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अभ्यास (1)

अभ्यास (1)

पहले, लोग जिस तरीके से अनुभव करते थे, उसमें बहुत सारे भटकाव और बेतुकापन था। उन्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों की समझ थी ही नहीं, इसलिए ऐसे बहुत से क्षेत्र थे जिनमें लोगों के अनुभव उलट-पलट हो जाते थे। परमेश्वर इंसान से यह अपेक्षा करता है कि वह सामान्य मानवीयता को जिए। मिसाल के तौर पर, लोगों का खाने-कपड़ों के मामलों में आधुनिक रीति-रिवाजों को अपनाना, सूट या टाई पहनना, आधुनिक कला के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल कर लेना और खाली समय में कला, संस्कृति और मनोरंजन का आनंद लेना, ठीक है। वे कुछ यादगार तस्वीरें खींच सकते हैं, पढ़कर कुछ उपयोगी ज्ञान हासिल कर सकते हैं और अपेक्षाकृत अच्छे परिवेश में रह सकते हैं। ये सारी ऐसी बातें हैं जो सामान्य मानवीयता के अनुकूल हैं, फिर भी लोग इन्हें परमेश्वर द्वारा घृणा की जाने वाली चीज़ों के रूप में देखते हैं और वे इन कामों को करने से स्वयं को दूर रखते हैं। उनके अभ्यास में मात्र नियमों का पालन करना शामिल होता है, जिसके कारण उनका जीवन निहायत ही नीरस और एकदम निरर्थक हो जाता है। दरअसल, परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा कि लोग इस तरह से कार्य करें। लोग स्वयं ही अपने स्वभावों को कम करना चाहते हैं, परमेश्वर के अधिक निकट आने के लिए निरंतर अपनी आत्माओं में प्रार्थना करते रहते हैं, उनके मन में लगातार उधेड़-बुन चलती रहती है कि परमेश्वर क्या चाहता है, उनकी आँखें सतत किसी न किसी बात पर टिकी रहती हैं, इस भयानक डर में कि किसी कारण से परमेश्वर से उनका संबंध-विच्छेद हो जाएगा। ये तमाम निष्कर्ष लोगों ने अपने आप ही निकाल लिए हैं; लोगों ने स्वयं ही ये नियम अपने लिए तय कर लिए हैं। अगर तुम खुद ही अपनी प्रकृति और सार के बारे में नहीं जानते और इस बात को नहीं समझते कि तुम्हारे अभ्यास का स्तर कहाँ तक पहुँच सकता है, तो तुम्हारे पास इस बात के लिए निश्चित होने का कोई रास्ता नहीं होगा कि परमेश्वर को इंसान से किन मानकों की अपेक्षा है और न ही तुम्हारे पास अभ्यास का कोई सटीक मार्ग होगा। चूँकि तुम्हें इस बात की समझ ही नहीं है कि वास्तव में परमेश्वर को इंसान से क्या अपेक्षा है, तो तुम्हारा मन हमेशा मंथन करता रहता है, तुम परमेश्वर के इरादों का विश्लेषण करने में अपना दिमाग खपाते रहते हो और अनाड़ीपन से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित और प्रबुद्ध किए जाने की राह ढूँढते हो। नतीजतन, तुम अभ्यास के कुछ ऐसे मार्ग विकसित कर लेते हो जिन्हें तुम उपयुक्त मानते हो। तुम्हें इस बात का पता ही नहीं कि परमेश्वर को इंसान से वास्तव में क्या अपेक्षाएँ हैं; तुम प्रसन्नतापूर्वक बस अपने तय किए हुए अभ्यासों को ही करते रहते हो, परिणाम की परवाह नहीं करते और इस बात की तो बिल्कुल भी चिंता नहीं करते कि तुम्हारे अभ्यास में कोई भटकाव या त्रुटियाँ तो नहीं हैं। इस तरह, तुम्हारे अभ्यास में स्वाभाविक तौर पर सटीकता की कमी होती है और वह सिद्धांतहीन होता है। विशेष रूप से उसमें उचित मानवीय विवेक और अंतरात्मा का अभाव होता है, साथ ही उसमें परमेश्वर की सराहना और पवित्र आत्मा की परिपुष्टि की कमी होती है। अपने ही बनाए रास्ते पर चलने में बहुत ज़्यादा आसानी होती है। इस तरह का अभ्यास महज़ नियमों का अनुसरण करना है या स्वयं को प्रतिबंधित और नियंत्रित करने के लिए जानबूझकर अधिक भार उठाना है। फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम्हारा अभ्यास एकदम सही और सटीक है, इस बात से अनजान कि तुम्हारे अभ्यास का अधिकतर हिस्सा अनावश्यक प्रक्रियाओं और अनुपालनों से बना है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो मूलत: अपने स्वभावों में बिना कोई बदलाव लाए, बिना किसी नयी समझ के, बिना नए प्रवेश के, बरसों तक इसी तरह से अभ्यास करते हैं। वे अनजाने में वही गलती बार-बार करके अपनी पाशविक प्रकृतियों को खुली छूट देते हैं, ऐसा इस हद तक करते हैं जहाँ बहुत बार वे अविवेकी, अमानवीय कृत्य कर बैठते हैं और इस प्रकार व्यवहार करते हैं कि लोग अपना सिर खुजलाते और हक्के-बक्के रह जाते हैं। क्या ऐसे लोगों के बारे कहा जा सकता है कि उन्होंने स्वभावगत बदलाव का अनुभव कर लिया है?

