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राक्षसों की गुफा में प्रवेश करने पर परमेश्‍वर के प्रेम का और भी गहरा अनुभव

फ़ेनयोंग, शान्‍सी प्रांत

बचपन से ही अपने माता-पिता की प्यार भरी देखभाल में बड़ा होने के बावजूद, मैं अक्सर अकेलापन महसूस करती थी और मुझे लगता था कि कोई ऐसा नहीं है जिस पर मैं निर्भर हो सकूं। मुझे हमेशा लगता था कि मैं किसी अबूझ पीड़ा की चपेट में हूँ जिससे मैं उबर नहीं पाती थी। मैं अक्सर खुद से पूछती थी: लोग जीवित क्यों हैं? हमें कैसे जीना चाहिए? लेकिन मुझे कभी कोई जवाब नहीं मिल पाता था। आखिरकार 1999 में, मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने का सौभाग्य मिला। परमेश्वर के वचन से प्राप्‍त पोषण और आहार ने मेरे एकाकी दिल को सुकून दिया और मुझे लगा कि मैं आखिरकार घर आ गई हूं। मैंने विशेष रूप से सुरक्षित और संरक्षित महसूस किया। आखिरकार तभी मुझे पता चला कि खुश रहने का क्‍या मतलब है। बाद में, मैंने परमेश्‍वर के वचन में पढ़ा कि: "मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। … परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। मानवजाति को न केवल एक निष्पक्ष समाज की, जिसमें हर एक व्यक्ति परिपुष्ट हो, और सभी एक समान और स्वतंत्र हों, बल्कि परमेश्वर द्वारा उद्धार और उनके लिए जीवन की उपलब्धता की भी आवश्यकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")। यहाँ, अंततः मैंने जाना कि अच्छा खाना, नए-नए कपड़े पहनना, और मौज-मस्ती करना ही जीवन जीना नहीं है। लोगों को जिस चीज़ की आवश्‍यता है वह है परमेश्‍वर द्वारा उद्धार और परमेश्‍वर द्वारा जीवन की आपूर्ति। केवल इन चीजों से ही लोगों की आत्माओं में मौजूद खालीपन को दूर किया जा सकता है। जिन सवालों ने मुझे इतने लंबे समय से परेशान कर रखा था, आखिरकार उनका जवाब मिल गया: परमेश्‍वर सृष्टि में रहने वाले हर प्राणी की देखरेख करता है—लोगों को परमेश्‍वर पर निर्भर होकर जीना चाहिए और उन्हें परमेश्‍वर के लिए जीना चाहिए, केवल इस तरह से जीने से ही लोगों का जीवन सार्थक होता है। जैसे-जैसे मैं परमेश्वर के वचन को और अधिक पढ़ती गई, मुझे धीरे-धीरे कुछ सच्चाई समझ में आने लगी, और बाद में मैं कलीसियाके कम से जुड़ गई। मैं अक्सर सभाओं में जातीथी और अपने भाई-बहनों के साथ संगत करती थी, मुझे लगता था कि मैं एक पूर्ण और संतुष्ट जीवन जी रही हूँ। लेकिन, अचानक गिरफ्तारी ने मेरे शांत जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया और मुझे राक्षसों की गुफा में डाल दिया …

17 जुलाई, 2009 की बात है, गर्मियों के दिन थे और उस दिन बारिश हो रही थी, जब मैं और मेरी तीन बहनें आंगन में कुत्ते को अचानक लगातार भौंकता हुआ सुनकर दोपहर की नींद से जाग गईं। यह देखने के लिए कि क्या हुआ, मैंने बाहर झांका और मैंने देखा कि सादी वर्दी में 20 से अधिक पुलिसवाले दीवार पर चढ़कर आंगन में आ रहे हैं। इससे पहले कि मैं कुछ कर पाती, वे धड़धड़ाते हुए घर में घुस गए और हमें मुख्‍य कमरे में खींचकर ले गए। परिस्थितियों में अचानक बदलाव से मैं एकदम घबरा गई क्योंकि मैं सोचने लगी कि मैं पुलिस की पूछताछ का जवाब कैसे दूंगी। लेकिन तभी, मेरे मन में एक विचार आया: परमेश्‍वर ने इन परिस्थितियों को होने दिया, इसलिए मुझे इसे स्‍वीकार करना होगा। उसके बाद, पुलिस ने हमें नीचे बैठने का आदेश दिया और उनमें से दो ने मेरी पीठ के पीछे मेरी बाहों को घुमाया, मेरी गर्दन पर बिजली का डंडा दबाकर लगाया, और मेरे सिर को कोट से ढक दिया। वे मुझे नीचे की ओर दबाते रहे जिससे मेरे पैर सुन्न हो गए। थोड़ा-सा भी हिलने-डुलने पर वो लोग गाली-गलौच करने लगते। इन दुष्ट पुलिसवालों ने डाकुओं की तरह पूरे घर की तलाशी ली, और मैं लगातार अपने दिल में परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हुए कहती रही, "परमेश्‍वर! मुझे पता है कि सब कुछ आपके