद्दे के उत्तर के लिए जानकारी की खोज करेंगे। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते हैं और अधिकांश मामलों में ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान पर या समस्या के समाधान करने के लिए वैज्ञानिक उत्तरों पर भरोसा करते हैं; किन्तु वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते हैं। क्या इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म विशेषज्ञ हैं जो उस स्थान पर गए हैं जहाँ महान जल प्रलय के बाद जहाज़ रुका था। उन्होंने जहाज़ को तो देख लिया है, किन्तु जहाज के प्रकटन में उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखा। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं। यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। यदि तुम भौतिक चीजों पर ही शोध करोगे, चाहे यह सूक्ष्म जीव विज्ञान हो, खगोलशास्त्र या भूगोल हो, तुम कभी भी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे जो कहता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर का अध्ययन करने की अनुमति नहीं दे रहा है? क्या यह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे अधिक संशयात्मक नहीं बनाता है? (हाँ।) तो किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिये वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता है, और शैतान लोगों के हृदयों को पकड़े रखने के लिये अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग करता है ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें। (हाँ।) इसलिए हम कहते हैं कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" से उद्धृत

6. मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में, शैतान ने काफी कुछ अपने जीवन के फ़लसफ़े और अपनी सोच को भर दिया है, और जब शैतान ऐसा करता है, तो शैतान मनुष्य को शैतान की सोच, फ़लसफ़े, और दृष्टिकोण को अपनाने देता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सब चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व और मनुष्य के भाग्य पर प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन प्रगति करता है, वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह महसूस करता है कि परमेश्वर का अस्तित्व धुँधला होता जाता है और यह भी महसूस कर सकता कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। क्योंकि शैतान ने अपने दृष्टिकोणों, अवधारणाओं, और विचारों को मनुष्य के मन में भर दिया है, तो जब शैतान ये विचार मनुष्य के दिमाग में भरता है, तो क्या मनुष्य इसके द्वारा भ्रष्ट नहीं हो जाता है? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित करता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर आश्रित हो रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोण और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है जो कि इस ज्ञान में छिपे हुए हैं। यहीं पर शैतान की मनुष्य की भ्रष्टता का मर्म घटित होता है, यही शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" से उद्धृत

7. शैतान ज्ञान को एक चारे के रूप में उपयोग करता है। ध्यान से सुनें: यह बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि "कठिन अध्ययन करें और प्रति दिन बेहतर बनें," किसी हथियार के रूप में, ज्ञान के साथ स्वयं को सुसज्जित करें, फिर विज्ञान के द्वार को खोलने के लिए ज्ञान का उपयोग करें; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करते हो, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है। शैतान मनुष्य को साथ ही ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए भी कहता है, ठीक उसी समय जब वे ज्ञान सीख रहे होते हैं, वह उन्हें बताता है कि उनके पास महत्वाकांक्षाएँ एवं आदर्श हों। लोगों की जानकारी के बिना, शैतान इस प्रकार के अनेक सन्देश देता है, लोगों को अवचेतन रूप से यह महसूस करवाता है कि ये चीज़ें सही हैं, या लाभप्रद हैं। अनजाने में, लोग इस प्रकार के मार्ग पर चलते हैं, अनजाने में ही अपने स्वयं के आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा आगे बढ़ने को बाध्‍य किए जाते हैं। कदम दर कदम, लोग अनजाने में ही शैतान के द्वारा दिए गए ज्ञान से महान या प्रसिद्ध लोगों की सोच को सीखते हैं। वे कुछ ऐसे लोगों के कर्मों से एक के बाद दूसरी चीज़ भी सीखते हैं जिन्हें लोग नायक मानते हैं। शैतान इन नायकों के कर्मों के सन्दर्भ में मनुष्य के लिए किस बात का समर्थन कर रहा है? वह मनुष्य के मन के भीतर क्या बिठाना चाहता है? मनुष्य को देशभक्त अवश्य होना चाहिए, उसके पास राष्ट्रीय अखण्डता अवश्य होनी चाहिए, और उसे वीरोचित अवश्य होना चाहिए। मनुष्य कुछ ऐतिहासिक कहानियों से या प्रसिद्ध वीरोचित व्यक्तियों की कुछ जीवनी से क्या सीखता है? अपने साथी के लिए या किसी मित्र के लिए व्यक्तिगत वफादारी के एहसास का होना, या उसके लिए कुछ भी कर गुज़रना। शैतान के इस ज्ञान के अंतर्गत, मनुष्य अनजाने में कई नकारात्‍मक चीज़ों को सीखता है। अनभिज्ञता के बीच, शैतान के द्वारा उनके लिए तैयार किए गए बीजों को उनके अपरिपक्व मनों में बो दिया जाता है। ये बीज उन्हें यह महसूस करवाते हैं कि उन्हें महान मनुष्य होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए, नायक होना चहिए, देशभक्त होना चाहिए, ऐसे लोग होना चाहिए जो अपने परिवार से प्रेम करते हैं, या ऐसे लोग होना चाहिए जो एक मित्र के लिए कुछ भी करेंगे और व्यक्तिगत वफादारी का एहसास रखेंगे। शैतान के द्वारा बहकाए जाने के द्वारा, वे अनजाने में ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे उसने उनके लिए तैयार किया था। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियमों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। अनजाने में और अपने आप में पूरी तरह से बेखबर, वे जीवन जीने के अपने स्वयं के नियम विकसित कर लेते हैं, जबकि ये शैतान के उन नियमों से बढ़कर और कुछ भी नहीं होते हैं जिन्हें जबरदस्ती उनके भीतर बैठा दिया गया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान उन्हें अपने स्वयं के लक्ष्यों को बढ़ावा देने, अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को, जीवन जीने के सिद्धान्तों को, और जीवन की दिशा को निर्धारित करने के लिए उकसाने का कारण बनता है, इसी बीच कहानियों का उपयोग करके, जीवनियों का उपयोग करके, और सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करके उनमें शैतान की चीज़ों को भरता है, ताकि वे थोड़ा-थोड़ा करके उसके चारे को निगल लें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

8. मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है, चाहे यह कहानियों की व्याख्या करना हो, ज्ञान का मात्र एक अंश देना हो, या उन्हें अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने देना हो या अपने आदर्शों को संतुष्ट करने देना हो। शैतान तुम्हें किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी ग़लत नहीं है, कि यह तो स्वाभाविक बात है। इसे हल्के ढंग से कहें तो, ऊँचे विचारों को बढ़ावा देना और महत्वाकांक्षाओं का होना आकांक्षाओं को रखना है, और यह जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें, या अपने जीवन में कोई जीवनवृत्ति बना सकें—तो क्या उस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं है? उस प्रकार से न केवल किसी व्यक्ति के पूर्वजों का सम्मान करना बल्कि संभवतः इतिहास पर अपनी छाप छोड़ देना—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी बात है, और उनके लिए यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। हालाँकि, क्या शैतान अपनी भयावह मंशाओं के साथ, लोगों को बस इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और तब निर्णय लेता है कि यह पूरा हो गया है? कदापि नहीं। वास्तव में, मनुष्य के आदर्श चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, चाहे मनुष्य की इच्छाएँ कितनी ही वास्तविक क्यों न हों या वे कितनी ही उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह जटिल रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बिठाने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? वे हैं "प्रसिद्धि" और "लाभ"। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का मार्ग चुनता है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का अतिवादी मार्ग नहीं है। अनभिज्ञता के मध्य, लोग शैतान के जीवन जीने के तरीके, जीवन जीने के उसके नियमों को स्वीकार करने लगते हैं, जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करते हैं, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में आदर्शों को प्राप्त करने लगते हैं। चाहे जीवन में ये आदर्श कितने ही ऊँचे प्रतीत क्यों न होते हों, ये केवल एक बहाना है जो प्रसिद्धि और लाभ से जटिलता से जुड़ा हुआ है। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, वास्तव में सभी लोग, वे जीवन में जिस किसी चीज़ का अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए उनका लाभ उठा सकते हैं। जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे देह के सुख विलास की अपनी खोज में और अनैतिक आनन्द में उनका लाभ उठा सकते हैं। लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियतियों को ले जा कर शैतान के हाथों में सौंप देते हैं ताकि उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्हें लालसा है। लोग वास्तव में इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और इस सब कुछ को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं। क्या लोगों के पास तब भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति इस प्रकार से वफादार हो जाते हैं? कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सर्वथा शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सर्वथा दलदल में धंस गए हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ हैं। एक बार जब कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में पड़ जाता है, तो वह आगे से उसकी खोज नहीं करता है जो उजला है, जो धार्मिक है या उन चीज़ों को नहीं खोजता है जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रसिद्धि एवं लाभ की जो मोहक शक्ति लोगों के ऊपर है वह बहुत बड़ी है, और वे लोगों के लिए उनके पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि पूरे अनंतकाल तक अनवरत अनुसरण करने की चीज़ें बन जाती हैं। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से अधिक और कुछ नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं हेतु बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त धन कमा सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? इस प्रकार के कोई लोग नहीं हैं। तो यह किसके लिए है कि वह इन सारे वर्षों में इन कठिनाईयों एवं कष्टों को सहन करता है? यह प्रसिद्धि और लाभ के लिए है: प्रसिद्धि एवं लाभ आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे पुकार रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाईयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाईयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर यह ज्ञान क्या है? क्या यह जीवन जीने के नियम नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिन्हें उनके ज्ञान सीखने के दौरान शैतान के द्वारा उन्हें सिखाया गया है? क्या यह जीवन के ऊँचे आदर्श नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के आदर्शों, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीरोचित लोगों की बहादुरी के जोश को लें, या नायकों और सामरिक उपन्यासों में तलवारबाज़ों के शौर्य एवं उदारता को लें। (हाँ, ऐसा है।) ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को इन विचारों को स्वीकार करने, इन विचारों के लिए जीने और इनका अनवरत अनुसरण के लिए लाया जाता है। यही वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसमें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

