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मैंने एक सच्चा घर पा लिया है

लेखिका: यांगयांग, संयुक्त राज्य अमेरिका

जब मैं तीन साल की थी, तो मेरे पिता का निधन हो गया। उस समय मेरी माँ ने बस मेरे छोटे भाई को जन्म दिया ही था, जिस पर मेरी दादी ने अंधविश्वास के कारण कहा कि मेरी माँ और मेरे छोटे भाई की वजह से ही मेरे पिता की मृत्यु हुई है। बेहतर विकल्प की कमी के कारण, माँ को मेरे छोटे भाई को लेकर अपने पिता के घर रहने के लिए जाना पड़ा, इसलिए जहाँ तक मुझे याद है, मैं अपने दादा-दादी के साथ ही रह रही थी। हालाँकि मेरे दादा-दादी ने मेरे साथ अच्छा व्यवहार किया, फिर भी मैं खुद को अकेला महसूस करती थी और अपनी माँ और छोटे भाई के साथ रहना चाहती थी। मैं दूसरे बच्चों को मिलने वाली ममता के लिए तरस गई थी। सच में, मेरी माँग बहुत बड़ी नहीं थी—मैं बस एक सच्चे परिवार की कामना करती थी, एक माँ जो मुझे ढेर सारा प्यार करे, जो अपनी सच्ची भावनाएँ मेरे साथ साझा कर सके। पर मेरी यह छोटी-सी अपेक्षा भी एक असाधारण आशा में बदल गई थी, क्योंकि मैं अपनी माँ से केवल सप्ताहांत में ही मिल पाती थी। जब भी मुझे स्कूल में परेशानी होती थी, तो मेरी माँ मेरे पास कभी नहीं होती थी; मैं सड़क के किनारे उगी घास की पत्ती की तरह थी, जिसमें किसी को कोई दिलचस्पी नहीं थी। समय के साथ, मैं अपने आपको बहुत हीन समझने लगी; मैं सब-कुछ अपने दिल में रखती और दूसरों के साथ बातचीत करने की पहल न कर पाती। जब मैं 16 साल की थी, तो मेरे गाँव के कुछ लोग काम के सिलसिले में विदेश गए, और यह विचार मुझे लुभा गया। मैंने मन में सोचा: घर पर मेरी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अगर मैं विदेश चली जाऊँ, तो अपने जीवन-यापन के लिए कमा सकती हूँ, यहाँ तक कि अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अपने परिवार को भी दे सकती हूँ। इस तरह मैं अपने परिवार को थोड़ा बेहतर ढंग से जीने में मदद कर सकती हूँ।

अगस्त 2000 में मैं अकेले अपने बलबूते पर जीवन-यापन करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका आ गई। यहाँ अमेरिका में मैं सुबह जल्दी उठ जाती और दिन भर देर रात तक काम करती। यहाँ मेरे साथ कोई नहीं था, जिसके साथ मैं अपने विचार साझा कर सकती। मैं ऊपर से कठोर बनी रहती, पर अपने भीतर एक अकेलापन और सूनापन महसूस करती। जब भी मुझे ऐसा महसूस होता, मुझे सचमुच अपने परिवार की बहुत याद आती, और मैं इस बात के लिए और भी तरस जाती कि मेरा एक खुशहाल परिवार हो।

जब मैं 21 साल की थी, तब एक रेस्तरां में काम करते हुए मुझे अपने होने वाले पति को जानने का मौका मिला। वह एक अच्छा लड़का था और अपने माता-पिता के प्रति समर्पित था, इसलिए मेरे मन में उसको लेकर एक अनुकूल धारणा बनी। एक बार, असावधानी से मेरे पैर में मोच आ गई, तो यह देखकर मैं हैरान रह गई कि मेरी देखभाल करने के लिए उसने अपनी नौकरी छोड़ दी, यह बात मेरे दिल को छू गई। मैं धीरे-धीरे उस पर निर्भर रहने लगी। अप्रैल 2008 में हमने शादी कर ली। मुझे ऐसा लगा, जैसे मुझे एक ऐसा हमसफर मिल गया है, जिस पर मैं जीवन में भरोसा कर सकती हूँ, और आखिरकार मुझे महसूस हुआ कि मेरा अपना एक परिवार है। मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि इतने सालों से मैं जिसकी उम्मीद लगाए हुए थी, वह आखिरकार सच हो गया। शादी के बाद मेरे पति की बहन और मैंने एक भवन निर्माण सामग्री की कंपनी शुरू करने के लिए साझेदारी की, पर चूँकि अपने परिवार में मैं अकेली ही ऐसी थी, जिसे अंग्रेजी आती थी, इसलिए पूरी कंपनी मूल रूप से मैं ही चलाती थी। मैं अपने परिवार