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अंतिम दिनों में चीन में कार्य करने के लिए परमेश्वर के देहधारण का उद्देश्य और महत्व क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, यह आरंभ था; कार्य का यह चरण, कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था, और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र में एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण, दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए, सभी देशों में से सबसे अशुद्ध में किया जाता है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान में किया गया था, और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान में किया जाता है, और इस अंधकार को बाहर निकाल दिया जाएगा, प्रकाश को प्रकट किया जाएगा, और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब सभी जगहों में इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि एक परमेश्वर है, जो सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति सर्वथा आश्वस्त हो जाएगा, तब समस्त जगत में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है: एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का 6,000 वर्षों का कार्य पूरा हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि हर अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। वैसे तो, केवल चीन में विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्तरूप है, और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। ये चीनी लोग हैं जो बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, जिनका परमेश्वर के प्रति सबसे मज़बूत विरोध है, जिनकी मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, और इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूलरूप आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई भी समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ पूरी तरह से समान हैं, और यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो यह अवश्य होगा कि वे उसका विरोध करते हैं। यहूदियों ने भी क्यों परमेश्वर का विरोध किया और उसकी अवहेलना की? फ़रीसियों ने भी क्यों उसका विरोध किया? यहूदा ने क्यों यीशु के साथ विश्वासघात किया? उस समय, बहुत से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। क्यों यीशु को सलीब पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसका एक उदाहरण बनाए जाते हैं, और जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक नमूना और प्रतिदर्श बन जाएँगे, और दूसरों के लिए संदर्भ के रूप में कार्य करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? चीन के लोगों में भ्रष्टाचार, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होते हैं और अपने सभी विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं, और दूसरी ओर, उनके जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़े हुए हैं, और उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जन्म का परिवार—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है। उनकी हैसियत भी कम है, और इस परीक्षा के कार्य के इसकी संपूर्णता में पूरा कर दिए जाने के बाद, उसका बाद का कार्य बहुत बेहतर तरीके से होगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सकता है, तो इसके बाद का कार्य ज़ाहिर तौर पर होगा ही। एक बार कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाता है, तो बड़ी सफलता पूर्णतः प्राप्त कर ली गई होगी, और समस्त विश्व में विजय का कार्य पूर्णतः पूरा हो गया होगा। वास्तव में, एक बार तुम लोगों के बीच कार्य सफल हो जाता है, तो यह समस्त विश्व में सफलता के बराबर होगा। यही इस बात का महत्व है कि क्यों मैं तुम लोगों को एक प्रतिदर्श और नमूने के रूप में कार्य करने कहता हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से उद्धृत

