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व्यवस्था के युग में नबियों के द्वारा दिए गए परमेश्वर के वचनों और देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अनुग्रह के युग में, यीशु ने भी काफ़ी बातचीत की और काफ़ी कार्य किया। वह यशायाह से किस प्रकार भिन्न था? वह दानिय्येल से किस प्रकार भिन्न था? क्या वह कोई भविष्यद्वक्ता था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे जिन्होंने वचन बोले थे, और मनुष्य को उनके वचन लगभग एक से प्रतीत होते थे। उन सभी ने बातें की और कार्य किए। पुराने विधान के भविष्यवद्क्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सका। ऐसा क्यों है? यहाँ कार्य की प्रकृति के आधार पर भिन्नता है। इस मामले को समझने के लिए, तुम देह की प्रकृति पर विचार नहीं कर सकते हो और तुम्हें किसी व्यक्ति के वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार नहीं करना चाहिए। तुम्हें अवश्य हमेशा सबसे पहले उसके कार्य पर और उन प्रभावों पर विचार करना चाहिए जिसे उसका कार्य मनुष्य में प्राप्त करता है। उस समय नबियों के द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य का जीवन प्रदान नहीं किया, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त किए गए संदेश मात्र भविष्यवाणियाँ थीं न कि जीवन का मार्ग थीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वरों के लिए सम्भव नहीं है। यीशु, ने भी, बहुत बातें की, परन्तु वे वचन जीवन का मार्ग थे जिसमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। कहने का अर्थ है, कि सबसे पहले, वह लोगों में जीवन प्रदान कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरा, वह मनुष्यों के विचलनों को पलट सकता था; तीसरा, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का उत्तरवर्ती हो सकता था; चौथा, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकता को समझ सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवाँ, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न सिर्फ़ यशायाह से भिन्न है परन्तु अन्य भविष्यद्वक्ताओं से भी भिन्न है। भविष्यवद्क्ताओं के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। सबसे पहले, वह मानव का जीवन प्रदान नहीं कर सकता था; दूसरा, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरा, उसने जिसके बारे में स्वयं बोला वह उसकी ही समझ से परे था। वह परमेश्वर के आत्मा से प्रत्यक्षतः प्रकाशनों को प्राप्त कर रहा था, और दूसरे उन्हें सुन कर भी, उसे नहीं समझे होंगे। ये कुछ ही बातें अकेले यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक नहीं थे, यहोवा के बदले किए गए कार्य उसके एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। हालाँकि, वह यहोवा का प्रतिनिधित्व पूरी तरह से नहीं कर सकता था। वह यहोवा का नौकर था, यहोवा के काम में एक उपकरण था। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य के क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से परे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और सम्पूर्ण मानवजाति का उद्धार करने के लिए सलीब पर चढ़ गया। अर्थात्, उसने यहोवा के द्वारा किए गए कार्य से परे नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। दूसरी स्थिति यह है कि वह उस बारे में बोलने में समर्थ था जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर कार्य था और सम्पूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य बनने के लिए देहधारी हुआ था, कैसे उस समय पवित्र आत्मा ने प्रकाशनों को दिया, और कैसे पवित्रात्मा ने कार्य करने के लिए मनुष्य पर अवरोहण किया, ये ऐसी बातें हैं जिन्हें मनुष्य देख नहीं सकता है या स्पर्श नहीं कर सकता है। इन सत्यों के लिए इस बात के साक्ष्य के रूप में कार्य करना सर्वथा असंभव है कि वही देहधारी परमेश्वर है। वैसे तो, परमेश्वर के केवल उन वचनों और कार्य पर ही अंतर किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए स्पर्श-गोचर हो। केवल यही वास्तविक है। यह इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल परमेश्वर स्वयं को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर का देहधारी देह भी सब बातों को नहीं जानता है; तुम सिर्फ़ उसके द्वारा किए गए कार्य से इस बात की पुष्टि कर सकते हो कि क्या वह परमेश्वर है।[क] उसके कार्यों से, यह देखा जा सकता है, सबसे पहले, वह एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ है; दूसरा, वह मनुष्य को जीवन प्रदान करने और मनुष्य को अनुसरण करने का मार्ग दिखाने में समर्थ है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर स्वयं है। कम से कम, जो कार्य वह करता है वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नई परिस्थितियों को पैदा करना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह परमेश्वर स्वयं है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान भविष्यद्वक्ताओं से भिन्नता प्रदान करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

कार्य के इस अंतिम चरण में, वचन के द्वारा परिणामों को प्राप्त किया जाता है। वचन के माध्यम से, मनुष्य बहुत से रहस्यों को और पिछली पीढ़ियों के दौरान किये गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य को पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी नहीं सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के कार्य को, और उन सिद्धान्तों को समझ जाता है जिनके द्वारा वे काम करते थे; वचन के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर स्वयं के स्वभाव को, और साथ ही मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध को भी समझ जाता है, और स्वयं अपने सार को जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से, मनुष्य आत्मा के कार्य को, परमेश्वर के देहधारी देह के कार्य को, और इसके अतिरिक्त, उसके सम्पूर्ण स्वभाव को जान जाता है। छ: हज़ार वर्षों से अधिक की परमेश्वर की प्रबंधन योजना का तुम्हारा ज्ञान भी वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया था। क्या तुम्हारी पुरानी अवधारणाओं का तुम्हारा ज्ञान और उन्हें एक ओर करने में तुम्हारी सफलता भी वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं की गयी थी? पिछले चरण में, यीशु ने चिह्न और अद्भुत काम किए थे, परन्तु इस चरण में ऐसा नहीं है। वह अब ऐसा क्यों नहीं करता है, क्या इस बारे में तुम्हारी समझ भी वचन के माध्यम से ही प्राप्त नहीं की गई थी? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर हैं। यहाँ तक कि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसे परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकती थीं। भविष्यद्वक्ताओं ने केवल भविष्यवाणियां कीं थीं, कि भविष्य में क्या होगा, परन्तु उस कार्य के बारे में नहीं कहा था जिसे परमेश्वर उस समय करने वाला था। उन्होंने मनुष्य की ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई करने के लिए, मनुष्य को सच्चाई प्रदान करने के लिए या मनुष्य पर रहस्यों को प्रकट करने के लिए नहीं बोला था, और उनके बोल जीवन प्रदान करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं थे। इस चरण में बोले गए वचनों के बारे में, इसमें भविष्यवाणी और सत्य है, परन्तु वे प्रमुख रूप से मनुष्य को जीवन प्रदान करने के काम आते हैं। वर्तमान समय के वचन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों से भिन्न हैं। यह कार्य का ऐसा चरण है जो भविष्यवाणियां करने के लिए नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन के लिए है, और मनुष्य के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "क्या वह परमेश्वर है" वाक्यांश नहीं है।

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