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7. परमेश्वर द्वारा सीसीपी सरकार और धार्मिक दुनिया का उपयोग करने में परमेश्वर की कौन सी बुद्धिमत्ता और सर्वशक्तिमत्ता का पता चलता है? (1)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, ऐसी योजना जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार मेरा कार्य इन तीनों युगों में तत्वतः अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक चरण में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या बल्कि, अधिक स्पष्ट कहें तो, यह उन छलकपटों के अनुसार किया जाता है जो शैतान उस युद्ध में काम में लाता है जो मैं उसके विरुद्ध शुरू करता हूँ। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यक्त करना, शैतान के सभी छलकपटों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को दिखाने के लिए है जबकि उसके साथ-साथ ही शैतान की असहनीय करालता को प्रकट करती है। इससे भी अधिक, यह मेरी रचनाओं को अच्छे और बुरे के बीच में अन्तर करना सिखाने के लिए है, यह पहचानना सिखाने के लिए है कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखना सिखाने के लिए है कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, व अधम से भी अधम है, दुष्ट है, और अच्छे एवं बुरे, सत्य एवं झूठ, पवित्रता एवं गन्दगी, और महान और हेय के बीच पूर्ण निश्चितता के साथ अंतर करना सिखाने के लिए है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो सकती है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टि का प्रभु—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, मनुष्य को उसके आनन्द की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है जिनकी मैंने रचना की है और जो बाद में मेरे विरूद्ध हो गया।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से

अब आपको गौर करना चाहिए कि परमेश्वर ने शैतान को तुरन्त ही समाप्त नहीं किया, ताकि मनुष्य देख सके कि किस प्रकार शैतान ने लोगों को भ्रष्ट किया है, और किस प्रकार परमेश्वर ने लोगों को बचाया है। केवल तब जब मनुष्य देख पाता है कि किस सीमा तक शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट किया है, किस प्रकार उसके अपराधों की सूची स्वर्ग में पहुँचने पर अंततः परमेश्वर शैतान का नाश करता है, ताकि मनुष्य देख सके कि उसमें परमेश्वर की धार्मिकता और उसका स्वभाव है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को कैसे समझें" से

जब मैं औपचारिक रूप से अपना कार्य शुरू करता हूँ, तो सभी लोग वैसे ही चलते हैं जैसे मैं चलता हूँ, इस तरह कि समस्त संसार के लोग मेरे साथ कदम मिलाते हुए चलने लगते हैं, संसार भर में "उल्लास" होता है, और मनुष्य को मेरे द्वारा आगे की ओर प्रेरित किया जाता है। परिणामस्वरूप, बड़ा लाल अजगर मेरे द्वारा उन्माद और व्याकुलता की स्थिति में डाल दिया जाता है, और वह मेरा कार्य करता है, और, अनिच्छुक होने के बावजूद भी, अपनी स्वयं की इच्छाओं का अनुसरण करने में समर्थ नहीं होता है, और उसके पास मेरे नियन्त्रण में समर्पित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। मेरी सभी योजनाओं में, बड़ा लाल अजगर मेरी विषमता, मेरा शत्रु, और मेरा सेवक भी है; वैसे तो, मैंने उससे अपनी "अपेक्षाओं" को कभी भी शिथिल नहीं किया है। इसलिए, मेरे देहधारण के काम का अंतिम चरण उसके घराने में पूरा होता है। इस तरह से, बड़ा लाल अजगर मेरी उचित तरीके से सेवा करने में अधिक समर्थ है, जिसके माध्यम से मैं उस पर विजय पाऊँगा और अपनी योजना को पूरा करूँगा।

संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "अध्याय 29" से

बड़े लाल अजगर के देश में, मैंने ऐसा कार्य किया है जो लोगों के लिए अकल्पनीय है, जिससे वे हवा में उड़ जाएंगे, जिसके बाद उनमें से काफी लोग हवा के तेज़ बहाव में दूर चले जाएंगे। वाकई ये "खलिहान" है जिसे मैं साफ करने वाला हूं; यही मेरी इच्छा है और यही मेरी योजना है। मेरे काम में व्यस्त रहने के दौरान, काफी दुष्ट लोग घुस आए हैं, लेकिन मुझे उन्हें खदेड़ने की अभी कोई जल्दी नहीं है। बल्कि सही समय आने पर मैं उन्हें छिन्न-भिन्न कर दूंगा। केवल उसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूंगा, जो मुझे सचमुच प्रेम करते हैं, उन लोगों को अंजीर के वृक्ष के फल और कुमुदिनी की सुगंध का आनंद लेने दूंगा। उस धरती पर जहां शैतान का बसेरा है, जहां गुबार है, वहां कोई शुद्ध स्वर्ण नहीं बचा है, मात्र रेत है, और ऐसे हालात से टकराते हुए मैं ऐसे चरण का कार्य करता हूं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं शुद्ध, परिशोधित स्वर्ण प्राप्त करता हूं, रेत नहीं। कोई दुष्ट मेरे घर में कैसे रह सकता है? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवी बनकर कैसे रहने दे सकता हूं? ऐसी चीज़ों को दूर भगाने के लिए मैं हर सम्भव तरीका अपनाता हूं। जब तक मेरी इच्छा ज़ाहिर नहीं हो जाती, तब तक किसी को पता नहीं चलता कि मैं क्या करने वाला हूं। इस अवसर का लाभ उठाते हुए मैं दुष्टों को निकाल बाहर करता हूं, और उन्हें मेरे सामने से चले जाने के लिए बाध्य किया जाता है। दुष्टों के साथ मैं ऐसा ही करता हूं, लेकिन फिर भी उनके लिए एक दिन ऐसा आएगा जब वे मेरी सेवा कर सकेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे" से

