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XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

(XV) परमेश्वर की सेवा करने और उसके लिए गवाही देने पर वचन

192. जब कार्य के बारे में बात की जाती है, तो मनुष्य का मानना है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करना कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किन्तु यह अत्यधिक एक-तरफा है; परमेश्वर इंसान से जो मांगता है वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर यात्रा करना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और आपूर्ति अधिक है। बहुत से भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पना किया गया कार्य, परमेश्वर के द्वारा मांग किए जाने वाले कार्यों के साथ असंगत है। इसलिए, आदमी को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और यही निश्चित रूप से कारण है कि क्यों मनुष्य का प्रवेश भी एक तरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करके प्रवेश करना शुरू करना चाहिए, ताकि तुम लोग इसके सभी पहलुओं का बेहतर अनुभव कर सको। यही है वह जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य, परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागने को संदर्भित नहीं करता है; यह इस बात को संदर्भित करता है मनुष्य का जीवन और मनुष्य जो जीवन बिताता है वे परमेश्वर के आनंद के लिए हैं या नहीं। कार्य, परमेश्वर के प्रति गवाही देने और मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी विश्वसनीयता और परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और वह है जो सभी लोगों को महसूस करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों का प्रवेश तुम लोगों का कार्य है; तुम लोग परमेश्वर के लिए अपने कार्य के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर का अनुभव करना न केवल उसके वचन को खाने और पीने में सक्षम होना है; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर की सेवा करने, और मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम अवश्य होना चाहिए। यह कार्य है, और तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को निष्पादित करना चाहिए। ऐसे कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर यात्रा करने, और सभी जगहों पर उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (2)" से उद्धृत

193. जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव अवश्य होने चाहिए, उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव अवश्य होना चाहिए। केवल ऐसे मनुष्य ही कलीसिया की अगुवाई करने वाले कार्यकर्ता या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं और अगुवाई नहीं कर सकते हैं, और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रेरित का कार्य दौड़ना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई करना और मानवीय स्वभाव में परिवर्तनों की अगुवाई करना है। यह ऐसा कार्य है जो उनके द्वारा किया जाता है जिन्हें भारी ज़िम्मेदारियों को कंधों पर उठाने के लिए अधिकृत किया जाता है और यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। इस प्रकार का कार्य केवल ऐसे लोगों के द्वारा आरम्भ किया जा सकता है जिनके पास जीवन का अस्तित्व है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास सत्य का अनुभव है। इसे ऐसे हर किसी के द्वारा आरम्भ नहीं किया जा सकता है जो छोड़ सकता है, भाग सकता है या जो खर्च करने की इच्छा रखता है; जिन लोगों के पास सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं क्योंकि वे इस पहलू में अस्तित्व को धारण नहीं करते हैं। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता है, बल्कि वह निष्कासन की एक वस्तु हो जाएगा यदि उसके पास लम्बी अवधि तक कोई सत्य नहीं होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

194. यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य होते हैं। यह सबसे छोटी चीज़ है जिससे तुम लोगों को सज्जित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों को, और उस कार्य को जानना चाहिए जिसे परमेश्वर अभी यहीँ करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोगों को सबसे पहले प्रवेश करना चाहिए और सबसे पहले परमेश्वर के महान आदेश को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर वास्तव में अनुभव कर लोगे, और जब तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य हो जाओगे। जब तुम लोग उसकी सेवा करते हो, तब परमेश्वर तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखों को खोलता है, और तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने एवं उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गम्भीर एवं वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और तुम लोगों के भाई-बहनों को, तुम लोगों की स्वयं की कमियों को पूरा करने के लिए दूसरे की मज़बूतियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में एक अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त करो। केवल इस प्रभाव को प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य बनोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें" से उद्धृत

195. जो परमेश्वर की सेवा करते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति अत्यंत वफादारी के लिए सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोगों के पीठ पीछे कार्यकलाप करते हो या उनके सामने, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और इस बात की परवाह किए बिना कि अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तुम हमेशा अपने स्वयं के मार्ग पर चलते हो, और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल यही परमेश्वर का अंतरंग होना है। यह कि परमेश्वर के अंतरंग ही सीधे तौर पर उसकी सेवा करने में समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपने स्वयं के हृदय के रूप में मानने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी मानने में समर्थ हैं, और वे इस बात पर कोई विचार नहीं करते हैं कि उन्हें संभावना प्राप्त होगी या खो जाएगी: यहाँ तक कि जब उनके पास संभावना नहीं होती है, और वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे, तब भी वे एक प्रेममय हृदय के साथ हमेशा परमेश्वर में विश्वास करेंगे। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी, और उसकी चाहतों को साझा कर सकते हैं। यद्यपि उनकी देह दुःखदायी और कमज़ोर हैं, फिर भी वे परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए दर्द को सहन कर सकते हैं एवं उसे छोड़ सकते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और भी अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो परमेश्वर करेगा, वह इन लोगों के माध्यम से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, वे परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ-साथ शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ-साथ शासन करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें" से उद्धृत