9. तो शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक वे जो भी सोच सकते हैं वह प्रसिद्धि एवं लाभ न हो। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाईयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए वे किसी भी प्रकार का मूल्यांकन करेंगे या निर्णय लेंगे। इस तरह से, शैतान मनुष्य को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है। ये बेड़ियों लोगों के ऊपर जन्‍मजात, और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। अतः लोग अनजाने में ही इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को नकार देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा वह और भी अधिक दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी को शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ में नष्ट हो जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

10. हजारों वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मानव की सोच और अवधारणाओं तथा मानसिक दृष्टिकोण को अभेद्य और अध्वंस्य[1] हो जाने की सीमा तक बंद कर दिया है। मनुष्य नरक के अट्ठारहवें स्तर में रहता है, मानो कि मनुष्यों को परमेश्वर द्वारा कालकोठरियों में निष्कासित कर दिया गया हो, जहाँ वे रोशनी को कभी न देख सकें। सामंतवादी सोच ने मनुष्यों का इस तरह दमन किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें विरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है और वे बस चुपचाप सहते और सहते हैं...। धर्म और न्याय के लिए लड़ने या खड़े होने का किसी ने भी साहस नहीं किया है; सालों-साल, दिन-ब-दिन सामंती मालिकों के उत्पीड़न और हमलों तले, वे बस एक जीवन जीते हैं जो एक जानवर के जीवन से बेहतर नहीं होता। मनुष्य ने कभी धरती पर खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश नहीं की है। ऐसा लगता है कि मनुष्य को पीट कर गिरा दिया गया है, शरद ऋतु में गिरने वाले सूखे और भूरे पत्तों की तरह। मनुष्यों ने बहुत पहले ही अपनी याददाश्त खो दी है और मानव जाति नामक नरक में वे असहाय रहते हैं, आखिरी दिन के इंतजार में ताकि वे नरक के साथ ही मर-मिट जाएँ, मानो कि वह आखिरी दिन जिस की वे चाह रखते हैं वो दिन हो जब वे आरामदायक शान्ति का आनंद लेंगे। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुंचा दिया है, जिससे व्यक्ति की विरोध करने की क्षमता और भी कम हो गई है। विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न के तले मनुष्य धीरे-धीरे अधोलोक में और गहरा गिर गया तथा परमेश्वर से और दूर हो गया। अब, परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पूर्ण अजनबी रह गया है, और जब वे मिलते हैं तो मनुष्य अब भी कतरा कर उससे बच निकलने की जल्दी करते हैं। मनुष्य उसकी नहीं सुनता है और उसे इस तरह अलग कर देता है जैसे कि उसने उसे पहले कभी जाना या देखा ही न हो। मानव जीवन की लंबी यात्रा के दौरान परमेश्वर प्रतीक्षा करता रहा है लेकिन उसने कभी अपने अनियंत्रित रोष को मानव के प्रति निर्देशित नहीं किया है। वह केवल मनुष्य के पश्चाताप करने और नए सिरे से शुरूआत करने की मौन प्रतीक्षा कर रहा है। परमेश्वर मनुष्य की दुनिया में काफी पहले आया और मनुष्य की तरह ही पीड़ा सहन करता है। वह कई सालों से मनुष्य के साथ रहा है और किसी ने भी उसके अस्तित्व की खोज नहीं की है। परमेश्वर मानव जगत के दुखों को चुपचाप सहन करता रहा है, उस काम को पूरा करते हुए जिसे वह अपने साथ लाया है। परमपिता परमेश्वर की इच्छा और मानव जाति की ज़रूरतों के लिए वह सहता रहा है, उस पीड़ा को झेलते हुए जिसका मनुष्य ने पहले कभी अनुभव नहीं किया। मनुष्य के सामने, उसने चुपचाप सेवा की है और खुद को नम्र किया है, परमपिता परमेश्वर की इच्छा और मानव जाति की ज़रूरतों की खातिर। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने चुपचाप मनुष्य को परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को दुष्टों के राजा और उसके पुत्रों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स ने मनुष्य की सोच और अवधारणाओं को विद्रोह के एक और युग में पहुँचा दिया है, जिससे मनुष्य उनकी और भी आराधना करता है जिन्होंने उन पुस्तकों और क्लासिक्स को लिखा था, इसने परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा को भी बढ़ाया है। दुष्टों के राजा ने निर्दयतापूर्वक मानव जाति के दिल से, उनकी जानकारी के बिना, परमेश्वर को बाहर निकाल दिया, जबकि उसने मनुष्य के दिल को हर्षपूर्वक हथिया लिया। तब से मनुष्य, दुष्टों के राजा का चेहरा धारण करने वाली एक बदसूरत और दुष्ट आत्मा के के अधीन हो गया था। परमेश्वर के प्रति घृणा उनके सीनों में भर गई, और दुष्टों के राजा की दुर्भावना दिन-ब-दिन आदमी के भीतर फैलती गई, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से बर्बाद नहीं हो गया। मनुष्य को अब स्वतंत्रता नहीं थी, और वह दुष्टों के राजा के चंगुल से मुक्त होने में असमर्थ था। इसलिए, उसे आत्मसमर्पण करते हुए और उसके अधीन होते हुए मनुष्य केवल एक ही जगह ठहर कर कब्जाया जा सकता था। इसने बहुत पहले मनुष्य के युवा दिल के भीतर नास्तिकता के फोड़े का बीज बोया था, उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखाते हुए जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में सीखो, चार आधुनिकीकरणों को समझो, दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है।" यही नहीं, इसने बार-बार घोषित किया, "आओ, हम अपने मेहनती श्रमिकों के माध्यम से एक खूबसूरत मातृभूमि का निर्माण करें," सभी को अपने देश की सेवा करने के लिए बचपन से तैयार रहने के लिए कहा। मनुष्य को अनजाने में इसके सामने लाया गया था, और इसने बेझिझक सारा श्रेय ले लिया (परमेश्वर द्वारा सभी मनुष्यों को अपने हाथों में रखने के संदर्भ में)। कभी एक बार भी इसने शर्म महसूस नहीं की, न ही शर्मिंदगी की कोई भावना रखी। इसके अलावा, उसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को लाकर अपने घर में बंदी बना लिया, जबकि वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलता रहा और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। वह ऐसा आततायी है! ऐसे चौंकाने वाले लांछनों को वह चीख-चीखकर कहता है, "दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण बहती है; बारिश वो नमी है जो द्रवीभूत होकर पृथ्वी पर बूंदों में गिर जाती है; भूविज्ञान सम्बन्धी परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना ही भूकंप है; सूरज की सतह पर नाभिक खलल के कारण हवा का शुष्क हो जाना ही सूखा पड़ने की वजह है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। कौन-सा हिस्सा परमेश्वर का कार्य है?" यहाँ तक कि चिल्लाते[क] हुए वह ऐसी बेशर्म बातें भी करता है: "मनुष्य प्राचीन वानरों से विकसित हुआ है, और लगभग एक अरब साल पहले के एक आदिम समाज से प्रगति करते हुए आज की दुनिया विकसित हुई है। किसी देश के बढ़ने या गिरने का फैसला उसके लोगों के हाथों द्वारा किया जाता है।" पीछे, मनुष्यों से इसे दीवारों पर उल्टा लटकाने के लिए कहा जाता है और इसे मेज पर संजोकर रख दिया जाता है और इसकी आराधना की जाती है। जब वह चीखता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," तो वह खुद को परमेश्वर मानता है, परमेश्वर को धरती की सीमाओं से लगातार बाहर धकेलता है। वह परमेश्वर की जगह में खड़ा होता है और दुष्टों के राजा के रूप में कार्य करता है। यह तो निपट हास्यास्पद है! उसकी वज़ह से कोई व्यक्ति जहरीली नफरत से भर सकता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर उसका कट्टर दुश्मन है, और परमेश्वर उसके साथ असंगत है। वह परमेश्वर को दूर भगाने के षड्यंत्र बनाता है जबकि वह अदंडित और स्वतंत्र[2] रहता है। ऐसा है यह दुष्टों का राजा! हम उसके अस्तित्व को कैसे सह सकते हैं? जब तक वह परमेश्वर के काम को छेड़कर उसे फटेहाल, उलट-पुलट[3] नहीं कर लेता है, तब तक वह चैन से नहीं रहेगा, मानो कि वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि मछली न मर जाए या जाल न फट जाए। वह जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है और लगातार करीब आता जाता है। उसके घिनौने चेहरे को बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब किया गया है और अब वह आहत और पिटा हुआ[4] है, एक भयानक दुर्दशा में, फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करने में नरम नहीं पड़ता है, मानो कि वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पाने के लिए, परमेश्वर को पूरी तरह से एक ही कौर में पूरा निगल जाना चाहता है। हम इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं, परमेश्वर के इस घृणित शत्रु को! केवल इसका उन्मूलन और पूर्ण विनाश हमारे जीवन की इच्छा को पूरा कर सकता है। इसे यूँ ही उच्छृंखल रूप से बढ़ते रहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? यह मनुष्य को इस सीमा तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग के सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और कुंठित हो जाता है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक को खो दिया है। इसे नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों न हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें ताकि बचे हुए खतरे को हम दूर कर सकें और परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व भव्यता तक शीघ्रतर पहुँच सके? दुष्टों का यह गिरोह मनुष्यों के बीच आ गया है और इसने बहुत खलबली और अशांति फैलाई है। ये सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान के कगार पर ले आये हैं, उन्हें धकेल कर टुकड़ों में धराशायी करने के बाद, उनके शवों को खा जाने की गुप्त योजना बना कर। वे परमेश्वर की योजना को बाधित कर पाने की और परमेश्वर के साथ एक लम्बा जुआ[5] खेलकर प्रतिस्पर्धा करने की निरर्थक आशा करते हैं। यह किसी तरह से आसान नहीं है! क्रूस को आखिरकार दुष्टों के राजा के लिए ही तैयार किया गया है जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर का उस क्रूस से सरोकार नहीं है और वह पहले से ही शैतान के लिए उसे छोड़ चुका है। परमेश्वर काफी पहले ही विजयी हो चुका है और अब मानव जाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता है। वह सभी मानव जाति के लिए उद्धार लाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (7)" से उद्धृत

