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विज्ञान मानवजाति के लिए वरदान रहा है या अभिशाप?

सुन योंगली (सामाजिक विज्ञान अकादमी का प्राध्यापक): अभी-अभी आपने बहुत अच्छा बोला। बहुत ही, वाज़िब लगा। लेकिन यह बात विज्ञान के मुताबिक़ नहीं है, और इसका वैज्ञानिक सबूत नहीं खोजा गया है। इसलिए परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं, यह तय करना नामुमकिन है। परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर सबके अपने विचार और राय हैं। मुझे ऐसा लगता है कि आपके विचार और सिद्धांत आपकी अपनी समझ के अनुसार हैं, और ये सब सिर्फ भ्रम हैं। हम साम्यवादियों को यकीन है भौतिकवाद और विकासवाद के सिद्धांत ही सत्य हैं क्योंकि वे, विज्ञान के मुताबिक़ हैं। हमारा देश, प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक उपयुक्त शिक्षा देता है। ऐसा किसलिए? इसलिए कि सभी बच्चों में छोटी उम्र से ही, नास्तिकता और विकासवाद, की सोच घर कर जाए, ताकि वे धर्म और अंधविश्वास से, दूर रहें, ताकि वे हर सवाल का तर्कसंगत जवाब दे सकें। उदहारण के लिए, जीवन के उद्भव को ले लें। पहले के वक्त में, हम अनजान थे, और किस्से-कहानियों में, यकीन करते थे, जैसे कि स्वर्ग और पृथ्वी का अलग होना और नुवा द्वारा इंसान को बनाया जाना। पश्चिमी लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने हम सबकी रचना की। दरअसल, ये सब मिथक और किस्से हैं, और विज्ञान के मुताबिक़ नहीं हैं। विकासवाद के, सिद्धांत के आने के बाद से जिसने मानवजाति के उद्भव के बारे में समझाया था, कि किस तरह, मनुष्य बंदरों से विकसित हुए, तब से, परमेश्वर द्वारा मनुष्य की रचना की कहानियाँ पूरी तरह निराधार साबित हो गयी हैं। हर चीज़ का विकास पूरी तरह से प्रकृति में हुआ है। यही सत्य है। इसलिए, हमें विज्ञान में विश्वास करना होगा और विकासवाद में। आप सभी लोग पढ़े-लिखे जानकार लोग हैं। आप परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकते हैं? ये बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आती। क्या आप अपने विचार हमसे साझा कर सकेंगे?

ही होंगचैंग (मत-आरोपण केन्द्र का निदेशक): प्रोफ़ेसर स्वन अच्छा पढ़ाते हैं। वे विज्ञान और विकासवाद में, विश्वास करने के तर्क पेश करते हैं सही औचित्य के साथ। सभी लोग प्लीज़ अपने-अपने विचार रखें अपने ख्यालात बताएं। बेझिझक बोलें कोई बंदिश नहीं।

चांग मींगदाओ (एक ईसाई): तब तो मैं, और भी कुछ कहना चाहूंगा कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य, भौतिकवाद और विकासवाद में विश्वास करते हैं, आप मार्क्स और डारविन का आदर करते हैं। तो ऐसा क्यों है, कि दुनिया में पहले से बहुत कम लोग, भौतिकवाद और विकासवाद में विश्वास करते हैं? मानवजाति में, परमेश्वर में विश्वास करनेवाले लोग बहुतायत में हैं। जो लोग परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करते हैं, वो विकासवाद पर विश्वास नहीं रखतें। अविश्वासियों में भी, ऐसे लोग ज़्यादा नहीं हैं, जो विकासवाद को, मानते हैं। क्या आजकल, लोग डारविन में विश्वास करते हैं? क्या ऐसे लोग हैं, जो विकासवाद को सत्य मानते हैं? शायद उतने नहीं जितने कि आप सोचते हैं। प्रोफ़ेसर स्वन क्या मैं पूछ सकता हूँ: क्या विकासवाद में विश्वास करनेवाले, सभी लोग यह मानते हैं कि बंदर उनके पूर्वज हैं? पूर्वजों के लिए किये गए क्रियाकर्म में, क्या वे बंदरों को सम्म्मानित करते हैं? अगर वे बंदरों को सम्मानित नहीं करते, मगर दोहराते रहते हैं कि विकासवाद सत्य है, तो वे जो शिक्षा देते हैं, उसका पालन नहीं करते। प्रोफ़ेसर स्वन, आप विज्ञान की आराधना करते हैं, हर चीज़ को विज्ञान पर आधारित करते हैं, और हर चीज़ को, समझाने के लिए विज्ञान का उपयोग करते हैं। क्या मैं पूछ सकता हूँ: क्या विज्ञान सत्य है? विज्ञान का उद्भव आखिर हुआ कैसे? बहुत-से वैज्ञानिक सिद्धांत, जो प्रकाशित होते हैं, उनका बाद में, दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा खंडन क्यों किया जाता है? क्या आप यह कहने की, हिम्मत कर सकते हैं कि विज्ञान सत्य है? मैं आपसे पूछता हूँ: क्या विज्ञान हमें, भ्रष्ट चाल-चलन से बचा सकता है? क्या विज्ञान मानवजाति को, शैतान की ताकत से बचा सकता है? क्या विज्ञान, लोगों को पाप करना छोड़कर, एक सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकता है? क्या विज्ञान दुनिया में अमन कायम कर सकता है? क्या विज्ञान हमारे लिए खुशियाँ, और एक शानदार मंजिल, ला सकता है? क्या विज्ञान हमें सुरक्षा और खुशी दिला सकता है? क्या विज्ञान मानवजाति के विकास और उसकी मंजिल की भविष्यवाणी कर सकता है? विज्ञान इनमें से, कोई भी काम नहीं कर सकता। आप कैसे कह सकते हैं कि विज्ञान सत्य है? अंत में, सत्य क्या है? क्या आप पक्के तौर पर बता सकते हैं?