में सबकी देखभाल भी कर रही थी और कंपनी का प्रबंधन भी कर रही थी। वर्षों के संघर्ष से मैं न केवल अपने पति को उसके पिछले ऋण चुकाने में मदद कर पाई, बल्कि अपने परिवार के लिए कुछ बचत भी कर सकी। मैंने सोचा था कि अपने प्रयासों से मैं अपने पति के परिवार का सम्मान जीत पाऊँगी, लेकिन असलियत चेहरे पर एक थप्पड़ की तरह लगी। जब व्यवसाय में कुछ सफलता मिलने लगी, तो हमने एक को जन्म देने की योजना बनाई, पर मैं गर्भवती नहीं हो सकी। इसलिए मैंने बहुत सारी दवाएँ लीं और बहुत डॉक्टरों से मिली, पर मुझे आशा की एक भी किरण दिखाई नहीं दी। मेरा पति अपने परिवार में सबसे बड़ा बेटा था, उसके माता-पिता और अन्य रिश्तेदार हमसे बहुत निराश हुए, क्योंकि हमने उन्हें पोता या पोती नहीं दी थी। इस तरह के दबाव के चलते, मेरे प्रति मेरे पति का रवैया भी नाटकीय ढंग से बदल गया। उसकी देखादेखी उसके परिवार के सभी लोगों ने मेरे प्रति अपना रवैया बदल लिया। मेरे पति की बड़ी बहन अकसर मुझे नजरअंदाज करके बातें किया करती, यहाँ तक कि मेरे पति के सामने मेरी बुराई करने के लिए तथ्यों को विकृत भी कर देती। मुझे लगा कि मेरे साथ अन्याय हुआ है, इसलिए मैंने अपने पति को अपनी भावनाओं से अवगत करा दिया। वह न केवल मेरे प्रति निष्ठुर था, बल्कि कभी-कभी मुझ पर चिल्लाता भी था, जिससे मुझे और भी ज़्यादा दुख और अन्याय महसूस होता था। बाद में, हम एक और जाँच के लिए अस्पताल गए, और अंतत: पता चला कि समस्या वास्तव में मेरे पति के साथ थी। पर यह बात अब महत्वपूर्ण नहीं रही थी, क्योंकि कई सालों की लड़ाई के बाद हमारा रिश्ता बिगड़ना शुरू हो गया था। 2012 की शुरुआत से मेरा पति अक्सर डॉक्टरों से मिलने और व्यापार करने के लिए वापस चीन चला जाता, और छह महीने में केवल एक बार ही घर वापस आता। हर बार जब वह वापस आता, तो सिर्फ पैसा लेने के लिए। वह मुझसे कहता कि जिस कंपनी को वह चीन में चला रहा है, उसे अपनी लागतें पूरी करने के लिए धन की आवश्यकता है, पर मेरे प्रति वह पूरी तरह से उदासीन रहता। इस तरह हम मुश्किल से तीनेक साल ही एक साथ रहे, और हमारे रिश्ते में और दरार पैदा हो गई।

आख़िरकार सितंबर 2015 में हमने तलाक ले लिया। मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का था कि जब हम अपनी संपत्ति का बँटवारा कर रहे थे, तो मेरे पति ने मुझसे एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाने के लिए एक वकील तक अधिकृत कर लिया, उस अनुबंध में कहा गया था कि अगर अदालत ने हमारे तलाक को मंजूरी नहीं दी, तो मुझे एक हफ्ते के भीतर अपनी सारी संपत्ति अपने पति को देनी होगी। एक अन्य वकील ने मुझे इस पर सावधानी से विचार करने के लिए कहा: अगर मैंने इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, तो यह मेरे लिए बहुत हानिकारक होगा। उसने कहा कि वह मुझे एक समझौता लिखने में मदद कर सकता है, जो मुझे गुज़ारा-भत्ता दिलाएगा। अपने पति को इतना कठोर और निर्दयी देखकर मुझे बहुत निराशा हुई। प्यार करने से लेकर शादी करने तक, लगभग एक दशक तक मैंने अपने पति और इस परिवार को सब-कुछ दिया, जिसकी किसी धनराशि या भौतिक संपत्ति से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन अब चूँकि मेरा पति मुझे गर्भवती नहीं कर पाया, इसलिए उसने और उसके परिवार ने बिना मेरी भावनाओं का जरा भी विचार किए, सारा दोष मुझ पर मढ़ दिया और मेरे प्रति संगदिल हो गया। मैंने इतना कुछ किया, पर बदले में मुझे अत्यधिक दर्द और संताप ही मिला। मैं टूट गयी। मैं इस परिवार के साथ अब कोई संबंध नहीं रखना चाहती थी। मैं बस जल्द से जल्द इस घर को छोड़ देना चाहती थी और इन लोगों से बहुत दूर चली जाना चाहती थी, जिन्होंने मुझे इतनी गहरी चोट पहुँचाई थी। इसलिए बिना किसी हिचकिचाहट के मैंने हस्ताक्षर कर दिए।