11. ऊपर से नीचे तक और शुरुआत से अंत तक, वह परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके साथ विसंगति में रहते हुए बर्ताव कर रहा है। प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की सभी बातें, प्राचीन संस्कृति का मूल्यवान ज्ञान, ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाएँ, और कन्फ्यूशियस के क्लासिक्स और सामंती संस्कारों ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी, साथ ही विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं भी नज़र नहीं आते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित, प्रतिरोधित और नष्ट करने के लिए वह प्राचीन "वानरों" द्वारा प्रचारित केवल सामंती रिवाजों पर जोर देता है। आज तक उसने मनुष्य को केवल पीड़ित ही नहीं किया है, बल्कि वह मनुष्य को पूरी तरह से खा जाना[6] चाहता है। सामंती नीति-संहिता की शिक्षा और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और मनुष्यों को बड़े और छोटे दुष्टों में बदल दिया है। कुछ ही ऐसे हैं जो आसानी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत करते हैं। मनुष्य का चेहरा हत्या से भर गया है, और सभी जगहों पर, मृत्यु हवा में है। वे इस भूमि से परमेश्वर को निष्कासित करने की कोशिश करते हैं; हाथों में चाकू और तलवारों के साथ, वे परमेश्वर का विनाश करने के लिए खुद को युद्ध के गठन में व्यवस्थित करते हैं। दुर्जनों की भूमि में जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियां फैली हुई हैं। इस जमीन के ऊपर जलते हुए कागज और धूप की एक घृणास्पद गंध फैली हुई है, इतनी घनी कि दम घुटता है। ऐसा लगता है मानो सर्प के मुड़ते और कुंडली मारते समय कीचड़ से ऊपर उठती हुई बदबू हो, और यह मनुष्य से बरबस कै कराने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, दुष्ट राक्षसों द्वारा ग्रंथों से किये गए मंत्रोच्चार की हलकी आवाज़ को सुना जा सकता है। यह आवाज़ दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, और मनुष्य अपनी रीढ़ की हड्डी से होकर नीचे जाती एक थरथराहट को महसूस किये बिना नहीं रह पाता है। इस देश भर में इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं, जिसने इस देश को एक चमचमाती दुनिया में बदल दिया है, और दुष्टों का राजा अपने चेहरे पर एक मूर्खतापूर्ण हँसी लिए हुए है, मानो कि उसकी शैतानी योजना सफल हो गई हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से इसके बारे में बेखबर है, और न ही मनुष्य को यह पता है कि इस दुष्ट ने पहले से ही उसे इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह मूढ़ और पराजित हो गया है। वह परमेश्वर का सब कुछ एक झटके में मिटा देना, फिर से उसका अपमान करना और उसे मार डालना चाहता है, और उसके कार्य को ढहाने और उलट-पुलट करने का प्रयास करता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जे का मान सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच के काम में परमेश्वर के "हस्तक्षेप" को बर्दाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? वह कैसे परमेश्वर को अपने काम को बाधित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभक रहा यह दुष्ट, कैसे पृथ्वी पर अपनी शक्ति के दरबार में परमेश्वर को शासन करने की इजाजत दे सकता है? यह कैसे स्वेच्छा से हार स्वीकार कर सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत को उजागर किया जा चुका है, इसलिए किसी को यह पता नहीं है कि वह हँसे या रोये, इसकी तो बात करना वास्तव में मुश्किल है। क्या यही इसका सार नहीं है? एक बदसूरत आत्मा लिए वह अभी भी यही मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। सह-अपराधियों का समूह![7] वे नश्वर भोग के सुख में लिप्त होने और विकार फ़ैलाने के लिए मनुष्यों के बीच आते हैं। उनका उपद्रव दुनिया में अस्थिरता का कारण बनता है और मनुष्य के दिल में आतंक ले आता है, और उन्होंने मनुष्य को विकृत कर दिया है ताकि मनुष्य असहनीय कुरूपता वाले जानवरों के समान दिखे, मूल पवित्र व्यक्ति की थोड़ी-सी भी पहचान रखे बिना। यहाँ तक कि वे धरती पर अत्याचारियों की तरह ताकत ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य में बाधा डालते हैं ताकि यह मुश्किल से आगे बढ़ सके और मानव को जैसे तांबे और इस्पात की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जा सके। इतने सारे पाप करने और इतनी परेशानी का कारण बनने के बाद वे ताड़ना की प्रतीक्षा करने के अलावा कैसे अन्य किसी भी बात की उम्मीद कर सकते हैं? राक्षस और बुरी आत्माएं बेधड़क होकर धरती पर निरंकुश व्यवहार करते रहे हैं और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा और श्रमसाध्य प्रयास को रोक दिया है, जिससे वे अभेद्य बन गए हैं। कैसा महापाप है! परमेश्वर कैसे चिंतित महसूस न करता? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस नहीं करता? वे परमेश्वर के कार्य के लिए गंभीर बाधा और विरोध का कारण बनते हैं। अत्यधिक विद्रोही!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (7)" से उद्धृत

