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IX भ्रष्ट मनुष्यों के शैतानी स्वभाव और उनके सार को प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

IX भ्रष्ट मनुष्यों के शैतानी स्वभाव और उनके सार को प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

1. परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और सामान्य मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और विवेक का प्रकटीकरण है, और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका विवेक अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जैसे परमेश्वर के हृदय के अनुकूल होना है। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "सामान्य समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के प्रति तड़प रखना, परमेश्वर के प्रति साफ़ समझ रखना, और परमेश्वर के प्रति विवेक रखना, यह परमेश्वर के प्रति एक हृदय और मन होना दर्शाता है, और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। जिन लोगों की समझ धर्मभ्रष्ट हो चुकी है वे ऐसे नहीं हैं। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही नहीं। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, उसकी आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, और सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ अनैतिक होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता का पछतावा करने के अयोग्य हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; लोग जितने अधिक परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं, लेकिन अपने आप को नहीं जानते, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

2. मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद विवेक, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और कुछ भी नहीं है; यदि मनुष्य का विवेक और समझ सामान्य होने के योग्य हो पाएँ, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि मनुष्य का विवेक हमेशा बेसुध रहा है, मनुष्य की समझ कभी भी सही नहीं रही, और लगातार मंद होती गई है कि मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना रहा, इस हद तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अंतिम दिनों के देहधारी परमेश्वर को अपने घर में प्रवेश देने से इंकार कर दिया, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर का देह उसे घृणित और नीच दिखता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता। यदि उसे थोड़ी-सी भी समझ होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसमें थोड़ा-सा भी विवेक होता, तो वह देहधारी परमेश्वर के साथ इस ढंग से इतना "आभारी" न होता। मनुष्य परमेश्वर के देह बनने के युग में जीता है, फिर भी वह एक अच्छा अवसर दिये जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने की बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में होता है और इससे ऊबा हुआ है। इसकी परवाह किये बिना कि मनुष्य परमेश्वर के आने के प्रति कैसा व्यवहार करता है, परमेश्वर ने, संक्षेप में, बिना इसकी परवाह किये अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागत करने वाला रुख़ नहीं रखा है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंद हो गई है, और उसका विवेक दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और मनुष्य के मौलिक विवेक का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था। मनुष्य मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के द्वारा बहुत अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान किये जाने के लिए न केवल एहसानमंद नहीं है, बल्कि परमेश्वर के द्वारा उसे सत्य दिए जाने पर वह आक्रोश में भी है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रूचि नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर के प्रति आक्रोश में है। मनुष्य न सिर्फ देहधारी परमेश्वर के लिए अपनी जान देने के नाकाबिल है, बल्कि वह उससे उपकार हासिल करने की कोशिश करता रहता है, और परमेश्वर से ऐसी माँगें करता है जो उससे दर्जनों गुना बड़ी हैं जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। ऐसे विवेक और समझ के लोग इसे दिया हुआ मानते हैं, और फिर भी ऐसा मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत अधिक खर्च किया है, और परमेश्वर ने उन्हें बहुत थोड़ा दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे सिर्फ एक कटोरा पानी ही दिया है फिर भी अपने हाथ पसार कर माँग दो कटोरे दूध के बराबर की करते हैं,[क] या मुझे एक रात के लिए कमरा दिया है परन्तु मुझ से निवास-स्थान के शुल्क के रूप में कई गुना दाम वसूलते हैं। ऐसी मानवता, और ऐसे विवेक के साथ, कैसे तू अब भी जीवन पाने की कामना कर सकता है? तू कितना घृणित अभागा है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

3. भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य बेसुध और मूर्ख बन गया है, एक दुष्ट आत्मा जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज हो गई है, और यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही स्वभाव का पूरा लेखा देने के अयोग्य है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है और वह नहीं जानता कि कहाँ मुड़ना है। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है: जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, तो वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख सकता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव भी किया है, फिर भी उसे धोखा देते हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल कार्य को खो दिया है, और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी, अपने मूल कार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, मेरी आँखों के सामने वह कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच में, सत्य और असत्य के बीच में अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ इतनी सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशीषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? एक ऐसी मानवता के साथ, कैसे वह सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कोई शर्म नहीं है! वह नीच ढोंगी है! तुम सब जो आशीषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले शीशे में अपना बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशीषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक बेहतरीन कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

4. वे घातक प्रभाव जो हज़ारों वर्षो की "राष्ट्रवाद की अभिमानी आत्मा" द्वारा मनुष्य के हृदय की गहराई में छोड़े गए तथा सामंती विचारधारा जिसके द्वारा लोग बिना स्वतंत्रता के, महत्वकांक्षा रखने और आगे बढ़ने की इच्छा के बिना, प्रगति करने की अभिलाषा के बिना, बल्कि निष्क्रिय रहने और पीछे की ओर जाने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बंधे और जकड़े हुए हैं, इत्यादि इन वास्तविक कारणों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट मलिनता और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य अंधकार के आतंकी जगत में जी रहे हैं, उनमें से कोई भी इस जगत के पार जाने के लिए प्रयास नहीं कर रहा है, और उनमें से कोई भी आदर्श जगत की ओर आगे बढ़ने के लिए नहीं सोच रहा है; बल्कि, वे अपने जीवन में बहुतायत से संतुष्ट हैं, अपने दिनों को बच्चे जनने और उनके पालन-पोषण में, झगड़ने में, पसीना बहाने में, और अपने कामों में जाने में व्यय करते हैं; शांति से अपने जीवन को जीते हुए आरामदायक और आनंदमय परिवार, वैवाहिक स्नेह, अपने बच्चों के बारे में अपने अपने अंत के वर्षों में आनंद के सपने देखते हैं...। इसकी अपेक्षा कि अपने सिद्ध जीवन का निर्माण करें, दसियों, हज़ारों, लाखों वर्षों से अभी तक, लोग इसी तरह से समय को व्यर्थ कर रहे हैं, सभी प्रतिष्ठा और संपत्ति की दौड़ में, और एक दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में, इस अंधकारपूर्ण जगत में केवल एक दूसरे की हत्या काइरादा रखते हैं। क्या किसी ने कभी परमेश्वर की इच्छा को ढूंढा है? क्या कभी किसी ने परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लम्बे अर्से से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानवीय स्वभाव बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना कठिन हो गया है, और यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने उन्हें आज सौंपा है उसपर लोग ध्यान भी देना नहीं चाहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (3)" से उद्धृत

5. मनुष्य का स्वभाव मेरे सार से पूर्णतः भिन्न है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति पूरी तरह से शैतान से उत्पन्न होती है और मनुष्य की प्रकृति को शैतान द्वारा संसाधित और भ्रष्ट किया गया है। अर्थात्, मनुष्य अपनी बुराई और कुरूपता के प्रभाव के अधीन जीवित रहता है। मनुष्य सच्चाई या पवित्र वातावरण की दुनिया में बड़ा नहीं होता है, और इसके अलावा प्रकाश में नहीं रहता है। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के भीतर सत्य सहज रूप से निहित हो, यह संभव नहीं है, और इसके अलावा वे परमेश्वर के भय, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के सार के साथ पैदा नहीं हो सकते हैं। इसके विपरीत, वे एक ऐसी प्रकृति से युक्त होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है, परमेश्वर की अवज्ञा करती है, और जिसमें सच्चाई के लिए कोई प्यार नहीं होता है। यही प्रकृति वह समस्या है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ—विश्वासघात।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (2)" से उद्धृत

6. मानव जाति का अस्तित्व बारी-बारी से आत्मा के देहधारण पर प्रतिपादित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति अपने आत्मा के देहधारण करने पर देह का मानव जीवन प्राप्त करता है। एक व्यक्ति की देह का जन्म होने के बाद, जब तक देह की उच्चतम सीमा नहीं आ जाती है तब तक वह जीवन जारी रहता है, अर्थात्, अंतिम क्षण तक जब आत्मा अपना आवरण छोड़ देता है। व्यक्ति की आत्मा के आने और जाने, आने और जाने के साथ यह प्रक्रिया बार-बार दोहरायी जाती है, इस प्रकार समस्त मानवजाति का अस्तित्व बना रहता है। शरीर का जीवन मनुष्य के आत्मा का भी जीवन है, और मनुष्य का आत्मा मनुष्य के शरीर के अस्तित्व को सहारा देता है। अर्थात्, प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उसकी आत्मा से आता है; यह उनका शरीर नहीं है जिसमें मूल रूप से जीवन था। इसलिए, मनुष्य की प्रकृति उसकी आत्मा से आती है, न कि उसके शरीर से। केवल प्रत्येक व्यक्ति का आत्मा ही जानता है कि कैसे उसने शैतान के प्रलोभनों, यातना और भ्रष्टता को सहा है। मनुष्य का शरीर यह नहीं जान सकता है। तदनुसार, मानवजाति अनिच्छापूर्वक उत्तरोत्तर गंदी, बुरी और अंधकारमय बनती जा रही है, जबकि मेरे और मनुष्य के बीच की दूरी अधिक से अधिक बढ़ती जा रही है, और मानवजाति के दिन और अधिक अंधकारमय होते जाते हैं। मानवजाति के आत्माएँ शैतान की मुट्ठी में हैं। वैसे तो, कहने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य के शरीर पर भी शैतान द्वारा कब्जा कर लिया गया है। कैसे इस तरह का शरीर और इस तरह के मानव परमेश्वर का विरोध नहीं कर सकते हैं और उसके साथ सहज अनुकूल नहीं हो सकते हैं? मेरे द्वारा शैतान को हवा में बहिष्कृत इस कारण से किया गया था क्योंकि इसने मेरे साथ विश्वासघात किया था, तो मनुष्य स्वयं को इसके प्रतिप्रभावों से कैसे मुक्त कर सकते हैं? यही कारण है कि मानव की प्रकृति विश्वासघात की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (2)" से उद्धृत

7. ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है विश्वासघात है। मेरे साथ छल करना और मेरे साथ धोखा करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। मतों से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं करना विश्वासघात है। जब कोई मुझे अपने दिल में से त्याग देता है तो झूठा मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी व्यवहार ऐसी चीजें हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम होते हो, और ये तुम लोगों के बीच आम भी हैं। तुम लोगों में से कोई भी नहीं सोच सकता है कि यह एक समस्या है, लेकिन यह ऐसा नहीं है जैसा मैं सोचता हूँ। मैं अपने साथ विश्वासघात किए जाने को एक तुच्छ बात के रूप में नहीं मान सकता हूँ, और इसके अलावा, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता हूँ। मैं अब तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, लेकिन तुम लोग अभी भी इसी तरह से हो। यदि किसी दिन तुम लोगों की देखभाल या निगरानी करने के लिए वहाँ कोई न हो, तो क्या तुम सभी लोग पहाड़ी के राजा नहीं बन जाओगे?[ख] तब तक, तुम्हारे बाद उस गंदगी को कौन साफ करेगा जब तुम विनाश का कारण बनते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (1)" से उद्धृत

8. इसे भाग्य पर मत छोड़ दो कि तुम लोगों की विश्वासघात की प्रकृति नहीं है सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम लोगों ने किसी के साथ गलत नहीं किया है। यदि तुम ऐसा ही सोचते हो तो तुम बहुत बगावती हो। हर बार जो वचन मैंने बोलें हैं वे सभी लोगों पर लक्षित हैं, न कि केवल एक व्यक्ति या एक प्रकार के व्यक्ति पर। सिर्फ इसलिए कि तुमने मेरे साथ एक चीज पर विश्वासघात नहीं किया है, यह साबित नहीं करता कि तुम मेरे साथ किसी भी अन्य चीज पर विश्वासघात नहीं कर सकते हो। कुछ लोग अपने विवाह में असफलताओं के दौरान सत्य की तलाश करने में अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। कुछ लोग परिवार के टूटने के दौरान मेरे प्रति निष्ठावान होने के अपने दायित्व को त्याग देते हैं। कुछ लोग खुशी और उत्तेजना के एक पल की तलाश करने के लिए मेरा परित्याग कर देते हैं। कुछ लोग प्रकाश में रहने और पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद प्राप्त प्राप्त करने के बजाय एक अंधेरी खोह में पड़े रहेंगे। कुछ लोग धन की अपनी लालसा को संतुष्ट करने के लिए दोस्तों की सलाह पर ध्यान नहीं देते हैं, और अब भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और स्वयं में बदलाव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग मेरा संरक्षण प्राप्त करने के लिए केवल अस्थायी रूप से मेरे नाम के अधीन रहते हैं, जबकि अन्य लोग केवल थोड़ा-सा ही समर्पित होते हैं क्योंकि वे जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं। क्या ये और अन्य अनैतिक और इसके अलावा अशोभनीय कार्य केवल ऐसे व्यवहार नहीं हैं जिनसे लोग लंबे समय से अपने दिलों की गहराई में मेरे साथ विश्वासघात करते आ रहे हैं? निस्संदेह, मुझे पता है कि लोगों का विश्वासघात पहले से योजनाबद्ध नहीं था, लेकिन यह उनकी प्रकृति का स्वाभाविक रूप से प्रकट होना है। कोई मेरे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहता है, और इसके अलावा कोई भी खुश नहीं है क्योंकि कि उन्होंने मेरे साथ विश्वासघात करने के लिए जैसा कुछ किया है। इसके विपरीत, वे डर से काँप रहे हैं, है ना? तो क्या तुम लोग इस बारे में सोच रहे हो कि तुम लोग इन विश्वासघातों से कैसे छुटकारा पा सकते हो, और कैसे तुम लोग वर्तमान परिस्थिति को बदल सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (1)" से उद्धृत

9. शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई सभी आत्माएँ शैतान के अधिकार क्षेत्र के नियंत्रण में हैं। केवल वे लोग जो मसीह में विश्वास करते हैं, शैतान के शिविर से बचा कर, अलग कर दिए गए हैं, और आज के राज्य में लाए गए हैं। अब ये लोग शैतान के प्रभाव में नहीं रहते हैं। फिर भी, मनुष्य की प्रकृति अभी भी मनुष्य के शरीर में जड़ जमाए हुए है। कहने का अर्थ है कि भले ही तुम लोगों की आत्माएँ बचा ली गई हैं, किंतु तुम लोगों की प्रकृति अभी भी पुरानी दिखायी देती है और इस बात की—सौ प्रतिशत संभावना रहती है कि तुम लोग मेरे साथ विश्वासघात करोगे। यही कारण है कि मेरा कार्य इतने लंबे समय तक चलने वाला है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति अति अविचल है। अब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में उतना अधिक पीड़ित हो रहे हो जितना तुम हो सकते हो, लेकिन एक अखण्डनीय तथ्य यह है: तुम लोगों में से प्रत्येक मुझे धोखा देने और शैतान के अधिकार क्षेत्र, उसके शिविर में लौटने, और अपने पुराने जीवन में वापस जाने में सक्षम है। उस समय तुम लोगों के पास लेशमात्र मानवता या इंसान का रूप-रंग, जैसा कि अभी तुम्हारे पास है, होना संभव नहीं होगा। गंभीर मामलों में, तुम लोगों को नष्ट कर दिया जाएगा और इसके अलावा तुम लोगों को, फिर कभी भी देहधारण नहीं करने, बल्कि गंभीर रूप से दंडित करने के लिए, अनंतकाल तक के लिए अभिशप्त कर दिया जाएगा। यह तुम लोगों के सामने डाली गई समस्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (2)" से उद्धृत

10. तुम लोग कीचड़ से अलग किये गए थे और हर हाल में, तुम सब मैल में से चुने गए थे, गंदे और परमेश्वर द्वारा घृणित थे। तुम लोग शैतान के थे[ग] और एक बार उसके द्वारा कुचले और दूषित किये गये थे। इसीलिए यह कहा जाता है कि तुम सब कीचड़ से अलग किये गए थे, और तुम लोग पवित्र नहीं हो, बल्कि तुम सभी वे गैर-मानव वस्तुएँ हो जिनमें से शैतान ने काफी समय से मूर्ख बनाये थे। यह तुम सब के लिए सबसे उपयुक्त वर्णन है। तुम्हें एहसास होना चाहिए कि तुम सब रुके हुए पानी और कीचड़ में पाई जाने वाली गन्दगी हो, मछली और चिंराट जैसी वांछनीय पकड़ के विपरीत, क्योंकि तुम सब से कोई आनंद नहीं मिल सकता है। इसे साफ़-साफ़ कहें तो, तुम लोग सबसे हीन सामाजिक वर्ग के सदस्य हो, सूअरों और कुत्तों से भी बदतर जानवर हो। सच कहूँ तो, तुम सब को इस तरह से संबोधित करना अतिरेक या अतिशयोक्ति नहीं हैं, बल्कि यह इस मुद्दे को सरल बनाने का एक तरीका है। तुम सभी को ऐसे शब्दों में संबोधित करना वास्तव में तुम्हें सम्मान देने का एक तरीका है। तुम लोगों की अंतर्दृष्टि, बोलचाल, मनुष्यों के रूप में आचरण और तुम्हारी ज़िंदगी की सभी चीज़ें—कीचड़ में तुम्हारी स्थिति सहित—यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम लोगों की पहचान "असाधारण" है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य की निहित पहचान और उसका मूल्य: ये क्या हैं?" से उद्धृत

11. मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं है, अपनी सम्पत्ति को परमेश्वर के लिए खर्च करने का इच्छुक नहीं है, और परमेश्वर के लिए जीवन-भर के प्रयास समर्पित करने के लिए तैयार नहीं है, और इसके बजाय कहता है कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया, परमेश्वर के बारे में बहुत अधिक मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता। ऐसी मानवता के साथ, यद्यपि तुम सब अपने प्रयासों में उदार भी होते तो भी तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाते, इस तथ्य के बारे में तो क्या कहा जाए कि परमेश्वर को नहीं खोजते हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम सब मानवजाति के दोषपूर्ण उत्पाद हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की मानवता से ज़्यादा नीच और कोई मानवता नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की "आदरसूचक पदवी" क्या है? जो लोग सच में परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे तुम लोगों को भेड़िये का पिता, भेड़िये की माता, भेड़िये का पुत्र, और भेड़िये का पोता कह कर बुलाते हैं; तुम सब भेड़िये के वंशज हो, भेड़िये के लोग हो, और तुम लोगों को अपनी पहचान जाननी चाहिए और उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। यह न सोचो कि तुम लोग कोई श्रेष्ठ हस्ती हो: तुम सब मानवजाति के मध्य गैर-मनुष्यों का सबसे अधिक क्रूर झुंड हो। क्या तुम्हें इसमें से कुछ नहीं पता? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम सबके मध्य में कार्य करने के लिए मैंने कितना जोखिम उठाया है? यदि तुम सबकी समझ वापस सामान्य नहीं हो सकती, और तुम सबका विवेक सामान्य रूप से कार्य नहीं कर सकता, तो फिर तुम सब कभी भी "भेड़िये" की पदवी से मुक्त नहीं हो पाओगे, तुम सब कभी भी श्राप के दिन से बच नहीं पाओगे, अपनी सजा के दिन से कभी बच नहीं पाओगे। तुम सब हीन जन्मे थे, जिसका कोई मूल्य नहीं है। तुम सब अंदर से भूखे भेड़ियों का झुंड, मलबे और कचरे का एक ढेर हो, और, तुम सबकी तरह, मैं तुम लोगों के ऊपर एहसान पाने के लिए कार्य नहीं करता, बल्कि इसलिए कि कार्य की आवश्यकता है। यदि तुम सब इसी ढंग से विद्रोही बने रहोगे, तो मैं अपना कार्य रोक दूँगा, और फिर दोबारा तुम लोगों पर कभी कार्य नहीं करूँगा; बल्कि मैं अपना कार्य दूसरे झुंड पर स्थानांतरित कर दूँगा जो मुझे प्रसन्न करता है, और इस तरह से मैं तुम सबको हमेशा के लिए छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं उन पर नजर रखने के लिए तैयार नहीं हूँ जो मेरे साथ शत्रुता रखते हैं। तो फिर, क्या तुम सब मेरे अनुरूप बनने की कामना करते हो, या मेरे विरुद्ध शत्रुता रखने की?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

12. मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा और कुछ नहीं है। मानवजाति ऐसी दुष्ट है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मानवजाति उस प्रधान दूत के वंशज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानवजाति उस शैतान की विरासत के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया और हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है। मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की जगमगाहट के बिना, झुका हुआ, उदास और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, कुछ इस तरह कि उसमें रहने वाला कोई व्यक्ति अपने चेहरे के सामने फैले हाथ को या अपना सिर उठाने पर सूरज को भी नहीं देख सकता है। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं जबकि ठण्डे और छाया वाले कोनों में दुष्टात्माओं की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। मनुष्यों के संसार में हर कहीं, दुष्टात्माएँ जत्थों में आती-जाती रहती हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गन्दगी से ढकी हुई संतानें भीषण संघर्ष में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज़ दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समयों में, इस तरह के संसार में, एक ऐसे "सांसारिक स्वर्ग" में, कोई व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जाता है? अपने जीवन की मंजिल की खोज करने के लिए कोई कहाँ जाएगा? मानवजाति, जो बहुत पहले से शैतान के पैरों के नीचे रौंद दी गयी है, शुरू से ही शैतान की छवि लिये एक अभिनेता—उससे भी अधिक, शैतान का मूर्त रूप रही है, जो उस साक्ष्य का काम कर रही है "जो जोरदार तरीके से और स्पष्ट रूप से शैतान की गवाही देती है"। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों की झुंड और इस भ्रष्ट मानव परिवार की ऐसी संतान, कैसे परमेश्वर की गवाही दे सकती है? मेरी महिमा कहाँ से आती है? कोई मेरी गवाही के बारे में बोलना कहाँ से शुरू कर सकता है? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मानवजाति को भ्रष्ट करके मेरे विरोध में खड़ा है, पहले ही मानवजाति को दबोच लिया है—उस मानवजाति को जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था, जो मेरी महिमा और मेरे जीवन से भरी थी—और उसे दूषित कर दिया है। इसने मेरी महिमा को छीन लिया है और इसने मनुष्य को जिस चीज़ से भर दिया है वह शैतान की कुरूपता की मिलावट वाला ज़हर, और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है" से उद्धृत

13. "स्वर्ग में, शैतान मेरा वैरी है, पृथ्वी पर, मनुष्य मेरा शत्रु है। स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संयोजन की वजह से, उनकी नौ पीढ़ियों को संगत के कारण दोषी माना जाना चाहिए।" शैतान परमेश्वर का दुश्मन है; मेरे इस प्रकार कहने का कारण यह है कि वह परमेश्वर के महान अनुग्रह और दया का ऋण नहीं चुकाता बल्कि "धारा के विपरीत पतवार चलाता है" और ऐसा करते हुए वह परमेश्वर के प्रति अपने "संतानोचित धर्म" को पूरा नहीं करता है। क्या लोग भी इस तरह से ही नहीं हैं? वे अपने "माता-पिता" के प्रति कोई संतानोचित सम्मान नहीं दिखाते और अपने "माता-पिता" से मिले पोषण और समर्थन को कभी नहीं लौटाते हैं। यह इसे दिखाने के लिए पर्याप्त है कि पृथ्वी के लोग स्वर्ग-स्थित शैतान के रिश्तेदार हैं। मनुष्य और शैतान परमेश्वर के प्रति एक ही दिल और दिमाग के हैं, और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने नौ पीढ़ियों को संगत द्वारा दोषी ठहराया और शायद किसी को भी क्षमा नहीं किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 38" से उद्धृत

14. एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता है कि परमेश्वर अपने लोगों को बचाने के लिए नहीं बुलाता है जो झपकी ले रहे हैं, किन्तु वे सभी सुस्ती की स्थिति में हैं मानो कि उन्होंने नींद की गोलियाँ ले ली हों। यदि वह उन्हें एक पल के लिए उठाता नहीं है, तो वे बिना किसी होश के, अपनी नींद की अवस्था मैं लौट जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उसके सभी लोगों को दो तिहाई लकवा मार गया है। उन्हें अपनी आवश्यकताओं या अपनी स्वयं की कमियों का पता नहीं है, या यहाँ तक कि यह भी नहीं पता है कि उन्हें क्या पहनना चाहिए या क्या खाना चाहिए। इससे पता चलता है कि बड़े लाल अजगर ने लोगों को भ्रष्ट करने के लिए काफी प्रयास किए हैं। इसकी कुरूपता चीन के हर क्षेत्र में फैली हुई है। इसने लोगों को परेशान भी कर दिया है और उन्हें इस पतनोन्मुख, अश्लील देश में अब और ठहरने का अनिच्छुक बना दिया है। परमेश्वर जिससे सर्वाधिक नफ़रत करता है वह है बड़े लाल अजगर का सार, यही वजह है कि वह लोगों को हर दिन अपने कोप में याद दिलाता है, और लोग हर दिन उसके कोप की नज़र के नीचे रहते हैं। फिर भी, अधिकांश लोग अभी भी परमेश्वर को तलाशना नहीं जानते हैं, किन्तु वे सिर्फ वहाँ बैठे हुए देखते रहते हैं और हाथ से खिलाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं। भले ही वे भूख से मर रहे होंगे, तब भी वे अपना स्वयं का भोजन खोजने के लिए तैयार नहीं होंगे। लोगों के विवेक को बहुत पहले ही शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था और हृदयहीन होने के लिए सार रूप से बदल दिया गया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने कहा था कि: "यदि मैंने तुम लोगों को प्रेरित नहीं किया होता तो तुम अभी भी जागृत नहीं होते, बल्कि ऐसे रहे होते मानो जमे होने की अवस्था में हो, और फिर से, मानो शीतनिद्रा में हो।" यह ऐसा है मानो कि लोग शीतनिद्रा में पड़े जानवरों की तरह थे जो सर्दियाँ गुज़ार रहे थे और खाने या पीने के लिए नहीं माँगते थे; यह वास्तव में परमेश्वर के लोगों की वर्तमान स्थिति है, यही वजह है कि परमेश्वर केवल लोगों से प्रकाश में देहधारी परमेश्वर स्वयं को जानने की अपेक्षा करता है। उसकी लोगों से बहुत अधिक बदलने या उनके जीवन में बहुत अधिक बढ़ोतरी करने की अपेक्षा नहीं है। यह गंदे, कुत्सित बड़े लाल अजगर को पराजित करने, और फलस्वरूप परमेश्वर की महान सामर्थ्य को बेहतर रूप से अभिव्यक्त करने के लिए पर्याप्त होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 13" से उद्धृत

15. जब मेरा कार्य समाप्त हो जाएगा, तो मैं मनुष्य से और "राहत निधि" की माँग नहीं करूँगा; बल्कि मैं अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा करूँगा, और "अपने घर की तमाम चीज़ों" को सभी लोगों के सुख के लिए नीचे ले आऊँगा। आज, मेरे परीक्षणों के बीच हर किसी की परीक्षा ली जा रही है। जब मेरा हाथ औपचारिक रूप से मनुष्यों के बीच आ जाएगा, तो लोग फिर मुझे प्रशंसा भरी आँखों से नहीं देखेंगे, बल्कि मुझ से नफरत के साथ व्यवहार करेंगे, और इस समय उनके दिलों को तुरंत मेरे द्वारा एक नमूने के रूप में काम में लाने के लिए बाहर निकाल दिया जाएगा। मैं "सूक्ष्मदर्शी यंत्र" के नीचे मनुष्य के दिल की छानबीन करता हूँ—वहाँ मेरे लिए कोई सच्चा प्यार नहीं है। सालों से लोग मुझे धोखा दे रहे हैं और मुझे बेवकूफ बना रहे हैं—यह पता चलता है कि उनके बाएँ आलिंद और दाहिने निलय दोनों में मेरे प्रति नफरत का विष होता है, और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उनके प्रति मेरा दृष्टिकोण ऐसा है। और फिर भी वे इसके बारे में पूरी तरह से अनजान बने रहते हैं, और वे इसे स्वीकार भी नहीं करते हैं। जब मैं उन्हें अपनी जाँच के परिणाम दिखाता हूँ, तब भी वे जागृत नहीं होते; ऐसा लगता है कि, उनके दिमाग में, ये सभी मामले अतीत के हैं, और उन्हें आज फिर से सामने नहीं लाया जाना चाहिए। इस प्रकार, लोग सिर्फ उदासीनता के साथ "प्रयोगशाला के परिणाम" को देखते हैं। वे स्प्रेडशीट (दस्तावेज) को वापस कर देते हैं और चल देते हैं। इसके अलावा, वे कहते हैं, "ये महत्वपूर्ण नहीं हैं, मेरे स्वास्थ्य पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।" वे अवमानना की एक छोटी मुस्कुराहट देते हैं, और फिर उनकी आँखों में थोड़ी धमकी-सी दिखती है, जैसे कि कह रही हों कि मुझे इतना सरल नहीं होना चाहिए, कि मुझे और अधिक यंत्रवत होना चाहिए। ऐसा लगता है कि उनके भीतर के रहस्यों का मेरे द्वारा किये गए प्रकटीकरण ने मनुष्यों के "नियमों" का उल्लंघन कर दिया है, और इसलिए वे मेरे प्रति अधिक घृणापूर्ण हो जाते हैं। तभी मैं लोगों की घृणा का स्रोत देखता हूँ। इसका कारण यह है कि जब मैं देख रहा होता हूँ, उनका खून बहता रहता है, और उनके शरीर में धमनियों से गुजरने के बाद वह उनके हृदय में प्रवेश करता है, और केवल इस समय मेरे पास एक नई "खोज" होती है। फिर भी लोग इस बारे में कुछ भी नहीं सोचते हैं। वे पूरी तरह से लापरवाह होते हैं, वे अपने पाने या खोने के बारे में बिलकुल नहीं सोचते हैं, जो उनकी "निस्वार्थ" भक्ति की भावना को दिखाने के लिए पर्याप्त है। वे अपने स्वास्थ्य की हालत पर कोई विचार नहीं करते हैं, और मेरे लिए "भागते-दौड़ते" हैं। यह उनकी "वफ़ादारी" भी है, और जो उनके बारे में "सराहनीय" है, इसलिए मैं एक बार फिर उनको "प्रशंसा" का एक पत्र भेजता हूँ, ताकि उन्हें इससे खुश किया जा सके। लेकिन जब वे इस "पत्र" को पढ़ते हैं, तो वे तुरंत कुछ चिड़चिड़ाहट महसूस करते हैं, क्योंकि वे जो भी करते हैं वह मेरे मूक पत्र द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है। जैसे-जैसे लोग कार्य करते हैं, मैंने हमेशा उन्हें निर्देशित किया है, फिर भी ऐसा लगता है कि वे मेरे वचनों से घृणा करते हैं; इस प्रकार, जैसे ही मैं अपना मुंह खोलता हूँ, वे अपनी आँखें मूँद लेते हैं और कानों पर अपने हाथ रख देते हैं। मेरे प्रेम की खातिर वे मुझे सम्मान से नहीं देखते, बल्कि उन्होंने हमेशा मुझसे नफरत की है, क्योंकि मैंने उनकी कमियों को इंगित किया, उनके पास रही सभी चीजों को उजागर किया, और इस तरह उन्होंने अपने व्यापार में नुकसान उठाया, और अपनी जीविका खो दी। इस प्रकार, तब से मेरे लिए उनकी नफरत बढ़ती जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 32" से उद्धृत

16. मानवजाति की प्रकृति है ऐसी है कि यदि यदि लेशमात्र भी आशा बची रहती है तो वे सहायता के लिए परमेश्वर के पास नहीं जाएँगे, बल्कि प्राकृतिक उत्तरजीविता के आत्मनिर्भर तरीके अपनाएँगे। इसका कारण यह है कि मानवजाति की प्रकृति दंभी है, और वे हर किसी को तुच्छ समझते हैं। इसलिए, परमेश्वर ने कहा: "एक भी मनुष्य सुख में होने के समय मुझसे प्रेम करने में समर्थ नहीं है। एक भी व्यक्ति अपने शांति और आनंद के समय में नहीं पहुँचा है ताकि मैं उनकी खुशी में सहभागी हो सकूँ।" यह निस्संदेह निराशाजनक है: परमेश्वर ने मानवजाति बनाई, किन्तु जब वह मानव दुनिया में आता है, तो वे उसका विरोध करने की कोशिश करते हैं, उसे अपने इलाके से निकाल देते हैं, मानो कि वह कोई भटकता हुआ अनाथ हो, या दुनिया में एक राज्यविहीन व्यक्ति हो। कोई भी परमेश्वर से अनुरक्त महसूस नहीं करता है, कोई भी वास्तव में उसे प्यार नहीं करता है, किसी ने भी उसके आने का स्वागत नहीं किया है। इसके बजाय, जब वे परमेश्वर के आगमन को देखते हैं, तो उनके हर्षित चेहरे पलक झपकते ही उदास हो जाते हैं, मानो कि अचानक कोई तूफान आ रहा हो, मानो कि परमेश्वर उनके परिवार की खुशियों को छीन लेगा, मानो कि परमेश्वर ने मानवजाति को कभी भी आशीष नहीं दिया हो, बल्कि इसके बजाय मानवजाति को केवल दुर्भाग्य ही दिया हो। इसलिए, मानवजाति के मन में, परमेश्वर उनके लिए कोई वरदान नहीं है, बल्कि कोई ऐसा है जो हमेशा उन्हें शाप देता है; इसलिए, मानवजाति उस पर ध्यान नहीं देती है, वे उसका स्वागत नहीं करते हैं, वे उसके प्रति हमेशा उदासीन रहते हैं, और यह कभी भी नहीं बदला है। क्योंकि मानवजाति के हृदय में ये बातें हैं, इसलिए परमेश्वर कहता है कि मानवजाति अतर्कसंगत और अनैतिक है, और यहाँ तक कि उन भावनाओं को भी उनमें महसूस नहीं किया जा सकता है जिनसे मनुष्यों को सुसज्जित होना माना जा सकता है। मानवजाति परमेश्वर की भावनाओं के लिए कोई मान नहीं दिखाती है, किन्तु परमेश्वर से निपटने के लिए तथाकथित "धार्मिकता" का उपयोग करती है। मानवजाति कई वर्षों से इसी तरह की है और इस कारण से परमेश्वर ने कहा है कि उनका स्वभाव नहीं बदला है। यह दिखाता है कि उनके पास कुछ पंखों से अधिक सार नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 14" से उद्धृत

17. स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रातों की तरह काली अँधेरी ताकतों के उत्पीड़न और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर के भावुक हृदय और उसकी उत्कट आशाओं का प्रतिफल ठंडे दिलों के साथ, कठोर, उदासीन आँखों के साथ, लोगों की दोहराई जाने वाली प्रतिक्रियाओं और अपमानों के साथ, तीक्ष्ण आलोचना के साथ, उपहास, और अनादर के साथ दिया गया है, इनके बदले में मनुष्य का व्यंग, उसकी कुचलन और अस्वीकृति, उसकी गलतफहमी, उसका विलाप, मनो-मालिन्य, परिहार, उसके धोखे, हमले और उसकी कड़वाहट के अलावा अन्य कुछ भी नहीं मिला है। स्नेही शब्दों को मिली हैं उग्र भौंहें और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा। परमेश्वर केवल सिर झुका कर, लोगों की सेवा करते हुए एक अनुकूल बैल[2] की तरह सहन कर सकता है। कितने सूर्य और चन्द्रमा का उसने सामना किया है, कितनी बार सितारों का, कितनी बार वह भोर में निकल कर गोधूलि में लौटा है, छटपटाया है और करवटें बदलीं हैं, अपने पिता से विरह की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा को सहते हुए, मनुष्य के हमलों और तोड़-फोड़, और मनुष्य से निपटने और उसकी छंटाई करने को बर्दाश्त करते हुए। परमेश्वर की विनम्रता और अदृष्टता का प्रतिफल मनुष्य के पूर्वाग्रह[3] से चुकाया गया है, मनुष्य के अनुचित विचारों और व्यवहार के साथ, से और परमेश्वर की गुमनामी, तितिक्षा और सहिष्णुता का ऋण मनुष्य की लालची निगाह से चुकाया गया है; मनुष्य परमेश्वर को बिना किसी मलाल के, घसीट कर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन में कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया "अजीब चतुराई" का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा डराया-धमकाया गया है और जो घृणित है, हजारों लोगों के पैरों के नीचे कुचलकर निर्जीव कर दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं ऊंचा खड़ा होता है, जैसे कि वह किले का राजा हो, जैसे कि वह परदे के पीछे से अपना दरबार चलाने के लिए, सम्पूर्ण सत्ता हथियाना[4] चाहता हो, परमेश्वर को रंगमंच के पीछे एक नेक और नियम-बद्ध निदेशक बनाने के लिए, जिसे पलट कर लड़ने या मुश्किलें पैदा करने की अनुमति नहीं है; परमेश्वर को अंतिम सम्राट की भूमिका अदा करनी होगी, उसे हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] बनना होगा। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो कैसे वह परमेश्वर से यह या वह मांगने के योग्य है? वह कैसे परमेश्वर को सुझाव देने के योग्य है? वह कैसे यह माँग करने के योग्य है कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के साथ सहानुभूति रखे? वह कैसे परमेश्वर की दया पाने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने के योग्य है? उसकी अंतरात्मा कहाँ है? उसने बहुत पहले परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, एक लंबे समय से उसने परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया है। परमेश्वर उज्ज्वल आँखें और अदम्य उत्साह लिए मनुष्यों के बीच आया था, यह आशा करते हुए कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसकी गर्मजोशी थोड़ी-सी ही रही हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल के लिए मनुष्य का आश्वासन धीमा है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है वे केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातना हैं; मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतृप्त नहीं होगा, वह हमेशा शरारती और उजड्ड होता है, वह कभी भी परमेश्वर को बोलने की कोई आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा उसके साथ की गई मनमानी को स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई भी विकल्प नहीं छोड़ता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (9)" से उद्धृत

18. सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर ने इतनी पीड़ा सहन की है, और इतने सारे हमलों का सामना किया है। पर आज भी, मनुष्य परमेश्वर से अपनी माँगे कम नहीं करता है, वह आज भी परमेश्वर की जाँच-पड़ताल करता है, आज भी उसमें उसके प्रति कोई सहिष्णुता नहीं है, और उसे सलाह देने, आलोचना करने और अनुशासित करने के अलावा मनुष्य और कुछ भी नहीं करता है, जैसे कि उसे गहरा भय हो कि परमेश्वर भटक जाएगा, कि पृथ्वी पर परमेश्वर पाशविक और अनुचित है, या दंगा कर रहा है, या वह कुछ भी काम का न रह जाएगा। मनुष्य का परमेश्वर के प्रति हमेशा इस तरह का रवैया रहा है। यह कैसे परमेश्वर को दुखी नहीं करता? देह धारण करने में, परमेश्वर ने जबरदस्त वेदना और अपमान को सहन किया है; मनुष्य की शिक्षाओं को स्वीकार करने के लिये परमेश्वर की और कितनी दुर्गति होगी? मनुष्य के बीच उसके आगमन ने उसकी सारी स्वतंत्रता छीन ली है, जैसे कि उसे अधोलोक में बंदी बना लिया गया हो, और उसने मनुष्य के विश्लेषण को थोड़े-से भी प्रतिरोध के बिना स्वीकार कर लिया है। क्या यह शर्मनाक नहीं है? एक सामान्य व्यक्ति के परिवार के बीच आने में, यीशु ने सबसे बड़ा अन्याय सहन किया है। इससे भी अधिक अपमानजनक यह है कि वह इस धूल भरी दुनिया में आ गया है और उसने खुद को बहुत ही नीचे तक झुका लिया है, और अधिकतम सामान्यता का देह ग्रहण किया है। एक मामूली व्यक्ति बनने में, क्या सर्वोच्च परमेश्वर को मुश्किल नहीं भुगतनी पड़ती है? और क्या यह सब मानव जाति के लिए नहीं है? क्या किसी भी समय ऐसा हुआ जब वह खुद के लिए सोच रहा था? यहूदियों द्वारा खारिज कर दिये जाने और मार दिए जाने, और लोगों द्वारा उसका उपहास और तिरस्कार किये जाने के बाद उसने न तो कभी स्वर्ग में शिकायत की, न ही धरती पर विरोध किया। आज, यह सहस्राब्दियों पुरानी त्रासदी इन यहूदी जैसे लोगों के बीच फिर से प्रकट हुई है। क्या वे उसी पाप को नहीं दुहरा रहे? परमेश्वर के वादों को पाने के लिए मनुष्य को क्या योग्य बनाता है? क्या वह परमेश्वर का विरोध कर बाद में उसका आशीर्वाद स्वीकार नहीं करता है? क्यों मनुष्य कभी न्याय का सामना नहीं करता, या सच्चाई की तलाश नहीं करता है? क्यों उसे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि नहीं है? उसकी धार्मिकता कहाँ है? उसकी निष्पक्षता कहाँ है? क्या वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने का दम रखता है? न्याय की उसकी समझ कहाँ है? मनुष्य को जो प्रिय है उसमें से कितना परमेश्वर को प्रिय है? मनुष्य खड़िया और पनीर का भेद नहीं बता सकता[7] है, वह हमेशा काले और सफ़ेद रंगों के बारे में भ्रमित[8] रहता है, वह न्याय और सच्चाई का दमन करता है, और अन्याय और अधर्म को हमेशा ऊपर ऊँचा उठाता है। वह प्रकाश को दूर भगाता है, और अंधेरों में कूदता-फाँदता है। जो लोग सच्चाई और न्याय की तलाश करते हैं, वे इसके बजाय प्रकाश को दूर भगाते हैं, जो परमेश्वर की तलाश करते हैं, वे उसे अपने पैरों के नीचे रौंदते हैं, और खुद को आकाश में ऊँचा फहराते हैं। मनुष्य एक डाकू[9] से भिन्न नहीं है। उसका विवेक कहाँ है? कौन सही-गलत का भेद कह सकता है? कौन न्याय कर सकता है? कौन सच्चाई के लिए दुःख सहना चाहता है? लोग शातिर और शैतान हैं! परमेश्वर को सूली पर चढ़ाने के बाद वे ताली बजाते और खुश होते हैं, उनकी असभ्य चीखें अंतहीन होती हैं। वे मुर्गियों और कुत्तों की तरह हैं, वे सह-षड्यंत्रकारी और धूर्त हैं, उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया है, उनकी दखल ने कोई जगह नहीं छोड़ी है, वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और पागलपन से गुर्राते फिरते हैं, सभी एक साथ घुसे हुए हैं, और गंद का माहौल फैला हुआ है, काफी हलचल और चटक है, और जो खुद को आँखें मूँद कर दूसरों से जोड़ते हैं, वे उभरते रहते हैं, सभी अपने पूर्वजों के "शानदार" नामों को पकड़े रहते हैं। इन कुत्तों और मुर्गियों ने बहुत पहले परमेश्वर को अपने मस्तिष्क के पीछे डाल दिया है, और परमेश्वर के दिल की स्थिति पर कभी भी ध्यान नहीं दिया। परमेश्वर का यह कहना कोई आश्चर्य नहीं है कि मनुष्य एक कुत्ते या मुर्गी की तरह है, एक भौंकने वाला कुत्ता जो सौ दूसरों के चीखने का कारण बनता है; इस तरह, बहुत शोरगुल के साथ मनुष्य परमेश्वर के कार्य को आज के दिन तक ले आया है, इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ कि परमेश्वर का कार्य क्या है, कि क्या इसमें न्याय है, कि क्या परमेश्वर के पास कोई एक ऐसी जगह है जहाँ उसे कदम रखना है, कि कल का दिन कैसा है, या फिर वह अपनी नीचता और अपनी गंदगी के बारे में अनभिज्ञ है। मनुष्य ने चीज़ों के बारे में ख़ास कुछ कभी नहीं सोचा है, उसने कल के बारे में खुद कभी चिंता नहीं की है, और जो कुछ फायदेमंद और अनमोल है उसे अपनी बाँहों में इकट्ठा कर लिया है, और रद्दी तथा बचे-खुचे[10] के सिवाय परमेश्वर के लिए कुछ नहीं छोड़ा है। मानवजाति कितनी क्रूर है! मानव के पास परमेश्वर के लिए कोई भावना नहीं बची है, और परमेश्वर का सब कुछ गुप्त रूप से निगल जाने के बाद, उसके अस्तित्व की तरफ अब और ध्यान न देते हुए, उसने उसे अपने बहुत पीछे उछाल फेंका है। वह परमेश्वर का आनंद तो लेता है, परन्तु परमेश्वर का विरोध करता है, और उसे पैरों तले कुचलता है, जबकि उसके मुंह में वह परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी प्रशंसा करता है; वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और परमेश्वर पर निर्भर रहता है, साथ ही परमेश्वर को धोखा भी देता है; वह परमेश्वर के नाम का "गुणगान" करता है और परमेश्वर के मुख की ओर नज़रें उठाता है, फिर भी वह बेरहमी से और बेशर्मी से परमेश्वर के सिंहासन पर बैठ जाता है और परमेश्वर की "अधर्मिता" का न्याय करता है; उसके मुंह से तो ऐसे शब्द आते हैं कि वह ईश्वर का ऋणी है, और वह परमेश्वर के शब्दों को देखता है, परन्तु फिर भी अपने दिल में वह परमेश्वर पर प्रहार करता है; वह ईश्वर के प्रति "सहिष्णु" है, फिर भी वह परमेश्वर पर अत्याचार करता है और उसका मुंह कहता है कि यह परमेश्वर की खातिर है; अपने हाथों में वह परमेश्वर की चीजों को रखता है, और अपने मुंह में वह उस भोजन को चबाता है जो परमेश्वर ने उसे दिया है, फिर भी उसकी आँखें परमेश्वर पर एक ठंडी और भावनारहित नज़र रखती हैं, मानो कि वह उसे पूरी तरह से गप कर जाने की इच्छा रखता हो; वह सच्चाई को देखता है लेकिन कहता है कि यह शैतान की चाल है; वह न्याय पर निगाह डालता है, लेकिन इसे आत्म-त्याग बन जाने के लिए मजबूर करता है; वह मनुष्यों के कामों को देखता है, पर इस बात पर जोर देता है कि वे ही परमेश्वर हैं; वह मनुष्यों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को देखता है लेकिन आग्रह करता है कि वे ही सत्य हैं; वह परमेश्वर के कार्यों पर नज़र डालता है लेकिन इस पर जोर देता है कि वे अहंकार और अभिमान, शेखी और दंभ हैं; जब मनुष्य परमेश्वर की ओर देखता है, तो वह उसे मानव के रूप में अंकित करने पर ज़ोर देता है, और उसे एक ऐसे सृष्ट जीव की जगह पर बिठाने की कोशिश करता है जो शैतान के साथ मिलीभगत में हो; वह पूरी तरह से जानता है कि वे परमेश्वर की उक्तियाँ हैं, फिर भी उन्हें किसी व्यक्ति के लेखन के अलावा और कुछ नहीं कहेगा; वह पूरी तरह से जानता है कि आत्मा देह में सिद्ध होती है, कि परमेश्वर देह बन जाता है, लेकिन केवल यही कहता है कि यह देह शैतान का वंशज है; वह पूरी तरह से जानता है कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, फिर भी कहता है कि शैतान लज्जित हुआ है, और परमेश्वर जीत गया है। ये कैसे निकम्मे लोग हैं! मनुष्य तो रक्षक कुत्तों के रूप में सेवा करने के योग्य भी नहीं है! वह काले और सफ़ेद के बीच तो भेद नहीं करता है, यहाँ तक कि वह जानबूझकर काले रंग को तोड़-मरोड़ कर सफेद बनाता है। क्या मनुष्य की ताकतें और मनुष्य के घेरे परमेश्वर की मुक्ति के दिन को बर्दाश्त कर सकेंगे? जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के बाद मनुष्य बेपरवाह है, या वह उसे मार डालने की हद तक भी चला जाता है, परमेश्वर खुद को दिखा सके इसका मौका ही न छोड़ते हुए। कहाँ है धार्मिकता? प्रेम कहाँ है? वह परमेश्वर के पास बैठता है, और परमेश्वर को धकेलता है कि वह घुटनों पर गिर कर माफ़ी माँगे, उसकी सारी व्यवस्थाओं का पालन करे, उसकी सभी चालाकियों को स्वीकार करे, और वह परमेश्वर जो कुछ भी करे उसमें उसकी सलाह लेने को कहता है, वर्ना वह फिर भड़क जाता है[11] और आग बबूला हो उठता है। अंधेरे के इस तरह के प्रभाव के तहत जो काले को सफ़ेद में बदल देता है, परमेश्वर कैसे दु:ख से ग्रस्त न होता? वह कैसे चिंता नहीं करता? ऐसा क्यों कहा जाता है कि जब परमेश्वर ने अपना नवीनतम कार्य शुरू किया, तो यह एक नए युग की सुबह की तरह था? मनुष्य के कर्म इतने "समृद्ध" हैं, "जीवित जल के सदैव बहते हुए कूप-स्रोत" मनुष्य के दिल के क्षेत्र को निरंतर "फिर से भरते हैं", जबकि मनुष्य का "जीवित जल का कूप-स्रोत" परमेश्वर के साथ बेझिझक[12] प्रतिस्पर्धा करता है; ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, और यह परमेश्वर की जगह पर लोगों को दंड से मुक्ति का प्रावधान देता है, जबकि मनुष्य इसमें शामिल खतरों के विषय में सोचे बिना इसके साथ सहयोग करता है। और इसका क्या प्रभाव है? वह उपेक्षापूर्वक ईश्वर को एक तरफ हटा देता है, और उसे बहुत दूर कर देता है, जहाँ लोग उसकी ओर ध्यान नहीं दें, इस बात से भयभीत कि परमेश्वर उनका ध्यान आकर्षित कर लेगा, और वह बेहद डरा हुआ है कि परमेश्वर के जीवित जल के कूप-स्रोत मनुष्य को लुभा लेंगे और मनुष्य को प्राप्त कर लेंगे। इस प्रकार, कई वर्षों की सांसारिक चिंताओं का सामना करने के बाद, वह परमेश्वर के खिलाफ कपट और षड्यंत्र करता है, और यहां तक कि परमेश्वर को अपनी फटकार का लक्ष्य भी बना देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर उसकी आँखों में एक कुंदा-सा बन गया है, और वह परमेश्वर को पकड़ने और उसे अग्नि में निर्मल तथा शुद्ध करने के लिए बेताब है। परमेश्वर की असुविधा को देख कर, मनुष्य अपनी छाती पीटता और हँसता है, वह खुशी के मारे नाचता है, और कहता है कि परमेश्वर को भी शुद्धिकरण में डुबो दिया गया है, और कहता है कि वह परमेश्वर की मलीन अशुद्धताओं को भस्म कर देगा, जैसे कि केवल यही तर्कसंगत और विवेकपूर्ण हो, जैसे कि केवल ये ही स्वर्ग के निष्पक्ष और उचित तरीके हों। मनुष्य का यह हिंसक व्यवहार संकल्पित और बेसुध दोनों ही लगता है। मनुष्य अपने बदसूरत चेहरे और अपना घृणित, गंदा आत्मा दोनों को ही प्रकट करता है, साथ ही साथ एक भिखारी की दयनीय शकल को भी; दूर-दूर तक उपद्रव करने के बाद, वह एक दयनीय सूरत बना लेता है और स्वर्ग से क्षमा के लिए भीख माँगता है, और एक अत्यंत दयनीय पिल्ले की तरह दिखता है। मनुष्य हमेशा अप्रत्याशित तरीकों से काम करता है, वह हमेशा "दूसरों को डराने के लिए शेर की पीठ पर सवारी करता है",[घ] वह हमेशा एक भूमिका निभा रहा होता है, परमेश्वर के दिल के बारे में वह जरा भी विचार नहीं करता, न ही वह अपनी स्थिति से कोई तुलना करता है। वह तो चुपचाप केवल परमेश्वर का विरोध करता है, जैसे कि परमेश्वर ने उसके साथ कोई अन्याय कर रखा हो और उसे इस तरह से व्यवहार नहीं करना चाहिए था, और जैसे कि स्वर्ग की आँखें न हों और जानबूझकर वह चीजों को उसके लिए कठिन बनाता हो। इस प्रकार मनुष्य हमेशा चुपके-चुपके साज़िशें रचता है और वह परमेश्वर से अपनी मांगें थोड़ी-सी भी कम नहीं करता, हिंसक आँखों से देखता है, परमेश्वर के हर कदम को उग्रता से घूरता है, कभी यह नहीं सोचता कि वह परमेश्वर का दुश्मन है, और यह उम्मीद करता है कि वह दिन आएगा जब परमेश्वर कुहासे को काट देगा, और चीज़ों को स्पष्ट करेगा, और उसे "बाघ के मुंह" से बचाएगा और उसकी ओर से प्रतिशोध ले लेगा। आज भी, लोग यह नहीं सोचते हैं कि वे परमेश्वर का विरोध करने की भूमिका निभा रहे हैं, ऐसी भूमिका जो युगों से बहुतों ने निभाई है; वे कैसे जान सकते हैं कि जो कुछ भी वे करते हैं, उसमें वे लंबे समय से भटक गए हैं, कि वे जो कुछ भी समझते थे वह सब समुद्रों ने कब का निगल लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (9)" से उद्धृत

19. मानवता का इतनी दूरी तक प्रगति कर लेना एक ऐसी स्थिति है जिसका कोई पूर्व उदाहरण नहीं। परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का प्रवेश कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर का कार्य भी एक शानदार मौका है जो बेमिसाल है। मनुष्य का आज तक का प्रवेश एक ऐसा आश्चर्य है जिसकी किसी मानव ने पहले कभी कल्पना नहीं की थी। परमेश्वर का कार्य अपने शिखर पर पहुँच गया है—और, बाद में, मनुष्य का "प्रवेश"[13] भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। परमेश्वर ने अपने आप को इतना नीचे उतारा है जितना कि वह संभवतः उतार सकता था, और कभी भी उसने मानव जाति या विश्व की सारी चीजों के सामने विरोध नहीं किया। इस बीच, मनुष्य परमेश्वर के सिर पर खड़ा है, उसे चरम सीमा तक उत्पीड़न देते हुए; सब कुछ अपनी चोटी पर पहुँच गया है, और वह दिन आ गया है जब धार्मिकता प्रकट होती है। क्यों उदासी को धरती पर छा जाने देते रहें, और अंधेरे को सभी लोगों को ढँकने देते रहें? परमेश्वर हजारों वर्षों तक, यहाँ तक कि हजारों दशकों तक, देखता रहा है—और उसकी सहिष्णुता बहुत समय पहले अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई है। वह मानव जाति की प्रत्येक हरकत को देख रहा है, वह यह देख रहा है कि इंसान की कुटिलता कितनी देर तक आतंक मचाएगी, और फिर भी मनुष्य, जो लंबे समय से सुन्न हो गया है, कुछ भी महसूस नहीं करता। और किसने कभी भी परमेश्वर के कार्यों को देखा है? किसने कभी अपनी नज़रों को उठाया है और दूर तक देखा है? किसने कभी ध्यान से सुना है? कौन कभी सर्वशक्तिमान के हाथों में रहा है? सभी लोग काल्पनिक भय से ग्रस्त[14] हैं। घास और पुआल के ढेर का क्या उपयोग है? केवल एक ही चीज है जो वे कर सकते हैं, वह है जीवित देहधारी परमेश्वर को मृत्यु पर्यन्त यातना देना। यद्यपि वे घास और पुआल के ढेर हैं, फिर भी एक काम है जो वे "सबसे अच्छा"[15] करते हैं: परमेश्वर को जीते-जी मृत्यु तक उत्पीड़न देना और फिर चिल्लाना कि "यह लोगों के दिल को खुश करता है"। झींगा-सैनिकों और केकड़ा-सेनाध्यक्षों का यह एक कैसा झुण्ड है! उल्लेखनीय रूप से, लोगों की एक सतत धारा के बीच, वे परमेश्वर पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, एक अभेद्य नाकाबंदी के साथ उसे घेरते हुए। उनका जोश अधिकाधिक तीव्रता से दग्ध[16] होता जाता है, वे परमेश्वर को घेरे हुए हैं, ताकि वह एक इंच भी हिल न सके। उनके हाथों में सभी प्रकार के हथियार हैं, और वे परमेश्वर की तरफ क्रोध से भरी हुईं आँखों से देखते हैं जैसे कि दुश्मन की ओर देख रहे हों; वे "परमेश्वर के टुकड़े-टुकड़े" कर देने को बेताब हैं। कैसी पहेली है: मनुष्य और परमेश्वर इतने कट्टर दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या यह हो सकता है कि अत्यंत प्यारे परमेश्वर और मनुष्य के बीच विद्रोह हो? क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर के कार्यों का मनुष्य के लिए कोई लाभ न हो? क्या वे मनुष्य को नुकसान पहुँचाते हैं? मनुष्य परमेश्वर पर एक अविचल ताक जमाये हुए है, बेहद डरते हुए कि वह मनुष्यों की नाकाबंदी को तोड़ डालेगा, तीसरे स्वर्ग में वापस लौट जाएगा, और एक बार फिर वह मनुष्यों को कालकोठरी में डाल देगा। मनुष्य परमेश्वर से ख़बरदार है, वह बहुत घबराया हुआ है, और दूर से जमीन पर छटपटाता है, लोगों के बीच रहे परमेश्वर के प्रति "मशीन गन" तानते हुए। ऐसा लगता है कि, परमेश्वर की थोड़ी-सी भी हलचल होते ही, मनुष्य उसका सब कुछ—उसका पूरा शरीर और वह जो कुछ भी पहने हुए है—मिटा देगा, कुछ भी बाकी नहीं छोड़ेगा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच का यह संबंध सुधार से परे है। परमेश्वर मनुष्य की समझ से परे है; मनुष्य, इस बीच, जानबूझकर अपनी आँखें बंद कर लेता है और सुस्ती में समय गंवाता है, मेरे अस्तित्व को देखने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक, और मेरे न्याय के प्रति निर्मम। अतः, जब मनुष्य यह उम्मीद नहीं करता है, मैं चुपचाप निकल पड़ता हूँ, और अब मैं तुलना नहीं करूँगा कि मनुष्य के लिए कौन ऊँचा या नीचा है। मानव सबसे निम्न स्तर का "जानवर" है एवं मैं अब उसकी ओर ध्यान देना नहीं चाहता। लंबे समय से मैं अपनी कृपा को पूरी तरह से उस स्थान पर वापस ले जा चुका हूँ जहाँ मैं शांतिपूर्वक रहता हूँ; चूँकि मनुष्य इतना अवज्ञाकारी है, उसके पास क्या वजह है कि वह मेरी अनमोल कृपा का और आनंद ले?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (10)" से उद्धृत

20. यद्यपि परमेश्वर का कार्य समृद्ध और प्रचुर है, मनुष्य में प्रवेश की कमी है। मनुष्य और परमेश्वर के बीच संयुक्त "उद्यम" का, लगभग समूचा ही परमेश्वर का कार्य है; जहाँ तक मनुष्य ने कितना प्रवेश किया है इसका प्रश्न है, उसके पास इसे दिखाने के लिए लगभग कुछ भी नहीं है। मनुष्य, जो इतना गरीब और अँधा है, आज के परमेश्वर के सामने अपनी ताकत को अपने हाथों में रहे "प्राचीन हथियारों" के बल पर मापता है। ये "आदिम वानर" मुश्किल से सीधे चल पाते हैं, और उनके "नग्न" शरीरों से उन्हें कोई शर्म नहीं आती है। परमेश्वर के कार्य का मूल्यांकन करने की उनकी पात्रता क्या है? इन चार हाथ-पैरों वाले वानरों में से कई की आँखें क्रोध से भर आती हैं, और अपने हाथों में पत्थर के प्राचीन हथियारों के साथ वे परमेश्वर का मुकाबला करते हैं, कपि-मानवों की एक ऐसी प्रतियोगिता शुरू करने की कोशिश करते हुए जिसकी मिसाल दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी थी, कपि-मानवों और परमेश्वर के बीच आखिरी दिनों की एक ऐसी प्रतियोगिता आयोजित करने को जो मुल्क भर में प्रसिद्ध हो जाएगी। इसके अलावा, इन आधे-सीधे प्राचीन कपि-मानवों से कई आत्म-संतुष्टि के साथ छलक रहे हैं। उनके चेहरे को ढकते बाल परस्पर उलझे हुए हैं, वे जान-लेवा इरादे से भरे हुए हैं और अपने सामने के पैर उठाते हैं। वे अभी भी आधुनिक मानव के रूप में पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं, इसलिए कभी तो वे सीधे खड़े होते हैं, और कभी वे रेंगते हैं, ओस की एकत्रित बूंदों के तरह पसीनों के मनके उनके माथे को ढकते हैं, उनकी तत्परता स्वयं प्रकट होती है। असली, प्राचीन, कपि-मानव, उनके साथी, को देखते हुए, चार अंगों पर खड़े हुए, उनके चार हाथ-पैर भारी और मंद, मुश्किल से उन पर होते प्रहार को रोकने में सक्षम और पलट कर लड़ने की शक्ति के बगैर, वे कठिनाई से खुद को संभाल पाते हैं। पलक झपकते ही—इससे पहले कि क्या हुआ यह देखने का समय हो—अखाड़े का "नायक" जमीन पर उल्टा लुढ़क जाता है, हाथ-पैरों को हवा में ऊपर उठाए हुए। वे अंग जो गलती से इतने वर्षों से जमीन में गड़े हुए थे, अचानक उलट-पुलट गए हैं, और कपि-मानव को अब विरोध करने की कोई इच्छा नहीं है। तब से, प्राचीन कपि-मानव का पृथ्वी से सफाया हो गया है—यह वास्तव में "गंभीर" है। इस प्राचीन कपि-मानव का ऐसा आकस्मिक अंत हुआ। इसे मनुष्य की इस अद्भुत दुनिया से इतनी जल्दी कूच क्यों करना पड़ा? इसने अपने साथियों के साथ रणनीति के अगले चरण पर चर्चा क्यों नहीं की? परमेश्वर के खिलाफ अपनी ताकत को मापने के रहस्य को बताये बिना इसने दुनिया से विदाई ले ली, यह कैसी दयनीय बात है! इस तरह के बुजुर्ग कपि-मानव के लिए एक फुसफुसाहट के बिना ही मर जाना कितना विचारशून्य था, अपने वंशजों के लिए इस "प्राचीन संस्कृति और कला" को विरासत में छोड़े बिना ही। इसके पास कोई समय ही न रहा कि जो इसके निकटतम थे उन्हें अपने पास बुलाकर उन्हें अपने प्रेम के बारे में बता सके, शिला-लेख में इसने कोई संवाद न छोड़ा, स्वर्ग के सूर्य को इसने नहीं पहचाना, और अपनी अकथनीय कठिनाइयों के बारे में कुछ भी नहीं कहा। अपनी आखिरी सांस लेते समय, अपनी आँखें बंद होने के पहले, अपने चार अकड़े-से हाथ-पैर हमेशा के लिए वृक्ष की शाखाओं की तरह आकाश की ओर उठाकर रखते हुए, उसने अपने वंशजों को अपने मरणासन्न शरीर के पास नहीं बुलाया, उन्हें यह बताने के लिए कि "परमेश्वर को चुनौती देने के लिए अखाड़े में नहीं उतरना"। ऐसा प्रतीत होगा कि इसकी एक पीड़ाजनक मृत्यु हुई...। अचानक, अखाड़े के नीचे से एक गरजती हँसी उभरती है; एक आधा-सीधा कपि-मानव अपने आपे से बाहर है; हिरण या अन्य जंगली प्राणियों का शिकार करने में इस्तेमाल होने वाली एक "पत्थर की लाठी" पकड़े हुए जो आदिम कपि-मानव के मुकाबले अधिक उन्नत है, यह अखाड़े में कूद पड़ता है, क्रोध से आग-बबूला होते हुए, और अपने मन में एक सुनिश्चित योजना लेकर।[17] ऐसा लगता है जैसे उसने कुछ सराहनीय काम किया है। अपनी पत्थर की लाठी की "ताकत" के सहारे वह "तीन मिनट" के लिए सीधे खड़े हो पाता है। इस तीसरे "पैर" की "शक्ति" कितनी प्रबल है! इसने तीन मिनट तक उस बड़े, अनाड़ी, बेवकूफ आधे-सीधे कपि-मानव को खड़ा कर के रखा—कोई आश्चर्य नहीं कि यह आदरणीय[18] बुजुर्ग कपि-मानव इतना दबंग है। यकीनन, यह प्राचीन पत्थर का औजार "अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखता है": चाकू की एक मूठ है, धार है, और नोक, एक मात्र दोष यह है कि धार पर चमक की कमी है—यह कितना शोकास्पद है। प्राचीन काल के "छोटे नायक" को फिर से देखो, अखाड़े में खड़े होकर नीचे रहे लोगों पर एक घृणापूर्ण दृष्टि डालता है, जैसे कि वे नपुंसक व हीन हों, और वह स्वयं वीर नायक हो। अपने दिल में, जो मंच के सामने हैं उनसे यह छिपे तौर पर घृणा करता है। "देश कठिनाई में है और हममें से प्रत्येक जिम्मेदार है, तुम लोग पीछे क्यों हट रहे हो? क्या यह हो सकता है कि तुम सब यह तो देखो कि देश को आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन खूनी लड़ाई में तुम लोग शामिल नहीं होगे? देश तबाही की कगार पर है—तुम लोग सबसे पहले चिंतित होने वाले और सबसे अंत में सुख भोगने वाले क्यों नहीं हो? तुम सभी देश को नाकामयाब होते और इसकी जनता को बर्बाद होते कैसे देख सकते हो? क्या तुम लोग राष्ट्रीय पराधीनता की शर्म को सहन करने के लिए तैयार हो? निकम्मों का यह एक कैसा झुण्ड है?" जैसे ही यह इस तरह सोचता है, मंच के सामने विवाद उठ खड़े होते हैं और उसकी आँखें और भी अधिक कुपित हो जाती हैं, जैसे कि बस अभी ही उनसे ज्वालाएँ बरसने[19] वाली हों। यह लड़ाई से पहले ही परमेश्वर को विफल कर देने के लिए उतावला है, लोगों को खुश करने की खातिर परमेश्वर को मौत के घाट उतारने के लिए बेताब। इसे बहुत कम पता है कि, हालांकि इसका पत्थर का औजार एक योग्य ख्याति का हो सकता है, यह परमेश्वर से कभी भी वैर नहीं कर सकता। इससे पहले कि खुद के बचाव का समय रहे, इससे पहले कि उसे लेट जाने और अपने पैरों पर उठ खड़े होने का समय मिले, यह आगे और पीछे कम्पित होता है, दोनों आँखों से दृष्टि खोकर। यह अपने बुजुर्ग पूर्वज के पास नीचे लुढ़क पड़ता है और फिर नहीं उठता; कसकर बूढ़े कपि-मानव को थामकर, वह अब और नहीं चीखता है, और अपनी तुच्छता को स्वीकार करता है, विरोध की अब किसी इच्छा के बगैर। वे बेचारे दो गरीब कपि-मानव अखाड़े के सामने मर जाते हैं। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि मानव जाति के पूर्वज, जो आज तक बचे हुए थे, उस दिन अज्ञान में मर गए जब धार्मिकता का सूर्य दिखाई दिया! कितना मूर्खतापूर्ण है यह कि उन्होंने इतने बड़े आशीर्वाद को यूँ ही हाथ से निकल जाने दिया—कि उनके आशीर्वाद के दिन, हजारों सालों से इंतजार करने वाले ये कपि-मानव दुष्टों के राजा के साथ "आनंद" भोगने के लिए इन आशीषों को अधोलोक में ले गए हैं! क्यों न इन आशीषों को वे जीवितों की दुनिया में अपने बेटों और बेटियों के साथ आनंद लेने के लिए रखें? वे सिर्फ मुसीबतें माँग रहे हैं! यह कैसी बर्बादी है कि थोड़ी-सी हैसियत, थोड़ी प्रतिष्ठा और दिखावे के लिए, उन्हें मारे जाने के दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है, नरक के द्वार सबसे पहले खोलने और वहीं के पुत्र बन जाने के लिए हाथ-पाँव मारते हुए। ऐसी कीमत चुकाना बहुत अनावश्यक है। यह कितना दयनीय है कि ऐसे बुजुर्ग पूर्वज, जो "राष्ट्रीय भावना से इतने परिपूर्ण" थे, "स्वयं पर इतने सख्त लेकिन दूसरों के प्रति बहुत सहिष्णु" हो सकते थे, खुद को नरक में बंद कर उन नपुंसक हीन जनों को बाहर कर देते हुए। ऐसे "जनता के प्रतिनिधि" कहाँ मिल सकते हैं? "अपनी संतानों के कल्याण" और "भविष्य की पीढ़ियों के शांतिपूर्ण जीवन" के लिए, वे परमेश्वर को भी हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देते हैं, और इसलिए वे अपने जीवन की कोई परवाह नहीं करते हैं। बिना रूके, वे खुद को "राष्ट्रीय हित" के लिए समर्पित कर देते हैं, बिना किसी शब्द के अधोलोक में प्रवेश करते हुए। ऐसा राष्ट्रवाद कहाँ मिल सकता है? परमेश्वर के साथ लड़ाई करते हुए, उन्हें मौत का डर नहीं, न ही खून बहाने का, और कल के बारे में तो वे बहुत ही कम चिंता करते हैं। वे बस युद्ध के मैदान में चले जाते हैं। यह बहुत दयनीय बात है कि उनकी "भक्ति की भावना" के लिए वे जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, वह है अनंत अफ़सोस और नरक की सदैव प्रदीप्त आग में जल जाना!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (10)" से उद्धृत

21. मैंने मनुष्य के साथ कई दिन-रात बिताए हैं, मैं दुनिया में मनुष्य के साथ रह चुका हूँ, और मैंने कभी भी मनुष्य से कोई और अपेक्षाएँ नहीं की हैं; मैं केवल मनुष्य का निरंतर आगे की ओर मार्गदर्शन करता हूँ, मैं मनुष्य का मार्गदर्शन करने के अलावा और कुछ भी नहीं करता हूँ, और मानव जाति की नियति की खातिर, मैं निरंतर प्रबंधन का कार्य करता हूँ। स्वर्ग के पिता की इच्छा को कभी किसने समझा है? किसने स्वर्ग और पृथ्वी के बीच यात्रा की है? मैं अब और मनुष्य के साथ उसके "बुढ़ापे" को और बिताना नहीं चाहता, क्योंकि मनुष्य बहुत पुराने ढंग का है, वह कुछ भी नहीं समझता है, एक ही चीज़ जो वह जानता है, अन्य सभी से अलग, वह है उस दावत को छक कर खाना जो मैंने सजा रखी है—किसी भी अन्य मामले पर ध्यान न देते हुए। मानव जाति बहुत कृपण है, मनुष्यों के बीच कोलाहल, उदासी और जोखिम बहुत अधिक है, और इस प्रकार मैं आखिरी दिनों के दौरान हासिल की गई जीत के बहुमूल्य फलों को साझा करना नहीं चाहता हूँ। मनुष्य को उन प्रचुर आशीर्वादों का आनंद उठाने दो जो उसने खुद ने निर्मित किये हैं, क्योंकि मनुष्य मेरा स्वागत नहीं करता है—मैं मनुष्य को मुस्कुराहट का स्वांग करने के लिए क्यों मजबूर करूँ? दुनिया का हर कोना गर्मजोशी से रहित है, पूरे विश्व के परिदृश्य में वसंत का कोई नामो-निशान नहीं है, क्योंकि जल में निवास करते एक जीव की तरह, उसमें थोड़ी-सी भी गर्माहट नहीं है, वह एक लाश की तरह है, और यहाँ तक कि वह रक्त भी जो उसकी नसों में दौड़ता है, एक जमी हुए बर्फ की तरह है जो दिल को ठिठुराता है। गर्माहट कहाँ है? बिना किसी कारण के मनुष्य ने परमेश्वर को सूली पर जड़ दिया, और बाद में उसने थोड़ी-सी भी आशंका महसूस नहीं की। किसी को भी कभी अफसोस नहीं हुआ है, और ये क्रूर आततायी अभी भी मनुष्य के पुत्र को एक बार फिर "जीवित पकड़ना"[20] चाहते हैं और एक गोली चलाने वाले दस्ते के सामने उसे ले आने की योजना बना रहे हैं, ताकि वे अपने दिल की नफरत को खत्म कर सकें। इस खतरनाक भूमि में और रहने का मुझे क्या लाभ है? यदि मैं रह जाता हूँ, तो केवल एक ही चीज जो मैं मनुष्य के लिए लाऊंगा, वह संघर्ष और हिंसा है, और संकट का कोई अंत न होगा, क्योंकि मैं कभी मनुष्य के लिए शांति नहीं, केवल युद्ध, लाया हूँ। मानव जाति के आखिरी दिन युद्ध से भर जाने चाहिए, और हिंसा और संघर्ष के बीच मनुष्य के गंतव्य को ध्वस्त हो जाना चाहिए। मैं युद्ध की "प्रसन्नता" में "हिस्सा" लेने के लिए तैयार नहीं हूँ, मैं मनुष्य के रक्तपात और बलिदान का साथ नहीं दूँगा, क्योंकि मनुष्य की अस्वीकृति मुझे "निराशा" की ओर ले गई है और मुझे मनुष्य के युद्धों को देखने का दिल नहीं है—मनुष्य को जी भर लड़ने दो, मैं आराम करना चाहता हूँ, मैं सोना चाहता हूँ, मानव जाति के अंतिम दिनों के दौरान राक्षसों को उनके साथी बनने दो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (10)" से उद्धृत

22. तुम लोगों के प्रयास में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत की अभिलाषा,[ङ] और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट निरूपण हैं। लोगों के हृदयों में ये चीजें विद्यमान हैं इसका कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ हैं। वे पाप के बीच में रहते हैं, मगर इसे पाप होना नहीं मानते हैं, और वे अभी भी विश्वास करते हैं: "हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें आशीष प्रदान करने चाहिए और हमारे लिए सब कुछ उचित प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर अवश्य होना चाहिए, और हमारे पास किसी और की तुलना में अधिक हैसियत और अधिक भविष्य अवश्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीषें अवश्य देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कहा जाएगा।" कई सालों से, जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदयों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छा शक्ति और संकल्प का अभाव है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और स्वेच्छाचारी भी बन गए हैं। उनमें ऐसे किसी भी संकल्प का सर्वथा अभाव है जो स्वयं को ऊँचा उठाता हो, और इससे भी ज्यादा, उनमें इन अंधेरे प्रभावों की बाध्यताओं से पीछा छुड़ाने की लेश मात्र भी हिम्मत नहीं है। लोगों के विचार और जीवन सड़े हुए हैं, परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में उनके दृष्टिकोण अभी भी असहनीय रूप से कुरूप हैं, और यहाँ तक कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास के बारे में अपने दृष्टिकोण की बात करते हैं तो इसे सुनना मात्र ही असहनीय है। सभी लोग कायर, अक्षम, नीच, और दुर्बल हैं। वे अंधेरे की शक्तियों के लिए गुस्सा महसूस नहीं करते हैं, और वे प्रकाश और सत्य के लिए प्यार महसूस नहीं करते हैं; इसके बजाय, वे उन्हें बाहर निकालने का अधिकतम प्रयास करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और दृष्टिकोण इस तरह के नहीं हैं? "चूँकि मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ कि मुझ पर केवल आशीषों की वर्षा होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मेरी हैसियत कभी नहीं गिरती है और कि यह अविश्वासियों की तुलना में अधिक है।" तुम लोग केवल एक या दो वर्षों से ही इस तरह के दृष्टिकोण को अपने भीतर प्रश्रय नहीं दे रहे हो; यह वहाँ कई वर्षों से है। तुम लोगों की लेन-देन संबंधी मानसिकता अति विकसित है। यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत को जाने नहीं दिया है, बल्कि तुम लोग हमेशा इस बारे में पूछताछ करने और इस पर ध्यान देने के लिए संघर्ष करते रहते हो, एक गहरे डर के साथ कि एक दिन तुम लोगों की हैसियत खो जाएगी और तुम लोगों का नाम बर्बाद हो जाएगा। लोगों ने सहुलियत की अपनी अभिलाषा की कभी भी उपेक्षा नहीं की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?" से उद्धृत

23. परमेश्वर में लोगों का विश्वास परमेश्वर से उन्हें एक उपयुक्त मंज़िल प्रदान करवाने, पृथ्वी पर समस्त अनुग्रह दिलवाने, परमेश्वर को अपना सेवक बनाने, परमेश्वर के साथ उनके शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखवाने, और उनके बीच कभी भी कोई संघर्ष नहीं होने देने की चाहत है। अर्थात्, परमेश्वर में उनके विश्वास के लिए आवश्यक है कि परमेश्वर उनकी सभी माँगों को पूरा करने का वादा करे, वे जो कुछ भी प्रार्थना करते हैं उन्हें प्रदान करे, ठीक जैसा कि बाइबल में कहा गया है "मैं तुम्हारी सारी प्रार्थनाओं को सुनूँगा।" उन्हें परमेश्वर से अपेक्षा है कि वे किसी का न्याय या किसी के साथ व्यवहार न करे, क्योंकि परमेश्वर हमेशा दयालु उद्धारकर्ता यीशु है, जो लोगों के साथ हर समय और हर स्थान पर अच्छे संबंध रखता है। जिस तरह से वे विश्वास करते हैं, वह इस तरह से है-वे हमेशा बेशर्मी के साथ परमेश्वर से चीज़ें माँगे, और परमेश्वर उन्हें सब कुछ आँख बंद करके प्रदान करे, चाहे वे विद्रोही हों या आज्ञाकारी। वे परमेश्वर से लगातार एक "कर्ज़" के पुनर्भुगतान की माँग करते हैं और परमेश्वर को किसी भी प्रतिरोध के बिना "अपने कर्ज़ का भुगतान" अवश्य करना चाहिए, और दोहरा "पुनर्भुगतान" करना चाहिए, चाहे परमेश्वर ने उनसे कुछ भी प्राप्त किया हो या नहीं। परमेश्वर केवल उनकी दया पर ही हो सकता है; वह मनमाने ढंग से गुप्त रूप से लोगों के लिए योजना नहीं बना सकता है, अपने उस विवेक और धर्मी स्वभाव को जैसा चाहे लोगों पर, उनकी अनुमति के बिना, तो बिल्कुल भी प्रकट नहीं कर सकता है जो कई वर्षों से छुपा हुआ है। वे परमेश्वर के सामने सिर्फ अपने पापों की स्वीकारोक्ति करें और परमेश्वर बस उन्‍हें पाप-मुक्त कर दे, और इससे तंग न हो सकें, और ऐसा हमेशा चलता रहे। वे परमेश्वर को सिर्फ आदेश दें और वह सिर्फ उस आज्ञा का पालन करे, जैसा कि बाइबल में अभिलिखित है कि वह इसलिये नहीं आया कि मनुष्य द्वारा उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु सेवा टहल करने आया, कि वह मनुष्य का सेवक बनने के लिए आया। क्या तुम लोगों ने हमेशा इस तरह से विश्वास नहीं किया है? जब तुम लोग परमेश्वर से कुछ प्राप्त नहीं कर सकते हो तो तुम लोग भाग जाना चाहते हो। और जब कोई चीज तुम लोगों की समझ में नहीं आती है तो तुम लोग बहुत क्रोधित हो जाते हो, और इस हद तक भी चले जाते हो कि सभी तरह के दुर्वचन कहने लगते हो। तुम लोग परमेश्वर को अपना विवेक और चमत्कार बस पूरी तरह से व्यक्त नहीं करने दोगे, बल्कि इसके बजाय तुम लोग मात्र अस्थायी सुविधा और आराम का आनंद लेना चाहते हो। अब तक, परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास में तुम लोगों का रवैया वही पुराने विचारों वाला रहा है। यदि परमेश्वर तुम लोगों को थोड़ा सा प्रताप दिखाता है तो तुम लोग अप्रसन्न हो जाते हो; क्या तुम लोग अब देखते हो कि तुम लोगों का स्‍तर कैसा है? ऐसा मत सोचो कि तुम सभी लोग परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो जबकि वास्तव में तुम लोगों के पुराने विचारों में बदलाव नहीं हुआ है। जब तक तुम्हारे साथ कुछ अशुभ नहीं होता है, तब तक तुम सोचते हो कि हर चीज़ आसानी से चल रही है और तुम परमेश्वर को सर्वोच्च शिखर तक प्यार करते हो। लेकिन जब तुम्हारे साथ ज़रा-सा भी अशुभ हो जाता है तो तुम अधोलोक में गिर जाते हो। क्या यही तुम्हारा परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

24. मेरे कार्यों की संख्या समुद्र के किनारे की रेत के कणों से भी ज़्यादा है, मेरी बुद्धि सुलैमान के सभी पुत्रों से बढ़कर है, फिर भी मनुष्य सोचता है कि मैं कम महत्व का मात्र एक चिकित्सक हूँ और मनुष्य का एक अज्ञात शिक्षक हूँ! कितने लोग केवल इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनको चंगा करूँगा? कितने लोग सिर्फ इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपने सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँगा? और कितने लोग बस मुझसे शांति और आनन्द प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग सिर्फ और अधिक भौतिक सम्पत्ति मांगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं, और कितने लोग सिर्फ इस जीवन को सुरक्षित गुज़ारने के लिए और आने वाले संसार में सुरक्षित और अच्छे से रहने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं? कितने लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं लेकिन आने वाले संसार में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं करते हैं? जब मैंने अपने क्रोध को नीचे मनुष्यों के ऊपर भेजा और सारे आनन्द और शांति को ले लिया जो उसके पास पहले से था, तो मनुष्य सन्देहास्पद हो गया। जब मैंने मनुष्य को नरक का कष्ट दिया और स्वर्ग की आशीषों को वापस ले लिया, तो मनुष्य की लज्जा क्रोध में बदल गई। जब मनुष्य ने मुझसे कहा कि मैं उसको चंगा करूँ, तो मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसके प्रति घृणा का एहसास किया, मनुष्य मेरे सामने से चला गया और दुष्टतापूर्ण दवाइयों और जादू टोने के मार्ग को खोजने लगा। जब मैंने मनुष्य का सब-कुछ ले लिया जिसको उसने मुझ से मांगा था, तो मनुष्य बिना किसी नाम-निशान के गायब हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर विश्वास करता है क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह रखता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत कुछ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?" से उद्धृत

25. आज, तुम लोगों ने जो समझा है, चाहे वो परीक्षणों का तुम्हारा ज्ञान हो या परमेश्वर में विश्वास का ज्ञान, वह इतिहास के ऐसे किसी भी व्यक्ति की तुलना में अधिक है जिसे पूर्ण नहीं बनाया गया था। जिन चीजों को तुम लोग समझे हो ये वे हैं जिन्हें तुम लोग पर्यावरण के परीक्षणों से गुजरने से पहले जान गए हो, लेकिन तुम्हारी वास्तविक कद-काठी उनके साथ पूरी तरह से असंगत हैं। तुम लोग जो जानते हो वह उससे अधिक है जो तुम लोग अभ्यास में लाते हो। यद्यपि तुम लोग कहते हो कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और आशीषों के लिए नहीं बल्कि केवल परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए, तुम्हारे जीवन में जो अभिव्यक्त होता है, वह इससे एकदम अलग है, और बहुत दूषित हो गया है। अधिकांश लोग शांति और अन्य लाभों के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। जब तक यह तुम्हारे लाभ के लिए न हो, तब तक तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो, और यदि तुम परमेश्वर के अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते हो, तो तुम खीज जाते हो। तुमने जो कहा वो तुम्हारी असली कद-काठी कैसे हो सकती है? जब अनिवार्य पारिवारिक की घटनाओं (जैसे कि बच्चों का बीमार पड़ना, प्रियजनों का अस्पताल जाना, ख़राब फसल पैदावार, परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पीड़न) की बात आती है, तो तुम इन्हें चीजों को भी नहीं झेल पाते हो जो प्रायः दिन-प्रतिदिन जीवन में होती हैं। जब ऐसी चीजें होती हैं, तो तुम घबरा जाते हो, तुम्हें पता नहीं होता कि क्या करना है—और अधिकांश समय, तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हो। तुम शिकायत करते हो कि परमेश्वर के वचनों ने तुम्हारे साथ चालाकी की है, कि परमेश्वर के कार्य ने तुम्हें परेशानी में डाल दिया है। क्या तुम लोगों के ऐसे विचार नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि ऐसी चीजें कभी-कभार ही तुम लोगों के बीच में होती हैं? तुम लोग इस तरह की घटनाओं के बीच रहते हुए हर दिन बिताते हो। तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास की सफलता के बारे में और कैसे परमेश्वर की इच्छा को पूरा करें, इस बारे में जरा सा भी विचार नहीं करते हो। तुम लोगों की असली कद-काठी बहुत छोटी है, यहाँ तक कि चूजे से भी छोटी है। जब तुम लोगों के परिवार के व्यवसाय में नुकसान होता है तो तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हो, जब तुम लोग स्वयं को परमेश्वर की सुरक्षा के बिना किसी वातावरण में पाते हो तब भी तुम लोग परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हो, यहाँ तक कि तुम तब भी शिकायत करते हो जब तुम्हारे चूजे मर जाते हैं या तुम्हारी बूढ़ी गाय बाड़े में बीमार पड़ जाती है, तुम तब शिकायत करते हो जब तुम्हारे बेटे का शादी करने करने का समय आता है लेकिन तुम्हारे परिवार के पास पर्याप्त धन नहीं होता है, और जब कलीसिया के कार्यकर्ता तुम्हारे घर पर कुछ भोजन खाते हैं, लेकिन कलीसिया तुम्हें प्रतिपूर्ति नहीं करती है या कोई भी तुम्हें कोई सब्ज़ी नहीं भेजता है, तब भी तुम शिकायत करते हो। तुम्हारा पेट शिकायतों से भरा है, और इस वजह से तुम कभी-कभी सभाओं में नहीं जाते हो या परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो, लंबे समय तक तुम्हारे नकारात्मक हो जाने की संभावना हो जाती है। आज तुम्हारे साथ जो भी कुछ भी होता है उसका तुम्हारी संभावनाओं या भाग्य से कोई संबंध नहीं है; ये चीजें तब भी होती जब तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं भी करते, मगर आज तुम उनका उत्तरदायित्व परमेश्वर पर डाल देते हो और यह कहने पर जोर देते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें हटा दिया है। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का क्या, क्या तुमने अपना जीवन सचमुच अर्पित किया है? यदि तुम लोगों ने अय्यूब के समान परीक्षणों का सामना किया होता, तो परमेश्वर का अनुसरण करने वाले तुम लोगों में से ऐसा कोई भी आज डटा नहीं रह पाता, तुम सभी लोग नीचे गिर जाते। और, निस्संदेह, तुम लोगों के और अय्यूब के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर है। आज, यदि तुम लोगों की आधी संपत्ति जब्त कर ली जाए तो तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने की हिम्मत करोगे; यदि तुम्हारे बेटे या बेटी को तुम से ले लिया जाए, तो तुम चिल्लाते हुए सड़कों पर दौड़ेंगे कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है; यदि तुम्हारे पास आजीविका कमाने का कोई रास्ता न बचे, तो तुम परमेश्वर से बहस करने की कोशिश करोगे; तुम पूछोगे कि मैंने तुम्हें डराने के लिए शुरुआत में इतने सारे वचनों को क्यों कहा। ऐसा कुछ नहीं है जिसे तुम लोग ऐसे समय में करने की हिम्मत नहीं करोगे। यह दर्शाता है कि तुम लोगों ने वास्तव में कोई सच्ची अंतर्दृष्टि नहीं पायी है, और तुम लोगों की कोई वास्तविक कद काठी नहीं है। इस प्रकार, तुम लोगों में परीक्षण अत्यधिक बड़े हैं, क्योंकि तुम लोग बहुत ज्यादा जानते हो, लेकिन तुम लोग वास्तव में जो समझते हो वह उसका हज़ारवाँ अंश भी नहीं है जिससे तुम लोग अवगत हो। मात्र समझ और ज्ञान पर मत रुको; सबसे अच्छा रहता कि तुम लोग यह देखते कि तुम लोग वास्तव में कितना अभ्यास में ला सकते हो, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी में कितनी है जो तुम्हारे कठोर परिश्रम के पसीने से अर्जित की गयी है, और तुम लोगों ने अपने कितने अभ्यासों में अपने स्वयं के संकल्प को समझा है। तुम्हें अपनी कद-काठी पर विचार करना चाहिए और गंभीरतापूर्वक अभ्यास करना चाहिए। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, तुम्हें किसी के लिए भी मात्र ढोंग करने का प्रयास नहीं करना चाहए—अंतत: तुम सत्य और जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं यह तुम्हारी स्वयं की खोज पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (3)" से उद्धृत