हाथों में है और आपके अच्छे इरादों के कारण ही मैं इस स्थिति का सामना कर रही हूं। भले ही मैं अभी समझ नहीं पा रही, लेकिन मैं समर्पित होने के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर! मुझे बहुत घबराहट महसूस हो रही है, मुझे बहुत डर लग रहा है, मुझे नहीं पता कि मुझे आगे किस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। मुझे पता है कि मेरा कद बहुत छोटा है, और मुझे सच्चाई बहुत कम समझ में आती है, इसलिए मैं आपकी सुरक्षा और मार्गदर्शन की याचना करती हूं। मुझे विश्वास और शक्ति दो, ताकि मैं दृढ़ रह सकूं, और यहूदा बनकर आपके साथ विश्वासघात न कर सकूं।" मैंने बार-बार प्रार्थना की, मुझे एक पल के लिए भी परमेश्‍वर को छोड़ने का साहस नहीं हो रहा था। तलाशी में पुलिस को चार लैपटॉप कंप्यूटर, कई सेल फोन, कई पेन ड्राइव, एमपी3 प्लेयर और चीनी मुद्रा में 1,000 (आरएमबी) से अधिक नकदी मिली। जब उन्होंने घर की तलाशी पूरी कर ली, तो जो कुछ भी मिला उसे उन्‍होंने जब्त कर लिया, हम में से प्रत्येक की तस्वीरें लीं और फिर हमें जबरन अपने वाहन में बिठा दिया। हम बाहर निकले तो मैंने देखा कि पुलिस की अनगिनत कारें और गाड़ियाँ खड़ी हैं।

पुलिस हमें एक सैन्य सबएरिया में एक हॉस्‍टल में ले गई, जहां उन्होंने पूछताछ करने के लिए हमें अलग-अलग कर दिया। दरवाजे पर दो पुलिस वाले पहरा दे रहे थे। मुझे कमरे में धकेलने के तुरंत बाद, तीन पुरुष अधिकारी और एक महिला अधिकारी मुझसे पूछताछ करने लगे। पुरुष अधिकारियों में से एक ने पूछा, "तू कहाँ से हैं? तेरा नाम क्या है? तू इस क्षेत्र में क्या कर रही है? कलीसिया का पैसा कहां है?" मैं लगातार अपने दिल में परमेश्‍वर से प्रार्थना करती रही, और उन्होंने मुझसे जो कुछ भी पूछा, मैंने मुंह खोलने से इनकार कर दिया। यह देखकर, वे सभी अपना आपा खो बैठे। उन्होंने मुझे सीधे खड़े होने का आदेश दिया और मुझे दीवार की टेक नहीं लेने दी। इस तरह, वे तीन दिनों और तीन रातों तक मुझसे पूछताछ करते रहे और उस दौरान वे मुझे खाने या सोने की अनुमति नहीं देते थे। मेरा पहले से ही दुबला-पतला, कमजोर शरीर इस तरह के दुर्व्यवहार को झेल नहीं सका। ऐसा लगा कि मेरा सिर फट जाएगा, मुझे लगा जैसे मेरा दिल खोखला हो गया है, मैं थकी हुई और भूखी थी, मैं अपना संतुलन बनाए नहीं रख पा रही थी। लेकिन जब भी मैं अपनी आँखें बंद करती, वे मुझे कोंचते और कहते, "तू हमारे सवालों का जवाब देने से पहले नहीं सो सकती! बिल्कुल नहीं!" हमारे पास भरपूर समय है। देखते हैं कि तू कितने समय तक टिकी रह सकती है! वे मुझसे अक्सर कलीसिया के बारे में सवाल पूछते। इस पूरी परीक्षा के दौरान मैं बहुत घबराई हुई थी, और डरी हुई थी कि कहीं लापरवाही के किसी क्षण में मेरे मुंह से कोई बात न निकल जाए। मैं शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पीड़ा महसूस कर रही थी, लेकिन जब मुझे लगा कि मैं जो कुछ सहन कर सकती थी वह मैंने सहन कर लिया है, अब और नहीं झेल पाऊँगी, तब परमेश्‍वर ने अपने वचन के इस अंश को याद दिलाकर मुझे प्रबुद्ध कर दिया, "जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करनी चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को बिना लड़खड़ाने या मिटने देते हुए बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मनसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारी वास्तविक कद-काठी क्या है, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास अवश्य होना चाहिए, और तुममें देह को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए")। परमेश्‍वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति ने मुझे प्रोत्साहन दिया। यह सही है, शैतान मुझ पर हमला करने के लिए मेरी शारीरिक कमजोरी का उपयोग कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि मैं अपने शरीर की रक्षा करने, सुविधा और आराम से