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मैंने सच्ची खुशी पा ली है

ज़ांग हुआ, कम्बोडिया

मेरा जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। भले ही हम अमीर नहीं थे, लेकिन मेरे माता-पिता एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और मेरा अच्छी तरह से ख्याल रखते थे—आप निश्चित तौर पर यह कह सकते हैं कि हम अपने पारिवारिक जीवन में काफी खुश और धन्य थे। बड़े होने के बाद मैंने खुद से कहा : मुझे एक ऐसा पति खोजना है,जो मेरा अच्छे से ख्याल रखे, और फिर एक खुशहाल व सुखी परिवार का निर्माण करे। यही बात सबसे महत्वपूर्ण है। मैं धन-संपन्नता नहीं चाहती—मुझे बस अपने पति के साथ प्रेमपूर्ण संबंध और शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन चाहिए।

जान—पहचान के एक व्यक्ति के माध्यम से मेरी मुलाकात मेरे भावी पति से हुई। पहले तो वह मुझे पसंद नहीं आया, क्योंकि उसका कद काफी छोटा था, लेकिन मेरे माता-पिता उसके बारे में अच्छी सोच रखते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि वह दिल से दयालु है और मेरा अच्छी तरह से ध्यान रखेगा। मैं देख सकती थी कि मेरा पति लोगों के साथ बहुत ईमानदारी से बर्ताव करता है और ऐसा लगता था कि वह अपने परिवार का अच्छी तरह से ध्यान रखेगा। मैंने सोचा, "अगर उसका कद थोड़ा छोटा भी है, तब भी ठीक है। जब तक वह मेरे साथ भला बर्ताव करता है, तब तक सब अच्छा है।" परिणामस्वरूप, मैं शादी के लिए तैयार हो गई और 1989 में हमने शादी कर ली। हमारी शादी होने के बाद मेरा पति मेरे साथ बड़ी कोमलता से पेश आता था और मेरा अच्छी तरह से ख्याल रखा करता था। मैं भी दिलोजान से उसका ख्याल रखती थी और अपने मन में हमेशा उसे प्राथमिकता देती थी। हमारी दो बेटियों का जन्म हो जाने के बाद मैं घर पर ही रहकर अपने परिवार का ख्याल रखने लगी, ताकि मेरा पति निश्चिंत होकर काम पर जा सके। जब हमारी दोनों बच्चियाँ स्कूल जाने लगीं, तो मैंने उनके स्कूल के पास एक जगह किराए पर ले ली, ताकि उनकी पढ़ाई के दौरान मैं उनके साथ रह सकूँ। जब संभव हुआ, तब तक मैंने अपने पति को छोटी-बड़ी पारिवारिक समस्याओं से परेशान नहीं किया। कभी-कभी हालात मुश्किल और थकाने वाले हो जाते थे, लेकिन हमारा पति-पत्नी का संबंध पारस्परिक प्रेम,परवाह और लिहाज से भरा था। हम एक शांतिपूर्ण जीवन जीते थे। मुझे महसूस होता था कि मेरा जीवन बहुत खुशहाल है।

उन दिनों मेरा पति जो कमाता था, उससे हमारे दैनिक खर्चे ही पूरे हो पाते थे। भले ही हमारी जिंदगी थोड़ी कठिन थी, लेकिन मैंने कभी भी उससे शिकायत नहीं की। मैं सोचती थी कि पति-पत्नी को जीवन के सुख-दुःख साझे करना चाहिए। लेकिन बाद में मेरे पति के कार्यस्थल की वित्तीय स्थिति गड़बड़ा गई; बात यहाँ तक पहुँच गयी कि हर महीने वह पहले की तुलना में केवल आधा वेतन ही घर लाने लगा। हमें अपने बच्चों की पढ़ाई के पैसे देने में भी दिक्कत होने लगी। अपने पति के दबाव को कम करने के प्रयास मेंमैं अक्सर ही अपने रिश्तेदारों से पैसे उधार लेने लगी। मैंने सोचा, "ये कठिनाइयां कुछ ही समय के लिए हैं। समय के साथ परिस्थितियां बेहतर हो जाएंगी।" चूंकि हम काफी समय तक पैसे उधार लेते रहे, इसलिए धीरे—धीरे हम पर कर्ज बढ़ता ही गया और हम दोनों ही बहुत दबाव में आ गए थे। 2013 में मेरे पति ने धन कमाने के लिए विदेश जाने के बारे में सोचा। जब उसने मुझे इस बारे मेंबताया, तो हालाँकि मेरी उसे जाने देने की इच्छा नहीं हुई, फिर भी मैंने सोचा, "अगर दो-तीन सालों के लिए विदेश जाकर वह कुछ पैसे कमा लेता है, तो हम अपना कर्ज उतार सकेंगे और अपने परिवार की स्थिति बेहतर कर सकेंगे। इतना ही नहीं ,हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं और हम उन्हें अच्छा जीवन देना चाहते हैं।" अपने परिवार की खातिर मैं उसे काम करने के लिए विदेश जाने देने के लिए तैयार हो गई।