अब, परमेश्वर में आस्था ने परमेश्वर के वचन के युग में प्रवेश कर लिया है। तुलनात्मक रूप से कहा जाए तो, लोग आज उतनी प्रार्थना नहीं करते जितनी पहले कभी किया करते थे; परमेश्वर के वचनों ने स्पष्ट रूप से सत्य के हर पहलू और अभ्यास के हर तरीके को साफ तौर पर बता दिया है, इसलिए अब लोगों को खोजने या अंधेरे में भटकने की आवश्यकता नहीं है। राज्य के युग के जीवन में, परमेश्वर के वचन लोगों को आगे का मार्ग दिखाते हैं। यह एक ऐसा जीवन है जिसमें लोगों को समझने के लिए हर बात को स्पष्ट कर दिया गया है—क्योंकि परमेश्वर ने हर बात का साफ तौर पर प्रदर्शित कर दिया है, और इंसान को टटोलते हुए जीवन में बढ़ने के लिए छोड़ नहीं दिया है। फिर चाहे विवाह, सांसारिक मामले, जीवन, आहार, कपड़े, आश्रय, पारस्परिक संबंध, हों या फिर यह कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए किस प्रकार से सेवा की जाए, देह-सुख का त्याग कैसे किया जाए वगैरह। ऐसी कौन-सी बात है जिसे परमेश्वर ने तुम लोगों के सामने स्पष्ट न किया हो? क्या अभी भी प्रार्थना और खोज करने की आवश्यकता है? वाकई कोई आवश्यकता नहीं है! लेकिन अगर तुम अभी भी ये काम करते हो, तो तुम निरर्थक कार्य कर रहे हो। यह अज्ञानता और मूर्खता है और एकदम अनावश्यक है! वही लोग लगातार बेवकूफी की प्रार्थनाएँ करते हैं जिनमें क्षमता की कमी है और जो परमेश्वर के वचनों को समझने के योग्य नहीं हैं। सत्य का अभ्यास करने के लिए मुख्य बात यह है कि तुममें निश्चय है या नहीं। कुछ लोग यह जानने के बावजूद कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, अपने क्रिया-कलापों में देह-सुख की प्राथमिकताओं का ही अनुसरण करते हैं। इससे जीवन में उनकी प्रगति रुक जाती है, प्रार्थना और खोज करने पर भी वे देह-सुख के आगे ही झुके रहना चाहते हैं। ऐसा करके, क्या वे जान-बूझकर पाप नहीं कर रहे हैं? उन लोगों की तरह जो देख-सुख के आनंद की अभिलाषा करते हैं, धन चाहते हैं और फिर परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं : "हे परमेश्वर! क्या तू मुझे देह-सुख के आनंद और धन-दौलत की अभिलाषा करने देगा? क्या यह मेरे लिए तेरी इच्छा है कि मैं इस तरीके से पैसा कमाऊँ?" क्या यह प्रार्थना करने का सही तरीका है? ऐसा करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि परमेश्वर को इन सब चीज़ों में कोई खुशी नहीं मिलती, उन्हें यह सब छोड़ देना चाहिए, लेकिन जिन चीज़ों को वे अपने दिलों में पकड़े बैठे हैं, वे पहले ही तय की जा चुकी हैं। जब वे प्रार्थना और खोज करते हैं तो वे परमेश्वर को इस बात के लिए विवश करने का प्रयास करते हैं कि वह उन्हें इस तरह से बर्ताव करने की अनुमति दे, अपने दिल में, वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर इसकी परिपुष्टि के लिए कुछ कहे—इसी को विद्रोहशीलता कहते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो कलीसिया के भाई-बहनों को अपने पक्ष में करके अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लेते हैं। तुम अच्छी तरह से जानते हो कि इस तरह की कारगुज़ारियाँ परमेश्वर के विरुद्ध हैं, लेकिन अगर एक बार तुम इस तरह का कुछ करने का निश्चय कर लेते हो, तो तुम शांत होकर, विचलित हुए बिना, परमेश्वर से प्रार्थना और खोज करने में लगे रहते हो। तुम कितने बेशर्म और निर्लज्ज हो! जहाँ तक सांसारिक चीज़ों के त्याग की बात है, उसके बारे में बहुत पहले ही बोल दिया गया है। कुछ लोग ऐसे हैं जो जानते हैं कि परमेश्वर को सांसारिक चीज़ों से घृणा है, लेकिन वे फिर भी प्रार्थना करके कहते हैं : "हे परमेश्वर! मैं जानता हूँ कि तू नहीं चाहता कि मैं सांसारिक चीज़ों के पीछे भागूँ, लेकिन मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ ताकि तेरा नाम कलंकित न हो; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ ताकि सांसारिक लोग तेरी महिमा मुझमें देख सकें।" यह किस तरह की प्रार्थना है? क्या तुम लोग बता