सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

(XI) परमेश्वर के साथ मनुष्य के संबंध से जुड़े वचन

128. परमेश्वर का स्वभाव सब के लिए खुला हुआ है और यह छिपा हुआ नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने जान-बूझकर कभी भी किसी व्यक्ति को दूर नहीं किया है और उसने कभी भी जान-बूझकर स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं किया है जिससे लोग उसे जानने या समझने के योग्य नहीं हो पाएँगे। परमेश्वर का स्वभाव हमेशा से ही खुला हुआ है और हमेशा से ही खुले तौर पर प्रत्येक व्यक्ति का सामना करता आया है। परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान, परमेश्वर अपना कार्य करता है, प्रत्येक का सामना करता है; और उसका कार्य हर एक व्यक्ति पर किया जाता है। जब वह यह कार्य करता है, तो वह लगातार अपने स्वभाव को प्रकट करता है, और वह हर एक व्यक्ति की अगुवाई एवं आपूर्ति करने के लिए लगातार अपने सार का और अस्तित्‍व का उपयोग करता है। चाहे परिस्थितियाँ अच्छी हों या बुरी, हर युग में और हर चरण पर, परमेश्वर का स्वभाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुला होता है, और उसका स्वरूप एवं अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुले होते हैं, उसी रीति से उसका जीवन लगातार एवं बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्ति कर रहा है और मानवजाति को सहारा दे रहा है। इन सब के बावजूद, परमेश्वर का स्वभाव कुछ लोगों के लिए छुपा रहता है। ऐसा क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही ये लोग परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी परमेश्वर को समझने का प्रयास या परमेश्वर को जानने की इच्छा नहीं की है, परमेश्वर के निकट आने की तो बात ही छोड़ दीजिए। इन लोगों के लिए, परमेश्वर के स्वभाव को समझने का अर्थ है कि उनका अंत आ रहा है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के स्वभाव के द्वारा उनका न्याय किया जाने वाला है और उन्हें दोषी ठहराया जानेवाला है। इसलिए, इन लोगों ने कभी भी परमेश्वर या उसके स्वभाव को समझने की इच्छा नहीं की है, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा की गहरी समझ या ज्ञान की लालसा नहीं की है। वे सचेत सहयोग के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को समझने का इरादा नहीं करते हैं—वे तो बस सदा मौज-मस्ती करते हैं और उन कार्यों को करते हुए कभी नहीं थकते हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसमें वे विश्वास करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जो केवल उनकी कल्पनाओं में ही मौजूद है, ऐसा परमेश्वर जो केवल उनकी अवधारणाओं में ही मौजूद है; और ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसे उनके दैनिक जीवन में उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। जब स्वयं सच्चे परमेश्वर की बात आती है, तो वे पूर्णतः उपेक्षापूर्ण हो जाते हैं, उसे समझने के लिए, एवं उस पर ध्यान देने के लिए उनमें कोई इच्छा नहीं होती है, और उनके पास उसके करीब आने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं होता है। वे स्वयं को छिपाने के लिए, एवं स्वयं को विशेष रीति से प्रस्तुत करने के लिए उन वचनों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर अभिव्यक्त करता है। उनके लिए, यह उनको पहले से ही सफल विश्वासी एवं ऐसा बना देता है जिनके हृदय के भीतर परमेश्वर के प्रति विश्वास है। उनके हृदय में, उनकी कल्पनाओं, उनकी अवधारणाओं, और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में उनकी व्यक्तिगत परिभाषाओं के द्वारा उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरी ओर, स्वयं सच्चे परमेश्वर का उनके साथ कोई वास्ता नहीं है। क्योंकि जब वे एक बार स्वयं सच्चे परमेश्वर को समझ जाते हैं, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को समझ जाते हैं, और जो वह है उसे समझ जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके कार्य, उनके विश्वास, और उनके अनुसरण को दोषी ठहराया जाएगा। इसीलिए वे परमेश्वर के सार को समझने के लिए तैयार नहीं हैं, और इसीलिए वे परमेश्वर को अच्छे से समझने, परमेश्वर की इच्छा को अच्छे से जानने, और परमेश्वर के स्वभाव को अच्छे से समझने के लिए सक्रिय रूप से खोजने या प्रार्थना करने की इच्छा नहीं रखते और उसके खिलाफ हैं। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कुछ ऐसा हो जिसे बनाया गया हो, जो खोखला एवं मायावी हो। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कोई ऐसा हो जो बिलकुल उनकी कल्पना जैसा हो, कोई ऐसा जो उनके आदेश को मानने के लिए हमेशा तैयार रहे, आपूर्ति करने में सदा भरपूर और हमेशा उपलब्ध रहे। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेना चाहते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो अनुग्रह बन जाए। जब उन्हें परमेश्वर की आशीष की आवश्यकता होती है, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह वो आशीष बन जाए। जब वे कठिनाई का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह उन्हें मजबूत बनाए, और उनका सुरक्षा-जाल बन जाए। परमेश्वर के विषय में इन लोगों का ज्ञान अनुग्रह एवं आशीष की परिधि के भीतर ही अटका रहता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के विषय में उनकी समझ भी उनकी कल्पनाओं और मात्र पत्रों एवं सिद्धान्तों तक ही सीमित होती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए उत्सुक हैं, जो असल में परमेश्वर को देखना चाहते हैं, और सचमुच में परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को समझना चाहते हैं। ये लोग सच्चाई की वास्तविकता एवं परमेश्वर के उद्धार की निरन्तर खोज में रहते हैं, और परमेश्वर के विजय, उद्धार एवं सिद्धता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ये लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, प्रत्येक परिस्थिति एवं प्रत्येक व्यक्ति, घटना या ऐसी चीज़ की तारीफ करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उनके लिए की है। और प्रार्थना करते हैं और ईमानदारी से तलाश करते हैं। जिसे वे सब से अधिक चाहते हैं वह यह है कि वे परमेश्वर की इच्छा को जानें और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव एवं सार को समझें। ऐसा इसलिए है ताकि वे आगे से परमेश्वर को ठेस नहीं पहुँचाएं, और अपने अनुभवों के माध्यम से, वे परमेश्वर की सुंदरता और उसके सच्चे पहलू को देखने के योग्य हों। यह इसलिए भी है जिससे एक असल सच्चा परमेश्वर उनके हृदय के भीतर बसेगा, और जिससे उनके हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान होगा, कुछ इस तरह कि वे आगे से कल्पनाओं, अवधारणाओं या छलावे के मध्य जीवन नहीं बिता रहे होंगे। इन लोगों के पास परमेश्वर के स्वभाव एवं उसके सार को समझने कीएक प्रबल इच्छा होने का कारण यह है कि परमेश्वर का स्वभाव एवं सार ऐसी चीज़ें हैं जिनकी आवश्यकता मानवजाति को उनके अनुभवों में किसी भी क्षण पड़ सकती है, ऐसी चीज़ें जो उनके पूरे जीवनकाल के दौरान जीवन की आपूर्ति करती हैं। जब एक बार वे परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हैं, तो वे और भी अच्छे से परमेश्वर का आदर करने, परमेश्वर के कार्य के साथ और भी अच्छे से सहयोग करने, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति और अधिक विचारशील बनने और अपनी बेहतरीन योग्यता के साथ अपने कर्तव्य को निभाने में सक्षम होंगे। जब परमेश्वर के स्वभाव के प्रति उनके रवैये के सम्बन्ध में दो प्रकार के लोग होते हैं। प्रथम प्रकार के लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझना नहीं चाहते हैं। यद्यपि वे कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहते हैं, स्वयं परमेश्वर को जानना चाहते हैं, और जो वह है उसे देखना चाहते हैं, और परमेश्वर की इच्छा का सचमुच सम्मान करना चाहते हैं, फिर भी अपने हृदय की गहराई में वे चाहते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में न रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस प्रकार के लोग निरन्तर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन और उसका विरोध करते हैं; वे अपने स्वयं के हृदयों में पद के लिए परमेश्वर से लड़ते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व पर अक्सर सन्देह और यहाँ तक कि उससे इंकार भी करते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव को, या स्वयं वास्तविक परमेश्वर को अपने हृदयों पर काबिज़ होने नहीं देना चाहते हैं। वे सिर्फ अपनी इच्छाओं, कल्पनाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करना चाहते हैं। अतः हो सकता है ये लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और उसके लिए अपने परिवारों एवं नौकरियों को भी त्याग सकते हैं, लेकिन वे अपने बुरे मार्गों का अंत नहीं करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग भेंटों की भी चोरी करते हैं या उसे उड़ा देते हैं, या एकांत में परमेश्वर को कोसते हैं, जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करनी है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर के ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने से बहुत अधिक डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को समझने की कभी कोशिश नहीं की है। क्या वे परमेश्वर को समझे बिना ही उसे जान सकते हैं? असंभव! इस प्रकार, जबकि "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर", इस विषय के वचन साधारण हो सकते हैं, प्रत्येक के लिए उनका अर्थ अलग होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए जो अक्सर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है, परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और परमेश्वर के प्रति अत्यंत उग्र है, इसका अर्थ दंडाज्ञा है; जबकि ऐसे व्यक्ति के लिए जो सत्य की वास्तविकता को खोजता है और जो अक्सर परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आता है, तो वह निःसन्देह बहुत ही स्वाभाविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से उद्धृत

129. जब परमेश्वर अपने सेज से उठा, पहला विचार जो उसके मन में आया वह यह थाः एक जीवित व्यक्ति, एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—कोई ऐसा जिसके साथ वह रहे और जो उसका निरन्तर साथी बने। वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने एक मुट्ठीभर धूल उठायी और सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया जिसकी उसने कल्पना की थी, और तब उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। एक बार जब परमेश्वर ने इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को प्राप्त कर लिया था, तो उसने कैसा महसूस किया? पहली बार, उसने एक प्रियजन, एक साथी को पाने का आनन्द महसूस किया। उसने पहली बार एक पिता होने के उत्तरदायित्व को और उस चिन्ता को भी महसूस किया जो उसके साथ आयी। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनन्द लाया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था जो परमेश्वर ने कभी किया था जिसे परमेश्वर ने अपने विचारों या यहाँ तक कि वचनों से भी सम्पन्न नहीं किया था, बल्कि जो उसके स्वयं के दोनों हाथों से किया गया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हो गया, जो माँस और लहू से बना हुआ, शरीर और आकार के साथ, और परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने एक प्रकार का ऐसा आनन्द महसूस किया जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने सचमुच में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी सी हलचल ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया था। इसलिए जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार उसे आया। यह घटनाओं की श्रृंखला थी जो उस पहले विचार के साथ आरम्भ हुई जो परमेश्वर को आया था। परमेश्वर के लिए, ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किन्तु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा ही महसूस क्यों न किया हो—आनन्द, उत्तरदायित्व, चिन्ता—उसके पास साझा करने के लिए वहाँ कोई नहीं था। उस पल से आरम्भ करके, परमेश्वर ने सचमुच में एकाकीपन और उदासी महसूस की जो उसने पहले कभी भी महसूस नहीं की थी। उसे महसूस हुआ कि मानव जाति उसके प्रेम और चिन्ता, और मनुष्य-जाति के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकती है या समझ नहीं सकती है, इसलिए उसे तब भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने इन चीज़ों को मनुष्य के लिए किया था, फिर भी मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे नहीं समझा था। प्रसन्नता के अलावा, वह आनन्द और संतुष्टि जो मनुष्य उसके लिए लाया था वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आयी। ये उस समय परमेश्वर के विचार और भावना थीं। जब परमेश्वर इन सब चीज़ों को कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनन्द से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, सब कुछ चिंता में घुल मिल गया। जो कुछ भी वह करना चाहता था वह था कि जल्दी ही यह व्यक्ति, यह मानव जाति जान ले कि परमेश्वर के हृदय में क्या है और उसकी इच्छाओं को शीघ्रता से समझ ले। तब, वे उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके अनुरूप हो सकते हैं। वे परमेश्वर को बोलते हुए अब और नहीं सुनेंगे लेकिन मूक बने रहेंगे; वे अब और अनजान नहीं होंगे कि कैसे परमेश्वर के साथ उसके कार्य में जुड़ें; और ख़ास कर के, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के प्रति अब और उदासीन लोग नहीं रहेंगे। ये पहली चीज़ें जिन्हें परमेश्वर ने पूर्ण किया बहुत ही अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