196. यीशु परमेश्वर के आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य—को पूरा करने में समर्थ था क्योंकि उसने अपनी व्यक्तिगत योजनाओं एवं विचारों के बिना परमेश्वर की इच्छा की पूरी परवाह की। इसलिए भी, वह परमेश्वर—परमेश्वर स्वयं का अंतरंग था, कुछ ऐसा जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह परमेश्वर स्वयं था, जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी; इस विषय की व्याख्या करने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए मैंने इसका यहाँ उल्लेख किया है।) वह परमेश्वर की प्रबन्धन योजना को बिलकुल केन्द्र में स्थापित करने में समर्थ था, और स्वर्गिक पिता से हमेशा प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा की तलाश करता था। उसने प्रार्थना की और कहाः "परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो उसे पूरी कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार कार्य मत कर; तू जैसा चाहे वैसे अपनी योजना के अनुसार काम कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किन्तु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य तेरी चिंता का विषय कैसे हो सकता है, मनुष्य जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझ में करना चाहता है।" यरूशलेम जाने के मार्ग पर, यीशु ने संताप में महसूस किया, मानो कि कोई एक नश्तर उसके हृदय में भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं थी; हमेशा से एक सामर्थ्यवान ताक़त थी जो उसे लगातार उस ओर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाएगा। अंततः, उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा करते हुए, तथा मृत्यु एवं अधोलोक के बन्धनों से ऊपर उठते हुए, पापमय देह के सदृश बन गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपनी सामर्थ्य खो दी, और उसके द्वारा परास्त हो गए थे। वह तैंतीस वर्षों तक जीवित रहा, पूरे समयकाल में उसने उस वक्त परमेश्वर के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में कभी विचार नहीं करते हुए, और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहाः "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए योग्य एवं पात्र बन गया। अपने पूरे जीवनकाल में, उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान के द्वारा अनगिनित बार प्रलोभित किया गया, किन्तु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे ऐसा कार्य इसलिए दिया था क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहाः "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह की इच्छाओं से मुँह मोड़ सकते हो, तो परमेश्वर अपना महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तों को पूरा कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोगों में यह कहने की हिम्मत होगी कि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हो एवं उसके आदेश को पूरा कर रहे हो, केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत करोगे कि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सेवा कर रहे हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें" से उद्धृत

197. जब पवित्र आत्मा लोगों पर काम करता है तो वे लोग जिन परिस्थितियों में होंगे, उनकी तुम्हें समझ होनी चाहिए। विशेष कर, जो लोग ईश्वर की सेवा करने के लिए समन्वय करते हैं, उन्हें उन विभिन्न परिस्थितियों की और भी बेहतर समझ होनी चाहिए जो पवित्र आत्मा के लोगों पर कार्य करने से पैदा होती हैं। यदि तुम अनेक अनुभवों और प्रवेश करने के कई तरीकों के बारे में केवल बात करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बेहद एक तरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने या सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना, स्वभाव में परिवर्तन ला पाना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उससे उत्पन्न फल को समझे बिना, बुरी आत्माओं के कामों को समझना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्यों और लोगों के की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्रबिंदु पर आना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले भटकाव या परमेश्वर पर विश्वास करने में होने वाली समस्याओं पर भी ध्यान ले जाना चाहिए ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालांकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए जो कि अधिकांश लोगों के लिए निष्पक्ष रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों की कई कठिनाइयों को हल करने के लिए, तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए, तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों की कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए और समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को हल करते हुए, किसी भटकाव या त्रुटियों के बिना, समस्या के स्रोत पर पहुंचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर की सेवा करने के लिए समन्वय करने योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक योग्य चरवाहे को किन साजो-सामान से युक्त होना चाहिए" से उद्धृत

198. अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए: एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, इन सिद्धान्तों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को ऐसी किसी भी चीज़ पर जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं या अपनी स्वयं की मंशाओं पर आधारित नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए चिंता दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात जो मुख्य है, और वह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और परमेश्वर के वचन का कड़ाई से पालन करते हुए हर चीज़ को करें। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जाने में सक्षम हो, या यदि तुम जिद्दी बनकर अपने स्वयं के मतों का पालन करते हो और अपनी स्वयं की कल्पना के अनुसार कार्य करते हैं, तो तुम्हारे कृत्य परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध का निर्माण करते हैं। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा की अगुवाई से लगातार पीछे लौटना केवल अंधी गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यहाँ तक कि यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कार्यान्वित कुछ नहीं करोगे। कार्य करते समय पालन करने के लिए ये दो सिद्धान्त हैं: एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार ही सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धान्तों के अनुसार कार्य को करना है। और दूसरा बिन्दु है भीतर बसे पवित्र आत्मा के द्वारा दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना है। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लिया जाता है, तो तुम आसानी से ग़लतियाँ नहीं करोगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अगुआओं और कार्यकर्ताओं के काम करने के मुख्य सिद्धान्त" से उद्धृत

199. एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने दे सकता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है वह, लोगों को मुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करते हुए, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे उत्तरोत्तर सत्य में अधिक गहरे जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य कम पड़ता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों में ला सकता है; वह लोगों से जो माँग करता है वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न नहीं होती है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत से नियम और बहुत से सिद्धान्त होते हैं, और यह लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकता है। यह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों को निभाने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हारी अगुवाई करता है ताकि तुम उसके समान बन जाओ; वह तुम्हें उसी में ला सकता है जो उसके पास है और जो वह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

200. मनुष्य की परमेश्वर की सेवा में सबसे बड़ी वर्जना क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? जो अगुवाओं के रूप में सेवा करते हैं वे हमेशा अधिक चतुरता प्राप्त करना चाहते हैं, बाकी सब से श्रेष्ठ बनना चाहते हैं, नई तरकीबें पाना चाहते हैं ताकि परमेश्वर देख सके कि वे वास्तव में कितने सक्षम हैं। हालाँकि, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। वे हमेशा दिखावा करना चाहते हैं; क्या यह निश्चित रूप से एक अहंकारी प्रकृति का प्रकटन नहीं है? कुछ तो यह भी कहते हैं: "ऐसा करके मुझे विश्वास है कि परमेश्वर बहुत प्रसन्न होगा; वह वास्तव में इसे पसंद करेगा। इस बार मैं परमेश्वर को देखने दूँगा, उसे एक अच्छा आश्चर्य दूँगा।" इस आश्चर्य के परिणामस्वरूप, वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं और परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं। जो कुछ भी तुम्हारे मन में आता है उसे उतावलेपन में न करें। यदि तुम कृत्यों के परिणामों पर विचार नहीं करते हो तो यह ठीक कैसे हो सकता है? जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो और उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करते हो, और तब हटा दिए जाते हो, तो तुम्हारे पास कहने के लिये कुछ नहीं बचा होगा। तुम्हारे अभिप्राय पर ध्यान दिए बिना, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम जानबूझकर ऐसा करते हो या नहीं, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते हो या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो, तो तुम आसानी से परमेश्वर को अपमानित करोगे और आसानी से उनके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे: इस चीज़ को लेकर प्रत्येक को सतर्क रहना चाहिए। एक बार जब तुम ईश्वर के प्रशासनिक आदेशों का गंभीरता से अपमान करते हो या परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो, तो परमेश्वर यह विचार नहीं करेगा कि तुमने इसे जानबूझकर किया या अनजाने में; इस चीज़ को तुम्हें स्पष्ट रूप से अवश्य देखना चाहिए। यदि तुम इस मुद्दे को समझ नहीं कर सकते हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से समस्या होनी ही है। परमेश्वर की सेवा करने में, लोग महान प्रगति करना, महान कार्यों को करना, महान वचनों को बोलना, महान कार्य निष्पादित करना, बड़ी-बड़ी पुस्तकें मुद्रित करना, महान बैठकें आयोजित करना और महान आगुवा बनना चाहते हैं। यदि तुम हमेशा उच्च महत्वाकांक्षाएँ रखते हो, तो तुम परमेश्वर के महान प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे; इस तरह के लोग शीघ्र ही मर जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर की सेवा में ईमानदार, खरे, धर्मनिष्ठ या विवेकशील नहीं हो, तो तुम कभी न कभी परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य के बिना परमेश्वर को अपमानित करना आसान है" से उद्धृत

201. परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर की तुम्हारी सेवा, तुम्हारी स्वयं की भलाई के अभिप्राय से है। यह सेवा तुम्हारे शैतानी स्वभाव पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने प्राकृतिक स्वभाव से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो; इसके अलावा, तुम सोचते रहते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, उसे परमेश्वर पसंद करता है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो उससे परमेश्वर घृणा करता है, और अपने कार्य में तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं द्वारा मार्गदर्शित होते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी सुधार नहीं आएगा; तुम और भी अधिक ज़िद्दी बन जाओगे क्योंकि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक समा जाएगा। इस तरह, तुम मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे सिद्धान्त विकसित कर लोगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर आधारित होते हैं, और तुम्हारे सेवा करने से तुम्हारे स्वयं के स्वभाव के अनुसार अनुभव प्राप्त होता है। यह मानवीय अनुभव का सबक है। यह मनुष्य के जीवन का दर्शन है। इस तरह के लोग फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों से संबंधित होते हैं। यदि वे कभी भी जागते और पश्चताप नहीं करते हैं, तो अतंतः वे झूठे मसीह बन जाएँगे जो अंत के दिनों में दिखाई देंगे, और मनुष्यों को धोखा देने वाले होंगे। झूठे मसीह और धोखेबाज़, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से ही उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं यदि वे अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय बहिष्कृत कर दिए जाने के ख़तरे में हैं। जो दूसरों के दिलों को जीतने, उन्हें व्याख्यान देने, नियंत्रित करने और ऊंचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, पद के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—वे लोग परमेश्वर के सामने मिटा दिए जाएँगे। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते हुए और अपनी योग्यताओं पर इतराते हुए, पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्णता पर नहीं लाएगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती है। लोग पुरानी बातों को पकड़े रहना पसंद करते हैं। वे अतीत की अवधारणाओं और अतीत की चीजों से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे पूरे जीवन का दम घोंट देंगी। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा, थोड़ी सी भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की "सेवा" में मिट जाओ। इसके बिल्कुल विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए" से उद्धृत

202. सबसे बढ़कर, गवाही देने के लिए यह जरूरी है कि तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बात करो कि कैसे परमेश्वर ने लोगों पर विजय प्राप्त की, कैसे वह लोगों को बचाता है, कैसे वह लोगों को बदलता है, और कैसे वह प्रवेश करने में लोगों का मार्गदर्शन करता है, ताकि वे जीते जा सकें, परिपूर्ण हो सकें एवं बचाए जा सकें। गवाही देने का मतलब है उसके कार्य की, और जो कुछ तुमने अनुभव किया है उसकी, बात करना। केवल उसका कार्य उसका प्रतिनिधित्व करता है, और केवल उसका कार्य सार्वजनिक तौर पर उसकी संपूर्णता को प्रकट कर सकता है; उसका कार्य ही उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह जो कार्य करता है वह आत्मा द्वारा किया जाता है, और जिन वचनों को वह कहता है, वे आत्मा द्वारा कहे जाते हैं। ये बातें केवल देहधारी परमेश्वर के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं; वास्तव में, वे आत्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। वह जो कार्य करता है और जो वचन बोलता है वह उसके सार-तत्व का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, मनुष्यों के बीच देह-रुपी वस्त्र धारण करने के बाद, परमेश्वर ने बात नहीं की होती या काम नहीं किया होता, और फिर तुम्हें उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमानता जानने के लिए कहा होता, तो क्या तुम सक्षम होते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम यह जान पाने के लिए सक्षम होते कि उसका गुण क्या है? यह केवल इसलिए है कि तुम लोगों ने उसके कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव किया है, कि वह तुमसे उसकी गवाही देने के लिए कहता है, और यदि तुमने इसका अनुभव नहीं किया होता, तो वह तुमसे इस तरह की माँग नहीं करता। इस प्रकार, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो वह सामान्य मानवता के उसके बाह्य स्वरुप को नहीं, बल्कि वह जो कार्य करता है, और जिस मार्ग पर वह अगुआई करता है, उन्हें प्रमाणित करता है, वह यह साबित करता है कि तुम उसके द्वारा कैसे जीते गए हो, और किन पहलुओं में तुम्हें सिद्ध बनाया गया है। तुम्हें इस तरह की गवाही देनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से उद्धृत