सकते हो? यह परमेश्वर को मजबूर करने और उस पर दबाव डालने की नियत से की गयी प्रार्थना है। क्या इस तरह से प्रार्थना करने पर तुम्हें शर्म नहीं आती? इस तरह की प्रार्थना करने वाले लोग जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं। इस तरह की प्रार्थना पूरी तरह से संदेहास्पद मंशा का मामला है। यह वाकई शैतानी स्वभाव का प्रकटन है। परमेश्वर के वचन शीशे की तरह साफ हैं, विशेषकर वे वचन जो उसकी इच्छा, उसके स्वभाव और इस बारे में व्यक्त किए गए हैं कि वह अलग-अलग प्रकार के लोगों के साथ किस तरह व्यवहार करता है। अगर तुम सत्य नहीं समझते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़ने चाहिए—ऐसा करने के परिणाम आँखें मूँदकर प्रार्थना और खोज करने से कहीं बेहतर होते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ प्रार्थना और खोज करने के स्थान पर परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ा जाना चाहिए और सत्य पर संवाद किया जाना चाहिए। अपनी नियमित प्रार्थना में, तुम्हें परमेश्वर के वचनों पर चिंतन और उनमें अपने आपको जानने का प्रयास करना चाहिए। यह जीवन में तुम्हारी प्रगति के लिए अधिक लाभदायक है। अब, अगर तुम अभी भी स्वर्ग की ओर अपनी आँखें उठाकर खोजते हो, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम अभी भी अज्ञात परमेश्वर में विश्वास रखते हो? पहले, तुमने अपनी प्रार्थना और खोज करने के परिणाम देख लिए और पवित्र आत्मा ने तुम्हारी आत्मा को थोड़ा-बहुत प्रेरित किया क्योंकि वह अनुग्रह के युग का समय था। तुम परमेश्वर को नहीं देख पाए, इसलिए तुम्हारे पास अपने रास्ते को महसूस करके आगे बढ़ने और इस तरह खोजने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अब परमेश्वर लोगों के बीच आ चुका है, वचन देह में प्रकट हो चुका है और तुम परमेश्वर को देख चुके हो; इस तरह पवित्र आत्मा पहले की तरह कार्य नहीं करता। युग बदल चुका है और पवित्र आत्मा का कार्य करने का तरीका भी बदल चुका है। हालाँकि लोग शायद अब पहले जितनी प्रार्थना न करें, क्योंकि परमेश्वर धरती पर है, इंसान के पास परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर है। इंसान परमेश्वर से प्रेम करने के युग में प्रवेश कर चुका है और वह सही ढंग से स्वयं में परमेश्वर से निकटता प्राप्त कर सकता है : "हे परमेश्वर! तू सचमुच बहुत अच्छा है और मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ! " बस केवल कुछ स्पष्ट और सरल शब्द लोगों के दिलों में परमेश्वर के लिए प्रेम को वाणी देते हैं; यह प्रार्थना इंसान और परमेश्वर के बीच प्रेम को और अधिक गहरा करने के लिए की जाती है। हो सकता है कई बार तुम स्वयं को कुछ विद्रोहशीलता का इज़हार करते हुए देखो और कहो : "हे परमेश्वर! मैं इतना भ्रष्ट क्यों हूँ?" कई बार तुम्हारी प्रबल इच्छा होती है कि तुम स्वयं को मारो और तुम्हारी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। ऐसे समय में, तुम्हें दिल में पछतावा और बेचैनी महसूस होती है, लेकिन इन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तुम्हारे पास कोई तरीका नहीं होता। यह पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य है, लेकिन जीवन का अनुसरण करने वाले ही इसे प्राप्त कर सकते हैं। तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर को तुमसे बहुत अधिक प्रेम है और तुम्हारे अंदर एक विशेष प्रकार की भावना होती है। भले ही तुम्हारे पास स्पष्ट तौर पर प्रार्थना करने के लिए शब्द नहीं होते, लेकिन तुम्हें हमेशा लगता है कि परमेश्वर का प्रेम महासागर जितना गहरा है। इस अवस्था में होने की अनुभूति को व्यक्त करने के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं हैं, और यह एक ऐसी अवस्था है जो आत्मा के अंदर अक्सर पैदा होती है। इस प्रकार की प्रार्थना और सहभागिता जिसका लक्ष्य इंसान को उसके दिल में परमेश्वर के करीब लाना है, सामान्य और सही है।

