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किसी व्यक्ति को उसके रूपरंग से नहीं पहचाना जा सकता

यांग रुई युसी शहर, शांग्जी प्रांत

अपने दिल में, मैंने हमेशा अपने पिता को एक अच्छा इंसान माना था। लेकिन एक दिन, अचानक मैंने सुना कि मेरे पिता को कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया है। मैं उस समय बिल्कुल भौंचक्की रह गई थी और इसे समझ नहीं सकी थी। मेरे दिल में, मेरा पिता दुनिया का सबसे महान आदमी था। भले ही उनका गुस्सा बुरा है, फिर भी वह हम बहनों की अच्छी देखभाल करता था और कभी भी हमें मारता या डाँटता नहीं था। हमारे परिवार के संघर्षों के बावजूद, वह हमें कभी भी हमें रुष्ट नहीं होने देता था, चाहे उसे कितनी ही पीड़ाएँ क्यों न सहनी पड़ें। हमारे पूरे परिवार के परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लेने के बाद, मेरा पिता अपने कर्तव्य को पूरा करने में अग्रसक्रिय हो गया था, और अक्सर हमें भी हमारे खुद के कर्तव्यों को उचित रूप से पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया करता था। भले ही कभी—कभी मेरा पिता थोड़ा क्रूर हो जाता था, लेकिन जैसे ही पूरा करने के लिए कोई कर्तव्य होता, तो हवा और बारिश या कठिनाई की हद की परवाह किए बिना, वह उसे पूरा करने का रास्ता खोज लेता। ऐसे अच्छे व्यक्ति को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? अगर वह उद्धार हासिल नहीं कर सकता है, तो कौन कर सकता है? इस स्थिति ने मेरे दिल को क्रोध और द्वंद्व से भर दिया था, क्योंकि मुझे लगता था कि कलीसिया ने मेरे पिता के साथ उचित बर्ताव नहीं किया था। यद्यपि, मैंने यह नहीं कहा था, लेकिन मुझे दिल को शांत रखने में कठिनाई हो रही थी और मैं संताप में तड़प रही थी।