परमेश्वर का उद्देश्य मनुष्य बुरी आत्माओं के कार्य के एक हिस्से का उपयोग करके मनुष्य के एक हिस्से को पूर्ण करना है, ताकि ये लोग राक्षसों के कार्यों को पूरी तरह देख सकें, और वे अपने पूर्वजों को सही मायने में समझ सकें। केवल तब ही मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकते हैं, न केवल राक्षसों की बल्कि अपने पूर्वजों की वंशावली को भी छोड़ सकेंगे। बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हराने का यह परमेश्वर का मूल इरादा है, ताकि सभी मनुष्य बड़े लाल अजगर के सच्चे रूप को जान सकें, उसके मुखौटे को पूरी तरह से उतार कर उसका वास्तविक स्वरूप देख सकें। परमेश्वर यही प्राप्त करना चाहता है, और पृथ्वी पर यही उसका अंतिम लक्ष्य है जिसके लिए उसने इतना काम किया है; वह सभी मनुष्यों में इसे हासिल करना चाहता है। इसे परमेश्वर के उद्देश्यों के लिए सभी चीज़ों की युक्ति के रूप में जाना जाता है।

वचन देह में प्रकट होता है में सम्पुर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 41" से

संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाइयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को पूरा करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस समूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों की पीड़ा, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव के कारण परमेश्वर अपना शुद्धिकरण का कार्य करता और जीतता है ताकि इससे वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी प्राप्त करे जो उसके कार्यों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस सूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं, यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर अपना विजय का कार्य उनके द्वारा करता है जो उसका विरोध करते हैं। ऐसा करने पर ही परमेश्वर की महान सामर्थ्य का प्रकटीकरण हो सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल वे जो अशुद्ध देश में रहते हैं, परमेश्वर की महिमा का उत्‍तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यह परमेश्वर की महान सामर्थ्‍य को विशिष्टता दे सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से

इसके बावजूद कि जो कुछ परमेश्वर करता है या वे माध्यम जिनके द्वारा वह इसे करता है, उस कीमत, या उसके उद्देश्य के बावजूद, उसके कार्यों का उद्देश्य बदलता नहीं है। उसका उद्देश्य है कि वह मनुष्य के भीतर परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं, और मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा का काम करे; दूसरे शब्दों में, उसका उद्देश्य है कि मनुष्य के भीतर वह सब कुछ किया जाए जिसके विषय में परमेश्वर विश्वास करता है कि ये उसके चरणों के अनुसार रचनात्मक हैं, उसका उद्देश्य है कि मनुष्य को सक्षम बनाया जाए ताकि वह परमेश्वर के हृदय को समझे और परमेश्वर की हस्ती को बूझे, और उसे अनुमति दिया जाए ताकि वह परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों को माने, और इस प्रकार मनुष्य को अनुमति दिया जाए कि वह परमेश्वर के भय और बुराई के परित्याग को हासिल करे—जो भी वह करता है उसमें यह सब परमेश्वर के उद्देश्य का एक पहलु है। दूसरा पहलु यह है कि, क्योंकि शैतान एक महीन परत है और परमेश्वर के कार्य में एक मोहरा है, इसलिए मनुष्य को अकसर शैतान को दे दिया जाता है; यह वह साधन है जिसे परमेश्वर उपयोग करता है ताकि शैतान की परीक्षाओं एवं हमलों के बीच लोगों को शैतान की दुष्टता, कुरूपता एवं घिनौनेपन को देखने की अनुमति दे, इस प्रकार लोग शैतान से घृणा करने लग जाते हैं और उसे पहचान जाते हैं जो नकारात्मकता है। यह प्रक्रिया उन्हें अनुमति देती है कि वे धीरे धीरे स्वयं को शैतान के नियन्त्रण से, और शैतान के आरोपों, हस्तक्षेप एवं आक्रमणों से स्वतन्त्र करें—जब तक, परमेश्वर के वचन के कारण, परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान एवं आज्ञाकारिता के कारण, और परमेश्वर में उनके विश्वास एवं भय के कारण, वे शैतान के हमलों के ऊपर विजय न पा लें, और शैतान के आरोपों के ऊपर विजय न पा लें; केवल तभी उन्हें पूरी तरह से शैतान के प्रभुत्व से छुड़ा लिया जाएगा। लोगों के छुटकारे का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे आगे से शैतान के मुंह का भोजन नहीं हैं—उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। यह इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग सच्चे हैं, क्योंकि उनके पास विश्वास, आज्ञाकारिता एवं परमेश्वर के प्रति भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को डरपोक बना देते हैं, और वे पूरी तरह से शैतान को हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनकी आस्था ने, और परमेश्वर के भय एवं आज्ञाकारिता ने शैतान को हरा दिया है, और शैतान को पूरी तरह से उन्हें छोड़ देने के लिए मजबूर किया है। केवल ऐसे ही लोगों को सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किया गया है, और मनुष्य को बचाने के लिए यही परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे उद्धार पाने की इच्छा करते हैं, और यह कामना करते हैं कि उन्हें पूरी तरह से परमेश्वर के द्वारा हासिल किया जाए, तो वे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें शैतान की परीक्षाओं और बड़े एवं छोड़े हमलों का सामना करना होगा। ऐसे लोग जो इन परीक्षाओं एवं आक्रमणों से उभरकर निकलेंगे और जो शैतान को पूरी तरह से हराने में समर्थ हैं वे ही ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया गया है। कहने का तात्पर्य है, वे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से होकर गुज़रे हैं, शैतान के द्वारा अनगिनित बार जिनकी परीक्षा ली गई और जिन पर आक्रमण किया गया है। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए परमेश्वर की समझ के लिए और परमेश्वर की इच्छा के लिए और अपेक्षाओं के लिए बचाया गया है, जो चुपचाप परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है वे ईमानदारी को धारण करते हैं, वे दयालु हैं, वे प्रेम एवं घृणा के बीच अन्तर करते हैं, उनके पास न्याय का एहसास है और वे न्यायसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह करने और वह सब संजोकर रखने के योग्य हैं जो परमेश्वर की और से है। ऐसे लोगों को शैतान के द्वारा बांधा नहीं गया है, उनकी जासूसी नहीं की गई है, उन पर दोष नहीं लगाया गया है, या उनका शोषण नहीं किया गया है, वे पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं, उन्हें पूरी तरह से छुड़ाया एवं मुक्त किया गया है। अय्यूब स्वतन्त्रता का मात्र ऐसा ही एक मनुष्य था, और परमेश्वर ने किस लिए उसे शैतान को सौंप दिया था यह निश्चित रूप से उसका महत्व है।