130. उत्पत्ति 2:15-17 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

क्या तुम लोगों को इन वचनों से कुछ समझ आया? पवित्र शास्त्र का यह भाग तुम लोगों को कैसा महसूस कराता है? पवित्र शास्त्र से "आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा" के उद्धरण को क्यों लिया गया? क्या अब तुम लोगों में से प्रत्येक के पास अपने-अपने मन में परमेश्वर और आदम की एक तस्वीर है? तुम लोग कल्पना करने की कोशिश कर सकते हो: यदि तुम लोग उस दृश्य में होते, तो तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर किस के समान होता? यह तस्वीर तुम लोगों को कौन सी भावनाओं का एहसास कराती है? यह एक द्रवित करनेवाली और दिल को छू लेनेवाली तस्वीर है। यद्यपि इसमें केवल परमेश्वर एवं मनुष्य ही हैं, फिर भी उनके बीच की घनिष्ठता ईर्ष्या के अत्यंत योग्य है: परमेश्वर का प्रचुर प्रेम मनुष्य को अकारण ही प्रदान किया गया है, यह मनुष्य को घेरे रहता है; मनुष्य भोला-भाला एवं निर्दोष, भारमुक्त एवं लापरवाह है, वह आनन्दपूर्वक परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीवन बिताता है; परमेश्वर मनुष्य के लिए चिंता करता है, जबकि मनुष्य परमेश्वर की सुरक्षा एवं आशीष के अधीन जीवन बिताता है; हर एक चीज़ जिसे मनुष्य करता एवं कहता है वह परमेश्वर से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ होता है और उससे अविभाज्य है।

तुम लोग कह सकते हो कि यह पहली आज्ञा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था जब उसने उसे बनाया था। यह आज्ञा क्या लिए हुए है? यह परमेश्वर की इच्छा को लिए हुए है, परन्तु साथ ही यह मानवजाति के लिए उसकी चिंताओं को भी लिए हुए है। यह परमेश्वर की पहली आज्ञा है, और साथ ही यह पहली बार भी है जब परमेश्वर मनुष्य के विषय में चिंता करता है। कहने का तात्पर्य है, जब से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया उस घड़ी से उसके पास उसके प्रति एक ज़िम्मेदारी है। उसकी ज़िम्मेदारी क्या है? उसे मनुष्य की सुरक्षा करनी है, और मनुष्य की देखभाल करनी है। वह आशा करता है कि मनुष्य भरोसा कर सकता है और उसके वचनों का पालन कर सकता है। यह मनुष्य से परमेश्वर की पहली अपेक्षा भी है। इसी अपेक्षा के साथ परमेश्वर निम्नलिखित वचन कहता है: "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" ये साधारण वचन परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। वे यह भी प्रकट करते हैं कि परमेश्वर के हृदय ने पहले से ही मनुष्य के लिए चिंता प्रकट करना शुरू कर दिया है। सब चीज़ों के मध्य, केवल आदम को ही परमेश्वर के स्वरुप में बनाया गया था; आदम ही एकमात्र जीवित प्राणी था जिसके पास परमेश्वर के जीवन की श्वास है; वह परमेश्वर के साथ चल सकता था, परमेश्वर के साथ बात कर सकता था। इसीलिए परमेश्वर ने उसे ऐसी आज्ञा दी थी। परमेश्वर ने इस आज्ञा में बिलकुल साफ कर दिया था कि मनुष्य क्या कर सकता है, साथ ही साथ वह क्या नहीं कर सकता है।

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसमें कोई चिंता है? इन वचनों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल लोगों के द्वारा सराहा जा सकता है, लेकिन इसे भली भांति एवं सचमुच में महसूस भी किया जा सकता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? अब जब मैंने इन बातों को कह दिया है, क्या तुम लोग अब भी सोचते हो कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? इतने साधारण नहीं हैं, है ना? क्या तुम लोग इसे पहले से देख सकते थे? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें इन थोड़े से वचनों को कहा होता, तो तुम भीतर से कैसा महसूस करते? यदि तुम एक दयालु व्यक्ति नहीं हो, यदि तुम्हारा हृदय बर्फ के समान ठण्डा है, तो तुम कुछ भी महसूस नहीं करोगे, तुम परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करोगे, और तुम परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करोगे। लेकिन यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास विवेक है, एवं मानवता है, तो तुम कुछ अलग महसूस करोगे। तुम स्नेह को महसूस करोगे, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारी परवाह की जाती है और तुम्हें प्रेम किया जाता है, और तुम खुशी महसूस करोगे। क्या यह सही नहीं है? जब तुम इन चीज़ों को महसूस करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार कार्य करोगे? क्या तुम परमेश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करोगे? क्या तुम अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और उसका सम्मान करोगे? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? तुम इससे देख सकते हो कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से उद्धृत

131. "और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए," इसकी छवि में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका निभाता है जब वह आदम और हव्वा के साथ है? मात्र दो मानव प्राणियों के साथ एक संसार में परमेश्वर किस प्रकार की भूमिका में प्रकट होता है? परमेश्वर की भूमिका में? ... तुम लोगों में से कुछ सोचते हैं कि परमेश्वर आदम और हव्वा के परिवार के एक सदस्य के रूप में प्रकट होता है, जबकि कुछ कहते हैं कि परमेश्वर परिवार के एक मुखिया के रूप में प्रकट होता है वहीं दूसरे कहते हैं वो अभिभावक के रूप में है। इनमें से सब बिलकुल उपयुक्त हैं। लेकिन वह क्या है जिस ओर मैं इशारा कर रहा हूँ? परमेश्वर ने इन दो लोगों की सृष्टि की और उनके साथ अपने सहयोगियों के समान व्यवहार किया। उनके एकमात्र परिवार के समान, परमेश्वर ने उनके रहन-सहन का ख्याल रखा और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा। यहाँ, परमेश्वर आदम और हव्वा के माता-पिता के रूप में प्रकट होता है। जब परमेश्वर यह करता है, मनुष्य नहीं देखता कि परमेश्वर कितना ऊंचा है; वह परमेश्वर की सबसे ऊँची सर्वोच्चता, उसकी रहस्यमयता को नहीं देखता है, और ख़ासकर उसके क्रोध या प्रताप को नहीं देखता है। जो कुछ वह देखता है वह परमेश्वर की नम्रता, उसका स्नेह, मनुष्य के लिए उसकी चिंता और उसके प्रति उसकी ज़िम्मेदारी एवं देखभाल है। वह रवैया एवं तरीका जिसके अनुसार परमेश्वर आदम और हव्वा के साथ व्यवहार करता है वह इसके समान है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंता करते हैं। यह इसके समान भी है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने पुत्र एवं पुत्रियों से प्रेम करते हैं, उन पर ध्यान देते हैं, और उनकी देखरेख करते हैं—वास्तविक, दृश्यमान, और स्पर्शगम्य। अपने आपको एक ऊँचे एवं सामर्थी पद पर रखने के बजाए, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के लिए पहरावा बनाने के लिए चमड़ों का उपयोग किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी लज्जा को छुपाने के लिए या उन्हें ठण्ड से बचाने के लिए इस रोएँदार कोट का उपयोग किया गया था। संक्षेप में, यह पहरावा जो मनुष्य के शरीर को ढंका करता था उसे परमेश्वर के द्वारा उसके अपने हाथों से बनाया गया था। इसे लोगों की सोच के अनुसार सरलता से विचार के माध्यम से या चमत्कारी तरीके से बनाने के बजाय, परमेश्वर ने वैधानिक तौर पर कुछ ऐसा किया जिसके विषय में मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर नहीं कर सकता था और उसे नहीं करना चाहिए। यह एक साधारण कार्य हो सकता है कि कुछ लोग यहाँ तक सोचें कि यह जिक्र करने के लायक भी नहीं है, परन्तु यह ऐसे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं लेकिन उसके विषय में पहले अस्पष्ट विचारों से भरे हुए थे, उन्‍हें उसकी विशुद्धता एवं मनोहरता में अन्तःदृष्टि प्राप्त करने, और उसके विश्वासयोग्य एवं दीन स्वभाव को देखने की गुंजायश भी देता है। यह अत्यधिक अभिमानी लोगों को, जो सोचते हैं कि वे ऊँचे एवं शक्तिशाली हैं, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता के सामने लज्जा से अपने अहंकारी सिरों को झुकाने के लिए मजबूर करता है। यहाँ, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता लोगों को यह देखने के लिए और अधिक योग्य बनाती है कि परमेश्वर कितना प्यारा है। इसके विपरीत, "असीम" परमेश्वर, "प्यारा" परमेश्वर और "सर्वशक्तिमान" परमेश्वर लोगों के हृदय में कितना छोटा, एवं नीरस है, और एक प्रहार को भी सहने में असमर्थ है। जब तुम इस वचन को देखते हो और इस कहानी को सुनते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को नीचा समझते हो क्योंकि उसने एक ऐसा कार्य किया था? शायद कुछ लोग ऐसा सोचें, लेकिन दूसरों के लिए यह पूर्णत: विपरीत होगा। वे सोचेंगे कि परमेश्वर विशुद्ध एवं प्यारा है, यह बिलकुल परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता है जो उन्हें द्रवित करती है। जितना अधिक वे परमेश्वर के वास्तविक पहलू को देखते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के प्रेम के सच्चे अस्तित्व की, अपने हृदय में परमेश्वर के महत्व की, और वह किस प्रकार हर घड़ी उनके बगल में खड़ा होता है, उसकी सराहना कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से उद्धृत

132. आरम्भ से लेकर आज के दिन तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर की सभी जीवित चीज़ों और प्राणियों में से, मनुष्य के अलावा और कोई भी परमेश्वर से बातचीत करने में समर्थ नहीं रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे सुनने में समर्थ बनाते हैं, और उसके पास आँखें हैं जो उसे देखने देती हैं, उसके पास भाषा है, अपने स्वयं के मत हैं और स्वतन्त्र इच्छा है। उसके पास वह सब कुछ है जिसकी आवश्यकता परमेश्वर को बोलता हुआ सुनने, परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए होती है, और इसलिए परमेश्वर मनुष्य को अपनी सभी इच्छाएँ प्रदान करता है, और मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके मन के मुताबिक हो तथा जो उसके साथ चल सके। जबसे परमेश्वर ने प्रबंधन करना प्रारम्भ किया, तब से वह मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है कि वह अपना हृदय उसे दे, कि वह परमेश्वर को उसे शुद्ध और सुसज्जित करने दे, उसे परमेश्वर के लिए संतोषजनक बनाने दे और उसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम करने दे, उसे परमेश्वर का आदर करवाने दे और दुष्टता से दूर करवाने दे। परमेश्वर ने हमेशा से ही इस परिणाम की आशा और प्रतीक्षा की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से उद्धृत