रहने के लिए उसके आगे झुक जाऊँगी और वह मेरी इस इच्छा का इस्तेमाल कर लेगा। मैं ऐसा नहीं होने दे सकती थी कि वह मुझे धोखा दे और मुझे एक कायर, पतित यहूदा के रूप में जीने को मजबूर कर दे। मैं ईश्वर के वचन के अनुसार जीने, देह सुख का त्याग करने, और ईश्वर के प्रेम पर अमल करने के लिए तैयार थी। मैं परमेश्‍वर के खिलाफ शिकायत या उससे विश्वासघात करने के बजाय अपनी देह को कष्‍ट होने दूंगी। परमेश्‍वर के वचन अथाह शक्ति का स्रोत थे, उन्‍होंने मेरी पीड़ा को सहन करने का दृढ़ संकल्प दिया। तीसरे दिन आधी रात को, एक अधेड़ उम्र का आदमी आया, जो उनका वरिष्ठ लग रहा था, यह देखते हुए कि वे मुझसे एक शब्द भी नहीं उगलवा पाए थे, वह आकर सीधा मेरे सामने खड़ा हो गया और बोला, "तुम जवान औरत हो, और देखने में बुरी नहीं हो। तुम जो चाहे कर सकती हो। फिर तुम परमेश्‍वर पर विश्वास करने पर क्यों अड़ी हुई हो? तुम हमें बता क्‍यों नहीं देती कि तुम क्या जानती हो? देर करने से तुम्‍हें कोई फ़ायदा नहीं होगा। तुम जितनी देर करोगी, उतना ही ज्‍़यादा कष्‍ट झेलना पड़ेगा।" उस समय, मेरी देह बेहद कमजोर थी, मेरा संकल्प डोलने लगा। मैंने सोचा, "शायद मुझे उन्हें कुछ महत्वहीन बात बता देनी चाहिए। अगर मैं इस तरह से उन्‍हें टालती रही, तो क्‍या पता वे मुझे और किन तरीकों से यातना देंगे?" लेकिन मैंने तुरंत ही सोचा, "नहीं! मैं कुछ नहीं बता सकती! अगर मैंने कुछ भी कह दिया तो वे ज्यादा से ज्यादा पूछेंगे। एक बार ऐसा करने के बाद रुकना नहीं हो पाएगा, और फिर मैं वास्तव में यहूदा बन जाऊंगी।" जब मुझे इस बात का एहसास हुआ, तो मैं समझ गई कि मैं शैतान की चाल में लगभग फंस गई थी। यह खतरनाक था! कैसे पापी, नीच शैतान लोग थे! वे मेरी कमजोरी का लाभ उठा रहे थे, मुझे कलीसिया से विश्‍वासघात करवाने के लिए कठोर और नरम दोनों तकनीकों का उपयोग कर रहे थे। मैं अपनेआप को शैतान के हाथों छले जाने नहीं दे सकती। मैं परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात करने से पहले मर जाऊंगी।

चौथे दिन, जब इन दुष्ट पुलिसवालों ने देखा कि मैंने अभी भी उन्हें कुछ नहीं बताया है, तो उन्होंने एक और चाल आज़माई। वे मुझे दूसरे कमरे में ले आए और दरवाजा बंद कर दिया। फिर मुझे याद आया कि मैंने एक बार किसी को कहते सुना था कि कैसे पुलिस एक बहन को पुरुषों से भरी जेल की कोठरी में लाई और पुरुष कैदियों से अपमानित करवाया। मुझे बहुत डर लगा, जैसे मैं बाघ के जबड़े में मेमना हूं जिसके बचने की कोई उम्‍मीद न हो, मैंने सोचा, "अब वे मुझे कैसे यातना देने जा रहे हैं? क्या मैं इस कमरे में मरने वाली हूं? … परमेश्‍वर, प्लीज़ मेरी रक्षा कीजिये और मुझे शक्ति दीजिये।" बार-बार मैंने प्रार्थना की और परमेश्‍वर को पुकारा, उसे एक पल के लिए भी भुलाने की हिम्मत नहीं की। दुष्‍ट पुलिसवाले बिस्तर पर बैठ गए। उन्होंने मुझे उनके सामने खड़े होने के लिए कहा और मुझसे वही सवाल पूछे, जब उन्होंने देखा कि मैं अभी भी नहीं बोल रही हूं, तो उनमें से एक व्यक्ति उग्र हो गया। उसने झपटकर मेरी बाहों को पकड़ लिया, उन्‍हें मरोड़कर मेरी पीठ के पीछे ले जाकर हथकड़ी लगा दी और मुझे घोड़े की मुद्रा में खड़े होने का आदेश दिया। इस समय तक मेरे पैर पहले ही सुन्‍न हो गए थे। वे इतने कमज़ोर थे कि खड़ा होना भी कठिन था, घोड़े की मुद्रा में मेरा बोझ कैसे उठाते। मैं एक मिनट के लिए भी उस स्थिति को बनाए नहीं रख सकी। जब मैं उनके मन मुताबिक खड़ी नहीं रह सकी, तो उनमें से एक ने मुझे पिंडली में बुरी तरह से लात मारी, जिससे मैं फर्श पर गिर पड़ी। एक लंबे-तड़ंगे पुरुष पुलिस अधिकारी ने आगे बढ़कर मेरी हथकड़ी पकड़कर मुझे उठाया, फिर मेरे पीछे मेरी बाहों को हवा में ऊपर उठा दिया, और मुझे फटकारते हुए उसने कहा, "अब तू बोलेगी या नहीं? मेरे धीरज का इम्तिहान न ले!" वह मुझे जितना ऊंचा उठाता, हथकड़ी उतना ही ज़्यादा कसती जाती और मैं दर्द में