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10. स्वर्ग का राज्य वास्तव में धरती पर आ है

10. स्वर्ग का राज्य वास्तव में धरती पर आ है

चेन बो, चीन

स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाना और प्रभु द्वारा मनुष्य को प्रदान किए गए शाश्वत कल्याण का आनंद उठा पाना, हम विश्वासियों की सबसे बड़ी लालसा है। हर बार जब मैं पास्टर को उपदेश में यह कहते हुए सुनते कि जो स्थान प्रभु हमारे लिए तैयार करेंगे वो स्वर्ग में होगा, वहाँ सोने के खेत होंगे, हरिताश्म की दीवारें होंगी, चारों ओर रत्न जगमगाएंगे, हम जीवन के वृक्ष का फल खा सकेंगे, जीवन की नदी का जल पी सकेंगे, अब और पीड़ा, आँसू, दु:ख नहीं होंगे और सब कुछ मुक्त और आज़ाद होगा, तो मुझमें भावनाओं और आनंद की अविश्वसनीय लहर उठती थी। यह वो स्थान है जिसके लिए मैं बहुत लालायित हूँ। धरती पर मेहनत-मजदूरी और दुख के जीवन ने वास्तव में मुझे भीतर से बहुत थका दिया है। इसी कारण, मैं सुसमाचार फैलाने और प्रभु के लिए स्वयं को उत्साहपूर्वक खपाने के वास्ते दौड़-धूप करती थी। मैं सुसमाचार का प्रचार करती और कलीसियाओं की स्थापना करती। ये सब चाहे जितना भी मुश्किल या पीड़ादायक होता जाता, लेकिन मैं दम भरने को भी नहीं रुकती। खासकर चूंकि मैं जानती थी कि हम अंत के दिनों में हैं और प्रभु हम सबको स्वर्गिक गृह में ले जाने के लिए जल्द ही लौट आएंगे, इसलिए मैं और-भी सक्रियता के साथ काम करती और खुद को खपाती थी।

एक दिन, हमारी माँ की कुशलता जानने के लिए मैं अपनी बहन के घर गई। मेरे वहाँ से जाने के पहले, मेरी बहन ने मुझे एक किताब दी, और आग्रह किया कि मैं इसे ध्यान से ज़रूर पढ़ूँ। मैंने मन ही मन सोचा : यह पुस्तक जो मेरी बहन ने मुझे दी है, निश्चित रूप से एक आध्यात्मिक काम है। संयोग से मेरी आत्मा अभी काफी शुष्क महसूस कर रही है, ऐसा नहीं लगता कि प्रभु मेरे साथ है, और बाइबल पढ़कर मैं रोशन महसूस नहीं करती। वापस पहुँच कर, मुझे इस पुस्तक को ध्यान से पढ़ना होगा। शायद यह मुझे कुछ दे। घर लौटने के बाद, मैंने पुस्तक खोली और इसे पढ़ना शुरू कर दिया। इससे पहले कि मैं जान भी पाऊँ, पुस्तक के वचनों ने मुझे खींच लिया। जितना अधिक मैंने इसे पढ़ा, मुझे उतना ही इससे आनंद हुआ, जितना अधिक मैंने इसे पढ़ा, उतना ही अधिक मुझे लगा कि इन वचनों में प्रकाश था, कि वे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध थे, ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी सामान्य व्यक्ति ने इन वचनों को बोला हो। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद से, मुझे कुछ ऐसे सत्य समझ में आये हैं, जिन्हें मैं पहले बाइबल पढ़कर नहीं समझ पाई थी, और मेरे मन में मुझे स्पष्टता और खुशी महसूस हो रही है। मैं प्रभु के करीब आने के लिए प्रार्थना करने को तैयार हूँ, और मेरा विश्वास बढ़ गया है। मेरी आध्यात्मिक स्थिति बेहतर हो गई है। मैंने सोचा : केवल पवित्र आत्मा का कार्य मनुष्य को विश्वास और शक्ति प्रदान कर सकता है, और मनुष्य की आत्मा को प्रावधान और पोषण दे सकता है। इस पुस्तक के वचन निश्चित रूप से पवित्र आत्मा से आते हैं। नतीजतन, हर दिन सुबह जागते ही मैं सबसे पहले इस पुस्तक को पढ़ती हूँ।

