हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!

केवल सत्य में मैं स्वयं प्रवेश करके, वास्तव में दूसरों की सहायता कर सकता हूँ

डू फान जियांग्शु प्रान्त

अभी कुछ ही समय पहले, एक कलीसिया में एक नए अगुवे का चयन करने के लिए वोट दिए गए, परन्तु संचालक अगुवा वोटिंग कराने के अपने तरीके का इस्तेमाल करते हुए, कलीसिया के सिद्धान्तों के विरूद्ध चली गई। जब कुछ अन्य भाई-बहनों ने अपने विचारों को व्यक्त किया, तो न केवल उसने उन्हें अस्वीकृत किया, अपितु अपने ही तरीके को बनाए रखने पर जोर दिया। अगुवे की इस तरह की गतिविधियों के परिणामस्वरूप कलीसिया में भ्रम उत्पन्न हो गया। जब मुझे पता चला, तब मैं पूरी तरह से गुस्से में आ गया: कैसे कोई इतना अधिक अभिमानी और स्व-धर्मी हो सकता है? मन में परमेश्वर के न होते हुए कलीसिया के अगुआ के कर्तव्यों को पूरा करना, कार्य व्यवस्था को निम्न स्तर का आँकना, भाइयों और बहनों के सुझावों का खण्डन करना और उन्हें अस्वीकार कर देना—आपको छोड़, कलीसिया में भ्रम की स्थिति को उत्पन्न करने के लिए अन्य कौन उत्तरदायी है! मैंने तुरन्त ही किसी को कलीसिया के उस अगुवे से वार्तालाप करने के लिए भेज दिया और इसी बीच, परमेश्वर के वचनों को पढते हुए इन से सम्बन्धित सच्चाइयों को को खोज ने लगा ताकि मैं उस अगुवे को उसके तरीकों की गलती को समझा सकूँ। उस रात बाद में, मैं गया और उस अगुवे से मुलाकात की। मुलाकात के समय, अपने स्वयं के क्रोध को दबाने में असमर्थ रहते हुए, मैंने उस से आरोप लगाने वाले स्वर में बात की। मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी, कि हमारी बैठक में दस मिनट के पश्चात्, वह अचानक खड़ी हुई और आँखों में आँसू लिए बाहर चली गई। एक भाई जो उसका पीछा करते हुए गए थे थोड़ी देर बाद वापस आ गए और कहा, "वह चली गई है और उसे पता है कि उसने गलत किया है।" मैं कठोरता के साथ क्रोधित होते हुए चिल्लाया: "सिद्धान्त की इतनी महत्वपूर्ण बात के सम्बन्ध में आप बातों को अनसुलझा ही रहने देने के लिए तैयार हैं? आप कितने अभिमानी और स्व-धर्मी हैं! आप कलीसिया के सिद्धान्तों के विरूद्ध चले जाते हैं और किसी दूसरे को कुछ कहने ही नहीं देते हैं। भविष्य में आप किसी कार्य को किस प्रकार पूरा करने की अपेक्षा कर सकते हैं? यह कितना खतरनाक संभावनाहै! इससे काम नहीं चलेगा, अगरआप बिना बताए कमरे से तेजी से निकल जायेंगे, तो मुझे आपको एक पत्र लिखना ही पड़ेगा।" ठीक वही उसी समय, मैं बैठा और मैंने उसे एक पत्र लिखा जिसमें मैंने प्रतीकात्मक रूप से स्वीकार किया कि मुलाकात में मेरा व्यवहार आदर्श नहीं था और इसके लिए मैंने उनसे क्षमा की माँग की। पत्र में, मैंने उसकी समस्याओं के बारे में भी कहा, सिद्धान्तों का सन्दर्भ देते हुए समस्या को स्पष्ट किया। मैंने सोचा कि मैंने बहुत अच्छी तरह से चीज़ों का निपटारा कर दिया था। एक ओर तो, मैंने दिखाया कि मैं स्वयं के अहंकार को छोड़ने और स्वयं के प्रति गहन समझ की प्राप्ति के लिए सक्षम था, साथ ही उसी समय में मैं मुद्दों को सुलझाने के लिए सच्चाई का उपयोग कर रहा था। यह देखते हुए कि मैंने मुद्दों का कैसे निपटारा किया था, मैंने सोचा कि यह अगुवा निश्चित रूप से आश्वस्त हो जाएगी और नई समझ को प्राप्त करेगी।