तलाक के बाद मैंने खुद को बहुत असहाय महसूस किया। मैं नहीं जानती थी कि मैं किस पर विश्वास कर सकती हूँ या किसके पास जाकर अपनी भावनाएँ साझा कर सकती हूँ। जितनी बार भी मैंने अपनी असफल शादी के बारे में सोचा, उतनी ही बार मुझे बहुत अवसाद और दुख का अनुभव हुआ। मैंने अपनी वर्तमान स्थिति का पुन: परीक्षण किया। एक बच्चा पाने के लिए मैंने हार्मोन की इतनी ज़्यादा दवा ली थी कि मेरा वजन पहले से आधा बढ़ गया था। मुझे इतना डर था कि लोग अब मुझे इस ख़स्ता हालत, इस मुश्किल स्थिति में देखेंगे। ऊपर से मैंने मजबूत होने का दिखावा किया, पर दिल में मैं बहुत कमज़ोर महसूस करती थी। मैंने वास्तव में एक ऐसे दिन की कामना की थी, जब मैं एक ऐसी ज़िंदगी जी पाऊँ, जहाँ मेरी आत्मा आज़ाद हो सके। इसी क्षण से मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने की इच्छा होने लगी।

इसके कुछ ही समय बाद, एक दिन मॉल में कपड़े खरीदते समय अचानक कार्मेन से मेरी मुलाकात हो गयी। वह मेरी मदद करने को बहुत उत्सुक थी और हमने एक-दूसरे के फोन नंबर ले लिए। बाद में मैंने वीचैट पर पोस्ट किया हुआ उसका एक संदेश देखा, जिससे मुझे पता चला कि वह ईसाई है। कार्मेन अक्सर मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम मुझसे साझा करती, जिससे मैं अपने दिल में बहुत द्रवित अनुभव करती। धीरे-धीरे मुझे पता चला कि मैं, जो हमेशा दूसरों के साथ भावनात्मक संबंध रखने से बचती थी, अपना दिल खोलकर अन्य लोगों के साथ बातचीत करने की इच्छा करने लगी हूँ। जब कार्मेन और मैं एक-दूसरे से परिचित हो गईं, तो पिछले कई वर्षों में मैंने अपने दिल में जो कष्ट सहे थे, वे सब बाहर निकलने लगे। कार्मेन ने वास्तव में मेरी पीड़ा को समझा, और उसने भी मेरे साथ एक ऐसा ही अनुभव साझा किया, जिससे वह गुज़री थी। मुझे लगा कि मैं ऐसी इंसान से मिली हूँ, जो वास्तव में परवाह करती है, इससे मेरा दिल गर्मजोशी से भर गया। एक दिन कार्मेन ने मुझे एक बहन के घर पर आमंत्रित किया, जहाँ मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई केविन और कई अन्य बहनों से मिली। उनके साथ रहकर मैंने महसूस किया कि वे उन लोगों से बहुत अलग हैं, जिनसे मैं अतीत में मिली थी। जब भी मैं अन्य लोगों के साथ होती थी, चाहे वे मेरे रिश्तेदार या दोस्त ही क्यों न होते हों, तो मुझे ऐसा लगता कि जब मैं उनके सामने अपना दिल खोलती हूँ, तो वे मुझे वास्तव में समझ नहीं पाते। उलटे मैं डरती कि मेरी विपत्तियों का उनके द्वारा मजाक उड़ाया जाएगा, इसलिए उनमें से किसी के साथ भी अपनी भावनाएँ साझा करने की मेरी इच्छा न होती। जबकि कार्मेन और इन लोगों के साथ मैं सहज अनुभव करती, क्योंकि ये सब लोग मेरे कष्ट समझते थे और अपने अनुभव भी मेरे साथ साझा करते थे। मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि यहाँ मैं इन सबके सामने, जिनसे कि मैं पहली बार मिली थी, अपना दिल खोल सकती हूँ और इन सबसे बात कर सकती हूँ, और किस तरह हम एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा करते हैं। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इन भाई-बहनों ने मेरे साथ मेरे अपने परिवार से अधिक अपने रिश्तेदार की तरह व्यवहार किया, जो मेरे साथ इस दुनिया में पिछले कई दशकों में पहले कभी नहीं हुआ था, जिससे मैंने अपने को भीतर से बहुत द्रवित अनुभव किया।