एक दिन, मैंने पुस्तक खोली और निम्नलिखित परिच्छेद पढ़ा: "परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य को अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीषों के अधीन जीवन जियेगीजीएगी; वहाँ शैतान की कुछ भी भ्रष्टता नहीं होगी, न ही कोई अधार्मिक बात होगी। मानवजाति सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेगी, वह परमेश्वर की देखभाल के अधीन रहेगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")। मैं वहाँ रुक गई। मेरा दिल चौंक गया, और मैंने मन ही मन सोचा: क्या भविष्य में मनुष्य पृथ्वी पर जीने जा रहा है? क्या प्रभु यीशु ने वादा नहीं किया था कि भविष्य में हम स्वर्ग में रहेंगे? ये वचन कैसे पृथ्वी पर होने के बारे में बात कर रहे हैं? यह कैसे संभव हो सकता है? क्या मैं इसे गलत पढ़ रही हूँ? इसलिए मैंने सावधानी से परिच्छेद को फिर से पढ़ा, और वास्तव में वे वचन कह रहे थे कि भविष्य में मनुष्य पृथ्वी पर रहने वाला है। तो इसका वास्तव में क्या अर्थ है? यह तो ठीक नहीं होगा। मुझे समझना था कि वास्तव में इसका क्या अर्थ था। तो मैंने पढ़ना जारी रखा: "परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मनुष्य के पास मनुष्य की मंज़िल है। विश्राम करते हुए, परमेश्वर पृथ्वी पर समस्त मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा। जबकि परमेश्वर के प्रकाश में, मनुष्य स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेगा। ... जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती है, तो इसका अर्थ है कि मनुष्य एक सच्ची सृष्टि बन गया है; मानवजाति पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करेगी और सामान्य मानवीय जीवन जियेगीजीएगी। लोग परमेश्वर के अब और अवज्ञाकारी और प्रतिरोध करने वाले नहीं होंगे; वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")। जितना अधिक मैंने पढ़ा, मुझे उतनी ही उलझन हुई: क्या इंसान पृथ्वी पर से परमेश्वर की आराधना करेगा? यह कैसे होगा? क्या बाइबल में यह नहीं लिखा है कि यह स्वर्ग में होगा? यह पृथ्वी पर कैसे हो सकता है? मैं अपनी बाइबल तक झट पहुँची, और यूहन्ना 14:2-3 का छंद खोला, और पढ़ा कि प्रभु यीशु कहता है: "मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते तो मैं तुम से कह देता; क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" प्रभु यीशु स्पष्ट रूप से कहता है कि उसका पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए था, इसलिए हमारी मंजिल स्वर्ग में होनी चाहिए। यह प्रभु का वादा है! मैंने मन ही मन सोचा: यह पुस्तक जो कह रही है वह प्रभु की बात से अलग है, इसलिए मैं इसे और नहीं पढ़ सकती। पुस्तक को बंद करने के बाद मेरा मन बहुत ही भ्रमित अवस्था में था, मुझे नहीं पता था कि क्या सही था, इसलिए मैंने लगातार प्रभु से प्रार्थना की: "हे प्रभु, कृपया मेरा मार्गदर्शन और मेरी अगुवाई करो। मुझे क्या करना चाहिए? मुझे इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए या नहीं? हे प्रभु, कृपया मुझे प्रबुद्ध करो, मेरा मार्गदर्शन करो...।" प्रार्थना करने के बाद मैंने सोचा कि कैसे इस पुस्तक को पढ़ने के बाद प्रभु के साथ अपने रिश्ते में मैंने खुद को उसके अधिक करीब, और प्रभु पर मेरे विश्वास में अधिक उत्साहित, महसूस किया था, और मेरी आत्मा को आपूर्ति दी जा रही थी। अगर मैंने इस पुस्तक को नीचे रखा और इसे पढ़ना बंद कर दिया तो मैं अपनी पिछली स्थिति में वापस चली जाऊँगी जहाँ मेरी आत्मा को रूखापन महसूस हो रहा था। चूँकि इस पुस्तक ने मेरे लिए इतना कुछ किया था, चूँकि मैं सुनिश्चित हो सकती थी कि यह पवित्र आत्मा से आई थी, चूँकि पवित्र आत्मा से आई होने के कारण यह गलत नहीं हो सकती थी, भले ही ये वचन मेरी अवधारणाओं के अनुरूप नहीं थे, इस वजह से मुझे उन्हें त्यागना नहीं चाहिए, न ही उन्हें पढ़ने से इनकार करना चाहिए। इस बारे में सोचते हुए, मैंने फैसला किया कि अपने मन में कोई निर्णय लेने के पहले इसे पढ़ते रहना बेहतर होगा।