12. परमेश्वर अंधविश्वास की उन गतिविधियों से सबसे ज्यादा घृणा करता है जिनमें लोग लिप्त रहते हैं, परंतु अभी भी बहुत से लोग यह सोचकर कि अंधविश्वास की ये गतिविधियाँ परमेश्वर द्वारा दी गई हैं, इन्हें त्यागने में असमर्थ हैं, और आज तक उन्होंने इन्हें पूरी तरह से नहीं त्यागा है। ऐसी वस्तुएं जैसे कि जवान लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और इन्हीं के समान अन्य तरीके जिनमें आनन्द के अवसरों को मनाया जाता है; वे प्राचीन तरीके जो हमें पूर्वजों से मिले हैं; और अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं: ये परमेश्वर के लिए और भी घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (सब्त समेत, जैसा कि धार्मिक जगत द्वारा मनाया जाता है) भी उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्यों के बीच के सामाजिक सम्बन्ध और सांसारिक बातचीत, परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक की वसंत का त्यौहार और क्रिसमस, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञास्वरूप नहीं हैं, तो इन त्यौहारों की छुट्टियों के लिए खिलौने और सजावट (गीत, नव वर्ष का केक, पटाखे, रौशनी की मालाएँ, क्रिसमस के उपहार, क्रिसमस के उत्सव, और परमप्रसाद) की तो बात ही छोड़ो—क्या वे मनुष्यों के मनों की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी का तोड़ना, दाखरस, और उत्तम वस्त्र और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन के सारे लोकप्रिय पारम्परिक त्यौहार, जैसे ड्रैगन हैड्स-रेजिंग दिवस, ड्रैगन बोट महोत्सव, मध्य-शरद ऋतु महोत्सव, लाबा महोत्सव, और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्यौहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस, और क्रिसमस, आज इन सभी अनुचित त्यौहारों को प्राचीन काल से बहुत से लोगों द्वारा मनाया गया और हमें प्रदान कर दिया गया, जिस मनुष्यजाति की परमेश्वर ने सृष्टि की उसके साथ यह पूर्णतः असंगत है। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कोई दोष नहीं है, परंतु यह मनुष्यजाति के साथ शैतान द्वारा खेली गयी चालें हैं। जिस स्थान पर शैतानों की जितनी ज्यादा भीड़ होती है, उतना ही पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ वह स्थान होता है, उतनी ही गहराई से सामंती प्रथा दृढ़ होती है। यह वस्तुएं लोगों को इतनी कस कर बाँध देती हैं कि हिलने-डुलने के लिए कुछ भी स्थान नहीं रह जाता है। धार्मिक जगत के बहुत सारे त्यौहार मौलिकता का प्रदर्शन करते और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किन्तु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे शैतान लोगों को बाँध देता है ताकि वे परमेश्वर को न जान पाएं—वे सब शैतान की धूर्त रणनीतियाँ हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह पहले ही बिना कोई चिह्न छोड़े, उस समय के साधन और शैली को नष्ट कर चुका होता है। परंतु, "सच्चे विश्वासी" अनुभूति की जा सकने वाली वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस दौरान वे आगे का अध्ययन न करते हुए, उन वस्तुओं को बिल्कुल भुला देते हैं जो परमेश्वर के पास हैं, ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम है जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके हैं और शैतान को आराधना-स्थल पर स्थापित कर चुके हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्रों को लोग स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं, इस पूरे समय वे बार-बार "पिता परमेश्वर" पुकारते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? परमेश्वर को उन सभी समान कथनों और क्रियाओं से, जो पूर्वजों से मनुष्यजाति को आज तक सौंपी गई हैं, घृणा है; वे गंभीरतापूर्वक परमेश्वर के आगे के मार्ग में बाधा डालते हैं और, यही नहीं, वे मनुष्यजाति के प्रवेश में विघ्न डालते हैं। यह बात तो एकतरफ कि शैतान ने मनुष्यजाति को किस सीमा तक भ्रष्ट किया है, लोगों के अंतर्मन विटनेस ली के नियम, लॉरेंस के अनुभवों, वॉचमैन नी के सर्वेक्षणों, और पौलुस के कार्य जैसी वस्तुओं से पूर्णतः भरे हुए हैं। परमेश्वर के पास मनुष्यों पर कार्य करने के लिए कोई भी मार्ग नहीं है, क्योंकि उनके भीतर व्यक्तिवाद, कानून, नियम, विनियम, प्रणाली, और ऐसी ही अनेक चीज़ें भरी पड़ी हैं; लोगों के सामंती अंधविश्वास की प्रवृतियों के अतिरिक्त इन वस्तुओं ने मनुष्यजाति को बंदी बनाकर उसे निगल लिया है। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे लोगों के विचार एक रूचिकर चलचित्र हैं और जो रंगों से भरपूर परियों की कहानी का वर्णन कर रहा है, जिसमें असाधारण प्राणी बादलों की सवारी कर रहें हैं, यह इतना कल्पनाशील है कि लोगों को स्तब्ध, मूक और विस्मित कर देता है। सच कहा जाए, तो आज परमेश्वर मुख्यतः मनुष्य के अंधविश्वास के लक्षणों से निपटने तथा उन्हें दूर करने और उनके मानसिक दृष्टिकोण के संपूर्ण परिवर्तन का कार्य करने के लिए आता है। परमेश्वर का कार्य यह नहीं है जो हमें पीढ़ी से पीढ़ी सौंपा गया है और जो आज तक मनुष्यजाति द्वारा सुरक्षित किया गया है; यह कार्य है जो कि व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा आरंभ किया गया और उसके द्वारा संपूर्ण किया गया है, बिना किसी महान आत्मिक व्यक्ति की धरोहर को आगे बढ़ाने की आवश्यकता के, या बिना किसी प्रतिनिधि प्रकृति के कार्य को विरासत में प्राप्त करके जो परमेश्वर द्वारा किसी अन्य युग में किया गया था। मनुष्य को इन चीज़ों से कोई सरोकार रखने की आवश्यकता नहीं है। आज परमेश्वर के बातचीत करने और कार्य करने की शैली भिन्न है, फिर मनुष्य को कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है? यदि मनुष्य अपने "पूर्वजों" की धरोहर को जारी रखते हुए आज के वर्तमान प्रवाह के पथ पर चलते हैं, तो वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की इस प्रकार के विशेष व्यवहार से बहुत घृणा करता है, उसी प्रकार जैसे वह मानवीय जगत के वर्षों, महीनों और दिनों से घृणा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (3)" से उद्धृत

13. शैतान ने, लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या अंधविश्वासी प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में गहरे प्रभावों को डालते हुए, कई लोक कथाओं या इतिहास की पुस्तकों में कहानियों को गढ़ा है और आविष्कृत किया है। उदाहरण के लिए चीन की आठ अमर हस्तियों का समुद्र पार करना (चाइनाज दि एट इम्मॉर्टल्स क्रॉसिंग द सी), पश्चिम की ओर यात्रा (जरनी टू द वेस्ट), जेड सम्राट (जेड एम्पेरर), नेज़्हा की अजगर राजा पर विजय (नेज़्हा कंकर्स दि ड्रेगन किंग), और परमेश्वरों के अधिष्ठापन (इनवेस्टीट्यूर ऑफ दि गॉड्स) को लें। क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग इन सभी विवरणों को नहीं जानते हो, फिर भी तुम सामान्य कहानियों को तो जानते ही हो, और यही वह सामान्य निहित वस्तु है जो तुम्हारे हृदय में चिपकी हुई है और तुम्हारे मन में चिपकी हुई है, और तुम इसे भूल नहीं सकते हो। विभिन्न समयों पर अपने विभिन्न विचारों या किंवदंतियों को फैलाने के बाद, ये ही वे चीज़ें हैं जिन्हें शैतान ने बहुत लम्बे समय से मनुष्य के लिए स्थापित किया है। ये चीज़ें प्रत्यक्ष रूपसे हानि पहुँचाती हैं और लोगों की आत्माओं को धीरे-धीरे नष्ट करती हैं और लोगों को एक सम्मोहन के बाद दूसरे सम्मोहन में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुम इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हो जो पारम्परिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वास से उत्पन्न होती हैं, जब एक बार ये चीज़ें तुम्हारे मन में स्थापित हो जाती हैं, जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह तुम्हारे सम्मोहित हो जाने के समान है—तुम इन संस्कृतियों, इन विचारों एवं पारम्परिक कथाओं के द्वारा उलझ जाते हो और प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, और जीवन को देखने के तुम्हारे नज़रिये को प्रभावित करती हैं और ये चीज़ों के बारे में तुम्हारे फैसले को भी प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं: यह वास्तव में एक सम्मोहन है। तुम कोशिश तो करते हो परन्तु उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते हो; तुम उन पर चोट तो करते हो किन्तु उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु उन पर प्रहार करने उन्हें नीचे नहीं गिरा सकते हो। इसके अतिरिक्त, जब मनुष्य को इस प्रकार के सम्मोहन में अनजाने में डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में, अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हुए, शैतान की आराधना करना आरम्भ कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, और अपने लिए एक आराधना करने और आदर करने की वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि उस हद तक चले जाते हैं कि उसका परमेश्वर के रूप में सम्मान करते हैं। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं जो उनके वचनों एवं कर्मों को नियन्त्रित कर रही हैं। इसके अलावा, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, और फिर तुम अनजाने में इन कहानियों के अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक प्रसिद्ध व्यक्ति बना देते हो, और उन्हें वास्तव में मौजूद वस्तुओं में बदल देते हो। अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। तुम अवचेतन रूप से दुष्टों, शैतान एवं मूर्तियों को भी अपने स्वयं के घर में और अपने स्वयं के हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक सम्मोहन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

14. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का लाभ उठाता है। इन सामाजिक प्रवृत्तियों में अनेक बातें शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं: "क्या वे उन कपड़ों के बारे में हैं जिन्हें हम पहनते हैं? क्या वे नवीतनम फैशनों, सौन्दर्य प्रसाधनों, बाल सँवारने एवं स्वादिष्ट भोजन के विषय में हैं?" क्या ये इन चीज़ों के बारे में हैं? ये प्रवृतियों का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ इन बातों के बारे में बात करना नहीं चाहते हैं। ऐसे विचार जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों के लिए ले कर आती हैं, जिस तरह से वे संसार में लोगों से स्वयं का आचरण करवाती हैं, जीवन के लक्ष्य एवं जीवन को देखने का नज़रिया जिन्हें वे लोगों के लिए लाती हैं, हम केवल उनके बारे में ही बात करने की इच्छा करते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की अवस्था को नियन्त्रित और प्रभावित कर सकती हैं। एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करते रहते हैं, जिसके कारण वे लगातार विवेक, मानवता और कारण को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाते हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। तो ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? तुम नग्न आँखों से इन प्रवृत्तियों को नहीं देख सकते हो। जब किसी प्रवृत्ति की हवा आर-पार बहती है, तो कदाचित् सिर्फ छोटी सी संख्या में ही लोग प्रवृत्ति स्थापित करने वाले बनेंगे। वे इस किस्म की चीज़ों को करते हुए शुरुआत करते हैं, इस किस्म के विचार या इस किस्म के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी अनभिज्ञता के बीच इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, और सभी इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए जो स्वस्थ्य शरीर और मन के नहीं है, जो कभी नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकते हैं, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभी से स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को स्वीकार करवाती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है। उनमें सामर्थ्य नहीं है, न ही उनमें योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। ...

... शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है ताकि एक बार में एक कदम उठाकर लोगों को दुष्टों के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि सामाजिक प्रवृत्तियों में फँसे लोग अनजाने में ही धन एवं भौतिक इच्छाओं का समर्थन करें, और साथ ही दुष्टता एवं हिंसा का समर्थन करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्ट शैतान बन जाता है! ऐसा मनुष्य के हृदय में कौन से मनोवैज्ञानिक झुकाव की वजह से होता है? मनुष्य किस बात का समर्थन करता है? मनुष्य दुष्टता और हिंसा को पसन्द करना शुरू कर देते हैं। वे खूबसूरती या अच्छाई को पसन्द नहीं करते हैं, और शांति को तो बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए ऊँची हैसियत एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों के बिना और बन्धनों के बिना अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, दूसरे शब्दों में जो कुछ भी वे चाहते हैं करते हैं। तो जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है मुक्त होने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास जिन्हें तुम जानते हो क्या वे इस भयानक दुर्दशा को दूर करने में तुम्हारी सहायता कर सकते हैं? क्या पारम्परिक आचार व्यवहार एवं पारम्परिक धार्मिक विधि विधान जिन्हें मनुष्य समझता है संयम बरतने में उनकी सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, तीन उत्कृष्ट चरित्र (थ्री करेक्टर क्लासिक) लें। क्या यह इन प्रवृत्तियों के रेतीले दलदल[ख] में से अपने पाँवों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, यह नहीं कर सकता है।) इस तरीके से, मनुष्य और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, दूसरों को नीचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण बन जाता है। लोगों के बीच अब और कोई स्नेह नहीं रह जाता है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह जाता है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई तालमेल नहीं रह जाता है; मानवीय रिश्ते हिंसा से भरे हुए हो जाते हैं। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्यों के बीच रहने के लिए हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे हिंसा का उपयोग करके अपनी स्वयं की आजीविका को झपट लेते हैं; वे हिंसा का उपयोग करके अपने पद को प्राप्त कर लेते हैं और अपने स्वयं के लाभों को प्राप्त करते हैं और वे हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करके जो कुछ भी चाहते हैं वह करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

15. "दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है" यह शैतान का फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव समाज में प्रचलन में है। तुम कह सकते हो कि यह एक चलन है क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बिठा दिया गया है और अब उनके हृदय में जम गया है। लोग इस कहावत को स्वीकार नहीं करने से लेकर इसके बढ़ते हुए उपयोग तक जिसकी वजह से जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तो उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, इसके अस्तित्व को मान लिया और अंततः, उन्होंने इस पर अपने अनुमोदन की मुहर लगा दी। क्या यही वह तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट कर रहा है? शायद लोग इस कहावत को समान स्तर तक नहीं समझते हैं, बल्कि हर एक के, उन चीजों के आधार पर जो उनके आस पास घटित हुई हैं और अपने स्वयं के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, इस कहावत की व्याख्या और स्वीकृति के भिन्न-भिन्न स्तर हैं, है न? इस बात की परवाह किए बिना कि इस कहावत के साथ किसी का कितना अनुभव रहा है, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? मानवीय स्वभाव के माध्यम से इस संसार में, तुम लोगों में से प्रत्येक के सहित, लोगों की कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच पूर्ण है! इसलिए जब शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस चलन का उपयोग कर लेता है उसके बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या तुम लोगों को नहीं लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते थे, कि एक दिन जीना भी बिल्कुल असम्भव होता? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास जितना पैसा है उतना ही उनका सम्मान है। गरीबों की कमर शर्म से झुकी हुई हैं, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचा और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों के लिए क्या लाते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सब कुछ नहीं समझते हैं? क्या बहुत से लोग और अधिक पैसा कमाने की खोज में अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते हैं? क्या और बहुत से लोग पैसा कमाने के वास्ते अपने कर्तव्य को करने और परमेश्वर को खोजने के अवसर को गँवा नहीं देते हैं? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है।) क्या लोगों को ऐसे स्तर तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने में शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में आता जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में उसी के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किन्तु उसकी खोज करने में तुम सामर्थ्यहीन हो। हो सकता है कि तुम परमेश्वर के वचन को स्पष्ट रूप से जानते हो, किन्तु तुम कीमत चुकाने को तैयार नहीं हो, कीमत चुकाने के लिये दुःख उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, बल्कि बिल्कुल अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिए तुम अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न कहे, परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, चाहे तुम्हें इस बात का कितना ही अहसास क्यों न हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर का प्रेम गहरा और महान है, तुम फिर भी अड़ियल ढंग से अपने रास्ते पर ही बने रहोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सब को त्यागने के बल्कि तुम अपने भाग्य को इसी कहावत से नियंत्रित करवाते हो। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित होते हैं और इसके द्वारा हेरफेर किए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का तुम्हारे हृदय में जड़ जमाना नहीं हैं? यदि तुम इसे करते हो, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ।) क्या तुम देखते हो कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? क्या तुम इसे महसूस कर सकते हो? (नहीं।) तुमने यह न तो देखा न महसूस किया। क्या तुम यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हो? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों पर मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों, और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें यह मालूम नहीं होता है कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और उन पर कोई आपत्ति नहीं करते हैं। वे इन चीज़ों को प्यार करते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को उनके साथ हेरफेर करने देते हैं, और इस तरह से शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" से उद्धृत

16. ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य को समाज के द्वारा बुरी तरह हानि पहुँची है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित हो चुका है, और उन्हें "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, भ्रष्ट जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीजों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ की है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और कोई एक भी व्यक्ति नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छासे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, न ही, इसके अलावा, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर सुख-सुविधा और देह के भ्रष्टाचार में लिप्त है। सत्य को सुनकर भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेने के बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख होते हैं। इतनी भ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

17. छः प्राथमिक साधन हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

पहला है नियन्त्रण और जोर जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियन्त्रित करने के लिए शैतान हर सभंव कार्य करेगा। "जोर जबरदस्ती" का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है अपनी बात सुनने पर विवश करने के लिए धमकी और ज़ोर-ज़बरदस्ती के पैतरों का इस्तेमाल करना, यदि तुम बात नहीं मानते हो तो तुमसे उसके परिणामों के बारे में विचार करवाता है। तुम भयभीत होते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते हो, इसलिए तब तुम उसके प्रति समर्पण कर देते हो।

दूसरा है धोखा देना और छल कपट करना। "धोखा देना और छल कपट करना" में क्‍या अपरिहार्य होता है? शैतान कुछ कहानियों एवं झूठी बातों को बनाता है, तुम्हें छल कपट से उन पर विश्वास करवाता है। वह तुम्हें कभी नहीं बताता है कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजित किया गया था, बल्कि न ही वह प्रत्यक्ष रूप से यह कहता है कि तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सृजित नहीं गया था। यह "परमेश्वर" शब्द का उपयोग बिलकुल नहीं करता है, बल्कि इसके बजाए एक विकल्प के रूप में किसी और चीज़ का उपयोग करता है, तुम्हें धोखा देने के लिए इस चीज़ का उपयोग करता है ताकि तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में मूल रूप से कोई विचार न आए। निश्चित रूप से यह छल कपट, न केवल सिर्फ इस एक को, बल्कि कई पहलुओं को शामिल करता है।

तीसरा है ज़बरदस्ती दिमाग में भरना। किस चीज़ को दिमाग में भरा जाता है? क्या ज़बरदस्ती दिमाग में भरना मनुष्य की स्वयं की पसंद के द्वारा होता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? (नहीं।) यदि तुम इससे सहमत नहीं होते हो तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम्हारी अनभिज्ञता में, शैतान की सोच, जीवन के उसके नियमों और उसके सार को तुम्हारे भीतर डालते हुए, वह तुम्हारे भीतर उँडेलता है।

चौथा है धमकियाँ और प्रलोभन। अर्थात्, शैतान विभिन्न साधनों को काम में लाता है ताकि तुम उसे स्वीकार करो, उसका अनुसरण करो, उसकी सेवा में कार्य करो; वह किसी भी ज़रूरी साधन से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। वह कभी-कभी तुम पर छोटे-छोटे अनुग्रह करता है परन्तु तब भी तुम्हें पाप करने के लिए लुभाता है। यदि तुम उसका अनुसरण नहीं करते हो, तो वह तुम्हें कष्ट भुगतवाएगा और तुम्हें दण्ड देगा और वह तुम पर आक्रमण करने और तुम्हें जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करेगा।

पाँचवा है धोखा और असमर्थता। "धोखा और असमर्थता" वह है जिससे शैतान कुछ मधुर सुनाई देने वाले कथनों एवं विचारों को बनाता है जो लोगों की धारणाओं से मेल खाते हैं ताकि ऐसा दिखाई दे मानो कि वह लोगों के शरीरों का ध्यान रख रहा है या उनके जीवन एवं भविष्य के बारे में सोच रहा है, जबकि वास्तव में यह बस तुम्हें बेवकूफ़ बनाने के लिए है। तब वह तुम्हें असमर्थ कर देता है ताकि तुम यह न जानो कि क्या सही है और क्या ग़लत है, ताकि तुम अनजाने में ही छले जाओ और फलस्वरूप उसके नियन्त्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है शरीर और मन का विनाश। शैतान मनुष्यों की किस चीज़ को नष्ट करता है? (उनके मन को, और उनके पूरे अस्तित्व को।) शैतान तुम्हारे मन को नष्ट करता है, तुम्हें विरोध करने में शक्तिहीन बना देता है, इसका अर्थ है कि तुम्हारे स्वयं के न चाहने के बावजूद बहुत धीरे-धीरे तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। वह हर दिन इन चीज़ों को तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रभावित करने और तुम्हारा पोषण करने के लिए प्रतिदिन इन विचारों एवं संस्कृतियों का उपयोग करता है, बहुत धीरे-धीरे तुम्हारी इच्छा शक्ति को बर्बाद करता है, तुम्हें ऐसा बना देता है कि तुम एक अच्छा इंसान अब और नहीं बनना चाहते हो, तुम उस चीज़ के पक्ष में अब और डटे नहीं रहना चाहते हो जिसे तुम धार्मिकता कहते हो। अनजाने में, तुम्हारे पास प्रवाह के विरुद्ध ऊपर की ओर तैरने की अब और इच्छा शक्ति नहीं होती है, बल्कि इसके बजाए तुम उसके साथ नीचे की ओर बहते हो। "विनाश" का अर्थ है कि शैतान लोगों को इतना अधिक कष्ट देता है कि वे न तो मनुष्य के समान और न ही प्रेत के समान रह जाते हैं, तब वह उन्हें निगलने के उस अवसर को पकड़ लेता है।

इन में से प्रत्येक माध्यम जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है मनुष्य को विरोध करने में निर्बल कर देता है; उनमें से कोई भी लोगों के लिए घातक हो सकता है। दूसरे शब्दों में, शैतान जो कुछ भी करता है और वह जिस भी साधन को काम में लाता है, वह तुम्हें पतित करने का कारण बनता है, तुम्हें शैतान के नियन्त्रण के अधीन ला सकता है और तुम्हें दुष्टता के दलदल में धँसा सकता है। ये वे साधन हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" से उद्धृत

18. परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है और मनुष्य परमेश्वर के रवैये एवं उसके हृदय में पोषित होता है। इसके विपरीत, क्या शैतान मनुष्य को पोषित करता है? वह मनुष्य को पोषित नहीं करता है। वह बस मनुष्य को हानि पहुंचाने के विषय में सोचता है। क्या यह सही नहीं है? जब वह मनुष्य को हानि पहुंचाने का विचार करता है, तो क्या वह ऐसा मानसिक दबाव की स्थिति में करता है? (हाँ।) अतः जब मनुष्य पर शैतान के कार्य की बात आती है, तो यहाँ मेरे पास दो वाक्यांश हैं जो शैतान की दुर्भावना एवं दुष्ट प्रकृति की व्याख्या अच्छी तरह से कर सकते हैं, जिससे सचमुच में तुम लोग शैतान की घृणा को जान सकते हो। मनुष्य के प्रति शैतान का नज़रिया ऐसा है कि वह हमेशा हर एक पर बलपूर्वक "कब्‍ज़ा" करना और उसे हासिल करना चाहता है ताकि वह उस बिन्दु तक पहुंच सके जहाँ वह मनुष्य को पूरी तरह से नियन्त्रण में रखे और उसे नुकसान पहुँचाए ताकि वह इस उद्देश्य एवं वहशी महत्वाकांक्षा को हासिल कर सके। "बलपूर्वक कब्‍ज़ा" करने का अर्थ क्या है? क्या यह तुम्हारी सहमति से होता है, या बिना सहमति के होता है? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या तुम्हारी जानकारी के बगैर होता है? यह पूरी तरह से तुम्हारी जानकारी के बगैर होता है। ऐसी परिस्थितियों में जहाँ तुम अनजान रहते हो, संभवतः जब उसने कुछ भी नहीं कहा होता है या संभवतः जब उसने कुछ भी नहीं किया होता है, जब कोई आधार नहीं होता है, और कोई सन्दर्भ नहीं होता है, वहाँ वह तुम्हारे चारों ओर होता है, और तुम्हें घेरे हुए होता है। वह तुम्हारा शोषण करने के लिए एक अवसर तलाशता है, तब वह बलपूर्वक तुम पर कब्‍ज़ा करता है, तुम्हें हासिल करता है तुम पर नियंत्रण करने और नुकसान पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल करता है। मानवजाति के लिए परमेश्वर के विरुद्ध शैतान की लड़ाई में यह एक अति विशिष्‍ट इरादा एवं व्यवहार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से उद्धृत

19. हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, दुःख से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चालें चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[8] क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे बेहद संरक्षित[9] रखा जाता है। आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; नज़र रखने वाले प्रहरी इस दौरान चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, इस बात से अत्यंत भयभीत कि परमेश्वर उन्हें अचानक पकड़ लेगा और उन सभी को मिटा कर रख देगा, और उन्हें शांति और ख़ुशी के स्थान से वंचित कर देगा। ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? मानवीय दुनिया के मामलों की क्या कद्र है उन्हें? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्सुक इच्छा को समझ सकता है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? पीढ़ी दर पीढ़ी, माता-पिता से लेकर बच्चों तक, दास मनुष्य ने परमेश्वर को अनुचित तरीके से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष उत्तेजित न करे? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापमयता की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो, उसे अब अनियंत्रित ढंग से फैलने की अनुमति न दो, और उसे अपनी इच्छानुसार परेशानी पैदा मत करने दो! यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं। परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच का स्नेह कहाँ है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा करना? परमेवर को क्यों बार-बार पुकारने पर मजबूर करना? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने के लिए क्यों मजबूर करना? यह अंधकारमय समाज और उसके शत्रुओं के संरक्षक कुत्ते, क्यों परमेश्वर को स्वतंत्रता से इस दुनिया में आने और जाने से रोकते हैं जिसे उसने बनाया? मनुष्य क्यों नहीं समझता, वह मनुष्य जो दर्द और पीड़ा के बीच रहता है? तुम लोगों के लिए, परमेश्वर ने अत्यंत यातना सही है, और अपने प्यारे पुत्र, उसके अपने देह और रक्त को अत्यंत दर्द के साथ तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर क्यों तुम लोग अभी भी अपनी आँखें फेर लेते हो? हर किसी के सामने, तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार करते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को मना करते हो। तुम लोग इतने अभद्र क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधियारे समाज में अन्याय को सहन करने के लिए तैयार हो? शत्रुता की सहस्राब्दियों के साथ स्वयं को भरने के बजाय, तुम लोग क्यों शैतानों के राजा के "बकवास" के साथ स्वयं को छलते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)" से उद्धृत

20. शैतान जन सामान्य को धोखा देने के जरिए प्रसिद्धि प्राप्त करता है। वह अक्सर स्वयं को धार्मिकता के प्रमुख और आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित करता है। धार्मिकता के बचाव के झण्डे तले, वह मनुष्य को हानि पहुंचाता है, उनके प्राणों को निगल जाता है, और मनुष्य को स्तब्ध करने, धोखा देने और भड़काने के लिए हर प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। उसका लक्ष्य है कि मनुष्य उसके बुरे आचरण को स्वीकार करे और उसका अनुसरण करे, और मनुष्य परमेश्वर के अधिकार और सर्वोच्च सत्ता का विरोध करने में उसके साथ जुड़ जाए। फ़िर भी, जब कोई उसकी चालों, षड्यंत्रों और बुरी युक्तियों को समझ जाता है और नहीं चाहता कि शैतान द्वारा उसे लगातार कुचला जाए और मूर्ख बनाया जाए या वो निरन्तर उसकी गुलामी करे, या उसके साथ दण्डित एवं नष्ट हो जाए, तो शैतान अपने असली दुष्ट, दुराचारी, भद्दे और वहशी चेहरे को प्रकट करने के लिए अपने पहले के संत रुपी चेहरे को बदल देता है और अपने झूठे नकाब को फाड़कर फेंक देता है। उसे उन सभी का विनाश करने में कहीं ज़्यादा खुशी मिलेगी जो उसका अनुसरण करने से इंकार करते हैं और उसकी बुरी शक्तियों का विरोध करते हैं। इस बिन्दु पर शैतान अब से विश्वास योग्य और सभ्य व्यक्ति का रूप धारण नहीं कर सकता है; उसके बजाए, उसके बुरे और असली शैतानी लक्षण प्रकट हो जाते हैं भेड़ की खाल उतर जाती है। जब एक बार शैतान की युक्तियों को प्रकाश में लाया जाता है, जब एक बार उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाता है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाएगा और अपने वहशीपन का खुलासा करेगा; लोगों को नुकसान पहुंचाने और निगल जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र हो जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मनुष्य के जागृत हो जाने से क्रोधित हो गया है; स्वतन्त्रता और प्रकाश की लालसा और अपनी कैद को तोड़कर आज़ाद होने की उनकी आकांक्षा के कारण उसने मनुष्य के प्रति बदले की एक प्रबल भावना को विकसित कर लिया है। उसके क्रोध का अभिप्राय उसकी बुराई का समर्थन करना है, और साथ ही यह उसके जंगली स्वभाव का असली प्रकाशन भी है।

हर एक मामले में, शैतान का आचरण उसके बुरे स्वभाव का खुलासा करता है। उन सभी बुरे कार्यों से जिन्हें शैतान ने मनुष्यों पर क्रियान्वित किया है—उसके आरम्भ के प्रयासों से लेकर उसका अनुसरण करने के लिए मनुष्यों को बहकाने तक, और उसके द्वारा मनुष्य के शोषण तक, जिसके अंतर्गत वह मनुष्य को अपने बुरे कार्यों में खींचता है, और उसके असली लक्षणों का खुलासा कर दिए जाने और मनुष्य द्वारा उसे पहचानने और उसे छोड़ देने के पश्चात् मनुष्य के प्रति शैतान की बदले की भावना तक—कोई भी शैतान के बुरी सार का खुलासा करने से नहीं चूकता है; कोई भी बात उस तथ्य को प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान का सकारात्मक चीज़ों से कोई नाता नहीं है; कोई भी बात यह प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान ही समस्त बुरी चीज़ों का स्रोत है। उसका हर एक कार्य उसकी बुराई का बचाव करता है, उसके बुरे कार्यों की निरन्तरता को बनाए रखता है, धर्मी और सकारात्मक चीज़ों के विरुद्ध जाता है, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के नियमों और विधियों को बर्बाद कर देता है। वे परमेश्वर के विरोधी हैं, और वे ऐसे हैं जिन्हें परमेश्वर का क्रोध नष्ट कर देगा। यद्यपि शैतान के पास उसका अपना क्रोध है, फ़िर भी उसका क्रोध उसके बुरे स्वभाव को प्रकट करने का एक माध्यम है। शैतान के भड़का हुआ और क्रोधित होने का कारण यह है: उसकी अकथनीय युक्तियों का खुलासा कर दिया गया है; उसके षडयन्त्र आसानी से दूर नहीं होते हैं; परमेश्वर का स्थान लेने और परमेश्वर के समान कार्य करने की उसकी वहशी महत्वाकांक्षा और लालसा पर प्रहार किया गया है और उसे रोका गया है; समूची मानवजाति को नियन्त्रित करने का उसका उद्देश्य निष्फल हो गया है और उसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता है। यह परमेश्वर का बार-बार उत्तेजित होनेवाला उसका क्रोध है जिसने शैतान के षडयन्त्रों को सफल होने से रोक दिया है और शैतान की दुष्टता के फैलाव और हिंसात्मक आचरण का पहले से अंत कर दिया है; इसलिए, शैतान परमेश्वर के क्रोध से नफरत करता है और डरता है। परमेश्वर के क्रोध का प्रत्येक इस्तेमाल न केवल शैतान के असली बुरे रूप को बेनकाब करता है; बल्कि वह शैतान की बुरी इच्छाओं को ज्योति में प्रकट भी करता है। उसी समय, मनुष्य के प्रति शैतान के क्रोध की वज़हों का पूरी तरह से खुलासा किया गया है। शैतान के क्रोध का भड़काना उसके बुरे स्वभाव का असली प्रकाशन है, और उसकी युक्तियों का खुलासा है। हाँ वास्तव में, हर बार जब शैतान क्रोधित होता है, तो यह बुरी चीज़ों के विनाश की घोषणा करता है, यह सकारात्मक चीज़ों की सुरक्षा और उनकी निरन्तरता की घोषणा करता है, और यह परमेश्वर के क्रोध की प्रकृति की घोषणा करता है—एक ऐसी प्रकृति जिसे ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से उद्धृत