133. परमेश्वर मनुष्य-जाति के प्रबन्धन, और मनुष्यों को बचाने की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण के रूप में देखता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और न ही उसे अपने वचनों से करता है, और वह विशेष रूप से इन चीज़ों को यूँ ही नहीं करता है—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, एक मानक के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मनुष्यजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। वह कार्य चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, बाधाएँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने ही कमज़ोर क्यों न हों, या मनुष्य-जाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी ही गहरी क्यों न हो, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपने परिश्रमी प्रयास व्यय करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबन्धन करते हुए, परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और सभी लोगों पर और उस कार्य पर जिसे वह पूर्ण करना चाहता है शासन कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है कि परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मनुष्यजाति को बचाने और उसका प्रबन्धन करने की मुख्य परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई। जब परमेश्वर इस कार्य को कार्यान्वित कर रहा होता है, तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बिना छिपाव के मनुष्यों के सामने अपने कठिन कार्य को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को प्रदर्शित कर रहा होता है। इन चीज़ों को उस तरह से प्रकाशित और व्यक्त करते हुए जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है, वह थोड़ा-थोड़ा करके इस सब को मनुष्यजाति के सामने बिना छिपाव के प्रकाशित करता है। इसलिए, पूरे विश्व में, परमेश्वर जिन लोगों को बचाने और जिनका प्रबन्धन करने का उद्देश्य रखता है उनके अलावा, कोई भी प्राणी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग रिश्ता हो। अपने हृदय में, जिस मनुष्यजाति का वह प्रबन्धन और उद्धार करना चाहता है, वह सबसे महत्वपूर्ण है, और वह इस मनुष्यजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं त्यागता है और लगातार अथक रूप से बिना कोई शिकायत या पछतावे के अपने कार्य में लगा रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि आज नहीं तो कल मनुष्य एक न एक दिन उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, और पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उस की ओर लौट जाएँगे ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

134. जिसने बाइबल पढ़ा है वह हर कोई जानता है कि जब यीशु का जन्म हुआ था तो बहुत सी चीज़े घटित हुई थीं। उनमें से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा के द्वारा शिकार किया जाना, यहाँ तक कि उस स्थिति तक कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उस से नीचे के सभी बच्चों का भी वध किया जा रहा था। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह होकर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम अपनाया था; और मनुष्यजाति को बचाने के अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई वह भी स्पष्ट है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मनुष्यजाति के बीच किया था वे भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य को सँभालने में समर्थ था, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, ठीक है न? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मनुष्यजाति के बीच अपने नए कार्य का विकास करना आरम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ था और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई को पूरा करने के अपने कार्य को आरम्भ किया था, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से अभिभूत हो गया था क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद, वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सका था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को आरम्भ कर सका था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मनुष्यजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह निस्संदेह वह था जिसके बारे में परमेश्वर सबसे अधिक प्रसन्न था। तब से शुरू हो कर यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही प्रामाणिक था। मनुष्यजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्टि महसूस करता है, ऐसा तब होता है जब मनुष्यजाति परमेश्वर के करीब आ सकती है, और जब लोग उद्धार के निकट आ सकते हैं। परमेश्वर के लिए, यह उसके नए कार्य की शुरूआत भी है, जब उसकी प्रबन्धन योजना एक कदम आगे प्रगति करती है, और इसके अतिरिक्त, जब उसकी इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचती है। मनुष्यजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह एक महत्वपूर्ण समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए चरण को कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मनुष्यजाति के बीच इस नए कार्य और नई शुरूआत को आरम्भ और प्रस्तुत किया जाता है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण के परिणाम को पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और परिणाम को देख लेता है। ऐसा भी तब होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि महसूस कराते हैं, और उसका हृदय, वास्तव में, प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, उसने पहले से ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने में और उसे सन्तुष्टि प्रदान करने में समर्थ है, परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, वह अपनी चिन्ताओं को एक ओर रख देता है, और वह प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरम्भ करने में समर्थ है, और वह उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के अवश्य करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने अन्त को पहले से ही देख लिया होता है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न हृदय वाला है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग उसकी कल्पना कर सकते हो? क्या परमेश्वर रोयेगा? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर अपने हाथों से ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मनुष्यजाति के लिए गा सकता है, उसे अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख है, और उसकी विभिन्न भावनाओं को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है और यह अत्यधिक सामान्य चीज़ है। तुम लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए, और तुम लोगों को उसकी प्रसन्नता या उसकी किसी भी भावना को सीमित करने के लिए उससे यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, तुम लोगों को अपने स्वयं के निषेधों को परमेश्वर पर प्रक्षेपित नहीं करना चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी मनोभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के माध्यम से हमने इन दोनों बार संवाद किया है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतन्त्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस कर पाओ जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस कर पाओ जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनो—तो कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो कि क्या चीज़ परमेश्वर को प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उसे उदास करती है—जब तुम उदास महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, और तुम प्रसन्न महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और उसके साथ अब और कोई बाधा नहीं होगी। तुम मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं, और ज्ञान से परमेश्वर को अब और विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारी इस प्रकार की आकांक्षा है। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

135. जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लम्बे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन-शैलियों का अनुभव करने और उन्हें देखने के बाद, ये अनुभव उसकी दिव्य भाषा को मानवीय भाषा में रूपान्तरित करने के लिए उसकी पाठ्यपुस्तकें बन गए। निस्संदेह, ये चीज़ें जो उसने जीवन में देखी और सुनी उन्होंने भी मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव को समृद्ध किया। जब वह लोगों को कुछ सत्‍यों को समझाना, परमेश्वर की कुछ इच्छाओं को समझाना चाहता था, तो वह परमेश्वर की इच्छा और मनुष्यजाति के प्रति उस की अपेक्षाओं को बताने के लिए वह उपरोक्त के समान दृष्टान्तों का उपयोग कर सकता था। ये दृष्टान्त लोगों के जीवन से सम्बन्धित थे; और ऐसा एक भी दृष्टान्त नहीं था जो मनुष्य के जीवन से अछूता था। जब प्रभु यीशु मनुष्यजाति के साथ रहता था, वह किसानों को अपने खेतों में देखभाल करते हुए देखता था, वह जानता था कि जंगली बीज क्या है और खमीर उठना क्या है; वह समझता था कि मनुष्य छिपे हुए खजाने को पसंद करते हैं, इसलिए उसने छिपे हुए खजाने और अनमोल मोती दोनों उपमाओं का उपयोग किया; और उसने मछुआरों को बार-बार जाल फैलाते हुए देखा था; इत्यादि। प्रभु यीशु ने मनुष्यजाति के जीवन में इन गतिविधियों को देखा था; और उसने भी उस प्रकार के जीवन का अनुभव किया। वह किसी अन्य मनुष्य के समान एक साधारण व्यक्ति था, जो मनुष्यों के तीन वक्त के भोजन और दिनचर्या का अनुभव कर रहा था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत इंसान के जीवन का अनुभव किया, और उसने दूसरों की ज़िन्दगियों को भी देखा। जब उसने यह सब कुछ देखा और व्यक्तिगत रूप से इनका अनुभव किया, तो उसने जो सोचा वह इस बारे में नहीं था कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार और अधिक स्वतन्त्रता से, अधिक आराम से जीवन बिता सकता है। जब वह प्रामाणिक मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तो प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन की कठिनाई को देखा, उसने शैतान की भ्रष्टता के अधीन लोगों की कठिनाई, संताप, और उदासी को देखा, उसने देखा कि वे शैतान के अधिकार क्षेत्र में जी रहे हैं, और पाप में जी रहे हैं। जब वह व्यक्तिगत रूप से मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तब उसने यह भी अनुभव किया कि जो लोग भ्रष्टता के बीच जीवन बिता रहे थे वे कितने असहाय हैं, उसने उन लोगों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया जो पाप में जीवन बिताते थे, जो शैतान के द्वारा, दुष्टता के द्वारा लाए गए अत्याचार में खो गए थे। जब प्रभु यीशु ने इन चीज़ों को देखा, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता में देखा या अपनी मानवता में? उसकी मानवता सचमुच में अस्तित्व में थी—वह बिल्कुल जीवन्त थी—वह इस सब का अनुभव कर सकता था और देख सकता था, और निस्संदेह वह इसे अपने सार में, उसने अपनी दिव्यता में इसे देखा। अर्थात्, स्वयं मसीह, उस मनुष्य प्रभु यीशु ने इसे देखा, और जो कुछ उसने देखा उससे उसने उस कार्य के महत्व और आवश्यकता को महसूस किया जिसे उसने इस बार अपनी देह में सँभाला था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि वह उत्तरदायित्व जिसे उसे देह में लेने की आवश्यकता थी बहुत बड़ा है, और वह पीड़ा जिसका वह सामना करेगा कितनी बेरहम होगी, फिर भी जब उसने पाप में जी रही मनुष्यजाति को असहाय देखा, जब उसने उनकी ज़िन्दगियों में संताप को और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने और अधिक पीड़ा का अनुभव किया, और मनुष्यजाति को पाप से बचाने के लिए अधिकाधिक चिन्तित हो गया। चाहे उसने किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया हो या किसी भी प्रकार की पीड़ा को सहा हो, वह पाप में जी रही मनुष्यजाति को बचाने के लिए और अधिक कृतसंकल्प हो गया। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना आरम्भ कर दिया था जो उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। और वह उस कार्य को पूर्ण करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया जो उसे लेना था—मनुष्यजाति के सभी पापों को लेने के लिए, मनुष्यजाति के लिए प्रायश्चित करने के लिए ताकि वे पाप में और अधिक न जीएँ और परमेश्वर पापबलि की वजह से मनुष्य के पापों को भुलाने में समर्थ हो, और इससे उसे मनुष्यजाति को बचाने के अपने कार्य को आगे बढ़ाने कि अनुमति मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि प्रभु यीशु अपने हृदय में, अपने आप को मनुष्यजाति के प्रति अर्पित करने, अपना स्‍वयं का बलिदान करने का इच्छुक था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने, सूली पर चढ़ाए जाने का भी इच्छुक था, और वह इस कार्य को पूर्ण करने का उत्सुक था। जब उसने मनुष्यों के जीवन की दयनीय दशा को देखा, तो वह, बिना एक मिनट या क्षण की देरी के, जितना जल्दी हो सके अपने लक्ष्य को और भी अधिक पूरा करना चाहता था। जब उसे ऐसी अत्यावश्यकता महसूस हुई, तो वह यह नहीं सोच रहा था कि उसका दर्द कितना भयानक होगा, और न ही उसने अब और यह सोचा कि उसे कितना अपमान सहना होगा—उसने बस अपने हृदय में एक दृढ़-विश्वास रखाः जब तक वह अपने को अर्पित किए रहेगा, जब तक उसे पापबलि के रूप में सूली पर चढ़ा कर रखा जाएगा, परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित किया जाएगा और वह अपने नए कार्य को शुरू कर पाएगा। पाप में मनुष्यजाति की ज़िन्दगियाँ, और पाप में अस्तित्व में रहने की उसकी अवस्था पूर्णत: बदल जाएगी। उसका दृढ़-विश्वास और जो उसने करने का निर्णय लिया था वे मनुष्यजाति को बचाने से सम्बन्धित थे, और जो करने के लिए वह दृढ़-संकल्पी था वह मनुष्य को बचाने से संबंधित था, और उसके पास केवल एक उद्देश्य थाः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरूआत कर सके। यह वह था जो उस समय प्रभु यीशु के मन में था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

136. जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बन कर, मनुष्यजाति के बीच, लोगों के आसपास रह कर, क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं, और फ़लसफ़ों को देख नहीं सकता है और महसूस नहीं कर सकता है? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? क्यों वह घृणा का एहसास करता है? मनुष्यजाति के जीने के लिए क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में जड़ पकड़े हुए थे? वे किस पर आधारित थे? जीने के लिए मनुष्यजाति की पद्धतियों, नियमों इत्यादि के लिए—यह सब कुछ शैतान की तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े पर सृजित है। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सच्चाई नहीं होती है—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य, और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। परमेश्वर, जो इस सार को धारण किए हुए है और ऐसी मनुष्यजाति के बीच रहता है—वह अपने हृदय में क्या सोचता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, और यह दर्द कुछ ऐसा है जिसे कोई इंसान समझ नहीं सकता है या अनुभव नहीं कर सकता है। क्योंकि सब कुछ जिसका वह सामना करता है, मुक़ाबला करता है, जिसे सुनता, देखता, और अनुभव करता है वह सब मनुष्यजाति की भ्रष्टता, दुष्टता, और सत्य के विरुद्ध उनका विद्रोह और सत्य के प्रति प्रतिरोध है। जो कुछ मनुष्यों से आता है वह उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, क्योंकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या वह ऐसे किसी को ढूँढ़ पाता है जो उसके साथ एक सामान्य भाषा साझा करता है? ऐसा मनुष्यजाति में नहीं पाया जा सकता है। ऐसे किसी को भी नहीं पाया जा सकता है जो परमेश्वर के साथ संवाद कर सकता हो, इस प्रकार आदान प्रदान कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे वे भागते हैं और जिनकी वे लालसा करते हैं वे सभी पाप से, और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में एक कटार के समान नहीं है? इन चीज़ों का सामना करके, क्या उसे अपने हृदय में आनन्द मिल सकता है? क्या वह सान्त्वना पा सकता है? जो उसके साथ रह रहें हैं वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—तो उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता है? यह पीड़ा वास्तव में कितनी बड़ी है, और कौन इसकी परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इस की सराहना कर सकता है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा कुछ ऐसी है जिसकी सराहना करने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवता की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा करती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह की दुर्दशा पर अक्सर सहानुभूति दिखाते हैं क्योंकि बाइबल में एक छंद है जो कहता हैः "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे हृदय में ले लेते हैं और विश्वास करते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहता है। अब, तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से इसे देखते हुए, क्या मामला ऐसा ही है? परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये कठिनाईयाँ पीड़ा हैं। उसने कभी देह की पीड़ाओं के लिए अन्याय के विरूद्ध चीख पुकार नहीं की है, और उसने कभी भी अपने लिए मनुष्यों से किसी चीज़ का प्रतिफल या पुरस्कार नहीं लिया है। हालाँकि, जब वह मनुष्यजाति की हर चीज़, मनुष्यों के भ्रष्ट जीवन और दुष्टता को देखता है, और जब वह देखता है कि मनुष्यजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान की क़ैद में है और बचकर नहीं निकल सकती है, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है—तो वह इन सब पापों को सहन नहीं कर सकता है। मनुष्यजाति के बारे में उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किन्तु उसे इस सब को सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाओं को भी व्यक्त नहीं कर सकता है, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता है। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश भी नहीं करता है—उसका हृदय दिन प्रतिदिन, लगातार कई वर्षों से, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इन सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने जो कुछ दिया है उसके बदले में वह मनुष्यों से किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं करता है, किन्तु परमेश्वर के सार की वजह से, वह मनुष्यजाति की दुष्टता, भ्रष्टता, और पाप को बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकता है, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसकी देह को अनन्त पीड़ा की ओर ले जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

137. ऐसा कहा जा सकता है कि कार्यों की श्रृंखलाएँ जो प्रभु यीशु ने पुनरूत्थान के बाद कही और की वे विचारपूर्ण थीं, और वे दयालु इरादों से की गई थीं। वे दयालुता और स्नेह से भरी हुई थीं जो परमेश्वर मानवजाति के प्रति रखता है, और प्रशंसा और कुशल देखरेख से भरी हुई थीं जो उस अंतरंग सम्बन्ध के लिए थीं जिसे उसने देह में रहने के दौरान मनुष्यजाति के साथ स्थापित किया था। उससे भी अधिक, वे अतीत की ललक और अपने अनुयायियों के साथ खाने-पीने के उस जीवन की आशा से भरी हुई थीं जो उसके देह में रहने के समय के दौरान थी। इसलिए, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी महसूस करें, और न ही वह यह चाहता था कि मनुष्यजाति स्वयं को परमेश्वर से दूर रखे। इससे भी बढ़कर, वह नहीं चाहता था कि मनुष्यजाति यह महसूस करे कि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद अब और वह प्रभु नहीं है जो लोगों से बहुत अंतरंग था, कि वह मनुष्यजाति के साथ अब और नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में लौट गया है, और उस पिता के पास लौट गया है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते थे और जिस तक कभी नहीं पहुँच सकते हैं। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मनुष्यजाति के बीच पद का कोई अंतर है। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परन्तु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसके हृदय में पीड़ा होती है क्योंकि इसका मतलब है कि उनके हृदय उससे बहुत दूर है, इसका मतलब है कि उसके लिए उनके हृदयों को पाना बहुत कठिन होगा। इसलिए यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हो जाता जिसे वे छू और देख नहीं सकते, तो इसने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इसने मनुष्यजाति की ग़लत ढंग से यह देखने की ओर अगुआई की होती कि पुनरूत्थान के बाद मसीह अभिमानी, मनुष्यों से भिन्न प्रकार का, और ऐसा बन गया है, जो मनुष्य के साथ मेज पर अब और नहीं बैठ सकता था और उनके साथ नहीं खा सकता है क्योंकि मनुष्य पापी और गन्दे हैं, और कभी भी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते हैं। मनुष्यजाति की इन ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए, प्रभु यीशु ने कई चीज़ें की जिन्हें वह देह में प्रायः करता था, जैसा कि बाइबल में दर्ज है, "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" उसने उन्हें पवित्रशास्त्र भी समझाया, जैसा कि वह किया करता था। यह सब कुछ जो प्रभु यीशु ने किया उसने प्रत्येक व्यक्ति को जिसने उसे देखा था यह महसूस कराया कि प्रभु नहीं बदला है, यह कि वह अभी भी वही प्रभु यीशु है। भले ही उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, फिर भी वह पुनर्जीवित हो चुका है, और उसने मनुष्यजाति को नही छोड़ा था। वह मनुष्यों के बीच रहने के लिए लौट आया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। लोगों के सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और उसकी बातचीत बहुत परिचित लगती थी। वह तब भी सहृदयता और सोच-विचार, अनुग्रह और सहिष्णुता से उतना ही भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था जो लोगों से वैसा ही प्रेम करता था जैसा वह अपने आप से करता था, जो मनुष्यजाति को सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा कर सकता था। हमेशा की तरह, उसने लोगों के साथ खाया, उनके साथ पवित्रशास्त्र पर चर्चा की, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वह पहले के समान ही, माँस और लहू से बना था और उसे छुआ और देखा जा सकता था। इस तरह मनुष्य के पुत्र ने लोगों को उस अंतरंगता को महसूस करने, और सहज महसूस करने, और किसी खोयी हुई चीज़ को पुनः प्राप्त करने का आनंद लेने दिया, और उन्होंने भी हिम्मत और दृढ़ विश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा और उसका आदर करना आरम्भ करने में पर्याप्त रूप से सहज महसूस किया जो मनुष्यजाति को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। वे निःसंकोच रूप से प्रभु यीशु के नाम से उसका अनुग्रह, उसका आशीष प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति और आनन्द प्राप्त करने के लिए, और उससे देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना भी करने लगे, तथा प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करने लगे और दुष्टात्माओं को निकालने लगे।

जिस दौरान प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उसके द्वारा कही गई चीज़ों को पूरी तरह से सत्यापित नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, तो उनके चेलों का रवैया अपेक्षा का था; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर उसे क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों का निराश रवैया था। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों के बारे में सन्देह करने से नकारने की ओर जाना आरम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक-एक करके लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे-धीरे नकारने से संशय की ओर आने लगे थे। अपने पुनरूत्थान के बाद जिस समय प्रभु यीशु ने अपने पंजर में थोमा से उसका हाथ डलवाया, जिस समय प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खायी, और उसके बाद उनके सामने भुनी हुई मछली खायी, केवल तभी उन्होंने सचमुच में उस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ही देह में मसीह है। तुम लोग ऐसा कह सकते हो कि यह ऐसा था मानो कि तब माँस और रक्त वाला यह आध्यात्मिक शरीर उन लोगों के सामने खड़ा हुआ उन्हें किसी स्वप्न से जगा रहा थाः मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था वही एक था जो अतिप्रचीन समय से अस्तित्व में था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डियाँ थीं, और वह पहले से ही मनुष्यजाति के साथ लम्बे समय तक रह और खा चुका था...। इस समय, लोगों ने महसूस किया कि उसका अस्तित्व बहुत यथार्थ, और बहुत अद्भुत था; वे भी बहुत आनन्दित और प्रसन्न थे, और साथ ही मनोभाव से भी भरे थे। और उसके पुनः-प्रकटन ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, और उसकी चाहत, और मनुष्यजाति के प्रति उसकी अनुरक्ति को महसूस करने दिया। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह महसूस कराया मानो कि एक पूरा जीवन काल गुज़र चुका हो। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और संवेदनशून्य हृदय को आराम मिला। वे अब और सन्देहपूर्ण या निराश नहीं थे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र पूरी अनन्तता तक उनके पीछे रहेगा, वह उनका दृढ़ दुर्ग, और हमेशा के लिए उनका आश्रय होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मनुष्यजाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटन से लोगों को बताया कि वह भले ही किसी भी रूप में अस्तित्व में क्यों न हो, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह, वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें उसे देखने और छूने देगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि वे कभी पुनः असहाय महसूस न करें। प्रभु यीशु यह भी चाहता था कि लोग यह जानें: इस संसार में उनके जीवन अकेले नहीं हैं। मनुष्यजाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आश्रित हो सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आश्रित होने के साथ, मनुष्यजाति अब और एकाकी या असहाय नहीं होगी, और जो उसे अपनी पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे अब और पाप में बँधे नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया बहुत छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस तरह से मैं उन्हें देखता हूँ, हर एक छोटी सी चीज़ भी बहुत अर्थपूर्ण थी, और बहुत मूल्यवान थी, और वे सभी बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली थीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

138. परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक हद तक भ्रष्टता एवं अनाज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने न तो इसे समझा न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक, वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आख़िरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना प्रेमयोग्य है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए, या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही हैं? नहीं! बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से उद्धृत

139. परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं—और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसीलिए, चाहे यह बाइबल हो या कोई अन्य पुस्तक, हम परमेश्वर को कभी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं, और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को यह वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है, या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे वह मानवजाति को अपने प्रति आभारी बनाए या उससे अपनी स्तुति कराए। यहाँ तक कि जब उसे क़़ष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिन्ता को कभी नहीं भूलता है, वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरन्तर मानवजाति को प्रदान करता है जैसा वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अक्सर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, फिर भी इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर के द्वारा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर, किसी भी अच्छे कार्य के लिए जिसे वह मानवजाति के लिए करता है, कभी ऐसा इरादा नहीं करता है कि उसे धन्यवाद से बदल दिया जाए या उसका मूल्य वापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसको ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं, और ऐसे लोग जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ये ऐसे लोग हैं जो प्रायः परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसे आशीष प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी आशीष जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं वे अक्सर उनकी कल्पना से परे होती हैं, और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होती हैं जिसे मानव उससे बदल सकते हैं जो उन्होंने किया है या उस कीमत से बदल सकते हैं जिसे उन्होंने चुकाया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से उद्धृत

140. मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति के द्वारा निर्धारित होता है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और ठीक जैसे लोग भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही इन प्रदर्शनों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि वह कोई कठपुतली नहीं है, और न ही वह खाली हवा है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानना मनुष्यजाति के लिए एक नेक खोज है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानने के द्वारा लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा-थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगोगे, तो तुम्हें नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने को अंजाम देना कोई कठिन कार्य है। इससे अधिक, जब तुम परमेश्वर को समझते हो, तो उसके बारे में निष्कर्षों को बनाने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है। जब तुम परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को बनाना बन्द कर देते हो, तो उसे अपमानित करने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है, और अनजाने में परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके बारे में ज्ञान को पाओ, और इसके द्वारा तुम अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानोगे। तुम उन मतों, पत्रों, एवं सिद्धान्तों का उपयोग करके परमेश्वर को परिभाषित करना बन्द करोगे जिनमें तुमने महारत हासिल की है। बल्कि, सभी चीज़ों में सदैव परमेश्वर के इरादों को खोजने के द्वारा, तुम अनजाने में ही ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार है।

परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के द्वारा अदृष्ट और अस्पर्शनीय है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, हर एक व्यक्ति के कार्यकलाप, साथ में उसके प्रति उनकी प्रवृत्ति—परमेश्वर के द्वारा मात्र महसूस नहीं किए जाते हैं, बल्कि ये दृष्टिगोचर भी हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर किसी को पहचानना चाहिए और इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। हो सकता है कि तुम स्वयं से हमेशा पूछते रहते हो: "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं ठीक इस समय किस बारे में विचार कर रहा हूँ? हो सकता है कि वह जानता हो, हो सकता है कि वह नहीं जानता हो"। यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करना और उसमें विश्वास करना मगर उसके कार्य और उसके अस्तित्व पर सन्देह करना, तो देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करोगे, क्योंकि तुम पहले से ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान के किनारे पर डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, परन्तु उन्होंने अभी तक सत्य की वास्तविकता को प्राप्त नहीं किया है, और ना ही वे परमेश्वर की इच्छा को भी समझते हैं। केवल अत्यंत छिछले मतों के मुताबिक चलते हुए, उनके जीवन और कद-काठी में कोई प्रगति नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने स्वयं के जीवन के रूप में नहीं लिया है, और उन्होंने कभी भी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार नहीं किया है। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को देख कर आनन्द से भर जाता है? क्या वे उसे आराम पहुँचाते हैं? उस स्थिति में, यह परमेश्वर में विश्वास करने की लोगों की विधि है जो उनका भाग्य तय करती है। चाहे यह इस बारे में प्रश्न हो कि तुम किस प्रकार परमेश्वर की खोज करते हो या तुम परमेश्वर से किस प्रकार व्यवहार करते हो, यह तुम्हारी स्वयं की प्रवृत्ति है जो सबसे महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की ऐसे उपेक्षा मत करो मानो कि वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा हो। अपने विश्वास के परमेश्वर के बारे में हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, हर एक छोटे वचन और हर एक छोटे से कर्म को देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंतर्तम सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने हैं, और परमेश्वर के द्वारा देखे जा रहे हैं। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कर्मों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं उन लोगों को कुछ परामर्श देना चाहूँगा जो अपने आपको छोटे शिशु के समान परमेश्वर के हाथों में देना चाहेंगे, मानो उसे तुम से लाड़-प्यार करना चाहिए, मानो कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, मानो तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है: सपने देखना छोड़ो! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है। वह मनुष्यजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य में ईमानदारी से बढ़ता है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाले या बिगाड़ने वाले प्रकार का प्रेम नहीं है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने के लिए, दया करने के लिए, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी करुणा और सहिष्णुता ऐसी चीज़ें हैं जिनकी ज़िन्दा बचे रहने के लिए मनुष्यजाति को आवश्यकता है। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में अस्तित्व में है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिल्कुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। इसलिए तुम्हें इस पर बिल्कुल स्पष्ट हो जाना चाहिए, और यह समझ जाना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, और उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर, और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। हो सकता है कि तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मुद्दा है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को करना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण का बिल्कुल विपरीत सही होता है, और यह कि परमेश्वर का प्रयास करने और उसे मापने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करके, तुम पहले ही उसे क्रोधित कर देते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर उस तरह संचालन नहीं करता है जैसा तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह से व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुँच में सावधान एवं बुद्धिमान रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करें—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ अवश्य विकसित करनी चाहिए; तुम्हारे साथ इसका संवाद करने के लिए तुम्हें प्रबुद्ध लोगों को अवश्य खोजना चाहिए, और ईमानदारी से खोजना चाहिए। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में मत देखो—मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर पहुँचना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसके वह योग्य है। परमेश्वर द्वारा उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो चाहे वह तुम्हें करुणा, या सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना क्यों न प्रदान करता हो, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू को परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करने दो। एक मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से उद्धृत

141. भाग्य पर विश्वास करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान का कोई विकल्‍प नहीं है

इतने वर्षों तक परमेश्वर का अनुयायी रहने के पश्चात्, क्या भाग्य के बारे में तुम लोगों के ज्ञान और संसारिक लोगों के ज्ञान के बीच कोई सारभूत अन्तर है? क्या तुम लोग सचमुच में सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण को समझ गए हो, और सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जान गए हो? कुछ लोगों में इस वाक्यांश "यह भाग्य है" की गहन, एवं गहराई से महसूस की जाने वाली समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, यह विश्वास नहीं करते हैं कि मनुष्य के भाग्य को परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है, और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो ऐसे हैं जो महासागर में इधर-उधर बहते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ तैरते रहते हैं, निष्क्रियता से इंतज़ार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के आलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे अपनी स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं, फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन नहीं जी सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन होने के समान नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना इस तथ्य और इस बाहरी घटना की पहचान मात्र है, जो इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य को शासित करता है, और इस बात को पहचानने से भिन्न है कि सभी चीज़ों के भाग्य के ऊपर प्रभुत्व का सृजनकर्ता ही स्रोत है, और उससे बढ़कर मानवजाति के भाग्य के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से भिन्न है। यदि कोई व्यक्ति केवल भाग्य पर ही विश्वास करता है—यहाँ तक कि इसके बारे में गहराई से महसूस करता है—किन्तु फलस्वरूप मानवजाति के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने, पहचानने, उसके प्रति समर्पण करने, और उसे स्वीकार करने में समर्थ नहीं है, तो उसका जीवन तब भी एक त्रासदी, व्यर्थ में बिताया गया जीवन, खालीपन होगा; वह तब भी सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन होने, उस वाक्यांश के सच्चे अर्थ के रूप में एक सृजित किया गया मानव प्राणी बनने, और सृजनकर्ता के अनुमोदन का आनन्द उठाने में असमर्थ होगा या होगी। जो व्यक्ति सचमुच में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक सक्रिय अवस्था में होना चाहिए, न कि निष्क्रिय या असहाय अवस्था में। जबकि साथ ही यह स्वीकार करके कि सभी चीज़ें भाग्य के द्वारा तय हैं, उसे जीवन और भाग्य के बारे में एक सटीक परिभाषा को धारण करना चाहिए: कि प्रत्येक जीवन सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा के हर एक चरण का स्मरण करता है, तो वह देखता है कि हर एक कदम पर, चाहे उसका मार्ग कठिन रहा था या सरल रहा हो, परमेश्वर उसके पथ का मार्गदर्शन कर रहा था, और उसकी योजना बना रहा था। ये परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएँ थी, और उसकी सतर्क योजना थी, जिन्होंने आज तक, अनजाने में, व्यक्ति की अगुवाई की है। सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसके उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ होना—कितना बड़ा सौभाग्य है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति निष्क्रिय है, तो इससे साबित होता है कि वह हर एक चीज़ का विरोध कर रहा है या कर रही है जो परमेश्वर ने उसके लिए व्यवस्थित की है, और यह कि उसकी विनम्र प्रवृत्ति नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति सक्रिय है, तो जब वह अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता है, जब सचमुच में परमेश्वर की संप्रभुता उसकी समझ में आने लगती है, तो वह और भी अधिक ईमानदारी से हर उस चीज़ के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य का आयोजन करने देने, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह रोकने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास होगा। क्योंकि वह देखता है कि जब वह भाग्य को नहीं बूझता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता है, जब वह जानबूझकर अँधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता और डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन, और बहुत ही मर्मभेदी होती है। इसलिए जब लोग मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो चतुर मनुष्य, स्वयं के तरीके से भाग्य के विरुद्ध लगातार संघर्ष करने और जीवन के अपने तथाकथित लक्ष्यों की खोज करने के बजाय, इसे जानना और स्वीकार करना, उन दर्द भरे दिनों को अलविदा कहना चुनते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छे जीवन का निर्माण करने का प्रयास किया था। जब किसी व्यक्ति का कोई परमेश्वर नहीं होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं देख सकता है, तो हर एक दिन निरर्थक, बेकार, और दयनीय है। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके जीवन जीने का अर्थ और उसके लक्ष्यों की खोज उसके लिए अंतहीन मर्मभेदी दुःख और असहनीय पीड़ा के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आती है, कुछ इस तरह कि वह पीछे मुड़कर देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करेगा, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेगा, और सच्चे मानव जीवन की खोज करेगा, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी मर्मभेदी दुःख और पीड़ा से छूटकर आज़ाद होगा, और जीवन के सम्पूर्ण खालीपन से छुटकारा पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

142. केवल वे लोग ही सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं जो सृजनकर्ता की संप्रभुता के प्रति समर्पण करते हैं