बाद मैंने पुस्तक को फिर से उठाया और पढ़ना जारी रखा: "मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है, और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। जब मनुष्य विश्राम करते हुए परमेश्वर की आराधना करेगा, तो वो पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा, और जब परमेश्वर विश्राम करते हुए मानवजाति के बचे हुए हिस्से की अगुआई करेगा; तो वह उनकी स्वर्ग से अगुआई करेगा, पृथ्वी से नहीं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")। मैं अपने मन में इस पर विचार करती रही: अब यह परिच्छेद कहता है कि परमेश्वर का विश्राम-स्थल स्वर्ग में है, और जब इंसान विश्राम करता है तो वह पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करेगा। क्या यह हो सकता है कि इंसानों के विश्राम की जगह वास्तव में धरती पर है जैसा कि ये वचन कह रहे हैं? यह असंभव है! प्रभु यीशु ने पहले ही कहा है कि जहाँ भी प्रभु होगा, वहीं हम होंगे, और प्रभु यीशु का पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण हुआ था, इसलिए हम भी निश्चित रूप से स्वर्गारोहण करेंगे! मैंने पिछले वर्षों के बारे में सोचा कि कैसे मैंने परमेश्वर को जगह-जगह पर ढूँढा था, कैसे इतनी पीड़ा सहन की थी। क्या यह इसलिए न था कि मैं स्वर्गारोहण करूँगी और अब पृथ्वी पर पीड़ा नहीं झेलूंगी? अगर यह वास्तव में ऐसा ही है जैसा कि इस पुस्तक में कहा गया है, कि भविष्य में मनुष्य अब भी धरती पर ही रहेंगे, तो क्या मेरी आशाएँ व्यर्थ न हो जाएँगी? मैं अपने बिस्तर पर गुमशुम पड़ी रही। सिर से पैर तक मैंने कमज़ोरी महसूस की। जितना अधिक मैंने इस बारे में सोचा, उतनी अधिक मैं अशांत रही। फिर, इसे समझने के लिए, मैं भागकर अपनी बहन के घर गई।

जब मैं अपनी बहन के घर पहुँची, तो मैं एक अधेड़ महिला से मिली, और मेरी बहन से पता चला कि वह बहन ली थी। शीघ्र ही, मैंने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद से उठे विचारों के बारे में उनसे बात की। इसे सुनने के बाद, बहन ली ने मेरे साथ सहभागिता की, "बहन, हम सभी जो प्रभु में विश्वास करते हैं, सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने मनुष्य के लिए जगह तैयार करने का वादा किया है, और वह जहाँ भी होगा, हमें वहीं आने के लिए कहेगा। प्रभु स्वर्गारोहण कर चुका है, इसलिए भविष्य में जब प्रभु लौटता है तो वह निश्चित रूप से हमें स्वर्ग में उसके साथ रहने के लिए आमंत्रित करेगा। लेकिन क्या हममें से किसी ने भी इस बारे में सोचा है कि इस तरह की कल्पना और तर्क मान्य है या नहीं? अगर यह वैसा ही होता जैसी हमने कल्पना की थी, कि प्रभु आएगा और हमें स्वर्ग में रहने के लिए ले जाएगा, तो क्या प्रभु से की गई यह प्रार्थना 'तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो' (मत्ती 6:10)। और प्रकाशितवाक्य की यह भविष्यवाणी 'देख, परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा' (प्रकाशितवाक्य 21:3)। व्यर्थ न हो जाएँगी? ये चीज़ें फिर कैसे भविष्यवाणी के अनुसार होंगी? यदि वह अंतिम ठिकाना जो परमेश्वर हमें देता