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चीनी कम्युनिस्ट सरकार क्यों सर्वशक्तिमान परमेश्वर और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर बेतहाशा उत्पीड़न, दमन और कड़ी कार्यवाही करती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"इस युग के लोग बुरे हैं" (लूका 11:29)।

"सारा संसार उस दुष्‍ट के वश में पड़ा है" (1 यूहन्ना 5:19)।

"हे भोर के चमकनेवाले तारे, तू कैसे आकाश से गिर पड़ा है? तू जो जाति जाति को हरा देता था, तू अब कैसे काटकर भूमि पर गिराया गया है? तू मन में कहता तो था, 'मैं स्वर्ग पर चढ़ूँगा; मैं अपने सिंहासन को ईश्‍वर के तारागण से अधिक ऊँचा करूँगा; और उत्तर दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर विराजूँगा, मैं मेघों से भी ऊँचे ऊँचे स्थानों के ऊपर चढ़ूँगा, मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊँगा'" (यशायाह 14:12-14)।

"फिर स्वर्ग में लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले; और अजगर और उसके दूत उससे लड़े, परन्तु प्रबल न हुए, और स्वर्ग में उनके लिये फिर जगह न रही। तब वह बड़ा अजगर, अर्थात् वही पुराना साँप जो इब्लीस और शैतान कहलाता है और सारे संसार का भरमानेवाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया, और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए" (प्रकाशितवाक्य 12:7-9)।

"जब अजगर ने देखा कि मैं पृथ्वी पर गिरा दिया गया हूँ, तो उस स्त्री को जो बेटा जनी थी, सताया" (प्रकाशितवाक्य 12:13)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तथ्य ये हैं: जब अभी तक इस पृथ्वी का अस्तित्व नहीं था, तब प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार क्षेत्र था; और यही अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर के विरुद्ध और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात इसलिए किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना और परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर होना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति द्वारा परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवाना और परमेश्वर के बजाय अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत सी चीज़ें हैं जो उसका आज्ञापालन करती थीं; स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मानते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मानते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थी जबकि आदम और हव्वा उसका आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से अधिक बढ़कर होना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। बाद में उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो तब विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" से उद्धृत

परमेश्वर कार्य करता है और किसी व्‍यक्ति की देखभाल करता है, उस पर नज़र रखता है, और शैतान उसके हर एक कदम का पीछा करता है। परमेश्वर जिस किसी पर भी अनुग्रह करता है, तो शैतान भी पीछे-पीछे चलते हुए उस पर नज़र रखता है। यदि परमेश्वर को यह व्यक्ति चाहिए, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब कुछ करता है, वह कार्य जिसे परमेश्वर ने किया है उसे लुभाने, परेशान करने और तबाह करने के लिए वह विभिन्न बुरे तरीकों का इस्तेमाल करता है ताकि वह अपने छिपे हुए उद्देश्य हासिल कर सके। उसका उद्देश्य क्या है? वह नहीं चाहता है कि परमेश्वर के पास कोई हो; उसे वे सभी लोग चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्‍ज़ा करे, उन पर नियन्त्रण करे, उनको अपने अधिकार में ले जिससे वे उसकी आराधना करें, जिससे वे उसके साथ रहते हुए बुरे कार्य करें। क्या यह शैतान का भयानक इरादा नहीं है? ... शैतान परमेश्वर के साथ युद्ध में है, उसके पीछे-पीछे चलता रहता है। उसका उद्देश्य परमेश्वर के समस्त कार्य को नष्ट करना है जिसे परमेश्वर करना चाहता है, उन लोगों पर कब्‍ज़ा एवं नियन्त्रण करना है जिन्हें परमेश्वर चाहता है, उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है जिन्हें परमेश्वर चाहता है। यदि उन्हें मिटाया नहीं जाता है, तो वे शैतान के द्वारा उपयोग होने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" से उद्धृत