हैन डॉन्गमे (एक ईसाई): प्रोफ़ेसर, क्योंकि आप विज्ञान को इतना ऊंचा स्थान देते हैं, और उसकी काफी इज़्ज़त करते हैं, क्या आप हमें समझा सकेंगे कि विज्ञान वास्तव में है क्या? विज्ञान सिर्फ कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो महज़ ज्ञान के दायरे में होते हैं, जिनका अनुसंधान भ्रष्ट इंसानों ने तब किया, जब उन्हें परमेश्वर की बनायी दुनिया का सामना करना पड़ा। यह पूरी तरह से इंसान के दिमाग की उपज है। भ्रष्ट इंसानों के पास सत्य नहीं होता। विज्ञान इंसानों से आता है। आप कैसे समझा सकते हैं कि वैज्ञानिक जानकारी सत्य है? सत्य सिर्फ परमेश्वर से आ सकता है। परमेश्वर ही, सृजनकर्ता हैं। सिर्फ सृजनकर्ता द्वारा व्यक्त वचन ही सत्य हैं। परमेश्वर ने प्रकट होने के बाद से बहुत-से कार्य किये हैं और वचन बोले हैं, तभी से इंसान ने उनके वचनों को अनुभव किया है। उन्होंने पहचान लिया है कि सिर्फ परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं; ये न बदलनेवाले तथ्य हैं। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने बहुत-सी चीज़ों की घोषणा की, परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए मनुष्यों की अगुवाई की, जिससे वे परमेश्वर की देखभालवाली सुरक्षा और उनका आशीर्वाद पा सकें। जिन लोगों ने व्यवस्थाओं को तोड़ा, उन्हें दोषी करार देकर श्राप दिया गया। अनुग्रह के युग में, मानवजाति के पापों के लिए प्रभु यीशु को, सूली पर चढ़ाया गया, और उन्होंने मानवजाति को छुटकारा दिलाया। उनमें विश्वास करने से, लोगों के पाप माफ़ कर दिये गए, और वे परमेश्वर के अनुग्रह और आशीर्वाद का आनंद ले सके। राज्य के युग के आगमन से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट होकर, लोगों के साथ न्याय करने और उन्हें बचाने के लिए सत्य व्यक्त करके कार्य किया है, लोगों को पूरी तरह से शैतान की ताकतों से बचाया है, लोगों को परमेश्वर की शरण में लाकर, परमेश्वर का आशीर्वाद दिलाया है, और उन्हें एक शानदार मंज़िल से नवाज़ा है। परमेश्वर के कार्य के तथ्य यह साबित करने के लिए काफी हैं, कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, और वे लोगों को जो दिलाते हैं, वो हैं, प्रकाश, आशीर्वाद और उद्धार। हज़ारों सालों से, परमेश्वर ने लोगों की अगुवाई के लिए, और आज हम जहां हैं, वहां का रास्ता दिखाने के लिए वचनों का उपयोग किया है। परमेश्वर सब-कुछ संपन्न करने के लिए वचनों का उपयोग करते हैं, परमेश्वर का प्रत्येक वचन सच साबित हो रहा है। ये ऐसे तथ्य हैं जिनको कोई भी देख सकता है। प्रभु यीशु ने कहा था: "क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा" (मत्ती 5:18)। "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी" (मत्ती 24:35)। अंत के दिन आ चुके हैं, और बहुत-से ईसाइयों ने देखा है कि प्रभु यीशु की भविष्यवाणियाँ, सच हो गयी हैं। इससे यह पता चलता है कि, सिर्फ परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, और ये सकारात्मक बातें हैं। ये ऐसे तथ्य हैं, जिनको कोई नकार नहीं सकता। सिर्फ परमेश्वर ही, मानवजाति को बचा सकते हैं। सिर्फ परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, और इंसान की ज़िंदगी हो सकते हैं। विज्ञान सत्य नहीं है।