बाद में, हम सभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की एंजेलिना की संगीतमय कहानी देखने के लिए एकत्र हुए, जिससे मेरा दिल उद्वेलित हो गया। फ़िल्म की कहानी बहुत सच्ची थी: एक बच्चे के रूप में फ़िल्म की नायिका अपने दोस्तों के साथ मासूमियत और निर्मलता के साथ खेला करती थी, लेकिन जब वे बड़े हो गए और परस्पर विरोधी हित रखने लगे, तो सभी के दिल बदलने लगे। वे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ योजना बनाने लगे, यहाँ तक कि एक-दूसरे के दुश्मन बन गए और आपस में लड़ने लगे। अब उनमें कहने के लिए भी कोई स्नेह या मित्रता नहीं रह गयी थी। मैं उन सभी वर्षों के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाई, जब मेरे पति और मैंने मिलकर संघर्ष किया था। पर चूँकि हमारा कोई बच्चा नहीं हुआ, इसलिए हमारा रिश्ता टूट गया, और आखिर में जब हमारी संपत्ति विभाजित करने का समय आया, तो मेरा पति मुझसे वास्तव में पाई-पाई के लिए लड़ा। इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि लोग वास्तव में कितने खराब हैं; जब उनके अपने हित दाँव पर लगते हैं, तो सभी भावनाएँ भुला दी जाती हैं। सौभाग्य से, फ़िल्म की नायिका अंततः परमेश्वर को पा लेती है और परमेश्वर के परिवार में लौट आती है, जहाँ अकेला परमेश्वर ही होता है, जिस पर वह भरोसा कर सकती है, और वह अब अकेली नहीं है, न ही वह ख़ुद को अनिश्चित और असहाय महसूस करती है। यह देखकर मैंने इतना द्रवित अनुभव किया कि मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैंने मन में सोचा: "जब एंजेलिना परमेश्वर के पास लौटी, तो उसने जीवित रहने के लिए पहना हुआ नक़ाब उतार दिया; वह वास्तव में परमेश्वर की उपस्थिति में रहने लगी, उसका उद्धार प्राप्त किया और एक मुक्त और निर्बाध जीवन जीने में सक्षम रही। सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से मुझे भी बचाएगा, ताकि मैं भी एंजेलिना की तरह ही ख़ुशी से जी सकूँ।" फिल्म में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को यह कहते सुना: "मनुष्य, जिसने सर्वशक्तिमान के द्वारा दी गई जीवन की आपूर्ति को त्याग दिया, वह नहीं जानताकि आखिर कि उसके अस्तित्व का प्रयोजन क्या है, और फिर भी मृत्यु से डरता रहता है। वे बिना किसी सहारे और सहायता के हैं, फिर भी अपनी आँखें बंद नहीं करना चाहते, और वे इस संसार में अपने अधम अस्तित्व को, देह की बोरियों को जिन्हें अपनी आत्मा का कोई बोध नहीं है, घसीटने के लिए खुद को दृढ़ बनाते हैं। तुम, और दूसरे लोग भी इस तरह बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी लक्ष्य के जीते हैं। किंवदन्ती में मौजूद मात्र एक पवित्र आत्मा ही उन लोगों को बचाने के लिए आएगा जो कष्ट से कराहते हैं और बेसब्री से उसके आगमन के लिए तड़पते हैं। जो लोग अचेतावस्था में हैं, उनमें अभी तक यह विश्वास जागृत नहीं हुआ है। फिर भी लोगों में इसकी तड़प है। वे जो बुरी तरह से दुख में हैं सर्वशक्तिमान उन पर करुणा दिखाता है। साथ ही, वह उन लोगों से ऊब चुका है जो होश में नहीं है, क्योंकि उसे उनसे प्रत्युत्तर पाने में लंबा इंतजार करना पड़ा है। वह खोजने की इच्छा करता है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है। वह तुम्हें भोजन-पानी देना चाहता है, जगाना चाहता है, ताकि तुम फिर और भूखे और प्यासे न रहो। जब तुम थके हो और इस संसार में खुद को तन्हा महसूस करने लगो तो, व्याकुल मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, रखवाला, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारे ऊपर नज़र रखे हुए है, वह तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में बैठा है। वह उस दिन की प्रतीक्षा में है