बड़े लाल अजगर की अभिव्यक्ति मेरे प्रति प्रतिरोध, मेरे वचनों के अर्थों की समझ और बोध की कमी, बार-बार मेरा उत्पीड़न, और मेरे प्रबंधन को बाधित करने के लिए षड़यंत्रों का उपयोग करने की कोशिश करना है। ... जिस बड़े लाल अजगर के बारे में मैं बात करता हूँ वह एक बड़ा लाल अजगर नहीं है; बल्कि यह मेरे विरोध में दुष्ट आत्मा है, जिसके लिए "बड़ा लाल अजगर" एक समानार्थी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 96" से उद्धृत

प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने चुपचाप मनुष्य को परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को दुष्टों के राजा और उसके पुत्रों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स ने मनुष्य की सोच और अवधारणाओं को विद्रोह के एक और युग में पहुँचा दिया है, जिससे मनुष्य उनकी और भी आराधना करता है जिन्होंने उन पुस्तकों और क्लासिक्स को लिखा था, इसने परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा को भी बढ़ाया है। दुष्टों के राजा ने निर्दयतापूर्वक मानव जाति के दिल से, उनकी जानकारी के बिना, परमेश्वर को बाहर निकाल दिया, जबकि उसने मनुष्य के दिल को हर्षपूर्वक हथिया लिया। तब से मनुष्य, दुष्टों के राजा का चेहरा धारण करने वाली एक बदसूरत और दुष्ट आत्मा के के अधीन हो गया था। परमेश्वर के प्रति घृणा उनके सीनों में भर गई, और दुष्टों के राजा की दुर्भावना दिन-ब-दिन आदमी के भीतर फैलती गई, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से बर्बाद नहीं हो गया। मनुष्य को अब स्वतंत्रता नहीं थी, और वह दुष्टों के राजा के चंगुल से मुक्त होने में असमर्थ था। इसलिए, उसे आत्मसमर्पण करते हुए और उसके अधीन होते हुए मनुष्य केवल एक ही जगह ठहर कर कब्जाया जा सकता था। इसने बहुत पहले मनुष्य के युवा दिल के भीतर नास्तिकता के फोड़े का बीज बोया था, उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखाते हुए जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में सीखो, चार आधुनिकीकरणों को समझो, दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है।" यही नहीं, इसने बार-बार घोषित किया, "आओ, हम अपने मेहनती श्रमिकों के माध्यम से एक खूबसूरत मातृभूमि का निर्माण करें," सभी को अपने देश की सेवा करने के लिए बचपन से तैयार रहने के लिए कहा। मनुष्य को अनजाने में इसके सामने लाया गया था, और इसने बेझिझक सारा श्रेय ले लिया (परमेश्वर द्वारा सभी मनुष्यों को अपने हाथों में रखने के संदर्भ में)। कभी एक बार भी इसने शर्म महसूस नहीं की, न ही शर्मिंदगी की कोई भावना रखी। इसके अलावा, उसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को लाकर अपने घर में बंदी बना लिया, जबकि वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलता रहा और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। वह ऐसा आततायी है! ऐसे चौंकाने वाले लांछनों को वह चीख-चीखकर कहता है, "दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण बहती है; बारिश वो नमी है जो द्रवीभूत होकर पृथ्वी पर बूंदों में गिर जाती है; भूविज्ञान सम्बन्धी परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना ही भूकंप है; सूरज की सतह पर नाभिक खलल के कारण हवा का शुष्क हो जाना ही सूखा पड़ने की वजह है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। कौन-सा हिस्सा परमेश्वर का कार्य है?" यहाँ तक कि चिल्लाते[क] हुए वह ऐसी बेशर्म बातें भी करता है: "मनुष्य प्राचीन वानरों से विकसित हुआ है, और लगभग एक अरब साल पहले के एक आदिम समाज से प्रगति करते हुए आज की दुनिया विकसित हुई है। किसी देश के बढ़ने या गिरने का फैसला उसके लोगों के हाथों द्वारा किया जाता है।" पीछे, मनुष्यों से इसे दीवारों पर उल्टा लटकाने के लिए कहा जाता है और इसे मेज पर संजोकर रख दिया जाता है और इसकी आराधना की जाती है। जब वह चीखता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," तो वह खुद को परमेश्वर मानता है, परमेश्वर को धरती की सीमाओं से लगातार बाहर धकेलता है। वह परमेश्वर की जगह में खड़ा होता है और दुष्टों के राजा के रूप में कार्य करता है। यह तो निपट हास्यास्पद है! उसकी वज़ह से कोई व्यक्ति जहरीली नफरत से भर सकता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर उसका कट्टर दुश्मन है, और परमेश्वर उसके साथ असंगत है। वह परमेश्वर को दूर भगाने के षड्यंत्र बनाता है जबकि वह अदंडित और स्वतंत्र[1] रहता है। ऐसा है यह दुष्टों का राजा! हम उसके अस्तित्व को कैसे सह सकते हैं? जब तक वह परमेश्वर के काम को छेड़कर उसे फटेहाल, उलट-पुलट[2] नहीं कर लेता है, तब तक वह चैन से नहीं रहेगा, मानो कि वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि मछली न मर जाए या जाल न फट जाए। वह जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है और लगातार करीब आता जाता है। उसके घिनौने चेहरे को बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब किया गया है और अब वह आहत और पिटा हुआ[3] है, एक भयानक दुर्दशा में, फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करने में नरम नहीं पड़ता है, मानो कि वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पाने के लिए, परमेश्वर को पूरी तरह से एक ही कौर में पूरा निगल जाना चाहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (7)" से उद्धृत