चिल्लाती। जितना मैं चीखती, उतना ही वह मुझे उठाता और उतने ही ज़हरीले ढंग से वह मुझे कोसता जाता, लेकिन मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था, सिवाय इसके कि मेरी बाहें और कलाइयां टूटने वाली थीं। ऐसे दुख में, परमेश्‍वर के वचन का एक अंश मेरे मन में आया। "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")। उस क्षण में, मैंने परमेश्‍वर के ढाढस बंधाने और प्रोत्साहन को दिल से महसूस किया। मैंने महसूस किया कि परमेश्‍वर मेरी ओर था, वह मेरे साथ था, मुझे इस बात के लिए प्रेरित कर रहा था कि चाहे कितना भी अधिक कष्ट क्यों न हो, मैं दृढ़ रहूं और उसके प्रति निष्ठावान बनी रहूं, क्योंकि केवल यही मजबूत और शानदार गवाही है। मैंने चुपचाप परमेश्‍वर से प्रार्थना की, "परमेश्‍वर, अभी आप मुझसे दृढ़ रहने और आपके लिए गवाही देने की अपेक्षा करते हैं। चाहे मैं कितना भी कष्‍ट उठाऊं, मैं शैतान के सामने आपके लिए गवाही दूंगी, और अगर मैं मर गई तो भी मैं आपके साथ विश्वासघात नहीं करूंगी! मैं शैतान के आगे समर्पण नहीं करूंगी!" सताये जाने के एक और दौर के बाद, पुलिसवाले ने देखा कि मैं अभी भी नहीं बोल रही हूँ, इसलिए उसने मुझे बुरी तरह धक्‍का देकर फर्श पर गिरा दिया। बाद में, मैंने देखा कि हथकड़ि‍यों ने मेरी कलाई में दो गहरे घावकर दिए थे, और ऐसा लग रहा था कि दर्द मुझे चीर रहा है। आज भी, मैं अपनी दाहिनी कलाई से भारी चीजें नहीं उठा सकती।

कलीसिया के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए पुलिस ने मुझे दस दिनों तक रुक-रुक कर यातनाएं दीं। जब उन्होंने देखा कि उनकी आक्रामक चालें काम नहीं कर रही हैं, तो उन्होंने एक अलग चाल आज़माई। एक दिन, उन्होंने मुझसे निकटता बनाने के लिए एक महिला अधिकारी को भेजा। वह मेरे लिए दैनिक उपयोग के कुछ सामान लेकर आई, और फिर मुझसे घनिष्‍ठता कायम करने की कोशिश करते हुए बोली, "खुद को देखो—युवा स्‍त्री हो, देखने में अच्‍छी हो, ज़रूर तुम्‍हारे पास एक अच्छा डिप्लोमा होना चाहिए। यदि तुम परमेश्‍वर में विश्वास नहीं करती, तो हम दोस्त हो सकते थे। यदि तुम्‍हारे पास कोई जगह नहीं है, तो तुम मेरे घर पर रह सकती हो। मैं यहाँ एक अच्छी नौकरी पाने में तुम्‍हारी मदद कर सकती हूँ, और एक अच्छे प्रेमी से परिचय करा सकती हूँ। तुम्‍हारे पास अपना घर हो सकता है, अपने, पति, बच्चे, और अपने परिवार के साथ जीवन का आनंद ले सकती हो। क्या यह अच्छा नहीं होगा? अभी की हालत में तुम घर भी नहीं जा सकती। क्या तुम्‍हें अपने घर और अपने माता-पिता की याद नहीं आती?"उसके साथ वाले पुरुष अधिकारी ने भी बात में बात मिलाई, "सही बात है। तुम अपनी ज़ि‍न्‍दगी छुपते हुए, कभी यहां तो कभी वहां रहते हुए क्यों गुजारती हो? अपने आप को यह सब तकलीफ़ें क्‍यों दे रही हो? अगर तुम हमारे साथ सहयोग करोगी, तो मैं वादा करता हूं कि तुम्‍हारे लिए इस सब से बाहर निकलने का एक तरीका है।" मैंने उन्हें मुझे लुभाते हुए सुना, तो मेरा दिल कमज़ोर पड़ गया, "वे सही हैं। मैंने पिछले कई वर्ष पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के डर से छिपते हुए बिताए हैं। मेरा कोई निश्चित ठिकाना नहीं रहा है, और मैं लगातार डर में जीती रही हूं। उत्पीड़न के ये दिन कब खत्म होंगे? इस तरह जीना वास्तव में दयनीय है!" लेकिन इस विचार ने तत्‍काल मेरे दिल को अंधेरे से भर दिया, इसलिए मैंने परमेश्‍वर को पुकारते हुए कहा, "परमेश्‍वर! मुझे पता है कि मेरी स्थिति ठीक नहीं है। मैं आपसे मांग कर रही हूं और आपके बारे में शिकायत कर रही हूं। यह मेरी विद्रोहशीलता और प्रतिरोध है। परमेश्वर! मैं आपसे विनती करती हूं कि आप मुझे प्रबुद्ध करें ताकि मैं इस गलत स्थिति से दूर हट सकूं, शैतान की योजना को सफल होने से रोक सकूं, और खुद को शैतान के जाल में गिरने से बचा सकूं।