भले ही जब लोगों को टटोलकर ढूँढना पड़ता था, वो अब बीते ज़माने की बात हो चुकी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें अब और प्रार्थना करने और खोजने की ज़रूरत नहीं है, न ही बात यह है कि लोगों को कार्य करने से पूर्व परमेश्वर की इच्छा के प्रकट होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है; ये सिर्फ इंसान की भ्रांत धारणाएँ हैं। परमेश्वर इंसानों के बीच रहने, उनकी रोशनी, उनका जीवन और उनका मार्ग बनने के लिए आया है : यह एक तथ्य है। बेशक, परमेश्वर धरती पर अपने आगमन में, यकीनन इंसान के लिए व्यवहारिक मार्ग और जीवन लाया है जो इंसान के आनंद की खातिर उसके आध्यात्मिक कद के उपयुक्त है—वह इंसान के अभ्यास के सारे मार्गों को तोड़ने के लिए नहीं आया है। इंसान अब भटकते और खोजते हुए नहीं जीता क्योंकि इन चीज़ों का स्थान कार्य करने और अपने वचन बोलने के लिए धरती पर परमेश्वर के आगमन ने ले लिया है। वह इंसान को उस अंधेरे और गुमनामी के जीवन से मुक्त कराने के लिए आया है जो वह जी रहा है ताकि इंसान रोशनी से भरा जीवन जी पाए। वर्तमान कार्य चीज़ों की ओर स्पष्ट संकेत करने, साफ तौर पर बोलने, प्रत्यक्ष रूप से जानकारी देने और चीज़ों को स्पष्टत: परिभाषित करने के लिए है ताकि लोग इन बातों को अमल में ला सकें, जैसे यहोवा परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों को यह कहते हुए राह दिखायी थी कि किस प्रकार बलि अर्पित करें और मंदिर का निर्माण करें। इसलिए, तुम लोगों को ईमानदारी से खोज करने का ऐसा जीवन जीने की आवश्यकता नहीं है जैसा प्रभु यीशु के जाने के बाद तुमने जिया था। क्या तुम्हें भविष्य में सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के कार्य के दौरान अपने मार्ग को ढूँढ़ना चाहिए? क्या तुम लोगों को जीने की खातिर अनाड़ीपन से उपयुक्त मार्ग की तलाश का प्रयास करना चाहिए? क्या तुम लोगों को अपना कर्तव्य निभाने की समझ हासिल करने के लिए अनिवार्यत: अंधेरे में भटकना चाहिए? यह जानने के लिए कि गवाही कैसे दी जाए, क्या यह आवश्यक है कि तुम लोग दंडवत करो, खोजो? यह जानने के लिए कि तुम लोगों को कपड़े कैसे पहनने चाहिए या कैसे जीना चाहिए, क्या यह आवश्यक है कि तुम लोग उपवास और प्रार्थना करो? यह जानने के लिए कि तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा जीते जाने को कैसे स्वीकार करना चाहिए, क्या यह आवश्यक है कि तुम लोगों को स्वर्ग के परमेश्वर से निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए? यह जानने के लिए कि तुम लोगों को परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे करना चाहिए, क्या यह आवश्यक है कि तुम लोग लगातार दिन-रात प्रार्थना करो? तुम लोगों में से ऐसे बहुत से लोग हैं जो यह कहते हैं कि वे अभ्यास नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें समझ नहीं है। लोग आज के समय में परमेश्वर के कार्य पर ध्यान नहीं दे रहे! मैं पहले बहुत सारे वचन बोल चुका हूँ, लेकिन तुम लोगों ने उन्हें पढ़ने पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तुम लोगों को पता ही नहीं कि अभ्यास कैसे करना है। बेशक, आज के युग में पवित्र आत्मा अभी लोगों को प्रेरित करता है कि वे आनंदित महसूस करें और वह इंसान के साथ रहता है। तुम्हारे जीवन में अक्सर होने वाली उन[क] विशेष, आनंददायक भावनाओं का स्रोत यही है। कभी-कभार कोई दिन आता है जब तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर बहुत ही मनोहर है और तुम अपने आपको उसकी प्रार्थना करने से रोक नहीं पाते : "हे परमेश्वर! तेरा प्रेम बहुत ही सुंदर और तेरी छवि बहुत ही महान है। मैं चाहता हूँ कि मैं तुझे और गहराई से प्रेम करूँ। मैं अपने समग्र जीवन को खपा देने के लिए स्वयं को पूर्णत: अर्पित कर देना चाहता हूँ। अगर यह तेरे लिए है, अगर मैं तुझे प्रेम कर पाऊँ, तो मैं अपना सर्वस्व तुझे समर्पित कर दूँगा...." यह सुख की एक भावना है जो तुम्हें पवित्र आत्मा ने दी है। यह न तो प्रबोधन है, न ही प्रकाशन है; यह प्रेरित होने का अनुभव है। कभी न कभी इस तरह के अनुभव होते रहेंगे : कभी-कभी जब तुम काम पर जा रहे होते हो, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके करीब आ जाते हो, और तुम इस हद तक प्रेरित हो जाते हो कि तुम्हारी आँखों में आँसू आ जाते हैं, अपने आप पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं रहता और तुम एक ऐसे उपयुक्त स्थान की तलाश के लिए बेचैन हो जाते हो जहाँ तुम अपने दिल की तीव्र भावनाओं को व्यक्त कर सको....कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि तुम किसी सार्वजनिक स्थान पर हो और महसूस करो कि तुम्हें परमेश्वर का प्रेम बहुत अधिक मिलता है, तुम्हें लगे कि तुम्हारी स्थिति मामूली नहीं है, यहाँ तक कि तुम दूसरों से अधिक सार्थक जीवन जी रहे हो। तुम्हें गहराई से महसूस होगा कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्कर्ष किया है और यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का महान प्रेम है। अपने दिल के किसी गहनतम कोने में तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के अंदर इस प्रकार का प्रेम है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता और जिसकी थाह नहीं पायी जा सकती, मानो तुम जानते तो हो मगर तुम उसका वर्णन नहीं कर सकते, यह तुम्हें सोचने के लिए हमेशा एक विराम देता है लेकिन तुम बिल्कुल भी व्यक्त नहीं कर पाते हो। कभी-कभी ऐसे समय में, तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम कहाँ हो और पुकार उठोगे : "हे परमेश्वर! तू कितना अथाह और मनोहर है!" इससे लोग उलझन में पड़ जाएंगे, लेकिन ये तमाम चीज़ें अक्सर होती हैं। तुमने ऐसी बातों का अनुभव किया है। आज पवित्र आत्मा ने तुम्हें यह जीवन प्रदान किया है और अब तुम्हें यही जीवन जीना चाहिए। यह तुम्हें जीवन जीने से रोकने के लिए नहीं है, बल्कि जिस तरह का जीवन तुमने जिया है उसे बदलने के लिए है। इस तरह की भावना का न तो वर्णन किया जा सकता है, न ही उसे व्यक्त किया जा सकता है। यह इंसान की सच्ची भावना भी है, यहाँ तक कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है। तुम इस बात को अपने दिल में तो समझ सकते हो लेकिन किसी दूसरे के सामने इसे साफ तौर पर व्यक्त करने का तुम्हारे पास कोई भी तरीका नहीं है। इसकी वजह यह नहीं है कि तुम धीमा बोलते हो या तुम हकलाते हो, बल्कि यह है कि इस तरह की भावना को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। आज तुम इन चीज़ों का आनंद ले सकते हो और तुम्हें इसी तरह का जीवन जीना चाहिए। बेशक, तुम्हारे जीवन के अन्य पहलू भी खाली नहीं हैं; बात केवल इतनी-सी है कि प्रेरित होने का यह अनुभव तुम्हारे जीवन में एक प्रकार का आनंद बन जाता है जो हमेशा तुम्हारे अंदर इच्छा पैदा करता है कि तुम पवित्र आत्मा के इन अनुभवों का आनंद लो। लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि इस तरह से प्रेरित होना इसलिए नहीं है कि तुम देह से परे तीसरे स्वर्ग में चले जाओ या पूरी दुनिया में भ्रमण करो। बल्कि इसलिए है कि तुम परमेश्वर के उस प्रेम को महसूस और अनुभव कर सकोजिसका आज तुम आनंद ले रहे हो, परमेश्वर के आज के कार्य के महत्व का अनुभव कर सको, और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा से स्वयं को फिर से परिचित करा सको। ये सारी चीज़ें इसलिए हैं ताकि परमेश्वर आज जो कार्य कर रहा है, तुम उसका और अधिक ज्ञान अर्जित कर सको—इस कार्य को करने का परमेश्वर का यही लक्ष्य है।