26. तुम आशा करते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करने से तुम्‍हें चुनौतियाँ और क्लेश, या थोड़ी बहुत कठिनाई विरासत में नहीं मिलेगी। तुम हमेशा ऐसी चीज़ों का अनुसरण करते हो जो निकम्मी हैं, और तुम अपने जीवन में कोई मूल्य नहीं जोड़ते हो, उसके बजाय तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज़्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम एक सूअर के समान जीते हो—तुममें, और सूअर और कुत्तों में क्या अन्तर है? क्या वे जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उसके बजाय शरीर से प्रेम करते हैं, सब के सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती फिरती हुई लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच में कितने सारे वचन बोले गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच में केवल थोड़ा सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच में कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्‍हारे पास शिकायत करने के लिए क्या है? क्या मामला ऐसा नहीं है कि तुमने कुछ भी इसलिए प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज़्यादा फिजूल हैं? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम बहुत ही ज़्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने के योग्य होने के लिए अनुसरण करते हो—अपनी सन्तानों के लिए बीमारी से आज़ादी, अपने जीवनसाथी के लिए एक अच्छी नौकरी, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी, अपनी बेटी के लिए एक सज्जन पति, अपने बैल और घोड़े के लिए अच्छे से जमीन की जुताई कर पाने की क्षमता, और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छे मौसम की कामना करते हो। तुम इन्हीं चीज़ों की खोज करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल सुकून के साथ जीवन बिताने के लिए है, इसलिए है कि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, कि आँधी तुम्‍हारे पास से होकर गुज़र जाये, धूल मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में बह न जायें, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो, कि तुम परमेश्वर की बांहों में रहो, कि तुम आरामदायक घोंसले में रहो। तुम्‍हारे जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा शरीर के पीछे पीछे चलता है—क्या तुम्‍हारे पास एक हृदय है, क्या तुम्‍हारे पास एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? बदले में बिना कुछ मांगते हुए मैं तुम्‍हें एक सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें वास्तविक मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम कुत्ते और सूअर के समान नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शुद्ध किए जाने का प्रयास नहीं करते हैं, और वे नहीं समझते हैं कि जीवन क्या है? प्रतिदिन, जी भरकर खाने के बाद, वे बस सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग दिया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है: तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में, इस सूअर के जीवन में, निरन्तर बने रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के ज़िन्दा रहने का क्या महत्व है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गन्दगी और व्यभिचार के मध्य रहते हो, और तुम किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन निम्नतम नहीं है? क्या तुम्‍हारे पास परमेश्वर की ओर देखने की धृष्टता है? यदि तुम लगातार इस तरह अनुभव करते रहो, तो क्या तुम्‍हें शून्यता प्राप्त नहीं होगी? सच्चा मार्ग तुझे दे दिया गया है, किन्तु अंततः तू उसे प्राप्त कर सकता है कि नहीं यह तेरे व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

27. जब भी गंतव्य की बात आती है, तुम उसे पूरी गंभीरता से लेते हो; तुम सभी लोग इस मामले में बहुत ही संवेदनशील हो। कुछ लोग तो एक अच्छा गंतव्य पाने के लिये परमेश्वर के सामने दंडवत करने से भी नहीं चूकते। मैं तुम्हारी उत्सुकता समझता हूं, उसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। तुम बिल्कुल नहीं चाहोगे कि तुम्हारी देह किसी विपत्ति में फंस जाये, और न ही तुम यह चाहोगे कि भविष्य में तुम्हें कोई दीर्घकालिक दंड भुगतना पड़े। तुम केवल सरल और उन्मुक्त जीवन जीना चाहते हो। इसलिए जब भी गंतव्य की चर्चा आती है, तुम सब एकदम बेचैन हो जाते हो और डरने लगते हो कि यदि तुम लोग पूरी तरह से सतर्क नहीं रहे तो कहीं परमेश्वर तुमसे नाराज न हो जाये और कहीं तुम्हें दंड का भागी न बनना पड़े। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचके, और तुम में से बहुत से लोग जो भटकाव और चंचलता में फंसे हुए थे, वे अचानक विनम्र और ईमानदार हो गये; तुम्हारी ईमानदारी तो बल्कि घबराहट पैदा करती है। खैर, तुम लोगों के दिल में "ईमानदारी" है। शुरु से अंत तक तुम लोगों ने मेरे साथ खुलापन रखा है। तुम्हारे मन की ऐसी कोई बात नहीं है जो तुम लोगों ने मुझसे छुपाई हो। फिर वह चाहे निंदा हो, कपट हो या समर्पण। यहां तक कि तुमने अपने मन के तहखाने में दबी बेहद अहम चीज़ें भी मेरे समक्ष बड़ी स्पष्टता से "स्वीकार" कर ली हैं। यह भी ठीक है कि मैंने भी कभी इन चीज़ों से बचने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मेरे लिये ये आम बातें हो गई हैं। परमेश्वर के अनुमोदन के लिए अपने सर का एक भी बाल गंवाने से बेहतर तुम लोग अपनी अंतिम मंज़िल के लिए आग के दरिया में कूदना ज़्यादा पसंद करोगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ कुछ ज़्यादा ही हठधर्मी हो रहा हूं; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूं, उसका सामना करने के लिये तुम्हारे हृदय का भाव अभी अपर्याप्त है। शायद मेरे कहने का तात्पर्य तुम लोग समझ न पाओ, तो मैं तुम्हें एक सरल व्याख्या करके बताता हूं: तुम सबको जिसकी ज़रूरत है वो सत्य और जीवन नहीं है; तुम्हारे आचरण का सिद्धांत नहीं है, और विशेषकर न मेरा श्रमसाध्य कार्य है। तुम लोगों को आवश्यकता उन चीज़ों की है जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—सम्पत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य की उपेक्षा करते हो, तो मैं तुम्हारी निष्ठा को एक शब्द में समेट सकता हूँ: अधूरे मन से। जिन चीज़ों के प्रति तुम सभी समर्पित हो, उन्हें हासिल करने के लिये तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने देखा है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर हर चीज़ की उपेक्षा कर दो, ऐसा नहीं है। बल्कि तुम सब सापेक्ष रूप से निष्ठावान हो, सापेक्ष रूप से गंभीर हो। इसीलिये मेरा कहना है कि जिनके मन में पूर्ण निष्ठा का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सफल नहीं हो पाते। ज़रा इस पर गंभीरता से विचार करो—क्या तुम लोगों में असफल लोगों की संख्या अधिक है?

तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिये कि परमेश्वर में विश्वास में सफलता लोगों को उनके अपने कार्यों से मिलती है; जब लोग असफल हो जाते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, किन्हीं अन्य वजहों से नहीं। मुझे लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करने की अपेक्षा, जो काम अधिक मुश्किल हैं और जिनमें अधिक कष्ट हैं, उन्हें करने के लिये तुम सब कुछ भी कर सकते हो, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लेते हो। उन कार्यों में तुम कोई गलती करना भी पसंद नहीं करते; तुम सभी ने अपना पूरा जीवन इसी प्रकार के निरंतर प्रयासों में लगा दिया है। तुम लोग स्थिति विशेष में मुझे देह में तो धोखा दे सकते हो, लेकिन तुम अपने परिजनों को धोखा नहीं दोगे। यही तुम्हारा व्यवहार बन चुका है और इसी सिद्धांत को तुम लोग अपने जीवन में अपनाते हो। क्या तुम अपने गंतव्य की खातिर, सुंदर और सुखद गंतव्य हेतु मुझे धोखा देने के लिये एक मिथ्या छवि का निर्माण नहीं कर रहे हो? मुझे ज्ञात है कि भक्ति और ईमानदारी मात्र अस्थायी है; तुम्हारी आकांक्षाएं और जो कीमत तुम लोग चुकाते हो, क्या वे तब की अपेक्षा अब के लिये नहीं हैं? एक खूबसूरत गंतव्य को सुरक्षित कर लेने के लिये तुम सब केवल अंतिम प्रयास करना चाहते हो। तुम्हारा उद्देश्य महज़ सौदेबाज़ी है; इसलिये नहीं कि तुम सत्य के प्रति कृतज्ञ नहीं हो, और विशेषकर यह उस कीमत को चुकाने के लिये नहीं है जो मैंने अदा की है। संक्षेप में यह कि तुम लोग अपनी चतुराई का प्रयोग करने के इच्छुक हो, लेकिन तुम इसके लिये संघर्ष करने को तैयार नहीं हो। क्या यही तुमतुम्हारी दिली ख्वाहिश नहीं है? तुम सब अपने को छिपाने का प्रयास न करो, और न ही इस हद तक अपने गंतव्य को लेकर माथापच्ची करो कि न तो तुम खा सको, न सो सको। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा गंतव्य निर्धारित हो चुका होता?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "गंतव्य पर" से उद्धृत

28. प्रतिदिन उसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य के कार्यों और विचारों पर चिंतन किया जाता है और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी में जुट जाते हैं। यही वह मार्ग है जिस पर सभी जीवितों को चलना होगा और जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसमें किसी के लिए कोई छूट नहीं है। मैंने अनगिनत वचन कहे हैं और इसके साथ-साथ मैंने अनगिनत कार्य किये हैं। प्रतिदिन मैं देखता हूँ जब प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से वह सब कुछ करता है जिसे उसे अपने अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार करना है, और वह किस प्रकार विकसित होता जाता है। अनजाने में अनेक लोगों ने "सही मार्ग" पर पहले से ही चलना आरम्भ कर दिया है, जिसे मैंने हर प्रकार के मनुष्य के प्रकटन के लिए निर्धारित किया था। मैंने पहले से ही हर प्रकार के मनुष्य को अलग-अलग वातावरण में रखा है और अपने-अपने स्थानों में प्रत्येक मनुष्य अपनी अंतर्निहित विशेषताओं को प्रकट कर रहा है। उन्हें कोई बांध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं और वे जो अभिव्यक्त करते हैं वह स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है। केवल एक ही चीज़ है जो उनको नियन्त्रण में रखती है और वह है मेरे वचन। इसलिए असंख्य मनुष्य अप्रसन्नता से मेरे वचनों को पढ़ते हैं ताकि उनका अंत कहीं उनकी मृत्यु न हो, परन्तु मेरे वचनों को कभी भी अभ्यास में लाते नहीं हैं। दूसरी ओर, कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, अतः वे स्वाभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वे मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानवजाति की मंजिल, और मनुष्य होने के मूल्य की खोज करते जाते हैं। मानवजाति मेरे वचन की उपस्थिति में इससे अलग और कुछ नहीं है और मैं बस चीज़ों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूं। मैं ऐसा कुछ नहीं करता हूँ जो मनुष्य को उनके अस्तित्व के आधार के रूप में मेरे वचन के अनुसार जीने के लिए बाध्य करे। इस प्रकार वे जिनमें कभी विवेक नहीं रहा है या जिनके अस्तित्व का मूल्य नहीं है, शांतचित्त होकर चीज़ों को घटित होते देखते हैं और बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और जो चाहते हैं करते हैं। वे सत्य से और उन सब से जो मुझसे आता है, उकताने लगते हैं। इसके अतिरिक्त, वे मेरे घर में रहते हुए भी उकता जाते हैं। ये लोग भले ही सेवकाई कर रहे हों, फिर भी अपने लक्ष्य के लिए और दण्ड से बचने के लिए मेरे घर में अस्थायी तौर पर रहते हैं। परन्तु उनके इरादे कभी नहीं बदलते हैं और न ही उनके कार्य। यह आशीषों के लिए उनकी इच्छा को और प्रोत्साहित करता है, और उस राज्य में एकतरफा यात्रा के लिए भी जहां वे अनंतकाल के लिये रह सकें और अनंत स्वर्ग में यात्रा कर सकें। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी निकट आने की लालसा करते हैं, वे उतना ही अधिक महसूस करते हैं कि सत्य उनके लिए एक अवरोध और उनके मार्ग के लिए एक रोड़ा बन गया है। वे सत्य का अनुसरण या न्याय तथा ताड़ना को स्वीकार किए बगैर, और उन सबसे बढ़कर, मेरे घर में समर्पित रूप से रहने की जरूरत को समझे बिना और जो आज्ञा मैं देता हूँ उसका पालन किए बिना, सदा-सर्वदा स्वर्ग के राज्य का आनन्द उठाने और राज्य में कदम रखने के लिए इन्तज़ार नहीं कर पाते हैं। ये लोग मेरे घर में प्रवेश न तो ऐसे हृदय की संतुष्टि के लिए करते हैं जो सत्य की खोज करता है और न ही मेरे प्रबन्धन के साथ मिलकर कार्य करने के लिए। वे महज उनमें से एक होने का लक्ष्य रखते हैं जिसे आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाता है। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया न ही अपनी भ्रष्टता की गहराई के चरम का एहसास किया है, फिर भी वे मेरे घर में अंत तक "सेवकों" के रूप में रहे। वे "धीरज से" मेरे दिन के आने का इन्तज़ार करते हैं और जब वे मेरे कार्य के तरीके के द्वारा यहाँ वहाँ उछाले जाते हैं तो वे थकते नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी कोशिश कितनी बड़ी है और उन्होंने उसकी क्या कीमत चुकाई है, कोई नहीं देखेगा कि उन्होंने सत्य के लिए कष्ट सहा है या मेरे लिए बलिदान किया है। अपने हृदय में, वे उस दिन को देखने का इन्तज़ार नहीं कर सकते हैं जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे बढ़कर, वे यह जानने के लिए बेचैन हैं कि मेरी सामर्थ्य और मेरा अधिकार कितना विशाल है। यह वो एक चीज़ है जिसमें बदलाव लाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए उन्होंने कभी भी शीघ्रता नहीं की है। वे उससे प्रेम करते हैं जिससे मैं उकता गया हूँ और वे उससे उकता गए हैं जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी चाह करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ लेकिन साथ ही वे उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते तो हैं फिर भी इस संसार से कभी नफरत नहीं करते हैं और इस बात से बहुत भयभीत हैं कि इसे मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। उनके इरादे परस्पर विरोधी हैं: वे इस संसार से अतिप्रसन्न हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, फिर भी साथ ही वे मुझसे लालसा रखते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ। इस रीति से वे विनाश के कष्ट से बचा लिए जाएँगे और इससे पहले कि वे सत्य के मार्ग से भटक जाएँ, वे अगले युग के स्वामियों के रूप में रूपान्तरित कर दिए जाएँगे। यह इसलिए है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और वह सब कुछ जो मुझ से आता है, वे उससे उकता गए हैं। शायद वे थोड़े से समय के लिए यह सोचकर "आज्ञाकारी लोग" बन जाएँगे कि कहीं आशीषों को खो न दें, लेकिन आशीषों के लिए उनकी चिंतित मानसिकता तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने और नाश होने का भय कभी धुंधला नहीं पड़ सकता। जैसे-जैसे मेरा दिन नज़दीक आता है, वैसे-वैसे उनकी इच्छा लगातार उत्कट होती जाती है। और विनाश जितना भयंकर होता है, उतना ही ज़्यादा यह उनको असहाय कर देता है और मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए जिनकी उन्होंने लम्बे समय से लालसा की है, उसके लिए वे यह नहीं जानते हैं कि कहाँ से प्रारम्भ करें। एक बार जब मेरा हाथ अपना काम करना प्रारम्भ कर देता है तो ये लोग एक अग्रगामी सैन्य टुकड़ी के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। वे बस सैन्य टुकड़ी की प्रथम पंक्ति में आने के बारे में सोचते हैं और यह सोचकर बहुत ज़्यादा भयभीत होते हैं कि मैं उन्हें नहीं देखूंगा। वे वही करते और कहते हैं जिसे वे सही समझते हैं; और यह नहीं जानते कि उनके कार्य कभी भी सत्य के अनुरूप नहीं रहे और वे मात्र मेरी योजनाओं में गड़बड़ी और हस्तक्षेप करने के लिए हैं। यद्यपि उन्होंने पुरजोर प्रयास किया है और शायद कठिनाई से होकर गुज़रने की उनकी इच्छा और इरादा सही हो, फिर भी जो कुछ वे करते हैं उनसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कार्य अच्छे इरादे के साथ किए गए हों और ऐसा तो बहुत ही कम हुआ जब मैंने उन्हें अपनी वेदी के ऊपर कुछ रखते हुए देखा हो। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उनके कार्य ऐसे ही हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए" से उद्धृत

29. अधिकांश लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे केवल इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि आशीषों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए या आपदा से कैसे बचा जाए। परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख करने पर वे चुप हो जाते हैं और उनकी रुचि समाप्त हो जाती है। उन्हें लगता है कि वे इस प्रकार के कुछ उबाऊ प्रश्नों को जानने से वे अपने जीवन में बढ़ नहीं सकते हैं या किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और इसलिए हालांकि वे परमेश्वर के प्रबंधन के संदेश के बारे में सुन चुके होते हैं, वे उन्हें बहुत ही लापरवाही से लेते हैं। उन्हें वे इतने मूल्यवान नहीं लगते कि उन्हें स्वीकारा जाए और वे अपने जीवन का अंग तो उन्हें बिल्कुल नहीं लगते। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर का अनुसरण करने का बहुत ही साधारण लक्ष्य होता हैः आशीषें प्राप्त करने का और वे इस लक्ष्य से मतलब न रखने वाली किसी भी बात पर ध्यान देने में बहुत ही आलस दिखाते हैं। उनके लिए, करने का अर्थ आशीषें प्राप्त करने के लिये परमेश्वर पर विश्वास करना सबसे तर्कसंगत लक्ष्य और उनके विश्वास का आधारभूत मूल्य है। और जो चीज़ें इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता प्रदान नहीं करतीं वे उनसे प्रभावित नहीं होते हैं। आज जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उनके साथ ऐसी ही समस्या है। उनके लक्ष्य और प्रेरणा तर्कसंगत दिखाई देते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर पर विश्वास समय ही, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपने कर्तव्य को भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी लगा देते हैं, परिवार और भविष्य को त्याग देते हैं, और यहां तक कि सालों अपने घर से दूर व्यस्त रहते हैं। अपने परम लक्ष्य के लिये, वे अपनी रूचियों को बदल डालते हैं, अपने जीवन के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देते हैं, और यहां तक कि अपनी खोज की दिशा तक को बदल देते हैं, फिर भी वे परमेश्वर पर अपने विश्वास के लक्ष्य को नहीं बदल सकते। वे अपने ही आदर्शों के लिये भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना ही दूर हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयां और अवरोध क्यों न आएं, वे डटे रहते हैं और मृत्यु के सामने निडर खड़े रहते हैं। इस प्रकार से अपने आप को समर्पित बनाए रखने के लिए उन्हें किस बात से शक्ति प्राप्त होती है? क्या यह उनका विवेक है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह उनका अटल इरादा है जो उन्हें दुष्ट शक्तियों से अंत तक युद्ध करते रहने की प्रेरणा देता है? क्या यह उनका विश्वास है जिसमें वे बिना प्रतिफल के परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या यह उनकी वफादारी है जिसके लिए वे परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त करने के लिए सब कुछ देने के लिए भी तैयार रहते हैं? या यह उनकी भक्ति है जिसमें वे हमेशा व्यक्तिगत असाधारण मांगों को त्याग देते हैं? उन लोगों के लिये जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के प्रबंधन को जानने के लिए कभी भी इतना कुछ नहीं दिया, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं! कुछ देर के लिये आइए इस पर चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। फिर भी उनका व्यवहार इस योग्य है कि हम उसका विश्लेषण करें। उन लाभों के अतिरिक्त जो उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े हैं, क्या इन लोगों के लिए जो कभी भी परमेश्वर को नहीं समझ पाते हैं, उसे इतना कुछ देने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? इसमें, हम एक पहले से ही अज्ञात समस्या को देखते हैं: मनुष्य का परमेश्वर के साथ सम्बन्ध केवल एक नग्न स्वार्थ है। यह आशीष देने वाले और लेने वाले के मध्य का सम्बन्ध है। सीधे-सीधे, यह कर्मचारी और नियोक्ता के मध्य के सम्बन्ध के समान है। कर्मचारी नियोक्ता के द्वारा पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ही कार्य करता है। इस प्रकार के सम्बन्ध में, कोई स्नेह नहीं होता है, केवल एक सौदा होता है; प्रेम करने और प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होता है; कोई आपसी समझ नहीं होती केवल अधीनता और धोखा होता है; कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक खाई जो कभी भी भरी नहीं जा सकती। जब चीज़ें इस बिन्दु तक आ जाती हैं, तो कौन इस प्रकार की प्रवृत्ति को बदलने में सक्षम है? और कितने लोग इसे वास्तव में समझने के योग्य हैं कि यह सम्बन्ध कितना निराशजनक बन चुका है? मैं मानता हूं कि जब लोग आशीषित होने के आनन्द में अपने आप को लगा देते हैं, तो कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ इस प्रकार का सम्बन्ध कितना शर्मनाक और भद्दा होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" से उद्धृत

30. अधिकांश लोग अपनी भविष्य की मंज़िल के लिए, या अल्पकालिक आनन्द के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। ऐसे लोग जो किसी व्यवहार से होकर नहीं गुज़रे हैं, उनके लिए परमेश्वर में उनका विश्वास स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए, एवं प्रतिफल अर्जित करने के लिए होता है। यह, सिद्ध किए जाने के लिए या परमेश्वर के किसी प्राणी के कर्तव्य को निभाने के लिए नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि अधिकांश लोग अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए, या अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। अर्थपूर्ण ज़िन्दगियों को जीने के लिए बिरले ही लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और न ही ऐसे लोग हैं जो विश्वास करते हैं कि चूँकि मनुष्य जीवित है, उसे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना स्वर्ग की व्यवस्था है और पृथ्वी का सिद्धान्त है, और यह मनुष्य का स्वाभाविक उद्यम है। इस रीति से, यद्यपि विभिन्न लोग अपने स्वयं के लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं, फिर भी इसके पीछे उनके अनुसरण एवं उनकी प्रेरणा का उद्देश्य सब एक जैसा है, और तो और, उनमें से अधिकांश लोगों के लिए उनकी आराधना के विषय लगभग एक समान हैं। पिछले कई हज़ार वर्षों से, बहुत से विश्वासी मर चुके हैं, और बहुत से लोग मर कर नया जन्म प्राप्त कर चुके हैं। ये बस एक या दो लोग ही नहीं हैं जो परमेश्वर की खोज करते हैं, न ही एक या दो हज़ार हैं, फिर भी इनमें से अधिकांश लोगों का अनुसरण उनकी स्वयं की संभावनाओं या भविष्य के लिए उनकी महिमामय आशाओं के खातिर होता है। ऐसे लोग जो मसीह के लिए समर्पित हैं वे बिरले हैं। अब भी अनेक भक्त विश्वासी अपने स्वयं के जालों में फंसकर मर चुके हैं, और, इसके अतिरिक्त, उन लोगों की संख्या जिन्होंने सफलता हासिल की है वह अत्यंत कम है। आज के दिन तक, लोग अपनी असफलता के कारण, या सफलता के रहस्य से, अनजान ही हैं। ऐसे लोग जो मसीह को खोजने की धुन में लगे हैं उन्होंने अभी भी त्वरित अन्तःदृष्टि के अपने पल को प्राप्त नहीं किया है, वे इन रहस्यों के तल तक नहीं पहुंच पाए हैं, क्योंकि वे तो कुछ जानते ही नहीं हैं। यद्यपि वे अपने अनुसरण में कष्टसाध्य प्रयास तो करते हैं, फिर भी जिस पथ पर वे चलते हैं वह असफलता का वो पथ है जिस पर उनके पूर्वज चले थे, और यह सफलता का पथ नहीं है। इस रीति से, चाहे वे जिस भी प्रकार से खोज करते हों, क्या वे अंधकार की ओर ले जाने वाले पथ पर नहीं चलते हैं? जो वे अर्जित करते हैं क्या वह कड़वा फल नहीं है? यह कह पाना काफी कठिन है कि ऐसे लोग जो उन लोगों का अनुकरण करते हैं जो बीते समयों में सफल हुए थे, वे अन्ततः सौभाग्य की ओर जाएंगे या आपदा की ओर। तो उन लोगों की सम्भावनाएं कितनी बदतर हैं जो असफल लोगों के पदचिन्हों के पीछे पीछे चलने के द्वारा खोज करते हैं? क्या उनकी असफलता पाने की सम्भावना और भी बड़ी नहीं है? वह पथ जिस पर वे चलते हैं, उसका क्या मूल्य है? क्या वे अपना समय बर्बाद नहीं कर रहे हैं? इस बात से परे कि लोग अपने अनुसरण में सफल होते हैं या असफल, ऐसा होने का, संक्षेप में, एक कारण है, और मामला यह नहीं है कि अपनी इच्छानुसार खोज करने के द्वारा उनकी सफलता या असफलता का निर्धारण किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

31. अधिकांश लोगों का परमेश्वर पर विश्वास का आधार दृढ़ धार्मिक विश्वास होता हैः वे परमेश्वर को प्रेम करने के योग्य नहीं होते हैं, और परमेश्वर का अनुसरण केवल एक रोबोट की तरह ही कर सकते हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची तड़प या भक्ति नहीं होती। वे मात्र चुपचाप उसका अनुसरण करते हैं। बहुत से लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परन्तु केवल कुछ ही हैं जो उसको प्रेम करते हैं; वे केवल परमेश्वर का "आदर" इसलिए करते हैं क्योंकि वे तबाही से डरते हैं, या फिर वे परमेश्वर की "प्रशंसा" करते हैं क्योंकि वह ऊँचा और शक्तिमान है—परन्तु उनकी श्रद्धा और आदर में कोई प्रेम या वास्तविक ललक नहीं होती है। अपने अनुभवों में वे सत्य के तुच्छ विषयों को खोजते हैं, या फिर कुछ निरर्थक रहस्यों को खोजते हैं। अधिकतर लोग सिर्फ अनुसरण करते हैं, वे आशीषों को प्राप्त करने के लिए ही गंदे पानी में मछली पकड़ते हैं; वे सत्य को नहीं खोजते हैं, न ही वे परमेश्वर से आशीष प्राप्त करने के लिए वास्तव में आज्ञापालन करते हैं। परमेश्वर पर केवल विश्वास से सभी लोगों का जीवन अर्थहीन है, यह बिना मूल्य का है, और इसमें उनके व्यक्तिगत विचार और लक्ष्य होते हैं; वे परमेश्वर को प्रेम करने के उद्देश्य से उस पर विश्वास नहीं करते हैं, परन्तु केवल आशीष पाने के लिए ही है। कई लोग वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है, वे जो चाहते हैं वही करते हैं, और कभी भी परमेश्वर के हितों को मानते नहीं हैं या चाहे वे कुछ भी करें वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं होता है। इस प्रकार के लोग एक सच्चा विश्वास तक प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के लिए प्रेम की तो बात ही क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से उद्धृत

32. परमेश्वर पर मानवजाति की आस्था का सबसे दुखद पहलू यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के मध्य में अपना प्रबंधन चलाता है और परमेश्वर के प्रबंधन के प्रति बेपरवाह रहता है। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि किस प्रकार से एक ही समय में परमेश्वर के प्रति समर्पण को खोजते हुए और उसकी आराधना करते हुए, वह कैसे अपने आदर्श गंतव्य का निर्माण करता है और इस गणित में लगा रहता है कि किस प्रकार से बड़ी से बड़ी आशीष और उत्तम गंतव्य को प्राप्त कर सके। अगर लोग इस बात को समझ भी जायें कि वे कितने दयनीय, घृणित और शोचनीय स्थिति में हैं, तो भी ऐसे कितने लोग हैं जो अपने आदर्शों और आशाओं का परित्याग कर सकते हैं? और ऐसा कौन है जो अपने कदमों को थाम ले और केवल अपने ही बारे में सोचना बंद कर दे? परमेश्वर को अपना प्रबन्धन पूर्ण करने के लिए ऐसे लोग चाहिये जो उसके साथ निकटता से सहयोग करें। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उसे समर्पित होने के लिये अपने दिमाग और देह को उसके प्रबंधकारणीय कार्य के लिये अर्पित कर दें; उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है जो अपने हाथ फैलाए खड़े रहें और उससे हर दिन मांगते ही रहें, उसे ऐसे लोग तो बिल्कुल नहीं चाहिए जो थोड़ा-सा कुछ करेंगे और फिर इस बात का इंतज़ार करेंगे कि अब परमेश्वर उनके लिये कुछ करे। परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है जो ज़रा-सा कुछ करेंगे और फिर ऐसा दिखलाएंगे जैसे पता नहीं उन्होंने कितना बड़ा काम कर दिया। वह ऐसे नृशंस लोगों से भी घृणा करता है जो उसके प्रबंधकारणीय कार्य को तो पसंद नहीं करते लेकिन हमेशा स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने की बातें करते रहते हैं। वह उन लोगों से तो और भी अधिक नफ़रत करता है जो मनुष्य को बचाने के लिये उसके काम से पैदा हुए मौके का फायदा उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग इस बात की चिंता कभी नहीं करते कि परमेश्वर अपने प्रबंधकारणीय कार्य के द्वारा क्या प्राप्त और अर्जित करना चाहता है वे केवल परमेश्वर के कार्य के द्वारा उपलब्ध अवसरों का उपयोग करके आशीषें प्राप्त करने के बारे में ही चिंता करते रहते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की चिंता नहीं करते, वे पूरी तरह से स्वयं के भविष्य और नियति में व्यस्त रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य को पसंद नहीं करते और उसकी इच्छा और मानवजाति को बचाने के कार्य में ज़रा सा भी दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, वे परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य से अलग जाकर केवल वही करते हैं जो उन्हें भाता है। परमेश्वर उनके व्यवहार का स्मरण नहीं करता है, न उसका अनुमोदन करता है और उनके प्रति अनुकूल भाव दिखाने की तो बात ही दूर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" से उद्धृत

33. लोगों के जीवन के अनुभवों में, वे प्रायः अपने लिए सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका को छोड़ दिया, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे तो इसमें अवश्य जोड़ना, और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कोई वचन दिए हैं? क्या उसने मेरे भले कर्मों को याद किया है? मेरा अन्त क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त कर सकता हूँ? ... प्रत्येक व्यक्ति लगातार, और प्रायः अपने हृदय में इस प्रकार का गुणा भाग करता है, और वे परमेश्वर से माँगें करते हैं जिनमें उनके कारण, और महत्वाकांक्षाएँ, तथा सौदे होते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है, परमेश्वर के बारे में लगातार योजनाओं को ईजाद करता रहता है, और लगातार परमेश्वर के साथ अपने अंत के बारे में बहस करता रहता है, और परमेश्वर से एक वक्तव्य निकलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह देता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर की खोज करने के साथ-साथ, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान व्यवहार नहीं करता है। वह हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करता है, लगातार उससे माँग करता रहता है, और यहाँ तक कि हर कदम पर उस पर दबाव डालता है, और एक इंच दिए जाने के बाद एक मील हथियाने की कोशिश करता है। परमेश्वर के साथ सौदबाजी करने के साथ-साथ, मनुष्य उसके साथ बहस भी करता है, और ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किसी निश्चित परिस्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त पड़ जाते हैं, और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भर जाते हैं। जब उसने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरम्भ किया था तब से, मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, स्विटज़रलैंड की सेना का एक चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा लेनदार माना है, मानो कि परमेश्वर से आशीषों और प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और कर्तव्य था, जबकि परमेश्वर की ज़िम्मेदारी मनुष्य की रक्षा और देखभाल करना और उसे भरण पोषण देना थी। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन सबकी "परमेश्वर में विश्वास करने" की मूल समझ, और परमेश्वर में विश्वास करने की अवधारणा की उनकी गहरी समझ ऐसी ही है। मनुष्य की प्रकृति के सार से लेकर उसकी व्यक्तिपरक खोज तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से सम्बन्धित हो। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ सम्भवतः कोई लेना देना नहीं हो सकता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य ने कभी यह विचार नहीं किया और न ही यह समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने में परमेश्वर का भय मानने, और परमेश्वर की आराधना करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थितियों के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। और यह सार क्या है? ऐसा है कि मनुष्य का हृदय द्वेषी है, यह छल और कपट को आश्रय देता है, और यह न त निष्पक्षता और धार्मिकता, या न ही उससे प्रेम करता है जो सकारात्मक है, और यह घिनौना और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के अधिक करीब नहीं आ सका है; उसने इसे बिलकुल भी परमेश्वर को नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य के सच्चे हृदय को कभी नहीं देखा है, न ही मनुष्य के द्वारा कभी उसकी आराधना की गई है। भले ही परमेश्वर कितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकाए, या कितना अधिक काम क्यों न करे, या मनुष्य को कितना ही अधिक प्रदान क्यों न करे, मनुष्य इसके प्रति अंधा, और सर्वथा उदासीन बना रहता है। मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपने हृदय का केवल अपने आप ही ध्यान रखना, अपने स्वयं के निर्णयों को ही लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करना, या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। आज मनुष्य की दशा ऐसी ही हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से उद्धृत

34. लोग कहते हैं कि परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है, और यह कि जब तक मनुष्य अंत तक उसके पीछे पीछे चलता रहेगा, वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे अधिक धर्मी है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक उसके पीछे पीछे चलता है, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है? मैं सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और अपने धर्मी स्वभाव से सभी मनुष्यों का न्याय करता हूँ, फिर भी जो अपेक्षाएं मैं मनुष्य से करता हूँ उसके लिए कुछ यथोचित स्थितियाँ होती हैं, और जिसकी अपेक्षा मैं करता हूँ उसे सभी मनुष्यों के द्वारा, चाहे वे जो कोई भी हों, अवश्य ही पूरा किया जाना चाहिए। मैं इसकी परवाह नहीं करता हूँ कि तेरी योग्यताएँ कितनी व्यापक और आदरणीय हैं; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तू मेरे मार्ग में चलता है कि नहीं, और सत्य के लिए तुझमें प्रेम और प्यास है कि नहीं। यदि तुझमें सत्य की कमी है, और उसके बजाय तू मेरे नाम को लज्जित करता है, और मेरे मार्ग के अनुसार कार्य नहीं करता है, और किसी बात की परवाह या चिंता किए बगैर बस नाम के लिए अनुसरण करता है, तो उस समय मैं तुझे मार कर नीचे गिरा दूँगा और तेरी बुराई के लिए तुझे दण्ड दूँगा, तब तेरे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तू ऐसा कह सकता है कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? आज, यदि तूने उन वचनों का पालन किया है जिन्हें मैंने कहा है, तो तू ऐसा इंसान है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। तू कहता है कि तूने हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करते हुए दुख उठाया है, कि तूने हमेशा हर परिस्थितियों में उसका अनुसरण किया है, और तूने उसके साथ अपना अच्छा और खराब समय बिताया है, किन्तु तूने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार जीवन नहीं बिताया है; तू सिर्फ हर दिन परमेश्वर के पीछे पीछे भागना और उसके लिए स्वयं को व्यय करना चाहता है, और तूने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन बिताने के बारे में नहीं सोचा है। तू यह भी कहता है, "किसी भी सूरत में, मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर धर्मी है। मैंने उसके लिए दुख उठाया है, मैं उसके लिए यहाँ वहाँ भागते रहता हूँ, और मैंने उसके लिए अपने आपको समर्पित किया है, और मैंने कड़ी मेहनत की है इसके बावजूद मेरी कद्र नहीं हुई है; वह निश्चय ही मुझे स्मरण रखता है।" यह सच है कि परमेश्वर धर्मी है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है: इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और इसे शरीर, या मानवीय सौदों के द्वारा कलंकित नहीं किया जा सकता है। वे सभी जो विद्रोही हैं और विरोध में हैं, और जो उसके मार्ग की सम्मति में नहीं हैं, उन्हें दण्डित किया जाएगा; किसी को भी क्षमा नहीं किया गया है, और किसी को भी बख्शा नहीं गया है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

35. क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई-नई प्रगति होती है, इसलिए यहां पर नया कार्य है, और इसलिए अप्रचलित और पुराना कार्य भी है। यह पुराना और नया कार्य परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है; प्रत्येक कदम पिछले कदम के बाद आता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुष्य की लम्बे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में सभी प्रकार की अवधारणाएं बना दी हैं। फिर भी मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार की अवधारणाएं बनाने की और भी अधिक अनुकूल बात यह है कि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है, और साथ ही प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का बहुत सालों से विस्तार हुआ है। इस प्रकार यह कहना सही होगा कि परमेश्वर में मनुष्यों के विश्वास में, विभिन्न अवधारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण मनुष्य के ज्ञान में निरंतर उत्पत्ति और विकास हुआ है जिसमें उसके पास परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की धारणाएं हैं—इस परिणाम के साथ कि परमेश्वर की सेवा करने वाले कई धार्मिक लोग उसके शत्रु बन बैठे हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक अवधारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता, इसके बजाय, निरंतर बदलता रहता है और कमोवेश परिवर्तित होता रहता है। यह कार्य स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यही परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत और अनेक उपायों में से एक है जिससे परमेश्वर अपने प्रबंधन को पूर्ण करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में ये समय-समय पर होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर पर विश्वास करता है, वह बहुत भिन्न है। वह पुराने, परिचित सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और जितने अधिक वे पुराने होते हैं उतने ही अधिक उसे प्रिय होते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, एक ऐसा दिमाग जो पत्थर के समान दुराग्रही है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नए रहने वाले और कभी भी पुराने न होने वाले परमेश्वर से घृणा करता है; वह हमेशा ही प्राचीन सफेद बाल वाले और स्थिर परमेश्वर को पसंद करता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छः हजार सालों से नया कार्य कर रहा है। तब, वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य की हठ के कारण या किसी मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के प्रबंधन के नियमों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परन्तु वे पादरी और महिलाएँ अभी भी फटी-पुरानी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को ऐसे आगे बढ़ाता जाता है मानो उसके साथ कोई है ही नहीं। हालांकि ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्यों को शत्रु बनाते हैं, और इनमें कभी मेल भी नहीं हो सकता है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, जैसे कि वे होकर भी नहीं हैं। फिर भी मनुष्य, अभी भी अपनी आस्थाओं और अवधारणाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी भी छोड़ता नहीं है। फिर भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: हालांकि मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं और वह अपना रुख परिस्थितियों के अनुसार हमेशा बदलता रहता है, और अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने हरा दिए गए दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और इंसानों में जो हार गए हैं और वे जो अभी भी हारने के लिए बचे हैं, उनके मध्य विजेता भी मौजूद हैं। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की अवधारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्यों के द्वारा ही उत्पन्न हुई हैं। फिर भी परमेश्वर इस कारण से मनुष्यों को नहीं क्षमा करता है, इसके अलावा, न ही वह परमेश्वर के कार्य के बाहर खेप-दर-खेप "परमेश्वर के लिए" ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा करता है। इसके बजाय, वह मनुष्यों की अवधारणाओं और पुरानी, पवित्र आस्थाओं के कारण बहुत ही ज्यादा चिढ़ा हुआ है और यहां तक कि वह उन तिथियों की भी उपेक्षा करता है जिसमें ये अवधारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये अवधारणाएँ उसके कार्य के कारण बनी हैं, क्योंकि मनुष्य की अवधारणाएं मनुष्यों के द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनका स्रोत मनुष्यों की सोच और दिमाग है, परमेश्वर नहीं बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्यों को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वह युगों और कालों में विभाजित है, न कि अनन्त और स्थिर है। यह इसलिए क्योंकि वह परमेश्वर है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के योग्य बनाता है, बजाय शैतान के जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम सब अभी भी यह नहीं समझते हो? तुम में परमेश्वर के प्रति अवधारणाएं हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नहीं हो क्योंकि तुम संकीर्ण दिमाग वाले हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य में बहुत कम बोध है, या इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मानवीय इच्छाओं के अनुसार नहीं है—इसके अलावा, न ही ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी अवधारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ सकते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है और क्योंकि तुममें परमेश्वर की सृष्टि की थोड़ी सी भी समानता नहीं है, इसलिए नहीं कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य केवल मनुष्य के कारण ही आये हैं। परमेश्वर के इरादे हमेशा नेक होते हैं: वह तुम्हें अवधारणा बनाने का कारण देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम फ़र्क नहीं कर सकते हो और हमेशा या तो अध्ययन या फिर विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अवज्ञा भी बहुत ज्यादा है। एक छोटा सा प्राणी जो पहले परमेश्वर के द्वारा दिया गया था, उसका बहुत ही नगण्य भाग लेने का साहस करता है, और परमेश्वर पर आक्रमण करने के लिए उसे पलट देता है—क्या यह मनुष्यों के द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित है कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और अपनी इच्छानुसार बेकार, बदबूदार, सड़े हुए सिद्धांतों के साथ ही साथ उन खोटी अवधारणाओं को व्यक्त करने में तो और भी अयोग्य है। क्या ये और भी बेकार नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं" से उद्धृत

36. परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता है, जिन तरीकों से वह कार्य करता है वे निरंतर बदलते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे लोग भी बदलते रहते हैं जो उसका अनुसरण करते हैं। जितना अधिक परमेश्वर का कार्य होगा, उतना ही अधिक मनुष्य परमेश्वर को जानेगा, और मनुष्य का स्वभाव भी परमेश्वर के कार्य के साथ बदलेगा। हालाँकि, परमेश्वर का कार्य इस कारण से हमेशा बदलता रहता है कि पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में नहीं जानने वाले और सत्य को न जानने वाले विवेकहीन लोग परमेश्वर के विरोधी बन जाते हैं। कभी भी परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है। न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ जाता है। जिस प्रकार परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर निरपवाद रूप से उसके आज के कार्य का निर्णय करता है, नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना परमेश्वर के लिए अत्यंत कठिन है। मनुष्य बहुत अधिक बाधाएँ प्रस्तुत करता है! मनुष्य की सोच बहुत ही ओछी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है, फिर भी वह ऐसे कार्य की व्याख्या करता है। परमेश्वर से दूर होकर, मनुष्य जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को ग्रहण करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जा रहे आशीषों को तो और भी कम ग्रहण करता है। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर की इच्छा हमेशा संतुष्ट रहेगी। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया ही जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं, उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं आत्म-अभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य का सावधानीपूर्वक अध्ययन करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का दृष्टिकोण अपनाता है। क्या यह मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसका विरोधी है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वह किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?" से उद्धृत

37. यदि तुम लोग परमेश्वर को मापने और निरूपित करने के लिए धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो कि परमेश्वर मिट्टी की कोई अपरिवर्ती मूर्ति हो, और तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के भीतर सीमांकित करते हो, और उसे कार्यों के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर को निन्दित किया है। क्योंकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने, अपने हृदयों में, परमेश्वर को प्रतिमा के साँचे में ढाला था, मानो कि परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही जिसे मसीह कहा जाता था परमेश्वर था, और क्योंकि वे परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करते थे मानो कि वह मिट्टी की एक मूर्ति (बेजान) हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए—निर्दोष यीशु को मृत्यु तक निन्दित करते हुए—सलीब पर चढ़ा दिया। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे नहीं छोड़ा, और दृढ़तापूर्वक उसे मृत्युदण्ड दे दिया। अतः यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर अपरिवर्ती है, और उसे बाइबल के अनुसार परिभाषित करता है, मानो कि उसने परमेश्वर के प्रबंधन की वास्तविक प्रकृति का पता लगा लिया हो, मानो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है सब मनुष्य के हाथों में हैं। लोग अत्यंत हास्यास्पद हैं, वे परम अहंकार से सम्पन्न हैं, और उन सबके पास आडंबरी वाक्पटुता की विशिष्ट योग्यता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना महान है, तब भी मैं कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो, कि ऐसे कोई नहीं हैं जो परमेश्वर के अधिक विरोध में हों, और कि तुम परमेश्वर की निंदा करते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने में और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी भी संतुष्ट नहीं होता है? इसलिए क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता है, उसकी अनेक धारणाएँ है, और उसका परमेश्वर का ज्ञान वास्तविकता से एक कतरा भी मेल नहीं खाता है, इसके बजाय वो नीरस ढंग से एक ही मूल विषय को बिना बदलाव के दोहराता रहता है और सभी परिस्थितियों के प्रति एक ही दृष्टिकोण रखता है। इस प्रकार, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "दुष्टों को निश्चय ही दण्ड दिया जायेगा" से उद्धृत

38. प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल सच्चाईयों का ही पालन करता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीह है," जो ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा से भी सन्देह के बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस तरह, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुकता है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के एक अंश को प्राप्त करने के बाद, वह इसके साथ ऐसा व्यवहार करता है मानो कि यह कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव उसी स्वरूप में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह अतीत में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है जिसका बस कोई अस्तित्व नहीं होता है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद, परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला यह व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली "केवल यहोवा में विश्वास करने और यीशु में विश्वास नहीं करने" में ग़लत थे, मगर अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसमें वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं" और "मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन जीवन बिताते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त नहीं करते हैं। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

39. मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों को प्यार करता है जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता है, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और मनुष्य के द्वारा अकल्पनीय एवं नश्वर मात्र द्वारा अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक मनुष्य के द्वारा विश्लेषित की जाती हैं, जिनकी वह सभी से बेपरवाह हो कर भी खोज करता है, और वह इन्हें प्राप्त करने की कोशिश करता है। जितना अधिक अवास्तविक ये होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से मनुष्य उनकी जाँच करता है और, यहाँ तक कि इतना दूर तक जा कर उनका विश्लेषण करता है, कि उनके बारे में अपने स्वयं की विस्तृत अवधारणाएँ बनाता है। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, मनुष्य प्रायः उतना ही अधिक उनके प्रति उपेक्षापूर्ण होता है; वह केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखता है और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाता है। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस वास्तविक कार्य के प्रति नहीं है जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, तुम लोग उतना ही अधिक उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम लोग उनकी जाँच करने के लिए अपना कोई भी समय नहीं निकालते हो, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन वास्तविक, सीधी-सादी अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और केवल उसकी वास्तविकता और सामान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग अज्ञातता के बीच विश्वास नहीं करते हो? अतीत में तुम लोगों का अज्ञात परमेश्वर में अविचल विश्वास था, और तुम लोगों की आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं थी। क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर छोटा सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्यों के द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उसकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता है? क्योंकि आज का परमेश्वर मनुष्य से जो कहता है वह ठीक वही है जिसे करने का मनुष्य सबसे अधिक अनिच्छुक है, और जो उसे लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह मनुष्यों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ना नहीं है? इस प्रकार से, अधिकांश लोग जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं वे देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक प्रकट सत्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से उद्धृत

40. बहुत वर्षों से, मैंने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा हो। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के बारे में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, इसे साफ-साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ है जिन्हें करने में वे असमर्थ हैं, और परमेश्वर को वैसा ही सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य और अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में मानता है। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएँ नहीं हैं, परमेश्वर एक मूर्ति है। जब किसी मसले से सामना होता है, तो परमेश्वर के पास कोई प्रवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, कोई विचार नहीं होता है; वह मनुष्य के वश में है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है; यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहिष्णुता की आवश्यकता होती है, परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने स्वयं के मन में एक परमेश्वर को गढ़ लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी माँगों को पूरा करवाते हैं और अपनी सभी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाते हैं। चाहे यह व्यक्ति कभी भी या कहीं भी क्यों न करे, और चाहे कुछ भी क्यों न करे, वे परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में, और परमेश्वर में अपने विश्वास में इस कल्पना को अपनाएँगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को भड़का देते हैं उसके पश्चात् परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, और चाहे लोग परमेश्वर का कैसे भी अपमान क्यों न करें, परमेश्वर उनमें से किसी का भी स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य के दोष, मनुष्य के अपराध, और मनुष्य की अवज्ञा उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहिष्णु एवं धैर्यवान रहेगा। परमेश्वर तब भी उनसे पहले के समान ही प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, चाहे कोई व्यक्ति परमेश्वर पर किसी भी प्रकार से विश्वास क्यों न करें, अगर वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तो परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक प्रवृत्ति रखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब तुम परमेश्वर पर विश्वास कर रहे होत हो उस समय, हो सकता है कि तुम परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखते हो, तुम प्रतिदिन उसका अध्ययन कर रहे होते हो, तुम हर दिन इसे पढ़ते हो, किन्तु तुम वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देते हो, तुम उसे खाली हवा के रूप में मानते हो, उसे एक व्यक्ति के रूप में मानते हो, और तुममें से कुछ लोग उसे केवल एक कठपुतली के रूप में मानते हों। मैं इसे इस प्रकार क्यों कहता हूँ? क्योंकि जिस प्रकार से मैं इसे देखता हूँ, उसमें चाहे तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या किसी परिस्थिति से होता है, वे बातें जो तुम लोगों के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज करने से नहीं होता है? तुम केवल वही जानते हो जो तुम स्वयं सोच रहे हो, और जो तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तुम्हारे स्वयं के विचारों, और तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोणों को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोप दिया जाता है। वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, जिन्हें ऐसे मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है जिनके मुताबिक बिना डाँवाडोल हुए चला जाता है। समय के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुम्हें परमेश्वर से निरंतर दूर हीकरता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से उद्धृत

41. जब लोग मेरे साथ इकट्ठे होते हैं, तो मेरा हृदय आनन्द से भर जाता है। तुरंत, मैं मनुष्यों के बीच अपने हाथों से आशीर्वाद देता हूँ, कि लोग मेरे साथ मिलें, और ऐसे दुश्मन न बनें जो मेरी अवज्ञा करते हैं, बल्कि ऐसे मित्र बनें जो मेरे साथ अनुकूल हों। इस प्रकार, मैं भी मनुष्य के प्रति सहृदय हूँ। मेरे कार्य में, मानव को एक उच्च-स्तरीय संगठन के सदस्य के रूप में देखा जाता है, इसलिए मैं उसकी ओर अधिक ध्यान देता हूँ, क्योंकि वह हमेशा मेरे कार्य का उद्देश्य रहा है। मैंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली है, ताकि उनके दिल मेरी ओर भरोसे से देख सकें—फिर भी वे पूरी तरह से अनजान हैं कि मैं ऐसा क्यों करता हूँ, और इंतजार के अलावा वे और कुछ भी नहीं करते। यद्यपि एक जगह है जो मैंने लोगों के दिलों में बनाई है, उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि मैं वहाँ बस जाऊं। इसके बजाय, वे अपने दिलों में "किसी पवित्र" के अचानक आ पहुँचने की प्रतीक्षा करते हैं। चूँकि मेरी पहचान बहुत "तुच्छ" है, मैं लोगों की माँगों से मेल नहीं खाता हूँ और इस प्रकार उनके द्वारा हटा दिया जाता हूँ। चूँकि वे जो चाहते हैं वह एक ऐसा "मैं" है जो उच्च और शक्तिशाली हो—जबकि मैं जब आया, तो मैं मनुष्य को ऐसा प्रतीत नहीं हुआ था, इसलिए वे दूर निगाहें टिकाये रहे, अपने दिलों में उसकी प्रतीक्षा करते रहे। जब मैं लोगों के सामने आया, तो उन्होंने आम जनता के सामने मुझे खारिज कर दिया। मैं केवल एक तरफ खड़े रह सकता था, मनुष्य के "निर्णय" का इंतजार करते हुए, यह देखने के लिए कि लोग मेरे साथ, इस त्रुटिपूर्ण "उत्पाद" के साथ, आखिर क्या करेंगे। मैं लोगों के दागों को नहीं, बल्कि उनके उस हिस्से को देखता हूँ जो बेदाग़ है, और इससे मैं संतुष्ट हूँ। लोगों की आँखों में, मैं आकाश से उतरा हुआ एक "नन्हा सितारा" हूँ, मैं स्वर्ग में केवल सबसे छोटा हूँ, और आज धरती पर मेरा आगमन परमेश्वर ने नियुक्त किया था। परिणामस्वरूप, लोग मेरे साथ परमेश्वर का मिलान करने से बेहद आशंकित होकर, "मैं" और "परमेश्वर" शब्दों की अधिक व्याख्याओं के साथ आए हैं। क्योंकि मेरी छवि में परमेश्वर की सूरत का कोई अंश नहीं, सभी लोग मानते हैं कि मैं एक सेवक हूँ जो परमेश्वर के परिवार का नहीं है, और कहते हैं कि यह परमेश्वर की छवि नहीं है। संभवतः ऐसे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर को देखा है, परन्तु धरती पर अंतर्दृष्टि की मेरी कमी के कारण, परमेश्वर मेरे सामने कभी "प्रकट" नहीं हुआ है। शायद मेरे अंदर बहुत कम "विश्वास" है, और इसलिए लोग मुझे छोटा समझते हैं। लोग सोचते हैं कि यदि कोई वास्तव में परमेश्वर है, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य की भाषा में निपुण होगा, क्योंकि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। लेकिन तथ्य इसके ठीक विपरीत हैं: न केवल मैं मनुष्य की भाषा में अकुशल हूँ, बल्कि कई बार ऐसा होता है जब मैं उसकी "कमियों" के लिए "प्रावधान" भी नहीं कर सकता। परिणामस्वरूप, मुझे थोड़ा "दोषी" महसूस होता है क्योंकि मैं लोगों की "माँग" के अनुसार कार्य नहीं करता, बल्कि सिर्फ उनमें जो "कमियाँ" हैं, उसके अनुसार सामग्री तैयार करता हूँ और कार्य करता हूँ। मैं मनुष्य से कुछ ज्यादा नहीं चाहता, फिर भी लोग अन्यथा मानते हैं। इस प्रकार, उनकी "नम्रता" उनके हर कदम से प्रकट होती है। वे हमेशा मेरे आगे चलने को प्रवृत्त होते हैं, मेरी अगुआई करते हुए, बहुत डरते हुए कि कहीं मैं खो न जाऊँ, भयातुर होते हैं कि मैं पहाड़ों के भीतर प्राचीन जंगलों में कहीं भटक जाऊँगा। नतीजतन, लोग हमेशा मेरी अगुआई करते रहते हैं, बहुत भयभीत होकर कि मैं कालकोठरी में चला जाऊँगा। मेरे पास लोगों की आस्था का कुछ हद तक "अनुकूल प्रभाव" है, क्योंकि उन्होंने भोजन या नींद की सोचे बिना मेरे लिए "परिश्रम" किया है, इस हद तक कि मेरे लिए उनके परिश्रम ने उनकी दिन-रात की नींद चुरा ली है और उन्हें सफेद बालों वाला बना दिया है—जो यह साबित करने के लिए काफी है कि उनका विश्वास सारे विश्वों से "ऊँचा", और सभी युगों के प्रेरितों और नबियों से "बढ़कर" है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 32" से उद्धृत

42. यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के देह धारण पर विश्वास नहीं करता है, अर्थात कोई जो प्रत्यक्ष परमेश्वर के कार्य और बातों पर और प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास न करके स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—उसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों के पास मानवीयता और विवेक का अभाव होता है, फिर सत्य के बारे में तो क्या कहें। ये वे लोग हैं जो प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते किंतु अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर इनके लिए सर्वाधिक विश्वसनीय है और उनके हृदयों को सबसे अधिक खुशी देता है। वे जिसे खोजते हैं वह वास्तविकता का सत्य नहीं है, न ही जीवन का वास्तविक सार है, परमेश्वर की योजना तो है ही नहीं; वे केवल रोमांच का पीछा करते हैं। वे सब बातें या वस्तुएँ जो उन्हें अधिक से अधिक उनकी अपनी इच्छाओं को पूरा करने का अवसर देती हैं, वे ही हैं जिन पर वे विश्वास करते और जिनका वे पीछा करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं कि निज इच्छाओं को पूरा करें—सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ये लोग बुरे कार्य करने वाले नहीं हैं? वे अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, और वे यह विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उन्हें नष्ट कर देगा, इन "इन भले लोगों को"। बल्कि ये विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें बचाकर रखेगा, और इससे भी अधिक यह कि प्रचुरता से पुरस्कार देगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत से कार्य किये हैं, और बड़े परिमाण में परमेश्वर के प्रति "निष्ठा" का प्रदर्शन किया है। यदि उन्हें साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करना हो, तो जैसे ही उनकी अभिलाषाएँ अधूरी रहें, वे तुरंत परमेश्वर के विरुद्ध बोलने लगेंगे और क्रोध से भर जाएँगे। ये बुरे लोग हैं जो अपनी अभिलाषाएँ पूरी करने की खोज में रहते हैं, ये लोग सत्य का पीछा करने वाले निष्ठावान लोग नहीं हैं। ऐसे लोग तथाकथित दुष्ट लोग हैं जो मसीह के पीछे चलते हैं। जो लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं वे सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। वे मानवजाति के भविष्य के परिणाम को समझने में और भी अधिक अयोग्य हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी कार्य या वाणी पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे मानव जाति के भविष्य के गंतव्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। इस कारण, यदि वे साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करें तब भी वे बुरा करेंगे और सत्य को नहीं खोजेंगे, और न उस सत्य पर अमल करेंगे, जिसे मैं चाहता हूँ। वे लोग जो यह विश्वास नहीं करते कि वे नष्ट होंगे, वे ही लोग असल में नष्ट होंगे। वे सब विश्वास करते हैं कि वे बहुत चतुर हैं, और वे ही सत्य पर अमल करते हैं। वे अपने बुरे आचरण को सत्य मानते हैं और उसमें सुख पाते हैं। ये दुष्ट लोग अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, वे सत्य को धर्मशिक्षा मानते हैं, और अपने बुरे कार्यों को सत्य मानते हैं, और अंत में वे केवल वहीं काटेंगे जो उन्होंने बोया है। लोग जितना अधिक आत्मविश्वास रखते हैं और जितना अधिक हठ करते हैं, वे उतना ही अधिक सत्य को पाने में असमर्थ हैं; लोग जितना ज्यादा स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ये वे लोग हैं जो दण्डित किये जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

43. लोगों की आंखों में, परमेश्वर के वचन हर दिन उपयोग में आने वाले बर्तन की तरह हैं, वे उन्हें महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला पाते—वे दयनीय अभागे बन गए हैं जो सच्चाई से अवगत हैं परन्तु इसे लागू नहीं करते। मनुष्य की यही एक अकेली कमी, इसलिए, कुछ समय के लिए परमेश्वर की घृणा उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है, और इस तरह वह कई बार कहता है कि लोग उसके वचनों पर ध्यान नहीं देते। फिर भी अपनी अवधारणाओं में, लोग यह विचार रखते हैं: "हर दिन हम परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं, यह कैसे कहा जा सकता है कि हम उन पर ध्यान नहीं देते? क्या यह हम पर अन्याय नहीं है?" परंतु, तुम्हारे लिए मुझे थोड़ी व्याख्या करने दो—लोग शर्म से पानी-पानी हो जाएंगे। जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे अपना सिर मंज़ूरी में हिला देते हैं, वे झुक जाते हैं और खुरचते हैं, जैसे कोई कुत्ता अपने मालिक के वचनों की गुलामी करता है। इसलिए, इस समय, लोग अयोग्य महसूस करते हैं, आँसू उनके चेहरों पर दिखते हैं, ऐसा लगता है जैसे वे पश्चाताप करना चाहते हैं और फिर से शुरू करना चाहते हैं—परंतु, एक बार जब समय बीत जाता है, तो उनकी भेड़ जैसी यह झेंप तुरंत ग़ायब हो जाती है, और भेड़ियापन उसकी जगह ले लेता है, वे परमेश्वर के वचनों को एक तरफ़ रख देते हैं, और हमेशा विश्वास करते हैं कि उनके स्वयं के मामले प्राथमिक हैं, कि परमेश्वर के मामले अंत में आते हैं, और उनकी इन क्रियाओं के कारण, वे कभी भी परमेश्वर के वचनों को क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं। जब तथ्य सामने आते हैं, वे अपनी कोहनी को बाहर की तरफ़ निकालते हैं[च]—वह अपने ही लोगों को धोखा देते हैं—कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है, "वह जीविका के लिए मुझ पर भरोसा करते हुए 'दूसरी तरफ भागती है।'" केवल इसी से ही यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के वचनों में थोड़ा-सा भी झूठ नहीं हैं, वे पूरी तरह से सत्य हैं, और इसमें थोड़ी-सी भी अतिशयोक्ति नहीं, फिर भी कुछ हद तक महत्व कम करके कहे गए प्रतीत होते हैं, क्योंकि मनुष्य की कद-काठी बहुत छोटी है, वह स्वीकृति के लिए असमर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 36" से उद्धृत

44. कई लोग परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन पढ़ने के लिए ही उठाते हैं, यहां तक कि उसके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती सम्पत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं और इससे भी अधिक हर जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, दूसरों की उसके वचनों से, आपूर्ति करते हैं, सहायता करते हैं। वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना हुआ, उसके वचन की गवाही देना हुआ; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना हुआ; वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना हुआ, ऐसा करना उसके वचन को अपने जीवन में लागू करना हुआ, कि ऐसा करने से उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी और वे बचाए जाएंगे और पूर्ण बनेंगे। परन्तु, परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हुए भी, वे कभी परमेश्वर के वचन पर अमल नहीं करते या अपने आप को परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है उसके अनुरूप नहीं ढालते। इसके बजाय, वे छल से दूसरों की प्रशंसा और भरोसे को प्राप्त करने, अपने आप ही प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन करने और उसे चुराने के लिए परमेश्वर के वचन को काम में लाते हैं। वे परमेश्‍वर के वचन के प्रसार से मिले अवसर को, परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के रूप में उपयोग करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परन्तु ये लोग परमेश्वर के वचन के प्रचार करने की प्रक्रिया में, न केवल परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल वे उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिये, दूसरों को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से सहायता और आपूर्ति पहुंचाने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने अपने को उससे वंचित रखा है, और इन सभी बातों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने में या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा की जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, परमेश्वर के बारे में उनकी ग़लतफ़हमियां और भी गहरा रही हैं; उस पर भरोसा न करना और भी अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएं और भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के बारे में अपनी ही परिकल्पना से आपूर्ति और निर्देशन पाकर, वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिल्कुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हैं, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया है और बचा लिए गए हैं, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य तक पहुँच बना ली है, परमेश्वर के अभिप्राय को समझ लिया है और परमेश्वर को जानने के मार्ग को खोज लिया है, मानो प्रचार करने की प्रक्रिया में, वे परमेश्वर से कई बार रू-ब-रू होते हैं। और अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गांभीर्य भरी परवाह और उदार प्रयोजनों का निरंतर बोध करते प्रतीत होते हैं और साथ-ही-साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जानने वाले, उसके सार को जानने वाले और उसके धार्मिक स्वभाव को समझने वाले प्रतीत होते हैं। इस आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी महानता की स्थिति से और भी अच्छे से परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचन के ज्ञान की सतही जानकारी से ओत-प्रोत होने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्टों को सहने के उनके संकल्प को दृढ़ता मिली है और परमेश्वर के ज्ञान की उनकी गहराई और बढ़ी है। शायद ही वे यह जानते हैं कि जब तक वे परमेश्वर के वचन का वास्तविक अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर के बारे में सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी ही काल्पनिक इच्छाओं और अनुमान से निकला हुआ होगा। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी जांच के सामने ठहर नहीं सकेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उच्चता परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या जांच-पड़ताल के तहत बिल्कुल भी नहीं ठहर सकेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं, और उनका तथाकथित परमेश्वर का ज्ञान भी उनकी कोरी-कल्पनाओं की उड़ान है। वास्तव में, ये लोग, जिन्होंने एक दृष्टि से, परमेश्वर के वचनों में काफी श्रम डाला है, उन्होंने कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वास्तविक आस्‍था क्या है, वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है, वास्तविक सरोकार क्या है, या परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान क्या है। वे सिद्धान्तों, कल्पनाओं, ज्ञान, भेंट, परम्परा, अंधविश्वास और यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को लेकर उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसके पीछे चलने के लिए "निवेश पूंजी" और "सैन्य हथियार" के तौर पर प्रयोग करते हैं, यहां तक कि उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, परमेश्वर के निरीक्षण, परीक्षण, ताड़ना करने और न्याय का सामना करने, उनसे संघर्ष करने के लिए और परमेश्वर को जानने के लिए, वे इस पूंजी और असलहे को लेकर उसे जादुई ताबीज़ में बदल देते हैं। अंत में, जो कुछ भी वे एकत्रित करते हैं उसमें परमेश्वर के बारे में, धार्मिक संकेतार्थों, सामंती अंधविश्वासों, और सभी प्रकार की प्रेम, वीभत्‍स और रहस्‍यमयी कथाओं से ओत-प्रोत निष्‍कर्षों से अधिक और कुछ नहीं होता, तथा उनका परमेश्वर को जानने और परिभाषित करने का तरीका केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करने वाले लोगों के सांचे में ही ढला होता है होती है—जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व, जिन बातों का वास्ता सच्चे परमेश्वर से है—ऐसी बातें हैं जो उनकी समझ में नहीं आईं हैं, जो पूरी तरह से असंगत और दो ध्रुवों की समान पूरी तरह विपरीत हैं। इस प्रकार से, हालांकि वे परमेश्वर के वचन के प्रावधान और पालन-पोषण में जी रहे हैं, सही मायनों में वे फिर भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने में वाकई असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी सच्चा सम्बन्ध या संवाद रखा है अत: उनके लिए यह असम्भव है कि वे परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ स्‍थापित कर सकें या फिर वे स्‍वयं में परमेश्वर में सच्‍चा विश्‍वास, उसका अनुसरण या उसकी आराधना जागृत कर सकें। कि उन्हें इस प्रकार से परमेश्वर के वचनों का सम्‍मान करना चाहिए, कि इस प्रकार उन्‍हें परमेश्वर का सम्मान करना चाहिए—इस दृष्टिकोण और रवैये ने उन्हें उनके प्रयासों में खाली हाथ रहने और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर बने न रह पाने के लिए अनन्तकाल तकअभिशापित कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह इसको प्रदर्शित करता है कि अनन्त काल से वे परमेश्वर के शत्रु रहे हैं और अनन्त काल तक वे कभी भी उद्धार को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" से उद्धृत

45. मैं तुम लोगों के जीवन में प्रकट होता हूँ लेकिन तुम लोग हमेशा अनजान रहते हो और मुझे पहचान भी नहीं सकते हो। तुम लोगों से कहे गए वचनों में लगभग आधे वचन तुम लोगों का न्याय करते हैं, और उनमें से आधे प्रभावी होते हैं, जिससे कि तुम लोग भ्रम में डाल दिए जाते हो। शेष आधे वचन तुम लोगों को जीवन के बारे में सिखाते हैं और स्वयं को संचालित कैसे करें इसके बारे में हैं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे वे तुम लोगों के लिए मौजूद ही नहीं हैं, और जैसे कि तुम लोग खेलते हुए बच्चों की बातें सुन रहे हो, जिसके प्रति तुम लोग हमेशा एक "छिपी हुई" मुस्कान देते हो, और फिर कुछ भी नहीं किया जाता है। तुम लोग इन चीज़ों के बारे में कभी चिंतित नहीं रहे हो; तुम लोगों ने हमेशा मेरे कार्यों को अपनी जिज्ञासा से ही देखा है जिससे कि अब तुम लोग अँधेरों में गिर गए हो और प्रकाश को देख नहीं सकते हो—तुम लोग अँधेरे में दयनीय ढंग से रो रहे हो। जो मैं चाहता हूँ वह तुम लोगों की आज्ञाकारिता है, तुम लोगों की निःशर्त आज्ञाकारिता और इससे भी ज्यादा, मेरी अपेक्षा है कि तुम लोग पूरी तरह से जो कुछ मैं कहता हूँ, उसके बारे में आश्वस्त रहो। तुम लोगों को उपेक्षा का दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए और विशेष रूप से तुम लोगों को इसका चयन करते हुए सामना नहीं करना चाहिए, यह कहना आवश्यक न होगा कि तुम लोग हमेशा मेरे वचनों और मेरे कार्य के प्रति उदासीन रहे हो। मेरा कार्य तुम लोगों के बीच किया जाता है और मैंने तुम लोगों के लिए बहुत सारे वचन प्रदान किए हैं, लेकिन यदि तुम लोग मेरे साथ इस तरह से टाल-मटोल करते रहोगे, तो जो कुछ भी तुमने हासिल नहीं किया और आचरण में नहीं लिया, मैं केवल उसे गैर-यहूदी परिवारों को दे सकता हूँ। सृष्टि में क्या है जो मेरे हाथों में नहीं? तुम लोगों में से अधिकांश "परिपक्व बुढ़ापे" की उम्र के हो और तुम लोगों के पास इस तरह के कार्य को स्वीकार करने की ऊर्जा नहीं है। तुम लोग एक हानहाओ[छ] पक्षी की तरह हो, बस मुश्किल से गुज़ारा करते हुए, और तुम लोगों ने कभी भी मेरे वचनों को गंभीरता से नहीं लिया है। युवा लोग अत्यंत वृथा और अति-आसक्त हैं और वे मेरे कार्य के प्रति और भी कम ध्यान देते हैं। वे मेरे भोज के व्यंजनों को भोगने की चाह नहीं करते; वे एक छोटे-से पक्षी की तरह हैं जो अपने पिंजरे से बाहर निकल बहुत दूर जाने के लिए उड़ गया है। इस तरह के युवा और वृद्ध लोग मेरे लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "युवा और वृद्ध लोगों के प्रति वचन" से उद्धृत

46. कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। क्योंकि ये लोग, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कितने वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं। वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धान्तों और चीज़ों को करने के तरीके के मुताबिक चलते हैं, और ज़िन्दा बचे रहने के उनके नियम एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में ग्रहण नहीं किया, कभी भी विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर का वचन सत्य है, परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कभी इरादा नहीं किया, और परमेश्वर को कभी भी अपने परमेश्वर के रूप में नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म की शौकिया रुचि के रूप में मानते हैं, परमेश्वर के साथ महज एक आध्यात्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं, इसलिए वे नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव, या परमेश्वर का सार कोशिश किए जाने और समझे जाने लायक है। तुम कह सकते हो कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर के अनुरूप है उसका इन लोगों से कोई लेना देना नहीं है। उनकी रूचि नहीं है, और वे ध्यान देने का कोई प्रयास नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है: परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, और परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; यह अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे बस वचनों में परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कोई वास्तविक कदम नहीं उठाते हैं। साथ ही वे व्यावहारिक रूप से भी कुछ नहीं करते हैं, और सोचते हैं कि वे बहुत चतुर हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से उद्धृत

47. मेरे सामने तुम्हारे इतने वर्षों के काम ने मुझे वह उत्तर दे दिया जो मुझे पहले कभी नहीं मिला था। और इस उत्तर से यह प्रश्न सामने आता हैः "सच्चाई और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है?" जो प्रयास मैंने मनुष्य में प्रवाहित किया है मेरे मनुष्य से मेरे प्रेम के सार-तत्व को साबित करता है, और मेरे सामने मनुष्य के कार्यों ने सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के इंसान के मुख्य सार-तत्व को भी प्रमाणित कर दिया है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ जिन्होंने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी ऐसा कोई समय नहीं होता है जब मेरा अनुसरण करने वाले मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ होते हों; वे मेरे किसी भी सुझाव को जो मुझसे आता है, स्वीकार करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। यही वह बात है जो मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे समझने में समर्थ नहीं है, इसके अतिरिक्त, कोई भी मुझे ग्रहण करने में सक्षम नहीं है, भले ही मेरी मनोवृत्ति निष्कपट और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी अपने मूल इरादों के अनुसार मेरे द्वारा सौंपे गए कार्य को कर रहे हैं; वे मेरे विचारों को नहीं खोजते हैं और मेरी अपेक्षाओं की खोज तो बहुत ही कम करते हैं। वे अभी भी दावा करते हैं कि वफादारी के साथ मेरी सेवा करते हैं, जबकि पूरे समय मुझसे विद्रोह करते रहते हैं। बहुत से लोग यह विश्वास करते हैं कि वे सच्चाईयाँ जो उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिन्हें वे व्यवहार में नहीं ला सकते हैं वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए, मेरी सच्चाईयाँ नकारने और दरकिनार करने के लिये हैं तब उसी समय, मैं वह बन जाता हूँ जिसे मनुष्य एकमात्र परमेश्वर के रूप में अपने शब्दों में स्वीकार करता है, परन्तु साथ ही मुझे एक ऐसे परदेशी के रूप में मानता है जो सत्य, मार्ग और जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता हैः मेरे वचन सदा-सर्वदा न बदलने वाले सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति हूँ और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों की कीमत और उसका अर्थ इसके द्वारा निर्धारित नहीं होता है कि उन्हें मानवजाति के द्वारा पहचाना और स्वीकारा गया है कि नहीं, परन्तु यह स्वयं वचनों के सार-तत्व के द्वारा होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा इंसान मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, फिर भी मेरे वचन का मूल्य और मानवजाति के प्रति उसकी सहायता का मूल्यांकन किसी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसलिए जब बहुत सारे लोगों का सामना मेरे वचनों से होता है जो विद्रोह करते हैं, उनका खण्डन करते हैं, या उनसे पूरी तरह घृणा करते हैं, तो उन सब के प्रति मेरा रवैया यह हैः समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इसके अतिरिक्त, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगाः जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इसके अलावा, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए" से उद्धृत

48. इन वर्षों में, तुमने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मेरे प्रति वफादारी नहीं दिखाई है। इसके बजाए, तुम उन लोगों के चारों ओर घूमते रहे हो जिनसे तुम प्रेम करते हो और ऐसी चीज़ों के चारों ओर जो तुम्हें प्रसन्न करती हैं, इतना ज़्यादा कि उन्हें हृदय के करीब रख लिया और उन्हें कभी भी, किसी भी समय, कहीं भी छोड़ा नहीं। जब तुम किसी एक चीज़ के विषय में, जिसे तुम प्रेम करते हो, उत्सुकता और जुनून से भर जाते हो, तो यह हमेशा उस समय में होता है जब तुम मेरा अनुसरण करते हो, या तब होता है जब तुम मेरे वचनों को ध्यान से सुनते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि अपने "पालतू" के प्रति वफादार होने और उनसे प्रसन्न होने के बजाए, तुम उस वफादारी का इस्तेमाल करो जो मैं तुम से चाहता हूँ। यद्यपि तुम मेरे लिए किसी एक या दो चीज़ों का बलिदान करते हो, फिर भी यह पूरी तरह तुम्हें नहीं दर्शाता है, और यह नहीं दिखाता है कि वह मैं हूँ जिसके प्रति तुम सचमुच में वफादार हो। तुम अपने आप को उन कार्यों में लीन कर देते हो जिनके विषय में, तुम में जुनून हैः जैसे कि कोई बेटे-बेटियों को लेकर, कोई अपने पतियों, पत्नियों, धन सम्पत्ति, कार्य, ऊँचे अधिकारियों, पदस्थिति या स्त्रियों को लेकर वफादार होते हैं। जिनके प्रति तुम वफादार होते हो, उन्हें लेकर तुम कभी भी ऊबते नहीं हो और झुंझलाते नहीं हो; सिवाय इसके, तुम उन चीज़ों को, जिनके प्रति तुम वफादार हो, उन्हें बड़ी मात्रा और गुणवत्ता में पाने के लिए अधिक लालायित होते हो, और तुम कभी भी निराश नहीं होते हो। उन चीज़ों की तुलना में एवं उन चीज़ों को लेकर जिनके बारे में तुम जुनूनी हो, मुझे और मेरे वचनों को हमेशा ही सबसे आखिरी स्थान में धकेल देते हो। और तुम्हारे पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं बचता कि उन्हें आखिरी श्रेणी में रखो। कुछ लोग आखिरी स्थान को किसी और चीज़ के लिए छोड़ देते हैं ताकि वे उसके प्रति वफादार हो सकें जिसे अभी तक खोजा नहीं गया है। ऐसे लोगों ने कभी भी अपने हृदय में मेरा थोडा-सा भी स्थान नहीं रखा है। शायद तुम सोचोगे कि मैं तुमसे बहुत कुछ अपेक्षा करता हूँ या भूलवश तुम पर दोष लगाता हूँ, लेकिन क्या तुमने कभी उस सच्चाई पर गौर किया है कि जब तुम आनन्दपूर्वक अपने परिवार के साथ समय बिताते रहते हो, तब तुम एक बार भी मेरे प्रति वफादार नहीं होते हो? ऐसे समय में, क्या तुम्हें इससे तकलीफ नहीं होती? अपने परिश्रम का प्रतिफल पाकर जब तुम्हारा हृदय आनन्द से भर जाता है, तब क्या तुम इस बात को लेकर हताशा महसूस करते हो कि तुमने अपने आपको पर्याप्त सच्चाई प्रदान नहीं की है? मेरी स्वीकृति न पाने के बाद तुम कब रोए हो? तुमने अपने दिमाग को घासफूस से भर दिया है और अपने बेटे-बेटियों के लिए बड़ी तकलीफ उठाते हो। फिर भी तुम सन्तुष्ट नहीं होते हो एवं तुम तब भी विश्वास करते हो कि तुम उनके प्रति परिश्रमी नहीं हो, और यह कि तुम ने पूरी कोशिश नहीं की है। परन्तु तुम मेरे लिए, हमेशा से कर्तव्यों को लेकर ढीले और लापरवाह रहे हो, और तुमने केवल मुझे अपनी यादों में रखा है पर अपने हृदय में नहीं। मेरा प्रेम और कोशिश हमेशा तुम्हारे द्वारा महसूस किए बगैर ही चले जाते हैं और तुमने कभी इसे समझने की कोशिश नहीं की। तुम सिर्फ संक्षिप्त विचारों में ही लगे रहते हो, और विश्वास करते हो कि यह काफी होगा। इस तरह की "वफादारी" वह नहीं है जिसके लिए मैंने लम्बे समय से लालसा की है; परन्तु यह लम्बे समय से मेरे लिए घृणास्पद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम किस के प्रति वफादार हो?" से उद्धृत

49. यदि अब मुझे तुम्हारे सामने कुछ धन-सम्पत्ति रखनी होती और तुम से कहना होता कि खुलकर चुनिए, यह जानते हुए कि मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराऊँगा, तो बहुतेरे धन-सम्पत्ति को चुनते और सत्य को छोड़ देते। पर तुम से बेहतर वे होंगे जो धन-सम्पत्ति को छोड़ कर अनिच्छा से सत्य को चुनेंगे, जबकि वे जो दोनों के बीच हैं, वे एक हाथ से धन-सम्पत्ति को पकड़ेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह से, क्या तुम्हारा असली स्वभाव प्रकट नहीं होता? जब सत्य और किसी अन्य चीज़ के बीच, जिसके प्रति तुम वफादार हो, चयन करते समय तुम सभी ऐसा ही निर्णय लोगे, और तुम्हारी मानसिकता वही रहेगी। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं जो सही या ग़लत के बीच में झूल गए? सकारात्मक और नकारात्मक, तथा काले और सफेद के बीच प्रतियोगिता में, तुम निश्चित तौर पर अपने उन चुनावों से परिचित हो जो तुमने परिवार और परमेश्वर, संतान और परमेश्वर, शांति और बिखराव, धन-सम्पत्ति और ग़रीबी, पदस्थिति और सामान्य स्थिति, समर्थन दिए जाने और अलग फेंक दिए जाने इत्यादि के बीच किया है। शांतिपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच, तुमने बेझिझक पहले को चुना, और वह भी बिना किसी संकोच के; धन-सम्पत्ति और कर्तव्यों के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना, और तुम में किनारे पर पहुँचने की इच्छा[ज] भी कम है; भोग-विलास और ग़रीबी के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना; बेटे, बेटियों, पत्नियों और मेरे बीच में, तुमने पहले को चुना; धारणा और सत्य के बीच में, तुमने एक बार फिर पहले को चुना। तुम्हारी हर प्रकार की बुराइयों का सामना करते हुए, वास्तव में मैंने तुममें विश्वास खो दिया है। मैं बहुत ज़्यादा आश्चर्यचकित हूँ कि तुम्हारा हृदय कोमल होने से इतना प्रतिरोध करता है। सालों के अथक प्रेम और प्रयास ने मुझे प्रकट रूप में केवल तुम्हारा तिरस्कार और निराशा ही प्रदान की है। फिर भी मेरी आशाएँ हर गुज़रते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन तो पहले से ही हर किसी के सामने पूरी तरह से रख दिया गया है। तो भी, तुम लगातार उसकी खोज करते हो जो अंधकार और बुराई से सम्बंध रखता है, और वह तुम पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देता है। अगर ऐसा है, तो तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुमने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? यदि तुम्हें फिर से चुनने को कहा जाए, तो तुम्हारी स्थिति क्या होगी? तो क्या पहले जैसी ही होगी? जो तुम मुझे दोगे क्या वह तब भी निराशा और अति दुखदायी कष्ट होगा? क्या तुम्हारे हृदयों में थोड़ा-सा भी उत्साह होगा? क्या तुम तब भी नहीं जानोगे कि मेरे हृदय को सुकून देने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम किस के प्रति वफादार हो?" से उद्धृत

50. मैं मनुष्य के व्यस्तता के समय में अपने आपको छिपा कर रखता हूँ और उसके खाली समय में अपने आपको प्रकट करता हूँ। मानव जाति सोचती है कि मैं अन्तर्यामी और परमेश्वर स्वयं हूँ जो सभी निवेदनों को स्वीकार करता है। इसलिए अधिकतर लोग मेरे सामने केवल परमेश्वर की सहायता माँगने आते हैं, न कि मुझे जानने कि इच्छा से। बीमारी की तीव्र वेदना में मनुष्य अविलंब मेरी सहायता का निवेदन करते हैं। जब आपदा में होते हैं, तो अपनी पीड़ा से बेहतर ढंग से छुटकारा पाने के लिए, वे अपनी सारी परेशानियाँ अपनी पूरी शक्ति से मुझे बताते हैं। फिर भी एक भी मनुष्य सुख में होने के समय मुझसे प्रेम करने में समर्थ नहीं है। एक भी व्यक्ति अपने शांति और आनंद के समय में नहीं पहुँचा है ताकि मैं उनकी खुशी में सहभागी हो सकूँ। जब उनका छोटा सा परिवार खुशहाल और सकुशल होता है, तो मुझे प्रवेश करने से निषिद्ध करते हुए, मनुष्य पहले ही मुझे एक तरफ कर देते हैं या मुझ पर अपने द्वार बंद कर देते हैं, और इस प्रकार परिवार की धन्य खुशी का आनंद नहीं लेने देते हैं। मनुष्य का मन अत्यंत संकीर्ण है, यहाँ तक कि मुझ जैसे प्रेमी, दयालु और सुगम परमेश्वर को रखने के लिए भी अत्यंत संकीर्ण है। कितनी बार मनुष्यों के द्वारा उनकी हँसी खुशी की बेला में मुझे अस्वीकार किया गया था; कितनी बार लड़खड़ाते हुए मनुष्य ने बैसाखी की तरह मेरा सहारा लिया था; कितनी बार बीमारी से पीड़ित मनुष्यों द्वारा मुझे चिकित्सक की भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया गया था। मानवजाति कितनी क्रूर है! सर्वथा अविवेकी और अनैतिक। यहाँ तक कि वे भावनाएँ भी महसूस नहीं की जा सकती हैं जिनसे मनुष्यों को सुसज्जित होना माना जाता है। वे मानवता के लेशमात्र से भी पूरी तरह से रहित हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 14" से उद्धृत

