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लापरवाही का समाधान करके ही इंसान उपयुक्त ढंग से अपना कर्तव्य निभा सकता है

जिंगशियान, जापान

आमतौर पर, सभा या अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैं लोगों की लापरवाही को उजागर करने से संबंधित परमेश्वर के वचनों को अक्सर पढ़ा करता था, लेकिन मैं अपने प्रवेश पर कोई ख़ास ध्यान नहीं देता था; मुझे नहीं लगता था कि मेरे अंदर कोई गंभीर मसला है। इसलिये मैं अपना काम लापरवाही से करने की समस्या को दूर करने के लिये विरले ही कभी सत्य की खोज करता था। ऐसा मैंने तब तक नहीं किया जब तक कि मेरी लापरवाही मेरे काम में एक बड़ा मसला नहीं बन गई। जब इस लापरवाही के कारण कलीसिया के सुसमाचार कार्य को नुकसान पहुँचा, तो परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से ही मुझे अपने काम के दौरान लापरवाही करने और उसके मूल का थोड़ा-बहुत ज्ञान हुआ। मैंने जाना कि अगर मैंने इस समस्या को सुलझाए बिना ही छोड़ दिया, तो मेरी लापरवाही की समस्या मुझे परमेश्वर की नफ़रत और घृणा का पात्र बना देगी, और देर-सवेर परमेश्वर मुझे उजागर करके हटा देगा। उसके बाद, मैं लापरवाही की समस्या को दूर करने के लिये सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान देने लगा, ताकि मैं सही ढंग से अपना काम कर सकूँ।

एक दिन, जब मैं कलीसिया के कुछ भाई-बहनों को सुन रहा था जो सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के लिये कुछ अच्छे मार्गों का अभ्यास करने पर बोल रहे थे, तो मुझे एहसास हुआ कि ऐसा ही कुछ मैंने पिछले साल भी सुना था। उस समय, मुझे भी लगा था कि इस तरह से अभ्यास करना हमारे वर्तमान दृष्टिकोण से कहीं ज़्यादा बेहतर है—लेकिन बाद में, जब मैंने सुसमाचार समूह के कई उत्तरदायी लोगों द्वारा इस अभ्यास को लागू कराने का प्रयास किया, तो उन लोगों ने कहा कि ऐसे बेशुमार कारण हैं जिनकी वजह से इस अभ्यास को लागू करना संभव नहीं है। हालाँकि यह सुनकर मुझे थोड़ी निराशा ज़रूर हुई थी, लेकिन मैंने बात को आगे नहीं बढ़ाया; इस तरह बात आई-गई हो गई। लेकिन वैसी ही बातें दोबारा सुनकर, मुझे लगा मेरी बात की पुष्टि हो गई; मैंने सोचा कि सुसमाचार के प्रचार-प्रसार का यह मार्ग वाकई अच्छा है। मैं उत्तरदायी व्यक्तियों से चर्चा करने का इच्छुक था कि बाकी लोगों के गुणों से मदद कैसे ली जाए। इसलिये, सभा के दौरान, मैंने उत्तरदायी व्यक्तियों को अपनी राय और सुझावों के बारे में बताने के बाद, मैंने देखा कि उनमें से कुछ लोगों की रुचि कुछ ज़्यादा नहीं है, जबकि बाकी लोग तर्क देने लगे कि सुसमाचार के प्रचार-प्रसार का यह तरीका क्यों व्यवहारिक नहीं है। मुझे समझ आ रहा था कि उन लोगों की बहुत सारी सोच और नज़रिया पुराना पड़ चुका था जिसे वे लोग छोड़ना नहीं चाहते थे। मेरी सहभागिता का कोई असर नहीं हुआ था। लेकिन फिर मैंने सोचा कि सुसमाचार के प्रचार-प्रसार में ये लोग कितने अनुभवी हैं: हालाँकि मैं उनके काम के लिये ज़िम्मेदार था, लेकिन मुझे सुसमाचार के प्रचार-प्रसार का ज़्यादा अनुभव नहीं था। अगर मैं एक व्यवहारिक तरीके पर सहभागिता कर पाने के काबिल नहीं था, तो कुछ सरल शब्दों से उनकी सोच को बदलना बहुत कठिन होगा। मैंने मन ही मन सोचा: “इन लोगों से अभ्यास के इन नए मार्गों को स्वीकार करवाना आसान नहीं होगा! अगर मुझे इन तौर-तरीकों के लिये कोई सहज आधार बताना हो और उनसे स्पष्ट सहभागिता करनी हो, तो मुझे दूसरे ज़्यादा अनुभवी भाई-बहनों की मदद लेकर, कोई हल निकालने का प्रयास करना होगा। मुझे प्रभावी होने के लिए, बहुत से लोगों से इस पर काफ़ी विस्तार से चर्चा करनी होगी, और बातचीत करनी होगी। ओह! लेकिन मेरे आस-पास तो ऐसे भाई-बहन नहीं हैं, न ही मैं किसी दूसरे देश में ऐसे भाई-बहनों को जानता हूँ। मेरे लिये, इस समस्या को सुलझाना बहुत मुश्किल है। इसमें वक्त और प्रयास लगेगा, और मुझे भारी कीमत चुकानी होगी। यह बड़ी मुसीबत का काम है। मेरे पास और भी तो काम हैं करने को। मैं अपना सारा समय इस इकलौती समस्या को हल करने में नहीं लगा सकता! मुझे जो कहना था, कह दिया; अब इसे स्वीकार करना न करना उनका काम है। इसे भूल जाना ही बेहतर है, इस पर मुझे ज़्यादा गंभीर होने की ज़रूरत नहीं है। जब यह बात उठेगी, तो मैं इस पर कमोबेश काफ़ी काम कर चुका हूँ।” इस तरह, चूँकि इस समस्या को वक्त पर नहीं सुलझाया गया, इसलिये सुसमाचार के काम में कोई सुधार नहीं आया।