कुछ दिन पहले, मैंने परमेश्वर के वचनों में से निम्नलिखित को पढ़ा: “ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों के विश्वास में, तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी मसीह के साथ अपनी संगति में, तुम सच नहीं बोल सकते हो, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी हो। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ तुम्हारा सामंजस्य नहीं है, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने पिता, माता और घरवालों की अच्छी देखभाल की हो, तब मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। बस इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम करते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं?” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं”)। परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने के बाद, मैं धीरे-धीरे समझ गई कि: यह देखने के लिए कि क्या कोई व्यक्ति धार्मिक है या बुरा, यह मत देखो कि क्या उसका बाहरी बर्ताव अच्छा है या बुरा, या दूसरे लोगों के साथ उसका संबंध कैसा है। बल्कि, परमेश्वर के साथ उसके संबंध पर विचार करो, और क्या वे सच में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं और उससे डरते हैं और क्या वे परमेश्वर के संगत हैं। किसी का दूसरों के साथ अच्छा संबंध हो सकता है, वो अक्सर दूसरों की मदद और उनके संग प्रेम का व्यवहार कर सकता है लेकिन अगर वो परमेश्वर के संगत नहीं हो सकता, अगर वो अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण नहीं करता है, अगर वो अपने कर्तव्य में अपने निजी मतलबों की मिलावट करता है, और अगर वो तब परमेश्वर के कार्य की आलोचना करता है जब वह उसकी धारणा के अनुरूप नहीं होता है, तो वह इन्सान पाखंडी है। वे कपटी, दो-मुंहे दुष्ट इंसान हैं। इस समझ के साथ मैं अपने पिता की कुछ अभिव्यक्तियों को याद करने लगी: अपने पहले के संप्रदाय में, मेरा पिता एक अगुआ था। परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्वीकार करने के बाद, इस कलीसिया के भाइयों और बहनों ने उसे एक अगुआ के रूप में नहीं चुना क्योंकि उनकी प्रकृति बहुत ज्यादा अहंकारी थी। भले ही वह ऊपरी तौर पर आज्ञाकारी लगता था और उसे जो भी कहा जाता था वह करता था, लेकिन उनका छिपा हुआ मकसद एक बार फिर से अगुआ के “सिंहासन” पर बैठने में समर्थ होना था। बाद में, जब उनकी इच्छा साकार नहीं हुई, तो उसने अपना असली रंग दिखा दिया, वह कलीसिया में हमेशा ही बेहद दंभी बर्ताव करता, कभी किसी की नहीं सुनता, और चाहे कुछ भी हो जाए हमेशा जबरदस्ती लोगों को अपनी बात सुनाता था। अगर वह किसी भी ऐसे कार्यकर्ता को देखता जो उसे पसंद नहीं था, तो वह उसकी आलोचना, उसका अपमान करता और उसे नीचा दिखाता। वह भाई-बहनों के मध्य बैर के बीज बोता था, कलीसियाई जीवन को बुरी तरह बाधित और अस्त-व्यस्त करता था। कई बार, अगुआ और कार्यकर्ता उसके साथ सत्य के बारे में संगति करते थे, उसकी कटाई-छंटाई करते थे और उसे चेतावनी देते थे- लेकिन वो पूरी तरह बेखबर बना रहा, पछतावा दिखाने की बात तो दूर है। क्या इस तरह का बर्ताव दुष्टतापूर्ण नहीं है? ठीक जैसा कि परमेश्वर ने कहा था: “मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे”)। परमेश्वर के वचनों के अनुसार, मेरे पिता का बर्ताव परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था का पालन नहीं करता था, और साथ ही कलीसिया में विघ्न पैदा कर रहा था। ताकत और पद के लिए संघर्ष करते हुए उसने हर प्रकार की दुष्टता की। इस तरह का सार वह है, जो परमेश्वर का विरोध करता है और जो शैतान का है। फिर भी, मैंने बाहरी तौर पर उसके आचरण का उपयोग किया, जैसे कि मेरी परवाह करना और मेरी देखभाल करना, अपने कर्तव्य पूरा करने में समर्थ होना, यह आँकलन करना कि वह एक अच्छा व्यक्ति है, यह सोचना कि कलीसिया को उसे निष्कासित नहीं करना चाहिए था। हालाँकि, बाहरी तौर पर उसके अच्छे कर्म परमेश्वर का आज्ञापालन करने के बराबर नहीं थे और इसके अतिरिक्त धार्मिक नहीं कहे जा सकते हैं। केवल वे ही जो सचमुच में परमेश्वर के आयोजन का पालन करते हैं और इच्छापूर्वक परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करते हैं, और स्वभावात्मक परिवर्तन का प्रयास करते हैं, उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। मेरा पिता आज जिस स्थिति में पड़ा है, उसके लिए वह स्वयं ही दोषी है। यह उसकी भयानक प्रकृति के कारण था और दोष देने के लिए उसके पास खुद के अलावा और कोई नहीं था। इसके अलावा, यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति थी।

हे परमेश्वर! मेरे ग़लत दृष्टिकोण को बदलने के लिए इस वातावरण का उपयोग करने और मुझे सच के इस पहलू को देने के लिए, और मुझे तेरी पवित्रता दिखाने और यह दिखाने के लिए तेरा धन्यवाद कि तेरे धार्मिक और प्रतापी स्वभाव का अपमान किसी के द्वारा भी अवश्य नहीं किया जाना चाहिए। इससे मैं यह समझ गई हूँ कि मैं सच के बिना चीजों में अंतर नहीं कर सकती हूँ या उनकी असलियत का पता नहीं लगा सकती हूँ। अब से, मेरे साथ चाहे कुछ भी घटित क्यों न हो, मैं किसी भी व्यक्ति का उसके बाहरी प्रकटन के आधार पर आँकलन नहीं करूँगी। मुझे सत्य का परिप्रेक्ष्य लेना है और तू जो भी करता है वह सब स्वीकार करना है। भले ही तू जो चीजें करता है, मैं उसकी असलियत का पता नहीं लगा सकती हूँ, लेकिन मैं विश्वास करूँगी कि तू जो कुछ भी करता है, वह सही है। मैं अब से एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण और परीक्षण नहीं करूँगी। मैं तेरी गवाही देने के लिए खुद को लगातार सतर्क रखते हुए, सत्य के पक्ष में खड़ी रहूँगी।

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