जब तुम्हारी याददाश्त एकाएक लौट आयेगी: और इस सत्य को पहचान लेगी कि तुम परमेश्वर से ही आए हो, किसको पता किस तरह और किस जगह बिछड़ गए थे, किसको पता किस मोड़ पर सड़क के किनारे बेहोश पड़े थे, और फिर अनजाने में किस मोड़ पर 'पिता' मिल जाए। और फिर तुम्हें यह भी एहसास है कि सर्वशक्तिमान निरंतर साथ रहा है, लगातार नज़र रखता रहा है, तुम्हारे लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना")। ये वचन सुनने के बाद ऐसा लगा, जैसे मेरी माँ मुझे बुला रही है, और मैं अपनी माँ के पास लौट आयी हूँ, जहाँ मुझे अपने दिल में एक अतुलनीय गर्मजोशी महसूस हुई। जैसा कि पता चला, परमेश्वर हमेशा मेरे साथ रहकर मुझ पर नज़र रखता था और मेरी वापसी का इंतज़ार करता था। मैं अब अकेली नहीं थी। परमेश्वर मेरी दुर्दशा और ज़रूरतों से अवगत था। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, जब मेरी आत्मा सबसे अधिक पीड़ित थी, तब सुसमाचार का प्रवचन देने वाले इन भाई-बहनों के माध्यम से वह मुझे परमेश्वर के घर में वापस लाया, जहाँ मैंने परमेश्वर का उद्धार प्राप्त किया और अपने प्रति परमेश्वर के प्रेम का आनंद उठाया। उस क्षण मैंने अपने आपको एक खोए हुए बच्चे की तरह महसूस किया, जिसे आख़िरकार अपना घर और परिवार मिल गया, और मुझे वास्तव में सच्ची ख़ुशी महसूस हुई!

इसके बाद, मैंने कलीसियाई जीवन जीना शुरू कर दिया और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन पढ़ने पर मैंने अनुभव किया कि मुझे कुछ ऐसा मिला है, जिस पर मैं वास्तव में भरोसा कर सकती हूँ, अब मेरे जीवन में एक उद्देश्य और एक दिशा है। पर चूँकि मैंने सच्चाई के बारे में बहुत कम समझा, इसलिए हर बार जब भी मैंने अपनी असफल शादी के बारे में सोचा, मुझे अपने दिल में दर्द महसूस हुआ। जिस तरह से मेरे पति के परिवार ने मेरे साथ बरताव किया, उससे मुझे नफ़रत थी, और हर बार जब भी मैं उसके बारे में सोचती थी, मैं दर्द से तड़प उठती। इसलिए मैंने अपनी परेशानियों के बारे में पमेश्वर से प्रार्थना की, और भाई-बहनों के साथ संगति कर उन्हें अपनी समस्याओं के बारे खुलकर बताया, और उनके हल के लिए सच्चाई की तलाश की। एक बार भाई केविन ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के इस अंश को मेरे साथ साझा किया: "मनुष्य परमेश्वर के साथ इन विभिन्न अवधियों में चला है, फिर भी वह नहीं जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों और जीवित प्राणियों की नियति पर शासन करता है या कैसे परमेश्वर सभी चीजों की योजना बनाता है और उन्हें निर्देशित करता है। इसी एक बात ने मनुष्य को अनादि काल से आज तक भ्रम में रखा है। जहाँ तक कारण का सवाल है, ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के तरीके बहुत छिपे हुए हैं, या परमेश्वर की योजना अभी तक पूरी नहीं हुई है, बल्कि इसलिए कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, इस हद तक कि मनुष्य जिस समय परमेश्वर का अनुसरण कर रहा होता है उसी समय शैतान की सेवा में भी बना रहता है—और उसे इसके बारे में पता भी नहीं चलता है। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों को या उस प्रकटन को नहीं खोजता है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे इस दुनिया के और अस्तित्व के उन नियमों के प्रति अनुकूल होने के लिए जिनका दुष्ट मनुष्यजाति अनुसरण करती है, उस दुष्ट, शैतान के क्षय पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य के हृदय और आत्मा को शैतान को श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित किया जाता है और वे शैतान का जीवनाधार बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन गये हैं जिसमें शैतान निवास कर सकता है और शैतान का खेल का अनुकूल मैदान बन गया है। इस तरह, मनुष्य अनजाने में मानव होने के सिद्धांतों और मानव अस्तित्व के मूल्य और अर्थ के बारे में अपनी समझ को खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय में धुँधली होती जाती है, और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ, मनुष्य की समझ चली जाती है कि परमेश्वर ने उसे क्यों बनाया है, न ही वह उन वचनों को जो परमेश्वर के मुख से आते हैं और वह सब जो परमेश्वर से आता है, उसे समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करने लगता है, और उसका हृदय और आत्मा शिथिल हो जाते हैं…। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है जिसे उसने मूल रूप से बनाया था, और मनुष्य अपनी शुरुआत का मूल खो देता है: यही इस मानव जाति का दुःख है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है")। इसके बाद भाई केविन ने इस पर संगति करके मुझे बताया, "हमारे जीवन के इतने कष्ट से भरे होने का कारण यह है कि हम शैतान के विचारों, नज़रियों और जीवन के सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं, और हमें शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया और भ्रष्ट किया जाता है। वास्तव में, शैतान ने हजारों सालों से मानव-जाति को भ्रष्ट किया है। अब लंबे समय से हम उन सब चीजों के अभ्यस्त हो गए हैं, जो शैतान ने हमारे भीतर बैठा दी हैं। हम जीवित रहने के शैतान के नियमों पर भरोसा करते हैं, जिससे हम सभी अपने स्वयं के लाभ के सिवाय सबके प्रति अंधे, स्वार्थी, घृणित और अविवेकी हो गए हैं। तुम्हारे पूर्व पति का परिवार तुम्हारे साथ उस तरह से व्यवहार इसलिए कर पाया, क्योंकि वे लोग भी ऐसे सामंती विचारों से नियंत्रित थे, जैसे 'पूर्वजों का वंश आगे बढ़ाओ,' 'अयोग्य संतान होने के तीन लक्षण हैं, कोई बेटा पैदा न करना उनमें से सबसे बुरा है,' और 'बच्चों को बुढ़ापे की लाठी की तरह पालो', जो शैतान द्वारा उनमें डाले गए थे। और जब तुम्हारा पति तुम्हारी संपत्ति का बँटवारा कर रहा था, तो उसने तुम्हारे साथ बरसों पति-पत्नी के रूप में बिताए समय का बिलकुल विचार नहीं किया, मेरा पति भी जीवित रहने के ऐसे ही नियमों से प्रभावित और नियंत्रित था, जैसे कि 'पैसा पहले है' और 'स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं', और वह स्वार्थी और संवेदनाहीन हो गया था। शैतान के भ्रष्टाचार के कारण लोग आसानी से एक-दूसरे के साथ मिलजुल नहीं सकते, हमारे जीवन में ऐसी कोई ख़ुशी नहीं है जिसकी चर्चा की जा सके। शैतान के के संतापों के कारण ही हम सभी दुखों का अनुभव करते हैं। हमारे समस्त परिवार भी शैतान से पीड़ित हैं, पूरी मानव-जाति शैतान के अधीन है, और शैतान के हाथों नुकसान उठाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकती। इसलिए, परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना जो लोग शैतान के दर्शन और सिद्धांतों से जीवन जीते हैं, वे सच्चे आनंद और ख़ुशी से रहित जीवन जीते हैं। अपने जीवन में हमें जिस चीज की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, वह भौतिक संपदा या हमारे परिवारों का प्यार नहीं है, बल्कि परमेश्वर का उद्धार है। हमें परमेश्वर के वचन द्वारा पोषण की आवश्यकता है। अकेला परमेश्वर ही हमें शैतान के भ्रष्टाचार और संताप से दूर कर सकता है, हमारे विवेक और विचार-शक्ति को बहाल कर सकता है, जिससे हम सच्चे लोगों की तरह रह सकते हैं और स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।" भाई