क्योंकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं पहचानते हैं, इसलिए वे हमेशा ढिठाई से, विद्रोही प्रवृत्ति के साथ भाग्य का सामना करते हैं, और हमेशा परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता तथा उन चीज़ों को त्याग देना चाहते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखी हैं, तथा अपनी वर्तमान परिस्थितियों के बदलने और अपने भाग्य के पलटने की व्यर्थ की आशा करते हैं। परन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं; वे हर मोड़ पर नाकाम रहते हैं। यह संघर्ष, जो किसी व्यक्ति की आत्मा की गहराई में होता है, पीड़ादायी है; यह पीड़ा अविस्मरणीय है; और पूरे समय वह अपने जीवन को गवाँता रहता है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है, या इसलिए है क्योंकि उस व्यक्ति ने भाग्यहीन जन्म लिया था? स्पष्ट रूप से दोनों में कोई भी सही नहीं है। वास्तव में, यह उन मार्गों के कारण है जिन्हें लोग अपनाते हैं, ऐसे मार्ग जिन्हें लोग अपनी ज़िन्दगियों को जीने के लिए चुनते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीज़ों का एहसास नहीं किया हो। किन्तु जब तुम सचमुच में जान जाते हो, जब तुम्हें सचमुच में एहसास हो जाता है कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सचमुच समझ जाते हो कि वह हर चीज़ जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए योजना बनाई और जो तुम्हारे लिए निश्चित की है वह बहुत लाभकारी है, और वह एक बहुत बड़ी सुरक्षा है, तो तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी पीड़ा धीरे-धीरे कम हो जाती है, और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व शांत, स्वतंत्र, एवं बन्धन मुक्त हो जाता है। अधिकांश लोगों की स्थितियों का आकलन करने पर, यद्यपि व्यक्तिपरक स्तर पर वे उसी तरह से जीवन जीते रहना नहीं चाहते हैं जैसा वे पहले जीते थे, यद्यपि वे अपनी पीड़ा से राहत चाहते हैं, फिर भी वस्तुनिष्ठ रूप से वे मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को नहीं समझ सकते हैं; वे सृजनकर्ता की संप्रभुता को वास्तव में समझ नहीं सकते है और उसके अधीन नहीं हो सकते हैं। और वे यह तो बिलकुल भी नहीं जान सकते हैं कि सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। इसलिए यदि लोग सचमुच में इस तथ्य को पहचान नहीं सकते हैं कि सृजनकर्ता की मनुष्य के भाग्य और मनुष्य की सभी स्थितियों के ऊपर संप्रभुता है, यदि वे सचमुच में सृजनकर्ता के प्रभुत्व के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, तो उनके लिए इस अवधारणा द्वारा विवश न किया जाना, और न रोका जाना कठिन होगा कि "किसी का भाग्य उसके अपने हाथों में होता है," उनके लिए भाग्य और सृजनकर्ता के अधिकार के विरुद्ध अपने प्रचण्ड संघर्ष की पीड़ा से छुटकारा पाना कठिन होगा, और कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके लिए सच में बन्धनमुक्त और स्वतन्त्र होना, और ऐसे लोग बनना भी कठिन होगा जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। अपने आपको इस स्थिति से स्वतन्त्र करने का एक सबसे आसान तरीका हैः जीवन जीने के अपने पुराने तरीके को विदा करना, जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना, अपनी पुरानी जीवनशैली, जीवन-दर्शन, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आदर्शों को सारांशित करना और उनका विश्लेषण करना, और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा और माँग के साथ उनकी तुलना करना, और देखना कि उनमें से कोई परमेश्वर की इच्छा और माँग के अनुकूल है या नहीं, उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है या नहीं, सत्य की महान समझ की ओर उसकी अगुवाई करता है या नहीं, और उसे मानवता और मनुष्य की सदृशता के साथ जीवन जीने देता है या नहीं। जब तुम जीवन के उन विभिन्न लक्ष्यों की, जिनकी लोग खोज करते हैं और जीवन जीने के उनके अनेक अलग-अलग तरीकों की बार-बार जाँच-पड़ताल करोगे और सावधानीपूर्वक उनका विश्लेषण करोगे, तो तुम यह पाओगे कि इनमें से एक भी सृजनकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जब उसने मानवजाति का सृजन किया था। वे सभी, लोगों को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करते हैं; ये सभी ऐसे गड्ढे हैं जिनमें मानवजाति गिरती है, और जो उन्हें नरक की ओर लेकर जाते हैं। तुम्हारे इसे पहचान जाने के पश्चात्, तुम्हारा कार्य है कि जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ दो, अनेक फंदों से दूर रहो, परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का प्रभार लेने दो और तुम्हारे लिए व्यवस्था करने दो, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का प्रयास करो, कोई विकल्प मत रखो, और एक ऐसे इंसान बनो जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसकी पीड़ा को सहन कर सकते हैं, परन्तु दूसरे सहन नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अनुपालन करने के इच्छुक होते हैं, परन्तु कुछ लोग अनिच्छुक होते हैं। जो लोग अनिच्छुक हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा और दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में स्पष्ट रूप से अवगत हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर है जो मनुष्य के भाग्य की योजना बनाता है और उसकी व्यवस्था करता है, और तब भी वे पैर मारते हैं और संघर्ष करते हैं, तब भी अपने भाग्य को परमेश्वर की हथेली में रखने और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होने के लिए सहमत नहीं हैं, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं से नाराज़ होते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो स्वयं देखना चाहते हैं कि वे क्या करने में सक्षम हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं, या अपनी स्वयं की सामर्थ्य के अधीन खुशियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, यह देखना चाहते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं या नहीं। मनुष्य की उदासी यह नहीं है कि मनुष्य सुखी जीवन की खोज करता है, यह नहीं है कि वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज करता है या धुंध के बीच अपने स्वयं के भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करता है, परन्तु यह है कि सृजनकर्ता के अस्तित्व को देखने के पश्चात्, इस तथ्य को जानने के पश्चात् कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता है, वह अभी भी अपने मार्ग को सुधार नहीं सकता है, अपने पैरों को दलदल से बाहर नहीं निकाल सकता है, बल्कि अपने हृदय को कठोर बना देता है और अपनी ग़लतियों को निरन्तर करता रहता है। बल्कि वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारता रहता है, और बिना किसी लेशमात्र पछतावे के, सृजनकर्ता की संप्रभुता के विरोध में ढिठाई से निरन्तर स्पर्धा करता रहता है, और कड़वे अंत तक इसका विरोध करता रहता है, और जब वह टूट कर बिखर जाता है और उसका रक्त बहने लगता है केवल तभी वह आखिरकार छोड़ने और पीछे हटने का निर्णय लेता है। यह असली मानवीय दुःख है। इसलिए मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, और जो बच निकलने का चुनाव करते हैं वे महामूर्ख हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

143. प्रसिद्धि और सौभाग्य की तलाश में बिताया गया जीवन मृत्यु का सामना होने पर व्यक्ति को घबराहट में डाल देगा

सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके द्वारा पूर्वनिर्धारण के कारण, एक एकाकी आत्मा जिसने अपने नाम पर शून्य से आरम्भ किया था वह माता-पिता और परिवार प्राप्त करती है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का अवसर प्राप्त करती है, मानव जीवन का अनुभव करने और दुनिया को देखने का अवसर प्राप्त करती है; और यह सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने, सृजनकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जानने, और सबसे बढ़कर, सृजनकर्ता के अधिकार को जानने और उसके अधीन होने का अवसर भी प्राप्त करती है। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ और क्षणभंगुर अवसर को नहीं पकड़ते हैं। कोई व्यक्ति भाग्य के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को खत्म कर देता है, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए और धन-सम्पत्ति और हैसियत के बीच इधर-उधर भागते हुए अपना सारा समय बिता देता है। जिन चीज़ों को लोग सँजो कर रखते हैं वे परिवार, पैसा और प्रसिद्धि हैं; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपने भाग्य के बारे में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि यह जाँचना और समझना बहुत अनिवार्य है: मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है। अपने सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वे तब तक सिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए दौड़-भाग करते हैं जब तक कि उनकी युवावस्था भाग नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते हैं और उनकी त्वचा में झुर्रियाँ नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे यह देख नहीं लेते हैं कि प्रसिद्धि व सौभाय किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते हैं, यह कि धन हृदय के खालीपन को नहीं भर सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी और मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि कोई भी उससे बच कर नहीं भाग सकता है जो कुछ नियति ने भण्डार में रखा हैं। जब वे जीवन के अंतिम मोड़ का सामना करने के लिए बाध्य होते हैं केवल तभी उनकी सचमुच समझ में आता है कि चाहे कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाए, भले ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त हो जाए और वह ऊँचे पद पर हो, कोई भी मृत्यु से बच कर नहीं भाग सकता है, हर एक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा: एक एकाकी आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है। जब किसी व्यक्ति के पास माता-पिता होते हैं, तो वह विश्वास करता है कि उसके माता-पिता ही सब कुछ हैं; जब किसी व्यक्ति के पास सम्पत्ति होती है, तो वह सोचता है कि पैसा ही उसका मुख्य आधार है, यही उसके जीवन की सम्पत्ति है; जब लोगों के पास हैसियत होती है, तो वे उससे कस कर चिपक जाते हैं और इसके वास्ते अपने जीवन को जोखिम में डाल देते हैं। जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने ही वाले होते हैं केवल तभी वे यह एहसास करते हैं कि जिन चीज़ों की खोज करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे क्षणभंगुर बादल के अलावा कुछ नहीं हैं, उनमें से किसी को भी वे थामे नहीं रह सकते हैं, उनमें से किसी को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी उन्हें मृत्यु से छूट नहीं दे सकता है, उनमें से कोई भी उस एकाकी आत्मा की वापसी यात्रा में उसका साथ या उसे सांत्वना नहीं दे सकता है; और उनमें से कोई भी किसी व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकता है, मृत्यु से पार जाने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दे सकता है। प्रसिद्धि और सौभाग्य जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में अर्जित करता है, उसे अस्थायी संतुष्टि, थोड़े समय का आनन्द, चैन का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं, और उसे उसके मार्ग से भटका देते हैं। और इसलिए लोग, जब, शान्ति, आराम, और हृदय की निश्चलता की लालसा करते हुए, मानवजाति के इस विशाल समुद्र में हाथ पैर मारते हैं, तो वे बार-बार लहरों के नीचे समा जाते हैं। लोगों ने अब तक सबसे महत्‍वपूर्ण प्रश्नों जैसे—वे कहाँ से आते हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि—का पता भी नहीं लगाया होता है कि वे प्रसिद्धि और सौभाग्य के द्वारा फुसला लिए जाते हैं, गुमराह हो जाते हैं, उनके द्वारा नियन्त्रित हो जाते हैं, हमेशा के लिए खो जाते हैं। समय उड़ जाता हैः पलक झपकते ही वर्षों बीत जाते हैं, इससे पहले कि कोई इसका एहसास करे, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब कोई व्यक्ति जल्दी ही संसार से जाने वाला होता है, तो वह धीरे-धीरे इस एहसास की ओर पहुँचता है कि संसार की हर चीज़ दूर हो रही है, यह कि वह उन चीज़ों को थामे नहीं रह सकता है जो उसके अधिकार में थी; केवल तभी वह महसूस करता है कि अब वाकई उससे पास कुछ भी नहीं है, ठीक अभी-अभी इस संसार में आये एक क्रन्दन करते हुए शिशु के समान महसूस करता है। इस मुकाम पर, व्यक्ति इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है कि उसने जीवन में क्या किया है, जीवित रहने का मूल्य क्या है, इसका अर्थ क्या है, वह इस संसार में क्यों आया; इस मुकाम पर, वह और भी अधिक जानना चाहता है कि वास्तव में दूसरा जीवन है या नहीं, स्वर्ग का वास्तव में अस्तित्व है या नहीं, वास्तव में गुनाहों की सज़ा है या नहीं...। व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस बारे में है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, उतना ही अधिक उसका हृदय खाली महसूस होता है; व्यक्ति मृत्यु के जितना अधिक नज़दीक आता है, वह उतना ही अधिक असहाय महसूस करता है; और इस प्रकार मृत्यु के बारे में उसका भय दिन प्रति दिन बढ़ता जाता है। जब मनुष्य मृत्यु के नज़दीक पहुँचते हैं तो उनका इस तरह से व्यवहार करने के दो कारण हैं: पहला, वे अपनी प्रसिद्धि और सम्पत्ति को खोने ही वाले होते हैं जिन पर उनका जीवन आधारित था, वे इस संसार में दृश्यमान हर चीज़ को पीछे छोड़ने ही वाले होते हैं; और दूसरा, वे नितान्त अकेले एक अनजाने संसार, एक रहस्मयी, अज्ञात राज्य का सामना करने ही वाले होते हैं जहाँ वे कदम रखने से भयभीत होते हैं, जहाँ उनके पास कोई प्रियजन नहीं है और किसी प्रकार का सहारा नहीं है। इन दो कारणों से, मृत्यु का सामना करने वाला हर एक व्यक्ति बेचैनी महसूस करता है, अत्यंत भय और लाचारी के एहसास का अनुभव करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं जाना था। जब लोग वास्तव में इस मुकाम पर पहुँचते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि, जब कोई इस पृथ्वी पर कदम रखता है, तो पहली बात जो उन्हें अवश्य समझनी चाहिए, वह है कि मानव कहाँ से आता है, लोग जीवित क्यों हैं, कौन मनुष्य के भाग्य का निर्धारण करता है, कौन मानव के अस्तित्व को भरण-पोषण करता है और किसके पास उसके अस्तित्व के ऊपर संप्रभुता है। ये जीवन की वास्तविक सम्पत्तियाँ हैं, मानव के जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक आधार हैं, न कि यह सीखना कि किस प्रकार अपने परिवार का भरण-पोषण करें या किस प्रकार प्रसिद्धि और धन-सम्पत्ति प्राप्त करें, किस प्रकार भीड़ से अलग दिखें या किस प्रकार और अधिक समृद्ध जीवन बिताएँ, और यह तो बिलकुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे बढ़ें और उनके विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करें। यद्यपि जीवित बचे रहने के जिन विभिन्न कौशलों पर महारत हासिल करने के लिए लोग अपना जीवन खर्च करते हैं वे भरपूर भौतिक आराम दे सकते हैं, फिर भी वे किसी मनुष्य के हृदय में सच्ची शान्ति और सांत्वना नहीं ला सकते हैं, बल्कि इसके बदले वे लोगों को निरन्तर उनकी दिशा से भटका देते हैं, उन्हें अपने आप पर नियन्त्रण रखने में कठिनाई होती है, वे जीवन का अर्थ सीखने के हर अवसर को खो देते हैं; और वे इस बारे में परेशानी का एक अंतर्प्रवाह पैदा करते हैं कि किस प्रकार ठीक ढंग से मृत्यु का सामना करें। इस तरह से, लोगों की ज़िन्दगियाँ बर्बाद हो जाती हैं। सृजनकर्ता सभी के साथ निष्पक्ष ढंग से व्यवहार करता है, सभी को उसकी संप्रभुता का अनुभव करने और उसे जानने का जीवन भर का अवसर प्रदान करता है, फिर भी, जब मृत्यु नज़दीक आती है, जब मौत का साया उसके ऊपर छा जाता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना आरम्भ करता है—और तब बहुत देर हो जाती है।