परमेश्वर के देहधारण से पहले खोजना और टटोलना ही जीवन का तरीका था। उस समय लोग परमेश्वर को देख नहीं पाते थे और इसलिए उनके पास खोजने और टटोलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। आज तुमने परमेश्वर को देख लिया है और वह सीधे तुमसे कहता है कि किस तरह तुम्हें अभ्यास करना चाहिए; इसलिए तुम्हें टटोलने और खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह इंसान को जिस मार्ग पर ले जाता है वह सत्य का मार्ग है, वह इंसान को जो बातें बताता है और इंसान जिन बातों को ग्रहण करता है वह जीवन और सत्य है। तुम्हारे पास मार्ग, जीवन और सत्य है, तो हर जगह पर खोजने की क्या आवश्यकता है? पवित्र आत्मा दो चरणों का कार्य एक-साथ नहीं करेगा। मेरे वचन बोलना बंद कर देने के बाद, अगर लोग परमेश्वर के वचनों को ध्यान से खाते-पीते नहीं हैं और सही ढंग से सत्य का पालन नहीं करते हैं, वे अभी भी अनुग्रह के युग की तरह ही काम करते हैं, अंधों की तरह टटोलते हैं, निरंतर प्रार्थना करते और खोजते हैं, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं होगा कि इस चरण का मेरा कार्य—वचनों का कार्य—व्यर्थ में किया जा रहा है? हालाँकि मेरा बोलना समाप्त हो चुका है, लेकिन लोग अभी भी पूरी तरह समझे नहीं हैं, क्योंकि उनमें क्षमता की कमी है। इस समस्या का समाधान कलीसियाई जीवन जीने और एक-दूसरे से संवाद करके किया जा सकता है। पहले, अनुग्रह के युग में, हालाँकि परमेश्वर ने देहधारण किया था, लेकिन उसने वचनों का कार्य नहीं किया था, इसलिए उस समय पवित्र आत्मा ने कार्य को बनाए रखने के लिए उस तरह से काम किया था। उस समय मुख्यत: पवित्र आत्मा ने कार्य किया था, लेकिन अब देहधारी परमेश्वर स्वयं इसे कर रहा है, उसने पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान ले लिया है। पहले, जब तक लोग प्रार्थना करते रहते थे, वे शांति और आनंद का अनुभव करते थे; उस समय फटकार और अनुशासन था। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य था। अब ये स्थितियाँ कभी-कभार ही उत्पन्न होती हैं। पवित्र आत्मा किसी भी युग में एक ही प्रकार का कार्य कर सकता है। अगर वह एक-साथ दो प्रकार के कार्य करता, लोगों में देह एक प्रकार का कार्य करता और पवित्र आत्मा दूसरे प्रकार का, और अगर जो देह करता उसका महत्व न होता और केवल जो आत्मा करता उसी का महत्व होता, तो मसीह के पास कोई अर्थपूर्ण सत्य, मार्ग या जीवन न होता। यह अंतर्विरोध होता। क्या पवित्र आत्मा ऐसे कार्य कर सकता है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान, सबसे बुद्धिमान, पवित्र और धर्मी है, और वह बिलकुल भी गलतियाँ नहीं करता।