अगले कई दिनों तक, इस पर सोच-सोचकर मैं बेचैन होता रहा। जब मुझे लगा कि मेरी स्थिति ठीक नहीं है, तो मैं प्रार्थना और खोज करने परमेश्वर के समक्ष आया। बाद में, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: “अपने कार्य करते समय और अपने कर्तव्य निभाते समय, क्या तुम अक्सर अपने व्यवहार और इरादों पर विचार करते हो? अगर तुम ऐसा सिर्फ़ कभी-कभार करते हो, तो तुम्हारी गलतियां करने की संभावना बहुत अधिक है, जिसका मतलब है कि तुम्हारे कद में अभी भी एक समस्या है। अगर तुम ऐसा कभी नहीं करते हो, तो तुम अविश्वासियों से अलग नहीं हो; हालांकि, अगर कभी-कभी तुम विचार करते हो, तो तुम्हारे पास एक विश्वासी होने की थोड़ी सी झलक है। तुम्हें विचार करने में ज़्यादा समय देना चाहिये। तुम्हें हर चीज़ पर विचार करना चाहिये: तुम्हें अपनी खुद की स्थिति पर विचार करना चाहिए, ताकि तुम यह देख सको कि क्या तुम परमेश्वर के सामने रहते हो, क्या तुम्हारे कार्यों के पीछे के इरादे सही हैं, क्या तुम्हारे कार्यों की प्रेरणाएं और स्रोत परमेश्वर की जांच में सफल हो सकते हैं, और क्या तुमने परमेश्वर की जांच-पड़ताल को स्वीकार कर लिया है। कभी-कभी तुम्हारे अंदर यह विचार आएगा, ‘इस तरह काम करना ठीक है; यह काफी है, है न?’ हालांकि, इस विचार में निहित धारणा, एक खास तरह की प्रवृत्ति को प्रकट करती है जो मामलों से निपटते समय लोगों में होती है, इसके साथ-साथ लोगों के उनके कर्तव्यों के प्रति रवैये को भी प्रकट करती है। यह मानसिकता एक अलग तरह की स्थिति है। क्या इस तरह की स्थिति ऐसा रवैया नहीं है जहां व्यक्ति में जिम्मेदारी का अभाव होता है और वह अपने कर्तव्य के निर्वहन के प्रति अरुचि से भरा है? तुमने शायद अब तक इस बात पर विचार नहीं किया होगा, और तुम्हें महसूस हो सकता है कि यह एक सामान्य अभिव्यक्ति है, यह मानवता का एक सामान्य प्रकाशन है, और इसका कोई मतलब नहीं है, लेकिन अगर तुम अक्सर ऐसी अवस्था में होते हो, ऐसी परिस्थिति में होते हो, तो इसके पीछे वह स्वभाव है जो तुम्हारे ऊपर प्रभुत्व रखता है। इसकी जाँच करना ज़रूरी है, और इसे गंभीरता से लिया जाना ज़रूरी है; अगर तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम्हारे अंदर कोई बदलाव नहीं आएगा” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें”)। “अगर तुम अपना कर्तव्य पूरा करने में अपना दिल नहीं लगाते हो और लापरवाह बने रहते हो, कोई भी काम सबसे आसान तरीके से करते हो, तो यह किस तरह की मानसिकता है? यह मानसिकता सिर्फ़ बिना रुचि लिये काम करने की है, जिसमें अपने कर्तव्य के प्रति कोई वफ़ादारी नहीं है, जिम्मेदारी की कोई समझ नहीं है, और उद्देश्य की कोई समझ नहीं है। हर बार जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तुम सिर्फ़ अपनी आधी शक्ति का उपयोग करते हो; तुम इसे आधे मन से करते हो, तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते हो, और बिना किसी कर्तव्यनिष्ठा के तुम बस इस कार्य को पूरा और ख़त्म कर देने की कोशिश करते हो। तुम इसे इतने बेपरवाह तरीके से पूरा करते हो कि ऐसा लगता है जैसे तुम इससे खिलवाड़ कर रहे हो। क्या यह समस्याओं को पैदा नहीं करेगा? अंत में, कोई न कोई यह कहेगा कि जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तुम सिर्फ़ एक प्रक्रिया पूरी करने की कोशिश करते हो। परमेश्वर इसके बारे में क्या कहेगा? वह कहेगा कि तुम विश्वास के लायक नहीं हो। अर्थात, अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है, चाहे वह काफी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का काम हो या सामान्य जिम्मेदारी वाला काम हो, अगर तुम उसमें अपना दिल नहीं लगाते हो और अपनी जिम्मेदारी के अनुसार काम नहीं करते हो, और अगर तुम इस काम को परमेश्वर द्वारा दिये गये एक मिशन की तरह नहीं देखते हो या इसे परमेश्वर द्वारा सौंपे गये कार्य के तौर पर नहीं देखते हो, और तुम इसे अपना कर्तव्य एवं दायित्व समझकर पूरा नहीं करते हो, तो तुम्हारे सामने समस्याएं खड़ी होंगी। ‘विश्वास के अयोग्य’—ये शब्द यह परिभाषित करेंगे कि तुम अपने कर्तव्य किस तरह पूरे करते हो, और परमेश्वर यह कहेगा कि तुम्हारा चरित्र अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है और तुम इसके प्रति इस तरह का रवैया अपनाते हो और इसे इसी तरह से पूरा करते हो, तो क्या आने वाले समय में तुम्हें कोई कर्तव्य सौंपा जाएगा? क्या तुम्हें कोई महत्वपूर्ण काम सौंपा जा सकता है? शायद तुम्हें ऐसा काम सौंपा जा सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारा व्यवहार कैसा है। हालांकि, परमेश्वर के हृदय में तुम्हारे प्रति हमेशा कुछ अविश्वास मौजूद रहेगा। परमेश्वर के मस्तिष्क में हमेशा कुछ अविश्वास और कुछ असंतोष का भाव होगा, तो क्या यह एक समस्या नहीं है?” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है”)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन का सामना करके, मैंने मन ही मन ख़ुद को बहुत धिक्कारा और लाँछित किया। मैंने देखा कि अपने काम के प्रति मेरा रवैया लापरवाही भरा और धोखा देने वाला था। मैंने उस वक्त को याद किया, जब मैंने पहली बार सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के अच्छे मार्गों के बारे में सुना था। मैंने उन मार्गों पर सहमति जताई थी, और महसूस किया था कि हमें उन्हें स्वीकार करके उन पर अमल करना चाहिये। लेकिन जब, मैंने इन तरीकों को लागू करने पर भाई-बहनों से वास्तव में सहभागिता करने का प्रयास किया और नाकाम रहा, तो मैं इस बात को जानता था कि मुझे उनके साथ उनके पुराने तौर-तरीकों और नज़रियों को बदलने के लिए सत्य पर सहभागिता करनी चाहिये। लेकिन जब मैंने इस बात पर विचार किया कि इस समस्या को सुलझाने के लिये मुझे क्या कीमत चुकानी पड़ेगी, कितना समय देना होगा, कितने प्रयास करने होंगे, तो लगा यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं हैं, जो सीधे-सीधे हो जाए, बल्कि यह एक “बड़ी परियोजना,” है—मुझे लगा कि यह एक बड़ी मुसीबत है, इसमें बहुत मेहनत है, तो मैं लापरवाह हो गया, मैंने बस औपचारिकताएँ पूरी कीं, खानापूर्ति की। मैंने यह मान लिया कि “मैंने कोशिश की,” “अपनी ओर से कुछ प्रयास किये,” “वे कमोबेश काफ़ी थे,” और “एक ही व्यक्ति सारे काम तो नहीं कर सकता।” मैंने अपने आपको इस झँझट से बाहर निकालने के लिये, यों ही काम करते हुए इस समस्या से पीछा छुड़ाने के लिये, इस तरह के तर्क गढ़ लिए; मैंने इस बात की भी परवाह नहीं की कि मैं प्रभावी भी रहा कि नहीं, यह मानते हुए कि इस काम को जैसे-तैसे निपटा देना ही काफ़ी है। मैंने शुरू से आख़िर तक इन्हीं मानकों पर काम किया। मैंने उत्तरदायी व्यक्तियों के साथ जो सहभागिता की थी, वह बेहद सतही थीं। मैंने दरअसल उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिये न तो कोई कष्ट उठाए, न ही कोई कीमत चुकाई; बल्कि मैंने यह मान लिया कि मैंने पहले ही काफ़ी कुछ कर दिया है। दरअसल, मैंने लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिये काम चलाऊ सतही तरीकों का इस्तेमाल किया था, ताकि अगर बाद में कोई इस समस्या को उठाए, तो मेरे पास उसका जवाब हो; इसके अलावा, सुसमाचार का ख़राब प्रचार-प्रसार अकेले मेरी ज़िम्मेदारी नहीं थी—यह उनके द्वारा अच्छे मार्ग को अमल में न लाने का परिणाम था। मैंने यह कहते हुए परमेश्वर को भी बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की: “हे परमेश्वर, मैं बस इतना ही कर सकता हूँ।” अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मैंने वाकई परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने का प्रयास ही नहीं किया, जब भी मेरे सामने परेशानी आई, मैंने परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अमल करने और उसे संतुष्ट करने की कोशिश ही नहीं की। बल्कि, अक्सर मैंने लापरवाही की, और परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास किया। मैं कितना कपटी, चालाक व्यक्ति था! मुझे अच्छी तरह पता था कि भाई-बहनों की सुसमाचार के प्रचार-प्रसार की समस्या का समाधान नहीं हुआ है, और मैंने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है। सुसमाचार के काम में रुकावट आते देखकर भी, यह सोचकर कि कौन मुसीबत में पड़े, मैंने उधर ध्यान नहीं दिया। क्या यह परमेश्वर के कार्य का मज़ाक बनाना नहीं है? मैंने देखा कि मेरे अंदर ज़रा भी ज़मीर और विवेक-बुद्धि नहीं है। मुझ पर थोड़ा-सा भी भरोसा नहीं किया जा सकता था! मैंने एक बार फिर से परमेश्वर के वचनों को पढ़ा: “… तुम लोगों को बनाने से पहले से ही मैं उस अधार्मिकता को जानता था जो मानव हृदय में गहराई से विद्यमान थी, और मैं मानव हृदय के सभी धोखों और कुटिलता को जानता था। इसलिए, भले ही जब लोग अधार्मिक कार्य करते हैं तब बिल्कुल भी कोई निशान न हों, किन्तु मुझे तब भी पता चल जाता है कि तुम लोगों के हृदयों में समाई अधार्मिकता उन सभी चीजों की समृद्धि से आगे बढ़ जाती है जो मैंने बनायी हैं” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी, तो तुझे उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तूने की हैं”)। उस पल, मैं अच्छी तरह समझ गया कि मुझ पर परमेश्वर के न्याय और ताड़ना पड़े हैं। परमेश्वर मेरे अंतरतम में झाँक चुका है, हालाँकि, मेरे कपट को कोई नहीं जानता था, लेकिन परमेश्वर के सामने सब-कुछ स्पष्ट था। परमेश्वर ने जो आदेश मेरे सुपुर्द किया था, मैंने उसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली। मैंने धूर्तता की थी, जिसकी वजह से सुसमाचार के काम में रुकावट आई थी। सबको ऐसा लगता था कि मैं अपना काम कर रहा हूँ, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं लापरवाही कर रहा था और परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास कर रहा था। मेरे अंदर परमेश्वर का कोई भय नहीं था। परमेश्वर के वचनों के समक्ष मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े: “अगर, कार्यों को करते समय तुम उनमें कुछ ज़्यादा मन लगाते हो और थोड़ी अधिक उदारता, जिम्मेदारी और सोच-विचार का उपयोग करते हो, तो तुम ज़्यादा प्रयास कर पाने में सक्षम होगे। जब तुम ऐसा कर सकते हो, तब तुम्हारे कर्तव्यों के निर्वहन के परिणामों में अवश्य सुधार होगा। तुम्हारे परिणाम बेहतर होंगे, और यह परमेश्वर के साथ-साथ लोगों को भी संतुष्ट करेगा” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “जीवन में प्रवेश दायित्‍वों के निर्वाह से प्रारंभ होना चाहिए”)। सहभागिता में, ऐसा कहा गया है: “लापरवाह होने का क्या अर्थ है? सरल शब्दों में इसके मायने हैं कि बिना किसी रुचि या उत्साह के दूसरों को दिखाने के लिये काम करना, ताकि दूसरों को लगे कि ‘हाँ, इसने यह कार्य कर लिया है।’ क्या इस तरह के रवैये से कोई परिणाम हासिल किया जा सकता है? (नहीं।) गैर-ज़िम्मेदार लोग ऐसे ही काम करते हैं; वे लोग इसी तरह से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। वे लोग वास्तव में इस कार्य के भार को वहन नहीं करते, लेकिन वे लोग इसे करे बिना बच नहीं सकते। अगर वे इसे नहीं करेंगे, तो लोग समझ जाएँगे कि इस अगुवा के साथ कुछ समस्या है। इसलिये, लोगों को दिखाने के लिये तो उन्हें ऊपर-ऊपर से काम करना ही पड़ता है। परमेश्वर ने कहा, ‘यह सेवा करना है। ऐसे लोग अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रहे।’ तो, सेवा करने और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में क्या अंतर है? जो लोग सचमुच अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, उनके अंदर एक ज़िम्मेदारी का भाव होता है—यह भाव सचमुच समस्या के समाधान की इच्छा से आता है, उस काम को सही ढंग से करने, परमेश्वर को संतुष्ट करने और परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने की इच्छा से आता है। इसलिये, जब वे लोग इन कामों को करते हैं, तो उनका संकल्प क्या होता है? उनका संकल्प होता है कि यह काम करना ही है, और अच्छे ढंग से करना है। समस्या को सुलझाना ही है। जब तक वह काम हो नहीं जाता, तब तक उन लोगों को चैन नहीं पड़ता, जब तक काम हो नहीं जाता, वे लोग रुकते नहीं हैं। वे लोग अपने काम को इस ज़िम्मेदारी से करते हैं। इसलिये, उनके लिये अपने काम में प्रभावी होना आसान होता है। अपने कर्तव्य का निर्वाह करने का यह अर्थ है। जब तुम्हारा काम और तुम्हारी कार्य-कुशलता प्रभावी होते हैं, तभी तुम अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे होते हो; अगर कोई प्रभाव पैदा नहीं होता, तो फिर तुम अपने काम को लापरवाही से कर रहे हो, इसका अर्थ है कि तुम अपने काम को घसीट रहे हो। इसी को सेवा करना कहते हैं; काम को निष्प्रभावी ढंग से करना ही सेवा करना है—इसमें कोई संदेह नहीं है, यही सही है!” (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। परमेश्वर के वचनों और इस सहभागिता से, मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला: कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये गंभीरता और निष्ठा की आवश्यकता होती है, इसके लिये हर चीज़ के साथ संजीदगी और ज़िम्मेदारी से पेश आना होता है, तभी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्टि मिलेगी। असली समस्या से दूर भागना, लापरवाही और महज़ दूसरों को दिखाने के लिये काम करना, परमेश्वर को धोखा देना है, उसके साथ खिलवाड़ करना है। इसका निश्चित रूप से कोई प्रभाव नहीं होगा। परमेश्वर मुझे कर्तव्य निभाने में लापरवाही करते हुए नहीं देखना चाहता था, वह नहीं चाहता था कि मैं उसका विरोध करूँ। उसे उम्मीद थी कि उसके आदेश के प्रति मेरा नज़रिया ईमानदारी का होगा, मैं अपने काम के प्रति अपना रवैया सुधारूँगा, सभी समस्याओं का सामना व्यवहारिक रूप से करूँगा, यह सोचने पर अधिक समय दूँगा कि समस्या को कैसे सुलझाया जाए, कैसे प्रभावी हुआ जाए; इस प्रकार से काम करना ही परमेश्वर के दिल के अनुरूप है। उस पल, मुझे एहसास हुआ कि सुसमाचार समूह की समस्याओं को अब और टाला नहीं जा सकता। हालाँकि सुसमाचार समूहों के पुराने नज़रियों पर सहभागिता करना और उन्हें बदलना आसान नहीं है, लेकिन अब मैं इसे और ज़्यादा टालना नहीं चाहता था। आगे, मैंने सुसमाचार के प्रचार-प्रसार की समस्याओं पर उत्तरदायी व्यक्तियों भाई झांग और भाई झाओ के साथ विस्तार से चर्चा करने के अवसर की तलाश की—कि कैसे एक लचीलापन रखते हुए अन्य स्थानों पर सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करने के तौर-तरीकों को अपनाया जाए और उसमें उनके अनुभवों का भी लाभ उठाया जाए। सहभागिता के बाद, भाई झांग और भाई झाओ ने कहा कि उन्हें इसे स्वीकरते हुए खुशी हो रही है और वे इस पर और विचार करेंगे कि इसे कैसे अमल में लाया जाए। बाद में, सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करते हुए भाई-बहनों में जोश आ गया और उनकी प्रभावशीलता में भी सुधार आया।

