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मैंने दूसरों के साथ काम करना सीखा

ल्यू हेंग यांग्सी प्रांत

परमेश्वर के अनुग्रह से, मैंने कलीसिया का अगुआ होने का उत्तरदायित्व लिया। उस समय, मैं बहुत उत्साहित थी और मैंने परमेश्वर के समक्ष एक संकल्प निर्धारित किया था: चाहे मैं किसी भी चीज़ का सामना क्यों न करूँ, मैं अपने उत्तरदायित्वों का त्याग नहीं करूँगी। मैं दूसरी बहन के साथ अच्छी तरह से काम करूँगी और एक ऐसी व्यक्ति बनूँगी जो सत्य का अनुसरण करने का प्रयास करती है। किन्तु मैंने केवल संकल्प ही लिया था, और नहीं जानती था कि एक सामंजस्यपूर्ण कामकाजी रिश्ते की वास्तविकता में कैसे प्रवेश कहूँ। जब मैंने पहली बार उस बहन के साथ कलीसिया के मामलों को व्यवस्थित करना शुरू किया जिसके साथ मैं काम कर रही थी, और जब हममें मत भिन्नता होती थी, तो मैं अपने हृदय और आत्मा की रक्षा करने के लिए कहते हुए परमेश्वर से होशहवाश में प्रार्थना करती थी ताकि मैं अपने साथी को दोष न दूँ। हालाँकि, मैंने केवल अपने व्यवहार को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया था ताकि मेरे साथी के साथ मेरा कोई टकराव न हो, इसीलिए मैंने सत्य में प्रवेश नहीं किया था। इसलिए, समय के साथ, उस बहन के साथ मेरी असहमतियाँ बढ़ती गईं। एक बार मैं एक बहन को नए विश्वासियों की सिंचाई के कर्तव्य में प्रोन्नत करना चाहती थी और जिस बहन के साथ मैं काम कर रही थी, उसने कहा कि वह बहन अच्छी नहीं है। जब मैंने अपने उम्मीदवार को बदल दिया उसके बाद भी उसने कहा कि यह अच्छा नहीं हुआ। मैं तुरंत विचलित हो गई और मैंने गुस्से में कहा: "कोई भी अच्छी नहीं है, केवल तुम अच्छी हो!" परिणामस्वरूप, मैंने इस मामले को फिर कभी नहीं उठाया। जब उसने इसके बारे में पूछा, तो मैंने क्रोध में कहा: "तुम जिसे भी चाहो उसे चुन लो! मुझे परवाह नहीं है!" इसके बाद, इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या कहती थी, यदि कोई असहमति होती, तो मैं कुछ नहीं कहती थी, और मैं यह सोचकर अपने विचार दबा देती थी कि इस प्रकार से मैं टकराव को रोक सकती हूँ। कभी-कभी जब इसे अंदर दबाए रखना असहनीय हो जाता था, तो मैं कहीं जा कर छुप जाती और रोती, मुझे लगता था कि मेरे साथ ग़लत हुआ है। मैंने ये तक सोचा कि: क्या तुम सक्षम नहीं हो? तो फिर इसे स्वयं करो! मैं तुम्हें स्वयं को मूर्ख बनाते हुए देखूँगी! बाद में एक बार, ऊँचे स्तर के एक अगुआ ने मुझे एक काम करने को सौंपा। पूरा मामला मेरे स्वयं के द्वारा तय किया गया था और इसकी मेरे द्वारा व्यवस्था की गई थी, और मुझे इससे काफ़ी संतुष्टि महसूस हुई थी। मुझे लगता था कि जिस बहन के साथ मैं काम कर रही थी वह मेरी प्रशंसा करेगी और मुझे सांत्वना देगी। अनपेक्षित रूप से, मेरी साथी ने इसे इस तरह अस्वीकृत कर दिया जैसे कि मुझ पर ठंडा पानी उँड़ेला जा रहा हो: "यह इसे करने का सही तरीका नहीं है।" इसने मुझे सचमुच चिढ़ा दिया था। मैं सोचती थी कि: तुमने वास्तविक स्थति को समझा भी नहीं और उसे तेजी से अस्वीकार कर दिया। यह बहुत अहंकार पूर्ण है! परिणामस्वरूप, हम दोनों अपनी-अपनी राय पर टिके रहे और हम में से कोई भी एक दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं था। इसके बाद, मैं परमेश्वर के वचन के