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परमेश्वर के वचनों ने मेरे गलत ख्याल और दृष्टिकोण बदल दिए

पैईहे, शियान्निंग शहर, हुबेई प्रांत

मैं सदैव विश्वास करती थी कि मैंने और मेरे पति ने हमारा जीवन “कठोर मेहनत-मज़दूरी करके” व्यतीत किया क्योंकि हमने युवावस्‍था में पर्याप्‍त शिक्षा प्राप्‍त नहीं की थी, और क्योंकि हमें कोई ज्ञान नहीं था। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि चाहे मुझे कितनी ही कठिन और कितनी ही अधिक परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े, मैं अपने पुत्रों और पुत्रियों को विद्यालय भेजूँगी ताकि वे कुछ उपलब्‍धि प्राप्त कर सकें, और उन्‍हें हमारे पदचिह्नों पर न चलना पड़े। हममें इस मार्गदर्शन के साथ, मैं और मेरा पति हमारी सबसे बड़ी पुत्री को तकनीकी विद्यालय में भेजने और सबसे बड़े पुत्र को विश्वविद्यालय में भेजने के लिए साधारण भोजन करते थे और साधारण वस्त्र पहनते थे और एक-एक पैसा बचाते थे। किंतु हमारे दो बच्चे और थे, इसलिए उन्हें विश्वविद्यालय भेजने के लिए, मेरे पति को काम करने के लिए एक बार में वर्षों तक घर से दूर रहना पड़ता था, और मैं भी खाली नहीं बैठती थी; मैं सुबह से शाम तक खेतों की और घर पर सुअरों की देखभाल करती। जब कभी खेत का कार्य बहुत थकाने वाला हो जाता था, तो मैं बस चाहती थी की मैं रुक जाऊँ। किंतु यह विचार करने पर जो पीड़ा और थकान मैंने भुगती थी वह औचित्‍यपूर्ण लगती थी, कि वर्तमान में समाज कितना प्रतिस्पर्धी है, कैसे यदि मैंने अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेजा, तो उनका भविष्य भी केवल मेरी ही तरह मिट्टी में कार्य करने का होगा, कैसे उन्हें कभी भी कुछ प्राप्त नहीं होगा और वे तुच्छ समझे जाएँगे और यह कि केवल विश्वविद्यालय में परीक्षा दे कर ही वे एक अच्‍छी नौकरी पा सकते थे या एक अधिकारी बन सकते थे, कुछ उपलब्धि पा सकते थे, अपने स्वयं के लिये एक भविष्‍य, और हमारे लिये गौरव प्राप्‍त कर सकते थे। और इसलिए, हर दिन जब मैं जागती थी, तब मैं स्वयं को अपने कार्य में इतना व्यस्त रखती थी कि प्रायः मेरे पास परमेश्‍वर के वचनों को खाने और पीने के लिए अथवा एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के लिए समय नहीं होता था, और कलीसिया में सामान्य जीवन के लिए अथवा अपने कर्तव्य को करने के लिए तो बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था, किंतु मैं इसके बारे में कुछ नहीं सोचती थी, और अपने बच्चों के लिए कमर-तोड़ मेहनत करती रहती थी … जब तक कि हाल ही में, मैंने परमेश्‍वर की संगति के इन शब्दों को नहीं सुना था: “जहाँ तक बच्चों की बात है, सभी माता-पिता आशा करते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करें और वे एक दिन आगे बढ़ें, समाज में उनका एक स्थान हो और साथ ही उनके पास एक स्थिर आय और प्रभाव दोनों हो—जिससे वे परिवार का सम्मान कर सकें। हर किसी का यही दृष्टिकोण है। क्या यह आशा करना सही दृष्टिकोण है कि ‘बेटा एक अजगर बन जाए, बेटी एक अमरपक्षी बन जाए’? हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे किसी प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में जाएँ और फिर उन्नत अध्ययनों को लें, यह सोचता है कि उपाधि अर्जित करने के बादवे भीड़ में अलग से दिखाई दें। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने हृदयों में, हर कोई ज्ञान की आराधना करता है, यह विश्वास करता है कि ‘अन्य उद्यमों का मूल्य कम होता है, पुस्तकों का अध्ययन उन सभी से श्रेष्ठतर है।’ इसमें सबसे ऊपर, आधुनिक समाज में प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से प्रचंड है, और बिना किसी उपाधि के तुम्हारे लिए इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि तुम अपने परिवार के रहने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने में भी समर्थ हो जाओ। इस बारे में हर कोई इसी तरह से सोचता है। … लेकिन क्या तुमने इस बारे में विचार किया है कि उनके इस प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने के बाद शैतान के कितने अभिप्राय और सिद्धान्त उनके मन में बैठ जाएँगे? … जब तक कि एक दिन, तुम्हारे बच्चे वापस आते हैं और तुम उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में नहीं बताते हो, और वे अनिच्छा नहीं दिखाते हैं। तुम्हारे उन्हें सत्य के बारे में बताने के बाद, वे कहते हैं कि तुम मूर्ख हो और तुम पर हँसते हैं, और तुम जो कुछ भी कहते हो उसका उपहास करते हैं। उस समय तुम सोचोगे कि अपने बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन विद्यालयों में भेजना ग़लत मार्ग चुनना था, लेकिन अफ़सोस करने के लिए बहुत देर हो जाएगी। … जब उनके बच्चों की बात आती है, तो उन दृष्टिकोणों और अभिप्रायों को पूर्णतः ग्रहण करने के लिए जिनकी परमेश्वर अपेक्षा करता है, या ऐसा व्यक्ति होने के लिए जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है, कोई भी उन्हें परमेश्वर के सामने लाने को तैयार नहीं है। लोग ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं और ऐसा करने का साहस नहीं करते हैं। वे भयभीत हैं कि यदि वे ऐसा करते हैं, तो उनके बच्चे गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में समर्थ नहीं होंगे या समाज में उनका कोई भविष्य नहीं होगा। यह दृष्टिकोण किस चीज़ की पुष्टि करता है? यह इस बात की पुष्टि करता है कि सच्चाई में और परमेश्वर में मनुष्यजाति की कोई रुचि, उसका कोई विश्वास और इसके अलावा उसकी कोई वास्तविक आस्था नहीं है। मनुष्यजाति जिस चीज़ को खोजती है और अपने हृदय में जिसकी आराधना करती है वह अभी भी यह दुनिया ही है, सोचती है कि जो लोग इस दुनिया को छोड़ते हैं वे जीवित बचने में समर्थ नहीं रहेंगे। …ये मानवीय विचार और दृष्टिकोण परमेश्वर के विरोध में हैं, परमेश्वर के प्रति एक विश्वासघात और अस्वीकृति हैं, और ये सत्य के साथ असंगत हैं” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “अपने पथभ्रष्‍ट दृष्टिकोणों को जानकर ही आप स्‍वयं को जान सकते हैं”)। परमेश्‍वर के प्रत्येक वचन ने मुझे गहराई तक प्रेरित किया। सब कुछ छोड़ कर इतने वर्षों की पीड़ादायक बचत और कठिन, श्रमसाध्य कार्य ताकि मेरे बच्चे विश्वविद्यालय जा सकें, और क्‍यों? क्योंकि मैं विश्वास करती थी कि शैतान की यह बात कि “अन्य खोजों का मूल्य कम है, पुस्तकों का अध्ययन सबसे श्रेष्ठ है” जीवित बचे रहने का एक नियम है! शैतान के विष के प्रभाव के अधीन, मैं ज्ञान को अन्य सभी से ऊपर रखती थी और सोचती थी कि केवल ज्ञान से ही कोई व्यक्ति अलग से दिखाई दे सकता है, चीज़ों को सम्पन्न कर सकता है, भविष्य बना सकता है, और समाज में हैसियत प्राप्त कर सकता है। मैं सोचती थी कि बिना शिक्षा वाले लोग निम्‍न वर्ग के और तिरस्‍कार के योग्य होते हैं, निम्न से भी निम्नतम होते हैं। इसलिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि मेरे बच्चे संसार में सफल हो सकें और “मेहनत मज़दूरी का जीवन” जीने से बच सकें, उन्हें अध्ययन करने और उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए मैंने अपनी क्षमता में सब कुछ किया। कई वर्षों तक, मैंने अपने इस लक्ष्य को अपने ह्दय में और किसी भी चीज़ से पहले रखा, और इस बीच परमेश्‍वर के वचनों, अपने कर्तव्यों और अपने स्वयं के उद्धार को अपने मन में पीछे दफ़न कर दिया। शैतान के विष ने मुझे बहुत गहराई तक आहत किया था! यद्यपि मैंने वर्षों तक परमेश्‍वर का अनुकरण किया है, किन्तु मुझे सत्य की प्राप्ति नहीं हुई, और मेरा दृष्टिकोण बिल्कुल भी नहीं बदला है। जिसकी मैं आराधना करती हूँ वह अभी भी ज्ञान ही है, जिसके लिए मैं तरसती हूँ और जिस पर भरोसा करती हूँ वह शैतान है। मैं अभी भी एक अविश्वासी हूँ जो सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भागती है और परमेश्‍वर का विरोध करती है।

