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परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और ज्ञान मुख्यतः किन पहलुओं में प्रकट हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्‍य हर उस नई चीज़ में प्रगट हुआ जिसे उसने बनाया था और उसके वचन और उपलब्धियाँ लेश-मात्र भी बिना किसी असंगति या अन्तराल के एक साथ घटित होती होने लगे। इन सभी नई चीज़ों का प्रकटीकरण और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ्‍य के प्रमाण थे; वह अपने वचन के समान ही भला है और उसका वचन पूरा होगा और जो पूर्ण हुआ है वो हमेशा बना रहेगा। यह सच्चाई कभी नहीं बदलीः यह भूतकाल में ऐसा था, यह वर्तमान में ऐसा है और पूरे अनंतकाल के लिए भी ऐसा ही बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

अपने वचनों के जरिए, सृष्टिकर्ता न केवल वह सब-कुछ हासिल करने में सक्षम हुआ जिसे उसने हासिल करने का बीड़ा उठाया था, और वह सब-कुछ प्राप्त किया जिसे वह प्राप्त करने निकला था, बल्कि जो कुछ भी उसने सृजित किया था, उसका नियन्त्रण कर सकता था, और जो कुछ उसने अपने अधिकार के अधीन बनाया था उस पर शासन कर सकता था और इसके अतिरिक्त, सब-कुछ क्रमानुसार और निरन्तर बने रहने वाला था। सभी वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा जीवित हुईं और मर भी गईं और उसके अतिरिक्त उसके अधिकार के कारण वे उसके द्वारा बनाई गई व्यवस्था के मध्य अस्तित्व में बनी रही और कोई भी वस्तु छूटी नहीं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से उद्धृत

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृत से वापस जीवित किया, तो उसने एक पंक्ति का उपयोग किया: "हे लाज़र, निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ नहीं कहा—ये शब्द क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी पूरा कर सकता है, जिसमें एक मरे हुए इंसान को जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन कर लिया, जब उसने जगत को बना लिया, तो उसने ऐसा अपने वचनों—मौखिक आज्ञाओं, अधिकार युक्त वचनों का उपयोग करके किया था, और ठीक उसी तरह सभी चीज़ों का सृजन हुआ था। यह उसी तरह से पूरा हुआ था। प्रभु यीशु के द्वारा कही गयी यह एक मात्र पंक्ति परमेश्वर के द्वारा उस समय कहे गए वचनों के समान थी जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन किया था; उसमें परमेश्वर के समान अधिकार, और सृजनकर्ता के समान क्षमता थी। परमेश्वर के मुँह के वचनों की वजह से सभी चीज़ें बनी और डटी थी, और बिल्कुल वैसे ही, जैसे प्रभु यीशु के मुँह के वचनों की वजह से लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके देहधारी देह में प्रदर्शित और साकार हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और क्षमता सृजनकर्ता, और मनुष्य के पुत्र से संबंधित थी जिसमें सृजनकर्ता साकार हुआ था। यही वह समझ है जो परमेश्वर के द्वारा लाज़र को मृत से वापस लाकर मनुष्यजाति को सिखायी गयी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

मैंने जो कहा है, उसका ख्याल करना चाहिए, जिसका ख्याल किया जाता है वह पूरा किया जाना चाहिए, और यह किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; यह परम सत्य है। चाहे वह हो जो मैंने अतीत में कहा है या वह जो मैं भविष्य में कहूँगा, वह सब कुछ घटित होगा, और समस्त मानव जाति इसको देखेगी। यह मेरे वचनों के कार्य का सिद्धांत है। ...संसार में जो कुछ भी होता है, उसमें से ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर अंतिम बात मेरी न हो। ऐसा क्या मौजूद है जो मेरे हाथों में नहीं? जो कुछ मैं कहता हूँ वही होता है, और मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है जो मेरे मन को बदल सकता है? क्या यह वह अनुबंध हो सकता है जो मैंने धरती पर बनाया था? मेरी योजना में कोई भी चीज़ बाधा नहीं डाल सकती; मैं अपने कार्य में और अपनी प्रबंधन योजना में हमेशा उपस्थित हूँ। कौन-सा मनुष्य हस्तक्षेप कर सकता है? क्या मैंने ही इन व्यवस्थाओं को व्यक्तिगत रूप से नहीं बनाया है? आज इस स्थिति में प्रवेश कर, यह अभी भी मेरी योजना से या मेरे पूर्वानुमान से भटका नहीं है; यह सब बहुत पहले मेरे द्वारा निर्धारित किया गया था। आप में से कौन इस चरण के लिए मेरी योजना की थाह ले सकता है? मेरी प्रजा मेरी आवाज़ सुनेगी, और उनमें से हर एक जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है, मेरे सिंहासन के सामने लौट आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1" से उद्धृत