इस मामले का अनुभव हासिल करने के बाद, मुझे काम में अपनी लापरवाही भरी स्थिति समझ में आ गई। मैं अब पूरी इच्छा से देह-सुख से विमुख होने लगा, और सत्य पर अमल करते हुए, निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह करने लगा। लेकिन मुझे अभी भी अपनी लापरवाही के सार, मूल और नतीजों की गंभीरता का ज्ञान नहीं था। बाद में, परमेश्वर ने मेरे लिये ऐसा परिवेश बनाया जिससे कि मैं सबक सीखना जारी रहूँ, और अपनी लापरवाही की समस्या का समाधान खोजता रहूँ।

उसके कुछ समय बाद, मुझे सुसमाचार समूह के कुछ मसलों का पता चला। कार्य-प्रभारी के नाते, भाई झांग काफ़ी अहंकारी व्यक्ति था। अपनी बातचीत और व्यवहार में वह मनमानी करने वाला इंसान था। वह दूसरे भाई-बहनों के सुझावों को स्वीकार करना पसंद नहीं करता था। उसके साथ काम करने वाले भाई झाओ पर भी उसका काफ़ी प्रभाव था। वे दोनों मिलकर, इस काबिल नहीं थे कि सुसमाचार के काम में आने वाली असली कठिनाइयों को सुलझाने का प्रयास या उस पर चर्चा कर सकें। भाई झाओ भी बहुत दकियानूसी सोच का व्यक्ति था, और सुसमाचार के प्रचार-प्रसार में ज़्यादातर सिद्धांत पर चलता था। इन दो कारणों से सुसमाचार का काम आगे नहीं बढ़ पा रहा था। मैंने उनकी समस्याओं का हल निकालने के लिये विशेष सहभागिता भी आयोजित की थी, लेकिन कोई ख़ास बदलाव नहीं आया। बाद में, मैंने उनसे सद्भावनापूर्ण सहयोग पाने का प्रयास छोड़ दिया; चीज़ें जैसी थीं उन्हें वैसा ही रखना काफ़ी था। जहाँ तक भाई झांग के दूसरों के सुझावों को न मानने वाले रवैये का सवाल था, ऐसे भी मौके आए जब मैंने हार मान ली, और ऐसे भी जब मैंने चीज़ों पर सिर्फ़ नज़र रखी। लेकिन मैंने इस समस्या के हल के लिये सत्य की खोज नहीं की। कई महीने पहले, भाई झाओ के सिद्धांत से चिपके रहने वाले अड़ियल रुख़ की वजह से काम में रुकावट आई थी; मैंने इस पर उससे सहभागिता की थी और उसने इस बात को समझा था, लेकिन बाद में मुझे पता चला कि कुछ मामलों में वह अभी भी सिद्धांत से चिपका रहता है और अड़ियल रुख़ लिए रहता है। कभी-कभी मैंने इस बात की ओर इशारा भी किया, लेकिन वह अपनी बात पर कायम रहने में माहिर था। मन ही मन मैंने सोचा: “उसे उसके विचारों से डिगाना बहुत मुश्किल है। बेहतर होगा कि मैं कुछ नियम खोजूँ, और असलियत में उसका जो व्यवहार है, उस पर उससे बात करूँ। मुझे शायद ऐसे भाई-बहनों को ढूँढ़ना पड़े जिन्हें सुसमाचार के प्रचार-प्रसार का अनुभव है ताकि वे भाई से बात करें जिससे कि उस पर कुछ असर हो।” इस समस्या के समाधान में आने वाली परेशानी के बारे में सोचकर, मैंने तय किया जैसा चल रहा है चलने दो। हालाँकि मुझे एहसास था कि भाई झांग और भाई झाओ की समस्या का असर सुसमाचार के काम पर पड़ेगा, लेकिन मुझे लगा कि, फ़िलहाल इस आदेश का दायित्व लेने के लिये सुसमाचार समूह में और कोई बेहतर व्यक्ति नहीं है। ऐसा नहीं है कि उनका काम बिल्कुल ही निष्प्रभावी था—बस कामचलाऊ था। जब तक इस बारे में ऊपरी-स्तर के अगुवा मुझे कुछ नहीं कहते, तब तक ठीक था। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो आपको हमेशा परेशान करती रहती हैं, और कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जो कभी नहीं सुलझतीं। तो जब इन दो भाइयों के साथ समस्याओं का सवाल आया, तो मुझे इस बात पर ज़्यादा माथा-पच्ची नहीं की कि इस पर क्या रुख़ अख्तियार करूँ, न ही मैंने इन बातों की माप-तौल की कि उनके काम में फ़ायदे ज़्यादा हैं या नुक्सान।

जल्द ही उसके बाद, कलीसिया ने एक सार्वजनिक सर्वेक्षण किया। नतीजों से मैं चौंक गया। बहुत से भाई-बहनों ने शिकायत की कि भाई झांग कभी किसी की राय नहीं मानते, अपनी मर्ज़ी चलाते हैं, अपनी बात ही ऊपर रखते हैं, दूसरों को भाषण झाड़ने और उन्हें नीचा दिखाने वाला व्यवहार करते हैं। कुछ भाई-बहन तो उनसे मिलने से ही डरते थे। उनके पास उसकी व्यवस्थाओं के अनुसार चलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था, वे ख़ुद को बँधा हुआ महसूस करते और नकारात्मकता में जीते थे। तथ्यों से ज़ाहिर था कि भाई झांग मसीह-विरोधी राह पर चल रहा था। जहाँ तक भाई झाओ का प्रश्न था, भाई-बहनों ने शिकायत की कि भाई झाओ बहुत कट्टर हैं, और अड़ियल तरीके से सिद्धांत से चिपके रहते हैं। वे कभी विरले ही भाई-बहनों को नियम में प्रवेश करने के लिये मार्गदर्शन देता था। सुसमाचार के प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया के दौरान, वह भाई-बहनों से ऐसे बहुत-से काम करवाता था जो निरर्थक होते थे। इससे ज़ाहिर है कि उसे न तो आत्मा की समझ थी, और न ही नियम की। उनकी हरकतों से सुसमाचार के काम में बहुत बाधा और रुकावट पैदा होती थी। उन्होंने भाई-बहनों पर ढेरों पाबंदियाँ थोप रखी थीं और उनके लिये परेशानियाँ पैदा कर दी थीं। नियमानुसार, भाई झांग और भाई झाओ को हटा दिया जाना चाहिये।