51. राज्य में, मैं राजा हूँ—किन्तु मेरे साथ अपने राजा के रूप में व्यवहार करने के बजाए, मनुष्य मेरे साथ ऐसे उद्धारकर्ता के रूप में व्यवहार करता है जो स्वर्ग से उतरा है। फलस्वरूप, वह लालसा करता है कि मैं उसे भीख दूँ, और मेरे बारे में ज्ञान की खोज नहीं करता है। बहुत से लोगों ने मेरे सामने एक भिखारी की तरह पुकारा है; बहुत से लोगों ने मेरे सामने अपने "थैलों" को खोला है और उन्हें जीवित रहने हेतु भोजन देने के लिए मुझसे याचना की है; बहुत से लोगों ने, इस बात की कामना करते हुए कि मुझे हड़प सकें और अपना पेट भर सकें, भूखे भेड़ियों के समान, लालची आँखें मुझ पर टिकाई हुई हैं; बहुत से लोगों ने, मुझ से क्षमा की प्रार्थना करते हुए, या स्वेच्छा से मेरी ताड़ना को स्वीकार करते हुए, अपने अपराधों की वजह से खामोशी से अपने सिरों को झुकाया है और लज्जित महसूस किया है। जब मैं बोलता हूँ, तो मनुष्य की बहुत-सी मूर्खताएँ बेहूदा प्रतीत होती हैं और प्रकाश के बीच उसका असली रूप प्रकट हो जाता है और प्रकाश की जगमगाहट में मनुष्य अपने आपको क्षमा करने में असमर्थ रहता है। इसलिए, वह मेरे सामने घुटने टिकाने और अपने पापों को अंगीकार करने की जल्दबाजी करता है। मनुष्य की "ईमानदारी" की वजह से, मैं उसे एक बार फिर से उद्धार के रथ पर खींच लेता हूँ, और इसलिए मनुष्य मेरे प्रति आभारी हो जाता है और मुझ पर एक प्यार-भरी नज़र डालता है। फिर भी वह अभी भी वास्तव में मुझ में शरण लेने को तैयार नहीं होता है, और उसने अपना हृदय पूरी तरह से मुझे नहीं दिया है। वह मेरे बारे में मात्र शेखी बघारता है, फिर भी वह सचमुच में मुझ से प्रेम नहीं करता है, क्योंकि उसने अपने मन को मेरी ओर नहीं पलटा है; उसका शरीर तो मेरे सामने है, मगर उसका हृदय कहीं और है क्योंकि नियमों के बारे में मनुष्य की समझ बहुत कम है और उसकी मेरे सामने आने में कोई रूचि नहीं है, इसलिए मैं उसे उचित सहयोग प्रदान करता हूँ, ताकि वह अपनी जिद्दी अज्ञानता के बीच मेरी ओर मुड़ सके। यही निश्चित रूप से वह दया है जो मैं मनुष्य को देता हूँ, और वह तरीका है जिसके द्वारा मैं मनुष्य को बचाने का प्रयास करता हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 22" से उद्धृत

52. आज संसार के लोगों के मध्य-जिनमें वे भी शामिल हैं जो मेरे घराने में मौजूद हैं। कौन सच में मुझ में शरण लेता है? कौन अपना हृदय उस कीमत के बदले देता है जो मैं ने चुकाई है? कौन कभी मेरे घराने में रहा है? किसने कभी सचमुच में मेरे सामने अपने आपको भेंट चढ़ाया है? जब मैं मनुष्य से अपेक्षाएँ करता हूँ, तो वह तुरन्त अपना "छोटा सा भण्डारगृह" बंद कर देता है। जब मैं मनुष्य को देता हूँ तो वह तुरन्त अपना मुँह खोलता है मेरी धन-सम्पत्ति को गुप्त रूप से लेने के लिए, और अपने हृदय में अक्सर काँपता है, इस बात से बहुत भयभीत होते हुए कि मैं उस पर पलटकर वार करूँगा। इसलिए मनुष्य का मुँह आधा खुला और आधा बंद है और वह उस धन-सम्पत्ति का आनंद उठाने में असमर्थ है जो मैं देता हूँ। मैं आसानी से मनुष्य को दोषी नहीं ठहराता फिर भी वह हमेशा "मेरे हाथ को पकड़ता है" और मुझसे माँगता है कि मैं उस पर "दया" करूँ, जब मनुष्य मुझ से विनती करता है केवल तभी मैं उस पर एक बार फिर से "दया" करता हूँ, और मैं उसे अपने मुँह के सबसे कठोर वचन देता हूँ, इतना कि वह तुरन्त शर्मिन्दगी महसूस करता है, और, मेरी "दया" को सीधे पाने में असमर्थ होते हुए भी, उसके बजाए वह अन्य लोगों को तैयार करता है कि वे उसके पास पहुंचाएँ। जबकि उसने मेरे सभी वचनों को समझ लिया है, तो मनुष्य की आकृति मेरी इच्छाओं के अनुरूप हो जाती है और उसकी दलीलें फलीभूत हो जाती हैं, और वे व्यर्थ या निष्फल नहीं होती हैं। मैं मानवजाति की दलीलों को आशीषित करता हूँ जो निष्कपट हैं, और दिखावटी नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 28" से उद्धृत

53. क्योंकि लोग मुझे नहीं जानते हैं और उनकी प्रकृति मेरी अवहेलना करती है, यहाँ तक कि वे लोग भी जो मेरे प्रति वफादार हैं अपनी खुशी के लिए हैं। किन्तु यदि कुछ ऐसा होता है जो उन्हें दुःख पहुँचाता है, तो उनके हृदय एकाएक बदल जाते हैं और वे मेरी तरफ से पीछे हटना चाहते हैं। यह शैतान की प्रकृति है। तुझे अपने आप को वफादार मानते, हुए स्वच्छंद बिल्कुल नहीं होना चाहिए! यदि उनके लिए इसमें कुछ नहीं है, तो जानवरों का यह झुंड मेरे प्रति वफादार होने में समर्थ है ही नहीं। यदि मैंने अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा नहीं की होती, तो तुम लोग बहुत पहले पीछे हट गए होते। अब तुम लोगों की की स्थिति इधर कुआँ उधर खाई जैसी है, तुम मेरे लिए सेवा प्रदान करने के अनिच्छुक हो किन्तु मेरे हाथ से मार गिराए जाने के लिए तैयार नहीं हो। यदि मैंने यह घोषणा नहीं की होती कि मेरी अवहेलना करने वाले किसी पर भी किसी भी समय बड़ी आपदाएँ पड़ेंगी, तो तुम लोग बहुत पहले पीछे हट गए होते। क्या मुझे नहीं पता है कि लोग कितने संकीर्ण मन वाले हो सकते हैं? अधिकांश लोग अब एक छोटी सी आशा बनाए रखते हैं, किन्तु जब वह आशा निराशा में बदल जाती है तो वे और आगे जाने के लिए तैयार नहीं होते हैं और वापस लौटने के लिए कहते हैं। मैंने इससे पहले कहा है कि मैं यहाँ किसी को अपनी इच्छानुसार नहीं रखता हूँ, बल्कि इस बारे में विचार करने के लिए सावधान रहता हूँ कि तेरे लिए क्या परिणाम होंगे, और यह एक तथ्य है, मैं तुझे धमकी नहीं दे रहा हूँ। मेरे सिवाय कोई भी मनुष्य की प्रकृति की थाह नहीं पा सकता है, और वे सभी, यह नहीं जानते हुए कि उनकी वफ़ादारी अशुद्ध है, सोचते हैं कि वे मेरे प्रति वफ़ादार हैं। ये अशुद्धताएँ लोगों को बर्बाद कर देंगी क्योंकि वे बड़े लाल अजगर का एक षड़यंत्र हैं। यह मेरे द्वारा बहुत पहले प्रकट कर दिया गया था; मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ, और क्या मैं इतनी सी आसान चीज़ को नहीं समझूँगा? तेरे इरादों को देखने के लिए मैं तेरे रक्त और तेरे मांस में घुसने में सक्षम हूँ। मनुष्य की प्रकृति को समझना मेरे लिए मुश्किल नहीं है, किन्तु लोग, यह सोचते हुए कि उनके स्वयं के अलावा उनके इरादों को और कोई नहीं जानता है, धृष्ट बनने की कोशिश करते हैं। क्या वे नहीं जानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों के भीतर विद्यमान है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 118" से उद्धृत

54. उनकी चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षा क्यों न की जाती हो, उन लोगों की स्वामी भक्ति अपरिवर्तनीय बनी रहती है जिनके हृदय में परमेश्वर है; किन्तु जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है उनके लिए, जब एक बार परमेश्वर का कार्य उनकी देह के लिए फायदेमन्द नहीं होता है, तो वे परमेश्वर के बारे में अपने दृष्टिकोण को बदल देते हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जो अंत में डटे नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर के आशीषों को ही खोजते हैं और उनके पास परमेश्वर के लिए अपने आपको व्यय करने और उसके प्रति अपने आपका समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं होती है। ऐसे सभी अधम लोगों को तब बहिष्कृत कर दिया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा, और वे किसी भी प्रकार की सहानुभूति के योग्य नहीं हैं। जो मानवता से रहित हैं वे सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करने में अक्षम हैं। जब परिवेश सही सलामत और सुरक्षित होता है, या जब वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह आज्ञाकारी रहते हैं, किन्तु जब एक बार जिस वस्तु की वे इच्छा करते हैं उससे समझौता किया जाता है या अंतत: उसका खंडन कर दिया जाता है, तो वे एकदम से बगावत कर देते हैं। यहाँ तक कि एक रात के अन्तराल में ही, वे अपने कल के उपकारियों के साथ अचानक बिना किसी तुक या तर्क के अपने घातक शत्रु के समान व्यवहार करते हुए, एक मुस्कुराते हुए, "उदार हृदय" वाले व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं। यदि इन दुष्ट आत्माओं को नहीं निकाला जाता है, तो क्या ऐसी दुष्ट आत्माएँ जो पलक झपकते ही हत्या कर सकती हैं, आगे और अधिक कष्टों का स्रोत नहीं बन जाएँगी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

55. मनुष्य दर्द के बीच मुझे खोजता है, और परीक्षणों के बीच मेरी ओर देखता है। शांति के समय के दौरान वह मेरा आनन्द उठाता है जब संकट में होता है तो वह मुझसे इनकार करता है, जब वह व्यस्त होता है तो मुझे भूल जाता है, और जब वह खाली होता है तब वह अन्यमनस्क तरीके से मेरे लिए कुछ करता है—फिर भी किसी ने भी अपने सम्पूर्ण जीवन में मुझसे प्रेम नहीं किया है। मैं चाहता हूँ कि मनुष्य मेरे सम्मुख ईमानदार हो जाएः मैं नहीं कहता कि वह मुझे कोई चीज दे, किन्तु केवल यही कहता हूँ कि सभी लोग मुझे गम्भीरता से लें, कि, मुझे गुमराह करने के बजाए, वे मुझे मनुष्य की ईमानदारी को वापस लाने की अनुमति दें। मेरी प्रबुद्धता, मेरी रोशनी और मेरे प्रयासों की लागत सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाते हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य के हर कार्य के वास्तविक तथ्य, मुझे दिए गए उनके धोखे भी, सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाते हैं। यह ऐसा है मानो कि मनुष्य के धोखे के अवयव उसके गर्भ में आने के समय से ही उसके साथ रहे हैं, मानो कि उसने चालबाजी के ये विशेष कौशल जन्म से ही धारण किए हुए है। इससे अधिक और क्या, उसने कभी भी इरादों को प्रकट नहीं किया है; किसी को भी कभी भी इन कपटपूर्ण कौशलों के स्रोत की सही प्रकृति का पता नहीं लगा है। परिणामस्वरूप, मनुष्य धोखे का एहसास किए बिना इसके बीच रहता है, और यह ऐसा है मानो वह अपने आपको क्षमा कर देता है, मानो कि यह उसके द्वारा मुझे जानबूझ कर दिए गए धोखे के बजाए परमेश्वर की व्यवस्था है। क्या यह मनुष्य का मुझसे धोखे का वास्तविक स्रोत नहीं है? क्या यह उसकी धूर्त योजना नहीं है? मैं कभी भी मनुष्य की चापलूसियों और झाँसापट्टी के द्वारा संभ्रमित नहीं हुआ हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही उसके सार को जान लिया था। कौन जानता है कि उसके खून में कितनी अशुद्धता है, और शैतान का कितना ज़हर उसकी मज्जा में है? मनुष्य हर गुज़रते दिन के साथ उसका और अधिक अभ्यस्त होता जाता है, इतना कि वह शैतान द्वारा यंत्रणा के प्रति बेसुध हो जाता है, और इस प्रकार उसमें "स्वस्थ अस्तित्व की कला" को ढूँढ़ने में कोई रूचि नहीं होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 21" से उद्धृत

56. कई बार ऐसा हुआ है जब मैंने अपने आत्मा के द्वारा मनुष्य को आवाज़ दी है, फिर भी मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है मानो मैंने उसे छुरा भोंक दिया है, और वह अति भय के साथ दूर से मेरे बारे में विचार करता है कि मैं उसे किसी और दुनिया में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ जब मैंने मनुष्य की आत्मा से पूछताछ की, फिर भी वह भुलक्कड़ बना रहता है, और बहुत ज़्यादा डर जाता है कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और उस अवसर का लाभ उठा कर उसकी सारी सम्पति को छीन लूँगा। अत:, वह मुझे बाहर निकाल देता है और मैं सर्द, कसकर बन्द किए दरवाज़े के सामने खड़ा रह जाता हूं। कई बार ऐसा हुआ जब मनुष्य गिर गया और मैंने उसे बचाया, फिर भी जागने के बाद वह तुरंत ही मुझे छोड़ देता है और, मेरे प्रेम का एहसास किए बगैर, मुझे चौकन्नी निगाहों से देखता है; मानो मैंने उसके हृदय को कभी उत्साहित नहीं किया है। मनुष्य भावना-शून्य है, और नृशंस पशु है। यद्यपि वह मेरे आलिंगन से उत्साहित होता है, फिर भी वह कभी इस से भाव-विभोर नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी जंगली जीव के समान है। उसने कभी भी मानवजाति के प्रति ताड़ना को संजो कर नहीं रखा है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों पर रहना पसंद करता है, जहाँ उसे जंगली जानवरों से खतरा रहता है फिर भी वह मेरे आश्रय में आना नहीं चाहता है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ: मैं महज अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य सामर्थी महासागर के बीच में से तैर कर मेरे पास आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सभी समृद्धि का आनन्द उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने के भय को पीछे छोड़ दे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 20" से उद्धृत

57. मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ जो तुम्हारे दिल में मौजूद है; तुम में से अधिकांश केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हो और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज करते हो। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन के लिए—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी बिखर जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखाधड़ी तुम लोगों के शब्दों और कर्मों के माध्यम से सामने आती है। स्पष्ट कहें तो, तुम लोग केवल मेरे बारे में उत्सुक हो, भयभीत नहीं; तुम लोग अपनी जीभों को काबू में नहीं रखते हो और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग अपने जीवन में सिर्फ अपनी चिंताओं को दूर करने और अपनी ऊब को मिटाने के लिए, अपने जीवन में बचे खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से किसने उन्हें अभ्यास में ढाला है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चीखते हुए कहते रहते हो कि परमेश्वर एक ऐसा परमेश्वर है जो लोगों के दिलों में गहराई से देखता है, परन्तु उस परमेश्वर का जिसके बारे में तुम दिलों में चीखते हो, मेरे साथ तालमेल कैसा है? जब तुम लोग इस तरह चिल्लाते हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या यह हो सकता है कि यही वह प्रेम है जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम लोगों के ओठों पर समर्पण की मात्रा छोटी नहीं है, लेकिन फिर तुम लोगों के बलिदान और तुम लोगों के अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर मेरे कानों तक पहुँचने वाले तुम लोगों के वचनों के कारण यह नहीं होता तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम लोग इस तरह के संकट में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छा रही है जैसे कि तुम लोग नरक में परीक्षण दे रहे हो। तुम लोगों के पास कोई जीवन-शक्ति नहीं है, और तुम लोग अपनी भीतरी आवाज़ के बारे में क्षीणता से बात कर रहे हो; यहाँ तक कि तुम लोग शिकायत और धिक्कार से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था और यहाँ तक कि तुम लोगों का मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम लोग अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? इस तरह से तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "युवा और वृद्ध लोगों के प्रति वचन" से उद्धृत

58. हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह इससेअनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से परहेज करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं नहीं गया हैः इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे प्रकाशित करने के बजाय ताकि परमेश्वर उसे देखे, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह उस तथ्य के बावज़ूद है जो कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग तो शपथ भी खाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देंगे, कि यदि वे अपनी शपथ को तोड़ें उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मानने में सक्षम है, न ही यह है कि उसने अपने भाग्य और भविष्य की सम्भावनाओं को तथा अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन छोड़ा है। इसलिए, ईश्वर के लिए तुम्हारी कसमों या उसके लिए तुम जो घोषणा करते हो उसके बावजूद, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अभी भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किन्तु तुम उसे इसका नियन्त्रण नहीं करने देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं दिया है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले वचन बोलते हो; इसी बीच, तुम अपने विभिन्न धूर्त इरादों को, अपनी साज़िश, षडयन्त्रों, और योजनाओं को परमेश्वर से छिपाते हो, और तुम अपने भविष्य की सम्भावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़े रहते हो, इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हुए कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ले लिए जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर स्वयं के प्रति मनुष्य की ईमानदारी को कभी नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, और वह देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करने की इच्छा करता है, और देख सकता है कि कौन सी चीजें उसके हृदय के भीतर रखी हुई हैं, फिर भी मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित नहीं होता है, उसने उसे परमेश्वर के नियन्त्रण में नहीं दिया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास अवलोकन करने का अधिकार है, परन्तु उसके पास नियन्त्रण करने का अधिकार नहीं है। अपनी व्यक्तिपरक चेतना में, मनुष्य स्वयं को परमेश्वर के आयोजनों पर छोड़ने की इच्छा या इरादा नहीं करता है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने तथा परमेश्वर की नज़रों से अपने असली चेहरे को छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढंकने के तरीकों के बारे सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देना चाहते हैं, बल्कि उसे स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि जो कुछ मनुष्य करता है और जो कुछ वह चाहता है उन सब की योजना, गणना, और निर्णय स्वयं मनुष्य के द्वारा किए जाते हैं; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं है। इसलिए, चाहे बात परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश के संबंध में हो, या उन अपेक्षाओं के संबंध में हो जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, मनुष्य के निर्णय उसके स्वयं के इरादों और रुचियों पर, उस समय की उसकी स्वयं की अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य हमेशा उस मार्ग का आँकलन करने और उस राह को चुनने के लिए जो उसे लेना चाहिए, अपने चिर-परिचित ज्ञान तथा अंतर्दृष्टि का, और अपनी स्वयं कि मति का उपयोग करता है, और परमेश्वर को हस्तक्षेप और नियन्त्रण की अनुमति नहीं देता है। मनुष्य के इसी हृदय को परमेश्वर देखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से उद्धृत

59. लोग प्रायः परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं के बारे में चिंता करते हैं और भयभीत होते हैं, फिर भी हर समय वे शैतान के फंदे में जीवन बिताते रहते हैं, और उस ख़तरनाक इलाके में जीवन जीते रहते हैं जिसमें उन पर शैतान के द्वारा आक्रमण और उनका शोषण किया जाता है—मगर वे भय को नहीं जानते हैं, और अविचलित रहते हैं। क्या चल रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित रहता है जिन्हें वह देख सकता है। उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और चिंता की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की जरा सी भी समझ नहीं है। बल्कि उसमें परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के बारे में थोड़ी सी घबराहट के अलावा, मनुष्य के पास परमेश्वर के भले इरादों की जरा सी भी समझ नहीं है। परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो कि परमेश्वर के पास छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा, यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर दुष्ट मंसूबों को आश्रय देता है; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सतर्क नहीं हुए तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, यह कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ भी उनके पास है वह परमेश्वर के द्वारा लिया जा सकता है, और उनके जीवन को भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य शैतान के खेमे में है, परन्तु वह शैतान के द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने के बारे में कभी चिंता नहीं करता है, और शैतान के द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है परन्तु वह शैतान के द्वारा बन्दी बनाए जाने की कभी चिंता नहीं करता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या यह विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच में मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ है, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर के शासन को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ है, तो वहाँ खोने के लिए क्या है? और इसलिए, मैं सुझाव देता हूँ कि तुम लोग अपने कार्यों में सतर्क रहो, और हर उस चीज़ के प्रति सावधान रहो जो तुम लोगों पर आने ही वाली है। तुम लोग उतावले या आवेगी न बनो, और परमेश्वर के साथ तथा लोगों, मामलों, और वस्तुओं के साथ, जिनकी उसने तुम लोगों के लिए व्यवस्था की है, अपने गर्म खून या अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हुए, अपनी कल्पनाओं और अवधारणाओं के अनुसार व्यवहार मत करो; परमेश्वर के कोप को भड़काने से बचने के लिए, तुम लोगों को अपने कार्यों में सचेत अवश्य होना चाहिए, तथा अवश्य अधिक प्रार्थना और खोज करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से उद्धृत

60. तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम लोगों का कहना है कि तुम लोग अपना जीवन मेरे कार्य को समर्पित करने के लिए तैयार हो, उसके लिए कुछ भी करने और सब कुछ करने के लिए तैयार हो, लेकिन तुम लोगों के स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम्हारे वचन केवल अभिमानी रहे हैं, और तुम लोगों की वास्तविक क्रियाएं बहुत घिनौनी रही हैं। ऐसा लगता है कि मानो किसी की जीभ और होंठ स्वर्ग में हैं, लेकिन उसके पैर दूर पृथ्वी पर हैं, इसलिए उसके वचन और कर्म और उसकी प्रतिष्ठा अभी भी भयानक स्थिति में हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया गया है, तुम लोगों की छवि तुच्छ बन गई है, तुम लोगों के बोलने का का तरीका नीच है, तुम लोगों का जीवन घृणित है, और यहां तक कि तुम लोगों की सारी मानवता भी नीच है। तुम लोगों का मस्तिष्क लोगों के प्रति संकुचित है और तुम लोग हर बात पर बहस करते हो। तुम लोग स्वयं अपनी प्रतिष्ठा और स्थिति के बारे में बहस करते हो, इतना कि तुम लोग नरक में उतरकर, आग के तालाब में जाने को तैयार हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म यह निर्धारित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए पर्याप्त है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के स्वभाव यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग घृणित आत्माएं हो जो चीज़ों से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियां और तुम लोग जो प्रकट करते हो, वे यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग ऐसे हो जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का रक्त पर्याप्त मात्रा में पिया है। जब राज्य में प्रवेश करने की बात आए, तो तुम लोग अपनी भावनाओं को धोखा मत देना। क्या तुम लोग मानते हो कि जिस तरह से अभी तुम लोग हो, वह तुम्हारे लिए मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि अपने वचनों और कर्मों के मेरे परीक्षण से गुज़रे बिना, तुम लोग मेरे कार्य की पवित्र भूमि और वचनों में प्राप्त कर सकते हो? कौन है जो मेरी दो आँखों को मूर्ख बनाने में कामयाब हो सकता है तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते हैं? तुम लोगों के जीवन को मेरे द्वारा अशुद्ध आत्माओं का रक्त पीने और उन अशुद्ध आत्माओं का मांस खाने के जीवन के रूप में निर्धारित किया गया है, क्योंकि तुम लोग हर दिन मेरे सामने उनका रूप धारण करते हो। मेरे सामने तुम लोगों का व्यवहार विशेष रूप से बुरा था, तो मैं कैसे चिढ़ महसूस न करता? तुम लोग जो कहते हो उसमें अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रता है: तुम लोग उसी तरह से धोखेबाज़ी, चालबाज़ी, और मक्खनबाज़ी करते हो जैसे जादू-टोना करने वाले करते हैं, जैसे धोखा देने वाले और अधर्मियों का रक्त पीने वाले करते हैं। मानव जाति की सभी अभिव्यक्तियाँ बहुत अधर्मी हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है सभी लोगों को उस पवित्र भूमि में पहुँचा दिया जाए जहाँ धर्मी व्यक्ति रहते हैं? तुम्हें लगता है कि तुम्हारा घिनौना व्यवहार तुम्हें पवित्र व्यक्ति की तरह उन अधर्मी लोगों से अलग कर सकता है? तुम्हारी सांप जैसी जीभ आखिरकार तुम्हारी उस देह का नाश कर देगी जो विनाश करती है और घिनौने व्यवहार करती है, और तुम्हारे वे हाथ जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त डूबे हुए हैं, अंत में तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे, तो तुम मैल में लिपटे हुए अपने हाथों को साफ़ करने के इस अवसर का उपयोग क्यों नहीं करते हो? और तुम अधर्मी वचन बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के अवसर का उपयोग क्यों नहीं करते हो? क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने दो हाथों और अपनी जीभ और होंठ के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं अपनी दोनों आँखों से सभी लोगों के दिलों पर नज़र रखता हूं क्योंकि मानव जाति का निर्माण करने से पहले मैंने उनके दिलों को अपने हाथों में थामा था। मैंने बहुत पहले मनुष्य के हृदय के भीतर झांका था, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि मनुष्य के दिल के विचार मेरी आँखों से बच सकते हों? और मेरी आत्मा के जलने से बचने के लिए वह समय से कैसे पहुँच सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!" से उद्धृत

61. तुम्हारे होंठ कबूतरों से भी अधिक दयालु हैं, लेकिन तुम्हारा दिल प्राचीन सांप से भी अधिक भयावह है, यहां तक कि तुम्हारे होंठ एक लेबनानी महिला से भी सुंदर हैं, लेकिन तुम्हारा दिल लेबनानी महिलाओं की तरह दयालु नहीं है और यह निश्चित रूप से कनानी लोगों की सुंदरता से तुलना नहीं कर सकता। तुम्हारा दिल बहुत धोखेबाज़ है! मुझे बस घृणा है अधर्मी के होंठों और अधर्मी के दिलों से। लोगों से मेरी आवश्यकताएं संतों से अधिक नहीं हैं, बस केवल इतना है कि मुझे अधर्मियों के बुरे कर्मों से घृणा होती है और मुझे उम्मीद है कि अधर्मी अपना मैलापन दूर कर सकेंगे और अपनी मौजूदा दुर्दशा से बच सकेंगे ताकि उन्हें उन अधर्मी लोगों से अलग किया जा सके, और वे उन लोगों के साथ रह सकें और पवित्र हो सकें जो धर्मी हैं। तुम उसी परिस्थिति में हो जिसमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल लिपटे हुए हो, तुम लोगों में उस मानव की समानता का ज़रा-सा भी अंश नहीं है, जिसे शुरुआत में बनाया गया था और क्योंकि हर दिन तुम लोग उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, तो तुम लोगों का प्रत्येक अंग और यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी उस मैले पानी से भीगे हुए हैं। यह इतना अधिक है कि तुम लोग उन दागों से ढंके हुए हो और तुम लोगों का एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत ही निराशाजनक है! तुम लोग घोड़ों और पशुओं की एक ऐसी दुनिया में रहते हो, और फिर भी तुम लोगों को परेशानी नहीं होती; और तुम लोग आनन्द से भरे हुए हो और तुम लोग स्वतंत्रता से और आराम से रहते हो। तुम लोग इस अशुद्ध पानी में तैर रहे हो, लेकिन वास्तव तुम लोगों को पता भी नहीं है कि तुम लोग इस तरह की परिस्थितियों से घिरे हुए हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साथ संबंध रखते हो और "मल" के साथ व्यवहार करते हो। तुम्हारा जीवन बहुत नीच है, और फिर भी तुम नहीं जानते कि तुम बिल्कुल भी इस मानवीय दुनिया में जी नहीं रहे हो और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे जीवन को बहुत पहले अशुद्ध आत्माओं ने कुचल दिया था, कि तुम्हारे चरित्र को बहुत पहले अशुद्ध पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम पृथ्वी पर स्वर्ग में रह रहे हो, कि तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ गुज़ारा है, और कि तुमने उन चीज़ों के साथ अपना जीवन गुज़ारा है जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की हैं? तुम्हारे जीवित रहने का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है? तुम अपने अशुद्ध आत्मा माता-पिता के लिए दौड़-भाग करते रहे हो, फिर भी तुम यह नहीं जानते कि जिन लोगों ने तुम्हें जाल में फंसाया है वे अशुद्ध आत्माएं तुम्हारे वे माता-पिता हैं जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोस के बड़ा किया। इसके अलावा, तुम यह नहीं जानते कि तुम्हारी सारी गंदगी वास्तव में उन्होंने ही तुम्हें दी है; तुम बस यही जानते हो कि वे तुम्हें "आनंद" दे सकते हैं, वे तुम्हें ताड़ना नहीं देते हैं, न ही वे तुम्हारे साथ न्याय करते हैं, और विशेष रूप से वे तुम्हें शाप नहीं देते हैं। वे कभी भी तुम पर गुस्से से भड़के नहीं हैं, बल्कि वे तुम्हारे साथ प्यार और दयालुता से व्यवहार करते हैं। उनके वचन तुम्हारे दिल को पोषित करते हैं और तुम्हें लुभाते हैं, ताकि तुम भ्रमित हो जाओ और बिना जाने, तुम उनकी सेवा के इच्छुक हो जाओ, उनकी निकासी के साथ ही उनके नौकर भी बन जाओ। तुम्हारी कोई शिकायत नहीं है, और तुम उनकी सेवा के लिए तैयार हो—वे तुम्हें धोखा देते हैं। यही कारण है कि मेरे कार्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं—कोई आश्चर्य नहीं है कि तुम हमेशा मेरे हाथों से चुपके से निकल जाना चाहते हो, और कोई आश्चर्य नहीं है कि तुम हमेशा मीठे वचनों का उपयोग करके गलत तरीकों से मेरी सहायता चाहते हो। हुआ यूं है कि तुमने पहले से एक दूसरी योजना बनाई है, एक दूसरी व्यवस्था की है। तुम मेरे, सर्वशक्तिमान के कार्यों, को थोड़ा-बहुत देख तो सकते हो, परंतु तुम्हें मेरे न्याय और मेरी ताड़ना के छोटे-से हिस्से के बारे में भी नहीं पता। तुम नहीं जानते कि मेरी ताड़ना कब शुरू हुई; तुम केवल मुझे धोखा देना जानते हो, लेकिन तुम नहीं जानते कि मैं मनुष्य के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करता हूं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!" से उद्धृत

62. मैं तुम्हारे बीच में रहा हूं, तुम्हारे साथ कई वसंत और कई पतझड़ के दौरान जुड़ा रहा हूँ, मैं तुम्हारे बीच बहुत समय से जी रहा हूं, तुम्हारे साथ रहा हूँ—तुम्हारे घृणित व्यवहारों में से कितने मेरी आंखों के सामने से फिसल गए? दिल से कहे गए तुम लोगों के ये वचन मेरे कानों में लगातार गूंजते हैं; तुम लोगों की हज़ारों, करोड़ों आकांक्षाएं मेरी वेदिका पर रखी गई हैं—उन्हें गिना भी नहीं जा सकता हैं। फिर भी तुम लोगों का जो समर्पण है और जो तुम अपने आपको खपाते हो, वह थोड़ा-सा भी नहीं है। मेरी वेदिका पर तुम लोगों की सच्चाई की एक बूँद भी नहीं है। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहां हैं? तुम लोगों ने मुझ से अनगिनत अनुग्रह प्राप्त किया है और स्वर्ग से अनगिनत रहस्यों को देखा है, और मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन तुम्हें जला देने की मेरी हिम्मत नहीं है, और बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? जो भोजन मैंने तुम्हें दिया, उसे तुम पलटकरउसी को मेरे सामने पेश कर देते हो। और मेरे सामने पेश कर देते हो, बल्कि यह और कहते हो कि यह वही है जो तुम्हें अपनी मेहनत के पसीने के बदले में मिला है, कि तुम वह सब मुझे अर्पित कर रहे हो, जो तुम्हारे पास है। तुम यह कैसे नहीं जानते कि तुम्हारा सारा "योगदान" वही चीज़ें हैं जो मेरी ही वेदिका से चोरी किए गए? और अब तुम उसे मुझे पेश कर रहे हो—क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे हो? तुम यह कैसे नहीं जानते कि आज जिसका आनंद मैं उठा रहा हूं वह मेरी वेदिका पर अर्पित की गई भेंट है, न कि वो जो अपनी कड़ी मेहनत के बदले तुमने कमाया है और फिर मुझे पेश किया है। तुम लोगों में वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत है, तो मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? मैं अब इसे और कैसे सहन कर सकता हूं? मैंने तुम लोगों को सब कुछ दे दिया है। मैंने तुम लोगों के लिए सब कुछ खोलकर रख दिया है, तुम्हारी ज़रूरतों को पूरा किया है, और तुम लोगों की आँखें खोल दी हैं, और फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा को अनदेखा कर, इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने निस्सवार्थ ढंग से अपना सब कुछ तुम लोगों पर अर्पित कर दिया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी, मैं जो कुछ भी स्वर्ग से लाया हूँ, वो तुम लोगों को प्राप्त हो जाए। परंतु तुम लोगों में कोई समर्पण नहीं है, और अगर तुमने छोटा-सा योगदान किया भी है, तो तुम लोग उसका हिसाब मेरे साथ करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं होगा? जो कुछ तुमने मुझे दिया है, वह तो बस रेत के एक कण के अलावा कुछ नहीं है, परन्तु जो कुछ तुमने मुझसे माँगा है वह एक टन सोने के बराबर है। क्या तुम्हारी माँग अनुचित नहीं है? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूं। उस दस प्रतिशत का कोई निशान नहीं है जो मुझे हासिल होना चाहिए, अतिरिक्त बलिदान को तो भूल ही जाओ। इसके अलावा, ईश्वरीय लोगों द्वारा जिस दस प्रतिशत का योगदान किया जाता है, उसे दुष्टों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम सब मुझे से तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरी वेदिका को नष्ट नहीं कर रहे हो? इस प्रकार के व्यक्ति को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम्हारे दुष्ट कार्यों को खज़ाने के रूप में कैसे देख सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!" से उद्धृत

63. मैं उन लोगों की बहुत अधिक सराहना करता हूँ जो दूसरों के बारे में संदेह को आश्रय नहीं देते हैं और उन्हें भी बहुत पसंद करता हूँ जो सहजता से सत्य को स्वीकार करते हैं; इन दो तरह के मनुष्यों के लिए मैं बहुत अधिक परवाह दिखाता हूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे ईमानदार मनुष्य हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा। सच्चे विश्वास का अभाव होने पर, तुम सच्चे प्रेम से और भी अधिक दूर होगे। और यदि तुम परमेश्वर पर भी संदेह करने और अपनी इच्छानुसार उसके बारे में अनुमान लगाने में समर्थ हो, तो तुम संदेह से परे, मनुष्यों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य के सदृश हो सकता हैः अक्षम्य रूप से पापमय, तुच्छ चरित्र का, निष्पक्षता और समझ से विहीन, न्याय की भावना के अभाव वाला, शातिर, कपटी, अक्सर धूर्त युक्तियों को आज़माने वाला, और साथ ही दुष्टता और अंधकार से खुश रहने वाला, इत्यादि। मनुष्य के ऐसे विचारों का होना इसी कारण से नहीं है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है? इस ढंग का विश्वास पाप से कम नहीं है! इसके अलावा, यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी हैं जो यह विश्वास करते हैं कि जो लोग मुझे प्रसन्न करते हैं वे चाटुकारों और चापलूसों के अलावा अन्य कोई नहीं हैं, और जिनमें इन कौशलों का अभाव है उन्हें नापसंद किया जाएगा और वे परमेश्वर के घर में अपना स्थान खो देंगे। क्या यही वह सब ज्ञान है जो तुम लोगों ने इन कई वर्षों में बटोरा है? क्या यही सब तुम लोगों ने प्राप्त किया है? मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफ़हमियों पर रुकता नहीं है; इसके अलावा, परमेश्वर के आत्मा के विरूद्ध में तुम लोगों की ईशनिंदा और स्वर्ग का तिरस्कार तो और भी अधिक ख़राब है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस ढंग का विश्वास तुम लोगों का है वह तुम लोगों को केवल मुझ से दूर भटकाने का तथा मेरे विरुद्ध और अधिक विरोधी बनाने का ही कारण बनेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से उद्धृत

64. परमेश्वर और मनुष्य को बराबर नहीं कहा जा सकता। उसका सार और उसका कार्य मनुष्य के लिये सर्वाधिक अथाह और समझ से परे है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप में अपना कार्य न करे, और मनुष्यों के संसार में अपने वचन न कहें, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर की इच्छा को समझ नहीं सकता है, और इसलिए, यहाँ तक कि जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भी परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, वे भी उसके अनुमोदन को पाने में सक्षम नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के बिना, चाहे मनुष्य कितना भी अच्छा करे, उसका कोई मूल्य नहीं होगा, क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचार से सदैव ऊँचे होंगे, और परमेश्वर की बुद्धि मनुष्यों के लिये अपरिमेय है। और इसीलिये मैं कहता हूँ कि जो परमेश्वर और उसके काम को "स्पष्ट रूप से देख पाते हैं" वे प्रभावहीन हैं, वे अभिमानी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं करना चाहिए; साथ ही, मनुष्य परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकता है। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य चींटी से भी छोटा है, तो वह परमेश्वर के कार्य को कैसे माप सकता है? जो लगातार कहते रहते हैं, "परमेश्वर इस तरह या उस तरह से कार्य नहीं करता है," या "परमेश्वर ऐसा या वैसा है"—क्या वे सब अभिमानी नहीं हैं? हम सबको जानना चाहिए कि वे सब लोग जो शरीरधारी हैं, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं। परमेश्वर का विरोध करना उनकी प्रकृति है, और वे परमेश्वर की बराबरी में नहीं हो सकते हैं। वे परमेश्वर के कार्य के लिये परामर्श तो बिल्कुल नहीं दे सकते हैं। परमेश्वर मनुष्यों का मार्गदर्शन कैसे करता है, यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, और कोई ऐसा-वैसा विचार नहीं रखना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हम परमेश्वर को खोजने का प्रयास करते हैं, इसलिए हमें परमेश्वर के कार्य पर परमेश्वर के विचार करने के लिए अपनी अवधारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए, और सबसे कम परिमाण में भी हमें जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिये अपने भ्रष्ट स्वभाव को नहीं लगाना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोग कैसे कह सकते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य के मार्ग की खोज करनी चाहिए, और परमेश्वर के अनुकूल रहने के मार्ग को खोजना चाहिए। हमें परमेश्वर के विरुद्ध अभिमानी और जिद्दी बनकर खड़े नहीं होना चाहिए; ऐसे कार्यों से भला क्या हो सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

65. क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसके भीतर वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किन्तु वे घमण्डी और आसक्त प्रकृति के होते हैं, और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे एक नाटक भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पाण्डित्य पर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम होते हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा के द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकार किए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अदूरदर्शी छोटे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुले आम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने चालाक हैं? बाइबिल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, लोगों को सिखाने के लिए केवल सतही सिद्धांतों के साथ, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने ही विचारों की प्रक्रिया के चारों ओर घूमाते रहने का प्रयास करते हैं, और अदूरदर्शी की तरह हैं, वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास कोई उल्लेखनीयकारण नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आँकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, आज वे परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत ही कम बातचीत करते हैं, बल्कि वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतना ही अधिक वे घमण्डी और अतिआत्मविश्वासी होते हैं और उतना ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं होते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, वे आलोचनात्मक होते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते और उसका अपमान और ईशनिंदा करते हैं—क्या इस प्रकार के असभ्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में अनभिज्ञ नहीं रहते हैं? इसके अलावा, क्या वे अभिमानी, अंतर्निहित रूप से घमण्डी और अशासनीय नहीं हैं? भले ही ऐसा दिन आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करें, तब भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध, ईशनिंदा करते हैं। इस प्रकार के उजड्ड लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में, क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के असभ्य, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और जितना अधिक वे ऐसा करते हैं, उतना ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना होती है। क्या वे सभी घमण्डी ऐसे लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, जो सभी इसी मार्ग पर चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से उद्धृत

66. ज्ञात हो कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हो, या आज कार्य को मापने के लिए अपनी धारणा का उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गम्भीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणा और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं कि परमेश्वर का कार्य ग़लत है, बल्कि इसलिए कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से बहुत ही ज्यादा अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। और वे यहाँ तक कि प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेसमय बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही कम होती है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा जलाए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य परमेश्वर को खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर को जान जाता है; यह नहीं कि वह अपनी सनक में उसकी आलोचना करने से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान जाएगा है। जितना अधिक परिशुद्ध परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान होता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग जितना कम परमेश्वर के बारे में जानते हैं, उतना ही ज्यादा परमात्मा का विरोध करने की उनकी संभावना होती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग गम्भीर धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के हैं वे और भी अधिक देहधारी परमेश्वर के साथ शत्रुता में हैं और इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार नहीं आता है, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से उद्धृत

67. यह मत सोचो कि तुम सब कुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबन्धन योजना के एक हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम क्यों इतनी ढिठाई से पेश आते हो? तुम्हारी मात्र जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए अपर्याप्त है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और जो कुछ सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचनात्मक न बनो और दोष मत ढूँढो। चाहे तुम कितने भी अभिमानी हो, फिर भी तुम चींटी से भी कम एक प्राणी हो! तुम्हारे पेट में जो कुछ भी है वह एक चींटी के पेट में जो है उससे भी कम है! यह मत सोचो कि क्योंकि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, इसलिए तुम बेलगाम घमण्ड के साथ बोल और कार्यकलाप कर सकते हो। क्या तुम्हारे अनुभव और तुम्हारी वरिष्ठता उन वचनों के परिणामस्वरूप नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत के द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम मेरे देहधारण को देखते हो, और परिणामस्वरूप तुम्हारी ऐसी समृद्ध धारणाएँ हो जाती हैं, जिनसे अनगिनत अवधारणाएँ आती हैं। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं हैं, तुम्हारे अंदर इतनी धारणाएँ नहीं होती। क्या तुम्हारी अवधारणाएँ इससे नहीं उभरी हैं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करते, तो तुम देहधारण के बारे में क्या जानते? क्या यह पहले देहधारण के तुम्हारे ज्ञान के कारण नहीं है कि तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण के बारे में राय बनाते हो? तुम्हें एक आज्ञाकारी अनुयायी बनने के बजाय क्यों इसकी जाँच करनी चाहिए? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें अध्ययन करने की अनुमति देंगे? तुम्हारा अपने परिवार के इतिहास का अध्ययन करना ठीक है, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के "परिवार के इतिहास" का अध्ययन करते हो, तो आज का परमेश्वर तुम्हें यह करने की अनुमति कैसे दे सकता है? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम अपने ऊपर अवमानना को नहीं लाते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" से उद्धृत