यद्यपि "वचन" शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कंपाता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों में जीता है और उससे भी अधिक वह परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीता है। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल रूप रंग को बदलने के लिये है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "राज्य का युग वचन का युग है" से उद्धृत

अंत के दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं अद्भुत कामों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं अद्भुत कामों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहराई से दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। तुम अपने बल पर इन्हें पहचानने में असमर्थ हो। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम पर प्रकट किया जाता है, तब तुम्हें स्वाभाविक रुप से ही एहसास हो जाएगा; तुम उन्हें इनकार करने में समर्थ नहीं होगे, और तुम्हें पूरी तरह से यक़ीन हो जाएगा। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि, मनुष्य को शैतान के हाथ से छीन कर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। हालाँकि, उसे परमेश्वर के द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित नहीं किया गया है, इसलिए वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य को उसका कोई ज्ञान नहीं है और अभी भी परमेश्वर का विरोध करता और उसके प्रति प्रतिरोध दिखाता है। मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। ...परमेश्वर की महिमा और परमेश्वर स्वयं का अधिकार जिसे तुम देखते हो वे मात्र सलीब पर चढ़ने, बीमारी को चंगा करने और दुष्टात्माओं को बाहर निकालने के माध्यम से नहीं देखे जाते हैं, बल्कि वचन के द्वारा उसके न्याय के माध्यम से और अधिक देखे जाते हैं। यह तुम्हें दर्शाता है कि न केवल चिह्न दिखाना, बीमारियों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को बाहर निकालना परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है, बल्कि वचन द्वारा न्याय परमेश्वर के अधिकार का प्रतिनिधित्व करने और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने में बेहतर समर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से उद्धृत

तुम सबों को परमेश्वर की इच्छा को समझना और देखना चाहिये कि परमेश्वर का कार्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। आज का कार्य उन लोगों का परिवर्तन करना है जो भ्रष्ट हो चुके हैं, और अत्यधिक सुन्न हो चुके हैं, और उन्हें शुद्ध करना है जो सृजन के बाद शैतान के मार्ग पर चल पड़े हैं, यह आदम और हव्वा का सृजन करना नहीं, प्रकाश की सृष्टि या अन्य सभी पेड़ पौधों और पशुओं के सृजन की तो बात ही दूर है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सके और वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को परिवर्तित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है, यह उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए है जो परमेश्वर के नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की अंदरूनी कहानी यही है। तुमको यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। अपने कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यही परमेश्वर के कार्य का पूरा महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से उद्धृत

मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, ऐसी योजना जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः आरंभ में व्यवस्था का युग; उसके बाद अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार इन तीनों युगों में मेरे कार्य का सार अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक चरण में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या बल्कि, अधिक स्पष्ट कहें तो, यह उन छल-कपटों के अनुसार किया जाता है जो शैतान उस युद्ध में काम में लाता है जो मैं उसके विरुद्ध शुरू करता हूँ। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यक्त करना, शैतान के सभी छल-कपटों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को दिखाने के लिए है, साथ ही यह शैतान की असहनीय करालता को भी प्रकट करती है। इससे भी अधिक, यह मेरी रचनाओं को अच्छे और बुरे के बीच में अन्तर करना सिखाने के लिए है, यह पहचानना सिखाने के लिए है कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखना सिखाने के लिए है कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, वह अधम से भी अधम है, दुष्ट है। यह अच्छे एवं बुरे, सत्य एवं झूठ, पवित्रता एवं गन्दगी, महान और हेय के बीच पूर्ण निश्चितता के साथ अंतर करना सिखाने के लिए है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो सकती है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टि का प्रभु—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, मनुष्य को उसके आनन्द की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है जिनकी मैंने रचना की है और जो बाद में मेरे विरुद्ध हो गया। मेरी छः-हज़ार-सालों की प्रबंधन योजना को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है ताकि इन प्रभावों को प्राप्त किया जाए: मेरी रचनाओं को मेरा गवाह बनने में सक्षम बनाना, मेरी इच्छा को समझना, और यह जानना कि मैं ही सत्य हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से उद्धृत

मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीज़ों का विकास था जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझ कर पूर्वनियत किया था; कोई कह सकता है कि यह अनपेक्षित था। इस प्रकार यह इसलिए था क्योंकि यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का पुनः सृजन नहीं करने की शपथ ली। परंतु परमेश्वर की बुद्धि के बारे में लोगों को केवल इसी आधार पर पता चलता है, ठीक उसी बिंदु की तरह जो मैंने पहले उल्लेख किया: "मेरी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर प्रयोग में लायी जाती है।" इससे फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हुई या साँप ने उन्हें कैसे प्रलोभित किया, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि थी; इसलिए, जबसे उसने संसार का सृजन किया है, वह नये-नये कार्य में व्यस्त रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार षडयंत्र किये हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, यहोवा परमेश्वर ने भी अपने बुद्धिमान कार्य को लगातार सम्पन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से अब तक उसने कार्य को कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, लोगों के बीच लगातार कार्य किया। यह लड़ाई संसार के आरंभ से अंत तक चलती रहेगी। यह सब कार्य करते हुए, उसने न केवल शैतान के द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को उसके द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि अपनी बुद्धि सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की उन्हें अनुमति भी दी है, और अंत में वह मानवजाति को अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा—दुष्टों को दण्ड देगा, और अच्छों को पुरस्कार देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। क्योंकि वह एक बुद्धिमान परमेश्वर है, और उसकी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर प्रयोग की जाती है। और इसलिए वह न केवल स्वर्ग की सब चीज़ों को अपने अधिकार के सामने समर्पित करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और यही अंतिम बात नहीं है, वह उन बुरे कार्य करने वालों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। कार्य के सभी परिणाम उसकी बुद्धि के कारण उत्पन्न होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले कभी भी अपनी बुद्धि को प्रकट नहीं किया था, क्योंकि स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, और समस्त ब्रह्माण्ड में उसके कोई शत्रु नहीं थे, और कोई अंधकार की शक्तियाँ नहीं थीं जो प्रकृति में से किसी भी चीज़ पर आक्रमण करती थी। प्रधान स्वर्गदूत द्वारा उसके साथ विश्वासघात करने के बाद, उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और यह मानवजाति के कारण ही था कि उसने औपचारिक रूप से प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दि-लंबा युद्ध आरंभ किया, ऐसा युद्ध जो प्रत्येक बाद के चरण के साथ और अधिक घमासान होता गया। इनमें से प्रत्येक चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती है। केवल इस समय ही स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज़ परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, और विशेषकर परमेश्वर की यथार्थता को देख सकती है। वह आज भी अपने कार्य को उसी यथार्थ तरीके से सम्पन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जब वह अपने कार्य को करता है, तो वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को प्रत्येक चरण के भीतरी सत्य को देखने की अनुमति देता है, यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को कैसे यथार्थतः समझाया जाए, और विशेष रूप से परमेश्वर की वास्तविकता को कैसे समझाया जाए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से उद्धृत