एक बार, जब मैं इस मुद्दे पर अपने अगुवे के साथ बात कर रहा था, तो अगुवे ने मुझसे पूछा कि इस मुद्दे का समाधान करते समय मैंने सच्चाई में कैसे प्रवेश किया। "मैंने सत्य में कैसे प्रवेश किया? क्या मैंने कार्य को अच्छे से नहीं किया? क्या मेरी गतिविधियाँ अनुचित थीं?" मैने थोड़ा सा भ्रमित महसूस किया। वह अगुवा आगे बोलता रहा: "प्रश्न यह नहीं है कि आप किसी मुद्दे का कितनी अच्छी तरह से समाधान करते हैं, अपितु क्या आपने इस मुद्दे को सुलझाने में आपने अपनी प्रतिष्ठा और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों को मनाने के लिए किया था या क्या आपने सत्य को परमेश्वर की गवाही देने और बढ़ाने के लिए उपयोग किया, और अन्य लोगों को स्वयं की गहरी समझ को प्राप्त करने दिया? सतह पर तो ऐसा प्रतीत होता है, कि आप परमेश्वर के वचन से बात कर रहे थे, परन्तु वास्तविकता में आप उसे अपने ही दृष्टिकोण के सामने झुकाने का प्रयास कर रहे थे। वह अंतत: उठ कर क्यों चली गई थी? यह स्पष्ट है कि वह इसलिए चली गई थी क्योंकि वह आपके तर्क को स्वीकार नहीं कर सकी, वह आश्वस्त ही नहीं थी। यदि हम दूसरों के साथ मात्र सच्चाई के बारे में ही बातचीत करने में लगे रहें और स्वयं के भ्रष्टाचार के ऊपर ध्यान देने की उपेक्षा करें, स्वयं को जानने की उपेक्षा करें और मात्र कार्य करने के लिए कार्य करें, तब तो हम कुछ भी नया नहीं सीखेंगे और हमारे अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इस अर्थ में, क्या हम पौलुस के जैसे नहीं हैं, जिसने दूसरों को मार्गदर्शन दिया, परन्तु, जो परमेश्वर की सेवा में, अपने ही भ्रष्ट तरीकों में और अधिक वृद्धि कर गया? अपने अहंकार में, वह एक ऐसा व्यक्ति बन गया जो ईश्वर पर विश्वास तो करता था और तौभी ईश्वर का विरोध करता था, जिससे उसका अन्त नर्क में हुआ।" यह वार्तालाप मेरे लिए एक लम्बी नींद से जगाने के लिए पुकार की तरह थी। वास्तव में, जब परमेश्वर ने मेरे सामने इस परिस्थिति को प्रस्तुत किया, तब मैंने सत्य की खोज नहीं की या परमेश्वर के मनोरथ को जानने का प्रयास नहीं किया था, न ही इस बात पर विचार किया था कि सत्य में कैसे प्रवेश किया जाए या परिस्थिति के प्रति स्वयं की भावुक प्रतिक्रियाओं के बारे में चिन्तन किया। कुल मिलाकर जो मैं सोच सका था वह यही था, कि कैसे अन्य लोगों की समस्याओं का समाधान किया जाए। इस अर्थ में, क्या मैं दूसरों को परमेश्वर के सामने लाने की उसकी इच्छा का लिहाज कर रहा था? या इसके बजायमैं अपनी प्रतिष्ठा का उपयोग करके दूसरों को अपने दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहा था? मैं सत्य, तर्क या मानवता के बिना शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। मैं भी एक पीड़ित था। मैं कैसे किसी से अधिक अच्छा था? मुझे कोई स्व-ज्ञान नहीं था, सत्य की कोई समझ नहीं थी। बिना सोचे समझे, मैंने एक कठोर सुर को अपनाया था और अपने आपे को खो दिया था, दूसरों को व्याख्यान देने के लिए अपनी प्रतिष्ठा का उपयोग किया था। मेरा शैतानी अभिमान और दम्भ उजागर हो गया था! जब मेरी बहन रोती हुई बाहर चली गई, तब मैंने अपने कार्यों पर चिन्तन नहीं किया, इसकी अपेक्षा उससे चिढ़ कर क्रोध से भर गया। क्या मेरा व्यवहार बड़े लाल अजगर की दमनकारी गतिविधियों की तरह नहीं है?