संवाद को सुनती भी नहीं थी। जितना अधिक मैं इसके बारे में सोचती, उतना ही अधिक मुझे लगता था कि वह गलत है। वही अपनी वरिष्ठता का लाभ उठाकर जानबूझ कर मेरे लिए चीज़ें मुश्किल बना रही थी। मैं इस बारे में भी सोचती थी कि कैसे मैंने उसे बार-बार बर्दाश्त किया था, फिर भी वह मेरे साथ इस तरह से व्यवहार करती थी। …मैं इसके बारे में जितना अधिक सोचती उतना ही अधिक मुझे तब तक लगता था कि मेरे साथ ग़लत हुआ, जब तक कि मैं पूरी तरह से अंधकार में नहीं पहुँच जाती थी और पवित्र आत्मा के कार्य को खो नहीं देती थी। उस समय से, मैं उसके साथ काम करने को तैयार नहीं थी। मैं सोचती थी कि: क्योंकि इससे निपटना मुश्किल है, इसलिए मैं बस इससे दूर रहूँगी। उस समय मैं यह भी जानती थी कि इस प्रकार की स्थिति काफ़ी ख़तरनाक है। मैं सोचती थी कुछ बुरा करने से बचने के लिए जितनी जल्दी संभव हो कर्तव्यों को बदलने का अनुरोध करना बेहतर रहेगा। परिणामस्वरूप, मैंने अपना त्यागपत्र लिखने के लिए अपनी छोटी कद-काठी और अक्षमता को अपना त्यागपत्र लिखने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग किया। शीघ्र ही, उच्च स्तर के अगुआ ने मेरे साथ असफलता को स्वीकार करने और त्यागपत्र देने के सिद्धांत के बारे में और साथ ही लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के महान सोच-विचार के बारे में संवाद किया। लेकिन मैंने अपने हृदय को कठोर बना लिया था और मैं नरम नहीं पड़ी।

अगली सुबह जब मैं बिस्तर से उठी, तो मेरा दिमाग़ पूरी तरह से खाली था। यहाँ तक कि जब मैं प्रार्थना करती थी तब भी मुझे परमेश्वर का एहसास नहीं होता था और मुझे लगता था जैसे परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है। मैं डर गई और घबरा गई; निश्चित रूप से यह मेरा आचरण था जिसकी वजह से परमेश्वर मुझसे घृणा करता था। परिणामस्वरूप, मैंने स्वयं की जाँच करनी शुरू की। जो कुछ हुआ था उसके बारे में जब मैंने विचार कर लिया उसके बाद, मैं यह देखने में समर्थ हुई कि मेरे स्वभाव की वजह से परमेश्वर मुझ से घृणा करता था। मेरे विचार और मेरे कार्य पूरी तरह से एक अविश्वासी के समान थे। मैं एक अविश्वासी के समान जी रही थी, जो अपरिवर्तित रहता था। परमेश्वर का वचन मेरे आचरण में नहीं था और परमेश्वर के प्रति मुझमें कोई श्रद्धा नहीं थी। मैं बस एक ऐसी व्यक्ति नहीं थी जिसने सत्य को स्वीकार किया था। परिणामस्वरूप, मुझे शैतान के द्वारा झाँसा दिया गया था और मैंने अनजाने में अपने उत्तरदायित्वों को त्याग दिया था। इस बारे में अवगत होने के बाद, मैंने तुरंत परमेश्वर के समक्ष दण्ड़वत प्रणाम किया और पश्चाताप किया कि: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं ग़लत हूँ। मैंने तुझ पर विश्वास किया है, लेकिन मैं तेरे काम का अनुभव करने की इच्छुक नहीं रही हूँ। तूने मेरे माहौल की व्यवस्था की और मैं इसे स्वीकार करने की इच्छुक नहीं रही हूँ; मैं पूरे मन से तेरी ताड़ना और न्याय से बचना चाहती थी, और जब तेरा प्रेम मुझ पर आया, तो मैं न केवल कृतघ्न थी, बल्कि मैंने तुझसे शिकायत भी की और तुझे गलत भी समझा। मेरे आचरण ने तुझे चोट पहुँचाई है। हे परमेश्वर, तेरे काम में मुझे प्रकट करने के लिए और मेरे भीतर उपस्थित शैतान के स्वभाव को पहचानने देने के लिए मैं तेरा