68. आज के पथ पर खोज के लिए सबसे उपयुक्त तरीका क्या है? अपनी खोज में तुम्हें किस व्यक्ति के रूप में स्वयं को देखना चाहिए? तुम्हें पता होना चाहिए कि जो कुछ अभी तुम्हारे साथ घटित हो रहा है उसे कैसे सँभाला जाए, चाहे वे परीक्षाएँ हों या पीड़ा, बेरहम ताड़ना हो या अभिशाप, इन सब के प्रति तुम्हें सतर्क ध्यान देना चाहिए। मैं यह क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि अंततः, अब जो तुम्हारे साथ घटित हो रहा है, वह एक के बाद एक छोटा परीक्षण है। शायद अभी यह तुम्हारे लिए एक बड़ा तनाव नहीं, इसलिए तुम चीज़ों को चाहे जैसे भी होने दे रहे हो, प्रगति की अपनी खोज में इसे कीमती धन की तरह न लेते हुए। तुम बहुत अधिक लापरवाह हो! इस कीमती धन को तुम वास्तव में अपनी आँखों के सामने तैरते बादलों की तरह लेते हो, और तुम कठोर आघात करतीं इन छोटी घटनाओं को संजोये नहीं रखते, जो अभी तुम्हें बहुत कठोर नहीं लग रही हैं। तुम बस रुखाई से निरीक्षण करते हो और दिल पर उन्हें नहीं लेते हो, केवल उन्हें कभी-कभी एक दीवार से टकराते हुए देखते हो। तुम बहुत घमंडी हो! एक के बाद एक भीषण, तूफानी हमले की ओर तुम एक तिरस्कारपूर्ण रवैया अपनाते हो, और कभी-कभी तुम रुखाई से मुस्कुराते हो, उदासीनता का एक भाव प्रकट करते हुए। इसका कारण यह है कि तुम बार-बार इस तरह के "दुर्भाग्य" से क्यों पीड़ित होते हो, इस बारे में तुमने कभी सोचा ही नहीं है। क्या यह हो सकता है कि मैं लोगों के प्रति बहुत अन्यायी हूँ? क्या मैं तुम्हारे साथ बस छिद्रान्वेषण कर रहा हूँ? यद्यपि तुम्हारी सोच उस तरह गंभीर नहीं है जिस तरह मैंने इसका वर्णन किया है, तुम्हारे खामोश आचरण ने तुम्हारे दिल की भीतर की दुनिया को बहुत सुस्पष्ट ढंग से चित्रित किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि जो चीज़ तुम्हारे दिल में गहरी छिपी हुई है वह निंदा और दुःख की उस अंतहीन झलक के अलावा और कुछ भी नहीं, जो दूसरों को शायद ही नज़र आये। चूँकि तुमने इस तरह के परीक्षणों को सहा है इसीलिए तुम्हें लगता है कि यह बहुत अनुचित है और तुम इस तरह अपशब्द फेंकते हो। यह इन परीक्षणों के कारण ही है कि तुम्हें लगता है दुनिया इतनी उजाड़ है, और इस प्रकार तुम उदासी से भरे हुए हो। तुम झटके के बाद झटका और अनुशासन के बाद अनुशासन को सबसे अच्छे संरक्षण के रूप में नहीं देख रहे हो, बल्कि तुम इन्हें स्वर्ग से मिले अनुचित उकसावे या उपयुक्त प्रतिकार के रूप में देखते हो। तुम बहुत अज्ञानी हो! तुमने निर्दयता से अपने सबसे अच्छे समय को अँधेरों में घेर लिया है और तुम बार-बार आते सुंदर परीक्षणों और अनुशासन के समय को एक दुश्मन के हमले के रूप में देखते हो। तुम परिवेश के प्रति अनुकूल होने में असमर्थ हो, और इससे भी अधिक, तुम अनुकूल होने के लिए तैयार ही नहीं हो। इसका कारण यह है कि तुम ताड़ना के बाद ताड़ना को क्रूर मानते हुए उनसे कुछ हासिल करने को तैयार नहीं हो। तुम खोज या जाँच नहीं करते हो, और तुम स्वर्ग की इच्छा के सामने लाचार हो—जहाँ भी तुम पहुँच जाते हो, बस तुम वहीं हो। इस ताड़ना ने जिस को तुम क्रूर मानते हो, तुम्हारे दिल को नहीं बदला है, न ही इसने तुम्हारे दिल को अधिकृत किया है। इसके बजाय, इसने सिर्फ उसे घायल किया है। तुमने इस "क्रूर ताड़ना" को इस जीवन में केवल अपने दुश्मन के रूप में देखा है, लेकिन तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया। तुम बहुत आत्म-तुष्ट हो! तुम शायद ही कभी मानते हो कि तुम्हें इस तरह के परीक्षण लागू होते हैं क्योंकि तुम बहुत घृणास्पद हो, बल्कि तुम्हें लगता है कि तुम बहुत अभागे हो और इसके अलावा, तुम कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ छिद्रान्वेषी हूँ। अब तक, मैं क्या कहता हूँ और क्या करता हूँ इसकी तुम्हें कितनी समझ है? यह न मान लो कि तुम जन्म से एक प्राकृतिक प्रतिभाशाली हो, स्वर्ग से सिर्फ ज़रा से छोटे और पृथ्वी से अत्यंत ऊँचे। तुम अन्य लोगों से ज्यादा चालाक नहीं हो, और यह भी कहा जा सकता है कि तुम पृथ्वी पर अन्य किसी भी समझदार व्यक्ति की तुलना में अच्छे-खासे अनाड़ी हो क्योंकि तुम अपने आप को बहुत बड़ा मानते हो; तुम में कभी लघुता की भावना नहीं रही। ऐसा लगता है कि तुम वह सब कुछ जो मैं करता हूँ, स्फटिक की तरह स्पष्ट देखते हो। सच्चाई यह है कि तुम दूर तक भी एक समझदार व्यक्ति नहीं हो। इसका कारण यह है कि तुम सोच भी नहीं सकते कि मैं क्या करने जा रहा हूँ, और मैं वर्तमान में क्या कर रहा हूँ इसको तो तूम और भी कम जानते हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम एक साधारण अनुभवी किसान से अपनी तुलना नहीं कर सकते जिसे मानव जीवन का संज्ञान नहीं और फिर भी खेती के लिए स्वर्ग से आशीर्वाद पर निर्भर करता है। तुम अपने खुद के जीवन के बारे में बहुत उपेक्षापूर्ण हो और तुम्हें अपनी स्वयं की प्रतिष्ठा तक के बारे में पता नहीं है, और तुम में आत्म-ज्ञान तो और भी कम है। तुम बहुत अधिक "उच्च और ताकतवर" हो! मैं वास्तव में चिंतित हूँ कि कैसे तुम्हारे जैसी कामचोर रसिक या नाजुक महिलाएँ ज्यादा तूफानी हवाओं और लहरों के हमलों का सामना कर पाएँगी? उन रसिकों को उस परिवेश के बारे में बिल्कुल भी परवाह नहीं है जो कि उन पर अब आ गया है। यह एक तुच्छ बात लगती है, उन्हें इन चीजों की कोई परवाह नहीं। वे नकारात्मक नहीं हैं और वे खुद को दीन-हीन रूप में नहीं देखते हैं। इसके बजाय, वे अभी भी "छायादार मार्गो" पर टहल रहे और सैर कर रहे हैं। इन "व्यक्तियों" के पास जो सीखते नहीं और कुछ भी जानते नहीं हैं, कोई सुराग नहीं है कि मैं इन चीजों को उनसे क्यों कहता हूँ। वे अपने आप को एक उग्र भाव से थोड़ा-सा जानते हैं, और इसके बाद उनके बुरे तौर-तरीके बदलते नहीं हैं। मेरे पास से जाने के बाद वे दुनिया भर में उच्छृंखल भाव से इठलाते फिरते और छल करते हैं। तुम्हारे चेहरे पर अभिव्यक्ति बहुत तेज़ी से बदलती है—तुम अभी भी मुझे इस तरह धोखा दे रहे हो। तुम्हारे पास ऐसी धृष्टता है! और वे नाजुक युवा महिलाएँ वास्तव में हास्यास्पद हैं। वे मेरी जरूरी बातें सुनती हैं, वे उस परिवेश को देखती हैं जिनमें वे हैं और वे आँसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर सकतीं; वे अपने शरीर को मटकाती हैं जैसे कि वे मोहक बनने की कोशिश कर रही हों। यह बहुत घृणास्पद है! वह अपने कद को देखती है और बिस्तर पर लेटी रहती है, लगातार रोते हुए, जैसे कि उसका दम घुटने ही वाला हो। इन वचनों से वह खुद की अपरिपक्वता और तुच्छ्ता को देखती है, और इसके बाद वह नकारात्मकता से अत्यंत भर जाती है। वह यूँ ही घूरती है, और उसकी आँखों में कोई रोशनी नहीं होती; वह शिकायत नहीं करती है, और न ही वह मुझसे नफरत करती है—वह इतनी नकारात्मक है कि वह हिलती-डुलती भी नहीं है। वह भी सीखती नहीं है और कुछ भी नहीं जानती है। मेरे पास से जाने के बाद, वह फिर एक बार मजाक करती हुई और चंचल हो जाती है, और वह चाँदी की घंटी जैसी हँसी एक चाँदी की घंटी वाली राजकुमारी की तरह ही होती है। वे बहुत नाजुक और आत्म-दया में बहुत कमी महसूस करती हुई—दोनों ही होती हैं! तुम सभी लोग, मानव जाति के बीच क्षतिग्रस्त सामान—तुम लोगों में मानवता का बहुत अभाव है! तुम लोग आत्म-प्रेम या आत्म-संरक्षण नहीं जानते हो, तुम लोग विवेक की बात नहीं समझ पाते हो, तुम लोग सच्चे मार्ग को नहीं खोजते या सच्चे प्रकाश से प्रेम नहीं करते हो, और तुम लोग विशेष रूप से खुद को सँजोये रखना नहीं जानते हो। तुम लोगों ने शिक्षा के मेरे वचनों को समय-समय पर अपने मन के पीछे धकेल दिया है और यहाँ तक कि अपने ख़ाली समय में मनोरंजन के लिए उन्हें इस्तेमाल भी किया है। तुम लोगों ने हमेशा उन्हें अपने स्वयं के ताबीज़ के रूप में उपयोग किया है। जब शैतान तुम्हें दोषी ठहराता है, तो तुम थोड़ी प्रार्थना करते हो। जब तुम नकारात्मक हो जाते हो, तो सो जाते हो, और जब तुम खुश होते हो तो पागलों की तरह भागते-फिरते हो। जब मैं तुम्हें फटकारता हूँ, तो तुम हामी भरते हो और नमन करते हो, लेकिन जैसे ही तुम मुझे छोड़ कर जाते हो, तो जंगलीपने से हँसते हो। लोगों के बीच तुम हमेशा सबसे ऊँचे बनते हो और तुमने स्वयं को सबसे अभिमानी के रूप में कभी नहीं सोचा है। तुम हमेशा उच्च और ताकतवर, बहुत आत्म-संतुष्ट और भीषण घमंडी हो। उस तरह के "युवा पुरुष", "युवती," "सज्जन", या "महिला" जो कुछ नहीं सीखते और कुछ भी नहीं जानते, मेरे वचनों के प्रति एक अनमोल खजाने जैसा व्यवहार कैसे कर सकते हैं? मैं तुमसे आगे पूछता हूँ—मेरे वचनों और मेरे कार्य से तुमने वास्तव में अब तक क्या सीखा है? तुम्हारी चालें और अधिक सयानी हैं? तुम्हारा देह अधिक परिष्कृत है? मेरे प्रति तुम्हारा रवैया अधिक तिरस्कारपूर्ण है? मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता हूँ, मेरे इस सारे कार्य ने वास्तव में अब तुम्हारी बहादुरी में, जो पहले एक चूहे-सी होती थी, बढ़ोतरी की है। तुम्हारा मुझसे डरना दिनोंदिन कम होता जाता है क्योंकि मैं बहुत दयालु हूँ। तुम्हारे देह को सज़ा देने के लिए मैंने हिंसक तरीकों का कभी इस्तेमाल नहीं किया है। शायद जिस तरह से तुम इसे देख रहे हो, मैं बस कठोर बोल रहा हूँ, लेकिन ज्यादातर समय मैं तुम्हारा सामना मुस्कुराहट के साथ करता हूँ और मैं शायद ही कभी तुम्हारे सामने तुम्हारी आलोचना करता हूँ। और यह विशेष रूप से इसलिए है क्योंकि मैं हमेशा तुम्हारी कमजोरियों के बारे में विचारशील हूँ, जिसके कारण तुम मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करते हो जैसा कि साँप दयालु किसान से करता है। मैं सचमुच मानव जाति के दूसरों को नापने के कौशल की प्रशंसा करता हूँ—यह वास्तव में उल्लेखनीय, शानदार है! मैं तुम्हें सच बताऊँगा। आज तुम्हारे दिल में आदर है या नहीं, वह महत्वहीन है। मैं घबराया हुआ या चिंतित नहीं हूँ, लेकिन मैं तुम्हें यह भी बताऊँगा कि तुम "प्रतिभाशाली" जो नहीं सीखते और कुछ भी नहीं जानते हो, अंततः अपनी स्वयं की प्रशंसा की छोटी चालाकी से बर्बाद हो जाओगे। तुम ही हो जो पीड़ित होगे, और तुम ही हो जो दंडित किये जाओगे। मैं इतना मूर्ख न बनूँगा कि नरक में तुम्हारे साथ जाऊँ और पीड़ित होता रहूँ, क्योंकि तुम और मैं एक तरह के नहीं हैं। मत भूलो कि तुम एक सृजन हो जो मेरे द्वारा शापित थे, और जो मेरे द्वारा सिखाये और बचाये गये हो। तुममें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी मैं लालसा रखूँ। चाहे मैं जब भी काम करूँ, मैं किन्हीं भी लोगों, घटनाओं, या चीजों के हेरफेर के अधीन नहीं हूँ। यह कहा जा सकता है कि मानवता के प्रति मेरा दृष्टिकोण और नज़रिया हमेशा एक जैसा रहा है। क्योंकि तुम मेरे प्रबंधन में सहायक हो इसलिए मेरे पास तुम्हारे लिए कोई अनुग्रह नहीं है; तुम्हारे पास निश्चय ही किसी और की तुलना में अधिक ताकत नहीं है। मैं तुम्हें इसे हमेशा याद रखने की सलाह देता हूँ कि तुम एक सृजन से अधिक कुछ नहीं हो! यद्यपि तुम मेरे साथ रहते हो, तुम्हें अपनी स्थिति को जानना चाहिए और स्वयं को बहुत बड़ा नहीं देखना चाहिए। यहाँ तक कि अगर मैं तुम्हारी आलोचना नहीं करता या तुम्हारे साथ व्यवहार नहीं करता, और मैं मुस्कुराहट के साथ तुम्हारा सामना करता हूँ, उससे यह साबित नहीं होता कि तुम और मैं एक ही तरह के हैं। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सत्य की खोज कर रहे हो, तुम स्वयं सत्य नहीं हो! तुम्हें किसी भी समय मेरे वचनों के अनुसार बदल जाना चाहिए—तुम इससे बच नहीं सकते। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि जब तक तुम इन अद्भुत समय के बीच हो, जब तक कि यह दुर्लभ मौका यहाँ है, तुम कुछ सीख लो और मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश मत करो। मुझे धोखा देने के लिए तुम्हें चापलूसी से काम लेने की ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए तुम्हारी सारी खोज मेरी खातिर नहीं—यह तुम्हारी खातिर है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो कुछ भी सीखते और जानते नहीं: क्या वे पशु नहीं हैं?" से उद्धृत

69. मनुष्य का अपना कर्तव्य निभाना, वास्तव में, उस सबका निष्पादन है जो मनुष्य के भीतर अन्तर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए सम्भव है, उसका निष्पादन है। यह इसके बाद ही है कि उसका कर्तव्य पूरा होता है। मनुष्य की सेवा के दौरान मनुष्य के दोष उसके प्रगतिशील अनुभवों और न्याय के अनुभव की उसकी प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा हैं या प्रभाव नहीं डालते हैं। वे लोग जो सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मान लेते हैं और ऐसे दोषों के भय से पीछे हट जाते हैं जो सेवा में विद्यमान हो सकते हैं, सभी मनुष्यों में सबसे कायर होते हैं। यदि मनुष्य वह व्यक्त नहीं कर सकता है जो उसे सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह प्राप्त नहीं कर सकता है जो मनुष्य के लिए अंतर्निहित रूप से संभव है, और इसके बजाय वह समय गँवाता है और बिना रुचि के कार्य करता है, तो उसने अपने उस प्रकार्य को खो दिया है जो एक सृजन किए गए प्राणी में होना चाहिए। इस प्रकार का मनुष्य साधारण दर्जे का तुच्छ मनुष्य और स्थान घेरने वाला निरर्थक कचरा समझा जाता है; इस तरह के किसी व्यक्ति को कैसे सृजन किए गए प्राणी की उपाधि से सम्मानित किया जा सकता है? क्या वे भ्रष्टता के अस्तित्व नहीं हैं जो बाहर से तो चमकते हैं परन्तु भीतर से सड़े हुए हैं? यदि कोई मनुष्य अपने आप को परमेश्वर कहता हो मगर अपनी दिव्यता को व्यक्त करने में, परमेश्वर स्वयं का कार्य करने में, या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो, तो वह निसंदेह ही परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है, और परमेश्वर जो अंतर्निहित रूप से प्राप्त कर सकता है वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है जो अंतर्निहित रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता है, और वह सृजन किए गए प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है। इसके अलावा, वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर के द्वारा ध्यान रखे जाने, बचाए जाने, और सिद्ध बनाए जाने के योग्य नहीं है। कई लोग जिन्होंने परमेश्वर के भरोसे को खो दिया है परमेश्वर के अनुग्रह को भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने कुकर्मों से घृणा नहीं करते हैं बल्कि ढिठाई से इस विचार का प्रचार करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है। और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व को भी इनकार करते हैं; कैसे इस प्रकार की विद्रोहशीलता वाला मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है? जो मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफल हो गए हैं वे परमेश्वर के विरुद्ध अत्यधिक विद्रोही रहे हैं और उसके अत्यधिक ऋणी हैं फिर भी वे पलट जाते हैं और कटुता से कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। कैसे इस प्रकार का मनुष्य सिद्ध बनाए जाने के लायक हो सकता है? क्या यह अलग कर दिए और दण्ड दिए जाने का अग्रदूत नहीं है? ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाता है पहले से ही सबसे जघन्य अपराध का दोषी है, जिसके लिए यहाँ तक कि मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी परमेश्वर के साथ बहस करने की धृष्टता करता है और स्वयं का उस से मिलान करता है। इस प्रकार के मनुष्य को सिद्ध बनाने का क्या महत्व है? यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफल होता है, तो उसे अपने आप को दोषी और ऋणी समझना चाहिए; उसे अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए, और इससे भी अधिक, परमेश्वर के लिए अपना जीवन और रक्त अर्पण कर देना चाहिए। केवल तभी वह सृजन किया गया प्राणी है जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करता है, और केवल इस प्रकार का मनुष्य ही परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं का आनन्द लेने के, और उसके द्वारा सिद्ध किए जाने के योग्य है। और तुम लोगों में से बहुतायत का क्या होगा? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ किस तरह का व्यवहार करते हो जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपने कर्तव्य को किस प्रकार से निभाया है? क्या तुम लोगों ने, यहाँ तक कि अपने स्वयं के जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है जिसे करने के लिए तुम लोगों को बुलाया गया था? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों ने मुझसे बहुत अधिक प्राप्त नहीं किया है? क्या तुम अंतर कर सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और उस सब का क्या हुआ जो मैंने तुमको प्रदान किया है और तुम लोगों के लिए किया है? क्या तुम लोगों ने इस सब का मूल्यांकन कर लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आँकलन और इसकी तुलना उस जरा से विवेक के साथ कर ली है जो तुम लोगों के पास तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे वचनों और कार्यों के योग्य कौन हो सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों का ऐसा मामूली सा बलिदान उस सबके योग्य है जो मैने तुम लोगों को प्रदान किया है। मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट आशंकाओं को प्रश्रय देते हो और मेरे प्रति खिन्न मन रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों ने एक सृजन किए गए प्राणी के कर्तव्य को बिल्कुल भी पूरा नहीं किया है? तुम लोगों को एक सृजन किया गया प्राणी कैसे माना जा सकता है? क्या तुम लोग स्पष्टता से नहीं जानते हो कि यह क्या है जिसे तुम लोग व्यक्त कर रहे और जी रहे हो? तुम लोग अपने कर्तव्य को पूरा करने में असफल रहे हो, किन्तु तुम परमेश्वर की दया और भरपूर आशीषें प्राप्त करने की लालसा करते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम लोगों के जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है जो कुछ नहीं माँगते हैं और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम लोगों जैसे मनुष्य, ऐसे मामूली तुच्छ व्यक्ति, स्वर्ग के अनुग्रह का आनन्द लेने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनन्त दण्ड ही तुम लोगों के दिनों में तुम्हारे साथ रहेगा! यदि, तुम लोग मेरे प्रति विश्वसनीय नहीं रह सकते हो, तो तुम लोगों के भाग्य में पीड़ा ही बनी रहेगी। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते हो, तो तुम्हार भाग्य में दण्ड ही होगा। राज्य के किसी भी अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है जिसे तुम लोग प्राप्त करने के योग्य हो और तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम ह!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

70. आओ हम निम्नलिखित अंश को देखें: "पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ों को करेंगे जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को, प्रजातंत्र और स्वतन्त्रता के लिए, मानवाधिकारों के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को जीवनवृत्तियों के लिए अपने कौशलों का उपयोग करने की ओर मोड़ देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक अंश के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या मनुष्यों की ये अभिव्यक्तियाँ आवश्यक रूप से वैसी ही नहीं हैं जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है"? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, बल्कि आज, लोग अमूर्त मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय करते हैं। जो लोग नियमों को बहुमूल्य समझते हैं वे नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं वे हैसियत को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, जो लोग अपनी जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने की ओर ले जाती हैं: "लोग अपने वचनों से परमेश्वर की सबसे बड़े के रूप में स्तुति करते हैं, किन्तु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।" ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उन जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। जहाँ तक जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है उसका, और उसकी इच्छा का संबंध है, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस परिदृश्य में, इन लोगों के बारे में और जो लोग दो हज़ार वर्ष पहले मन्दिर में अपना स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे उनके बारे में क्या अन्तर है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

71. मेरी पीठ पीछे बहुत से लोग हैसियत के आशीष का लोभ करते हैं, वे ठूँस-ठूँस कर खाना खाते हैं, वे नींद से प्यार करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर बहुत ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना सामान्य कार्य नहीं करते हैं, और मुफ़्त में खाते हैं, या अन्यथा मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, वे ऊँचे स्थान में खड़े होते हैं तथा दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरन्तर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हैं, वे हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे पास सही प्रेरणाएँ हैं, किन्तु तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किन्तु यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सही नहीं हैं, और तुम तब भी कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों के लिए मेरे पास कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्त में भोजन करते हैं, और हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं पर कोई विचार नहीं करते हैं; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, वे परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं उस पर परमेश्वर की आत्मा के द्वारा कोई विचार नहीं किया जाता है, वे हमेशा अपने भाई-बहनों के विरुद्ध चालाकी करते और साजिश करते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर, वे दाख की बाड़ी में लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूरों को चुराते हैं और दाख की बाड़ी को कुचलते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करने के लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते हो, क्या तुम परमेश्वर के आदेश को लेने के लायक़ हो? कौन तुम जैसे व्यक्ति पर भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बड़ा काम देने की हिम्मत कर सकता है? क्या तुम चीजों में विलंब नहीं कर रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें" से उद्धृत

72. क्रूर, निर्दयी मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, आपस में धक्का-मुक्की, सम्मान और संपत्ति के लिए छीना-झपटी, एक-दूसरे का कत्ल करना—आखिर ये सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर ने लाखों वचन कहे हैं, तब भी किसी को अभी तक अक़्ल नहीं आई है। वे अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, हैसियत, अभिमान, और पैसों के लिए, कपड़ों के वास्ते, भोजन और शारीरिक क्रिया करते हैं—किसकी क्रियाएँ वास्तव में परमेश्वर के लिए हैं? यहाँ तक कि उनमें से भी जिनकी क्रियाएँ परमेश्वर के वास्ते हैं, मात्र थोड़े ही हैं जो परमेश्वर को जानते हैं। ऐसे कितने हैं जो अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते हैं? ऐसे कितने हैं जो अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए दूसरों का दमन नहीं करते हैं और दूसरों के साथ भेदभाव नहीं करते हैं? इस प्रकार, परमेश्वर को असंख्य बार बलात् मृत्युदंड दिया गया है, अनगिनत क्रूर न्यायाधीशों ने परमेश्वर की निंदा की और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया। कितनों को धर्मी कहा जा सकता है क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "दुष्टों को निश्चय ही दण्ड दिया जायेगा" से उद्धृत

73. क्या तुम लोगों ने कभी भी उसका एहसास किया है जो तुम आज कर रहे हो—दुनिया भर में उपद्रव करना, एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र करना, एक दूसरे को धोखा देना, विश्वासघात, गोपनशीलता और बेशर्मी का व्यवहार करना, सच्चाई को न जानना, कुटिल और धोखेबाज बनना, चापलूसी करना, खुद को हमेशा सही और दूसरों से बेहतर मानना, घमंडी बनना, और पहाड़ों में जंगली जानवरों की तरह जंगलीपन करना और जानवरों के राजा की तरह कठोर बनना—क्या यही किसी मानव की सदृशता है? तुम लोग असभ्य और अनुचित हो। तुमने कभी मेरे वचन को कीमती नहीं माना है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों ने एक तिरस्कारपूर्ण रवैया अपनाया है। इस तरह कहाँ से उपलब्धि, एक सच्चा मानव-जीवन, और सुंदर आसरे आएंगे? क्या तुम्हारी असंयत कल्पना वास्तव में तुम्हें बाघ के मुँह से बचा पाएगी? क्या यह वास्तव में तुम्हें जलती हुई आग से बचा पाएगी? क्या तुम इतने गिर गए होते अगर तुमने वास्तव में मेरे कार्य को अमूल्य खजाने के रूप में माना होता? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे नसीब को वास्तव में बदला नहीं जा सकता है? क्या तुम इस तरह के अफसोस के साथ मरने के लिए तैयार हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य का सार और उसकी पहचान" से उद्धृत

74. तुम लोगों में से हर एक जनसाधारण के शिखर तक उठ चुका है; तुम लोग जनसाधारण के पूर्वज होने के लिए आरोहण कर चुके हो। तुम लोग अत्यंत स्वेच्छाचारी हो, और आराम के स्थान की तलाश करते हुए, और अपने से छोटे भुनगों को निगलने का प्रयास करते हुए, उन सभी भुनगों के बीच तुम्हारे सिर पर खून सवार हो जाता है। अपने हृदयों में तुम लोग द्वेषपूर्ण और कुटिल हो, उन भूतों से भी आगे हो जो समुद्र के तले में डूबे हुए हैं। तुम लोग, भुनगों को ऊपर से नीचे तक परेशान करते हुए, गोबर के तले में रहते हो, जब तक कि ऐसा न हो जाए कि उनके पास कोई शांति न रहे, थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से लड़ते हो और फिर शांत हो जाते हो। तुम लोगों को अपनी जगह तक का पता नहीं है, मगर तब भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। ऐसे संघर्ष से तुम लोग क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय में वास्तव में मेरे लिए आदर होता, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक दूसरे के साथ कैसे लड़ सकते थे? तेरी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तू अभी भी गोबर में एक बदबूदार छोटा सा कीड़ा नहीं है? क्या तू पंख विकसित करने में सक्षम होगा और आकाश में कबूतर बन पाएगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी, तो तुझे उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तूने की हैं" से उद्धृत

75. तुम लोगों के लिए यह सबसे अच्छा होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा प्रयास करो। तुम लोगों ने परमेश्वर की कृपा प्राप्त क्यों नहीं की है? तुम्हारा स्वभाव उसके लिए घिनौना क्यों है? तुम्हारे शब्द उसके अंदर जुगुप्ता क्यों उत्पन्न करते हैं? तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखाते ही खुद ही अपनी तारीफ करने लगते हो और अपने छोटे से बलिदान के लिए प्रतिफल चाहते हो; जब तुम सब थोड़ी-सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो तुम लोग दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कुछ छोटे छोटे-कार्यों को करके तुम लोग परमेश्वर का तिरस्कार करने लग जाते हो। तुम लोग परमेश्वर को स्वीकार करने के बदले धन-संपत्ति, भेंटों और प्रशंसा की अभिलाषा करते हो। एक या दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा हृदय दुखता है; जब तुम लोग दस सिक्के देते हो, तब तुम लोग आशीषों की और दूसरों से अलग दिखने की अभिलाषा करते हो। जैसी तुम्हारी मानवता है उसके बारे में तो बात करना और सुनना भी वास्तव में अपमानजनक है। तुम्हारे शब्दों और कार्यों के बारे में प्रशंसापूर्ण क्या है? वे जो अपने कर्तव्यों को निभाते हैं और वे जो नहीं निभाते; वे जो अगुवाई करते हैं और वे जो अनुसरण करते हैं; वे जो परमेश्वर को ग्रहण करते और वे जो नहीं करते हैं; वे जो दान देते हैं और वे जो नहीं देते; वे जो प्रचार करते हैं और वे जो वचन को ग्रहण करते हैं इत्यादि; इस प्रकार के सभी लोग अपनी ही तारीफ करते हैं। क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता है? निश्चित रूप से तुम लोग जानते हो कि तुम सब परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम सभी परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। अच्छी तरह से यह जानते हुए कि तुम सब बिल्कुल अयोग्य हो, फिर भी तुम लोग डींग मारते ही रहते हो। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता है कि तुम्हारी समझ ऐसी हो गई है कि अब तुम्हारे पास और आत्म-संयम नहीं है? ऐसी समझ के साथ तुम लोग परमेश्वर के साथ संगति करने के काबिल कैसे हो सकते हो? अब क्या तुम लोग इस मकाम पर अपने लिए भयभीत नहीं हो? तुम्हारा स्वभाव पहले ही ऐसा हो गया है कि तुम लोग परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम्हारा विश्वास हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारा विश्वास बेतुका नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम उस मार्ग का चुनाव कैसे करोगे जिस पर तुम्हें चलना है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

76. अब मैं पृथ्वी पर रहता हूँ, और मनुष्यों के बीच रहता हूँ। सभी मनुष्य मेरे कार्य का अनुभव कर रहे हैं और मेरे कथनों को देख रहे हैं, और इसके साथ ही मैं अपने प्रत्येक अनुयायी को सभी सत्य प्रदान करता हूँ ताकि वे मुझसे जीवन प्राप्त कर सकें और ऐसा मार्ग प्राप्त कर सकें जिस पर वे चल सकें। क्योंकि मैं परमेश्वर हूँ, जीवन का दाता हूँ। मेरे कार्य के कई सालों के दौरान, मनुष्य ने काफी प्राप्त किया है और काफी त्याग किया है, मगर मैं तब भी कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य केवल अपने होठों से स्वीकार करता है कि मैं परमेश्वर हूँ जबकि मेरे द्वारा बोले गए सत्य से असहमत होता है, और उस सत्य का तो बहुत ही कम अभ्यास करता है जो मैं उससे अपेक्षा करता हूँ। कहने का अर्थ है कि मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है; मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है परन्तु जीवन के अस्तित्व को नहीं करता है, मनुष्य केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करता है परन्तु उसके सार को स्वीकार नहीं करता है। अपने उत्साह के कारण, मनुष्य मेरे लिए घृणित बन गया है। क्योंकि मनुष्य मुझे धोखा देने के लिए बस कानों को अच्छे लगने वाले वचनों को कहता है, और कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता है। तुम लोगों की बोली में साँप का प्रलोभन है; इसके अलावा, यह चरम रूप से अहंकारी, असंदिग्ध रूप से प्रधान स्वर्गदूत की घोषणा है। इतना ही नहीं, तुम्हारे कर्म शर्मनाक स्तर तक तार-तार और फटे हुए हैं, तुम लोगों की असंयमित अभिलाषाएँ और लोलुप अभिप्राय सुनने में अपमानजनक हैं। तुम सब लोग मेरे घर में पतंगे, घृणा के साथ छोड़ी जाने वाली वस्तुएँ बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य का प्रेमी नहीं है, बल्कि ऐसे मनुष्य हो जो आशीषों के, स्वर्ग में आरोहण करने के, और मसीह के पृथ्वी पर अपनी सामर्थ्य का उपयोग करने के शानदार दर्शन को देखने के इच्छुक हैं। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि कोई तुम लोगों के समान व्यक्ति, इतनी गहराई तक भ्रष्ट कोई मनुष्य, और जो बिल्कुल भी नहीं जानता है कि परमेश्वर क्या है, कैसे परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य हो सकता है? तुम लोग स्वर्ग में कैसे आरोहण कर सकते हो? तुम लोग कैसे महिमा को देखने के योग्य बन सकते हो, जो अपने वैभव में अभूतपूर्व है। तुम लोगों के मुँह छल और गंदगी, विश्वासघात और अहंकार के वचनों से भरे हैं। तुम लोगों ने मेरे प्रति कभी भी ईमानदारी के वचन नहीं कहे हैं, मेरे वचनों का अनुभव करने पर कोई पवित्र वचन, समर्पण करने के कोई वचन नहीं कहे हैं। अंततः तुम लोगों का यह विश्वास किसके जैसा है? तुम लोगों के हृदयों में अभिलाषाएँ और सम्पत्ति भरी हुई है; तुम्हारे दिमागों में भौतिक चीजें भरी हुई हैं। हर दिन, तुम लोग गणना करते हो कि मुझसे कोई चीज़ कैसे प्राप्त करो, तुमने मुझसे कितनी सम्पत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। हर दिन, तुम लोग और भी अधिक आशीषें अपने ऊपर बरसने का इंतज़ार करते हो ताकि तुम लोग और भी अधिक तथा और भी बेहतर तरीके से उन चीज़ों का आनन्द ले सको जिनका आनंद लिया जा सकता है। प्रत्येक क्षण तुम लोगों के विचारों में जो रहता है वह मैं नहीं हूँ, न ही वह सत्य है जो मुझसे आता है, बल्कि तुम लोगों में पति (पत्नी), बेटे, बेटियाँ, या तुम क्या खाते या पहनते हो, और कैसे तुम लोगों का आनंद और भी अधिक बेहतर हो सकता है, यही विचार आता है। यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने पेट को ऊपर तक भर लेते हो, तब क्या तुम लोग एक लाश से जरा सा ही अधिक नहीं हो? यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने बाहरी स्वरूप को सजा लेते हो, क्या तुम लोग तब भी एक चलती-फिरती लाश नहीं हो जिसमें कोई जीवन नहीं है? तुम लोग तब तक अपने पेट के लिए कठिन परिश्रम करते हो जब तक कि तुम लोगों के सिर के बाल भूरे और सफेद नहीं हो जाते हैं, फिर भी तुममें से कोई भी मेरे कार्य के लिए एक बाल तक बलिदान नहीं करता है। तुम लोग अपनी देह के वास्ते, और अपने बेटे-बेटियों के लिए लगातार बहुत सक्रिय रहते हो, अपने शरीर पर भार डाल रहे हो और अपने मस्तिष्क को कष्ट दे रहे हो, फिर भी तुम में से कोई एक भी मेरी इच्छा के लिए चिंता या परवाह नहीं दिखाता है। वह क्या है जो तुम अब भी मुझ से प्राप्त करने की आशा रखते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं" से उद्धृत

77. तुम लोगों के हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरे हुए हैं, और इसके परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा अपने साथ विद्रोह और कपट लिए रहते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ डाल देते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे बारे में शक्की हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे अस्तित्व के अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते हो और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में मुझे धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मुझसे डरते नहीं हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या यह सब प्यार माना जाता है? तुम लोगों ने बहुत बलिदान किए हैं, यह सत्य है, जिसकी मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ। क्या इसे प्रेम माना जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा सा भी आभास नहीं है। इतने सालों के कार्य और इतने सारे वचनों के बाद जो मैंने तुम लोगों को प्रदान किए हैं, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह पीछे मुड़कर सावधानीपूर्वक देखने योग्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं" से उद्धृत

78. जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं मगर उस सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, मगर परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर की अवधारणाएँ हैं और जानबूझ कर विद्रोह करते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के बारे में निर्णय लेते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने में और उनकी गवाही देने में असमर्थ है, वह परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरे सत्योपदेश को सुनिए: यदि तुम लोगों को इस मार्ग पर चलने का वास्तव में विश्वास है, तो इस मार्ग पर चलते रहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते हो, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा यह वास्तव में शुभ के बजाय अशुभ का शकुन है, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति अतिशय भ्रष्ट है। तुम लोगों में लेशमात्र भी स्वामिभक्ति या आज्ञाकारिता, या ऐसा हृदय नहीं है जिसमें धार्मिकता और सत्य की प्यास हो। और न ही तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति लेशमात्र भी प्रेम है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी दशा अति विध्वस्त है। तुम लोगों को जो पालन करना चाहिए वह करने में और जो बोलना चाहिए वह बोलने में तुम लोग सक्षम नहीं हो। तुम लोग उन चीजों का अभ्यास करने में सक्षम नहीं हो जिनका तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए। तुम लोग उस कार्य को करने में सक्षम नहीं हो जो तुम लोगों को करना चाहिए। तुम लोगों में वह स्वामिभक्ति, विवेक, आज्ञाकारिता और संकल्पशक्ति नहीं है जो तुममें होनी चाहिए। तुम लोगों ने उस तकलीफ़ को नहीं झेला है, जो तुम लोगों को झेलनी चाहिए, तुम लोगों में वह विश्वास नहीं है, जो तुम लोगों में होना चाहिए। तुम लोग सभी गुणों से विहीन हो, क्या तुम लोगों के पास जीते रहने के लिए आत्म-सम्मान है? मेरा तुम लोगों से आग्रह है कि अनंत विश्राम के लिए अपनी आँखें बंद कर लेना तुम लोगों के लिए बेहतर है, जिससे तुम परमेश्वर को तुम लोगों के लिए चिंता करने और कष्ट झेलने से बचा सकते हो। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम उसकी इच्छा को नहीं जानते हो; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, मगर परमेश्वर की माँगों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर परमेश्वर को जानते नहीं हो, और ऐसे जीते हो मानो प्रयत्न करने का कोई लक्ष्य नहीं है। तुम लोगों के कोई आदर्श और कोई उद्देश्य नहीं हैं। तुम लोग मनुष्य की तरह जीते हो मगर तुम लोगों के पास विवेक, सत्यनिष्ठा या लेशमात्र भी विश्वसनीयता नहीं है। तुम लोगों को मनुष्य कैसे समझा जा सकता है? तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर उसे धोखा देते हो। ऊपर से, तुम लोग परमेश्वर का धन ले लेते हो और उसके चढ़ावों को खा जाते हो, मगर अंत में, परमेश्वर के लिए कोई आदर भाव अथवा परमेश्वर के प्रति विवेक का प्रदर्शन नहीं करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग परमेश्वर की अत्यंत मामूली माँगों को भी पूरा नहीं कर सकते हो। तो तुम लोगों को मनुष्य कैसे माना जा सकता है? जो भोजन तुम लोग खाते हो और जो साँस तुम लोग लेते हो, वे परमेश्वर से आते हैं, तुम उसके अनुग्रह का आनंद लेते हो, मगर अंत में, तुम लोगों को परमेश्वर का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता है। इसके विपरीत, तुम लोग निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का विरोध करते हो। क्या तब तुम लोग एक जंगली जानवर नहीं हो जो कुत्ते से भी बेहतर नहीं है? क्या जानवरों में कोई ऐसा है जो तुम लोगों की तुलना में अधिक द्वेषपूर्ण है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं" से उद्धृत

79. तुम लोगों की सत्यनिष्ठा सिर्फ़ वचनों में है, तुम लोगों का ज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक और वैचारिक है, तुम लोगों की मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीषें पाने के लिए है, और इसलिए तुम लोगों का विश्वास अवश्य ही किस प्रकार का हो सकता है? आज भी, तुम लोग सत्य के प्रत्येक वचन को एक बहरे कान से ही सुनते हो। तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि ईसा क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि यहोवा का आदर कैसे करें, तुम लोग नहीं जानते हो कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश किया जाए, और तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर के स्वयं के कार्य और मनुष्य के धोखे के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किये गए किसी सत्य के वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो, जो तुम्हारे विचार के अनुरूप नहीं होता है। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारी सत्यनिष्ठा कहाँ है? सत्य को खोजने की तुम्हारी इच्छा कहाँ है? परमेश्वर के बारे में तुम्हारा आदर कहाँ है? मैं तुम लोगों बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं, वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फ़रिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से उद्धृत

80. तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान, चाहे वह पुरुष या महिला हो, पूरे दिन किस बात पर होता है? क्या तुम सब जानते हैं कि तुम खाने के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़ों को देखो, तुम्हारे हाथों ने क्या फसल काटी है उसे देखो, अपने पेट को रगड़ो—खून पसीने की कीमत चुकाकर तुमने क्या हासिल किया है? तुम अभी भी दृश्यावलोकन के बारे में सोचते हो, तुम अभी भी अपने बदबूदार देह को सजाने की सोचते हो—इसका क्या मूल्य है! तुम्हें सामान्य होने के लिए कहा जाता है, लेकिन आज न केवल तुम सामान्य नहीं हो, तुम इसके विपरीत हो। ऐसे व्यक्ति को मेरे सामने आने की हिम्मत कैसे हो सकती है? इस तरह की एक मानवता के साथ, अपने शरीर को प्रदर्शित और प्रकट करते हुए, हमेशा शरीर की वासनाओं के बीच रह कर, क्या तुम गंदे राक्षसों और बुरी आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे गंदे राक्षस को लंबे समय तक रहने नहीं दूँगा! और यह मत सोचो कि मुझे नहीं पता कि तुम अपने दिल में क्या सोचते हो। तुम अपनी वासना और अपने शरीर पर एक कठोर लगाम रख सकते हो, लेकिन क्या मैं तुम्हारे दिल के विचारों को और जो कुछ तुम्हारी आँखें चाहती हैं उसे नहीं जान सकता? क्या तुम सब युवा महिलाएँ अपने देह को प्रदर्शित करने के लिए उसे फूलों की तरह सुंदर नहीं बनाती हो? तुम लोगों के लिए पुरुषों के क्या लाभ हैं? क्या वे वास्तव में तुम लोगों को दुःख के सागर से बचा सकते हैं? और तुम सब रसिक जो सज्जन और प्रतिष्ठित दिखने के लिए खुद को पोशाक पहनाते हो—क्या यह तुम्हारे रूप के दिखावे के लिए नहीं है? और तुम लोग इसे किसके लिए कर रहे हो? तुम सब के लिए महिलाओं के क्या लाभ हैं? क्या वे तुम लोगों के पाप के स्रोत नहीं हैं? तुम सब पुरुष और महिलाएँ, मैंने तुमसे कई वचन कहे हैं, फिर भी तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही अनुपालन किया है। तुम लोगों के कान भारी हैं, आँखें मंद हो गई हैं, और तुम सब के दिल कठोर हैं, इस तरह कि तुम लोगों के देह में लालसा के अलावा और कुछ नहीं है; तुम लोग इसमें फँसे हुए हो, बचने में असमर्थ हो। गंदगी और कीचड़ में छटपटाते तुम कीड़ों के पास कौन जाना चाहता है? मत भूलो कि तुम लोग उनकी तुलना में कुछ अधिक नहीं हो जिन्हें मैंने गोबर से उठाया है, मूल रूप से, तुम सब सामान्य मानवता वाले नहीं थे। मैं तुमसे जो चाहता हूँ वह सामान्य मानवता है जो मूल रूप से तुम लोगों के पास नहीं थी; मैं नहीं चाहता कि तुम लोग अपनी वासनाओं का प्रदर्शन करो, या कि अपने सड़े हुए देह को खुली छूट दो, जिसे कई वर्षों तक शैतान ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग इस तरह खुद को तैयार करते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं है कि तुम सब लगातार और भी गहरे फँस जाओगे? क्या तुम सब नहीं जानते कि तुम लोग मूल रूप से पाप के थे? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम्हारे देह वासना से भरे हैं? यह ऐसा है कि तुम्हारी वासना तुम सब के कपड़ों से भी रिसती है, एक असहनीय रूप से बदसूरत, गंदे राक्षस जैसी तुम सब की स्थिति को प्रकट करते हुए। क्या तुम लोगों के सामने यह सब से अधिक स्पष्ट नहीं है? तुम सभी के दिल, तुम्हारी आँखें, तुम्हारे होंठ—क्या वे गंदे राक्षसों द्वारा अशुद्ध नहीं हुए हैं? क्या वे गंदे नहीं हैं? तुम सोचते हैं कि जब तक तुम कोई अनैतिक[झ] काम नहीं करते, तब तक तुम अत्यंत पवित्र हो; तुम सोचते हो कि सुंदर ढंग से कपड़े पहन कर तुम अपनी नीच आत्माओं को छिपा सकते हो—इसकी कोई संभावना नहीं है! मैं तुम सब को और अधिक यथार्थवादी होने की सलाह देता हूँ: धोखेबाज़ और नकली मत बनो, और खुद को प्रदर्शित न करो। तुम लोग अपनी वासना एक-दूसरे को दिखाते हो, परन्तु जो भी तुम लोग प्राप्त करोगे वह होगी सदा के लिए पीड़ा और बेरहम प्रताड़ना! तुम्हें एक-दूसरे के साथ इश्कबाज़ी और प्यार करने की क्या ज़रूरत है? क्या यह तुम लोगों का खरापन है? क्या यह तुम सभी को सशक्त बनाता है? मैं तुम्हारे बीच उन लोगों से घृणा करता हूँ जो दुष्टतापूर्ण दवाओं का इस्तेमाल करते हैं और इंद्रजाल में पड़ते हैं, मैं तुम लोगों के बीच उन युवा पुरुषों और महिलाओं से घृणा करता हूँ जो अपने देह से प्यार करते हैं। सबसे अच्छा होगा यदि तुम लोग खुद को नियंत्रित करोगे, क्योंकि आज मैं तुमसे चाहता हूँ कि तुम्हारे पास सामान्य मानवता हो, न कि तुम अपनी वासना का दिखावा करो। तुम लोग हमेशा कोई भी मौका ले लेते हो, क्योंकि तुम लोगों के देह बहुत भरपूर हैं, और तुम सभी की वासना बहुत बड़ी है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से उद्धृत

81. मेरे कार्य करने के दौरान तुम लोग हमेशा मेरे खिलाफ काम करते हो; तुम मेरे वचनों का कभी भी पालन नहीं करते हो। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तू अपना काम करता है, तू अपना खुद का एक छोटा सा राज्य बना लेता है—तुम लोमड़ियों और कुत्तों के झुंड, तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह मेरे खिलाफ होता है! तुम लोग हमेशा उन लोगों को अपने आगोश में लाने की कोशिश करते हो जो केवल तुम लोगों से प्यार करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह धोखेबाज़ी है! तुम लोगों के पास कोई आज्ञाकारिता या श्रद्धा नहीं है—तुम लोग जो भी करते हो वह धोखेबाज़ी और ईशनिन्दा है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? यौन में अनैतिक, कामुक पुरुष हमेशा उन नख़रेबाज़ वेश्याओं को अपने स्वयं के भोग के लिए अपनी ओर खींचना चाहते हैं। मैं ऐसे यौन रूप से अनैतिक राक्षसों को नहीं बचाऊँगा, मैं तुम सब गंदे राक्षसों से नफरत करता हूँ, तुम लोगों की व्यभिचारिता और नख़रेबाजी तुम सभी को नरक में गिरा देगी—तुम लोगों के पास अपने लिए कहने को क्या है? तुम गंदे राक्षसों और बुरी आत्माओ, तुम बहुत घृणास्पद हो! तुम लोग घिनौने हो! ऐसे कचरे को कैसे बचाया जा सकता है? क्या जो पाप में फँसे हैं उन्हें अभी भी बचाया जा सकता है? आज इस सत्य, इस मार्ग, और इस जीवन के प्रति तुम लोगों का कोई आकर्षण नहीं है; तुम लोग पाप करने के प्रति, धन के ओहदे, प्रसिद्धि और लाभ, देह के सुख, पुरुषों की सुंदरता और महिलाओं के नख़रों के प्रति आकर्षित हो। ऐसा क्या है जो मेरे राज्य में प्रवेश के लिए तुम लोगों को योग्य बनाता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी कहीं अधिक बड़ी है, तुम लोगों की हैसियत परमेश्वर की हैसियत से अधिक ऊँची है, मनुष्यों के बीच तुम सभी की प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग एक ऐसा आदर्श बन गए हो जिसकी लोग पूजा करते हैं। क्या तू महादूत नहीं बन गया है? जब लोगों का परिणाम प्रकट किया जाता है, जो तभी होता है जब उद्धार का कार्य समाप्त होने लगता है, तो तुम लोगों में से कई लाशें होंगी जो उद्धार से परे हैं और जिनका उन्मूलन अवश्य कर दिया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से उद्धृत

82. मनुष्य मूल्यहीन अभागे हैं क्योंकि वे स्वयं को नहीं सँजोए रखते हैं। यदि वे स्वयं से भी प्यार नहीं करते हैं, किन्तु स्वयं को ही रौंदते हैं, तो क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि वे मूल्यहीन हैं? मानवजाति एक अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और जो दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को देती है। किन्तु फिर भी, वे अब भी नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण के अधीन करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैं मानवजाति के बीच किसी जीवन से नहीं गुज़रा हूँ, मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म हर की बहुत स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति को उसकी गहरी शर्मिंदगी तक उजागर करने में भी सक्षम हूँ, इस हद तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को मार्ग देने का अब और साहस नहीं करते हैं। घोंघे की तरह, जो अपने खोल में शरण ले लेता है, वे अपनी स्वयं की बदसूरत स्थिति को उजागर करने का अब और साहस नहीं करते हैं। क्योंकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती है, इसलिए उनका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालना है, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के बीच संबंध असामान्य हैं, और लोगों के बीच कोई सामान्य अंतर्वैयक्तिक संबंध नहीं हैं, इसलिए परमेश्वर के साथ उनका सामान्य[ञ] संबंध तो बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर ने बहुत अधिक कहा है, और ऐसा करने में उसका मुख्य उद्देश्य मानवजाति के हृदय में एक स्थान को अधिकार में लेना है, लोगों को उनके हृदय की सभी मूर्तियों से छुटकारा दिलवाना है, ताकि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर सामर्थ्य का उपयोग कर सके और पृथ्वी पर होने का अपना उद्देश्य प्राप्त कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 14" से उद्धृत

83. मैंने इस प्रकार से तुम लोगों बीच कार्य किया और बातचीत की है, मैंने बहुत सारी ऊर्जा व्यय की और प्रयास किए हैं, फिर भी क्या तुम लोगों ने कभी भी उस बात को सुना है जो मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से कहता हूँ? तुम लोग कहाँ मुझ सर्वशक्तिमान के सामने झुके हो? तुम लोग मुझ से इस प्रकार से व्यवहार क्यों करते हैं? क्यों जो कुछ तुम लोग कहते और करते हो वह मेरे क्रोध को भड़काता है? तुम्हारे हृदय इतने कठोर क्यों हैं? क्या मैंने कभी भी तुम्हें मार गिराया है? क्यों तुम लोग मुझे दुःखी और चिंतित करने के अलावा और कुछ नहीं करते हो? क्या तुम लोग अपने ऊपर मेरे, यहोवा के कोप के दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम लोगों की अवज्ञा द्वारा भड़काए हुए मेरे क्रोध को तुम पर भेजने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या मैं जो कुछ भी करता हूँ वह तुम लोगों के लिए नहीं है? फिर भी तुम लोगों ने सदैव मुझ यहोवा के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया: मेरे बलिदान को चुराना, मेरे घर की वेदी के चढ़ावों को घर ले जा कर भेड़ियों की माँद में छोटे और बड़े शावकों को खिलाना; लोग, मुझ सर्वशक्तिमान के वचनों को, मलमूत्र के समान गंदा हो जाने के लिए पाखाने में उछालते हुए एक दूसरे से लड़ाई करते हैं, गुस्से से घूरते हुए तलवारों और भालों के साथ एक दूसरे का सामना करते हैं। तुम लोगों में ईमानदारी कहाँ है? तुम लोगों की मानवता पाशविकता बन गई है! तुम लोगों के हृदय बहुत पहले पत्थरों में बदल गए हैं। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब मेरे कोप का दिन आएगा तब मुझ सर्वशक्तिमान के विरुद्ध आज की गई तुम लोगों की दुष्टता का मैं न्याय करूँगा? क्या तुम लोगों को लगता है कि मुझे इस प्रकार से बेवकूफ बनाकर, मेरे वचनों को कीचड़ में फेंक कर और उन पर ध्यान न देकर—मेरी पीठ पीछे इस प्रकार के कार्य करके तुम लोग मेरी कुपित नज़रों से बच निकल सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदानों को चुराया और मेरी सम्पत्ति के लिए लालायित हुए, तभी तुम लोग मुझ यहोवा की आँखों द्वारा पहले से ही देखे जा चुके थे? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदानों को चुराया, तो यह उस वेदी के सामने था जिस पर बलिदान चढ़ाए जाते हैं? तुमने कैसे मान लिया कि तुम इतने चालाक हो कि मुझे इस तरह से धोखा दे सकोगे? मेरा प्रचण्ड प्रकोप कैसे तुम लोगों की बुरी करतूतों से दूर रह सकता है? मेरा क्रोध कैसे तुम लोगों के घृणित पापों को नज़रंदाज़ कर सकता है? आज तुम लोग जो बुराई करते हो वह तुम लोगों के लिए कोई मार्ग नहीं खोलती है, बल्कि तुम्हारे कल के लिए ताड़ना संचित करती है; यह तुम लोगों के प्रति मुझ सर्वशक्तिमान की ताड़ना को भड़काती है। कैसे तुम लोगों की बुरी करतूतें और बुरे वचन मेरी ताड़ना से बच सकते हैं? कैसे तुम लोगों की प्रार्थनाएँ मेरे कानों तक पहुँच सकती हैं? कैसे मैं तुम लोगों की अधार्मिकता के बचने का मार्ग खोल सकता हूँ? मैं कैसे अपनी अवहेलना करने में तुम लोगों की बुरी करतूतों को जाने दे सकता हूँ? कैसे मैं तुम लोगों की ज़ुबानों को काटकर अलग नहीं कर सकता हूँ जो साँप की ज़ुबान के समान जहरीली है? तुम लोग मुझे अपनी धार्मिकता के वास्ते नहीं पुकारते हो, बल्कि इसके बजाय अपनी अधार्मिकता के परिणामस्वरूप मेरे कोप को संचित करते हो। मैं तुम लोगों को कैसे क्षमा कर सकता हूँ? मेरी, सर्वशक्तिमान की, नज़रों में, तुम लोगों के वचन और कार्य दोनों ही गंदे हैं। मेरी, सर्वशक्तिमान की नज़रें, तुम लोगों की अधार्मिकता को एक निर्मम ताड़ना के रूप में देखती हैं। कैसे मेरी धर्मी सजा और न्याय तुम लोगों से दूर जा सकती है? क्योंकि तुम लोग मेरे साथ ऐसा करते हो, मुझे दुःखी और कुपित करते हो, इसलिए मैं कैसे तुम लोगों को अपने हाथों से बच कर निकलने दे सकता हूँ और उस दिन से दूर होने दे सकता हूँ जब मैं, यहोवा तुम लोगों को ताड़ना और श्राप दूँगा? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों के सभी बुरे वचन और कथन पहले से ही मेरे कानों तक पहुँच चुके हैं? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की अधार्मिकता ने पहले से ही मेरी धार्मिकता के पवित्र लबादे को गंदा कर दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की अवज्ञा ने पहले से ही मेरे उग्र क्रोध को भड़का दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों ने बहुत पहले से ही मुझे अति कुपित कर रखा है और बहुत समय पहले ही मेरे धैर्य को आजमा चुके हो? क्या तुम नहीं जानते हो कि तुम लोग मेरी देह के टुकड़े करके उसे पहले ही नष्ट कर चुके हो? मैंने अब तक इतना सहा है, कि मैं तुम लोगों के प्रति अब और अधिक सहिष्णु नहीं होते हुए, अपना क्रोध प्रकट करता हूँ। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की बुरी करतूतें पहले ही मेरी आँखों के सामने आ गई हैं, कि मेरी पुकारें मेरे पिता के कानों तक पहले ही पहुँच चुकी हैं? वह कैसे तुम लोगों को मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार करने दे सकता है? क्या मैं तुम लोगों में जो भी कार्य करता हूँ वह तुम लोगों के वास्ते नहीं है? फिर भी तुम लोगों में से कौन मेरे, यहोवा के, कार्य को अधिक प्रेम करने लगा है? क्या मैं कमज़ोर होने, और जो पीड़ा मैंने सही है उसकी वजह से, अपने पिता की इच्छा के प्रति विश्वासघाती हो सकता हूँ? क्या तुम लोग मेरे हृदय को नहीं समझते हो? मैं तुम लोगों से उसी तरह बोलता हूँ जैसे यहोवा बोलता था; क्या मैंने तुम लोगों के लिए काफी कुछ नहीं त्यागा है? भले ही मैं अपने पिता के कार्य के वास्ते इन सभी कष्टों को सहने को तैयार हूँ, फिर भी तुम लोग उस ताड़ना से कैसे मुक्त हो सकते हो जिसे मैं अपने कष्टों के परिणामस्वरूप तुम पर लाऊँगा? क्या तुम लोगों ने मेरा बहुत आनंद नहीं ले लिया है? आज, मैं अपने परमपिता द्वारा तुम को प्रदान किया गया हूँ; क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोग मेरे उदार वचनों की अपेक्षा कहीं अधिक का आनंद लेते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मेरा जीवन तुम लोगों के जीवन और जिन चीजों का तुम आनन्द लेते हो उनके बदले है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मेरे परमपिता ने शैतान के साथ युद्ध करने के लिए मेरे जीवन का उपयोग किया है, कि उसने मेरा जीवन तुम लोगों को प्रदान किया है, जिसने तुम लोगों को सौ गुना प्राप्त करवाया, और तुम लोगों को कितने ही प्रलोभनों से बचने दिया? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि यह केवल मेरे कार्य के माध्यम से ही है कि तुम लोगों को कई प्रलोभनों से और कई उग्र ताड़नाओं से छूट दी गई है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि यह केवल मेरे ही कारण है कि मेरे परमपिता ने तुम लोगों को अभी तक आनन्द लेने दिया है? आज तुम लोगों के हृदय कैसे इतने कठोर हो सकते हैं, मानो कि वे उन पर कड़ी चमड़ी उग आई हो? कैसे वह दुष्टता जो तुम आज करते हो उस कोप के दिन से बच सकती है जो पृथ्वी से मेरे जाने के बाद आएगा? कैसे मैं उन हृदय से अत्यंत कठोर लोगों को यहोवा के क्रोध से बचने दे सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है" से उद्धृत

84. तुम लोग, छोटे से बदबूदार कीड़ो, मुझ, यहोवा की, वेदी के चढ़ावों को चुराते हो; ऐसा करने में, क्या तुम लोग अपनी बर्बाद, असफल प्रतिष्ठा को बचा सकते हो और इस्राएल के चुने हुए लोग बन सकते हो? तुम लोग बेशर्म नीच आदमी हो! वेदी पर वे भेंटें, उन लोगों द्वारा जो मेरा आदर करते हैं, उदार भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में, मुझे चढ़ाई गई थीं। वे मेरे नियंत्रण के लिए और मेरे उपयोग के लिए हैं, तो लोगों द्वारा मुझे दिए गए छोटे से जंगली कबूतर को संभवतः तू मुझसे कैसे लूट सकता है? क्या तू एक यहूदा बनने से नहीं डरता है? क्या तू नहीं डरता है कि तेरी भूमि रक्त का मैदान बन सकती है? तू बेशर्म प्राणी! क्या तुझे लगता है कि लोगों द्वारा चढ़ाए गए जंगली कबूतर तुम भुनगों का पेट पोषण करने के लिए हैं? मैंने तुझे जो दिया है, वह है जिससे में संतुष्ट हूँ और तुझे देने का इच्छुक हूँ; मैंने तुझे जो नहीं दिया है वह मेरी इच्छा पर है। तू बस मेरे चढ़ावों को चुरा नहीं सकता है। एक वह जो कार्य करता है वह मैं, यहोवा—सृष्टि का प्रभु हूँ, और लोग मेरी वजह से भेंटें चढ़ाते हैं। क्या तुझे लगता है कि तू जो दौड़-भाग करता है यह उसके लिए भरपाई है? तू सच में बेशर्म है! तू यह दौड़-भाग किसके लिए करता है? क्या यह तेरे स्वयं के लिए नहीं है? तू मेरी भेंटों को क्यों चुराता है? तू मेरे पैसों की थैली में से पैसे क्यों चुराता? क्या तू यहूदा इस्करियोती का बेटा नहीं है? मुझ, यहोवा को भेंटें याजकों द्वारा आनंद लिए जाने के लिए हैं। क्या तू एक याजक है? तू मेरी भेंटों को आत्मसंतुष्टि के साथ खाने की हिम्मत करता है और यहाँ तक कि तू उन्हें मेज पर भी छोड़ देता है; तू किसी लायक नहीं है! तू बेकार का नीच! मुझ, यहोवा की आग तुझे भस्म कर देगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी, तो तुझे उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तूने की हैं" से उद्धृत

85. ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों के विश्वास में, तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी मसीह के साथ अपनी संगति में, तुम सच नहीं बोल सकते हो, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी हो। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ तुम्हारा सामंजस्य नहीं है, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने पिता, माता और घरवालों की अच्छी देखभाल की हो, तब मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। बस इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम करते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और छंटाई स्वीकार नहीं कर सकता, और सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का दावा करते हो। तुम सबका ऐसा विश्वास तुम्हारे ऊपर उचित प्रतिकार लेकर आएगा। काल्पनिक भ्रम में लिप्त होना और मसीह को देखने की चाहत करना बंद कर दो, क्योंकि तुम सभी कद में बहुत छोटे हो, इतने कि तुम लोग उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम पूरी तरह से अपने विद्रोह को मिटाकर मसीह के साथ साँमजस्य स्थापित कर पाते हो, तभी परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम बिना छंटाई या न्याय से गुज़रे परमेश्वर को देखने जाते हो, तब तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और विनाश तुम्हारी नियति बन जाएगा। मनुष्य का स्वभाव स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, क्योंकि सभी मनुष्यों को शैतान के द्वारा पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया है। यदि कोई भ्रष्ट मनुष्य अपनी भ्रष्ट के मध्य परमेश्वर के साथ संगति करने का प्रयास करे, तो उससे कोई अच्छी चीज़ नहीं उत्पन्न हो सकती; मनुष्य के सारे कार्य और वचन निश्चित तौर पर उसकी भ्रष्टता का खुलासा करेंगे; और जब वह परमेश्वर के साथ जुड़ेगा, तो उसका विद्रोह सभी पहलुओं में प्रकट होगा। मनुष्य अनजाने में मसीह का विरोध करता है, मसीह को धोखा देता है, और मसीह को अस्वीकार करता है; तब मनुष्य और भी ज़्यादा खतरनाक स्थिति में होगा। यदि यह जारी रहता है, तो वह दण्ड का भागी होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

86. मैंने बहुत सारे वचन कहे हैं, और अपनी इच्छा और स्वभाव को भी व्यक्त किया है, और फिर भी, लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ में विश्वास करने में अक्षम ही हैं, या यह भी कहा जा सकता है कि, वे अभी भी मेरी आज्ञा का पालन करने में अक्षम हैं। वे जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, वे जो शिक्षा-सिद्धान्त के अनुसार जीते हैं, वे जो उस कार्य के मध्य में जीते हैं जिन्हें मैं आज करता हूं—उनमें से कौन मेरे अनुकूल है? तुम सब सिर्फ़ आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, और कभी एक बार भी तुम लोगों ने यह विचार नहीं किया कि मेरे अनुकूल कैसे बन सकते हो, या अपने आप को मेरे साथ शत्रुता होने से कैसे रोक सकते हो। मैं तुम सबसे बहुत निराश हूं, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक दिया है, फिर भी मैंने तुम लोगों से बहुत ही कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमण्ड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की ज़रूरत से अधिक अभिलाषाएं, तुम लोगों का धोखा, तुम लोगों का आज्ञा-उल्लंघन—इनमें से कौन सी चीज़ मेरी नज़र से बच सकती है? तुम लोग मेरे साथ चाल चलते हो, मुझे मूर्ख बनाते हो, मेरा अपमान करते हो, मुझे धोखा देते हो, मुझ से ज़बरदस्ती वसूल करते हो, बलिदानों के लिए मुझ पर बल प्रयोग करते हो—ऐसे दुष्कर्म मेरी सज़ा से कैसे बच निकल सकते हैं? तुम लोगों की बुराई मेरे साथ तुम्हारी शत्रुता का प्रमाण है, और मेरी अनुकूलता में न होने का प्रमाण है। तुम सब में से प्रत्येक अपने आप में यह विश्वास करता है कि वह मेरे अनुकूल है, परन्तु यदि ऐसा है, तो फिर यह अखंडनीय प्रमाण किस पर लागू होता है? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति बहुत निष्कपटता और ईमानदारी है। तुम सब सोचते हो कि तुम लोग बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो, और तुम सबने मुझे बहुत कुछ समर्पित किया है। तुम सब सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त काम कर दिया है। फिर भी, क्या तुम लोगों ने कभी इन धारणाओं की अपने ख़ुद के स्वभाव से तुलना की है? मैं कहता हूं कि तुम लोग बहुत ही घमण्डी, बहुत ही लालची, बहुत ही यन्त्रवत् हो; और तुम सब मुझे बहुत ही गहरी चालबाज़ियों से मूर्ख बनाते हो, और तुम्हारे इरादे घृणित हैं और तुम्हारी विधियाँ घृणित हैं। तुम लोगों की ईमानदारी बहुत ही थोड़ी है, तुम्हारी गम्भीरता बहुत ही थोड़ी है, और तुम्हारी अंतरात्मा तो और अधिक क्षुद्र है। तुम लोगों के हृदय में बहुत ही अधिक द्वेष है, और इससे कोई भी नहीं बचा है, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। तुम सब मुझे अपने बच्चों, या अपने पति, या आत्म-संरक्षण के लिए बाहर निकाल देते हो। मेरी चिंता करने की बजाय—तुम सब अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने सामाजिक स्तर, अपने भविष्य, और अपनी ख़ुद की संतुष्टि की चिंता करते हो। तुमने कभी बातचीत करते समय या कार्य करते समय मेरे बारे में सोचा है? जब मौसम ठंडा होता है, तो तुम लोगों की सोच अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी, या अपने माता-पिता के लिए ही होती है। जब मौसम गरम होता है, तब भी, तुम सबके हृदय में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता है। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, तुम अपने ख़ुद के फायदों, अपनी ख़ुद की व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कभी भी ऐसा क्या काम किया है जो सिर्फ मेरे लिए ही हो? तुमने कब सिर्फ मेरे बारे में ही सोचा है? कब तुमने अपने आप को, हर कीमत पर, केवल मेरे लिए और मेरे कार्य के लिए ही समर्पित किया है? मेरे साथ तुम्हारी अनुकूलता का प्रमाण कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी ईमानदारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी आज्ञाकारिता की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे केवल मेरी आशीषों का लाभ पाने के लिए ही नहीं रहे हैं? तुम सब मुझे मूर्ख बनाते और धोखा देते हो, तुम सब सत्य के साथ खेलते हो, और सत्य के अस्तित्व को छुपाते हो, और सत्य के सार-तत्व को धोखा देते हो, और तुम लोग इस प्रकार अपने आप को मेरा शत्रु बनाते हो, अतः भविष्य में क्या तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रहा है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर से अनुकूलता की ही खोज करते हो, और मात्र एक अज्ञात विश्वास की खोज करते हो, फिर भी तुम सब मसीह की अनुकूलता में नहीं हो। क्या तुम्हारी दुष्टता को भी वही कठोर दण्ड नहीं मिलेगा जो पापी को मिलता है? उस समय, तुम सबको अहसास होगा कि कोई भी जो मसीह के अनुकूल नहीं होता, क्रोध के दिन से वह बच नहीं पायेगा, और तुम लोगों पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं उन्हें किस प्रकार का कठोर दण्ड दिया जायेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" से उद्धृत

87. परमेश्वर के सामने तुम सभी लोग पुरस्कार प्राप्त करके और उसकी नज़रों में उसके अनुग्रह की वस्तु बन कर प्रसन्न होते हो। यह हर एक की इच्छा होती है जब वह परमेश्वर पर विश्वास करना प्रारम्भ करता है, क्योंकि मनुष्य सम्पूर्ण हृदय से ऊँची चीज़ों के लिए प्रयास करता है और कोई भी दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता है। यही मनुष्य की प्रकृति है। निश्चित रूप से इसी कारण, तुम लोगों में से कई स्वर्ग के परमेश्वर से अनुग्रह प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करते रहते हो, फिर भी वास्तव में, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की वफादारी और निष्कपटता, तुम लोगों की स्वयं के प्रति तुम लोगों की वफादारी और निष्कपटता से बहुत कम है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि मैं परमेश्वर के प्रति तुम्हारी वफादारी को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता हूँ, और तुम लोगों के हृदय में विद्यमान परमेश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारता हूँ। अर्थात्, वह परमेश्वर जिसकी तुम लोग आराधना करते हो, वह अज्ञात परमेश्वर जिसकी तुम लोग प्रशंसा करते हो, उसका बिल्कुल भी अस्तित्व नहीं है। मेरे निश्चित तौर पर ऐसा कह सकने का कारण यह है कि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से बहुत दूर हो। तुम लोगों की वफादारी तुम्हारे हृदयों में एक प्रतिमा के अस्तित्व के कारण है, और जहाँ तक मेरी बात है, परमेश्वर जो तुम लोगों की दृष्टि में प्रतीत होता है न तो महान है और न ही छोटा, तुम बस मुझे केवल वचनों से ही अभिस्वीकृत करते हो। जब मैं तुम लोगों की परमेश्वर से अत्यधिक दूरी के बारे में बोल रहा होता हूँ, तो मैं इस बारे में संकेत कर रहा हूँ कि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से कितनी दूर हो, जबकि अज्ञात परमेश्वर नज़दीक ही प्रतीत होता है। जब मैं "महान नहीं" कहता हूँ, तो यह इस संदर्भ में है कि जिस परमेश्वर पर तुम्हें आज के दिन विश्वास है, वह कैसे ब़ड़ी योग्यताओं से रहित मात्र एक साधारण मनुष्य प्रतीत होता है; ऐसा मनुष्य जो बहुत उत्कृष्ट नहीं है। और जब मैं "छोटा नहीं" कहता हूँ, तो इसका अर्थ यह है कि यद्यपि यह मनुष्य हवा को आज्ञा नहीं दे सकता है और बरसात को आदेश नहीं दे सकता, तब भी वह परमेश्वर के आत्मा को उस कार्य को करने के लिए पुकारने में समर्थ है जो, मनुष्य को पूरी तरह से हैरान करते हुए, स्वर्ग और पृथ्वी को हिला देता है। बाह्यरूप से, तुम सभी लोग पृथ्वी के इस मसीह के प्रति बहुत आज्ञाकारी प्रतीत होते हो, फिर भी सार में न तो उस पर तुम लोगों का विश्वास है और न ही तुम उसे प्रेम करते हो। मेरे कहने का अर्थ यह है कि वह एक जिस पर तुम लोगों को वास्तव में विश्वास है वह तुम्हारी भावनाओं का अज्ञात परमेश्वर है, और वह जिसे तुम लोग वास्तव में प्रेम करते हो वो परमेश्वर है जिसकी तुम सभी लोग दिन-रात लालसा करते हो, लेकिन उसे कभी भी व्यक्तिगत रूप से नहीं देखा है। जहाँ तक इस मसीह कि बात है, तुम लोगों का विश्वास मात्र आंशिक है, और उसके लिए तुम लोगों का प्रेम कुछ भी नहीं है। विश्वास का अर्थ भरोसा और ईमान है; प्रेम का अर्थ है, हृदय में आदर और प्रशंसा, कभी अलग नहीं होना। फिर भी तुम लोगों का मसीह में विश्वास और उससे प्रेम आज इससे बहुत ही कम पड़ता है। जब विश्वास की बात आती है, तो तुम लोग उस पर कैसे विश्वास करते हो? जब प्रेम की बात आती है, तो तुम लोग उसे कैसे प्रेम करते हो? तुम लोगों को उसके स्वभाव के बारे में बस कुछ भी समझ नहीं है, उसके सार के बारे में तो और भी कम ज्ञान है, तो तुम लोगों को उस पर कैसे विश्वास है? उस पर तुम लोगों के विश्वास की वास्तविकता कहाँ है? तुम लोग उसे प्रेम कैसे करते हो? उसके लिए तुम लोगों के प्रेम की वास्तविकता कहाँ है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से उद्धृत

88. यीशु को देखने से पहले, अर्थात, देहधारी परमेश्वर को देखने से पहले, संभवत: तुम्हारे भीतर अनेक विचार होंगे, उदाहरण के लिए, यीशु के रूप के बारे में, उसके बोलने के तरीका, उसके जीवन-शैली के बारे में इत्यादि। लेकिन एक बार वास्तव में उसे देख लेने के बाद, तुम्हारे विचार तेजी से बदल जाएँगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोग जानना चाहते हो? जबकि मनुष्य की सोच और विचारों को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह मनुष्य के लिए और बहुत अधिक असहनीय है कि वह मसीह के सार में परिवर्तन करे। तुम लोग मसीह को अविनाशी, एक संत मानते हो, लेकिन कोई उसे एक सामान्य मानव नहीं मानता जो दिव्य सार धारण किये हुए है। इसलिए, अनेक लोग जो दिन-रात परमेश्वर को देखने की लालसा करते हैं, वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं और परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं। क्या यह मनुष्य की ओर से की गई ग़लती नहीं है? तुम लोग अभी भी यह सोचते हो कि तुम्हारा विश्वास और तुम्हारी निष्ठा ऐसी है कि तुम सब मसीह के रूप को देखने के योग्य हो, परन्तु मैं तुमसे गुहार लगाता हूँ कि तुम अपने आपको और भी अधिक व्यवहारिक चीज़ों से सन्नद्ध कर लो! क्योंकि भूतकाल, वर्तमान, और भविष्य में बहुतेरे जो मसीह के सम्पर्क में आए, वे असफल हो गए हैं और असफल हो जाएँगे; वे सभी फरीसियों की भूमिका निभाते हैं। तुम लोगों की असफलता का कारण क्या है? इसका सटीक कारण यह है कि तुम्हारे विचार में एक प्रशंसनीय परमेश्वर है। परन्तु सत्य ऐसा नहीं जिसकी मनुष्य कामना करता है। न केवल मसीह ऊँचा-विशाल नहीं है, बल्कि वह विषेश रूप से छोटा है; वह न केवल मनुष्य है बल्कि एक सामान्य मनुष्य है; वह न केवल स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता, बल्कि वह पृथ्वी पर भी स्वतन्त्रता से घूम नहीं सकता है। और इसलिए लोग उस के साथ सामान्य मनुष्य जैसा व्यवहार करते हैं; जब वे उसके साथ होते हैं तो बेतकल्लुफ़ी भरा व्यवहार करते हैं, और उसके साथ लापरवाही से बोलते हैं, और तब भी पूरे समय "सच्चे मसीह" के आने का इन्तज़ार करते रहते हैं। जो मसीह पहले ही आ चुका है उसे तुम लोग ऐसा समझते हो कि वह एक साधारण मनुष्य है और उसके वचन को भी साधारण इंसान के वचन मानते हो। इसलिए, तुमने मसीह से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है और उसके बजाए प्रकाश में अपनी कुरूपता को पूरी तरह प्रकट कर दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

89. मसीह के सम्पर्क में आने से पहले, तुम्हें शायद विश्वास हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह बदल चुका है, तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो, और तुम्हें शायद यह भी विश्वास हो कि तुम मसीह की आशीषों को प्राप्त करने के लिए सबसे ज़्यादा योग्य हो। क्योंकि तुम कई मार्गों पर यात्रा कर चुके हो, बहुत काम कर चुके हो, और बहुत अधिक फल ला चुके हो, अतः अंत में तुम्हीं मुकुट प्राप्त करोगे। फिर भी, एक सच्चाई है जिसे शायद तुम नहीं जानते हो: जब मनुष्य मसीह को देखता है तब उसका भ्रष्ट स्वभाव, विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा हो जाता है, और जिस विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा ऐसे अवसर पर होता है वह किसी अन्य समय की अपेक्षा कहीं ज़्यादा पूर्ण और निश्चित होता है। मसीह मनुष्य का पुत्र है और सामान्य मानवता रखता है जिस कारण मनुष्य न तो उसका सम्मान करता और न ही आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इस कारण से मनुष्य का विद्रोह पूरी तरह और स्पष्ट रूप से प्रकाश में लाया जाता है। अतः मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति के सारे विद्रोह को खोज निकाला है और मानवजाति के स्वभाव को बहुत ही स्पष्ट रूप से दृश्यमान बना दिया है। इसे कहते हैं "लालच देकर एक बाघ को पहाड़ के नीचे ले आना" और "लालच देकर एक भेड़िए को गुफा से बाहर ले आना।" क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या तुम कह सकते हैं कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगेः जब भी परमेश्वर मुझे नई परिस्थिति में डालता है, मैं हमेशा आज्ञापालन करता हूँ और कभी शिकायत नहीं करता। इसके अतिरिक्त, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता हूँ। कुछ कहेंगेः परमेश्वर जो भी काम मुझे सौंपता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ करता हूँ और कभी भी लापरवाही नहीं करता। तब मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ: क्या तुम सब मसीह के साथ रहते हुए उसके अनुरूप हो सकते हो? और कितने समय तक तुम सब उसके अनुरूप रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घण्टा? दो घण्टे? हो सकता है तुम्हारा विश्वास उसके अनुरूप हो, परन्तु तुम लोगों के पास अधिक दृढ़ता नहीं है। जब तुम सचमुच में मसीह के साथ रहोगे, तो तुम्हारा दंभ और अहंकार धीरे-धीरे तुम्हारे शब्दों और कार्यों के द्वारा प्रकट होने लगेगा, और इस प्रकार तुम्हारी अत्यधिक इच्छा, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतुष्टि स्वतः ही प्रकट हो जायेगी। आखिरकार, तुम्हारा अहंकार बहुत ज़्यादा बड़ा हो जाएगा, और जब कि तुम मसीह के वैसे ही विरोधी नहीं बन जाते जैसे जल और आग, और तब तुम्हारे स्वभाव का पूरी तरह से खुलासा हो जायेगा। उस समय, तुम्हारी धारणाएँ पर्दे में नहीं रह सकेंगी। तुम्हारी शिकायतें भी, अनायास ही प्रकट हो जाएँगी, और तुम्हारी नीच मानवता का भी पूरी तरह से खुलासा हो जाएगा। फिर भी, तुम लगातार अपने विद्रोहीपन से मुकरते हो। और तुम विश्वास करते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना आसान नहीं है और वह मनुष्य के प्रति बहुत अधिक कठोर है, लेकिन अगर वह कोई अधिक दयालु मसीह होता तो तुम पूरी तरह से उसे समर्पित हो जाते। तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम्हारे विद्रोह का एक जायज़ कारण है, कि तुम सबने केवल तभी मसीह के विरूद्ध विद्रोह किया जब उसने तुम लोगों को हद से ज़्यादा मजबूर कर दिया। तुम सबने कभी यह एहसास नहीं किया है कि तुम लोग मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, न ही तुम्हारे पास उसकी आज्ञा मानने की मंशा है। बल्कि, तुम ढिठाई से आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारे मन के अनुसार काम करे, और यदि वह एक भी कार्य ऐसा करे जो तुम्हारे मन के अनुकूल न तो तुम लोग मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं मनुष्य है। क्या तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे नहीं हैं जो उसके साथ इस तरह विवाद करते हैं? आख़िरकार तुम लोग किसमें विश्वास करते हो? और तुम लोग किस तरह से खोजते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

90. तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम सबसे गुहार लगाता हूँ कि तुम अपने आपको इस तरह ऊँचा न उठाओ; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं यह कहता हूँ कि कोई मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, इस समय तुम मसीह को देखोगे तो, तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद कर देगा और बेहद तिरस्कृत करेगा। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार फूटना शुरू कर सकता है, और तुम्हारे विद्रोह में फल लग सकते हैं। ऐसी मानवता के साथ तुम कैसे मसीह के साथ संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम वास्तव में उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुम में सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदय में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता बहुत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम्हारा मन होता है, तुम परमेश्वर को पकड़ते हो और उसकी आराधना करने लगते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि तुम सभी उनके सहअपराधी हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। यहाँ तक कि वे मनुष्य भी जो दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाते हैं उन्हें भी प्रतिफल दिया जाता है, फिर भी मसीह, जो तुम्हारे बीच में ऐसा कार्य करता है, उसे मनुष्य के द्वारा प्रेम नहीं किया जाता है, न प्रतिफल दिया जाता है, न ही उसे मनुष्य का समर्पण प्राप्त होता है। क्या यह दिल दुखाने वाली बात नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

91. मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है, इसलिए सभी सृजे गए प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता, अर्थात्, परमेश्वर स्वयं का स्वभाव तथा अस्तित्व है, जो उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही साधारण हो, यह बात अखंडनीय है कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले तथा वह किसी भी प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करें, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है, मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह कैसे भी अपनी दिव्यता के अस्तित्व को प्रकट करे, मनुष्य यह स्वीकार करने में असमर्थ है कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपनी आज्ञाकारिता और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख लोग उतना ही हल्के ढंग से मसीह का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी है जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपनाते हैं, मगर उन "महान लोगों" की ऊँची प्रतिमाओं को आराधना करने के लिए मेज पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा परमेश्वर की अवज्ञा इस तथ्य से आते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा के प्रति और साथ ही मसीह की सामान्य मानवता से समर्पण करता है; इसमें परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा उसकी अवज्ञा का स्रोत निहित है। यदि मसीह के पास न तो उसकी मानवता का भेष होता और न ही सृजन किए गए प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज की होती, बल्कि इसके बजाए अति मानवता से सम्पन्न होता, तब किसी भी मनुष्य में अवज्ञा न होने की संभावना होती। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अदृश्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण इस वजह से है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है तथा उसके पास सृजन किए गए प्राणी की कोई भी विशेषता नहीं है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किन्तु मसीह के प्रति अपमान करने की प्रवृत्ति बनाए रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" से उद्धृत

92. जब विश्वास की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं क्योंकि उनमें विश्वास है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा को नहीं सहेंगे। तब मैं आपसे पूछता हूँ: ऐसा क्यों है कि यद्यपि आप परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, किन्तु कभी भी उसका आदर नहीं करते हैं? यदि आप परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं तो क्यों आपके हृदय में परमेश्वर का भय नहीं है? आप स्वीकार करते हैं कि मसीह परमेश्वर का देहधारण है, तो क्यों आप उसके प्रति इस प्रकार का तिरस्कार रखते हैं? उसके प्रति इतने अनादर पूर्वक कार्य क्यों करते हैं? क्यों आप उसकी खुलकर आलोचना करते हैं? क्यों आप हमेशा उसकी गतिविधियों ताक-झाँक करते हैं? क्यों आप अपने आप को उसकी व्यवस्था के प्रति समर्पित नहीं करते हैं? क्यों आप उसके वचन के अनुसार कार्य नहीं करते हैं? क्यों आप उसकी भेंटों को जबरन वसूलते और लूटते हैं? क्यों आप मसीह के स्थान पर बोलते हैं? क्यों आप उसके कार्य और वचन का आँकलन करते हैं कि वे सही हैं या गलत हैं? क्यों आप पीठ पीछे उसकी ईशनिंदा करने का साहस करते हैं? क्या यही और अन्य बातें हैं जो आपके विश्वास का गठन करती हैं?