उसके मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर का धन्यवाद। इस अनुभव ने मुझे सच्चाई की वास्तविकता में प्रवेश करने के महत्व पर प्रबुद्ध कर दिया। केवल सच्चाई की वास्तविकता में प्रवेश करके ही हम परमेश्वर की सुरक्षा को प्राप्त कर सकते और परमेश्वर का विरोध नहीं कर सकते हैं। एक उपदेश में ऐसे कहा गया था: "बहुत से लोग झूठे अगुवे या मसीह विरोधी बन जाते हैं क्योंकि वे वास्तव में सच्चाई का अनुसरण नहीं करते हैं और, परिणामस्वरूप, उनके पास सच्चाई की लेश मात्र वास्तविकता भी नहीं होती है। जैसे ही वे पदवी को और कुछ अधिकारों को प्राप्त कर लेते हैं, तो वे मनमर्ज़ी से काम करने लगते हैं, सबसे ऊपर खड़े हो जाते हैं, दूसरों पर रोब जमाने लगते हैं और हैसियत की आशीष का लालच करते हैं। अन्त में, ऐसे लोग घृणित ठहरते हैं और परमेश्वर के चुने हुओं द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते हैं, जिस से अन्तत: वे पूर्ण विफलता को प्राप्त करते हैं। क्या यह सम्भवतः एक दुर्लभ घटना हो सकती है? क्यों लोग होश में नहीं आ पाते हैं? पदवी के मुनाफों में मज़े करने और सत्ता का उपभोग और हैसियत की आशीष के लिए परमेश्वर पर विश्वास करने में क्या लाभ है? यह स्वार्थी, नीच और बुरे लोगों का व्यवहार है, यह उन लोगों की नीच इच्छा है जो मसीह विरोधी के मार्ग पर चलते हैं" (ऊपर से संगति)। इस अवतरण के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि जो लोग सच्चाई में प्रवेश नहीं करते हैं, वे प्रतिष्ठा प्राप्त करने पर स्वयं को राजा घोषित करेंगे और दूसरों को दबाने, अधीन रखने और नियन्त्रित करने के लिए अहंकार में अपनी पदवी का उपयोग करेंगे। वे अन्ततः झूठे अगुवे और मसीह विरोधी बन जाएँगे। यह सत्ता की सामर्थ्य नहीं है जिसने इन लोगों को नाश कर दिया है, अपितु सच्चाई की खोज में असफल रहने का अनिवार्य परिणाम है! यद्यपि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह अनुभव अधिक भयानक नहीं था, तथापि, परमेश्वर का विरोध करने में मेरी मानसिक अवस्था और सच्चा स्वभाव अविवादित रूप से उजागर करता है कि मैं मसीह के विरोधी होने के मार्ग पर चल रहा था। यदि मेरे पास परमेश्वर का मार्गदर्शन नहीं होता, तो मुझे निश्चित रूप से मेरी गलती का एहसास नहीं होता और अभी भी मैं स्व-धार्मिकता में ही जीता रहता। उस मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़ते हुए, मैं अन्ततः उजागर हो जाता और धीरे-धीरे समाप्त हो जाता! जब मैं सोचता हूँ कि चीज़ें कैसे घटित हो सकती थीं, तो यह मुझे सुन्न कर देता है। मैं किन खतरनाक रास्तों पर चल रहा था, इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करते हुए अभी भी यह जानने में असमर्थ हूँ कि कैसे वास्तविकता में प्रवेश कैसे करना है, पौलुस की तरह, जो सत्य की एक काल्पनिक अवधारणा के भीतर रहा, परन्तु उसने अपने स्वाभाविक चरित्र और भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार परमेश्वर पर विश्वास किया और उसकी सेवा करता रहा। यदि मैं अपनी वर्तमान अवस्था को नहीं उलटता, तो मैं स्वयं को अनन्त विनाश के लिए दोषी पा सकता हूँ। भविष्य में, मुझे व्यक्तिगत् रूप से सच्चाई की खोज और प्रवेश करने के ऊपर अधिक महत्व देना की आवश्यकता है।