203. जब व्यावहारिक परमेश्वर लोगों पर विजय प्राप्त करता है, तो ये उसके दिव्य वचन ही होते हैं जो लोगों को जीत लेते हैं। मानवजाति यह नहीं कर सकती है, यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे कोई नश्वर प्राणी प्राप्त कर सकता हो, और यहाँ तक कि सामान्य लोगों के बीच में जो उच्चतम क्षमता लिए हुए हैं, वे भी इसे करने में असमर्थ हैं, क्योंकि उसका देवत्व किसी भी सृष्ट जीव से अधिक है। लोगों के लिए, यह असाधारण है; सृष्टिकर्ता, आखिर तो, किसी भी सृष्ट जीव से अधिक ही है। यह कहा गया है कि छात्र अपने शिक्षकों से अधिक नहीं हो सकते। निर्मित प्राणी निर्माता से अधिक नहीं हो सकते; यदि तुम उससे ऊपर होते, तो वह तुम्हें जीत नहीं पाता—वह तुम्हें जीत सकता है क्योंकि वह तुमसे ऊपर है। वह जो सभी मानव जाति को जीत सकता है, सृष्टिकर्ता ही है, लेकिन उसके अलावा कोई और यह काम नहीं कर सकता। यह गवाही है; यह उस तरह की गवाही है जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने ताड़ना, निर्णय, शुद्धिकरण, परीक्षण, झटके, और यातनाओं के प्रत्येक चरण का अनुभव किया है, और तुमने विजय हासिल की है, और तुमने शरीर की संभावनाओं को, अपनी निजी प्रेरणाओं और देह के व्यक्तिगत हितों को अलग कर दिया है—दूसरे शब्दों में कहें तो, सभी लोगों के दिल परमेश्वर के वचनों से जीते गए हैं। यद्यपि तुम्हारा जीवन उस हद तक विकसित नहीं हुआ है, जितना उसने चाहा था, तुम इन बातों को जानते हो, और वह जो भी करता है, तुम उससे पूरी तरह से आश्वस्त हो—तो यह गवाही है, और यह गवाही वास्तविक है! परमेश्वर जो कार्य करने आया है—न्याय और ताड़ना का—वह मनुष्य पर विजय प्राप्त करने के लिए है, परन्तु वह अपने काम का समापन भी करता है, युग को समाप्त करता है, अपने कार्य का अंतिम अध्याय पूरा करता है। वह पूरे युग को समाप्त करता है, पूरी मानव जाति को बचाता है, पूर्ण रूप से मानव जाति को पाप से छुड़ाता है, और पूरी तरह से मानव जाति को, जिसे उसने बनाया था, प्राप्त कर लेता है। यह सब है जिसकी तुम्हें गवाही देना चाहिए। तुमने परमेश्वर के बहुत से कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, इसलिए यह बात कितनी दयनीय होगी अगर तुम अंततः उस काम को नहीं कर सकते जो तुम्हें निश्चय ही करना चाहिए था। भविष्य में, जब सुसमाचार फैलाया जाता है, तो तुम्हें अपने खुद के ज्ञान की बात करने में सक्षम होना होगा, अपने दिल में अर्जित सभी चीजों का प्रमाण देना होगा, और कोई प्रयास नहीं छोड़ना होगा। यह है जो एक सृष्ट जीव के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण का क्या महत्व है? इसका असर क्या है? और इसका कितना भाग मनुष्य में किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के पृथ्वी पर आने के बाद उससे किए गए सभी कार्यों के बारे में स्पष्ट रूप से बोल सकते हो, तो तुम्हारी गवाही पूर्ण होगी। जब तुम इन पाँच चीज़ों के बारे में स्पष्ट रूप से बोल सकते हो—महत्व, सामग्री, उसके काम का सार, उसका स्वभाव जिसका यह सार प्रतिनिधित्व करता है, और उसके कार्य के सिद्धांत—तब यह साबित होगा कि तुम गवाही देने में सक्षम हो, और तुम वास्तव में उस ज्ञान से संपन्न हो। जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ वह बहुत ज्यादा नहीं है, और उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो वास्तव में अनुसरण करते हैं। यदि तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने का संकल्प कर चुके हो, तो तुमको यह समझना चाहिए कि परमेश्वर को किस बात से घृणा और किस से प्रेम है। तुमने उसके कार्य में से काफी का अनुभव किया है, और इस कार्य के माध्यम से, तुम्हें उसके स्वभाव का, और जिन बातों से उसे घृणा या प्रेम है उसका, पता चलना चाहिए, और उसकी इच्छा और मानव जाति से उसकी अपेक्षाओं को तुम्हें समझना चाहिए, और इसका उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से उद्धृत