लोगों के पहले के अनुभवों में बहुत सारे भटकाव और गलतियाँ थीं। कुछ चीज़ें ऐसी थीं जो सामान्य मानवता वाले लोगों में होनी चाहिए थीं या उन्हें करनी चाहिए थीं, या ऐसी त्रुटियाँ थीं जिनसे इंसानी जीवन में बचना मुश्किल था, और जब उन चीज़ों को गलत ढंग से संभाला गया, तो लोगों ने उसकी ज़िम्मेदारी परमेश्वर पर डाल दी। एक बहन थी जिसके घर पर कुछ मेहमान आए। उसकी रोटियाँ ढंग से सिंकी नहीं थी, तो उसने सोचा : "शायद यह परमेश्वर का अनुशासन है। परमेश्वर फिर से मेरे दंभी दिल से निपट रहा है; मेरा अभिमान सचमुच बहुत मजबूत है।" दरअसल, जहाँ तक इंसान के सामान्य ढंग से सोचने का सवाल है, जब मेहमान आते हैं, तो तुम उत्तेजित हो जाते हो और हड़बड़ी करते हो, हर काम बेतरतीबी से करते हो, तो यह स्वभाविक बात है कि या तो खाना जल जाता है या उसमें नमक ज़्यादा हो जाता है। यह ज़्यादा उत्तेजित होने से होता है, लेकिन लोग इसे "परमेश्वर के अनुशासन" के सिर मढ़ देते हैं। दरअसल, ये वो सारी गलतियाँ हैं जो इंसानी जीवन में होती हैं। अगर तुम परमेश्वर में आस्था न रख रहे होते, तो क्या यह समस्या तब न आती? समस्याएँ अक्सर इंसान की गलतियों का नतीजा होती हैं—ये गलतियाँ कोई पवित्र आत्मा की करनी का मामला नहीं हैं। इन गलतियों का परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे अगर खाना खाते समय तुम्हारी जीभ कट जाए तो क्या यह परमेश्वर का अनुशासन है? परमेश्वर के अनुशासन के सिद्धांत हैं और वे आमतौर पर तब देखने में आते हैं जब तुम जानबूझकर कोई अपराध करते हो। जब तुम परमेश्वर के नाम को शामिल करके या उसकी गवाही या कार्य से संबंधित कोई काम करते हो तभी वह तुम्हें अनुशासित करेगा। जो काम लोग करते हैं उसकी अंदरूनी जागरुकता हासिल करने के लिए उनमें अब सत्य की पर्याप्त समझ है। उदाहरण के रूप में : अगर तुमने कलीसिया के धन का गबन कर लिया या उस धन को तुमने बेतहाशा खर्च कर दिया, तो क्या यह संभव है कि तुम्हें कुछ महसूस न हो? ऐसा करते समय तुम्हें कुछ महसूस होगा। यह संभव नहीं है कि ऐसा काम करने के बाद ही तुम्हें कुछ महसूस हो। तुम अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध जो काम करते हो उनके बारे में तुम अपने दिल में स्पष्ट होते हो। क्योंकि लोगों की अपनी पसंद और प्राथमिकताएँ होती हैं, वे बस लिप्त हो जाते हैं जबकि वे जानते हैं कि सत्य को कैसे अमल में लाना है। वैसे, कुछ करने के बाद, उन्हें कोई स्पष्ट शर्मिंदगी महसूस नहीं होती या वे किसी स्पष्ट अनुशासन से नहीं गुज़रते। क्योंकि उन्होंने यह अपराध जानबूझकर किया होता है, इसलिए परमेश्वर उन्हें अनुशासित नहीं करता; जब धार्मिक न्याय का समय आयेगा, तो हर एक पर उसके कर्मों के अनुसार परमेश्वर का प्रतिफल आयेगा। इस समय कलीसिया में कुछ ऐसे लोग हैं जो पैसों का गबन करते हैं, कुछ ऐसे हैं जो स्त्री-पुरुषों में एक स्पष्ट सीमारेखा कायम नहीं रखते, कुछ आलोचना, अवहेलना करते हैं और गुप्त रूप से परमेश्वर के कार्य को ध्वस्त करने का प्रयास करते हैं। फिर भी उनके साथ सब-कुछ सही कैसे है? जब वे लोग ऐसे काम करते हैं, तो उन्हें इसका भान होता है और उन्हें अपने दिल में शर्मिंदगी भी होती है और इसी वजह से वे लोग कभी-कभी ताड़ना और शुद्धिकरण का कष्ट उठाते हैं, लेकिन वे लोग बहुत निर्लज्ज होते हैं! जैसे जब लोग स्वच्छंद संभोग में लिप्त होते हैं, तो उन्हें उस समय पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं, लेकिन उनकी कामुकता बहुत अधिक होती है और वे अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाते। भले ही पवित्र आत्मा उन्हें अनुशासित कर दे, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए पवित्र आत्मा अनुशासन को प्रभाव में नहीं लाएगा। अगर पवित्र आत्मा उन्हें तब अनुशासित न करे, उन्हें कोई शर्मिंदगी महसूस न हो और उनके देह को कुछ न हो, तो क्या बाद में उन्हें फटकारा जा सकता है? कृत्य को चुका है, अब क्या अनुशासन हो सकता है? इससे यही साबित होता है कि वे बहुत ही निर्लज्ज लोग हैं और उनमें मानवीयता का अभाव है, ये लोग अभिशाप और दंड के हकदार हैं! पवित्र आत्मा अनावश्यक रुप से काम नहीं करता। अगर तुम भलीभाँति सत्य जानते हो लेकिन उस पर अमल नहीं करते, अगर तुम कोई भी बुराई करने के काबिल हो, तो तुम सिर्फ यही कर सकते हो कि उस दिन का इंतज़ार करो जब दुष्ट के साथ तुम्हें भी दंडित किया जाएगा। यही तुम्हारे लिए सर्वोत्तम अंत है! मैंने बारंबार तुम्हें अंतरात्मा के बारे में प्रवचन दे दिया है, जो कि न्यूनतम पात्रता है। अगर लोगों में अंतरात्मा का अभाव है, तो वे पवित्र आत्मा का अनुशासन खो चुके हैं; वे जो चाहें कर सकते हैं और परमेश्वर उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। जिनमें सचमुच अंतरात्मा और विवेक है, वे जब कोई गलत कार्य करेंगे तो वे उसके प्रति सजग होंगे। जब उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारेगी तो वे थोड़ा असहज महसूस करेंगे; उनमें अंतर्द्वंद्व चलेगा और अंतत: वे देह-सुख का त्याग कर देंगे। वे उस मुकाम तक नहीं जाएँगे जहाँ वे ऐसा कोई काम करें जो गंभीर रूप से परमेश्वर-विरोधी हो। पवित्र आत्मा उन्हें चाहे अनुशासित करे या न करे, ताड़ना दे या न दे, लोग जब कुछ गलत करेंगे, तो उन्हें कुछ महसूस होगा। इसलिए, लोग अब हर तरह के सत्यों को समझते हैं और अगर वे उनका अभ्यास नहीं करते, तो यह एक मानवीय मसला है। मैं ऐसे लोगों के बारे में बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं देता, न ही उनके लिए कोई उम्मीद करता हूँ। तुम जैसा चाहो कर सकते हो!