धन्यवाद करती हूँ। यदि ऐसा नहीं होता, तो मैं अब भी यही सोचती कि मैं बुरी नहीं थी। अब मैं देखती हूँ कि मेरी कद-काठी वास्तव में बहुत छोटी है। मैं यहाँ तक कि छोटी-छोटी असफलताएँ भी नहीं सँभाल सकती हूँ। जब भी मुझे पसंद न आने वाली कोई छोटी-सी घटना होती है, तो मैं तुझे धोखा देना चाहती हूँ। मैंने उस शपथ का त्याग कर दिया जो मैंने तुझसे की है। हे परमेश्वर, मैं पश्चाताप करने की इच्छुक हूँ; मैं तेरे वचनों के माध्यम से अपने आप को जानने की इच्छुक हूँ और तेरे वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने की इच्छुक हूँ। मैं इस माहौल में तेरे प्रति समर्पित होने और उस बहन के साथ अच्छी तरह से कार्य करने की इच्छुक हूँ। हे परमेश्वर, मैं शैतान के प्रभुत्व में अब और रहने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से बाधित होने की इच्छुक नहीं हूँ। मैंने अपना त्यागपत्र वापस लेने का मन बना लिया है। मैं अपनी गरिमा के लिए जीने की अब और इच्छुक नहीं हूँ, किन्तु मैं एक बार तुझे संतुष्ट करने की इच्छुक हूँ!" प्रार्थना करने के बाद, मैं रोने लगी थी और इसके तुरंत बाद ही मैंने अपना त्यागपत्र वापस लिया और उसे उसी जगह टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उस दिन जब हम इकट्ठे हुए, तो हम में से कुछ लोग मिलजुल कर परमेश्वर के वचन को एक साथ पढ़ रहे थे: "तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग खराब है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता डूबकर नीच अधमता में पहुँच गई है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!')। "लोग स्वयं से तो बहुत ज़्यादा अपेक्षा नहीं करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर से बहुत अपेक्षा होती है। वे परमेश्वर से उन पर विशेष कृपा दर्शाने और उनके प्रति धैर्यवान और सहनशील होने, उन्हें दुलारने, उनका भरण पोषण करने, उन पर मुस्कुराने, और कई तरीकों से उनकी देखभाल करने के लिए कहते हैं। वे अपेक्षा करते हैं की वो उनके प्रति बिल्कुल भी सख़्त न हो या ऐसा कुछ भी न करे जिससे उन्हें ज़रा सा भी परेशानी हो, और वे केवल तभी संतुष्ट होते हैं यदि वह हर एक दिन उनकी खुशामद करता है। मनुष्य में विवेक की कितनी कमी है!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकी होते हैं')। परमेश्वर का वचन पूरी तरह से मेरी शर्मनाक स्थिति और शैतान-जैसे स्वरूप को प्रकाश में ले आया था। मैं इतनी शर्मिंदा थी कि मैं धरती में समा जाने के लिए एक दरार चाहने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती थी। परमेश्वर के वचन के प्रकाशन और प्रबुद्धता के माध्यम से, मैं देख पा रही थी कि मेरे भीतर शैतान का स्वभाव बहुत गंभीर था। मेरा ऐसा अभिमानी और अहंकारी स्वभाव था कि मुझे लगता था कि मैं अन्य लोगों से बेहतर हूँ। मुझ में थोड़ी-सी भी आत्म-जागरूकता नहीं थी; मैं नहीं समझती थी कि मैं बेहतर नहीं हूँ। इसलिए, जब मैं उस बहन के साथ काम कर रही थी, तो मैं हमेशा सोचती थी कि मैं प्रभारी हूँ, कि मैं अगुआ हूँ। मैं उत्सुक थी कि वह बहन हर चीज़ में मेरा अनुसरण करे और मेरी बात सुने। मैंने हमेशा सोचती थी कि मैं अगुआ हूँ। जब बहन की राय मेरी राय से टकराती थी, तो मैं टकराव का समाधान करने के लिए या आम सहमति पर पहुँचने के लिए सत्य की तलाश नहीं करती थी। बल्कि, मैं अपनी मनःस्थिति खो देती थी और एक रवैया अपना लेती थी क्योंकि मैं इस हद तक अपना सम्मान गँवा बैठती थी कि मैं अपनी कुण्ठाओं को निकालने के लिए अपना काम छोड़ने के लिए तैयार हो जाती थी। मैंने उस बहन के बारे में पूर्वाग्रही विचार बना लिए थे और हमारे बीच के खराब संबंधों को सुधारने के लिए कभी भी पहल करने की नहीं सोचती थी। जब हम एक साथ काम कर रहे थे, तो मैं हमेशा अकड़ दिखाती थी। मैं स्वयं को बदलने की आवश्यकता नहीं समझती थी, मैं बहन के साथ घनिष्ठ रूप से बात करने से घृणा करती थी। मैं उस पर ध्यान केंद्रित करती थी और उससे अपेक्षा करती थी कि वह स्वयं को बदले। मैं स्वयं को सत्य का मालिक मानती थी और अन्य लोगों को भ्रष्ट के रूप में देखती थी। एक साथ काम करने की पूरी प्रक्रिया के दौरान, मैंने स्वयं की जाँच नहीं की। जब उस बहन का रवैया ख़राब होता था, या जब हमारे बीच मत-भिन्नता होती, तो मैं सभी दोष उठा कर अपनी साथी पर डाल देती थी। मैं मानती थी कि वह ग़लत थी और मैं सही थी, इसलिए मैं इस हद तक अपने दिल में उसका अनादर करती थी और उसके विरुद्ध भेदभाव करती थी कि मैं उसे एक शत्रु की तरह समझती थी, और चाहती थी कि मेरी साथी स्वयं का मज़ाक बना ले। मेरे अहंकार, बर्बर घमंड, बुद्धिहीनता और शोचनीयता, और साथ ही मेरे संकीर्ण मानसिकता वाले व्यवहार को देखने पर, मुझमें कोई सामान्य मानव समझ कैसे बच सकती थी? मैं पूरी तरह अविवेकी थी! परमेश्वर ने मुझे अनुग्रह दिया और मुझे उत्तरदायित्व लेने का अवसर दिया था, किन्तु मैंने परमेश्वर को संतुष्ट करने के अपने कर्तव्यों पर उस बहन के साथ अच्छी तरह से काम करने के बारे में नहीं सोचा था। पूरे दिन, मैं ईमानदारी से कार्य नहीं करती थी, मैं उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचती, और उसके साथ ईर्ष्यापूर्ण विवाद करती। पूरे दिन मैं केवल अपनी स्वयं की परिवेदनाओं के बारे में कलह करना और अपने बड़प्पन और घमंड पर लगातार लड़ना जानती थी। क्या मेरा अंतःकरण तर्कसंगत था? क्या मैं एक ऐसी व्यक्ति थी जो सत्य की खोज करती थी? आरंभ से ही, मैं और वह बहन एक दूसरे के प्रति समर्पण नहीं करते थे और न ही अपने कार्य में एक दूसरे को सहारा देते थे; बल्कि, हमने अपने दम पर प्रभार ले लिया और अपने-अपने काम करते थे। क्या मैं मसीह-विरोधी मार्ग पर नहीं थी? क्या चीज़ों को इस तरह से करना आत्म-विनाश की ओर बढ़ना नहीं था? आज, मैं यह देख पा रही हूँ कि मेरा आचरण देह की स्वार्थी इच्छाओं के बारे में था। मेरा स्वभाव बहुत स्वार्थी और दुःखद था। मैंने कभी सत्य का इस हद तक अनुसरण नहीं किया कि परमेश्वर पर कई वर्षों का मेरा विश्वास भी मेरे लिए कुछ वास्तविक नहीं लाया था और मेरे स्वभाव में थोड़ा-सा भी बदलाव नहीं आया था। परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है कि हम अपने जीवन में उसके वचनों को अभ्यास में लाएँ, फिर भी मैं अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में स्वयं को इससे दूर रखती हूँ। मैं वास्तव में एक अविश्वासी हूँ! मैं इस तरह से नहीं जी सकती थी, मैं सत्य को तलाशने और स्वयं को रूपांतरित करने की इच्छुक थी।