मेरी लापरवाही और वास्तविक कार्य न करने के रवैये ने सुसमाचार के काम को बहुत नुक्सान पहुँचाया था। इससे भाई-बहनों को भी बहुत मुश्किलें पेश आईं थी। इस बात पर विचार करके, मैंने मन ही मन ख़ुद को बहुत धिक्कारा। यह सोचकर कि मैं अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर! मेरे कारण आज कलीसिया के काम को जो नुक्सान हुआ है, उसकी वजह मेरी असावधानी है, मेरी लापरवाही है, अपनी पद-प्रतिष्ठा के आशीषों में लिप्त रहना और वास्तविक कार्य न करना है। मैं आपका ऋणी हूँ, मुझे भाई-बहनों के लिये अफ़सोस है। हे परमेश्वर! मैं इस मामले में आपके न्याय और ताड़ना को स्वीकार लूँगा, ताकि मैं अपने आपको गहराई से जानकर आपके आगे सच्चा प्रायश्चित करूँ।”

बाद में, मैंने सहभागिताओं में पढ़ा, “यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो अपने कर्तव्य में बस किसी तरह काम चलाता हो और धोखा देने के लिए युक्तियाँ बनाता रहता हो, तो इससे पता चलता है कि तुम एक धोखेबाज़ और कुटिल व्यक्ति हो और शैतान से जुड़े हुए हो” (ऊपर से संगति)। “हर किसी के पास अपने कर्तव्यों की पूर्ति में एक ही समस्या है, और यह है बेपरवाही से काम करना। ऐसा लगता है कि कोई भी उनकी कर्तव्यनिष्ठा का हक़दार नहीं है—अगर लोग किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई काम बहुत गंभीरता से करते हैं, तो उनके लिए वो व्यक्ति बहुत सम्माननीय होगा, कोई ऐसा होगा जो बहुत मदद कर सकता हो, या कोई ऐसा जिसका उन पर बहुत एहसान हो, अन्यथा लोग काम को गंभीरता से नहीं लेंगे। ‘लाभ’ शब्द मानवजाति की प्रकृति पर बड़े अक्षरों में छ्पा है; लोग केवल उस काम को गंभीरता से लेते हैं जिसके बदले में उन्हें कुछ लाभ मिल सके, और यदि उनके लिए कोई लाभ नहीं होता तो वे एक बेपरवाह रवैया अपनाएंगे। यह मनुष्यों की प्रकृति है, और भ्रष्ट मानवजाति का एक अभिलक्षण भी है। सभी लोग अपनी ही सोचते हैं, इसलिए सभी लोग बेपरवाही से कार्य करते हैं और बस किसी तरह काम चलाकर खुश हैं। यह शायद थोड़ा बेहतर होगा अगर मानवजाति वास्तव में अपने कर्तव्य को, किसी ऐसे कार्य के रूप में देखे जो परमेश्वर के लिए है और उसे परमेश्वर की खातिर, गंभीरता से ले सके। अगर मानवजाति के पास वास्तव में परमेश्वर का भय मानने वाला एक दिल हो, तो इसकी संभावना प्रायः नहीं होगी कि लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय बेपरवाही बरतें” (ऊपर से संगति)। इन सहभागिताओं से अपनी तुलना करके, और अपनी हरकतों पर आत्म-मंथन करके, मुझे ख़ुद पर बहुत शर्म आई। मैंने देखा कि मेरी प्रकृति विशेष रूप से स्वार्थी और चालाक थी, मैं जो कुछ भी करता था, अपने हितों को साधने के लिये करता था। मेरा जीने का मंत्र यह था, “जब तक कोई संबद्ध लाभ न हो, तब तक कभी भी सुबह जल्दी मत उठो।” जिन कामों से फ़ायदा हो, वो करो, जिनसे न हो, उन्हें छोड़ दो। कर्तव्य का निर्वहन परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करने के लिए है। मैंने हमेशा कम कीमत चुकाकर अधिक आशीष पाने की कोशिश की थी, इस तरह मेरे लापरवाह होने और परमेश्वर को धोखा देने की बहुत संभावना थी। मुझे याद आया कि किस तरह भाई झांग और भाई झाओ के साथ किसी समस्या पर चर्चा के वक्त, मैं अच्छी तरह जानता था कि जैसा उनका रवैया है, उससे सुसमाचार के काम को नुक्सान होगा—लेकिन यह देखकर कि बाहर से वे लोग अपने कर्तव्य का निर्वाह करते प्रतीत होते थे, और यह मानकर कि उनसे बेहतर कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके, मैंने उनके साथ एकाध बार सहभागिता करने के अलावा कुछ नहीं किया। मैं समस्या के समाधान के लिये कोई बड़ी कीमत चुकाने को तैयार नहीं था। अपना काम करते समय, मैं बस इसी बात से संतुष्ट था कि दूसरों को लगता है कि मैंने अच्छा काम किया या ऊपरी-स्तर के अगुवाओं को मेरे काम में कोई ख़ामी नज़र नहीं आती; मैं इस बात पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता था कि परमेश्वर क्या सोचता है, या वह इसे किस तरह देखता है। मैं अच्छी तरह जानता था कि मैंने समस्या का समाधान पूरी तरह से नहीं किया है, न ही मैंने कभी यह जानने का प्रयास किया कि उनके मसले का मूल और सार क्या है, उसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें हटाने में इतना समय लग गया—जो कि सुसमाचार के काम में एक बड़ी बाधा थी। परमेश्वर ने मुझे इस उम्मीद से इतना महत्वपूर्ण काम देकर मुझे ऊपर उठाया था कि मैं उसकी इच्छा का ख़्याल रखूँगा—लेकिन मैंने परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने पर विचार ही नहीं किया, बल्कि मैंने शैतान के गुर्गे की भूमिका निभाकर, परमेश्वर को बेवकूफ़ बनाने का प्रयास किया, और उसके काम को तबाह करने की कोशिश की। मेरे अंदर ज़रा-सी भी मानवता नहीं थी। मैं वाकई घिनौना और नफ़रत के काबिल था। मैं सचमुच परमेश्वर के समक्ष जीने लायक नहीं था! परमेश्वर का स्वभाव ऐसा है जिसका इन्सान द्वारा अपमान नहीं किया जा सकता; मेरी हरकतों से परमेश्वर घृणा कैसे न कर सकता?