मेरी योजना में, शैतान ने हमेशा हर कदम का बहुत तेजी से पीछा किया है, और मेरी बुद्धि की विषमता के रूप में, हमेशा मेरी वास्तविक योजना को बिगाड़ने के लिए उसने तरीके और संसाधनों को खोजने की कोशिश की है। परन्तु क्या मैं उसकी धोखेबाज़ योजनाओं से परास्त हो सकता हूँ? सभी जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर हैं मेरी सेवा करते हैं—क्या शैतान की कपटपूर्ण योजनाएँ कुछ अलग हो सकती हैं? यह निश्चित रूप से मेरे ज्ञान का प्रतिच्छेदन है, यह निश्चित रूप से वह है जो मेरे कर्मों के बारे में चमत्कारिक है, और यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा मेरी पूरी प्रबंधन योजना चलती है। राज्य के निर्माण के दौरान भी मैं शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं से बचता नहीं हूँ, बल्कि उस कार्य को करता रहता हूँ जो मुझे करना होता है। ब्रह्मांड में सभी वस्तुओं के बीच, मैंने अपनी विषमता के रूप में शैतान के कर्मों को चुना है। क्या यह मेरी बुद्धि नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 8" से उद्धृत

जब मैं औपचारिक रूप से अपना कार्य शुरू करता हूँ, तो सभी लोग वैसे ही चलते हैं जैसे मैं चलता हूँ, इस तरह कि समस्त संसार के लोग मेरे साथ कदम मिलाते हुए चलने लगते हैं, संसार भर में "उल्लास" होता है, और मनुष्य को मेरे द्वारा आगे की ओर प्रेरित किया जाता है। परिणामस्वरूप, बड़ा लाल अजगर मेरे द्वारा उन्माद और व्याकुलता की स्थिति में डाल दिया जाता है, और वह मेरा कार्य करता है, और, अनिच्छुक होने के बावजूद भी, अपनी स्वयं की इच्छाओं का अनुसरण करने में समर्थ नहीं होता है, और उसके पास मेरे नियन्त्रण में समर्पित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। मेरी सभी योजनाओं में, बड़ा लाल अजगर मेरी विषमता, मेरा शत्रु, और मेरा सेवक भी है; वैसे तो, मैंने उससे अपनी "अपेक्षाओं" को कभी भी शिथिल नहीं किया है। इसलिए, मेरे देहधारण के काम का अंतिम चरण उसके घराने में पूरा होता है। इस तरह से, बड़ा लाल अजगर मेरी उचित तरीके से सेवा करने में अधिक समर्थ है, जिसके माध्यम से मैं उस पर विजय पाऊँगा और अपनी योजना को पूरा करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 29" से उद्धृत

परमेश्वर की शैतान पर विजय एक निश्चित प्रवृत्ति है! वास्तव में शैतान बहुत पहले असफल हो चुका है। जब बड़े लाल ड्रेगन के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगे, अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया, और यह कार्य गति पकड़ने लगा, तो शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण शैतान को पराजित करने के अभिप्राय से था। शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देह बन गया और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, और उसने देखा कि कोई भी शक्ति कार्य को रोक नहीं सकी। इसलिए, जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया तथा कोई और कार्य करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप किया और परेशानियाँ डाली; हालाँकि, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन गया है, और कि अपने कार्य में, परमेश्वर ने मानवजाति के लिए प्रकटन और न्याय के रूप में काम में लाने के लिए, और परिणामस्वरूप मानवजाति को जीतने और शैतान को पराजित करने के लिए उसकी विद्रोहशीलता का उपयोग किया है। परमेश्वर उसकी अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, मैंने पहले निम्नलिखित कहा है: मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है। अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से उद्धृत