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचन को पढ़ा जो कह रहे थे: "अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। … परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। … तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो')। एक उपदेश में यह कहा गया था कि: "समन्वय के साथ सेवा करने में कोई मुख्य अथवा उप भूमिका नहीं होती है। हर कोई एक समान स्थिति में होता है, और सिद्धान्त होता है सत्य की संगति करने के माध्यम से एक सर्वसम्मति प्राप्त करना। यह एक दूसरे का आज्ञापालन करना लोगों के लिए आवश्यक बनाता है। अर्थात्, जो कोई भी सही ढंग से बोलता है और सत्य के अनुसार बोलता है उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए। सिद्धान्त है सत्य का पालन करना। सत्य अधिकार है, और जो कोई भी सत्य के अनुरूप किसी भी चीज़ की संगति कर सकता है और चीज़ों को परिशुद्धता से देख सकता है उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि लोग क्या करते है या वे कौन से कर्तव्य को पूरा करते हैं, सत्य का पालन करना हमेशा सिद्धान्त रहता है" (कार्य व्यवस्था)। संगति और परमेश्वर के वचन से, मैंने देखा कि सेवा में समन्वयता को अभ्यास में कैसे लाया जाना चाहिए। अर्थात्, परमेश्वर की इच्छा के बारे में विचारशील होना और मिलजुल कर काम करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित की रक्षा करना। इस बात की परवाह किए बिना कि क्या किया जा रहा है या कार्य क्या है, उसे एक आम सहमति तक पहुँचने के लिए सत्य का संवाद करके सत्य के प्रति समर्पण करके किया जाना चाहिए। तुम इतने अभिमानी और अहंकारी नहीं हो सकते हो कि तुम अपनी राय बनाए रखो और दूसरों को अपनी बात सुनाओ, और तुम अपने अंतर्वैयक्तिक संबंधों को बचाने के लिए सत्य को नहीं बेच सकते हो। इसके अलावा, तुम स्वतंत्रता का निर्माण करने के लिए वैयक्तिकता का अनुसरण नहीं कर सकते हो, तुम्हें अवश्य स्वयं को विनम्र करना चाहिए और स्वयं को इनकार करने की, एक दूसरे से सीखने की, और एक सामंजस्यपूर्ण कार्य संबंध बनाने के लिए एक दूसरे की कमज़ोरियों की भरपाई करने की पहल करनी चाहिए। केवल इस प्रकार के सच्चे कामकाजी रिश्ते में प्रवेश करके, एक हृदय और एक मन के साथ हर चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करके, और एक दूसरे की कमज़ोरियों की भरपाई करके ही तुम परमेश्वर के आशीषों और मार्गदर्शन को प्राप्त कर सकते हो, जिससे कलीसिया को इसके काम में बेहतर परिणामों तक पहुँचा सकते हो जबकि अपने जीवन को भी लाभान्वित कर सकते हो। इसके विपरीत, यदि मिलजुल कर कार्य करते समय तुम अहंकारी रहते हो, यदि तुम सत्य के सिद्धांत की खोज नहीं करते हो और दूसरों को नियंत्रित करने के लिए एक तानाशाही रूप धारण करते हो, या यदि तुम अकेले कार्य करते हो और चीज़ों को करने के लिए स्वयं पर ही निर्भर करते हो, तो तुम परमेश्वर की घृणा से पीड़ित रहोगे और परमेश्वर के कलीसिया के लिए नुकसान का कारण बनोगे। फिर भी मैं अभिमानी थी और हमेशा अपनी बात मनवाना चाहती थी। मुझे कैसे पता नहीं था कि परमेश्वर के परिवार का काम कुछ ऐसा नहीं था जिसे कोई अकेला व्यक्ति पूरा कर सकता था? सभी लोगों के पास सत्य नहीं होता है और उनमें बहुत अधिक अभाव होता है। कुछ करने के लिए स्वयं पर ही निर्भर होने से दुर्घटनाएँ होने की संभावना बढ़ जाती है। केवल सहकारी कार्य के माध्यम से ही हमारी कमियों को पूरा करने और गलतियों को रोकने के लिए पवित्र आत्मा का अधिक कार्य प्राप्त किया जा सकता है। उस समय, मैं अपने अभिमान और स्वार्थ में उजागर शैतान के स्वभाव के कारण, और परमेश्वर की इच्छा के लिए थोड़ा-सा भी विचार न करने के कारण, और साथ ही अपमानित न होने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए चौंकाने वाले और अशिष्ट व्यवहार को दर्शाने के स्तर तक जाने के लिए अपराध-बोध और आत्म-दोष महसूस करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती थी। मेरा मानना है कि मैं बहुत विवेकशून्य और मूर्ख थी, और सेवा में समन्वय का अभ्यास करने के लिए मेरे लिए एक ऐसे माहौल की व्यवस्था करने के परमेश्वर के इरादे को मैं नहीं समझी थी—यहाँ तक कि इस स्तर तक कि मुझे इस बात की भी जरा सी समझ नहीं थी कि अपनी कमियों की क्षतिपूर्ति करने के लिए मेरी साथी की खूबियों से कैसे सीखा जाए या मिलजुल कर कार्य करने के माध्यम से उस चीज़ को कैसे सीखा जाए जिसकी मुझे आवश्यकता है। परिणामस्वरूप, इससे कलीसिया को नुकसान हुआ और जीवन में मेरी अपनी वृद्धि में विलंब हुआ। आज, परमेश्वर की दया के बिना और परमेश्वर के वचन के प्रकाश के बिना, मैं अपने आप को छोड़ने में असमर्थ होती और मैं नहीं जान पाती कि मैं किसी भी तरह से बेहतर नहीं हूँ। मैं अभी भी यही चाहती कि दूसरे मेरी बात सुनें, मानो कि कलीसिया के काम को अच्छी तरह से करने के लिए मैं स्वयं पर भरोसा कर सकती हूँ। अंत में, कौन जानता है कि किस प्रकार की आपदाएँ टूट पड़ती? परिणामस्वरूप, मैंने एक संकल्प स्थापित किया कि: मैं परमेश्वर के वचन के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार हूँ, मैं कलीसिया के कार्य के लिए और जीवन में अपने विकास के लिए उस बहन के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से काम करने को तैयार हूँ और अपने हितों के बारे में अब और नहीं सोचूँगी।

इसके बाद, मैंने उस बहन से खुलकर बात की, जिसके साथ मैं काम करती थी, कि मैंने किस तरह से स्वयं को जाना था। हमने सच्चाई से संवाद किया और मिलजुल कर सेवा करने के सिद्धांत में प्रवेश किया। उसके बाद, हमारा काम और अधिक सामंजस्यपूर्ण था। जब हमारी राय भिन्न होती, तो हम सत्य के लिए प्रार्थना करते थे और परमेश्वर की इच्छा की तलाश करते थे। जब हम एक दूसरे की कमियों को देखते, तो हम समझदार और क्षमाशील हो जाते थे; हम एक दूसरे के साथ प्रेम से व्यवहार करते थे। अनजाने में, हम परमेश्वर के आशीषों को महसूस करते थे और अतीत की तुलना में सुसमाचार के कार्यों के परिणाम बहुत अधिक प्रकट होते थे। इस समय, मैं अपनी उस भ्रष्ट प्रकृति से घृणा करने लगी थी जो मेरी थी; मुझे घृणा होती थी कि मैं सत्य की खोज नहीं करती थी और परमेश्वर को बहुत अधिक नीचा दिखाती थी। अंततः, मैंने सत्य को अभ्यास में लाने के मीठे स्वाद का अनुभव किया और मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के हृदय को शान्त करने के लिए अधिक शक्ति महसूस करती थी। अब से, मैं सत्य के अधिक पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए तैयार हूँ और जो कुछ भी मैं करूँ उसमें सिद्धांत रखना चाहती हूँ।

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