204. जब आप परमेश्वर के लिए गवाही देते हैं, तो आपको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करते हैं और लोगों को कैसे दंड देते हैं, मनुष्यों का शुद्धिकरण करने और मनुष्यों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करते हैं। आपको इस बारे में भी बात करना चाहिए कि आपने कितना सहन किया है, आप लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे आपको जीता था; परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान आपके पास है और आपको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य परमेश्वर को कैसे चुकाना चाहिए। तुम्हें इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्कहीन माना जाएगा। जिन वास्तविक, यथार्थ बातों का तुम दिल से और असल में अनुभव करते हो उनके बारे में ज़्यादा बात करो; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा। तुम लोग परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी थे और उनके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम जीत लिए गए हो, इसे कभी नहीं भूलो।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है" से उद्धृत

205. परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देने हेतु तुम्हें यह व्यक्त करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए कि उसके कार्य क्या हैं, और ऐसा तुम्हारे अनुभव, ज्ञान और तुम्हारे द्वारा सहे गए कष्टों के माध्यम से किया जाता है। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? यदि तुम उसके नाम, और इससे भी अधिक, उसके कार्यों की गवाही देने में समर्थ हो, और साथ ही उस छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपने लोगों से अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाह हो। तुम वास्तव में, परमेश्वर के लिए प्रकार गवाही कैसे देते हो? परमेश्वर को जीने के लिए खोजना और लालसा करना, अपने शब्दों के माध्यम से गवाही देना, लोगों को परमेश्वर के कार्यों को जानने और देखने देना—यदि तुम वास्तव में यह सब कुछ खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। यदि तुम जो चाहते हो वह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना और बिल्कुल अंत में धन्य किए जाना है, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें खोज करनी चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, उसे कैसे संतुष्ट करें जब वह अपनी इच्छा को तुम्हारे सामने प्रकट होता है; तलाश करनी चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की कैसे गवाही दें, और तुम पर उनके अनुशासन और व्यवहार को कैसे प्रदर्शित करें। अब तुम्हें इन सभी बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार एकमात्र इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद उसकी महिमा को साझा कर सको, तब भी यह अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता है। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने में समर्थ होने, उनकी माँगों को संतुष्ट करने और एक व्यावहारिक तरीके से उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे यह पीड़ा, आँसू या दुःख हो, तुम्हें अभ्यास में इस सभी का अनुभव अवश्य करना चाहिए। यही सब कुछ है ताकि तुम परमेश्वर के गवाह बन सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से उद्धृत

206. यदि तू ऐसा व्यक्ति है जो सिद्ध किए जाने का अनुसरण करता है, तो तुझे गवाही दी होगी, और तू कहेगा: "परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और यद्यपि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मेरे पास परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धर्मी स्वभाव मुझमें आ गया है, और मेरे लिए आशीषें और अनुग्रह लाया है; यह उसका न्याय और उसकी ताड़ना है जिसने मुझे शुद्ध किया है और मेरी सुरक्षा की है। यदि परमेश्वर के द्वारा मेरी ताड़ना और मेरा न्याय नहीं किया जाता, और यदि परमेश्वर के कठोर वचन मेरे ऊपर नहीं आते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान सकता था, न ही मुझे बचाया जा सकता था। एक जीवधारी के रूप में, आज मैं यह देखता हूँ, एक व्यक्ति न केवल परमेश्वर के द्वारा बनाए गए सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है, परन्तु, अति महत्वपूर्ण रूप से, सभी जीवधारियों को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनन्द उठाना चाहिए, और उसके धर्मी न्याय का आनन्द उठाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनन्द के योग्य है। एक ऐसे जीव के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिया गया है, एक व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धर्मी स्वभाव में उसकी ताड़ना और उसका न्याय है, और, इसके अतिरिक्त, उसमें बड़ा प्रेम है। यद्यपि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और इसमें मैं आशीषित हुआ हूँ।" यह वह पथ है जिस पर वे चलते हैं जो सिद्ध किए जाने का और जिस ज्ञान के बारे में वे बोलते हैं, उसका अनुभव करते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके पास पतरस के समान ही अनुभव होते हैं। वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने जीवन प्राप्त किया है, और जिनके पास सत्य है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक अनुभव करता है, तो परमेश्वर के न्याय के दौरान वह अनिवार्य रूप से पूरी तरह शैतान के प्रभाव से अपने आपको को छुड़ा लेगा, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