ही होंगचैंग: छात्रो, मैं, नहीं जानता कि सत्य क्या है, मैं विज्ञान को नहीं समझता। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ, कि अगर विज्ञान न होता, तो हम ऐसी उन्नत और आरामदेह ज़िंदगी, न जी पाते, जो हम अब जी रहे हैं। क्या विज्ञान के ये तमाम नतीजे, जिनका लोग आज आनंद ले रहे हैं, विज्ञान की बदौलत नहीं हैं? आज लोगों को होने वाली तमाम बीमारियाँ, विज्ञान के ज़रिये ही ठीक हो पाती हैं। लोगों की तमाम समस्याएँ हल के लिए विज्ञान की ओर देखती हैं। क्या यह आपके मुताबिक सत्य नहीं है? आप परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और कहते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। मुझे यकीन नहीं होता। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि विज्ञान के बिना, इंसान का विकास ही नहीं होता। हम बिना रोशनी के होते; हम अँधेरों में जीते। शायद आपकी आस्था का मतलब यह है कि परमेश्वर आपकी तमाम समस्याओं को सुलझा सकते हैं? क्या वे आपको खुशहाल ज़िंदगी जीने लायक बना सकते हैं? अगर हम सिर्फ परमेश्वर में विश्वास करते, विज्ञान में नहीं, तो क्या समाज तरक्की कर पाता? मुझे लगता है कि आप विश्वासी लोग वास्तविकता नहीं जानते। क्या परमेश्वर आपको कम्युनिस्ट पार्टी के अत्याचार की सारी तकलीफों से बचा सकते हैं? क्या परमेश्वर कम्युनिस्ट पार्टी को, नष्ट कर सकते हैं? ये सच्चाई है। आप, इन्हें कैसे समझा सकते हैं?

पैन लांग (मत-आरोपण केन्द्र का उप निदेशक): डायरेक्टर हे ठीक कह रहे हैं। बिना वैज्ञानिक विकास के, इंसान अज्ञानी, बर्बर, बेवकूफ और पिछड़ा हुआ ही रहता। बहुत साल पहले हम नहीं जानते थे कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कैसे करें। अब जबकि विज्ञान का विकास हो चुका है, हमने कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस को बाहर निकाला है, और परमाणु शक्ति का भी, विकास किया है। इनसे समाज और अर्थतंत्र ने, तरह-तरह से खूब तरक्की की है, और हमारे जीवन-स्तर को सुधारा है। सुनिए, हमारी आबादी, रोज़ बढ़ती जा रही है, और खाने-पीने की चीज़ें कम, होती जा रही हैं। टेक्नॉलॉजी, कीटाणुनाशकों और रसायनों से, फसल की पैदावार बहुत बढ़ी है। हम लोगों की मदद कर सकते हैं ताकि वे अच्छा खाएं और अच्छा पहनें। क्या ये समस्याएँ परमेश्वर में विश्वास से हल हो सकती हैं? क्या ये सब सिर्फ विज्ञान के नतीजे नहीं हैं? इसलिए हम लोगों को विज्ञान में विश्वास करना चाहिए। आप देखिए सिर्फ विज्ञान ही फर्क ला सकता है और इस दुनिया को बदल, सकता है, और-तो-और वह दुनिया को काबू में कर सकता है। विज्ञान पर भरोसा करके, हम अपने लिए एक खुशहाल ज़िंदगी, और एक गौरवशाली, मातृभूमि बना पाये हैं। हमें परमेश्वर की नहीं, विज्ञान की ज़रूरत है? हमें काम के लिए इसकी ज़रूरत है। अब मैं जो कह रहा हूँ क्या ये गलत है?