…………

मनुष्य के लिए अपने स्थायी प्रावधान एवं आपूर्ति के कार्य के दौरान, परमेश्वर मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इच्छा एवं अपेक्षाओं को बताता है, और अपने कार्य, स्वभाव, एवं जो उसके पास है एवं जो वह है उन्हें मनुष्य को दिखता है। उद्देश्य यह है कि मनुष्य के डीलडौल को सुसज्जित किया जाए, और मनुष्य को अनुमति दिया जाए कि वह उसका अनुसरण करते हुए परमेश्वर से विभिन्न सच्चाईयों को हासिल करे—ऐसी सच्चाईयां जो हथियार हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिया गया है जिससे वह शैतान से लड़े। इस प्रकार से सुसज्जित होकर, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना करना होगा। परमेश्वर के पास मनुष्य को परखने के लिए कई माध्यम एवं बढ़िया मार्ग हैं, परन्तु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु अर्थात् शैतान के "सहयोग" की आवश्यकता है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य को हथियार देने के बाद जिससे वह शैतान से युद्ध करे, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को अनुमति देता है कि वह मनुष्य के डीलडौल को "परखे" यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचना को तोड़कर आज़ाद हो सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया होगा होगा। परन्तु यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचना को छोड़कर जाने में असफल हो जाता है, और शैतान के आधीन हो जाता है, तो उसने उस परीक्षण को उत्तीर्ण नहीं किया होगा। परमेश्वर मनुष्य के किसी भी पहलु की जांच कर ले, उसकी जांच का मापदंड है कि मनुष्य अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर रहता है या नहीं जब शैतान के द्वारा उस पर आक्रमण किया जाता है, और उसने परमेश्वर को छोड़ा है या नहीं और शैतान की घेराबंदी के समय शैतान के प्रति समर्पित एवं अधीन हुआ है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर होता है कि वह शैतान पर विजय प्राप्त करके उसे हरा सकता है या नहीं, और वह स्वतन्त्रता हासिल कर सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर होता है कि वह शैतान के बन्धनों पर विजय प्राप्त करने के लिए, एवं शैतान से आशा का त्याग करवाने एवं उसे अकेला छोड़ने के लिए मजबूर करने हेतु अपने स्वयं के हथियारों को उठा सकता है या नहीं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उसे दिया गया था। यदि शैतान आशा को त्याग देता है और किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने के लिए फिर कभी कोशिश नहीं करेगा, वह इस व्यक्ति पर फिर कभी दोष नहीं लगाएगा और हस्तक्षेप नहीं करेगा, वह फिर कभी मनमर्जी तरीके से उसको प्रताड़ित नहीं करेगा या उस पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस प्रकार के व्यक्ति को ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किया जाएगा। यही वह सम्पूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को हासिल करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से

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