है स्वर्ग में होता, तो जब परमेश्वर ने मूल रूप से मनुष्य को बनाया, तो उसके द्वारा हमें पृथ्वी पर रहने देने का क्या महत्व था?" मैं बिलकुल ही आश्वस्त नहीं हुई थी और मैंने पलट कर कहा: "भले ही पवित्र ग्रंथ के ये अंश इन बातों को कहें, प्रभु ने खुद कहा था: 'मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो' (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु के पुनरुत्थान के बाद, उसने स्वर्गारोहण किया, और यहाँ प्रभु कह रहा है कि वह हमारे लिए एक जगह तैयार करेगा। वह कहता है कि वह जहाँ भी है, हम भी वहीं होंगे। तो यह साबित करता है कि परमेश्वर ने हमसे वादा किया था कि हम अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए स्वर्गारोहण करेंगे, न कि हम पृथ्वी पर अनन्त जीवन प्राप्त करेंगे। यह ऐसा कुछ है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता!" बहन ली ने धैर्यपूर्वक बात करना जारी रखा: "बहन, यह सच है कि प्रभु उन लोगों के लिए एक जगह तैयार कर रहा है जो उस पर विश्वास करते हैं, लेकिन क्या यह जगह वास्तव में धरती पर है या स्वर्ग में है? प्रभु इन वचनों में इसे नहीं कहता है, तो हमारी बात का आधार क्या है जब हम कहते हैं कि वह स्थान जो वह हमारे लिए तैयार कर रहा है, वह स्वर्ग में है? क्या यह वास्तव में प्रभु का वादा है, या यह हमारी अपनी अवधारणा और कल्पना है? हममें से उन लोगों के लिए जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, सभी चीजें प्रभु के वचन पर आधारित होनी चाहिए, हमारी अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं की प्रभु के वचन में मिलावट नहीं की जानी चाहिए, और फिर हम कहते हैं कि यह प्रभु का तात्पर्य है। क्या यह परमेश्वर के वचन की व्याख्या करने के लिए अपने विचारों पर निर्भर होना नहीं है? क्या यह प्रभु के वचन को तोड़ना-मरोड़ना नहीं है? इसलिए, हम प्रभु के वचन की व्याख्या करने के लिए अपने दिमाग की कल्पनाओं और अपने विचारों और पसंदों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं, तो हम एक भूल करेंगे। उत्पत्ति 2:7-8 में यह कहा गया है: 'तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम* को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्‍वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया। और यहोवा परमेश्‍वर ने पूर्व की ओर अदन में एक वाटिका लगाई, और वहाँ आदम को जिसे उसने रचा था, रख दिया।' यह स्पष्ट है कि शुरुआत में परमेश्वर ने मनुष्य को धरती पर बनाया, और मनुष्य को बनाने से पहले परमेश्वर ने, मनुष्य के लिए एक अच्छे वातावरण को तैयार करने के लिए, सभी चीज़ों को बनाया। इसलिए हम देख सकते हैं कि यह परमेश्वर की इच्छा है हम धरती पर रहें। इसके अलावा, प्रभु की प्रार्थना में, प्रभु ने हमसे परमेश्वर के प्रति प्रार्थना करवाई है कि उसका राज्य पृथ्वी पर आए। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में यह भविष्यवाणी की गई है, 'जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया' (प्रकाशितवाक्य 11:15)। 'परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा' (प्रकाशितवाक्य 21:3)। पवित्रशास्त्र और भविष्यवाणी की इन पंक्तियों से हम देख सकते हैं कि जिस स्थान को परमेश्वर हमारे लिए तैयार कर रहा है, वह धरती पर है, और भविष्य में हमारा अंतिम ठिकाना स्वर्ग में नहीं, धरती पर है...।" बहन ली की सहभागिता पूरी तरह से मेरी अवधारणाओं के खिलाफ़ चली गई। वह जो भी कह रही थी, मैंने बस उसे सुना ही नहीं। मैं उठ खड़ी हुई और मैंने उससे गुस्से में कहा: "बोलना बंद करो! पिछले कई वर्षों में मैंने दौड़-भाग की है, खर्च किया है और प्रभु के लिए पीड़ा उठाई है ताकि मैं स्वर्गारोहण कर सकूँ! हर समय मैं इंतज़ार करती रही हूँ कि प्रभु मुझे वापस स्वर्ग के घर में ले जाए, ताकि मुझे पृथ्वी पर पीड़ा न सहनी पड़े। तुम कहती हो कि हमारा अंतिम ठिकाना पृथ्वी पर है। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती।" यह कहने के बाद मैं पलट कर जाने लगी। मेरी छोटी बहन मुझसे बात करने की कोशिश में भाग कर आयी: "बहन, तुम इतनी जिद्दी कैसे हो सकती हो? क्या यह दृष्टिकोण जिसे तुमने पकड़ रखा है, सही है? प्रभु कहता हैं, 'जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ,' तुम इस वचन के सही अर्थ को नहीं जानती हो, और तुम अपने विचारों को बनाए रखती हो। क्या वह मूर्ख होना नहीं है? यह उन लोगों का रवैया नहीं है जो सत्य की तलाश करते हैं! प्रभु यीशु जिसका हम इंतज़ार करते हैं, पहले ही लौट आया है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है! वह पुस्तक जिसे मैंने तुम्हें पढ़ने दी है, परमेश्वर के व्यक्तिगत कथन और वचन है! वह प्रभु जिसकी हम हर दिन राह देख रहे थे कि वह हमें लेने आएगा, अब वापस आ गया है। हमें ध्यान से सुनना होगा। हमें बिल्कुल इस अत्यंत दुर्लभ अवसर को बिगाड़ना नहीं चाहिए!"

अपनी बहन को ये शब्द कहते सुनकर मैं चकित रह गई। मैं तो बस जो कुछ अभी सुना था उस पर विश्वास करने की हिम्मत न कर सकी: प्रभु वापस आ गया है? क्या ये सच है? तब मेरी बहन ने कहा: "क्या तुमने ही ऐसा नहीं कहा था कि इस पुस्तक के वचन पवित्र आत्मा से आए थे? जब तुमने इसे पढ़ा, तो तुम्हें लगा था कि तुम्हें बहुत कुछ प्रदान किया गया था, कि तुम्हारे पास पवित्र आत्मा का कार्य था, और प्रभु के साथ तुम्हारा रिश्ता बढ़कर अधिक करीब हो गया था। अब इसके बारे में सोचो: प्रभु के वचन के अलावा, कौन इस तरह के प्रभावी तरीक़े से बोलता है? अब प्रभु कार्य करने और नए वचनों को व्यक्त करने के लिए लौट आया है, और हम परमेश्वर के वचनों की मिठास का आनंद लेने में सक्षम हैं। अगर हम खोज और जाँच नहीं करते हैं, अगर हम अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को आँखें मूँद कर थामे रहते हैं, और बाइबल के शाब्दिक अर्थ को कसकर पकड़े रहते हैं, तो आखिरकार हम खुद को बर्बाद कर लेंगे। वे फरीसी जो अपने समय में बाइबल में कुशल थे, बाइबल के शब्दों को अंधाधुंध थामे रहते थे, उन्होंने सवाल करने की बिलकुल ही कोशिश नहीं की कि बाइबल की उनकी अपनी समझ सही थी या नहीं, या वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप थी या नहीं। इसके बजाय उन्होंने सोचा कि जिस व्यक्ति को उन्होंने मसीहा नहीं कहा, वह वो उद्धारकर्ता नहीं था जो आने वाला था, उन्होंने यह जाँच नहीं की कि प्रभु यीशु का मार्ग मनुष्य को जीवन की आपूर्ति दे सकता है या नहीं, या यह मनुष्य को अभ्यास करने का पथ दिखा सकता है या नहीं। वे केवल अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं से हठपूर्वक चिपके रहे, अंधे बनकर उन्होंने प्रभु यीशु के उद्धार से इनकार कर दिया, और अंत में प्रभु को क्रूस पर कीलों से जड़ देने का घृणित अपराध कर बैठे। हम फरीसियों के पदचिन्हों का अनुसरण नहीं सकते और परमेश्वर का विरोध करने के उनके पथ पर नहीं चल सकते हैं!" मेरी