शू श्यांगक्वांग (एक ईसाई): डायरेक्टर पैन, आप विज्ञान में विश्वास करते हैं, और सोचते हैं कि विज्ञान हमें विकास करने और खुशहाल होने में, मदद कर सकता है। क्या यह वास्तविकता है? विज्ञान तरक्की कर रहा है, लेकिन उसने दरअसल क्या हासिल किया है? बाहर से, ऐसा लगता है कि विज्ञान सकारात्मक नतीजे लाया है। लगता है कि जीवन-स्तर ऊपर उठा है और समाज फल-फूल रहा है। जबकि असलियत में, विज्ञान ने आस्था का संकट खड़ा कर दिया है, क्योंकि हम, परमेश्वर से दूर होकर, उन्हें नकारते और धोखा देते हैं। लोगों के विज्ञान में विश्वास की वजह से, बहुत-से लोग परमेश्वर को नहीं खोजते। बल्कि वे भौतिक सुखों को खोजते हैं। इन रुझानों के पीछे भागने के कारण, इन्सान के नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है, वे और भी ज़्यादा दुष्ट हो गये हैं। लोगों की आत्माएं कहीं ज़्यादा खोखली हो गयी हैं। लोग उत्तेजना तलाशते हैं, और हवस के पीछे भागते हैं। नशे की लत और, खुदकुशी के मामले बढ़ गये हैं। ये आज की सच्चाई है। जिस दौरान हमने विज्ञान का विकास किया, हमने अपने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया, हवा, पानी, मिट्टी और यहाँ तक कि भोजन को भी दूषित कर दिया है। इससे हमें बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचा है। बहुत-से देश हथियारों की दौड़ में, ज़्यादा आधुनिक हथियार बनाने के लिए दिमाग के घोड़े दौड़ा रहे हैं। विज्ञान ने परमाणु हथियार और गाइडेड मिसाइलें बनाकर, हम सबके लिये तबाही का खतरा पैदा कर दिया है। अगर तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया, तो यह मानवजाति को तबाह कर देगा। आप कह सकते हैं जब विज्ञान अपने चरम पर पहुंचेगा तब मानवजाति का अंत हो जाएगा। डायरेक्टर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सुनें। शायद आप समझ सकें विज्ञान मानवजाति के लिए वरदान लाया है या तबाही।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। …विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी चैन हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य अपरिहार्य रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की लालसा और अन्वेषण की इच्छा को शांत नहीं कर सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेहूदे बलिदान और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा। …यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो इस प्रकार का देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर, चला जाएगा, और परमेश्वर के द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा" (वचन देह में प्रकट होता है)।

टैन शोमीन (एक ईसाई): सर्वशक्तिमान परमेश्वर यह भी कहते हैं: "वे निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण एवं गहरे अनुसंधान को क्रियान्वित करते रहते हैं, तो वे लगातार अपनी स्वयं की भौतिक आवश्यकताओं एवं काम वासना को संतुष्ट करते रहते हैं: फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे हैं? सबसे पहले अब आगे से कोई पर्यावरणीय संतुलन नहीं रहा और, इसके साथ ही साथ, इस प्रकार के वातावरण के द्वारा समस्त मानवजाति के शरीरों को दूषित एवं क्षतिग्रस्त कर दिया गया है, और विभिन्न संक्रमित रोग, विपदाएँ, एवं धुंध हर जगह फैल गई है। यह ऐसी स्थति है जिस पर अब मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है, क्या यह सही नहीं है? अब तुम लोग इसे समझते हो, यदि मानवजाति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करती है, परन्तु इस रीति से हमेशा शैतान का अनुसरण करती रहती है—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करती है, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करती है, निरन्तर जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करती है—तो क्या तुम लोग पहचानने में समर्थ हो कि मानवजाति का स्वाभाविक अन्त क्या होगा? स्वाभाविक अंतिम परिणाम क्या होगा? …यह बर्बादी होगीः एक समय में एक कदम बढ़ाकर बर्बादी की ओर पहुँचना! एक समय में एक कदम के लिए दृष्टिकोण!" (वचन देह में प्रकट होता है)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सारी बातें तथ्य और सत्य हैं। इंसान जिस विज्ञान का विकास कर रहा है, क्या ये उसका नतीजा नहीं है? भ्रष्ट मानवजाति, विज्ञान की आराधना करती है। यह खतरनाक है! विज्ञान के विकास ने हम सबको तबाही और, बर्बादी में झोंक दिया है।

चांग मींगदाओ: प्रोफ़ेसर, परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं। सिर्फ परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकते हैं। अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य व्यक्त करते हैं, और मनुष्य के साथ न्याय करते हैं ताकि भ्रष्ट मानवजाति को शुद्ध करके बचा सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के वास्ते है बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के वास्ते भी है। इससे भी अधिक, यह उन सभी चीज़ों के लिए सभी से अभिस्वीकृति प्राप्त करने के वास्ते है जो कार्य मैं कर चुका हू। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एक मात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत निस्तब्ध हो जाएगी। मेरे बिना, मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी… आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रो में अच्छे के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते हो" (वचन देह में प्रकट होता है)। सिर्फ परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य के लिए समर्पित होकर, और मसीह द्वारा व्यक्त सत्य को स्वीकार करके ही, किसी का भ्रष्ट चाल-चलन शुद्ध किया जा सकता है, और तभी वह परमेश्वर की शरण में जाकर उनकी आराधना कर सकता है। किसी को परमेश्वर की रक्षा की वजह से इसी तरह से विपत्तियों से बचाया जा सकता है, और वह परमेश्वर के राज्य में पहुँच सकता है।

"साम्यवाद का झूठ" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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