ऊपर से नीचे तक और शुरुआत से अंत तक, वह परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके साथ विसंगति में रहते हुए बर्ताव कर रहा है। प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की सभी बातें, प्राचीन संस्कृति का मूल्यवान ज्ञान, ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाएँ, और कन्फ्यूशियस के क्लासिक्स और सामंती संस्कारों ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी, साथ ही विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं भी नज़र नहीं आते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित, प्रतिरोधित और नष्ट करने के लिए वह प्राचीन "वानरों" द्वारा प्रचारित केवल सामंती रिवाजों पर जोर देता है। आज तक उसने मनुष्य को केवल पीड़ित ही नहीं किया है, बल्कि वह मनुष्य को पूरी तरह से खा जाना[4] चाहता है। सामंती नीति-संहिता की शिक्षा और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और मनुष्यों को बड़े और छोटे दुष्टों में बदल दिया है। कुछ ही ऐसे हैं जो आसानी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत करते हैं। मनुष्य का चेहरा हत्या से भर गया है, और सभी जगहों पर, मृत्यु हवा में है। वे इस भूमि से परमेश्वर को निष्कासित करने की कोशिश करते हैं; हाथों में चाकू और तलवारों के साथ, वे परमेश्वर का विनाश करने के लिए खुद को युद्ध के गठन में व्यवस्थित करते हैं। दुर्जनों की भूमि में जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियां फैली हुई हैं। इस जमीन के ऊपर जलते हुए कागज और धूप की एक घृणास्पद गंध फैली हुई है, इतनी घनी कि दम घुटता है। ऐसा लगता है मानो सर्प के मुड़ते और कुंडली मारते समय कीचड़ से ऊपर उठती हुई बदबू हो, और यह मनुष्य से बरबस कै कराने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, दुष्ट राक्षसों द्वारा ग्रंथों से किये गए मंत्रोच्चार की हलकी आवाज़ को सुना जा सकता है। यह आवाज़ दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, और मनुष्य अपनी रीढ़ की हड्डी से होकर नीचे जाती एक थरथराहट को महसूस किये बिना नहीं रह पाता है। इस देश भर में इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं, जिसने इस देश को एक चमचमाती दुनिया में बदल दिया है, और दुष्टों का राजा अपने चेहरे पर एक मूर्खतापूर्ण हँसी लिए हुए है, मानो कि उसकी शैतानी योजना सफल हो गई हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से इसके बारे में बेखबर है, और न ही मनुष्य को यह पता है कि इस दुष्ट ने पहले से ही उसे इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह मूढ़ और पराजित हो गया है। वह परमेश्वर का सब कुछ एक झटके में मिटा देना, फिर से उसका अपमान करना और उसे मार डालना चाहता है, और उसके कार्य को ढहाने और उलट-पुलट करने का प्रयास करता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जे का मान सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच के काम में परमेश्वर के "हस्तक्षेप" को बर्दाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? वह कैसे परमेश्वर को अपने काम को बाधित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभक रहा यह दुष्ट, कैसे पृथ्वी पर अपनी शक्ति के दरबार में परमेश्वर को शासन करने की इजाजत दे सकता है? यह कैसे स्वेच्छा से हार स्वीकार कर सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत को उजागर किया जा चुका है, इसलिए किसी को यह पता नहीं है कि वह हँसे या रोये, इसकी तो बात करना वास्तव में मुश्किल है। क्या यही इसका सार नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (7)" से उद्धृत

हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, दुःख से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चालें चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[5] क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे बेहद संरक्षित[6] रखा जाता है। आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; नज़र रखने वाले प्रहरी इस दौरान चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, इस बात से अत्यंत भयभीत कि परमेश्वर उन्हें अचानक पकड़ लेगा और उन सभी को मिटा कर रख देगा, और उन्हें शांति और ख़ुशी के स्थान से वंचित कर देगा। ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? मानवीय दुनिया के मामलों की क्या कद्र है उन्हें? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्सुक इच्छा को समझ सकता है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? पीढ़ी दर पीढ़ी, माता-पिता से लेकर बच्चों तक, दास मनुष्य ने परमेश्वर को अनुचित तरीके से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष उत्तेजित न करे? दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापमयता की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो, उसे अब अनियंत्रित ढंग से फैलने की अनुमति न दो, और उसे अपनी इच्छानुसार परेशानी पैदा मत करने दो! यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं। परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच का स्नेह कहाँ है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा करना? परमेवर को क्यों बार-बार पुकारने पर मजबूर करना? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने के लिए क्यों मजबूर करना? यह अंधकारमय समाज और उसके शत्रुओं के संरक्षक कुत्ते, क्यों परमेश्वर को स्वतंत्रता से इस दुनिया में आने और जाने से रोकते हैं जिसे उसने बनाया?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)" से उद्धृत

शैतान जन सामान्य को धोखा देने के जरिए प्रसिद्धि प्राप्त करता है। वह अक्सर स्वयं को धार्मिकता के प्रमुख और आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित करता है। धार्मिकता के बचाव के झण्डे तले, वह मनुष्य को हानि पहुंचाता है, उनके प्राणों को निगल जाता है, और मनुष्य को स्तब्ध करने, धोखा देने और भड़काने के लिए हर प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। उसका लक्ष्य है कि मनुष्य उसके बुरे आचरण को स्वीकार करे और उसका अनुसरण करे, और मनुष्य परमेश्वर के अधिकार और सर्वोच्च सत्ता का विरोध करने में उसके साथ जुड़ जाए। फ़िर भी, जब कोई उसकी चालों, षड्यंत्रों और बुरी युक्तियों को समझ जाता है और नहीं चाहता कि शैतान द्वारा उसे लगातार कुचला जाए और मूर्ख बनाया जाए या वो निरन्तर उसकी गुलामी करे, या उसके साथ दण्डित एवं नष्ट हो जाए, तो शैतान अपने असली दुष्ट, दुराचारी, भद्दे और वहशी चेहरे को प्रकट करने के लिए अपने पहले के संत रुपी चेहरे को बदल देता है और अपने झूठे नकाब को फाड़कर फेंक देता है। उसे उन सभी का विनाश करने में कहीं ज़्यादा खुशी मिलेगी जो उसका अनुसरण करने से इंकार करते हैं और उसकी बुरी शक्तियों का विरोध करते हैं। इस बिन्दु पर शैतान अब से विश्वास योग्य और सभ्य व्यक्ति का रूप धारण नहीं कर सकता है; उसके बजाए, उसके बुरे और असली शैतानी लक्षण प्रकट हो जाते हैं भेड़ की खाल उतर जाती है। जब एक बार शैतान की युक्तियों को प्रकाश में लाया जाता है, जब एक बार उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाता है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाएगा और अपने वहशीपन का खुलासा करेगा; लोगों को नुकसान पहुंचाने और निगल जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र हो जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मनुष्य के जागृत हो जाने से क्रोधित हो गया है; स्वतन्त्रता और प्रकाश की लालसा और अपनी कैद को तोड़कर आज़ाद होने की उनकी आकांक्षा के कारण उसने मनुष्य के प्रति बदले की एक प्रबल भावना को विकसित कर लिया है। उसके क्रोध का अभिप्राय उसकी बुराई का समर्थन करना है, और साथ ही यह उसके जंगली स्वभाव का असली प्रकाशन भी है।