चीनी लोगों ने कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं किया है और कभी भी यहोवा की सेवा नहीं की है, कभी भी यीशु की सेवा नहीं की है। वे जो कर सकते हैं वह केवल दिखावापूर्ण सम्मान है, वे धूप जलाते हैं, जॉस पेपर जलाते हैं, और बुद्ध की पूजा करते हैं। वे सिर्फ मूर्तियों की पूजा करते हैं—वे सभी चरम सीमा तक विद्रोही हैं, इसलिए लोगों की स्थिति जितनी निम्न है, इससे उतना ही अधिक पता चलता है कि परमेश्वर तुम लोगों से और भी अधिक महिमा पाता है। ...अगर याकूब के वंशज चीन में, ज़मीन के इस टुकड़े पर, पैदा हुए होते, और वे तुम सब ही होते, तो तुम लोगों में किए गए कार्य का क्या महत्व होता? शैतान क्या कहेगा? शैतान कहेगा: "वे तुम से डरा करते थे, उन्होंने तुम्हारे साथ शुरु से आज्ञा-पालन किया और उन्होंने तुम्हें धोखा दिया हो ऐसा इतिहास में नहीं है। वे मानव जाति के सबसे कलंकित, अधम या सबसे पिछड़े नहीं हैं।" यदि यह वास्तव में इस तरह से किया जाता है, तो इस कार्य से कौन प्रभावित होगा? पूरे संसार में से, चीनी लोग सबसे पिछड़े हैं। वे कम ईमानदारी के साथ निम्न दर्जे में जन्म लेते हैं, वे बोदे और सुस्त हैं, और वे अशिष्ट और अवनतिशील हैं। वे शैतानी स्वभाव से ओतप्रोत, गंदे और कामुक हैं। तुम सब में ऐसी बातें हैं। जहाँ तक इन भ्रष्ट स्वभावों की बात है, इस कार्य के पूरा होने के बाद लोग उन्हें फेंक देंगे और पूरी तरह से पालन करने और परिपूर्ण बनने में वे सक्षम हो जाएँगे। केवल इस तरह के कार्य के फल को सृष्टि के बीच गवाही कहा जाता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मोआब के वंशजों को बचाने का महत्व" से उद्धृत

अब मोआब के वंशजों पर कार्य करने का अर्थ है उन लोगों को बचाना जो सबसे गहरे अंधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित थे, परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शुरूआत में, उन सभी लोगों के दिलों में परमेश्वर की कमी थी—केवल इन लोगों को उनमें बदलना जो उसकी आज्ञा का पालन करते और उससे प्रेम करते हैं, सच्ची विजय है, और इस तरह के कार्य का फल सबसे मूल्यवान और सबसे ज्यादा निश्चयात्मक है। केवल यही महिमा प्राप्त कर रहा है—यही वह महिमा है जिसे कि परमेश्वर अंत के दिनों में हासिल करना चाहता है। हालांकि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब वे ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम हैं, जो वास्तव में परमेश्वर की ऊँचाई है। यह काम बहुत ही सार्थक है, और यह न्याय के माध्यम से है कि वह इन लोगों को जीत लेता है। वह जानबूझकर उन्हें दंडित नहीं कर रहा, बल्कि वह उन्हें बचाने के लिए आया है। यदि वह अभी भी आखिरी दिनों के दौरान इस्‍त्राएल में जीतने का काम कर रहा होता, तो वह बेकार होगा; यदि वह फलदायक भी हो, तो इसका कोई मोल न होगा या कोई बड़ा महत्व नहीं होगा, और वह सारी महिमा पाने में सक्षम नहीं होगा। वह तुम लोगों पर कार्य कर ररहा है, अर्थात् उन लोगों पर जो सबसे अंधकारमय स्थानों में गिर चुके हैं, जो सबसे अधिक पिछड़े हैं। ये लोग यह मानते नहीं हैं कि परमेश्वर है और वे कभी नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है। इन प्राणियों को शैतान ने इस हद तक भ्रष्ट किया है कि वे परमेश्वर को भूल गए हैं। वे शैतान द्वारा अंधे बना दिए गए हैं और वे बिलकुल नहीं जानते कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है। अपने दिलों में तुम सब मूर्तियों की पूजा करते हो, शैतान की पूजा करते हो, क्या तुम लोग सबसे अधम, सबसे पिछड़े लोग नहीं हो? देह से तुम लोग सबसे निम्नतम हो, किसी भी निजी स्वतंत्रता से विहीन, और तुम लोग कष्टों से भी पीड़ित हो। तुम लोग इस समाज में सबसे निम्न स्तर पर भी हो, तुम लोगों को विश्वास की स्वतंत्रता तक नहीं है। तुम सब पर कार्य करने का यही महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मोआब के वंशजों को बचाने का महत्व" से उद्धृत