जब कुछ लोग एकत्रित होते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों को दर-किनार करके हमेशा इस बारे में बात करते हैं कि अमुक व्यक्ति कैसा है। बेशक, थोड़ी समझ होना अच्छी बात है, ताकि तुम कहीं भी जाओ, तुम्हें कोई आसानी से धोखा न दे सके, न ही आसानी कोई बुद्धू या मूर्ख बना सके—यह भी एक पहलू है जो लोगों में होना चाहिए। लेकिन तुम्हें मात्र इसी एक पहलू पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। इसका संबंध चीज़ों के नकारात्मक पक्ष से है और तुम हमेशा लोगों पर नज़र गड़ाए नहीं रह सकते। पवित्र आत्मा किस प्रकार कार्य करता है, इस बारे में तुम्हें अभी बहुत थोड़ा ज्ञान है, परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बहुत सतही है, और तुम्हारे अंदर सकारात्मक चीज़ें बहुत ही कम हैं। जिसमें तुम्हारी आस्था है वह परमेश्वर है, जिसे तुम्हें समझना है वह परमेश्वर है, शैतान नहीं। अगर तुम केवल इतना ही समझते हो कि शैतान कैसे काम करता है, उन सारे तरीकों को जानते हो जिनके ज़रिए दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं, लेकिन अगर तुम्हें परमेश्वर का किसी भी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं है, तो उसका क्या अर्थ होगा? आज जिसमें तुम्हारी आस्था है, क्या वह परमेश्वर नहीं है? तुम्हारे ज्ञान में ये सकारात्मक बातें शामिल क्यों नहीं हैं? तुम प्रवेश के सकारात्मक पहलू पर ध्यान ही नहीं देते, न ही इस पर तुम्हारी पकड़ है, तो आखिर वो क्या चीज़ है जिसे तुम अपनी आस्था में प्राप्त करना चाहते हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि तुम्हें कैसे अनुसरण करना चाहिए? तुम नकारात्मक पहलू के बारे में बहुत कुछ जानते हो, लेकिन प्रवेश के सकारात्मक पहलू पर तुम नाकाम हो जाते हो, तो आखिर तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ेगा कैसे? तुम जैसा व्यक्ति जो शैतान के साथ युद्ध के अलावा कोई बात ही नहीं करता, उसके विकास के लिए भविष्य की संभावनाएँ क्या होंगी? क्या तुम्हारा प्रवेश बहुत पुराना नहीं होगा? ऐसा करके तुम वर्तमान कार्य से क्या हासिल कर पाओगे? तुम्हारे लिए इस समय यह समझना मुख्य है कि परमेश्वर अब क्या करना चाहता है, इंसान को कैसे सहयोग करना चाहिए, उसे परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए, उसे पवित्र आत्मा के कार्य को कैसे समझना चाहिए, परमेश्वर आज जो वचन कह रहा, उसे उन सबमें कैसे प्रवेश करना चाहिए, उन्हें कैसे खाना-पीना चाहिए, अनुभव करना और समझना चाहिए, उसे परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करना चाहिए, कैसे परमेश्वर द्वारा जीता जाना चाहिए और परमेश्वर के सामने कैसे समर्पित होना चाहिए... तुम्हें इन बातों पर ध्यान देना चाहिए और अब इनमें प्रवेश करना चाहिए। क्या तुम समझते हो? मात्र दूसरे लोगों की पहचान करने पर ध्यान देने से क्या फायदा? तुम यहाँ-वहाँ शैतान और दुष्ट आत्माओं की पहचान कर सकते हो—तुम दुष्ट आत्माओं की पूरी समझ हासिल कर सकते हो, लेकिन अगर तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में कुछ भी न कह पाओ, तो क्या ऐसी पहचान परमेश्वर की समझ का विकल्प हो सकती है? मैं पहले दुष्ट आत्माओं के कार्य की अभिव्यक्तियों के बारे में संवाद कर चुका हूँ, लेकिन इसकी मात्रा अधिक नहीं रही है। बेशक, लोगों में थोड़ी-बहुत पहचानने की शक्ति होनी चाहिए और जो लोग परमेश्वर की सेवा करते हैं उनमें यह पहलू होना चाहिए ताकि वे बेवकूफी के काम करने और परमेश्वर के कार्य को बाधित करने से बचें। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के कार्य का ज्ञान और परमेश्वर की इच्छा की समझ का होना। तुम्हारे अंदर परमेश्वर के कार्य के इस चरण का क्या ज्ञान है? क्या तुम बता सकते हो कि परमेश्वर क्या कार्य करता है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, तुम्हारी अपनी कमियाँ क्या हैं और तुम्हें स्वयं को किन चीज़ों से लैस करना चाहिए? क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारा नवीनतम प्रवेश क्या है? तुम्हें परिश्रम का फल मिलना चाहिए और नए प्रवेश की समझ हासिल करनी चाहिए। तुम्हें भ्रमित होने का ढोंग नहीं करना चाहिए; तुम्हें अपने अनुभव और ज्ञान को और गहरा करने के लिए नए प्रवेश में और अधिक प्रयास करना चाहिए, यहाँ तक कि तुम्हें वर्तमान नवीनतम प्रवेशों और अनुभव करने के सबसे सही तरीके पर पकड़ बनानी चाहिए। इसके अलावा, नए कार्य और नए प्रवेश के ज़रिए, तुम्हारे अंदर पिछ्ले पुराने और पथभ्रष्ट अभ्यासों की समझ होनी चाहिए, और तुम्हें यह खोजना चाहिए कि नए अनुभवों में प्रवेश करने के लिए उन्हें कैसे हटाया जाए। ये वे बातें हैं जिन्हें तुम्हें अब तुरंत समझकर उनमें प्रवेश करना चाहिए। तुम्हें पुराने और नए प्रवेशों में अंतर और उनके संबंधों को समझना चाहिए। अगर इन बातों पर तुम्हारी पकड़ नहीं होगी, तो तुम्हारे पास विकास का कोई मार्ग न होगा, क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के साथ अपनी गति नहीं बनाए रख पाओगे। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को सही ढंग से खाना-पीना चाहिए, सही ढंग से संवाद करना और अभ्यास के अपने पिछले पुराने तरीकों और पुरानी पारंपरिक धारणाओं को बदलना चाहिए ताकि तुम नए अभ्यास में प्रवेश कर सको और परमेश्वर के नए कार्य में प्रवेश कर सको। तुम्हें इन चीज़ों को हासिल करना चाहिए। मैं तुम्हें बस यह पता लगाने के लिए नहीं कह रहा हूँ कि तुम सही ढंग से कैसे इसके लिए पात्र बनो; यह लक्ष्य नहीं है। बल्कि मैं तुमसे यह कह रहा हूँ कि तुम्हें अपने सत्य के अभ्यास को और अपने जीवन-प्रवेश को गंभीरता से लेना चाहिए। स्वयं को जानने की तुम्हारी योग्यता तुम्हारे सच्चे आध्यात्मिक कद का निरूपण नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सको, परमेश्वर के वचनों में सत्यों का अनुभव कर सको और उनकी समझ हासिल कर सको, और अपनी पिछली निजी धारणओं और त्रुटियों को पहचान सको, तो यह तुम्हारा सच्चा आध्यात्मिक कद है और जिसे तुम सबको हासिल करना चाहिए।