लोग धन-दौलत और प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियाँ बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते रहते हैं कि केवल ये ही उनका सहारा हैं, मानों कि उन्हें प्राप्त करके वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, मृत्यु के सामने वे कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से चकनाचूर हो जाते हैं, वे कितने एकाकी और असहाय हैं, और कहीं नहीं भाग सकते हैं। उनकी समझ में आता है कि जीवन को धन-दौलत और प्रसिद्धि से नहीं खरीदा जा सकता है, कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो, उसका पद कितना ही ऊँचा क्यों न हो, मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल और महत्वहीन होते हैं। उनकी समझ में आता है कि धन-दौलत से जीवन को नहीं खरीदा जा सकता है, प्रसिद्धि मृत्यु को नहीं मिटा सकती है, यह कि न तो धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है। लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे जीवित रहने की लालसा करते हैं; लोग जितना अधिक इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के पास आने से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर उनकी वास्तव में समझ में आता है कि उनका जीवन उनसे सम्बन्धित नहीं है, उनके नियन्त्रण में नहीं है, और यह कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा इस पर किसी का वश नहीं है, कि यह सब उसके नियन्त्रण से बाहर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

144. सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

जिस क्षण किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब अकेली आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन का अपना अनुभव और सृजनकर्ता के अधिकार का अपना अनुभव आरम्भ करती है जिसे सृजनकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि, यह उस व्यक्ति, उस आत्मा के लिए सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान अर्जित करने का, और उसके अधिकार को जानने का और इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का सर्वोत्तम अवसर है। लोग सृजनकर्ता के द्वारा उनके लिए लागू किए गए भाग्य के नियमों के अधीन अपना जीवन जीते हैं जिसे, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर उनके कई दशकों के जीवन के दौरान उसके अधिकार को जानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए, कई दशकों के दौरान अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, यह पहचानना कि सभी मनुष्यों के भाग्य पूर्वनियत होते हैं, और यह समझना या इस बात का सार निकालना कि जीवित रहने का अर्थ क्या है, बहुत आसान होना चाहिए। साथ ही जब कोई व्यक्ति जीवन के इन सीखों को ग्रहण करता है, तो धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगता है कि जीवन कहाँ से आता है, यह समझने लगता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, मनुष्य के जीवन का ध्येय और लक्ष्य क्या होना चाहिए; और धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगेगा कि यदि वह सृजनकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करेगा—जब कोई आत्मा एक बार फिर से सृजनकर्ता का सामना करने ही वाली होगी—तब उसका हृदय असीमित भय और बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों तक अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आता है, अभी तक उसकी समझ में नहीं आया है कि किसकी हथेली में मनुष्य का भाग्य रहता है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने में समर्थ नहीं होगा या होगी। जिस व्यक्ति ने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृजनकर्ता की संप्रभुता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ और मूल्य की सही समझ है; ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृजनकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव और सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, ऐसा व्यक्ति है जो सृजनकर्ता के अधिकार के प्रति समर्पण कर सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति के सृजन के अर्थ को समझता है, समझता है कि मनुष्य को सृजनकर्ता की आराधना करनी चाहिए, कि जो कुछ भी मनुष्य के पास है वह सृजनकर्ता से आता है और वह निकट भविष्य में ही किसी दिन उसके पास लौट जाएगा; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृजनकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और मनुष्य की मृत्यु पर उसकी संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृजनकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं। इसलिए, जब किसी व्यक्ति की समझ में सचमुच ये बाते आ जाती हैं, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक एक ओर करने, और बाद में जो कुछ भी होता है उसको खुशी से स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पित होने, और सृजनकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम मोड़ का स्वागत करने में समर्थ हो जाएगा, बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे ख़ौफ़ खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजित किए गए प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के और अपने ध्येय को पूरा करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के बारे में सही दृष्टिकोण होगा, और वह सृजनकर्ता के आशीष वाला और मार्गदर्शित जीवन बिताएगा, वह सृजनकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कर्मों और उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि, ऐसे व्यक्ति को सृजनकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा और स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत प्रवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम मोड़ का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम मोड़ को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सहज अंत तक पहुँचाने के बाद, जीवन में अपने ध्येय को पूरा करने के बाद, वह सृजनकर्ता के पास लौट गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

145. केवल सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके ही कोई व्यक्ति उसकी ओर लौट सकता है

जब किसी को सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं का स्पष्ट ज्ञान और अनुभव नहीं होगा, तो भाग्य और मृत्यु के बारे में उसका ज्ञान आवश्यक रूप से असंगत होगा। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि यह सब परमेश्वर की हथेली में होता है, यह एहसास नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर उनके ऊपर नियन्त्रण और संप्रभुता रखता है, यह नहीं पहचान सकते हैं कि मनुष्य ऐसी संप्रभुता को दूर नहीं फेंक सकता है या उससे बच नहीं सकता है; और इसलिए मृत्यु का सामना करते समय उनके अंतिम शब्दों, चिंताओं एवं पछतावों का कोई अन्त नहीं होता है। वे अत्यधिक बोझ, अत्यधिक अनिच्छा, अत्यधिक भ्रम, से दबे हुए होते हैं, और इन सब के कारण उन्हें मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उनका जन्म ज़रूरी है और उसकी मृत्यु अनिवार्य है, और कोई भी इस प्रवाह से परे नहीं हो सकता है। यदि कोई इस संसार से पीड़ा रहित प्रस्थान करना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम मोड़ का बिना किसी अनिच्छा या चिंता के सामना करने में समर्थ होना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि कोई पछतावा न छोड़ें। और बिना किसी पछतावे के प्रस्थान करने का एकमात्र मार्ग है सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना है, और उनके प्रति समर्पण करना। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों से, दुष्टताओं से, और शैतान के बन्धन से दूर रह सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा निर्देशित और आशीष-प्राप्त जीवन जी सकता है, ऐसा जीवन जो स्वतंत्र और मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य और अर्थ हो, ऐसा जीवन जो सत्यनिष्ठ और खुले हृदय का हो; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति समर्पण कर सकता है; अय्यूब के समान, सृजनकर्ता के द्वारा परीक्षा लिए जाने और वंचित किए जाने के लिए, सृजनकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अपने जीवन भर सृजनकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी प्रशंसा अर्जित कर सकता है, जैसा कि अय्यूब ने किया था, और उसकी आवाज़ को सुन सकता है, और उसे प्रकट होते हुए देख सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, बिना किसी पीड़ा, चिंता और पछतावे के जी और मर सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति, अय्यूब के समान, प्रकाश में जीवन बिता सकता है, प्रकाश में अपने जीवन के हर मोड़ से होकर गुज़र सकता है, अपनी यात्रा को प्रकाश में सरलता से पूरा कर सकता है, और अपने ध्येय को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकता है—एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव कर, सीख कर, और जान कर—और प्रकाश में गमन कर सकता है, और उसके पश्चात् एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में हमेशा सृजनकर्ता की तरफ़ खड़ा हो सकता है, और उसकी सराहना पा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

146. मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, यद्यपि यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति पहलेपहल सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करता है वहाँ से लेकर उस समय तक जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने में समर्थ हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो जाता है, यदि कोई वास्तव में उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को प्राप्त करने का अवसर होता है। और प्रायः, लोग अपनी इच्छाओं और आशीषों को पाने की अपनी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा बहक जाते हैं; वे नहीं पहचान सकते हैं कि मानव जीवन का सार कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व को नहीं समझते हैं, और इसलिए उन्हें मानव जीवन का अनुभव करने और सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने का यह मूल्यवान अवसर अच्छा नहीं लगता है, और वे य‍ह एहसास नहीं करते हैं कि एक सृजित किए गए प्राणी के लिए सृजनकर्ता का व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। इसलिए मैं कहता हूँ, कि जो लोग जो चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितना जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत की व्यवस्था करे, ताकि वे तुरन्त ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख सकें और शीघ्र ही धन्य हो सकें, वे बदतरीन प्रकार की अवज्ञा और चरण मूर्खता के दोषी हैं। और जो लोग अपने सीमित समय के दौरान सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने के इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा करते हैं, वे ही बुद्धिमान लोग हैं, और वे ही प्रतिभाशाली लोग हैं। ये दो अलग-अलग इच्छाएँ दो अत्यंत भिन्न दृष्टिकोणों और खोजों को उजागर करती हैं: जो लोग आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी और नीच हैं; वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई विचार नहीं करते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने की कभी खोज नहीं करते हैं, उसके प्रति समर्पण करने की कभी इच्छा नहीं करते हैं, और जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसा ही जीवन बिताना चाहते हैं। वे लापरवाह चरित्रहीन लोग हैं; वे ऐसी श्रेणी हैं जिन्हें नष्ट किया जाएगा। जो लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं को दरकिनार करने में समर्थ हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हैं; वे इस प्रकार के लोग होने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति विनम्र हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं। ऐेसे लोग प्रकाश में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच जीवन जीते हैं; निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। जो भी हो, मानव पसंद बेकार है, मनुष्य का इस बात पर कोई वश नहीं है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यह अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर की करुणा पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पण कर दें। यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, तो तुम क्या कर सकते हो? क्या परमेश्वर को नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसकी करुणा पर नहीं छोड़ते हो, यदि तुम प्रभारी होने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और एकमात्र तुम ही हो जो अंत में नुकसान उठाओगे। यदि लोग यथाशीघ्र परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने में, उसके अधिकार को जानने में, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उसे समझने में शीघ्रता करेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी, केवल तभी वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएँगे, केवल तभी वे उद्धार प्राप्त करेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