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया तो वह दुनिया का नहीं था और संसार का सुख भोगने के लिए वह देह नहीं बना था। वह स्थान जहाँ कार्य करना सबसे अच्छी तरह से उसके स्वभाव को प्रकट करता और जो सबसे अर्थपूर्ण होता, वही स्थान है जहाँ वह पैदा हुआ। चाहे वह स्थल पवित्र हो या गन्दा, और चाहे वह कहीं भी काम करे, वह पवित्र है। दुनिया में हर चीज़ उसके द्वारा बनाई गई थी; बात सिर्फ इतनी है कि शैतान ने सब कुछ भ्रष्ट कर दिया है। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। उसका एक गंदे देश में आकर कार्य करना उसकी पवित्रता को प्रकट करने के लिए है; वह अपने कार्य के लिए ऐसा करता है, अर्थात् इस दूषित भूमि के लोगों को बचाने के इस कार्य को करने के लिए वह महान अपमान को सहन करता है। यह गवाही के लिए है और यह पूरी मानव जाति के लिए है। इस प्रकार का कार्य लोगों को जो देखने देता है वह है परमेश्वर की धार्मिकता, और यह परमेश्वर की सर्वोच्चता को प्रदर्शित करने में अधिक सक्षम है। उसकी महानता और उदारता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से दिखायी जाती है, जिनके बारे में कोई भी कुछ खास नहीं सोचता है। एक गंदे स्थल में पैदा होना यह बिलकुल साबित नहीं करता कि वह दीन-हीन है; यह तो केवल सारी सृष्टि को उसकी महानता और मानव जाति के लिए उसके सच्चे प्यार को देखने देता है। जितना अधिक वह इस तरह से करता है मनुष्य के लिए उसका शुद्ध प्रेम, उसका दोषरहित प्रेम उतना ही अधिक प्रकट होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मोआब के वंशजों को बचाने का महत्व" से उद्धृत

समस्त ब्रम्हांड में परमेश्वर के सारे कार्यों में इसी एक जनसमूह पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उसने अपने सभी प्रयास तुम लोगों के लिये समर्पित किये और तुम्हारे लिये सब कुछ बलिदान किया है, उसने समस्त ब्रम्हांड में पवित्र आत्मा के सभी कार्यों को वापस लेकर तुम्हें सौंप दिया है। यही कारण है कि मैं कहता हूं, तुम सभी सौभाग्यशाली हो। और यही नहीं, उसने अपनी महिमा इज़राइल से, अर्थात उसके चुने हुए लोगों सेहटाकर तुम लोगों को दी है, ताकि वह अपनी योजना के उद्देश्यों को तुम्‍हारे जनसमूह के द्वारा पूर्ण रूप से प्रकट कर सके। इस कारण तुम सभी वे लोग हो जो परमेश्वर की विरासत को पाएंगे, और इससे भी अधिक परमेश्वर की महिमा के वारिस बनेंगे। संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाइयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को पूरा करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस समूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों की पीड़ा, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव के कारण परमेश्वर अपना शुद्धिकरण का कार्य करता और जीतता है ताकि इससे वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी प्राप्त करे जो उसके कार्यों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस सूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं, यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर अपना विजय का कार्य उनके द्वारा करता है जो उसका विरोध करते हैं। ऐसा करने पर ही परमेश्वर की महान सामर्थ्य का प्रकटीकरण हो सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल वे जो अशुद्ध देश में रहते हैं, परमेश्वर की महिमा का उत्‍तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यह