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्‍वर के वचन का एक अंश याद आया। "संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: 'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?")। ईश्वर के वचनों द्वारा प्रबोधन ने मेरे हृदय को उज्ज्वल कर दिया। मुझे उत्पीड़न और क्लेश का अनुभव करने का महत्व समझ में आया। ईश्वर इन राक्षसों द्वारा उत्पीड़न का उपयोग इसलिए करता है कि हममें कष्‍ट सहने का संकल्प आए और परमेश्‍वर का अनुसरण करने में हमारी ईमानदारी और आस्‍था को पूर्णता मिले, ताकि हमारा अनुभव और गवाही शैतान पर परमेश्‍वर की विजय का शक्तिशाली प्रमाण बन सके, ताकि सभी लोग इस गवाही को देख सकें कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का अंत के दिनों का कार्य मनुष्य का कार्य नहीं है, बल्कि स्वयं परमेश्‍वर का कार्य है। परमेश्‍वर के कार्य और परमेश्‍वर के वचनों के मार्गदर्शन और प्रावधान के बिना, कोई भी व्यक्ति इन राक्षसों की मानवता को कुचल डालने वाली दीर्घकालिक क्रूरता और यंत्रणा को सहन नहीं कर सकता है। अपने जीवन की कीमत पर भी परमेश्‍वर पर विश्वास करने और परमेश्‍वर का अनुसरण करने में सक्षम होना लोगों पर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कार्य का प्रभाव है। यह परमेश्‍वर की महिमा, और परमेश्‍वर के सर्वशक्तिमान सामर्थ्य की गवाही है। अपने काम के इस अंतिम चरण में, परमेश्वर ऐसे विजेताओं का समूह प्राप्त करना चाहता है जो शैतान के उत्पीड़न और क्रूर चोटों का सामना कर सकें और निर्भीक रूप से धार्मिकता की ओर मुड़ सकें। यही वे विजेता हैं जिन्‍हें परमेश्‍वर अंततः हासिल करना चाहता है! परमेश्‍वर का वचन कहता है, "मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, और वह चुना हुआ जीवन तुम लोगों को दे दिया है जिसे चुने हुए लोगों, अर्थात् इस्राएलियों ने कभी प्राप्त नहीं किया था। उचित रीति से तो, तुम लोगों को मेरे लिए गवाही देनी होगी, और अपनी युवावस्था को मेरे प्रति समर्पित करना होगा और अपना जीवन कुर्बान करना होगा। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। यह बहुत पहले से ही नियत किया गया है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम लोगों को देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?")। अपनी छह हजार साल की प्रबंध योजना में, परमेश्‍वर ने तीन चरणों का काम कर लिया है और दो बार देहधारण किया है। अपने अंतिम देहधारण में, वह चीन में, परमेश्‍वर को सबसे अधिक सताने वाले नास्तिक देश में, काम करने आया है, और वह अंत के दिनों में प्राप्‍त होने वाली महिमा के एक भाग को हममें से उन लोगों को देता है जिन्हें शैतान द्वारा गहराई और क्रूरता से चोट पहुँचाई गई है, और इस प्रकार वह शैतान को हराता है, और साथ ही हमारे भीतर सत्‍य और जीवन सक्रिय करता है। वास्तव में हम परमेश्‍वर से बहुत कुछ प्राप्त करते हैं, और इसलिए हमें परमेश्‍वर के लिए गवाही देनी चाहिए। यह परमेश्‍वर का आदेश है, साथ ही उसकी कृपा और उत्थान भी है और यह हमारे लिए सम्मान की बात है। इसलिए, आज हम जो कष्ट सहन कर रहे हैं, वह सार्थक और मूल्यवान है, और हमारे लिए परमेश्‍वर के पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्‍वर के वचनों के प्रबोधन और मार्गदर्शन के माध्यम से, मैंने ईश्वर की इच्छा को समझा, शैतान की चालों को पहचान लिया, और दृढ़ रहकर परमेश्‍वर की गवाही देने के लिए किसी भी कष्ट को सहन करने का संकल्प पा लिया। उसके बाद, पुलिस ने मुझसे दो और सप्‍ताहों तक पूछताछ करती रही, लेकिन मैंने कभी भी उन्हें कलीसिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।