बहन के शब्दों को सुनने के बाद मैंने खुद मन ही मन सोचा: मेरी बहन जो कह रही है वह तर्कसंगत है। जब मनुष्य की आत्मा शुष्क हो, तो प्रभु का वचन ही एकमात्र समाधान होता है। मैंने सोचा कि जब से मैंने इस पुस्तक के वचनों को पढ़ा था, तब से मेरी आत्मा की सेहत वास्तव में बेहतर, और भी बेहतर, होती गई है, कैसे इसने मुझे परमेश्वर में विश्वास दिया है, और कैसे इससे मुझे यह महसूस होता है कि परमेश्वर मेरे साथ है। मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं कुछ सच्चाइयों को समझती हूँ। क्या यह हो सकता है कि इस पुस्तक के वचनों को बोलना वास्तव में प्रभु का लौट आना है? परमेश्वर का लौटना एक बड़ी बात है। मुझे बिना सोचे-समझे इंकार और आकलन नहीं करना चाहिए, मुझे जाँच करने और तलाशने का प्रयास करना चाहिए, मैं उन फरीसियों की तरह नहीं हो सकती जिन्होंने सत्य की खोज ही नहीं की, जो परमेश्वर के प्रतिरोध में अपनी अवधारणाओं से चिपके रहे थे! इस पल में, मैंने सुखद आश्चर्य और भय, इन दोनों का अनुभव किया। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था क्योंकि मैंने परमेश्वर में विश्वास किया था और उसके लौटने और मुझे स्वर्ग के राज्य में स्वीकार करने की मुझे प्रतीक्षा थी, जहाँ मैं चिंता से मुक्त जी सकती थी, अब पृथ्वी पर कठिन समय का अनुभव करने की आवश्यकता नहीं थी, और आज ही मैंने परमेश्वर के लौटने की खबर सुनी थी। यह वास्तव में एक विराट खुशी का अवसर है। मुझे भय इसलिए था क्योंकि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु की वापसी है तो प्रभु द्वारा मुझे स्वर्ग के राज्य में स्वीकार किए जाने के लिए उनका इंतज़ार करने का मेरा सपना टूट जाएगा...। मेरे दिल में मुझे सभी तरह की मिश्रित भावनाएँ महसूस हुईं, मुझे नहीं पता था कि इसका एहसास कैसे करना है। मुझे असहाय महसूस हुआ। मैं बस यही कर सकती थी कि प्रार्थना में प्रभु के पास जाऊँ: "हे प्रभु! हर दिन मैं प्रतीक्षा करती आई हूँ कि तुम आओगे और मुझे अपने स्वर्ग के घर में ले जाओगे, लेकिन वे कह रहे हैं कि जिस स्थान को तुमने मेरे अंतिम ठिकाने के लिए तैयार किया है वह यहीं धरती पर है। मैं वास्तव में इस तथ्य का सामना करने में असमर्थ हूँ। मैं वास्तव में पृथ्वी पर इस तरह के कठिन समय का अनुभव करना नहीं चाहती हूँ। हे प्रभु! मुझे मेरे दिल में अब इतनी पीड़ा महसूस हो रही है, कृपया मेरी मदद करो, और इस रास्ते पर आगे मेरा मार्गदर्शन करो।" प्रार्थना करने के बाद मैंने प्रभु यीशु के उन वचनों के बारे में सोचा जहाँ वह कहता है: "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है" (मत्ती 5:3)। यह सच है! परमेश्वर केवल उन लोगों को पसंद करता है और केवल उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की अनुमति देता है जो मन के दीन हैं और जो सत्य की तलाश करते हैं। मुझे ऐसा बनना चाहिए जो मन का दीन हो। केवल उनकी सहभागिता को ध्यान से सुनकर मैं प्रभु की इच्छा के अनुरूप हो सकूँगी।