इन सभी बातों के समाप्त होने के कुछ समय पश्चात्, मुझे एक बहन से एक पत्र मिला जिसकी शुरुआत इससे हुई कि उसे सच्चाई को समझने में परेशानी हो रही थी और उसने मेरे मार्गदर्शन की माँग की थी। पत्र को पढ़ने के पश्चात्, मैं पुन: गुस्से से भर गया: आप कितनी अभिमानी हैं! आप कलीसिया के अगुवों और कार्यकर्ताओं के साथ अच्छी तरह से सहयोग नहीं कर सकतीं। प्रत्येक बार जब वे आपको सुझाव देते हैं तो आप केवल बहाने बनातीं हैं, मनमाने तरीके से कार्य करते रहतीं हैं। सुसमाचार का वह कार्य जिसके लिए आप जिम्मेदार हैं उसमें आप असफल रहीं हैं और कलीसिया सदैव आपकी स्थिति पर रिपोर्ट दे रही है। आज आप मुझसे मार्गदर्शन को पाने के लिए लिख रहीं हैं: क्या आप निश्चित रूप से मेरे मार्गदर्शन को स्वीकार कर सकतीं हैं? आप सोचतीं हैं कि आपने जो कुछ किया है वह उचित और सही है और आपकी सभी विफलताएँ अन्य लोगों के द्वारा सच्चाई का अभ्यास करने में असमर्थ रहने के कारण हैं: कितनी अच्छी तरह आप वास्तव में स्वयं को जानते हैं? …और जितना अधिक मैंने सोचा, उतना अधिक मैं गुस्से से भरता चला गया, मैं अपने मन में गुस्से की ज्वाला को भड़कते हुए महसूस कर सकता था: क्या आपने मुझसे मार्गदर्शन देने की माँग नहीं की? मैं कुछ समय से आपके साथ बातचीत करना चाह रहा था, आज मुझे अन्त में अवसर मिल ही गया है। मैं अपने वर्तमान कार्य को किनारे किया और उसकी परिस्थिति से सम्बन्धित परमेश्वर के वचनों की खोज करने लगा, जिस से कि मैं उसे समझा सकूँ। हुआ यह कि, जितना अधिक मैंने उचित सन्दर्भों की खोज की, उतना ही मैंने इन्हें कम पाया–मैं इस बात के बारे में उलझन में पड़ गया कि वे सभी अनुच्छेद कहाँ गायब हो गए, जिनकी मेरे पास कुछ समझ थी। जब मैं उत्तेजित हो रहा था, मुझे अचानक एक फटकार सी प्रतीत हुई: वह स्थान कहाँ है जहाँ आप परमेश्वर के वचन की खोज करते हैं? यहाँ यह व्यक्ति आपके सामने है, आप सत्य में कैसे प्रवेश करेंगे? क्यों आप सदैव दूसरे लोगों की समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रयासरत् हैं? आपने स्वयं में क्या उजागर किया है? उस क्षण, मेरा दिल शांत हो गया और मैं मन में सोचने लगा: आप भूल भी गए हैं कि पिछली बार क्या हुआ था? मात्र कार्य करने के लिए कार्य को न करें-इससे पहले कि आप दूसरों की सहायता करने का प्रयास करें अपने स्वयं के मुद्दों का समाधान करें। इस समय, मैंने परमेश्वर के वचन के इस अवतरण के ऊपर पुन: विचार किया: "पहले तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा करके अपने भीतर की सभी कठिनाइयों को हल करना होगा। अपने पतित स्वभाव को छोड़ दो और अपनी अवस्था को वास्तव में समझने में सक्षम बनो और यह जानो कि तुम्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए; जो कुछ भी तुम्हें समझ में न आए, उसके बारे में सहभागिता करते रहो। व्यक्ति का खुद को न जानना अस्वीकार्य है। पहले अपनी बीमारी ठीक करो, और मेरे वचनों को खाने और पीने और उन पर चिंतन-मनन द्वारा, अपना जीवन मेरे वचनों के अनुसार जीओ और उन्हीं के अनुसार अपने कर्म करो; चाहे तुम घर पर हो या किसी अन्य जगह पर, तुम्हें परमेश्वर को अपने भीतर शक्ति के प्रयोग की अनुमति देनी चाहिए। … जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं जी सकता, क्या उसका जीवन परिपक्व हो सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। तुम्हें