बाद में, मुझे स्थानीय नज़रबंदी गृह में स्थानांतरित कर दिया गया। जैसे ही मैं व‍हां पहुंची, एक महिला पुलिस अधिकारी ने मुझे तलाशी लेने के लिए निर्वस्‍त्र होने का आदेश दिया, और उसने मेरे पास मौजूद पैसों को भी ज़ब्त कर लिया। जब मैंने कोठरी में प्रवेश किया, तो वहां भयानक बदबू थी। सोने के लिए बने एक ही चबूतरे पर बीस से अधिक लोग ठूंसे हुए थे। हम सभी उसी कमरे में खाते, पेशाब और शौच करते थे। इसके बाद वाले महीने में, मुझे इन दुष्ट पुलिसवालों ने ओवरटाइम काम करने और हर दिन अतिरिक्त ड्यूटी लेने का आदेश दिया। उन्होंने मेरा चश्मा ले लिया था, इसलिए मुझे सब कुछ धुंधला दिखता था, और मुझे काम करते समय हर चीज़ को देखने के लिए अपनी आंखों के बहुत करीब लाना पड़ता था। ऊपर से, नज़रबंदी गृह की रोशनियां छोटी और धीमी थीं। जब दूसरे सोते थे, तो मुझे देर रात तक काम करते रहना पड़ता था क्योंकि मुझे अपने कामों को पूरा करने में ज़्यादा समय लगता था। मेरी आँखें बहुत थकी रहती थीं, मुझे डर था कि काम मुझे अंधा बना देगा। मैं रात को अच्छी तरह से नहीं सो सकती थी, प्रत्येक रात मुझे कोठरी में एक घंटे की शिफ्ट ड्यूटी करनी होती थी। हर दिन काम के भारी बोझ के अलावा, मुझसे सप्ताह में दो बार पूछताछ की जाती थी, और हर बार, ये दुष्‍ट पुलिसवाले मुझे हथकड़ी और बेड़ियां और "शाही पीले" रंग की कैदी की वर्दी पहना देते थे। मुझे याद है, ऐसे ही एक दिन बारिश हो रही थी। मैं एक पुरुष पुलिस अधिकारी के साथ चलकर जा रही थी, जिसने अपने ऊपर छाता लगा रखा था। मैं हथकड़ी-बेड़ी में जेल की पतली वर्दी पहने हुए बेहद कठिनाई से चल रही थी और ठंडी बारिश मुझ पर पड़ रही थी। बेड़ि‍यां बहुत भारी थीं, और हर कदम पर मेरे टखनों को खरोंचते हुए जोर से टकराने की आवाज़ कर रही थीं। अतीत में मैंने केवल टीवी पर ऐसी चीजें देखी थीं, लेकिन अब मैं इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर रही थी। मुझे अपनी स्थिति से घृणा हो गई, मैं दिल ही दिल में चीख उठी, "इस तरह तो हत्यारों और बलात्कारियों से पूछताछ की जाती है! मैंने ऐसा क्या किया है जो मेरे साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है?" तभी परमेश्‍वर ने मुझे प्रबुद्ध किया और मुझे परमेश्‍वर के वचन याद आए; "प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! … यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। जब मैंने परमेश्वर के वचनों की तुलना उस वास्तविकता से की जिसका मैं सामना कर रही थी, तो अंत में मैंने देखा कि यद्यपि सीसीपी बाहरी दुनिया के लिए हर तरह से घोषणा करती है कि सभी लोग धार्मिक स्वतंत्रता के हकदार हैं, परंतु जैसे ही कोई भी वास्तव में परमेश्‍वर में विश्‍वास करने लगता है, वह सभी प्रकार के उत्पीड़न से इसका जवाब देती है – गिरफ्तारी, हिंसा, अपमान, निंदा, और कारावास। यह लोगों के साथ मानवीय व्यवहार नहीं करती। "धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता" और "लोकतंत्र और मानवाधिकारों" के मूल्य विशुद्ध रूप से दूसरों को धोखा देने, आंखों में धूल झोंकने और उनके साथ खिलवाड़ करने की चालें हैं! यह दुष्ट पार्टी तमाम तरह की वाक्पटुता से अपने को सजाती है, लेकिन वास्तव में यह किसी राक्षसी जानवर जितनी क्रूर और नृशंस है, वास्तव में बहुत अधिक पापी और शातिर है! सीसीपी दुनिया में ऐसे बदमाशों और बुरे काम करने वालों की जानबूझकर अनदेखी करती है और उस ओर से आंखें मूंदे रहती है, जो धोखाधड़ी करते हैं, हत्या और लूट करते हैं, और कई बार उनकी रक्षा भी करती है, परंतु यह उन लोगों को बेरहमी से सताती और मारती है जो परमेश्‍वर में विश्वास रखते हैं और सही रास्ते पर चलते हैं। सीसीपी वास्तव में एक राक्षस है जिसने खुद को परमेश्‍वर का दुश्मन बना लिया है! इन बातों के बारे में सोचते हुए, मैं इस वीभत्स राक्षस से घृणा किए बिना नहीं रह सकी। मैंने इसके खिलाफ विद्रोह करने की कसम खाई, भले ही मुझे अपनी जान से इसकी कीमत चुकानी पड़े, और मैंने खुद को परमेश्‍वर के हवाले कर दिया! एक महीने के बाद, कोई भी सबूत न होने के बावजूद, पुलिस ने "सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने" के आरोप में मुझे एक वर्ष तक सश्रम पुनर्शिक्षा की सजा सुनाई।