147. परमेश्वर को अपने अद्वितीय स्वामी के रूप में स्वीकार करना उद्धार हासिल करने का पहला कदम है

परमेश्वर के अधिकार के बारे में सच्चाईयाँ ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गम्भीरता से लेना चाहिए, अवश्य अपने हृदय से अनुभव करना और समझना चाहिए; क्योंकि ये सच्चाईयाँ हर व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित हैं, हर व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं, उन महत्वपूर्ण मोड़ों से सम्बन्धित हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य गुज़रना है, और परमेश्वर की संप्रभुता और उस प्रवृत्ति से सम्बन्धित हैं जिनके साथ उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति की आख़िरी मंज़िल से सम्बन्धित हैं। इसलिए उन्हें जानने और समझने के लिए जीवन भर की ऊर्जा लगती है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को गम्भीरता से लोगे, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करोगे, तब धीरे-धीरे एहसास करने लगोगे और समझने लगोगे कि परमेश्वर का अधिकार सचमुच अस्तित्व में है। किन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं समझते हो, उसकी संप्रभुता को कभी स्वीकार नहीं करते हो, तब तुम कितने ही वर्ष क्यों न जीवित रहो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता का थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे। यदि तुम सचमुच में परमेश्वर के अधिकार को जानते और समझते नहीं हो, तो जब तुम मार्ग के अंत में पहुँचोगे, तो भले ही तुमने दशकों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारे पास अपने जीवन में दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में तुम्हारा ज्ञान अनिवार्य रूप से शून्य होगा। क्या यह बहुत ही दुःखदायी बात नहीं है? इसलिए तुम जीवन में चाहे कितनी ही दूर तक क्यों न चले हो, अब तुम चाहे कितने ही वृद्ध क्यों न हो गए हो, तुम्हारी शेष यात्रा चाहे कितनी ही लम्बी क्यों न हो, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को पहचानना होगा और इसे गम्भीरतापूर्वक लेना होगा, और इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय स्वामी है। मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की इन सच्चाईयों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है, मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है, परमेश्वर को जानने हेतु जीवन तथा बुनियादी सबक है जिसका सभी हर दिन सामना करते हैं, और जिससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई एक इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र स्वामी है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपने स्वयं के भाग्य पर हुक्म चलाना असंभव है, और उससे परे होना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, आयोजित, व्यवस्थित, नियन्त्रित, या परिवर्तित तो बिलकुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के लिए सभी चीज़ों पर हुक्म चलाता है, क्योंकि केवल वही अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य के ऊपर संप्रभुता रखता है; और इसलिए केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय स्वामी है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति के ऊपर, बल्कि सृजित नहीं किए गए प्राणियों, जिन्हें कोई मनुष्य देख नहीं सकता है, के ऊपर भी संप्रभुता रखता है, तारों के ऊपर, और ब्रह्माण्ड के ऊपर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद तथ्य है, ऐसा तथ्य जो वास्तव में अस्तित्व में है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यदि चीज़ें जैसी हैं उससे तुम में से कोई एक अभी भी असंतुष्ट हैं, यह विश्वास करता है कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचता है कि तुम भाग्यशाली हो सकते हो और अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उनसे बच निकल सकते हो; यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का, और इसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देने, और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और सौभाग्य अर्जित करने का प्रयास करते हो; तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि तुम अपने लिए जीवन के हालातों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल समस्याओं को ही माँग रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! एक दिन, देर-सवेर, तुम यह जान जाओगे कि तुमने ग़लत चुनाव किया था, यह कि तुम्हारी कोशिशें व्यर्थ थी। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ, भाग्य से लड़ने की तुम्हारी इच्छाएँ, और तुम्हारा स्वयं का कट्टर स्वभाव, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम एक कड़वी कीमत चुकाओगे। हालाँकि, अभी तुम्हें परिणाम की भयंकरता नहीं दिखाई देती है, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और उसकी सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का स्वामी है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ और इसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे महसूस करने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य से प्रेम करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनाते हो। और स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी भी महसूस नहीं किया है, परमेश्वर के अधिकार को तो बिलकुल नहीं पहचाते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और उस पसंद के कारण जो तुमने की है, तुम सर्वथा मूल्यहीन हो जाओगे, निःसन्देह परमेश्वर की घृणा और तिरस्कार की वस्तु हो जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसकी परीक्षाओं को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक समझ को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृजनकर्ता की प्रजा बन गए होंगे। केवल इस प्रकार के लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जान लिया है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है, मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य की उनकी समझ और उसके प्रति उनका समर्पण वास्तविक और परिशुद्ध है। जब वे मृत्यु का सामना करेंगे, तो वे अय्यूब के समान, ऐसा मन रखने में समर्थ होंगे जो मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होता है, किसी व्यक्तिगत पसंद के बिना, किसी व्यक्तिगत इच्छा के बिना, सभी चीज़ों में परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ होंगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक सृजित किए गए सच्चे मनुष्य के रूप सृजनकर्ता की तरफ़ लौटने में समर्थ होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

148. परमेश्वर और मनुष्यजाति के बीच में सबसे बड़ा अन्तर है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है और सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है। परमेश्वर प्रत्येक चीज़ का स्रोत है, और मनुष्यजाति सभी चीज़ों का आनन्द लेती है जबकि परमेश्वर उनकी आपूर्ति करता है। अर्थात्, मनुष्य तब सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है जब वह उस जीवन को स्वीकार कर लेता है जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों को प्रदान करता है। मनुष्यजाति परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों के सृजन के परिणामों का आनन्द उठाती है, जबकि परमेश्वर स्वामी है। तो सभी चीज़ों के दृष्टिकोण से, परमेश्वर और मनुष्यजाति के बीच क्या अन्तर है? परमेश्वर सभी चीज़ों के विकास के तरीके को साफ-साफ देख सकता है, और सभी चीज़ों के विकास के तरीके को नियन्त्रित करता है और उस पर वर्चस्व रखता है। अर्थात्, सभी चीज़ें परमेश्वर की दृष्टि में हैं और उसके निरीक्षण के दायरे के भीतर हैं। क्या मनुष्यजाति सभी चीज़ों को देख सकती है? मनुष्यजाति जो देखती है वह सीमित है, ये केवल वही हैं जिन्हें वे अपनी आँखों के सामने देखते हैं। यदि तुम इस पर्वत पर चढ़ते हो, तो जो तुम देखते हो वह यह पर्वत है। पर्वत के उस पार क्या है तुम उसे नहीं देख सकते हो। यदि तुम समुद्र तट पर जाते हो, तो तुम महासागर के इस भाग को देखते हो, परन्तु तुम नहीं जानते हो कि महासागर का दूसरा भाग किसके समान है। यदि तुम इस जंगल में आते हो, तो तुम उन पेड़ पौधों को देख सकते हो जो तुम्हारी आँखों के सामने और तुम्हारे चारों ओर हैं, किन्तु जो कुछ और आगे है उसे तुम नहीं देख सकते हो। मनुष्य उन स्थानों को नहीं देख सकते हैं जो अधिक ऊँचे, अधिक दूर और अधिक गहरे हैं। वे उस सब को ही देख सकते हैं जो उनकी आँखों के सामने हैं और उनकी दृष्टि के भीतर है। भले ही मनुष्य एक वर्ष की चार ऋतुओं के तरीके और सभी चीज़ों के विकास के तरीके को जानते हों, फिर भी वे सभी चीज़ों को प्रबंधित करने या उन पर वर्चस्व रखने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर, जिस तरह से परमेश्वर सभी चीज़ों को देखता है वह ऐसा है जैसे परमेश्वर किसी मशीन को देखता है जिसे उसने व्यक्तिगत रूप से बनाया है। वह हर एक अवयव को बहुत ही अच्छी तरह से जानेगा। इसके सिद्धांत क्या हैं, इसके तरीके क्या हैं, और इसका उद्देश्य क्या है—परमेश्वर इन सभी चीज़ों को सीधे-सीधे और स्पष्टता से जानता है। इसलिए परमेश्वर परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य है! भले ही मनुष्य विज्ञान और सभी चीज़ों के नियमों पर अनुसन्धान करता रहे, फिर भी यह एक सीमित दायरे में होता है, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है। मनुष्य के लिए, यह असीमित है। यदि मनुष्य किसी छोटी सी चीज़ पर अनुसन्धान करते हैं जिसे परमेश्वर ने किया था, तो वे उस पर अनुसन्धान करते हुए बिना किसी सच्चे परिणाम को हासिल किए अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं। इसीलिए यदि ज्ञान का और परमेश्वर का अध्ययन करने के लिए जो कुछ भी तुमने सीखा है उसका उपयोग करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर को जानने या समझने में समर्थ नहीं होगे। किन्तु यदि तुम सत्य को खोजने और परमेश्वर को खोजने के मार्ग का उपयोग करते हो, और परमेश्वर को जानने के दृष्टिकोण से परमेश्वर की ओर देखते हो, तो एक दिन तुम स्वीकार करोगे कि परमेश्वर के कार्य और उसकी बुद्धि हर जगह है, और तुम यह भी जान जाओगे कि बस क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत कहा जाता है। तुम्हारे पास जितना अधिक ऐसा ज्ञान होगा, तुम उतना ही अधिक समझोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी कहा जाता है। सभी चीज़ें और प्रत्येक चीज़, जिसमें तुम भी शामिल हो, निरन्तर परमेश्वर की आपूर्ति के नियमित प्रवाह को प्राप्त कर रही हैं। तुम भी स्पष्ट रूप से आभास करने में समर्थ हो जाओगे कि इस संसार में, और इस मनुष्यजाति के बीच, परमेश्वर के पृथक और कोई नहीं है जिसके पास सभी चीज़ों के ऊपर शासन करने, उनका प्रबन्धन करने, और उन्हें अस्तित्व में बनाए रखने की ऐसी सामर्थ्य और ऐसा सार हो सकता है। जब तुम ऐसी समझ प्राप्त कर लोगे, तब तुम सच में स्वीकार करोगे कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है। जब तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तब तुमने सचमुच में परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और तुमने उसे अपना परमेश्वर एवं अपना स्वामी बनने दिया है। जब तुम्हारे पास ऐसी समझ होगी और तुम्हारा जीवन ऐसी स्थिति पर पहुँच जाएगा, तो परमेश्वर अब और तुम्हारी परीक्षा नहीं लेगा और तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, और न ही वह तुमसे कोई माँग करेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को समझते हो, उसके हृदय को जानते हो, और तुमने परमेश्वर को सच में अपने हृदय में स्वीकार कर लिया है। सभी चीज़ों पर परमेश्वर के वर्चस्व और प्रबंधन के बारे में इन विषयों पर बातचीत करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है। यह लोगों को और अधिक ज्ञान एवं समझ देने के लिए है; मात्र तुमसे स्वीकार करवाने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें परमेश्वर के कार्यकलापों का और अधिक व्यावहारिक ज्ञान एवं समझ देने के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII" से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

ठोस रंग

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

स्क्रॉल की दिशा

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

गति

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन