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परमेश्वर की कलीसिया क्या है? एक धार्मिक संगठन क्या होता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"कलीसिया ... यह उसकी देह है, और उसी की परिपूर्णता है जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है" (इफिसियों 1:22-23)।

"यीशु ने परमेश्‍वर के मन्दिर में जाकर उन सब को, जो मन्दिर में लेन-देन कर रहे थे, निकाल दिया, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर बेचनेवालों की चौकियाँ उलट दीं; और उनसे कहा, लिखा है, 'मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा'; परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो" (मत्ती 21:12-13)।

"उसने ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा, 'गिर गया, बड़ा बेबीलोन गिर गया है! वह दुष्‍टात्माओं का निवास, और हर एक अशुद्ध आत्मा का अड्डा, और हर एक अशुद्ध और घृणित पक्षी का अड्डा हो गया। क्योंकि उसके व्यभिचार की भयानक मदिरा के कारण सब जातियाँ गिर गई हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है, और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं'" (प्रकाशितवाक्य 18:2-3)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं, और इस समय के दौरान परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीवन बिताएँगे, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास रूप में लाने के इच्छुक हैं उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासित किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें दण्ड भी दिया जा सकता है। इस बात की परवाह न करते हुए कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, बशर्ते कि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हों, परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा जो उसके नाम के वास्ते उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम की महिमा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं वे उसके आशीषों को प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हैं वे उसके दण्ड को प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं वे ऐसे लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने उस नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, तो उनका परमेश्वर के साथ उचित सहयोग होना चाहिए, और उन्हें ऐसे विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए जो अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं। यह मनुष्य से की गई परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और झिड़की उन पर लागू नहीं होते हैं। पूरा दिन, ये लोग देह में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मन के भीतर जीवन बिताते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं वह सब उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुए सिद्धान्त के अनुसार होता है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएँ नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त और विनियमन यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह एकमात्र चीज़ जो उन्हें एक साथ लाती है धर्म है; वे चुने हुए लोग, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता है, और वे पवित्र आत्मा से अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों और कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और अधम लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई सम्बन्ध हो, और यह परमेश्वर के कार्य को तो बिलकुल भी नहीं बिगाड़ सकता है। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और उल्लेख करने के लायक मात्र भी नहीं होते हैं। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। क्योंकि वे सभी ऐसे लोग हैं जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और वे पवित्र आत्मा के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाते हैं। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नामपट्ट के अधीन जो उन्हें अच्छा लगता है वे वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके विरोध में हो जाते हैं, और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या ऐसे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

यहोवा पर विश्वास करने वालों को परमेश्वर कौन-सा नाम देता है? यहूदी धर्म। वे एक प्रकार का धार्मिक समूह बन गए। और परमेश्वर उन लोगों को कैसे परिभाषित करता है जो यीशु पर विश्वास करते हैं? उन्हें धार्मिक समूह—ईसाई धर्म के हिस्से के रूप में परिभाषित किया जाता है, है ना? परमेश्वर की नज़रों में, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म धार्मिक समूह हैं। परमेश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों परिभाषित करता है? उन सभी के बीच जो परमेश्वर द्वारा परिभाषित इन धार्मिक निकायों के सदस्य हैं, क्या कोई ऐसा है जो परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है? (नहीं।) परमेश्वर की नज़रों में, क्या जो लोग परमेश्वर का नाममात्र के लिए पालन करते हैं, वे सभी ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें वह परमेश्वर में विश्वासियों के रूप में स्वीकार करता है? क्या उन सभी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध हो सकता है? क्या वे सभी परमेश्वर के उद्धार के लिए लक्ष्य हो सकते हैं? (नहीं।) यद्यपि तुम लोगों ने अब अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, क्या ऐसा दिन आएगा जब तुम लोग उसमें बदल जाओगे जिसे परमेश्वर धार्मिक समूह के रूप में देखता है? यह अचिंतनीय प्रतीत होता है। यदि तुम लोग परमेश्वर की नज़र में एक धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हो, तो तुम लोग उसके द्वारा बचाए नहीं जाओगे और इसका अर्थ है कि तुम लोग परमेश्वर के घर के नहीं हो। इसलिए सारांश करने का प्रयास करो: ये लोग जो नाममात्र में सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन जिन्हें परमेश्वर एक धार्मिक समूह का हिस्सा मानता है—वे किस रास्ते पर चलते हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ये लोग कभी भी उसके मार्ग का अनुसरण या उसकी आराधना नहीं करते हुए और परमेश्वर का त्याग करते हुए, विश्वास के झंडे को लहराने के मार्ग पर चलते हैं? अर्थात्, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं लेकिन शैतान की पूजा करते हैं, अपने स्वयं के प्रबंधन को अंजाम देते हैं, और अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं—क्या यही इसका सार है? क्या इस तरह के लोगों का मनुष्य के उद्धार की परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई संबंध है? (नहीं।) चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, तब परमेश्वर ने निर्धारित किया है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? अपने हृदय में वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर और नियंत्रण के अधीन हैं। नामचारे के लिए, वे शायद किसी व्यक्ति का अनुसरण करते हों, लेकिन सार रूप में, वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताक़तों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो परमेश्वर की दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचा सकता है? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने स्वयं के प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किया जाना है; परमेश्वर इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते है, वे पहले से ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। ...यदि लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर चलने में असमर्थ हैं, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, और तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो इस तरह के लोगों से परमेश्वर द्वारा नफ़रत की जाएगी और उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। हर पहलू से, ये लोग जो परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किए जाते हैं वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी होने में असमर्थ हैं। परमेश्वर की नज़रों में, परमेश्वर उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है" से उद्धृत

सबसे पहले, आइए हम इस बात को समझें कि "आस्था वाले लोगों" में "आस्था" कौन सी आस्थाओं को संदर्भित करती है: इसका आशय यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, इस्लाम और बुद्धधर्म, इन पाँच प्रमुख धर्मों से है। ...

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हमने जिन पाँच धर्मों के बारे में कहा है, उनमें ईसाई धर्म कुछ विशेष है। और ईसाई धर्म के बारे में क्या विशेष है? ये वे लोग हैं जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें यहाँ कैसे सूचीबद्ध किया जा सकता है? चूँकि ईसाईयत एक प्रकार का मत है, तो यह, निःसंदेह, केवल मत से संबंधित है—यह एक प्रकार का अनुष्ठान, एक प्रकार का धर्म है, और उन लोगों की आस्था से कुछ अलग है जो सच्चाई से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इसे पाँच प्रमुख धर्मों के बीच सूचीबद्ध करने का मेरा कारण यह है क्योंकि ईसाईयत को भी उसी स्तर तक घटा दिया गया है जिस स्तर पर यहूदी, बौद्धधर्म और इस्लाम धर्म हैं। अधिकतर ईसाई इस बात पर विश्वास नहीं करते हैं कि कोई परमेश्वर है, या यह कि वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, उसके अस्तित्व पर तो वे बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे मात्र धर्मशास्त्र के बारे में बात करने के लिए धर्मग्रंथों का उपयोग करते हैं, लोगों को दयालु बनना, कष्टों को सहना और अच्छे कार्य करना सिखाने के लिए धर्मशास्त्र का उपयोग करते हैं। ईसाईयत धर्म इसी प्रकार का है: यह केवल धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांतो पर ध्यान केन्द्रित करता है, मनुष्य का प्रबंधन करने या उसे बचाने के परमेश्वर के कार्य से इसका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है, यह उन लोगों का एक धर्म है जो ऐसे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं जिसे परमेश्वर अंगीकार नहीं किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" से उद्धृत

"पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

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