21. शैतान की "विशिष्ट" पहचान ने बहुत से लोगों से उसके विभिन्न पहलुओं के प्रकटीकरण में गहरी रूचि का प्रदर्शन करवाया है। यहाँ तक कि बहुत से मूर्ख लोग हैं जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के साथ-साथ, शैतान भी अधिकार रखता है, क्योंकि शैतान चमत्कार करने में सक्षम है, ऐसे काम करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए असंभव हैं। इस प्रकार, परमेश्वर की आराधना करने के अतिरिक्त, मानवजाति अपने हृदय में शैतान के लिए भी एक स्थान आरक्षित रखती है, परमेश्वर के रूप में शैतान की भी आराधना करती है। ऐसे लोग दयनीय और घृणित हैं। अपनी अज्ञानता के कारण वे दयनीय हैं, अपने पाखंड और अंतर्निहित बुराई के सार के कारण घृणित हैं। इस बिन्दु पर, मैं महसूस करता हूँ कि तुम लोगों को जानकारी दूँ कि अधिकार क्या है और यह किसकी ओर संकेत करता है, यह किसे दर्शाता है। व्यापक रूप से कहें तो परमेश्वर स्वयं ही अधिकार है, उसका अधिकार उसकी श्रेष्ठता और सार की ओर संकेत करते हैं, स्वयं परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर के स्थान और पहचान को दर्शाता है। इस स्थिति में, क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि वह स्वयं परमेश्वर है? क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि उसने सभी चीज़ों को बनाया है; सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है? बिलकुल नहीं करता! क्योंकि वह किसी भी चीज़ को बनाने में असमर्थ है; अब तक उसने परमेश्वर के द्वारा सृजित की गई वस्तुओं में से कुछ भी नहीं बनाया है, कभी ऐसा कुछ नहीं बनाया है जिसमें जीवन हो। क्योंकि उसके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, इसलिए वह संभवत: कभी भी परमेश्वर की हैसियत और पहचान प्राप्त नहीं कर पाएगा, यह उसके सार से तय होता है। क्या उसके पास परमेश्वर के समान सामर्थ्‍य है? बिलकुल नहीं है! हम शैतान के कार्यों को और शैतान द्वारा प्रदर्शित चमत्कारों को क्या कहते हैं? क्या यह सामर्थ्‍य है? क्या इसे अधिकार कहा जा सकता है? बिलकुल नहीं! शैतान बुराई की लहर को दिशा देता है, परमेश्वर के कार्य के हर एक पहलू में अस्थिरता पैदा करता है, बाधा और रूकावट डालता है। पिछले कई हज़ार सालों से, मानवजाति को बिगाड़ने, शोषित करने, भ्रष्ट करने हेतु लुभाने, धोखा देकर पतित करने और परमेश्वर का तिरस्कार करने के अलावा उसने क्या किया है, इसलिए मनुष्य अँधकार से भरी मृत्यु की घाटी की ओर चला जाता है, क्या शैतान ने ऐसा कुछ किया है जिससे वह मनुष्य के द्वारा उत्सव मनाने, तारीफ करने या दुलार पाने के ज़रा-सा भी योग्य हो? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उससे मानवजाति भ्रष्ट हो जाती? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या उसने मानवजाति को नुकसान पहुँचाया होता? यदि शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्‍य होता तो क्या मनुष्य परमेश्वर को छोड़कर मृत्यु की ओर मुड़ जाता? चूँकि शैतान के पास कोई अधिकार और सामर्थ्‍य नहीं है, इसलिये जो कुछ वह करता है उससे उसके सार के विषय में हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? ऐसे लोग भी हैं जो यह अर्थ निकालते हैं कि जो कुछ भी शैतान करता है वह महज एक छल है, फिर भी मैं विश्वास करता हूँ कि ऐसी परिभाषा उतनी उचित नहीं है। क्या मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए उसके बुरे कार्य महज एक छल हैं? वह बुरी शक्ति जिसके द्वारा शैतान ने अय्यूब का शोषण किया, उसका शोषण करने और उसे नष्ट करने की उसकी प्रचण्ड इच्छा, संभवतः महज छल के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। अगर हम विचार करें तो यह देखते हैं कि पहाड़ों और पर्वतों में दूर-दूर तक फैले हुए अय्यूब के पशुओं का झुण्ड और समूह, एक पल में सब कुछ चला गया, अय्यूब का महान सौभाग्य ग़ायब हो गया। क्या इसे महज छल के द्वारा प्राप्त किया जा सकता था? उन सब कार्यों का स्वभाव जो शैतान करता है वे नकारात्मक शब्दों जैसे अड़चन डालना, रूकावट डालना, नुकसान पहुँचाना, बुराई, ईर्ष्‍या अँधकार के साथ मेल खाते हैं और बिलकुल सही बैठते हैं, इस प्रकार उन सबका घटित होना अधर्म और बुरा है, इसे पूरी तरह शैतान के कार्यों के साथ जोड़ा जाता है, इसे शैतान के बुरे सार से जुदा नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद कि शैतान कितना "सामर्थी" है, इसके बावजूद कि वह कितना ढीठ और महत्वाकांक्षी है, इसके बावजूद कि नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता कितनी बड़ी है, इसके बावजूद कि उसकी तकनीक का दायरा कितना व्यापक है जिससे वह मनुष्य को बिगाड़ता और लुभाता है, इसके बावजूद कि उसके छल और प्रपंच कितने चतुर हैं जिससे वह मनुष्य को डराता है, इसके बावजूद कि वह रूप जिसमें वह अस्तित्व में रहता है कितना परिवर्तनशील है, वह एक भी जीवित प्राणी को बनाने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, सभी चीज़ों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाओं और नियमों को निर्धारित करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है, किसी भी तत्व, चाहे जीवित हो या निर्जीव, शासन और नियन्त्रण करने में कभी सक्षम नहीं हुआ है। पूरे विश्व के व्यापक फैलाव में, एक भी व्यक्ति या तत्व नहीं है जो उससे उत्पन्न हुआ हो या उसके द्वारा अस्तित्व में बना हुआ हो; एक भी व्यक्ति या तत्व नहीं है जिस पर उसके द्वारा शासन किया जाता हो या उसके द्वारा नियन्त्रण किया जाता हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीना है, बल्कि, उसे परमेश्वर के सारे आदेशों और आज्ञाओं को भी मानना होगा। परमेश्वर की आज्ञा के बिना शैतान के लिए भूमि की सतह पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी छूना कठिन है; परमेश्वर की आज्ञा के बिना, शैतान के पास इतनी भी आज़ादी नहीं है कि वह भूमि की सतह पर से एक चींटी को हटा सके—परमेश्वर द्वारा सृजित इंसान को हटाने की तो बात ही क्या है। परमेश्वर की नज़रों में शैतान पहाड़ों के सोसन फूलों, हवा में उड़ते हुए पक्षियों, समुद्र की मछलियों और पृथ्वी के कीड़े मकौड़ों से भी कमतर है। सभी चीज़ों के बीच में उसकी भूमिका है कि वह सभी चीज़ों की सेवा करे, मानवजाति के लिए कार्य करे, परमेश्वर और उसकी प्रबंधकीय योजना के कार्य करे। इसके बावजूद कि उसका स्वभाव कितना ईर्ष्यालु है, उसका सार कितना बुरा है, एकमात्र कार्य जो वो कर सकता है वह है आज्ञाकारिता से अपने कार्यों को करता रहे: परमेश्वर की सेवा में लगा रहे, परमेश्वर के कार्यों में पूरक बने। शैतान का सार-तत्व और हैसियत ऐसे ही हैं। उसका सार जीवन से जुड़ा हुआ नहीं है, सामर्थ्‍य से जुड़ा हुआ नहीं है, अधिकार से जुड़ा हुआ नहीं है; वह परमेश्वर के हाथों में मात्र एक खिलौना है, परमेश्वर की सेवा में मात्र एक मशीन!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

फुटनोट:

1. "अध्वंस्य" का प्रयोग व्यंगात्मक रूप से किया गया है, इसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति, और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में कठोर होते हैं।

2. "अदंडित और स्वतंत्र" इंगित करता है कि वह दुष्ट उन्मत्त हो जाता है और उसके सिर पर खून सवार हो जाता है।

3. "फटेहाल, उलट-पुलट" का अभिप्राय इससे है कि कैसे उस दुष्ट का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।

4. "आहत और पिटा हुआ" का सम्बन्ध दुष्टों के राजा के बदसूरत चेहरे से है।

5. "एक लम्बा जुआ" शैतान की कपटी, भयावह योजनाओं के लिए एक रूपक है। इसका प्रयोग उपहास में किया जाता है।

6. "खा जाना" का मतलब दुष्टों के राजा के हिंसक व्यवहार से है, जो लोगों को पूरी तरह से लूटता है।

7. "सह-अपराधियों का समूह" "गुंडों के गिरोह" की ही किस्म का है।

8. "निराधार आरोप लगाते हुए" का अर्थ है वे तरीके जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

9. "बेहद संरक्षित" उन विधियों को दर्शाता है जिनका उपयोग करके शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, वे बहुत ही दुष्ट होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने की जगह नहीं मिलती।

क. मूल पाठ में "कुछ चिल्लाते भी हैं" ऐसा लिखा है।

ख. मूलपाठ में "के रेतीले दलदल" यह वाक्यांश नहीं है।

अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन

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VIII मानवजाति को शैतान कैसे भ्रष्ट करता है, इसे प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

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