परमेश्वर की महान सामर्थ्‍य को विशिष्टता दे सकता है। इसी कारण मैं कहता हूँ कि परमेश्वर अशुद्ध देश में और उन लोगों के द्वारा महिमा पाता है, जो उस देश में रहते हैं। यही परमेश्वर की इच्छा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा यह यीशु के कार्य के चरण में था; उसे सिर्फ उन फरीसियों के बीच ही महिमा मिल सकती थी जिन्होंने उसे सताया। यदि यीशु को वैसा कष्ट और यहूदा का विश्वासघात नहीं मिलता, तो यीशु का उपहास और निंदा भी नहीं होती, क्रूस पर चढ़ना तो असम्भव होता, और उसे कभी भी महिमा नहीं मिलती। जहां भी परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहां भी वह शरीर में काम करता है, वो वहाँ महिमा पाता है और उन्हें जीत लेता है जिन्हें वो जीतना चाहता है। यह परमेश्वर के कार्य की योजना है, और यही उसका प्रबंधन है।

कई हजार वर्षों की परमेश्वर की योजना में, शरीर में किया गया कार्य दो भागों में हैं: पहला क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए उनकी महिमा गायी जाती है; दूसरा कार्य अंतिम दिनों में जीतने और सिद्ध करने का है, जिसके द्वारा वह महिमा प्राप्त करेगा। यह परमेश्वर का प्रबंधन है। इस कारण, तुम लोग परमेश्वर के कार्य को या तुम लोगों के लिये परमेश्वर की आज्ञा को बहुत साधारण न समझो। तुम सभी बहुत ज़्यादा बढ़कर और अनंतकाल की परमेश्वर की महिमा के भार के वारिस हो, और यह विशेष रूप में परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया है। परमेश्वर की महिमा के दो भागों में से, एक तुम लोगों के अन्दर प्रकट होता है; परमेश्वर की महिमा के पहले भाग की संपूर्णता तुम लोगों को दी गई है ताकि वह तुम सभी की विरासत बने। यह परमेश्वर का उत्कर्ष और उसकी योजना है जो बहुत पहले से पूर्व-निर्धारित है। परमेश्वर ने यह महान कार्य उस देश में किया है जहां बड़ा लाल अजगर निवास करता है, ऐसा कार्य, यदि कहीं और किया जाता, तो वर्षों पहले बड़ा फल लाता, और मनुष्यों के द्वारा बड़ी आसानी से स्वीकार किया जाता। और ऐसा कार्य पश्चिम के पादरियों के लिए स्वीकार करना अत्यन्त आसान होता जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा बढ़ाने के कार्य के इस चरण को किसी अन्य स्थान में प्राप्त नहीं कर सकता है; अर्थात, जहां सभी मनुष्यों की ओर से सहयोग मिलता है और सभी राष्ट्रों की स्वीकृति होती है, वहां परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के लिए कोई स्थान नहीं रहता है। और यही इस देश में इस कार्य के चरण का असाधारण महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से उद्धृत

परमेश्वर ने सम्पूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया तथा सम्पूर्ण सृष्टि को बनाया; तो वह अपने कार्य को केवल इस्राएल तक ही सीमित कैसे रख सकता है? उस हालत में, उसका संपूर्ण सृष्टि की रचना करने का क्या उपयोग होगा? उसने सम्पूर्ण संसार की रचना की है; उसने अपनी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को न सिर्फ़ इस्राएल में बल्कि ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों के साथ भी कार्यान्वित किया। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि वे चीन, संयुक्त राज्य अमरीका, यूनाईटेड किंगडम में रहते हैं या रूस में; प्रत्येक व्यक्ति आदम का वंशज है; वे सभी परमेश्वर के द्वारा बनाए गए हैं। एक भी व्यक्ति परमेश्वर की सृष्टि के दायरे से अलग नहीं हो सकता है और एक भी व्यक्ति "आदम का वंशज" होने से बच कर भाग नहीं सकता है। वे सभी परमेश्वर की रचनाएँ हैं, और वे सभी आदम के वंशज हैं; वे आदम और हवा के भ्रष्ट किए गए वंशज भी हैं। केवल इस्राएली ही नहीं, बल्कि सभी लोग, परमेश्वर की रचना हैं; फिर भी, रचनाओं में से कुछ लोग श्रापित हैं, और कुछ धन्य हैं। इस्राएलियों के बारे में कई वांछनीय बातें हैं; परमेश्वर ने आरम्भ में इस्राएलियों के बीच कार्य किया था क्योंकि वे सबसे कम भ्रष्ट लोग थे। उनकी तुलना में चीनी फीके पड़ते थे और उनकी बराबरी की उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। इस प्रकार, आरम्भ में परमेश्वर ने इस्राएलियों के बीच कार्य प्रारम्भ किया और दूसरे चरण का उसका कार्य केवल यहूदिया में किया गया। इसके परिणामस्वरूप, लोग कई प्रकार की धारणाएँ और नियम बनाते हैं। वास्तव में, यदि उसे मनुष्यों की धारणाओं के अनुसार कार्य करना होता, तो परमेश्वर केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता; इस प्रकार से, वह अन्यजाति के देशों के बीच अपने कार्य का विस्तार करने में असमर्थ होता; क्योंकि वह सम्पूर्ण सृष्टि का परमेश्वर होने के बजाय केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता। भविष्यवाणियों में कहा गया है कि यहोवा का नाम अन्यजाति देशों में महान होगा और यह कि अन्यजाति देशों में यहोवा का नाम फैल जाएगा—वे ऐसा क्यों कहते? यदि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर होता, तो वह केवल इस्राएल में ही कार्य करता। इसके अलावा, वह इस कार्य का विस्तार नहीं करता और वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं करता। चूँकि उसने यह भविष्यवाणी की है, तो उसे अन्यजाति देशों में और प्रत्येक देश तथा स्थान में अपने कार्य का विस्तार करने की आवश्यकता होगी। चूँकि उसने ऐसा कहा है, इसलिए, वह ऐसा ही करेगा। यह उसकी योजना है, क्योंकि वही स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता प्रभु है और सम्पूर्ण सृष्टि का परमेश्वर है। इस बात की परवाह किए बिना कि वह अपना कार्य इस्राएल में करता है या सम्पूर्ण यहूदिया में, वह जो कार्य करता है वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्य होता है और सम्पूर्ण मानवजाति का कार्य होता है। आज वह जो कार्य बड़े लाल अजगर—एक अन्यजाति देश में करता है—यह अभी भी सम्पूर्ण मानवता का कार्य है। पृथ्वी पर इस्राएल उसके कार्य का आधार हो सकता है; इसी प्रकार, अन्यजाति देशों के बीच चीन भी उसके कार्य का आधार हो सकता है। क्या उसने अब इस भविष्यवाणी को पूरा नहीं किया है कि "यहोवा का नाम अन्यजाति देशों में महान होगा?" अन्यजाति देशों के बीच उसके कार्य का पहला चरण उस कार्य को संदर्भित करता है जिसे वह बड़े लाल अजगर के देश में कर रहा है। क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस देश में कार्य करना और इन श्रापित लोगों के बीच कार्य करना विशेष रूप से मानवीय धारणाओं के विपरीत चलता है; इसलिए ये लोग बहुत ही निम्न स्तर के हैं और बिना किसी मूल्य के हैं। ये सभी वे लोग हैं जिन्हें यहोवा ने आरम्भ में त्याग दिया था। दूसरे लोगों के द्वारा लोगों को त्यागा जा सकता है, परन्तु यदि वे परमेश्वर के द्वारा त्यागे जाते हैं, तो इन लोगों की कोई हैसियत नहीं होगी, और उनका सबसे न्यूनतम मूल्य होगा। सृष्टि के एक भाग के रूप में, शैतान के द्वारा कब्ज़े में लिया जाना या अन्य लोगों के द्वारा त्याग दिया जाना, ये दोनों चीज़ें कष्टदायक हैं, परन्तु यदि सृष्टि के एक भाग को सृष्टि के प्रभु द्वारा त्याग दिया जाता है, तो यह दर्शाता है कि उसकी हैसियत बहुत ही निम्न स्तर पर है। मोआब के वंशज श्रापित थे और वे इस अल्प-विकसित देश में पैदा हुए थे; बिना संदेह के, मोआब के वंशज अंधकार के प्रभाव में सबसे निम्न हैसियत वाले लोग हैं। क्योंकि अतीत में भी इन लोगों का स्तर सबसे निम्न था, इसलिए उनके बीच किया गया कार्य मानवीय धारणाओं को चूर-चूर करने में सबसे समर्थ है, और यह कार्य छः-हजार-वर्षीय प्रबंधन की योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। क्योंकि उसका इनके बीच कार्य करना, मानवीय धारणाओं को तोड़ने में सबसे अधिक सक्षम है; इसलिए इसके साथ वह एक नया युग आरंभ करता है; इसके साथ वह सभी मानवीय धारणाओं को चूर-चूर कर देता है; इसके साथ वह सम्पूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य को समाप्त करता है। उसका आरम्भिक कार्य, इस्राएल के दायरे में, यहूदिया में किया गया था; उसने अन्यजाति देश में कोई भी युग-आरम्भ करने का कार्य ज़रा भी नहीं किया; उसका अंतिम चरण का कार्य न केवल अन्यजाति देशों के लोगों के बीच किया जाता है; बल्कि इससे भी अधिक, यह उन श्रापित लोगों के बीच किया जाता है। यह एक बिन्दु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है; इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण सृष्टि का परमेश्वर "बन" जाता है और सभी चीज़ों का प्रभु, जीवन से युक्त हर चीज़ के लिए आराधना का उद्देश्य बन जाता है।

... परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण सृष्टि पर निर्देशित है; यह इसके अनुसार नहीं किया जाता है कि रचना किए जाने के बाद किसी को श्रापित किया गया है या नहीं। प्रबंधन का उसका कार्य सृष्टि के सभी की ओर निर्देशित है, न कि उन चुने हुए लोगों की ओर जो श्रापित नहीं किए गए हैं। चूँकि परमेश्वर अपनी सृष्टि के बीच कार्य करना चाहता है, इसलिए वह इसे निश्चित रूप से पूरी सफलतापूर्वक पूर्ण करेगा; वह उन लोगों के बीच कार्य करेगा जो उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। इसलिए, वह मनुष्यों के बीच कार्य करने में सभी परम्पराओं को तोड़ देता है; उसके लिए "श्रापित," "ताड़ित," और "धन्य" शब्द बेमतलब के हैं! यहूदी लोग काफी अच्छे हैं, और इस्राएल के चुने हुए लोग भी बुरे नहीं हैं, ये अच्छी क्षमता और मानवता वाले लोग हैं। यहोवा ने शुरूआत में अपना कार्य इनके बीच आरम्भ किया और अपना आरम्भिक कार्य किया, परन्तु यह सब बेमतलब का होता यदि अब वह उन्हें अपने विजयी होने के कार्य के लिए प्राप्तकर्ताओं के रूप में इस्तेमाल करता। यद्यपि वे भी सृष्टि का एक हिस्सा हैं और उनमें बहुत से सकारात्मक पहलू हैं, किन्तु उनके बीच इस चरण के कार्य को करना बेमतलब होगा। वह किसी को भी जीतने में असमर्थ होगा, न ही वह सम्पूर्ण सृष्टि को समझाने में समर्थ होगा। बड़े लाल अजगर के देश के लोगों तक उसके कार्य के अंतरण का यही महत्व है। यहाँ सबसे गहरा अर्थ एक युग को आरम्भ करने में, सभी नियमों और मानवीय धारणाओं को उसके तोड़ने में और सम्पूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य के उसके समापन में है। यदि उसका वर्तमान का कार्य इस्राएलियों के मध्य किया गया होता, तो छः-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन के उसके कार्य के समाप्त होने के समय तक, हर कोई यह विश्वास करता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, यह कि सिर्फ़ इस्राएल के लोग ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, यह कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के आशीष और वादे प्राप्त करने के योग्य हैं। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर बड़े लाल अजगर के अन्यजाति देश में देहधारी होता है; उसने सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के रूप में परमेश्वर का कार्य पूर्ण कर लिया है; उसने अपना सम्पूर्ण प्रबंधन कार्य पूर्ण कर लिया है, और वह बड़े लाल अजगर के देश में अपने कार्य के सबसे मुख्य भाग को समाप्त करेगा। कार्य के इन तीनों चरणों का सबसे महत्वपूर्ण भाग है मनुष्य की मुक्ति—अर्थात्, संपूर्ण सृष्टि से सृष्टि के प्रभु की आराधना करवाना। इसलिए, इस कार्य का प्रत्येक चरण बहुत ही सार्थक है; परमेश्वर निरर्थक या मूल्यहीन कोई कार्य नहीं करेगा। एक ओर, कार्य का यह चरण एक युग के आरम्भ और पिछले दो युगों के अंत से युक्त है; दूसरी