बाद में, नित्य परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से मैं समझ गयी कि कुछ ज्ञान हमें व्यवहारिक समझ, अंतर्दृष्टि, और जीवन के सिद्धांत जैसी कुछ चीज़ों को पाने दे सकता है, और इस तरह का ज्ञान हमारे लिए लाभकारी हो सकता है। लेकिन ज़्यादातर ज्ञान शैतान के सिद्धांतों से आता है, और मिथ्या एवं विधर्म है जिसे शैतान लोगों को धोखा देना और भ्रष्ट करने के लिए प्रयोग करता है। शैतान अध्ययन और शिक्षा का उपयोग छल से उन्हें उसकी शिक्षा ग्रहण करने और उनके मन में उसके विष और विचारों को स्वीकार करने के लिए करता है, और एक बार विष पहुँचा देने पर, ऐसे लोग पूरी तरह से नास्तिक विचारों और भ्रम के कब्ज़े में आ जाते हैं जो परमेश्‍वर को नकारते और उसका विरोध करते हैं, जिससे कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने और उन्हें निगलने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। “कभी कोई उद्धारकर्ता नहीं हुआ है,” “मनुष्यों की उत्पत्ति बंदरों से हुई है,” “सारे मौसम प्रकृति द्वारा बनते हैं,” “हर कोई अपने लिए, बाकियों को शैतान ले जाये,” ऐसे सभी वाक्यांश भौतिकतावाद और उत्पत्ति के सिद्धांतों से संबंधित ख्याल और दृष्टिकोण हैं। इन्हें हमारे दिल के गहनतम हिस्से में डाल दिया गया है, ये हमें परमेश्वर का विरोध करने और उसके अस्तित्व को अस्वीकार करने पर मजबूर करते हैं। क्योंकि मैं शैतान के छल की असलियत को समझ नहीं सकी थी इसलिए मैंने इन बातों पर विचार किए बिना कि कैसे उन्हें परमेश्‍वर के सामने लाएँ, उनसे उस सत्य को स्वीकार करवाएँ जो परमेश्‍वर से प्राप्त होता है और वे परमेश्‍वर की आवश्यकताओं के अनुसार जीवन बिताएँ, मैंने व्यग्रतापूर्वक अपने बच्चों को शैतानी शिक्षा लेने भेज दिया और उन्हें दुष्ट को सौंप दिया। हाल ही में मेरे पुत्र ने एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, और जब वह घर लौटा, तो भले ही उसने काफी ज्ञान प्राप्त कर लिया था, साथ ही वह शैतान के मिथ्या कथनों और विधर्म से भर चुका था। जब भी मैं परमेश्‍वर में विश्वास के बारे में किसी चीज़ का उल्लेख करती, तो वह मेरा खंडन करने के लिए हर प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान और सिद्धांतों को प्रदर्शित करता, वह मुझे अनपढ़, अज्ञानी और अविवेकी कहता, वह कहता कि मुझे विज्ञान को मानना चाहिए…। इन सबका सामना करते हुए मुझे बहुत पछतावा हुआ और तभी मुझे एहसास हुआ किसमस्त शैतानी संस्कृति और ज्ञान सत्य के प्रतिकूल हैं। ये वे उपकरण हैं जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है और उन पर नियंत्रण करता है। मुझे ये भी समझ आ गया कि ज़्यादा ज्ञान अर्जित करना बहुत अच्छी बात नहीं है। लोग जितनी उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं, और जितना अधिक ज्ञान वे ग्रहण करते हैं, उतना ही अधिक उनमें विष भर जाता है, वे परमेश्‍वर से उतना ही अधिक दूर हो जाते हैं, उनके लिए सत्य को स्वीकार करना उतना ही अधिक कठिन हो जाता है, और उनके लिए उतना ही अधिक कठिन परमेश्‍वर से उद्धार प्राप्त करना हो जाता है। कोई कह सकता है कि जितनी अधिक पुस्तकें एक व्यक्ति पढ़ता है और जितना अधिक ज्ञान उसे प्राप्त होता है, उनका परमेश्‍वर के प्रति प्रतिरोध उतना ही गम्भीर हो जाता है। इस तरह का ज्ञान बहुत ख़तरनाक चीज़ है!