हर एक मामले में, शैतान का आचरण उसके बुरे स्वभाव का खुलासा करता है। उन सभी बुरे कार्यों से जिन्हें शैतान ने मनुष्यों पर क्रियान्वित किया है—उसके आरम्भ के प्रयासों से लेकर उसका अनुसरण करने के लिए मनुष्यों को बहकाने तक, और उसके द्वारा मनुष्य के शोषण तक, जिसके अंतर्गत वह मनुष्य को अपने बुरे कार्यों में खींचता है, और उसके असली लक्षणों का खुलासा कर दिए जाने और मनुष्य द्वारा उसे पहचानने और उसे छोड़ देने के पश्चात् मनुष्य के प्रति शैतान की बदले की भावना तक—कोई भी शैतान के बुरी सार का खुलासा करने से नहीं चूकता है; कोई भी बात उस तथ्य को प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान का सकारात्मक चीज़ों से कोई नाता नहीं है; कोई भी बात यह प्रमाणित करने से नहीं चूकती है कि शैतान ही समस्त बुरी चीज़ों का स्रोत है। उसका हर एक कार्य उसकी बुराई का बचाव करता है, उसके बुरे कार्यों की निरन्तरता को बनाए रखता है, धर्मी और सकारात्मक चीज़ों के विरुद्ध जाता है, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के नियमों और विधियों को बर्बाद कर देता है। वे परमेश्वर के विरोधी हैं, और वे ऐसे हैं जिन्हें परमेश्वर का क्रोध नष्ट कर देगा। यद्यपि शैतान के पास उसका अपना क्रोध है, फ़िर भी उसका क्रोध उसके बुरे स्वभाव को प्रकट करने का एक माध्यम है। शैतान के भड़का हुआ और क्रोधित होने का कारण यह है: उसकी अकथनीय युक्तियों का खुलासा कर दिया गया है; उसके षडयन्त्र आसानी से दूर नहीं होते हैं; परमेश्वर का स्थान लेने और परमेश्वर के समान कार्य करने की उसकी वहशी महत्वाकांक्षा और लालसा पर प्रहार किया गया है और उसे रोका गया है; समूची मानवजाति को नियन्त्रित करने का उसका उद्देश्य निष्फल हो गया है और उसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से उद्धृत

फुटनोट:

1. "अदंडित और स्वतंत्र" इंगित करता है कि वह दुष्ट उन्मत्त हो जाता है और उसके सिर पर खून सवार हो जाता है।

2. "फटेहाल, उलट-पुलट" का अभिप्राय इससे है कि कैसे उस दुष्ट का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।

3. "आहत और पिटा हुआ" का सम्बन्ध दुष्टों के राजा के बदसूरत चेहरे से है।

4. "खा जाना" का मतलब दुष्टों के राजा के हिंसक व्यवहार से है, जो लोगों को पूरी तरह से लूटता है।

5. "निराधार आरोप लगाते हुए" का अर्थ है वे तरीके जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

6. "बेहद संरक्षित" उन विधियों को दर्शाता है जिनका उपयोग करके शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, वे बहुत ही दुष्ट होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने की जगह नहीं मिलती।

क. मूल पाठ में "कुछ चिल्लाते भी हैं" ऐसा लिखा है।

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