उसी समय, बहन ली बोली: "प्रभु ने कहा है : 'धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे' (मत्ती 5:8)। हमें प्रभु के वचन को सुनना चाहिए, और प्रभु की वापसी का स्वागत करते समय उन लोगों की तरह होना चाहिए जो मन के शुद्ध हैं। हालाँकि परमेश्वर आज जो काम कर रहा है वह हमारी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं है, फिर भी जो कुछ भी परमेश्वर करता है वह अच्छा होता है, यह सब इंसानों की खातिर होता है, और इन सब में परमेश्वर की इच्छा मौजूद है, जहाँ सत्य की खोज की जा सकती है। अगर हम इसे पूरी तरह से समझ नहीं पाते हैं तो हमें पहले खुद को अलग करना होगा और सत्य की खोज करने का प्रयास करना होगा, ताकि हम परमेश्वर के प्रबोधन को प्राप्त कर सकें और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकें। बहन, अपने दिल को खोल दो और उन चीज़ों के बारे में बात करो जिन्हें तुम अभी भी समझती नहीं हो, और हम आपस में सहभागिता कर उन्हें खोज सकते हैं।" मुझे लगा कि बहन ली ने जो कहा था, वह अर्थपूर्ण था, मुझे शांत होना और खोजना चाहिए, इसलिए मैंने कहा: "बहन, एक बात है जिसे मैं समझ नहीं पा रही हूँ। ऐसा क्यों है कि हमारा अंतिम ठिकाना स्वर्ग में नहीं बल्कि यहीं पृथ्वी पर है?" बहन ली ने यूहन्ना 3:13 को ढूँढ निकाला: "कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात् मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है" और यशायाह 66:1 को पढ़ा "आकाश मेरा सिंहासन और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है," और मुझे इन दो परिच्छेदों को पढ़ने के लिए दिया। तब उसने इन दो परिच्छेदों पर सहभागिता की। बहन की सहभागिता के माध्यम से मुझे लगा कि मेरा मन अचानक स्पष्ट हो गया था। मैं भी पवित्रशास्त्र के इन अंशों को जानती थी, तो ऐसा क्यों था कि मैंने कभी उन पर चिंतन नहीं किया था? प्रभु स्पष्ट कहता है कि स्वर्ग से नीचे उतरने वाले मनुष्य के पुत्र को छोड़कर कोई भी व्यक्ति स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता है, क्योंकि स्वर्ग परमेश्वर का सिंहासन है और पृथ्वी परमेश्वर के चरणों की चौकी है, तो मनुष्य स्वर्ग पर चढ़ने के लायक कैसे हो सकता है? परमेश्वर ने मनुष्य को धरती पर बनाया, और उसे धरती पर जीने दिया। जिस दिन से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य पृथ्वी पर निवास करता रहा है, और धीरे-धीरे संख्या में बढ़ा है। मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर ने जो भी कार्य किया, वह भी पृथ्वी पर हुआ है। यह ऐसा कुछ था जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित किया था। यह ऐसा कुछ है जिसे कोई भी व्यक्ति नहीं बदल सकता है। उसने बाइबल को अपनी संगति में गूँथते हुए बताया कि कैसे प्रभु ने कहा था कि वह हमारे लिए जगह तैयार करेगा। उसने समझाया कि यह देहधारी परमेश्वर के प्रकटन और अंत के दिनों में उसके धरती पर किए काम के संदर्भ में कहा गया है, उसने यह पूर्वनिर्धारित कर दिया था कि हम अंत के दिनों में जन्मेंगे, परमेश्वर कि वाणी सुनेंगे, परमेश्वर के सिंहासन के सामने उठाए जाएँगे, अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण के काम को स्वीकार करेंगे और अंतत: परमेश्वर के राज्य में ले जाए जाएंगे। यही, "जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:3), इन वचनों का सच्चा अर्थ है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर का राज्य वास्तव में धरती पर है, और मानव जाति का अंतिम ठिकाना पृथ्वी पर है, न कि स्वर्ग में! इस पूरे समय में, मैं अपनी खुद की अवधारणाओं और कल्पनाओं के भीतर रहा करती थी, मैंने इसे परिसीमित किया था कि परमेश्वर स्वर्ग में मेरे जीने के लिए मुझे लेने वापस लौट आएगा, लेकिन यह वास्तव में प्रभु की इच्छा के अनुरूप नहीं है, यह तथ्यों के अनुरूप नहीं है! हालांकि, मैं अभी भी धरती पर इस तरह का जीवन जीने के लिए तैयार नहीं थी जहाँ मैं शैतान द्वारा पीड़ित थी। इसलिए, इसके तुरंत बाद, मैंने बहन ली को अपने विचार बताए।