जब मैं लेबर कैम्‍प में पहुंची, तो मुझे अहसास हुआ कि यह और भी अंधेरा स्थान है। यहाँ बिल्‍कुल भी स्वतंत्रता नहीं थी। बंदी अपने यूनिट गार्ड के आदेश पर ही खा-पी सकते थे, या शौचालय जा सकते थे, हमें गार्ड की हर बात माननी थी वरना हमें सजा दी जाती थी। कमरे में दाखिल होने और बाहर जाते समय हमें नंबर लिखाना होता था, और अगर किसी ने गलत नंबर बता दिया, तो पूरी यूनिट को दो घंटे तक तेज़ धूप में बिताने या बारिश में भीगने की सजा दी जाती थी। जब हम खाने के लिए कैफेटेरिया जाते, तो अगर किसी ने गलत नंबर बताया, तो पूरी यूनिट को बाहर इंतजार करने के लिए मजबूर करके और खाने की अनुमति नहीं देकर सजा दी जाती थी। जब अन्‍य बंदी खाना खाते थे तो हम केवल असहाय होकर देख सकते थे। हमें हर भोजन से पहले एक सैन्य गीत भी अपनी पूरी ताकत से गाना पड़ता था, और अगर कोई सुर में नहीं गाता या पर्याप्‍त जोर से नहीं गाता, तो हमें गीत को फिर शुरू से गाना पड़ता, एक बार, दो बार…। हमारे यूनिट गार्ड के संतुष्ट होने के बाद ही हमें खाने की अनुमति दी जाती। यह तथाकथित "प्रबंधन प्रणाली" विशुद्ध रूप से दूसरों पर रोब गांठने, दूसरों पर हुक्‍म चलाने, और अपनी हैसियत का आनंद लेने की उन दुष्‍ट गार्डों की इच्छा पूरी करने करने के लिए ही बनाई गई थी। वे हर दिन दूसरों को बिल्‍कुल कगार पर धकेल देते हैं। यहाँ, गार्डों के लिए सफाई करने और उनकी रजाई में तह लगाकर रखने के अलावा, बंदियों को उनके पैर धोने के लिए पानी लाना पड़ता था और उनकी पीठ की मालिश करनी पड़ती थी। गार्ड महाराजाओं और महारानियों की तरह पेश आते थे, यदि आप उनकी अच्छी सेवा करते तो वे मुस्कुराते थे, लेकिन अगर आप उनकी बुरी सेवा करते तो बहुत बुरे ढंग से डांटते या पीटते थे। हम चाहे जो भी कर रहे होते, चाहे हम बाथरूम में ही क्‍यों न हों, जैसे ही हम गार्ड को चिल्लाते हुए सुनते, हमें जोर से "हाज़ि‍र है" का जवाब देना होता था और उनके निर्देशों को सुनने के लिए जल्दी से जाना पड़ता था। सीसीपी शासन के तहत श्रम शिविर इसी तरह से से चलाए जाते हैं। वे अंधकारपूर्ण, दमनकारी, क्रूर और अपमानजनक हैं। इस सबका सामना करते हुए, मुझे नाराजगी और बेबसी के अलावा कुछ नहीं सूझता था। और इसके अलावा, ये दुष्ट पुलिसवाले श्रम शिविर के बंदियों के साथ बोझ ढोने वाले जानवरों और दासों के रूप में, केवल पैसा कमाने के औज़ारों के रूप में पेश आते थे। वे रोज़ हम पर काम का भारी बोझ लाद देते, यहां तक कि खाने और सोने के अलावा, हम अपना बाकी समय उनके लिए पैसे कमाने में ही बिताते थे। हर दिन, हमें जिन विभिन्न नियमों का पालन करना पड़ता था, उसके अलावा हमें काम के भारी बोझ से भी जूझना पड़ता, और कोई नहीं जानता था कि कब हमें दंडित किया जाएगा और डांटा-फटकारा जाएगा। मैं वाकई इस तरह से रहना बर्दाश्‍त नहीं कर सकती थी, और न जाने कितनी बार मैंने सोचा, "क्या मैं इस श्रम शिविर में ही मर जाऊंगी? हर दिन वे हमें थका कर चूर कर डालते हैं। मैं इतना कठिनाई भरा वर्ष कैसे गुज़ार सकूंगी? यह आखिर कब खत्म होगा? मैं इस नारकीय स्थान पर एक और मिनट, एक और सेकंड, बर्दाश्‍त नहीं कर सकती।" ऊपर से, कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसके साथ मैं अपनी भावनाओं को खुलकर साझा कर सकती थी। हर दिन, मुझे चुपचाप सब कुछ सहन करते हुए लगातार काम करना पड़ता था, और मैं बहुत दुखी महसूस करती थी। रात में, जब सभी सो रहे होते, तो खिड़की की सलाखों के पार चांद को देखकरमैं दुःख से भर जाती। मैं अलग-थलग और अकेला महसूस करती, और मैं अपने तकिए में मुंह छिपाकर रोने से खुद को रोक नहीं पाती थी। लेकिन जिस क्षण मैंने सबसे कमजोर महसूस किया, मुझे अचानक परमेश्‍वर का वचन याद आया, "मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से 'नरक' और 'अधोलोक' में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (9)")। परमेश्‍वर के