हर समय मेरे वचनों के अनुसार जीना चाहिए और मेरे वचनों को जीवन की आचार-संहिता बना लेना चाहिए, इससे तुम लोग महसूस करोगे कि इस आचार-संहिता के साथ व्यवहार करने से परमेश्वर आनंदित होता है, और ऐसा नहीं करने से परमेश्वर घृणा करता है; और धीरे-धीरे तुम सही मार्ग पर चलने लगोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 22')। "तुम्हें उन लोगों की समझ होनी चाहिए जिनके साथ तुम सहभागिता करते हो और तुम्हें जीवन में आध्यात्मिक मामलों पर सहभागिता करनी चाहिए; तभी तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति कर सकते हो और उनकी कमियों को दूर कर सकते हो। तुम्हें उनसे भाषण देने वाले अंदाज़ में बात नहीं करनी चाहिए; ऐसा दृष्टिकोण रखना मूलत: गलत है। सहभागिता में तुम्हें आध्यात्मिक मामलों की समझ होनी चाहिए, तुम्हारे अंदर बुद्धि होनी चाहिए और तुम्हें यह समझना चाहिए कि लोगों के दिल में क्या है। यदि तुम्हें दूसरों की सेवा करनी है, तो तुम्हें सही व्यक्ति होना चाहिए और तुम्हारे पास जो कुछ भी है उसके साथ तुम्हें सहभागिता करनी चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13')। पानी की तरह परमेश्वर के वचन स्पष्ट थे और इसने मेरी अपनी अयोग्यताओं का एहसास करने में मेरी सहायता की: जब भी मैं ऐसी ही किसी परिस्थिति में आता हूँ, तब मैं स्वयं के प्रति कभी भी सचेत नहीं होता हूँ और मैं स्वयं में क्या उजागर कर रहा हूँउस बात को महत्व ही नहीं देता हूँ। मूलभूत रूप से, मेरे मन में परमेश्वर नहीं है और मुझे नहीं पता कि उस पर निर्भर कैसे होना है। इसके अतिरिक्त, मैं परमेश्वर के बहुत से वचनों को नहीं समझ पा रहा हूँ और मैं परमेश्वर के वचनों के अनुसार बातों को देखने या काम करने में अक्षम हूँ। परमेश्वर कहता है कि हमें अपने जीवन को प्रत्येक दिन के प्रत्येक क्षण को उसके वचन के अनुसार व्यतीत करें और हम परमेश्वर के वचन को एक दिशानिर्देश के रूप में लें, जिसके द्वारा हम स्वयं का संचालन करना है। वह अपेक्षा करता है कि हम वही करें जिसे वह चाहता है और उसे त्यागें जो उनके मनोरथों के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर उससे घृणा करता है जिसे मैंने स्वयं के बारे में आज प्रकट किया है? मेरे काम आज मेरे कर्तव्यों को कैसे पूरा कर रहे थे? नहीं, मैं स्पष्ट रूप से बुराई कर रहा था। इस समय, मुझे 44वें सिद्धान्त "प्रेम से भरे हुए मन के साथ दूसरों की सहायता करने का सिद्धान्त" का अवतरण प्राप्त हुआ, जिसमें कहा गया था: "तुम्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार विभिन्न प्रकार के लोगों को अलग करना चाहिए। जो लोगों वास्तव में परमेश्वर के ऊपर विश्वास करते हैं और सच्चाई को स्वीकार करते हैं, तुम्हें उनकी सहायता प्रेमी और सत्यनिष्ठ हृदय के साथ करनी चाहिए" (सिद्धांतवादी व्यवहार के लिए अभ्यास और धर्मचर्य्या)। मैंने साथ ही परमेश्वर के इन वचनों को भी पाया, "परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो')। क्योंकि परमेश्वर हमें प्रेम करता है, वह शरीर धारण करता है और स्वयं को नम्रता से छुपा लेता है, सारी मानवता को बचाने के लिए कहीं पर भी नहीं रूकता है। वह मनुष्यों के भ्रष्ट पहलुओं से घृणा करता है, परन्तु उनकी दुर्बलता के साथ सहानुभूति रखता है, लोगों को उनके भ्रष्टता के विषय में कभी भी सम्बोधित नहीं करता है, अपितु सदैव लोगों को सच्ची फटकार, अथक शिक्षण के साथ प्रोत्साहित करता है, और उनके तरीकों की गलती का एहसास प्रेम के साथ देता है और एक नया मार्ग ढूंढने में प्रोत्साहित करता है। परमेश्वर मुझे अपना अनुग्रह देता है, मुझे उठाता है और मुझे इस कर्तव्य को पूरा करने की अनुमति देता है ताकि मैं उस बात को प्रेम कर सकूँ जिसे परमेश्वर प्रेम करता है, मेरे भाइयों और बहनों को प्रेम से भरे हुए मन से सहायता कर सकूँ जब वे मुसीबत में होते हैं और सभी लोगों के साथ सत्यनिष्ठ मन से व्यवहार कर सकूँ। मैं, हालाँकि, उसके सिद्धान्तों के विरूद्ध गया: केवल इसलिए कि मेरी पदवी थोड़ी बड़ी थी और मैंने देखा कि दूसरों ने उनकी कुछ भ्रष्टता को उजागर किया था, मैंने उनकी कमजोरी के साथ सहानुभूति की उपेक्षा की, परन्तु इसकी अपेक्षा परमेश्वर के वचन को हथियार की तरह चलाते हुए उन्हें दबा देने और मेरे साथ सहमत होने के लिए उन्हें मजबूर किया। क्या यह घृणा का कार्य नहीं है? अचानक मैंने अपने अहंकार और अज्ञानता पर बहुत शर्मिन्दगी और परेशानी को महसूस हुआ। इसके पश्चात्, मैंने 43वें सिद्धान्त, "मन से साझा करने का सिद्धान्त" से परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ा: "'अनुभव साझा करने और संगति करने' का अर्थ है अपने हृदय के हर विचार, अपनी अवस्था, अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान, और साथ ही अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बात करना और उसके बाद, अन्य लोग इन बातों को समझते हैं, और सकारात्मक को स्वीकार करते हैं और जो नकारात्मक है उसे पहचानते हैं। केवल यही साझा करना है, और केवल यही वास्तव में संगति करना है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास')। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के द्वारा, मैंने सीखा कि मैं मेरी बहन के साथ किस तरीके से बातचीत करूँ जो उसके लिए लाभदायी हो। इस बार, जब मैंने लिखने के लिए अपनी कलम उठाई, तो मुझे महसूस हुआ कि मेरे भीतर प्रेम उमड़ने लगा था। मुझ में बहन के साथ चर्चा करने में अपने मन को खोल देने की दृढ़ इच्छा महसूस हुई। इस बार, मैंने अपने अभिमानी और दंभी स्वभाव और अमानवीय व्यवहार के प्रति अपने आत्मज्ञान के ऊपर चर्चा की-मैंने भाइयों और बहनों के साथ सही तरीके से व्यवहार नहीं किया, उनके प्रति प्रेम और करुणा दिखाने में उपेक्षा की थी। पत्र में मैंने निम्नलिखित बातों को लिखा: मैं सचमुच में आपको अपने सामने रखने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देना हूँ, जिससे कि मैं अपने मन के भीतर द्वेष को देख पाया। एक अगुवे के रूप में, मुझ में कोई सच्चाई या वास्तविकता नहीं है। मैं एक अगुवे बनने की योग्यता नहीं रखता हूँ, क्योंकि मैं उन कर्तव्यों का पालन करने में असफल हो गया जिन्हें परमेश्वर ने मुझे दिया था-मैं परमेश्वर के सामने एक सेवक के रूप में कार्य करने में विफल रहा। इसकी अपेक्षा, मैंने अपने कर्तव्यों को अधिकार, प्रतिष्ठा के पद के रूप, यह सोचते हुए कि मैं दूसरों से ऊपर हूँ। जब मैंने आपके पत्र को देखा, तब मैं तिरस्कार और आलोचना से भरा गया था, और यहाँ तक कि मैंने यह विश्वास किया कि मेरे पास आपकी छंटाई और