मेरी बात सुनने के बाद, बहन ली ने 'वचन देह में प्रकट होता है' की किताब खोली, और मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से एक परिच्छेद पढ़कर सुनाया: "विश्राम में जीवन बिना युद्ध, बिना गंदगी और लगातार बनी रहने वाली अधार्मिकता के बिना है। कहने का अर्थ है कि इसमें शैतान के उत्पीड़न (यहाँ 'शैतान' का संकेत शत्रुतापूर्ण शक्तियों से हैं), शैतान की भ्रष्टता, और साथ ही परमेश्वर की विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का अभाव है। हर चीज अपने मूल स्वभाव का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना करती है। स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। यह मानवजाति का विश्राम से भरा जीवन है। ... परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व अब और नहीं रहेगा। और शैतान की तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में अब और नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी परमेश्वर को पृथ्वी पर उत्पीड़ित किया था और वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिये गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिये गए होंगे। उन दुष्ट व्यक्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिए जाने के बाद, पृथ्वी पुनः कभी भी शैतान की पीडाओं को नहीं जानेगी। मानवजाति संपूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी, और केवल तब कहीं जाकर परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्वापेक्षाएँ हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से मुझे यह समझ में आया कि, हालाँकि भविष्य में हमारे जीवन अभी भी धरती पर होंगे, एक बार जब परमेश्वर मानवजाति को बचाने के कार्य के अपने अंतिम चरण को पूरा कर लेता है, तो शैतान नष्ट हो जाएगा, और पृथ्वी पर हमारे जीवन कभी भी शैतान के द्वारा परेशान नहीं होंगे, और न ही हम चिंता करेंगे या कष्ट उठाएँगे, या आँसू बहाएंगे, या आहें भरेंगे। यह उस समय की तरह ही होगा जब आदम और हव्वा अदन की वाटिका में रहते थे। हम परमेश्वर की आराधना करने के लिए स्वतंत्र होंगे, और एक सुंदर और धन्य जीवन जी रहे होंगे जहाँ परमेश्वर मनुष्य के साथ होगा। यह मानवजाति का अंतिम ठिकाना होगा, और यह वह अंतिम चीज़ होगी जो परमेश्वर अंत के दिनों में अपने कार्य में पूरा करेगा। यह वास्तव में अद्भुद है! उसी पल में मैंने एक राहत की साँस छोड़ी: "मानव जाति के अंतिम ठिकाने के बारे में इस तरह स्पष्ट तरीक़े से कौन बात कर सकता है? मानवजाति के अंत की व्यवस्था कौन कर सकता था? केवल परमेश्वर ही ऐसा कर सकता था!" सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के भीतर मैंने परमेश्वर की आवाज़ को पहचाना, और देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का कार्य करने के लिए प्रकट होना है! मैंने अंततः अपने मन की अवधारणाओं से छुटकारा पा लिया था, और खुशी से सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर मैं परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आई थी।

मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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10. स्वर्ग का राज्य वास्तव में धरती पर आ है

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