परमेश्‍वर से प्रबुद्धता ने मुझे यह समझाया कि “अन्य खोजों का मूल्य कम है, पुस्तकों का अध्ययन सबसे श्रेष्ठ है” एक शैतानी भ्रम है, लोगों को धोखा देने, बहकाने और भ्रष्ट करने के लिए शैतान के झूठों में से एक है। मैं समझ गयी कि शैतान के प्रभुत्व में रहने और शैतान के सैद्धांतिक शिक्षा को स्वीकार करने से, हम और ज़्यादा भ्रष्ट ही हो सकते हैं। साथ ही मैं समझ गयी कि अपने बच्चों को केवल परमेश्वर के समक्ष उसके वचनों को पढ़ने के लिए लाने और उसकी अपेक्षा के अनुसार जीने से ही हम सार्थक जीवन जी सकते हैं। परमेश्वर मैं अब शैतान द्वारा धोखा और कष्ट पाना नहीं चाहती, मैं सत्य का अनुसरण करना और अपने भ्रामक दृष्टिकोण को बदलना चाहती हूँ, मैं चाहती हूँ कि तेरे वचन मेरे अस्तित्व का आधार बनें, और मैं अपने दोनों सबसे छोटे बच्चों को तेरे सामने लाना चाहती हूँ, ताकि वे तेरा उद्धार प्राप्त कर सकें और वैसे बनें जैसा कि मनुष्‍यों को होना चाहिए।

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