केविन की संगति सुनने के बाद, मुझे अचानक एहसास हुआ: तो दर्द में जीने वाली मैं अकेली ही नहीं हूँ, बल्कि शैतान द्वारा पूरी मानव-जाति को मूर्ख बनाया और भ्रष्ट किया गया है, और हम सभी पीड़ा में संघर्ष कर रहे हैं। केवल परमेश्वर के सामने आकर और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करके ही लोग शैतान के संताप से दूर हो सकते हैं, और इस दुख से पार पा सकते हैं। यह ख़ुशी और मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है। जब मैंने यह समझ लिया, तो मेरे मन ने एकदम स्पष्ट हो गया, और मुझे ऐसा लगा कि मैं आजाद हूँ।

जब मैंने आदमी के दर्द में जीने का मूल कारण समझ लिया, तो मुझे समझ में आ गया कि मेरे और मेरे पूर्व पति के परिवार के बीच नाराज़गी शैतान के संताप के कारण हुई थी, यहाँ तक कि मैं उन्हें आज़माने और माफ़ करने के तथा उनके प्रति द्वेष छोड़ने के लिए भी तैयार हो गई। जब मैंने परमेश्वर के वचन को व्यवहार में लाना शुरू किया, तो मुझे अपने दिल में बहुत अधिक ख़ुशी महसूस हुई। अगस्त 2016 में, एक दिन मैं सड़क पर अपने पूर्व पति से टकरा गई। हमने एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दीं और मुझे दिल में स्पष्ट अनुभव हुआ कि मैं अब उसे नाराज़ नहीं हूँ, क्योंकि मैं जानती थी कि वह शैतान के संतापों के साथ जी रहा है, और उसे शैतान द्वारा मूर्ख बनाया गया तथा संतप्त किया गया है। अगर मेरे पास अवसर होता, तो मैं अंत के दिनों का परमेश्वर का सुसमाचार उसके सामने प्रसारित कर देती, ताकि वह भी परमेश्वर के सामने आ सके और सर्जक का उद्धार प्राप्त कर सके। उस क्षण मैंने महसूस किया कि परमेश्वर वास्तव में बहुत प्यारा है, और परमेश्वर का वचन सत्य है। इसलिए अगर हम परमेश्वर के सामने आकरउसका उद्धार प्राप्त करें, तो हम ख़ुद को शैतान के बंधन से मुक्त कर सकते हैं, स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त करके सुखी और धन्य जीवन जी सकते हैं।

जब भी मैं कनान की धरती पर आनंद के नृत्य व गायन का वीडियो देखती हूँ, तो मुझे बहुत खुशी होती है, और मुझे लगता है कि इस भजन के वचन पूरी तरह से मेरी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं: "मैं ईश्वर के परिवार में लौट आया, जोश और खुशियों से भरकर। नाज़ है सच्चे प्रभु जाना तुझे, दिल अपना मैंने किया तुझे अर्पण। आँसुओं की घाटी से गुज़रा मगर, देखा है मैंने प्रेम प्रभु का। दिन-ब दिन बढ़ता प्रभु में प्रेम मेरा, है प्रभु मेरी खुशियों का खज़ाना। उसकी सुंदरता पे मोहित मेरा दिल, जुड़ा है बस प्रभु से। कितना भी चाहूँ प्रेम पूरा ना होगा, प्रभु महिमा के गीत दिल में मेरे।" जब मैं उस मार्ग की ओर पीछे मुड़कर देखती हूँ जिसका मैंने अनुसरण किया, तो चाहे मुझे उस पर कुछ भी अनुभव क्यों न हुआ हो, परमेश्वर हमेशा मेरे साथ रहा और मुझ पर नज़र बनाए रहा, अंत में वह मुझे वापस अपने परिवार में ले गया। अब मैं हर दिन स्वयं को सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन द्वारा सिंचित किए जाने और अपनी देखभाल किए जाने का आनंद प्राप्त करती हूँ। मैं अपने भीतर जिस दर्द को महसूस करती थी, वह दूर हो गया है, मैंने अपने जीवन में दिशा पा ली है और सच्ची स्वतंत्रता तथा ख़ुशी प्राप्त कर ली है। मुझे बचाने के लिए परमेश्वर का शुक्रिया। मैं सत्य पर चलने का प्रयास करूँगी और परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान के लिए एक सृजन के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की हर संभव कोशिश करूँगी!

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