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े: “जहां तक लोगों के इरादों और कर्तव्यों के निर्वहन में उनके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की बात है, परमेश्वर इसकी जाँच करता है और इसे देख सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपने कार्य करते समय लोग उसमें अपने पूरे दिल और पूरी शक्ति का प्रयोग करें। उनका सहयोग भी काफी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति ने जिन कर्तव्यों को पूरा किया है उस पर और अपने पिछले कार्यों पर कोई पछतावा न हो, इसके लिए प्रयास करना और उस स्थिति तक पहुंचना, जहां उस पर परमेश्वर का कोई ऋण बाकी न रहे—अपना पूरा दिल और अपनी पूरी शक्ति लगाने का यही अर्थ है। अगर आज तुम अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति नहीं लगाते हो, तो बाद में, जब कुछ गलत हो जाएगा, और उसके परिणाम सामने आएंगे, तो क्या तब पछतावा करने के लिए बहुत देर नहीं हो जाएगी? तुम हमेशा के लिए ऋणी बन जाओगे, और यह तुम्हारे ऊपर एक धब्बा बन जाएगा! धब्बा लगने का मतलब है अपने कर्तव्य पूरे करते समय लोगों द्वारा किया गया उल्लंघन। अपने कर्तव्य पूरे करते समय जो किया जाना चाहिये और जो करना ज़रूरी हो, उसके प्रति अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति लगाने की कोशिश करो। अगर तुम बस लापरवाही से उन कार्यों को नहीं करते हो, और अगर तुम्हें कोई पछतावा नहीं है, तो इस समय के दौरान किये गये तुम्हारे कार्यों को याद रखा जाएगा। जिन कार्यों को याद रखा जाता है वे परमेश्वर के सामने अच्छे कर्म होते हैं। और कौन से कार्य हैं जिन्हें याद नहीं रखा जाता है? (उल्लंघन और बुरे कर्म।) उल्लंघनों को याद नहीं रखा जाता। ऐसा हो सकता है कि इस समय उन कार्यों का जिक्र करने पर लोग यह स्वीकार न करें कि वे बुरे कर्म हैं, लेकिन अगर ऐसा दिन आता है जब इस बात के गंभीर परिणाम सामने आते हैं, जब इसका नकारात्मक असर पड़ता है, तो उस समय तुम्हें यह महसूस होगा कि यह सिर्फ व्यवहार संबंधी उल्लंघन नहीं था, बल्कि यह एक बुरा कर्म था। जब तुम्हें इसका एहसास होगा, तुम अपने मन में विचार करोगे, ‘अगर मुझे पहले इसका एहसास हो गया होता, तो ऐसा नहीं हुआ होता! अगर मैंने इस पर थोड़ा और विचार कर लिया होता, अगर मैंने थोड़ा और प्रयास कर लिया होता, तो ऐसा नहीं होता।’ कोई भी चीज़ तुम्हारे हृदय पर हमेशा के लिए लगे इस धब्बे को मिटा नहीं सकेगी। अगर यह एक अनंत ऋण बन जाता है, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें”)। परमेश्वर के वचनों पर जब मैंने विचार किया, तो उन्होंने मेरे दिल को अंदर तक छू लिया। मैंने विचार किया कि किस तरह मैं अपनी चालाक, स्वार्थी प्रकृति के हाथों संचालित हो रहा था, किस तरह मैंने धूर्तता से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते समय कीमत चुकाने से बचने की कोशिश की थी, जो उत्तरदायी लोग उपयोग के लायक नहीं थे, उन्हें किस तरह मैंने तुरंत पहचानकर वहाँ से हटाकर कहीं और नहीं लगाया, इस तरह इन सबसे सुसमाचार का काम बाधित हुआ, और भाई-बहनों को अंधेरे और पाबंदियों में बीच रहना पड़ा। मैं परमेश्वर के समक्ष अपराधी था। अगर समय रहते परमेश्वर के न्याय और ताड़ना ने मेरे दुष्ट कदमों को रोका न होता, तो क्या पता भविष्य में मैं कौन-सी बड़ी दुष्टता कर बैठता? उस समय, मैं इस पर जितना विचार करता, उतना ही डर जाता। अपने काम में लापरवाही बरतना बेहद ख़तरनाक होता है—यह कलीसिया के काम को किसी भी वक्त बाधित कर सकता है! अपनी लापरवाही के भयंकर नतीजे देखने के बाद ही मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार न किया, और परमेश्वर के वचनों के अभ्यास पर ध्यान नहीं दिया, अगर मैंने अपने काम में ढिलाई बरती, तो मैं कभी भी परमेश्वर के प्रति निष्ठा हासिल नहीं कर पाऊँगा। ऐसी स्थिति में फिर अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति और परमेश्वर द्वारा उद्धार की तो बात ही बेमानी है। उस वक्त मेरे अंदर एक संकल्प और इच्छा ने जन्म लिया कि मैं सत्य पर चलूँ और अपने कर्तव्य के निर्वाह में निष्ठा हासिल करूँ।

उसके बाद, हमने भाई झांग और भाई झाओ को हटाने के लिये अधिक उपयुक्त लोगों की तलाश की ख़ातिर नियम का प्रयोग किया। लेकिन इसके बावजूद सुसमाचार समूह की समस्या बनी रही। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर! सुसमाचार समूह में अभी भी बहुत-सी समस्याएँ हैं जिनका समाधान नहीं हुआ है। अभ्यास के कुछ अच्छे तौर-तरीके पूरी तरह से कार्यान्वित नहीं किए गए हैं। चूँकि, मैं पहले सत्य की खोज में ढीला पड़ गया था, इसलिये कुछ समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं। इस बार मैं इन समस्याओं के समाधान का प्रयास अवश्य करूँगा। हे परमेश्वर! मुझे मार्गदर्शन दीजिये।” उसके बाद, सुसमाचार समूह में सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के तरीके पर विस्तार से चर्चा करने के लिये मुझे कुछ अच्छा कार्य करने वाले भाई-बहन मिल गए। मैंने बहुत-कुछ सीखा। फिर, मैंने सभी के साथ सभा करने और कर्तव्य निभाने में आने वाली समस्याओं पर सहभागिता करने की तैयारी की। उस शाम, मैंने तथ्यों का अध्ययन करने के दौरान चीज़ों पर गहराई से विचार किया, इस बात को समझने का प्रयास किया कि तैयारियों को