आपकी बातचीत और व्यवहार का हर अंश मसीह पर आपके अविश्वास के तत्वों को प्रकट करता है जो आप अपने भीतर वहन करते हैं। आप जो कुछ भी करते हैं उसके लिए आपके कुत्सित इरादों और लक्ष्यों में अविश्वास व्याप्त होता है; यहाँ तक कि आपकी आँखों से जो झलकता है और जो साँसें आप छोड़ते हैं, इन्हीं तत्वों से दूषित हैं। दूसरे शब्दों में, आप में से प्रत्येक व्यक्ति, दिन के हर पल के दौरान, अपने साथ अविश्वास के तत्वों को वहन करता है। इसका अर्थ है कि, हर पल, आप मसीह के साथ विश्वासघात करने के खतरे में हैं, क्योंकि आपके शरीर में दौड़ने वाला रक्त ही देहधारी परमेश्वर में अविश्वास के साथ संचारित होता रहता है। इसलिए, मैं यह कहता हूँ कि परमेश्वर पर विश्वास के मार्ग पर जिन पदचिह्नों को आप छोडते हैं, वे काफ़ी नहीं हैं। परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर आपकी यात्रा की बुनियाद अच्छी तरह से मज़बूत नहीं है, और उसकी बजाय आप बिना रुचि के चलते रहते हैं। आप हमेशा मसीह के वचनों पर संदेह करते हैं और उन्हें तुरंत अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। यही कारण है कि आप मसीह पर विश्वास नहीं करते हैं, और हमेशा उसके बारे में अवधारणाएँ रखना एक अन्य कारण है कि आप मसीह पर विश्वास नहीं करते हैं। मसीह के कार्यों के बारे में हमेशा संशय रखना, मसीह के वचनों के प्रति बहरे बने रहना, मसीह के द्वारा किए गए जो भी कार्य हैं उनके बारे में राय रखना और इसे पूरी तरह से समझने में समर्थ नहीं होना, आपको चाहे कैसा भी स्पष्टीकरण क्यों न प्राप्त हो, किन्तु अवधारणाओं को छोड़ने में कठिनाई महसूस करना इत्यादि; ये सभी अविश्वास के तत्व हैं जो आपके हृदय में घुलमिल गए हैं। यद्यपि आप मसीह के कार्य का अनुसरण करते हैं और कभी भी पीछे नहीं रहते हैं, किन्तु आपके हृदयों में अत्यधिक विद्रोह घुलमिल गया है। यह विद्रोह परमेश्वर में आपके विश्वास की एक अशुद्धि है। शायद आप सहमत न हों, किन्तु यदि इससे आप अपने स्वयं के इरादों को नहीं पहचान सकते हैं, तो आप निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति होंगे जो नष्ट हो जाएगा। क्योंकि परमेश्वर केवल उन्हें ही पूर्ण करता है जो वास्तव में उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें नहीं जो उस पर संशय करते हैं, और उन सब को तो बिल्कुल नहीं जो कभी भी उसे परमेश्वर न मानने के बावजूद उसका इच्छा के विरुद्ध अनुसरण करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?" से उद्धृत

93. कुछ लोग सत्य का आनन्द नहीं लेते हैं, न्याय का तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग दंभी समझे जाते हैं। ये लोग अनन्य रूप से दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। सत्य के मार्ग को स्वीकार करने के बावजूद, वे संशय में रहते हैं और अपने आप को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं। वे परमेश्वर के लिए बलिदान करने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और मसीह को एक ओर कर दिया जाता है। उनके हृदयों में प्रसिद्धि, वैभव और महिमा भरी रहती हैं। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ऐसा मामूली सा आदमी बहुत से लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, यह कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाने में सक्षम है। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ परमेश्वर के द्वारा चुने गए लोग हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; दरअसल, अविश्वास से दूर, वे हास्यास्पद जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं; वे विशाल समूहों और सम्प्रदायों को ऊँचा सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करते हैं; वे मात्र विश्वसघाती हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?" से उद्धृत

94. आप जिसकी प्रशंसा करते हैं वह मसीह की विनम्रता नहीं, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की है। आप मसीह की सुन्दरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हैं, बल्कि उन आवारा लोगों से प्रेम करते हैं जो घृणित संसार से जुडे हैं। आप मसीह की पीड़ा पर हँसते हैं, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हैं जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और लंपटता का जीवन जीते हैं। आप मसीह के साथ-साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हैं, परन्तु उन धृष्ट मसीह विरोधियों की बाहों में प्रसन्नता से जाते हैं, हालाँकि वे आपको सिर्फ देह, लिखित पत्र और नियंत्रण ही प्रदान कर सकते हैं। फिर भी आपका हृदय उनकी ही ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत, उनके प्रभाव की ओर जाता रहता है, फिर भी आप रवैया बनाये रखते हैं जहाँ आपमसीह के कार्य को स्वीकारना कठिन पाते हैं और आप उसे स्वीकारने के अनिच्छुक हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आपमें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। आपने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि आप बाध्य थे। आपके हृदय में हमेशा कई अहंकारी आचरण वाली छवियों का ऊँचा स्थान रहा है; आप न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हैं। आपके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। आपके हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य रहा है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह अहंकारी तो बिल्कुल नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?" से उद्धृत

95. वर्तमान में बहुत सा अविश्वास अभी भी आपके भीतर है। अपने आप के भीतर कर्मठतापूर्वक देखने का प्रयास करें और आपको आपका उत्तर निश्चित रूप से मिल जाएगा। जब आपको वास्तविक उत्तर मिल जाएगा, तब आप स्वीकार करेंगे कि आप परमेश्वर के विश्वासी नहीं हैं, बल्कि इसके बजाय ऐसे व्यक्ति हैं जो उसे धोखा देता है, उसकी ईशनिंदा करता है और उसके साथ विश्वासघात करता है, और ऐसे व्यक्ति हैं जो उसके प्रति निष्ठाहीन है। तब आपको महसूस होगा कि मसीह कोई व्यक्ति नहीं बल्कि परमेश्वर है। जब वह दिन आएगा, तब आप उसका आदर करेंगे, उससे डरेंगे और वास्तव में मसीह से प्रेम करेंगे। वर्तमान में, आपके हृदय में केवल 30 प्रतिशत ही विश्वास है, जबकि आपका हृदय 70 प्रतिशत शक से ग्रस्त है। मसीह के द्वारा किया गया कोई भी कर्म और बोला गया कोई भी वाक्य आपमें उसके बारे अवधारणाएँ या राय बनाने का कारण बन सकता है। ये अवधारणाएँ और ये राय उसके बारे में आपके पूर्ण अविश्वास से उत्पन्न होती है। आप केवल स्वर्ग के अनदेखे परमेश्वर की प्रशंसा करते हैं और उसका भय मानते हैं और धरती पर जीवित मसीह के लिए आपमें कोई सम्मान नहीं है। क्या यह भी आपका अविश्वास नहीं है? आप केवल उस परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं जिसने अतीत में कार्य किया था, किन्तु आज के मसीह का सामना तक नहीं करते हैं। ये हमेशा आपके हृदय में घुलेमिले "विश्वास" हैं जो आज के मसीह पर विश्वास नहीं करते हैं। मैं आपको कम करके नहीं आँकता हूँ, क्योंकि आपके भीतर अत्यधिक अविश्वास है, आप में बहुत ज्यादा अशुद्धि है और इसकी चीरफाड़ अवश्य की जानी चाहिए। ये अशुद्धियाँ इस बात का संकेत हैं कि आपमें बिल्कुल भी विश्वास नहीं है; ये मसीह को आपके त्यागने के संकेत हैं और आप पर मसीह के विश्वासघाती के रूप में कलंक हैं। वे मसीह के बारे में आपके ज्ञान को ढकने वाला पर्दा हैं, मसीह द्वारा आपको प्राप्त करने में एक बाधा हैं, मसीह के साथ आपके सुसंगत होने में एक रूकावट हैं, और एक सबूत हैं कि मसीह आपको स्वीकार नहीं करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हैं?" से उद्धृत

96. कार्य के कई वर्षों के दौरान, तुम लोगों ने कई सत्यों को देखा है, किन्तु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम लोगों में से कितने सत्य को स्वीकार करने को तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किन्तु कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदयों में जो कुछ भी विद्यमान है वह अधर्म है, और इस कारण से तुम लोग विश्वास करते हो कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है। तुम यहाँ तक कि यह विश्वास भी करते हो कि देहधारी परमेश्वर, ठीक एक सामान्य मनुष्य की तरह, बिना दयालु हृदय या कृपालु प्रेम के होगा। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि एक कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर के भीतर ही विद्यमान होती है। और तुम लोग विश्वास करते हो कि इस प्रकार के संत का अस्तित्व नहीं होता है और केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज्य करते हैं, जब कि परमेश्वर, जिस पर लोग अच्छे और सुंदर के लिए अपना मनोरथ रखते हैं, मनुष्य के द्वारा बनाया गया एक प्रसिद्ध काल्पनिक रूप है। तुम लोगों के मन में, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, किन्तु पृथ्वी का यह परमेश्वर, स्वर्ग के परमेश्वर का सिर्फ़ एक प्रतिस्थानिक और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता है, एक साथ उनका उल्लेख तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता है। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किन्तु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो वे ऐसे गुण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही तुच्छ, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना की प्रवृत्ति नहीं है, केवल धार्मिकता होती है, जबकि धरती के परमेश्वर में केवल स्वार्थी नीयत है और वह बिना किसी निष्पक्षता और समझ वाला है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी सी भी कुटिलता नहीं होती है और वह हमेशा विश्वासयोग्य है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा ही एक बेईमानी का पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत अधिक प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त रूप से परवाह नहीं करता है, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदयों में काफी समय से है और भविष्य में आगे भी बना रह सकता है। तुम लोग अधार्मिकता के दृष्टिकोण से मसीह के सभी कर्मों पर विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत अधिक गम्भीर गलती की है और ऐसा किया है जो तुमसे पहले आने वाले लोगों द्वारा कभी नहीं किया गया है। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते हो जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो मानो कि तुम लोगों के लिए अदृश्य हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करते हो। तुम अभिमानी छवियों को प्रेम करते हो और उन लोगों का सम्मान करते हो जो अपनी वाक्यपटुता के लिए प्रतिष्ठित हैं। तुम सहर्ष उस परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हो जाते हो जो तुम लोगों के हाथों को संपत्ति से भर देता है, और उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा को पूरा कर सकता है। केवल वह एक जिसकी आराधना तुम नहीं करते हो वह यह परमेश्वर है जो कि अभिमानी नहीं है; एकमात्र चीज़ जिससे तुम घृणा करते हो वह इस परमेश्वर के साथ सम्बद्धता ही है जिसे कोई भी मनुष्य उच्च सम्मान नहीं दे सकता है। एकमात्र चीज़ जिसे करने के तुम अनिच्छुक हो वह इस परमेश्वर की सेवा करना ही है, जिसने तुम्हें कभी भी एक पैसा भी नहीं दिया है, और एकमात्र वह जो तुम्हें उसके लिए लालायित करवाने में असमर्थ है वह यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। इस प्रकार का परमेश्वर तुम्हारे क्षितिज को विस्तृत करने में, तुम्हें खज़ाना मिल गया ऐसा महसूस करने में समर्थ नहीं बना सकता है, तुम्हारी इच्छा पूरी करने में समर्थ तो बिल्कुल नहीं बना सकता है। तो फिर क्यों, तुम उसका अनुसरण करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो वह केवल इस मसीह को अपमानित ही नहीं करता है, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, यह स्वर्ग के परमेश्वर का अपमान करता है। मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से उद्धृत

97. तुम सब परमेश्वर से बहुत अधिक इच्छा रखते हो कि वह तुम लोगों में चमक उठे, मगर तुम लोग परमेश्वर से बहुत अधिक दूर हो। आखिर समस्या क्या है? तुम लोग केवल उसके वचनों को ग्रहण करते हो, किन्तु उसके व्यवहार करने या अनावश्यक हिस्से की काट-छाँट करने को ग्रहण नहीं करते हो, उसके प्रत्येक प्रबंध को स्वीकार करने, उस पर पूर्ण विश्वास करने में तो तुम बिल्कुल भी समर्थ नहीं हो। तो फिर यहाँ पर क्या मामला है? अंतिम विश्लेषण में, तुम लोगों का विश्वास एक अंडे के खाली खोल के समान है जो कभी भी किसी चूज़े को पैदा नहीं कर सकता है। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास तुम लोगों को सत्य तक लेकर नहीं आया है या इसने तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं कराया है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों तक जीवनाधार और आशा की एक भ्रामक भावना लाया है। परमेश्वर पर विश्वास करने में तुम लोगों का उद्देश्य, सत्य और जीवन के बजाय, इस आशा और जीवनाधार की भावना के वास्ते है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर पर विश्वास का तुम लोगों का मार्ग, जीहुज़ूरी और बेशर्मी से केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने के अलावा और कुछ नहीं है, और किसी भी तरह से इसे सच्चा विश्वास नहीं माना जा सकता है। कैसे इस प्रकार के विश्वास से चूज़ा प्रकट हो सकता है? दूसरे शब्दों में, इस ढंग के विश्वास से कैसा फल प्राप्त हो सकता है? परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का प्रयोजन, तुम लोगों के लक्ष्यों को पूर्ण करने के लिए, परमेश्वर का उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो परन्तु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो। हालाँकि, मैं तुम लोगों के विचारों का अनुमोदन नहीं करता हूँ। मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किन्तु उनकी कभी भी नहीं, जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस प्रकार के लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हैं, अंत में, वे मेरे हाथ से बच कर नहीं निकल सकते हैं जो दुष्टों को दण्ड देता है। इस प्रकार के लोग दुष्ट हैं; ये मनुष्य दुष्ट हैं; ये दुष्ट लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी भी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते हैं, और उसके अलावा, उसे अभिस्वीकृत नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से उद्धृत

98. सभी कलीसियाओं में समागम में विध्वंसकारी सदस्य होते हैं; उन सभी में ऐसे सदस्य होते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये लोग शैतान का छ्द्म वेष हैं जो परमेश्वर के परिवार में घुस गए हैं। ऐसे लोग छ्द्म वेष धारण करने में विशेष रूप से अच्छे होते हैं; मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, बेशर्म कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने उद्देश्य को पाने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन जब भाइयों और बहनों से सामना होता है, तो वे अपना कुरूप पक्ष को प्रकट कर देते हैं। जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं तो वे उन पर आक्रमण कर देते हैं, उन्हें एक ओर कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर उसकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनगे आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे", और ऐसे "पालतू कुत्ते" अधिसंख्य कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर और गुप्त संकेतों से एक-दूसरे को इशारे करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है। जिस किसी में भी सबसे अधिक विष होता है वह "प्रमुख राक्षस" होता है, और जिसकी भी सबसे अधिक प्रतिष्ठा होती है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए, मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी की भी इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभावों से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं वैसे ही कलीसिया में मौत की घुटन छा जाती है। कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं वे एक ओर फेंक दिए जाते हैं और वे अपना भरसक प्रयास करने की योग्यता को गँवा देते हैं, जबकि जो कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करते हैं और जिनसे मौत पसरती हैं वे कलीसिया में उपद्रव मचाते फिरते हैं। इस तरह की कोई भी कलीसिया बस शैतान के कब्ज़े में है; और इसका सम्राट इब्लीस ही है। यदि समागम के सदस्य उठ खड़े नहीं होते हैं और उन प्रमुख राक्षसों को बाहर नहीं करते हैं, तो वे भी देर-सवेर बर्बाद हो जाएँगे। अब से, ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। यदि ऐसी कलीसिया के समागम के सदस्य, जो थोड़ा सा सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं, इसकी खोज करने में संलग्न नहीं होते हैं, तो उस कलीसिया पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक है, ऐसा कोई नहीं है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उनके सम्बंध विच्छेद कर दिये जाने चाहिए। इसे दफ़्न कर मृत्यु देना कहते हैं; इसे शैतान को बहिष्कृत करना कहते हैं। यदि कोई कलीसिया कई स्थानीय गुण्डों, और साथ ही कुछ छोटी-छोटी "मक्खियों" से युक्त जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है जो उनके आसपास अनुसरण करती हैं, और यदि समागम के सदस्य, सत्य देख लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और हेरफेर से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। यद्यपि इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और ज़्यादा धूर्त, और ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, और इस तरह के हर एक को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से संबंधित हैं, वे शैतान के पास लौट जाएँगे, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं, उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदयों की तृप्ति तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; और वह किसी के प्रति भी पक्षपात नहीं करता है। यदि तू एक इब्लीस है, तो तो तू सत्य का अभ्यास करने में अक्षम है; और यदि तू कोई ऐसा है जो सत्य की खोज करता है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

99. जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे उनसे ईर्ष्या रखते हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं, और वे हमेशा ऐसे लोगों के साथ विश्वासघात करना चाहते हैं जो नासमझ हैं और जिनमें विवेक की कमी है। जिन बातों को ये उगलते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में गिरने का, तुझमें असामान्य परिस्थिति पैदा होने का और तुझे अंधकार से भरने का कारण बनती हैं; वे तुझे देह में आनंद लेने और तेरा अपने आप में आसक्त होने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के साथ सदैव लापरवाही से व्यवहार करते हैं, वे आत्म-बोध से शून्य होते हैं; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर की अवहेलना के लिये फुसलाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और ना ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते होते हैं और स्वयं के प्रति कोई नफ़रत नहीं होती है। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और वे दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य की लालसा करने से रोकते हैं। जिनके साथ वे विश्वासघात करते हैं वे प्रकाश को नहीं देख सकते हैं और अंधेरों में पड़ जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते हैं, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और वे दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने से रोकते हैं, और उन सभी मूर्खों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनकी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किस में विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किस में विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले बहुत सुन चुका हूँ और इसे दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। और कोई कह सकता है कि उनमें विवेक नहीं है, लेकिन वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है; ऐसा एक भी नाज़ुक समय नहीं हुआ है जब पर वे कभी सत्य के पक्ष में खड़े हुए हों, एक बार भी उन्होंने सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं की—तो क्या वे वाकई विवेकहीन हैं? वे हमेशा शैतान के पक्ष में क्यों खड़े होते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना तरह यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो उनकी अभिव्यक्ति बदलने के क्षण भर में ही सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझ में विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ है। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह महज़ इसलिए है क्योंकि कि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो वह इसलिए है क्योंकि अभी निष्कासन का समय नहीं है; बल्कि अभी यह समय हटाने करने का है। तुझे निष्कासित करने की कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब तुझे हटा देने के बाद, दंडित किया जायेगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

100. जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होते हैं। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग करीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जागा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आणंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

101. चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और उसके सभी कार्यों में विश्वास अवश्य रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यदि तुम ऐसा करने में असमर्थ हो, तो यह मायने नहीं रखता है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी कभी भी उसका आज्ञापालन नहीं किया है या उसके सभी वचनों को स्वीकार नहीं किया है, बल्कि उसके बजाए परमेश्वर से समर्पण करने को और तुम्हारी अवधारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सब से अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और तुम एक अविश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति कैसे परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में समर्थ हो सकता है जो मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही मनुष्य वह है जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना करता है और उसका विरोध करता है। वह परमेश्वर का शत्रु है और मसीह विरोधी है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखता है, ऐसे व्यक्ति ने कभी भी समर्पण करने का जरा सा भी इरादा नहीं दिखाया है, और कभी भी खुशी से समर्पण नहीं दिखाया है और अपने आपको दीन नहीं बनाया है। वह दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाता है और कभी भी किसी के प्रति भी समर्पण नहीं दिखाता है। परमेश्वर के सामने, वह स्वयं को वचन का उपदेश देने में सबसे ज़्यादा निपुण समझता है और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझता है। वह उस अनमोल "ख़जाने" को कभी नहीं छोड़ता है जो पहले से ही उसके अधिकार में है, बल्कि आराधना करने, दूसरों को उसके बारे में उपदेश देने के लिए, उन्हें अपने परिवार की विरासत मानता है, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए उनका उपयोग करता है जो उसकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में कुछ संख्या में ऐसे लोग हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल दर साल और पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अनुलंघनीय" कर्तव्य को जोशपूर्वक लागू करने की कोशिश करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता है और एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निन्दा करने का साहस नहीं करता है। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बन गए हैं, और युगों-युगों से दूसरों पर क्रूरतापूर्वक शासन करते हुए उच्छृंखल चल रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करता है और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीवित दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने अस्तित्व में रहने की अनुमति कैसे दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते हैं, तो ये आततायी जिनके हृदय में थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं है कितना कम चल सकते हैं! परमेश्वर के कार्य को मनुष्य के द्वारा आसानी से ग्रहण नहीं किया जाता है। भले ही मनुष्य अपनी सारी ताक़त का इस्तेमाल करे, तो भी वह एक अंश मात्र ही प्राप्त करने और अंत में सिद्धता हासिल करने के योग्य हो पाएगा। तो प्रधानदूत की सन्तानों का क्या होगा जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगे रहते हैं? क्या उनकी परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने की आशा और भी कम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे" से उद्धृत

102. फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की, जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लेते हैं कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से उद्धृत

103. ऐसे लोग जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते हैं वे लोग हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और इससे भी अधिक वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते हैं। वे जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं, वे हर दिन बाइबल पढ़ते हैं, फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता है। एक भी इंसान परमेश्वर को नहीं जान पाता है; और यही नहीं, उनमें से एक भी परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं है। वे सबके सब व्यर्थ, अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पर खड़ा हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के नाम पर धमकी देते हैं, किंतु वे जानबूझ कर उसका विरोध करते हैं। यद्यपि वे स्वयं को परमेश्वर का विश्वासी दर्शाते हैं, किंतु ये वे लोग हैं जो मनुष्यों का मांस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहते हैं या सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, और वे बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करती हैं। यद्यपि वे "मज़बूत देह" वाले हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे ईसा-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर के विरोध में ले जाते हैं? वे कैसे जानेंगे कि ये जीवित शैतान हैं जो निगलने के लिए विशेष रूप से आत्माओं को खोज रहे हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं" से उद्धृत

104. राक्षस और बुरी आत्माएं बेधड़क होकर धरती पर निरंकुश व्यवहार करते रहे हैं और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा और श्रमसाध्य प्रयास को रोक दिया है, जिससे वे अभेद्य बन गए हैं। कैसा महापाप है! परमेश्वर कैसे चिंतित महसूस न करता? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस नहीं करता? वे परमेश्वर के कार्य के लिए गंभीर बाधा और विरोध का कारण बनते हैं। अत्यधिक विद्रोही! यहाँ तक कि अधिक शक्तिशाली दुष्ट की ताकत पर छोटे-बड़े राक्षस भी अभिमानी हो जाते हैं और मुश्किलें पैदा करते हैं। वे स्पष्ट जानकारी के बावजूद जानबूझकर सच्चाई का विरोध करते हैं। विद्रोह के बेटे! ऐसा लगता है कि अब, जब नरक का राजा राजसी सिंहासन पर चढ़ गया है, तो वे दम्भी हो गए हैं और दूसरों के साथ घृणा से पेश आते हैं। कितने सच्चाई की खोज करते हैं और धर्मिकता का पालन करते हैं? वे सभी सूअरों और कुत्तों की तरह जानवर हैं, गोबर के एक ढेर में अपने सिरों को हिलाने और उपद्रव भड़काने[21] के लिए बदबूदार मक्खियों के गिरोह का नेतृत्व करते हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा, राजाओं में सर्वश्रेष्ठ है, इस बात को समझे बिना कि वे सड़न पर भिनभिनाती मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इतना ही नहीं, वे सूअरों और कुत्तों जैसे अपने माता-पिता पर निर्भर करते हुए परमेश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध निंदनीय टिप्पणी करते हैं। अति तुच्छ मक्खियों को लगता है कि उनके माता-पिता एक दांतों वाली व्हेल[22] की तरह विशाल हैं। क्या उन्हें एहसास नहीं है कि वे बहुत कमज़ोर हैं, जबकि उनके माता-पिता उनकी तुलना में अरबों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं? अपनी नीचता से अनजान होकर, वे उन सूअरों और कुत्तों की दुर्गन्ध के सहारे उच्छृंखल व्यवहार करते हैं और भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने का भ्रामक विचार रखते हैं। यह तो बिल्कुल बेशर्मी की बात है! अपनी पीठों पर हरी पंखों के साथ (यह परमेश्वर पर उनके विश्वास करने के दावे को संदर्भित करता है), वे घमंडी हो जाते हैं और हर जगह पर अपनी सुंदरता और आकर्षण का अभिमान करते हैं, मनुष्य पर अपनी अशुद्धताओं को चुपके से डालते हैं। और वे दम्भी भी हैं, मानो कि इंद्रधनुष के रंगों वाले पंखों का एक जोड़ा उनकी अपनी अशुद्धताओं को छिपा सकता है, और इस तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को सताते हैं (यह धार्मिक दुनिया की अंदर की कहानी को संदर्भित करता है)। मनुष्य को नहीं पता कि भले ही मक्खी के पंख खूबसूरत और आकर्षक हों, यह अंततः केवल एक छोटी मक्खी से बढ़कर कुछ नहीं है जो गंदगी से भरी हुई और रोगाणुओं से ढकी हुई है। अपने सूअर और कुत्तों जैसे माता-पिता की ताकत पर, वे देश भर में अत्यधिक उग्रता के साथ आतंक मचाते हैं (यह उन धार्मिक अधिकारियों को संदर्भित करता है, जो सच्चे परमेश्वर और सत्य को धोखा देते हुए, देश से मिले मजबूत समर्थन के आधार पर, परमेश्वर को सताते हैं)। ऐसा लगता है कि यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में, वापस आ गए हैं। उन्होंने फिर से अपने उत्पीड़न का कार्य शुरू कर दिया है, भ्रष्ट हो चुके इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद, अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे परमेश्वर के काम को चुपके से क्षीण करने के तरीकों के बारे में लगातार सोचती हैं। वे बहुत कुटिल और धूर्त हैं और अपने देश में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं। यह बात परमेश्वर को ज़ोर से चीखने को लगभग उकसाती है, और वह उनको नष्ट करने के लिए वह तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (7)" से उद्धृत

105. बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का और उसके द्वारा कही गई चीज़ों का मूल्यांकन यह था: "क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ...उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या शून्य में कल्पना करना नहीं था—उसके कार्यों के बारे में जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के बारे में उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो कि उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, किन्तु वह अहंकार जिसके साथ उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी उन्मत्त ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी उजागर कर दिया था। ये बातें जो उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं वे उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के कुरूप और द्वेषपूर्ण स्वभाव से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु जो कुछ उसने किया था उस पर उन्होंने बिना देखे, अधीरता से, सनक और जानबूझकर किए गए द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। यह यहाँ तक कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को विवेकहीन तरीके से बदनाम करने की हद तक था। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बालज़बूल" और "दुष्टात्माओं का सरदार।" अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देह के कार्य को जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना हुआ था पागलपन कहा। उन्होंने ना केवल बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके प्रतिरोध का सार और परमेश्वर की ईशनिंदा पूरी तरह से शैतान के सार और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्मा के प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा के समान था। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते थे, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मनुष्यजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईशनिंदा का सार और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, परमेश्वर की परीक्षा लेने की उनकी कभी न खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के उनके प्रतिरोध का सार और उसके प्रति उनकी शत्रुता का रवैया, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था उसके लिए परमेश्वर ने एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में, दोनों में अक्षम्य है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

106. तुम्हारे हृदय में एक बहुत बड़ा रहस्य है। तुम कभी नहीं जान पाते कि वो वहाँ है क्योंकि तुम एक ऐसे संसार में जीवन बिता रहे हो जहां चमकती रोशनी नहीं है। तुम्हारा हृदय और तुम्हारी आत्मा दुष्ट शक्ति द्वारा दबोच ली गई है। तुम्हारी आंखों को अंधकार ने ढक लिया है, तुम सूर्य को आकाश में नहीं देख सकते, न ही रात में टिमटिमाते तारों को। तुम्हारे कान धोखा देने वाले शब्दों से जाम हो गए हैं। तुम यहोवा की गर्जन वाली आवाज को सुन नहीं पाते हो, न ही सिंहासन से तेज बहते जल की आवाज को। जो अधिकारपूर्वक तुम्हारा होना चाहिये था और सर्वशक्तिमान ने जो तुम्हें दिया था, वह सब कुछ तुमने खो दिया है। तुम कष्टों के एक अथाह सागर में प्रवेश कर चुके हो, जहां से बच निकलने की सामर्थ तुम्हारे अंदर नहीं है, जीवित बचकर वापस आने की आशा नहीं है, तुम बस संघर्ष करते रहते हो और लगातार चलते रहते हो...। उस घड़ी से तुम्हारी नियति यह बन गई कि दुष्ट के हाथों तुम्हारा विनाश हो, तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आशीषों से बहुत दूर हो गए हो, सर्वशक्तिमान के पोषण की पहुँच से दूर हो गये, और एक ऐसी राह पर चले गये जहाँ से लौटना संभव नहीं। लाखों पुकार भी तुम्हारे दिल और आत्मा को जगा नहीं सकतीं। तुम दुष्ट के हाथों में गहरी नींद में सो जाते हो, जो तुम्हें लालच देकर बिना किसी दिशा और मार्ग संकेतों के, अंतहीन क्षेत्र में ले गया। अब से तुमने अपनी मूल पवित्रता को, मासूमियत को खो दिया है, और सर्वशक्तिमान की देखभाल से छिपने लगे हो। वह दुष्ट तुम्हारे हृदय को चलाता है और तुम्हारा जीवन बन जाता है। अब तुम उससे डरते नहीं हो, उसे नजरअंदाज नहीं करते, उस पर संदेह नहीं करते; बल्कि उसे तो तुम अपने हृदय में ईश्वर समझने लगते हो। तुम उसका आदर-सम्मान करने लगे, तुम उसकी आराधना करते हो, उसकी परछाई की तरह सदैव साथ रहते हो, और जीवन और मृत्यु में एक-दूसरे के लिए वचनबद्ध हो जाते हो। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं कि तुम कहाँ से आये हो, तुम क्यों पैदा हुए हो, या तुम क्यों मरोगे? तुम्हारे लिए सर्वशक्तिमान एक अजनबी-सा हो गया है, तुम उसकी उत्पत्ति को नहीं जानते हो, उसने तुम्हारे लिए जो कुछ किया है, उसको भी भुला बैठे हो। उसका प्रत्येक कार्य तुम्हें घृणित लगने लगा है। न तो तुम उन्हें संजोते हो और न ही उनकी कीमत जानते हो। जब से तुमने सर्वशक्तिमान से पोषण प्राप्त करना शुरू किया है, तभी से तुम उस दुष्ट शक्ति के साथ चलते आ रहे हो। हजारों वर्षों से तुम उस दुष्ट शक्ति के साथ आंधी-तूफान में से होकर चलते रहे हो। उससे मिलकर तुमने परमेश्वर का विरोध किया, जो तुम्हारे जीवन का स्त्रोत था। तुम पश्चाताप करना नहीं जानते, अब तुम जान लो कि तुम विनाश के चरम बिंदु पर जा पहुंचे हो। तुम भूल बैठे कि दुष्ट शक्ति ने तुम्हें प्रलोभित किया, तुम्हें सताया; तुम अपने मूल को भूल गए। ठीक इसी तरह दुष्ट शक्ति तुम्हें प्रत्येक कदम पर अभी भी हानि पहुंचा रही है। तुम्हारा हृदय और तुम्हारी आत्मा संवेदनाशून्य और विगलित हो गई है। तुम अब संसार की व्याकुलता को लेकर शिकायत नहीं करते, ऐसा विश्वास ही नहीं करते कि संसार अधर्म से भरा है। तुम तो सर्वशक्तिमान के अस्तित्व की परवाह तक नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि तुमने बहुत पहले ही दुष्ट शक्ति को अपना सच्चा पिता मान लिया है, और तुम अब उससे अलग नहीं हो सकते। यह तुम्हारे हृदय का एक राज़ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना" से उद्धृत

107. जब भोर होती है, तो भोर का तारा पूर्व दिशा में चमकने लगता है। यह वह तारा है जो पहले कभी नहीं था। यह तारों से आकाश को रोशनी देता है और लोगों के हृदय में बुझी हुई ज्योति को जला देता है। इस ज्योति के कारण लोग अब अकेले नहीं हैं, यह ज्योति तुम्हारे और दूसरों के ऊपर समान रूप से चमकती है, परंतु सिर्फ तुम अंधकारमय रात में गहरी नींद में सोते रहते हो। तुम आवाज को सुन पाने में, रोशनी को निहार पाने में असमर्थ हो, यहां तक कि एक नए आकाश और एक नई पृथ्वी, नये युग के आगमन से भी अनजान हो। क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हें बताता है, "मेरे बेटे, जागना मत, अभी सुबह नहीं हुई है। बाहर सर्दी है, अंदर ही रहो, नहीं तो तलवार और भाले तुम्हारी आंखे छेद डालेंगे।" तुम्हें अपने पिता की बात पर बड़ा विश्वास है क्योंकि तुम्हारा मानना है पिता जो तुमसे बड़ा है एकदम सही है और वो पिता तुमसे सच्चा प्यार भी करता है। ऐसी बातें और ऐसा प्यार उस किंवदन्ती पर विश्वास नहीं करने देता कि इस संसार में ज्योति है, और बिल्कुल परवाह नहीं करने देता कि क्या इस संसार में सच्चाई है। तुम अब आशा नहीं करते कि सर्वशक्तिमान तुम्हें बचा ले। तुम यथास्थिति से संतुष्ट हो, अब रोशनी की किरण के आगमन की आशा ही नहीं रखते, और अब दंतकथाओं में वर्णित सर्वशक्तिमान परमेश्वर के आगमन की प्रतीक्षा नहीं करते। जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हारी नजरों में जो सुंदर दिखता है, अब उसका पुनरुत्थान कभी नहीं होगा, न ही वह अब अस्तित्व में रहेगा। तुम्हारी नज़र में मानवजाति का कल या भविष्य गायब और नष्ट हो जाता है। तुम अपने पिता के वस्त्रों को पूरी शक्ति से पकड़े रहते हो, साथ में कष्ट उठाने को तैयार हो, अपने सहयात्री और अपनी सुदूर यात्रा की "दिशा" को खो देने के भय से पीड़ित हो। विराट और भ्रमित संसार ने तुममें से अनेक को इस दुनिया में तरह-तरह की भूमिका निभाने हेतु निर्भीकता और निडरता से भर दिया है। उसने अनेक "योद्धाओं" को तैयार कर दिया है जो मृत्यु से डरते ही नहीं। इससे भी बढ़कर, उसने असंवेदनशील और लकवा-ग्रस्त मनुष्यों के दल बनाकर रखे हैं जो अपने सृजे जाने के अभिप्राय को बिल्कुल नहीं समझते। सर्वशक्तिमान की नज़रें हर पीड़ित इंसान को देखती हैं। वह दुख सहते लोगों के विलाप को सुनाता है, वह व्यथित लोगों की निर्लज्जता को देखता है, और वह उस मानवजाति की बेबसी एवं भय को महसूस करता है जिसने अपना उद्धार खो दिया है। मनुष्यजाति उसकी देखभाल को नकारती है, अपने ही मार्ग पर चलती है, और उसकी नज़र रखने वाली आंखों से दूर रहती है। वह शत्रु के संग गहरे समुद्र की सारी कड़वाहट का स्वाद आख़िरी बूंद तक चखना अधिक पसंद करती है। अब मानवजाति को सर्वशक्तिमान की आह सुनाई नहीं देगी। सर्वशक्तिमान के हाथ दुख में डूबी मानवजाति को अब स्पर्श करने के लिए तैयार नहीं हैं। वह अपने काम को दोहराता है, बार-बार खोता है, बार-बार पकड़ लेता है। उस क्षण से वह थकने लगता है, ऊब जाता है और तब वह अपने हाथ में लिये काम को रोक देता है, और फिर लोगों के बीच में भ्रमण करना बंद कर देता है...। लोग इन परिवर्तनों के प्रति जागरूक नहीं हैं, सर्वशक्तिमान के आने और जाने, सर्वशक्तिमान के खिन्न मन और निराशा को नहीं जानते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना" से उद्धृत

108. जब रात चुपचाप आती है, मनुष्य अनजान बना रहता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय यह नहीं समझ सकता कि अँधेरा कैसे आता है या कहाँ से आता है। जब रात चुपचाप खिसकती है, मनुष्य दिन के उजाले का स्वागत करता है, लेकिन जहाँ तक प्रकाश कहाँ से आया है और कैसे इसने रात के अँधेरे को दूर भगाया है इसकी बात है, मनुष्य और भी कम जानता है तथा और भी कम अवगत है। दिन और रात की ये बारम्बार अदला-बदली मनुष्य को एक अवधि से दूसरी अवधि में, एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अगली में ले जाती है, जब कि यह भी सुनिश्चित करती है कि हर अवधि में परमेश्वर का कार्य और हर युग के लिए उसकी योजना को कार्यान्वित किया जाता है। मनुष्य परमेश्वर के साथ इन विभिन्न अवधियों में चला है, फिर भी वह नहीं जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों और जीवित प्राणियों की नियति पर शासन करता है या कैसे परमेश्वर सभी चीजों की योजना बनाता है और उन्हें निर्देशित करता है। इसी एक बात ने मनुष्य को अनादि काल से आज तक भ्रम में रखा है। जहाँ तक कारण का सवाल है, ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के तरीके बहुत छिपे हुए हैं, या परमेश्वर की योजना अभी तक पूरी नहीं हुई है, बल्कि इसलिए कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, इस हद तक कि मनुष्य जिस समय परमेश्वर का अनुसरण कर रहा होता है उसी समय शैतान की सेवा में भी बना रहता है—और उसे इसके बारे में पता भी नहीं चलता है। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों को या उस प्रकटन को नहीं खोजता है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे इस दुनिया के और अस्तित्व के उन नियमों के प्रति अनुकूल होने के लिए जिनका दुष्ट मनुष्यजाति अनुसरण करती है, उस दुष्ट, शैतान के क्षय पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य के हृदय और आत्मा को शैतान को श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित किया जाता है और वे शैतान का जीवनाधार बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन गये हैं जिसमें शैतान निवास कर सकता है और शैतान का खेल का अनुकूल मैदान बन गया है। इस तरह, मनुष्य अनजाने में मानव होने के सिद्धांतों और मानव अस्तित्व के मूल्य और अर्थ के बारे में अपनी समझ को खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय में धुँधली होती जाती है, और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ, मनुष्य की समझ चली जाती है कि परमेश्वर ने उसे क्यों बनाया है, न ही वह उन वचनों को जो परमेश्वर के मुख से आते हैं और वह सब जो परमेश्वर से आता है, उसे समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करने लगता है, और उसका हृदय और आत्मा शिथिल हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है जिसे उसने मूल रूप से बनाया था, और मनुष्य अपनी शुरुआत का मूल खो देता है: यही इस मानव जाति का दुःख है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है" से उद्धृत

फुटनोट:

1. मानव जाति की अवज्ञा का पर्दाफाश करने के लिए "विनाश" का प्रयोग किया गया है।

2. "मिली हैं उग्र भौंहें और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा, सिर झुका कर, एक अनुकूल बैल की तरह, लोगों की सेवा करते हुए" मूलतः एक वाक्य था, लेकिन चीजों को साफ करने के लिए इसे यहाँ दो में विभाजित किया गया है। पहला वाक्य मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा, परमेश्वर द्वारा सहन की गई पीड़ा को इंगित करता है, और यह कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है।

3. "पूर्वाग्रह" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को दर्शाता है।

4. "सम्पूर्ण सत्ता हथियाना" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को संदर्भित करता है। वे खुद को ऊंचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बांधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और उनके लिए पीड़ा उठाने को कहते हैं। वे वो ताकतें हैं जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

5. "कठपुतली" का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है जो परमेश्वर को नहीं जानते।

6. "तेजी से बढ़ते" का उपयोग लोगों के नीच व्यवहार को उजागर करने के लिए किया जाता है।

7. "खड़िया और पनीर का भेद नहीं बता सकता" उसे इंगित करता है जब लोग परमेश्वर की इच्छा को किसी शैतानी चीज़ में मरोड़ देते हैं, मोटे तौर पर यहाँ उस व्यवहार का जिक्र है जिसमें लोग परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं।

8. "काले और सफ़ेद रंगों के बारे में भ्रमित" सत्य को माया के साथ, धार्मिकता को बुराई के साथ मिला देने की ओर इशारा करता है।

9. "डाकू" का उपयोग यह संकेत करने के लिए किया गया है कि लोग अबोध हैं और उनमें अंतर्दृष्टि की कमी है।

10. "रद्दी तथा बचे-खुचे" का प्रयोग उस व्यवहार को इंगित करने के लिए किया गया है जिसमें लोगों ने परमेश्वर पर अत्याचार किया।

11. "भड़क जाता है" मनुष्य के बदसूरत चेहरे को दर्शाता है जो क्रूर और हताश है।

12. "बेझिझक" का अर्थ है, जब लोग लापरवाह होते हैं, और परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी श्रद्धा नहीं रखते हैं।

13."मनुष्य का 'प्रवेश'" यहाँ मनुष्य के अवज्ञाकारी व्यवहार को इंगित करता है। जीवन में लोगों के प्रवेश की बात करने के बजाय—जो सकारात्मक है—यह उनके नकारात्मक व्यवहार और कार्यों को दर्शाता है। यह मोटे तौर पर मनुष्य के सभी कर्मों का जिक्र है जो परमेश्वर के विरोध में हैं।

14. "काल्पनिक भय से ग्रस्त" का प्रयोग मनुष्यों के गुमराह जीवन का उपहास करने के लिए किया गया है। यह मानव जाति के जीवन की कुरूप स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें लोग राक्षसों के साथ रहते हैं।

15. "सबसे अच्छा" उपहास उड़ाने के अर्थ से कहा गया है।

16. "जोश अधिकाधिक तीव्रता से दग्ध" उपहास में कहा गया है, और यह मनुष्य की बदसूरत हालत को संदर्भित करता है।

17. "मन में एक सुनिश्चित योजना लेकर" का प्रयोग उपहास में किया गया है, और यह दर्शाता है कि कैसे लोग खुद को ही नहीं जानते और अपने वास्तविक कद से अनजान हैं। यह अपमान करने के अर्थ से है।

18. "आदरणीय" उपहास में कहा गया है।

19. "ज्वालाएँ बरसने" लोगों की उस बदसूरत स्थिति को इंगित करता है, जो क्रोध से जल-भुन जाते हैं जब वे परमेश्वर द्वारा पराजित हो जाते हैं। यह परमेश्वर के प्रति उनके विरोध की हद के बारे में बताता है।

20. "जीवित पकड़ना" मनुष्य के हिंसक और नीच व्यवहार को दर्शाता है। मनुष्य क्रूर है और वह परमेश्वर की ओर थोड़ा-सा भी क्षमाशील नहीं है, और उससे बेतुकी माँगें करता है।

21. "उपद्रव भड़काने" का मतलब है कि कैसे वे लोग जो राक्षसी हैं आतंक फैलाते हैं, परमेश्वर के कार्य को बाधित और प्रतिरोधित करते हुए।

22. "दांतों वाली व्हेल" का उपयोग उपहासपूर्ण ढंग से किया गुया है। यह एक रूपक है कि कैसे मक्खियां इतनी छोटी होती हैं कि सूअर और कुत्ते उन्हें व्हेल की तरह विशाल नज़र आते हैं।

क. मूल पाठ में "के लिए सोने के सिक्के" शब्द लिखे हैं।

ख. एक चीनी कहावत, जिसका शाब्दिक अर्थ है "ऐसे डाकू जो पहाड़ों पर कब्जा कर लेते हैं और स्वयं को राजा घोषित करते हैं।"

ग. मूल पाठ में "यह" लिखा गया है।

घ. यह एक चीनी मुहावरा है।

ङ. मूल पाठ में "की अभिलाषा" वाक्यांश नहीं है।

च. "अपनी कोहनी को बाहर की तरफ़ निकालना" एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति अपने करीबी लोगों, उदाहरण के लिए माता-पिता, बच्चों, रिश्तेदारों या भाई-बहन, की क़ीमत पर दूसरों की मदद कर रहा है।

छ. हानहाओ पक्षी की कहानी इसॉप की चींटी और टिड्डी की कल्पित कहानी के काफ़ी समान है। हानहाओ पक्षी जब मौसम गर्म हो, तब एक घोंसला बना लेने के बदले सोना पसंद करता है—अपने पड़ोसी, एक नीलकंठ पक्षी, की बार-बार चेतावनी के बावजूद। जब सर्दी आती है, तो पक्षी ठिठुर कर मर जाता है।

ज. किनारे पर पहुँचने की इच्छा: एक चीनी कहावत है जिसका मतलब है "किसी की बुरी नज़र से बचना।"

झ. मूल पाठ में "अनैतिक" नहीं है।

ञ. मूल पाठ में "सामान्य" को छोड़ दिया गया है।

अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन

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IX भ्रष्ट मनुष्यों के शैतानी स्वभाव और उनके सार को प्रकट करने पर उत्कृष्ट वचन

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