ऐसी अनेक स्थितियाँ होती हैं जिनमें तुम्हें पता नहीं चलता कि अभ्यास कैसे करें, पवित्र आत्मा के कार्य की तो तुम्हें और भी कम जानकारी होती है। कभी-कभी तुम कुछ ऐसा कर देते हो जो साफ तौर पर पवित्र आत्मा की अवज्ञा होती है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के ज़रिए, पहले ही इस मामले में सिद्धांत पर तुम्हारी पकड़ है, इसलिए तुम्हारे अंदर शर्मिंदगी और बेचैनी की अंदरूनी भावना है; बेशक, इस तरह की भावना थोड़ा-बहुत सत्य जानने के आधार के अंतर्गत ही आएगी। अगर लोग परमेश्वर के आज के वचन से सहयोग न करें या उनके अनुरूप अभ्यास न करें, तो फिर वे पवित्र आत्मा के कार्य को बाधित कर रहे हैं और वे यकीनन अपने अंदर बेचनी महसूस करेंगे। मान लो कि तुम किसी पहलू विशेष के सिद्धांत को समझते हो लेकिन तुम उसके अनुरूप अभ्यास नहीं करते, तो फिर तुम्हारे अंदर शर्मिंदगी की भावना आएगी। अगर तुम सिद्धांत को नहीं समझते और सत्य के इस पहलू को बिल्कुल भी नहीं जानते, तो फिर ज़रूरी नहीं कि तुम इस मामले में शर्मिंदगी महसूस करो। पवित्र आत्मा की फटकार हमेशा प्रसंग के अनुसार होती है। तुम्हें लगता है कि चूँकि तुमने प्रार्थना नहीं की और पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग नहीं किया, इसलिए तुम्हारे कारण कार्य में देरी हो गयी। जबकि सच्चाई यह है कि इसमें देरी नहीं की जा सकती। पवित्र आत्मा किसी और को प्रेरित कर देगा; पवित्र आत्मा के कार्य में कोई रुकावट नहीं डाल सकता। तुम्हें लगता है कि तुमने परमेश्वर को निराश कर दिया, यह भावना तुम्हारी अंतरात्मा में आनी चाहिए। तुम सत्य हासिल कर पाते हो या नहीं, यह तुम्हारा अपना मामला है और इसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं। कभी-कभी तुम्हारी अपनी अंतरात्मा ही अपराधी महसूस करती है, लेकिन यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन या प्रकाशन नहीं है, न ही यह पवित्र आत्मा की फटकार है। बल्कि यह इंसानी ज़मीर के अंदर की भावना है। अगर तुम ऐसे मामलों में जहाँ परमेश्वर का नाम, परमेश्वर की गवाही या परमेश्वर का कार्य जुड़ा हुआ है, स्वच्छंदता से पेश आते हो, तो परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं। लेकिन इसकी एक सीमा है—परमेश्वर सामान्य और छोटे मामलों में तुम्हें लेकर परेशान नहीं होगा। वो तुम्हें नजरंदाज कर देगा। अगर तुम सिद्धांतों का उल्लंघन करोगे और परमेश्वर के काम में बाधा डालोगे और परेशानी पैदा करोगे, तो फिर तुम पर उसका क्रोध फूटेगा और वह तुम्हें बिल्कुल नहीं बख्शेगा। मानवीय जीवन के दौरान तुम जो कुछ गलतियाँ करते हो, उन्हें टाला नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, तुम अपनी रोटी सही ढंग से नहीं सेंकते और कहते हो कि यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुशासन है—ऐसा कहना पूरी तरह से विवेकहीन बात है। परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, क्या तुम्हारे साथ ऐसा अक्सर नहीं होता था? तुम्हें यह पवित्र आत्मा का अनुशासन लगता है, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं है (कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर), क्योंकि यह कार्य पूरी तरह से पवित्र आत्मा से नहीं आता, बल्कि इंसानी भावनाओं से आता है। हालाँकि, आस्था रखने वालों के लिए इस तरह से सोचना एक सामान्य बात है। जब तुम परमेश्वर में आस्था न रखते थे तो इस तरह से नहीं सोचते। एक बार तुम परमेश्वर में आस्था रखने लगे, तो तुम इन बातों पर ज़्यादा विचार करने लगे और इसलिए स्वाभाविक रूप से तुम इस तरह से सोचने लगे। यह सामान्य लोगों की सोच से पैदा होती है और इसका संबंध उनकी मानसिकता से है। लेकिन मैं तुम्हें एक बात बता दूँ, ऐसी सोच पवित्र आत्मा के कार्य के दायरे में नहीं आती। यह पवित्र आत्म का लोगों को उनकी सोच के ज़रिए सामान्य प्रतिक्रिया देने का उदाहरण है; लेकिन तुम्हें यह समझना चाहिए कि यह प्रतिक्रिया पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। इस तरह का "ज्ञान" रखने से यह साबित नहीं होता कि तुम्हारे अंदर पवित्र आत्मा का कार्य है। तुम्हारा ज्ञान पवित्र आत्मा के प्रबोधन से नहीं आता, यह पवित्र आत्मा का कार्य तो बिल्कुल भी नहीं है। यह मात्र सामान्य इंसानी सोच का नतीजा है और इसका संबंध पवित्र आत्मा के प्रबोधन या प्रकाशन से बिल्कुल भी नहीं है—ये साफ तौर पर विशिष्ट घटनाएँ हैं। ऐसी सामान्य इंसानी सोच पवित्र आत्मा से बिल्कुल उत्पन्न नहीं होती।जब पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो वह आम तौर पर उन्हें परमेश्वर के कार्य का, और उनकी सच्ची प्रविष्टि और सच्ची अवस्था का ज्ञान देता है। वह उन्हें परमेश्वर के अत्यावश्यक इरादों और उसकी मनुष्य से वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में समझने देता है, ताकि उनके पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ बलि कर देने का संकल्प हो, ताकि वे परमेश्वर से अवश्य प्रेम करें भले ही वे उत्पीड़न और प्रतिकूल परिस्थितियों को भुगतें, ताकि वे परमेश्वर की गवाही दें भले ही इसका अर्थ अपना खून बहाना और अपना जीवन अर्पित करना हो; उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होगा। यदि तेरा इस तरह का संकल्प है तो इसका अर्थ है कि तुझमें पवित्र आत्मा की हरकतें है, और पवित्र आत्मा का कार्य है—लेकिन जान ले कि तू हर गुजरते पल में इस तरह की हरकतों से संपन्न नहीं है। कभी-कभी बैठकों में जब तू प्रार्थना करता है और परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता है, तो तू बेहद द्रवित और प्रेरित महसूस कर सकता है। जब अन्य लोग परमेश्वर के वचनों के अपने अनुभव और समझ पर कुछ संगति साझा करते हैं तो यह बहुत नया और ताजा महसूस होता है, और तेरा हृदय पूरी तरह से स्पष्ट और उज्ज्वल हो जाता है। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। यदि तू कोई अगुवा है और पवित्र आत्मा तुझे असाधारण प्रबुद्धता और रोशनी देता है, तो जब तू काम करने के लिए कलीसिया में जाता है, वह उन समस्याओं को देखने देता है जो कलीसिया के भीतर मौज़ूद हैं, और जानने देता है कि उनका समाधान करने के लिए सत्य पर संगति को कैसे साझा करें, तुझे अविश्वसनीय रूप से नेक, जिम्मेदार और अपने कार्य में गंभीर बनाता है, तो यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है।

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "ये कुछ हैं" लिखा है।

वचन देह में प्रकट होता है

ठोस रंग

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

स्क्रॉल की दिशा

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गति

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