ओर, यह समस्त मानवीय धारणाओं और मानवीय विश्वास के सभी पुराने तरीकों को चूर-चूर करने से युक्त है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्यों की भिन्न-भिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; हालाँकि यह, मानवीय धारणाओं को पूरी तरह से हटा देता है, जिससे मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है। मोआब के वंशजों पर विजय का उपयोग करके और मोआब के वंशजों के बीच किए गए कार्य का उपयोग करके, परमेश्वर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में पूरी मानवजाति को जीत लेगा। उसके कार्य के इस चरण का यही सबसे गहरा महत्व है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यद्यपि आप अब जानते हैं कि आपकी हैसियत निम्न है, और यह कि आप कम मूल्य के हैं, फिर भी आप अभी भी यह महसूस करेंगे कि आपकी सबसे आनन्ददायक वस्तु से भेंट हो गई है: आपने बहुत बड़े आशीष को विरासत में प्राप्त किया है, एक बड़ा वादा प्राप्त किया है और परमेश्वर के इस महान कार्य को आप पूरा कर सकते हैं और आप परमेश्वर का सच्चा चेहरा देख सकते हैं, परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जान सकते हैं और उसकी इच्छा को पूरा कर सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में किए गए थे। यदि अंत के दिनों के दौरान उसके कार्य का यह चरण अभी भी इस्राएलियों के बीच किया जा रहा होता, तो न केवल सम्पूर्ण सृष्टि यह विश्वास करती कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधन योजना भी अपने वांछित प्रभाव को प्राप्त नहीं करती। जिस समय इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण पूरे किए गए थे उस दौरान, कोई भी नया कार्य कभी भी नही किया गया था और अन्यजाति देशों में नया युग आरम्भ करने का परमेश्वर का कोई भी कार्य कभी भी नहीं किया गया था। युग आरम्भ करने के कार्य का यह चरण सबसे पहले अन्यजाति देशों में किया जाता है, और इसके अलावा, सबसे पहले मोआब के वंशजों के बीच किया जाता है; इसने सम्पूर्ण युग का आरम्भ किया है। परमेश्वर ने मानवीय धारणाओं में निहित किसी भी ज्ञान को चूर-चूर कर दिया और इसमें से किसी भी बात को अस्तित्व में बने रहने की अनुमति नहीं दी है। विजय करने के अपने कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को, ज्ञान के उन पुराने मानवीय तरीकों को ध्वस्त कर दिया है। वह लोगों को देखने देता है कि परमेश्वर के साथ कोई भी नियम नहीं हैं, कि परमेश्वर के बारे में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, कि वह जो कुछ करता है उसमें वह सही है। वह सृष्टि के बीच जो भी कार्य करता है, उसके प्रति आपको पूरी तरह से समर्पित अवश्य होना चाहिए। वह जो भी कार्य करता है वह सार्थक होता है और उसकी स्वयं की इच्छा और बुद्धि के अनुसार किया जाता है और मानवीय पसंदों और धारणाओं के अनुसार नहीं किया जाता है। वह उन चीज़ों को करता है जो उसके कार्य के लिए लाभप्रद होती हैं; यदि कोई चीज़ उसके कार्य के लिए लाभप्रद नहीं है तो वह उसे नहीं करेगा, चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो! वह कार्य करता है और अपने कार्य की सार्थकता और प्रयोजन के अनुसार अपने कार्य के लिए प्राप्तकर्ता एवं स्थान का चयन करता है। वह पुराने नियमों के मुताबिक नहीं चलता है, न ही वह पुराने सूत्रों का पालन करता है; इसके बजाय, वह कार्य की महत्ता के आधार पर अपने कार्य की योजना बनाता है; अंत में वह इसके सच्चे प्रभाव और इसके प्रत्याशित उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। यदि आप इन बातों को अभी नहीं समझेंगे, तो इस कार्य का आप पर कोई प्रभाव प्राप्त नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है" से उद्धृत

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