ज़्यादा प्रभावी कैसे बनाया जाए। मैंने कई क्षेत्रों की समस्याओं को सारांशित किया और उत्तर के लिये परमेश्वर के संबंधित वचनों को ढूँढ़ा। जब मैंने आधी तैयारी कर ली, तो मुझे एहसास हुआ कि अभी भी बहुत सारे ब्यौरे का समाधान खोजा जाना है—यह देखकर कि पहले ही काफ़ी देरी हो चुकी है, हार माने लेने और लापरवाही दिखाने की मेरी आदत ने एक बार फिर बिन बुलाये सिर उठाया: “इन समस्याओं के संदर्भों का पता लगाने में बहुत वक्त लगेगा और बहुत प्रयास करने होंगे। और वैसे भी, बहुत देर हो चुकी है, इतने विस्तार में जाने की क्या ज़रूरत है; और फिर, कुल मिलाकर एक दिशा तो मिल ही गई है, भाई-बहन इसे आसानी से समझ जाएँगे। इतना काफ़ी है।” लेकिन जैसे ही मैंने आराम करने की सोची, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए: “जब कभी भी तुम शिथिल पड़ना चाहते हो और बस बिना रुचि के काम करना चाहते हो, जब कभी भी तुम आलसी बनना चाहते हो, और जब कभी भी तुम अपना ध्यान बँटने देते हो और बस मौज-मस्ती करना चाहते हो, तो तुम्हें इन बातों पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए: इस तरह व्यवहार करने में, क्या मैं अविश्वास के लायक बन रहा हूँ? क्या यह कर्तव्य के निर्वहन में अपना मन लगाना है? क्या मैं ऐसा करके विश्वासघाती बन रहा हूँ? ऐसा करने में, क्या मैं उस विश्वास के अनुरूप रहने में विफल हो रहा हूँ, जो परमेश्वर ने मुझ पर दिखाया है? तुम्हें इसी तरह आत्म-मंथन करना चाहिए। तुम्हें सोचना चाहिये, ‘मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उस समय, मैंने महसूस किया कि कुछ समस्या थी, लेकिन मैंने उस समस्या को गंभीर नहीं समझा; मैंने बस लापरवाही से उस पर लीपा-पोती कर दी। इस समस्या का अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है। मैं किस तरह का व्यक्ति हूँ?’ अब तुमने समस्या को पहचान लिया होगा और खुद को कुछ हद तक जान लिया होगा। थोड़ा ज्ञान हो जाने पर, क्या तुम्हें रुक जाना चाहिए? क्या अपने पापों को स्वीकार कर लेने से तुम्हारा काम पूरा हो गया है? तुम्हें पश्चाताप करना होगा और खुद में पूरी तरह बदलाव लाना होगा!” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है”)। परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना ने मुझे एहसास कराया कि मैं फिर से लापरवाह बन रहा हूँ; कि मैं एक बार फिर, देह-सुख की तरफ़ भाग रहा हूँ और जैसे तैसे काम निपटाने की कोशिश कर रहा हूँ। साथ ही, मेरे दिल में यह बात स्पष्ट थी कि अगर मैंने गंभीर मसलों को नहीं पहचाना और योजनाबद्ध तरीके से सहभागिता नहीं की, तो यकीनन इसका असर प्रभावशीलता पर पड़ेगा। सर्वोत्कृष्ट प्रभाव हासिल करने के लिये, मुझे देह-सुख का त्याग करना पड़ेगा। परिणामस्वरूप, मैंने इस पर बहुत विचार किया और उन समस्याओं की एक सूची बनाई जिन पर सबसे पहले ध्यान देने की ज़रूरत थी। हालाँकि यह सब करते-करते बहुत रात हो गई, लेकिन मैंने अपने दिल में एक दृढ़ता महसूस की। अगले दिन, हम लोग इकट्ठे हुए और हमने मौजूदा समस्याओं पर सहभागिता की। सभी भाई-बहनों ने ज़ोरदार तरीके से नए मार्ग और उपायों का अनुमोदन किया। मैंने जब यह देखा कि जिन समस्याओं ने हमें एक अर्से से परेशान कर रखा था, उनका समाधान हो गया है, और हर कोई आज़ादी महसूस कर रहा है, तो मेरे दिल को बड़ा सुकून मिला। उसके बाद, हम लोगों ने नए मार्ग और उपायों के अनुसार अभ्यास करना शुरू किया। सुसमाचार का काम धीरे-धीरे प्रभावी होने लगा। मैंने पूरे दिल से परमेश्वर को धन्यवाद दिया।

इस अनुभव के बाद, मुझे सचमुच इस बात का एहसास हुआ कि शैतान ने मुझे कितनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया था। मेरे अंदर न तो ज़मीर बचा था, न ही तर्क-बुद्धि; हालाँकि ऊपरी तौर पर तो मैंने चीज़ों का त्याग करने और ख़ुद को खपाने के काबिल था—यहाँ तक कि कुछ मामलों में तो कीमत भी चुका दी थी—लेकिन चूँकि न तो मैंने सत्य हासिल किया था, न जीवन, इसलिये अभी भी भ्रष्ट स्वभाव ने मुझ पर कब्ज़ा कर रखा था। मेरी कपटी और चालाक प्रकृति ने मुझे अपने हितों के अलावा बाकी सब के लिए अंधा बना रखा था, वही मुझे हर पल संचालित कर रही थी। मैं सब-कुछ केवल अपने लाभ के लिये करता था। अपने कर्तव्यों के निर्वाह में, मैं हमेशा धूर्तता करता था और परमेश्वर को छलता था; मुझे इस बात का ज़रा-सा भी एहसास नहीं था कि एक सृजित प्राणी को परमेश्वर के प्रेम की कीमत चुकानी चाहिये और उसकी इच्छा का ख़्याल रखना चाहिये। शुक्र है परमेश्वर के प्रकाशन का, मैं देखा पाया कि मैं कितना नीच और अधम हूँ, मेरे अंदर इंसानियत नाम की कोई चीज़ नहीं थी। खास तौर से जब मैंने यह सोचा कि मेरी लापरवाही की वजह से परमेश्वर के घर को कितना नुक्सान हुआ है, तो मुझे महसूस हुआ कि मैं बिल्कुल भी विश्वासपात्र नहीं हूँ, मैं परमेश्वर को ठेस पहुँचाने वाला इंसान हूँ। मुझे अपने आपसे और भी ज़्यादा घृणा हो गई। मेरे अंदर इस बात की ख्वाहिश और भी अधिक ज़ोर मारने लगी कि मेरा भ्रष्ट स्वभाव दूर हो और मैं परमेश्वर के द्वारा बचाया जाऊँ। परमेश्वर मेरा न्याय करने और मुझे ताड़ना देने के लिये और भी परिवेशों की व्यवस्था करे, ताकि मैं जल्दी से जल्दी अपने कर्तव्य के निर्वाह में परमेश्वर के दिल को संतुष्ट कर सकूँ।

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