वचन की हर पंक्ति ने मेरे दिल को सुकून पहुंचाया। हाँ! मैं इस राक्षसी जेल में अकेली और अलग-थलग महसूस कर रही थी क्योंकि मेरे पास दिल की बात करने के लिए कोई नहीं था, लेकिन परमेश्‍वर स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरा था और हमें, उस मानवजाति को बचाने के लिए भयावह अपमान और पीड़ा सहन की, जिसने उसके साथ खिलाफ विद्रोह किया और उसका विरोध किया, और एक भी व्यक्ति उसे समझ नहीं सका या उसकी इच्छा का ध्‍यान रख सका। इसके बजाय, उसे लोगों की गलतफ़हमी, शिकायतों, उपेक्षा, हमलों, छल और विश्वासघात का सामना करना पड़ा। क्या परमेश्‍वर ने वही अलगाव और अकेलापन महसूस नहीं किया? क्या परमेश्‍वर को भी सताया और आहत नहीं किया गया? लेकिन इसके बावजूद, मैं परमेश्‍वर की इच्छा का बिल्कुल ध्‍यान नहीं रख रही थी, और थोड़े से कष्ट के बाद ही नकारात्मक और कमजोर हो गई थी। मैं केवल पीछे हटना और बच निकलना चाहती थी। मैं वास्तव में विद्रोहि‍णी थी! परमेश्‍वर ने मुझे इन शैतानों के उत्पीड़न का शिकार इसलिए नहीं बनने दिया क्योंकि वह जानबूझ कर चाहता था कि मैं कष्‍ट सहूं, बल्कि इसलिए क्योंकि वह चाहता था कि मैं अपने क्रूर उत्पीड़न के अनुभव के ज़रिए सीसीपी के दुष्‍ट चेहरे को स्पष्ट रूप से देख सकूं, वास्तव में उसका त्याग करने में सक्षम बनूं, और अंत में पूरी तरह से परमेश्‍वर की ओर मुड़ जाऊं। यह सब परमेश्‍वर के नेक इरादों और उद्धार के साथ किया गया था। और वैसे भी, मसीह अब मेरे साथ कष्‍ट उठा रहा था, इसलिए मैं अब अकेली नहीं थी। केवल तभी मैंने महसूस किया कि परमेश्‍वर मनुष्य के साथ जो कुछ करता है, उसमें केवल उद्धार और प्रेम होता है। हालांकि मैंने देह में कष्‍ट उठाया, लेकिन यह मेरे जीवन में प्रवेश के लिए अविश्वसनीय रूप से फायदेमंद था! एक बार जब मैंने इन चीजों को समझ लिया, तो मैं धीरे-धीरे अपनी नकारात्मक, कमजोर स्थिति से उबरने लगी, और मुझे परमेश्‍वर की गवाही देने के लिए कष्‍ट उठाते हुए संतुष्ट होने का संकल्प मिल गया।

जून 2010 के अंत में, मुझे एक महीने पहले छोड़ दिया गया। इस उत्पीड़न और कठिनाई के अनुभव से, मैंने वास्तव में महसूस किया कि लोगों के लिए परमेश्‍वर का उद्धार ईमानदार और व्यावहारिक है, लोगों के लिए परमेश्‍वर का प्यार गहरा और वास्तविक है! अगर मुझे इन शैतानों द्वारा उत्पीड़न और गिरफ्तारी का अनुभव नहीं हुआ होता, तो मेरा विश्वास, साहस, और कष्‍ट सहने का संकल्प पूर्ण नहीं हो सकता था, और मैं कभी भी राक्षस के वास्तविक, बदसूरत चेहरे को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाती। मैं कभी भी दिल से उससे घृणा नहीं कर पाती, और मैं कभी भी अपने हृदय को परमेश्‍वरको समर्पित नहीं कर पाती और खुद को पूरी तरह से परमेश्‍वर के हवाले नहीं कर पाती। उत्पीड़न और कठिनाई की कड़वाहट के वास्तविक अनुभव के बिना, मैं कभी भी उस दुख को समझ या सराह नहीं पाती जो परमेश्‍वर अनुभव करता है या हमें बचाने के लिए इस गंदी जगह पर देहधारण करके आने में वह जो कीमत चुकाता है। इससे मैं परमेश्‍वर के प्रेम को अधिक गहराई से महसूस कर सकी और अपने हृदय को उसके करीब ला सकी। मैं परमेश्‍वर के वचनों के लिए आभारी हूं कि उन्होंने मुझे बार-बार मार्गदर्शन दिया, और जेल के अंधेरे में रहने के एक साल के दौरान मेरा साथ दिया। आज, मैं कलीसिया में लौट आई हूं, मैं अपने भाई-बहनों के साथ सत्य पर परमेश्‍वर के वचन और वार्तालाप को पढ़ती हूं, मैं फिर से अपने कर्तव्यों को निभा रही हूं, और मेरा हृदय अनंत उल्‍लास और खुशी से भरा है। मैं अपने हृदय की गहराई से परमेश्‍वर की आभारी हूं, मैंने अपने आप से एक शपथ ली है: भविष्य में मुझे चाहे जैसी भी परिस्थितियों या परीक्षाओं से गुज़रना पड़े, मैं अपनी सारी शक्ति के साथ सत्य का अनुसरण करना चाहती हूं और अंत तक परमेश्‍वर के पीछे चलना चाहती हूं!

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