निपटारा करने का अधिकार था। मैं कितना अधिक अभिमानी और दंभी रहा हूँ! वास्तव में, आपकी अयोग्यताएँ मेरी भी अयोग्यताएँ और कमजोरियाँ थीं। जब मैं और मेरे भाई-बहन एक साथ मिलकर काम नहीं कर सकते हैं, तब यह परमेश्वर है जो इस तथ्य को उजागर कर रहा है कि यह पूरी असफलता सौहार्दपूर्ण सहयोग के साथ सच्चाई में प्रवेश करने में मेरी ही अक्षमता का परिणाम था। इस प्रकाशन के लिए परमेश्वर का धन्यवाद, जिससे मुझे यह महसूस करने में सहायता मिली कि कई वर्षों तक परमेश्वर के ऊपर विश्वास करने के पश्चात् भी, मुझ में अभी तक मानव जाति के लिए परमेश्वर के उद्धार के प्रति पूरा ज्ञान प्राप्त करना बाकी है। मुझे अभी भी मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर के मनोरथ को समझना है। मैं नहीं जानता कि कि मनुष्य को किस तरीके से बचाया जाना और सिद्ध किया जाना चाहिए। परिणामस्वरूप, जिस भी परिस्थिति से मेरा सामना होता, मैं अभी तक परमेश्वर के न्याय और ताड़ना, निपटारे और छंटाई को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। इसकी अपेक्षा, मैं हमेशा सतही विषयों के दलदल में ही फँसा हुआ हूँ। यदि आपने मुझे उजागर करता हुआ पत्र नहीं भेजा होता, तो मैंने अपने समस्या के प्रकार को ही नहीं देखा होता। आइए भविष्य में सच्चाई की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए दोनों अभ्यास करें।

जब मैंने वास्तव में अपने अहंकार को छोड़ दिया, अपने आप को जाना और विश्लेषण किया, और मैंने वास्तविक स्थिति जिसका मैंने अनुभव किया है उसका उपयोग अपनी बहन के साथ बातचीत करने और सच्चाई में प्रवेश करने के लिए किया, तब मुझे अत्यधिक स्थिरता और शान्तिपूर्णता महसूस हुई और मुझे प्रतीत हुआ कि हम दोनों में किसी तरह की कोई दूरी और विवाद नहीं है। मैंने वास्तव में उन परिस्थितियों में परमेश्वर की आशीष के चिन्ह को देखा जिसमें मैंने सच्चाई का अभ्यास किया था। केवल परमेश्वर के नित्य मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के माध्यम से ही मैं, जो केवल सच्चाई के बारे में बात कर सकता था, परन्तु इसे लागू नहीं कर सकता, जो सच्चाई की वास्तविकता में प्रवेश किए बिना अनुभवों के बीच से निष्क्रिय होकर निकल जात था, धीरे-धीरे सुधार करने लगा। मैंने अपने अतीत के अनुभवों में परमेश्वर के पवित्र और व्यक्त धर्मी स्वभाव को देखा था। जैसा कि एक उपदेश के अंश में कहा गया है, "जहाँ कहीं भी भ्रष्टता है, वहाँ पर न्याय होगा, जहाँ कहीं भी बुराई है, वहाँ ताड़ना होगी" (ऊपर से संगति)। मैं और भी अधिक जागरूक हो गया हूँ कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना ही है जिसकी हमें आवश्यकता है। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना गहरे उद्धार और अनुग्रह का वरदान है। केवल इस न्याय और ताड़ना को प्राप्त करने के माध्यम से ही हम शैतान के काले प्रभाव से युद्ध कर सकते, अन्धेरे को दूर कर सकते, प्रकाश और सत्य की खोज कर सकते, सत्य में प्रवेश कर सकते, और सच्चाई का अभ्यास कर सकते हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना जहाँ कहीं मैं जाऊँ मेरे पीछे चलती रहे, ताकि मैं शुद्धता प्राप्त कर सकूँ और एक सच्चे व्यक्ति के रूप में जीवन यापन कर सकूँ।

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