मैं पहले यह कह चुका हूँ: मैं एक बुद्धिमान परमेश्वर हूँ। मैं अपनी सामान्य मानवता का उपयोग सभी लोगों और शैतानी व्यवहार को प्रकट करने के लिए करता हूँ, उन लोगों को उघाड़ता हूँ जो गलत इरादों वाले हैं, जो दूसरों के सामने तो एक तरह से पेश आते हैं और उनकी पीठ के पीछे दूसरी तरह से, जो मेरा विरोध करते हैं, जो मेरे प्रति विश्वासघाती हैं, जो दौलत के लालच में हैं, जो मेरे बोझ के प्रति विचारशील नहीं हैं, जो अपने भाइयों और बहनों के साथ धोखाधड़ी और कुटिलता में लगे हुए हैं, जो लोगों को खुश करने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, और जो अपने भाइयों और बहनों के साथ अपने दिलोदिमाग में सर्वसम्मति से सहयोग नहीं कर सकते हैं। मेरी सामान्य मानवता के कारण, बहुत से लोग गुप्त रूप से मेरा विरोध करते हैं और धोखाधड़ी और कुटिलता में लगे होते हैं, वे यह मान लेते हैं कि मेरी सामान्य मानवता को पता नहीं होता है। और बहुत से लोग मेरी सामान्य मानवता पर विशेष ध्यान देते हैं, मुझे खाने और पीने के लिए अच्छी चीज़ें देते हैं, सेवकों की तरह मेरी सेवा करते हैं, और उनके दिल में जो कुछ भी होता है, उसे कहते हैं, जबकि मेरी पीठ के पीछे बिलकुल दूसरी तरह से काम करते हैं। अंधे मनुष्यों! तुम मुझे—उस परमेश्वर को जो मनुष्य के दिल में गहराई से देखता है—बिल्कुल नहीं जानते हो। तुम अभी भी मुझे नहीं जानते हो; तुम अभी भी सोचते हो कि मुझे पता नहीं है कि तुम क्या करने जा रहे हो। इसके बारे में सोचो: मेरी सामान्य मानवता के कारण कितने लोगों ने खुद को बर्बाद कर दिया है? जागो! मुझे अब और धोखा मत दो। तुम्हें अपने समस्त आचरण और व्यवहार को, तुम्हारे प्रत्येक शब्द और कार्य को, मेरे सामने अर्पित कर देना चाहिए, और मेरे द्वारा किए गए इसके निरीक्षण को स्वीकार करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 76" से उद्धृत

मैं बुद्धिमानी से काम करता हूँ। चाकू के बिना, बंदूक के बिना और एक भी अँगुली उठाए बिना, मैं उन लोगों को पूरी तरह से पराजित कर दूँगा जो मेरा अनादर करते हैं और मेरे नाम को शर्मिंदा करते हैं। मैं उदारचरित हूँ, और तब भी एक स्थिर गति से मैं अपना काम करता रहता हूँ जब शैतान ऐसी परेशानी पैदा करता है; मैं इस पर कोई ध्यान नहीं देता हूँ और मैं अपनी प्रबंधन योजना की पूर्णता के साथ इसे पराजित कर दूँगा। यह मेरी सामर्थ्य और मेरी बुद्धि है, और इससे भी अधिक यह मेरी अनन्त महिमा का एक छोटा सा हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 91" से उद्धृत

आज, परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए संसार में वापस आ गया है। उसका पहला ठहराव, नास्तिकता का कट्टर गढ़, तानाशाही शासकों का विशाल जमावड़ा, चीन है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा उसका हर तरह से शिकार किया जाता है और उसे अत्यधिक पीड़ा के अधीन किया जाता है, उसके पास अपना सिर टिकाने के लिए कोई जगह नहीं है और वह किसी भी शरणस्थल को पाने में असमर्थ है। इसके बावजूद, परमेश्वर तब भी उस कार्य को जारी रखता है जिसे करने का उसका इरादा हैः वह अपनी वाणी बोलता है और सुसमाचार का प्रसार करता है। कोई भी परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं ले सकता है। चीन में, जो कि एक ऐसा देश है जो परमेश्वर को एक शत्रु मानता है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। इसके बजाय, अधिक से अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचन को स्वीकार कर लिया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को बचाने के लिए वह सब कुछ करता है जो वह कर सकता है। हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है उस मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती है। वे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते हैं और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर के द्वारा दण्डित किए जाएँगे। वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी राष्ट्र जो परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ...

परमेश्वर का कार्य उफ़नती हुई लहरों के समान है। उसे कोई नहीं रोक सकता है, और कोई भी उसके क़दमों को थाम नहीं सकता है। केवल वे लोग ही जो उसके वचनों को सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करके उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त कर सकते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं वे ज़बर्दस्त आपदा और उचित दण्ड के अधीन किए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

राज्य मनुष्यों के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मनुष्यों के मध्य बन रहा है, यह मनुष्यों के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। ...क्या तुम सबने मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने मिलने वाले वायदों को पाया है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन को देखोगे और मेरी विजय की गवाही के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 19" से उद्धृत

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