207. जैसे ही परमेश्वर लोगों के भीतर का जीवन बन जाता है, तो वे परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ बन जाते हैं। क्या यह परमेश्वर का कार्य नहीं है? इससे बड़ी कोई गवाही नहीं है! परमेश्वर ने एक निश्चित बिन्दु तक कार्य किया है; उसने लोगों को सेवा के लिये कहा है, और ताड़ना ग्रहण करने या मर जाने के लिये कहा है और लोग उससे दूर नहीं गए हैं, जो यह दिखाता है कि ये लोग परमेश्वर के द्वारा जीत लिए गए हैं। जिनमें सत्य है वे ऐसे लोग हैं जिनके पास असली अनुभव है और वे अपनी गवाही में, परमेश्वर के लिये दृढ़ता से खड़े रह सकते हैं, बिना कभी पीछे हटे और जो परमेश्वर के साथ प्रेम रखते हैं और लोगों के साथ भी सामान्य सम्बन्ध रखते हैं, जब उनके साथ कुछ घटनाएं घटती हैं, तो वे पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं और मृत्यु तक उसका आज्ञापालन करने में सक्षम होते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा व्यवहार और प्रकाशन परमेश्वर के लिए गवाही है, वे मनुष्य के द्वारा जिए जाते हैं और परमेश्वर के लिए गवाही ठहरते हैं, और वास्वत में यही परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेना है; जब इस बिन्दु तक तुम्हारा अनुभव होता है, तो उसमें एक प्रभाव की उपलब्धि हो चुकी होती है। तुम असली जीवन जी रहे होते हैं, और तुम्हारे प्रत्येक कार्य को अन्य लोग प्रशंसा से देखते हैं, तुम्हारा बाह्य रूप साधारण होता है परन्तु तुम अत्यंत धार्मिकता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन दूसरों तक पहुंचाते हो तो तुम्हें परमेश्वर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्रदान करता है। तुम अपने शब्दों के द्वारा परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त करते हो और वास्तविकता को सम्प्रेषित करते हो, और आत्मा की सेवा को अच्छी तरह समझते हो। तुम खुलकर बोलते हो, तुम सभ्य और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं और शालीन हो, परमेश्वर को मानते हो और जब तुम पर चीज़ें आ पड‌ती हैं तो तुम अपनी गवाही में दृढ़ रहते हो, चाहे कुछ भी हो जाए तुम जिसके साथ भी व्यवहार कर रहे होते हो शांत और शांतचित्त बने रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने परमेश्वर के प्रेम को देखा है। कुछ लोग अभी भी युवा हैं, परन्तु वे मध्यम आयु के लोगों के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व होते हैं, सत्य को धारण किए रहते हैं और दूसरों के द्वारा प्रशंसा प्राप्त करते हैं—और यह वे लोग हैं जो गवाही देते हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से उद्धृत

208. आज तुम्हें मालूम होना चाहिये कि तुम पर विजय कैसे हो, और लोग खुद पर विजय उपरांत अपना आचरण कैसा रखते हैं। तुम यह कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गयी है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रहोगे? संभावनाओं की परवाह किए बगैर तुम में पूरे अंत तक अनुसरण करने की क्षमता होनी चाहिए और तुम्हें किसी भी परिस्थितिवश परमेश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पक्ष प्राप्त करने हैं: अय्यूब की गवाही—मृत्यु तक आज्ञाकारिता और पतरस की गवाही—परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए, उसके पास कोई भी सांसारिक संसाधन नहीं था और शारीरिक पीड़ा से वह घिरा हुआ था, तब भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस ने मृत्यु तक परमेश्वर से प्रेम रखा। जब वह मरा—जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया—तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपने हित या महिमामयी आशा को या अनावश्यक विचारों को स्थान नहीं दिया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्था को पूर्णतः मानने की ही इच्छा की। तुमने गवाही दी है यह माने जाने से पूर्व, ऐसा व्यक्ति बनने से पहले, जिसे विजय प्राप्त करने के बाद पूर्ण बनाया गया है, तुम्हें ऐसा स्तर हासिल करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से उद्धृत

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