मेरा पति तीन साल के लिए कम्बोडिया चला गया। इस दौरानमैं घर पर रुककर बच्चों और हमारे बुजुर्ग माता—पिता का ध्यान रखती रही। पहले मेरा पति अक्सर ही घर कॉल किया करता था और दिखाता था कि वह परिवार का ख्याल करता है। वह घर पर पैसे भी भेजा करता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसके कॉल आने कम से कमतर होते गए। हालात ऐसे हो गए कि उसने बड़े दिनों तक घर पर पैसे नहीं भेजे, न ही कॉल किया। मुझे चिंता हुई कि उसे कहीं कुछ हो तो नहीं गया। इसलिए मैं अपनी बेटियों के साथ उसे देखने गई। जब हम कम्बोडिया पहुंचे और मैंने देखा कि मेरा पति सही—सलामत है, तो मुझे राहत मिली। चूंकि हम पहली बार कम्बोडिया आए थे, मैंने चीन वापस जाने से पहले वहां अपनी बेटियों के साथ कुछ समय तक ठहरकर अपने पति के साथ रहने की सोची। मैंने देखा कि हर बार जब मैं अपने पति के साथ बाहर जाती थी, तो मेरे पति को जानने वाले लोग मुझे अजीब नजरों से देखते थे। चूंकि हमारी भाषा अलग थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं पता चला कि इसका क्या मतलब है। एक हफ्ते के बाद मेरा पति बिना बताए किसी अजनबी बच्चे को अपनी बांहों में लिए मेरे पास आया। उसने उस बच्चे से कहा, "अपनी आंटी को नमस्ते करो।" उस समय मैं बस देखती रह गयी, क्योंकि मैं नहीं जानती थी कि क्या हो रहा है। जब मैंने अपने पति से पूछा, तो पता चला कि यह बच्चा उसे कम्बोडिया की एक दूसरी औरत से पैदा हुआ था। मैं इतनी गुस्सा हो गई कि एक शब्द भी बोल नहीं पाई। मुझे लगा मैं बिलकुल बेवकूफ हूँ, और मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया। जब मैंने उसे भला—बुरा कहना चाहा, तो उसने शांति से उत्तर दिया, "यह बहुत आम बात है। यहाँ बहुत लोग ऐसा करते हैं!" जब मैंने उसे ऐसा कहते हुए सुना, तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मेरा पूरा शरीर कांपने लगा। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा पति, जिसने इतने सालों तक मुझे प्रेम किया, वह मुझसे इतनी कठोर और निर्मम बात कह सकता है और ऐसे बेशर्मी के काम कर सकता है। गुस्से में मैंने उसे कसकर दो थप्पड़ मार दिए। उसका धोखा बिलकुल भी अपेक्षित नहीं था, मैं इसे स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी। मैं बिलकुल स्तब्ध हो गयी थी। मैं जमीन पर बैठ गई और फूट—फूटकर रोने लगी। मैंने खुद से बार-बार यह पूछा, "उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैं जिस पति को जानती थी, वह कहां चला गया? उसने मुझसे अनंत प्रेम की प्रतिज्ञा की थी; क्या अनंत प्रेम की उसकी प्रतिज्ञा, उसकी स्नेहशीलता और परवाह सब-कुछ नकली था? मैंने इस परिवार को सब-कुछ दिया। मैंने कभी भी अपने पति से पैसों या अच्छी चीज़ों की मांग नहीं की। लेकिन, अब…" मुझे बड़ा अपमान महसूस हुआ। मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे साथ बहुत गलत हुआ है, मैं बहुत दुखी थी। मुझे नहीं लगता था कि अब मेरे अंदर जीने की शक्ति बची है।

उसके बाद के दिनों में चेहरा आंसुओं से हमेशा ढका ही रहता था। मैं उस औरत और उस बच्चे से घृणा करती थी। मैंने अपने पति से कहा कि मुझे तलाक चाहिए और मैं अपनी बेटियों को वापस चीन ले जाने और इस तथाकथित परिवार को छोड़ने के लिए तैयार हो गई। लेकिन मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मेरा पति न सिर्फ मुझे तलाक देने के लिए तैयार नहीं हुआ, बल्कि वो उस महिला को छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं था। बाद में मुझे पता चला कि मेरे परिवार के कुछ सदस्य पहले से ही यह जानते थे कि मेरे पति को कोई दूसरी महिला मिल गई है और उसे उससे एक बच्चा भी है, लेकिन उन्होंने इस बारे में मुझे अंधकार में रखा। मुझे और भी ज्यादा महसूस होने लगा कि मेरे जीवन से गरिमा छीन ली गयी है। मैंने इस परिवार को संभालने के लिए कड़ी मेहनत की थी। मैंने कभी भी यह नहीं सोचा था कि इसके बदले मुझे धोखा और कपट मिलेगा। मेरा दिल टूट गया था। यह धोखा वैसे ही बहुत दर्दनाक था, लेकिन मैं जिस बात को बिलकुल स्वीकार नहीं कर पा रही थी, वह था मेरे पति के परिचितों का मुझे अजीब नज़रों से घूरना। वे मुझे लेकर बकवास भी किया करते थे। असल में तो मेरे पति ने मुझे धोखा दिया था और उस महिला ने मेरे परिवार को तोड़ा था, लेकिन उस वक्त दूसरों की नज़रों में मैं घुसपैठिया थी। उस समय मैं जो दर्द को महसूस कर रही थी, उसे बयान नहीं कर सकती। एक-एक दिन एक साल जैसा लगता था और मेरा वजन भी 10 किलो से ज्यादा वजन घट गया था।

उस समय जब मैं पूरी तरह से निराश हो गई थी, तब मेरा सामना सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के उद्धार से हुआ। जब मेरी पड़ोसन लिन टिंग को इस घटना के बारे में पता चला, तो वह मेरे पास आई और उसने मेरे साथ सुसमाचार साझा किया। उसने कहा, "परमेश्वर में विश्वास रखो—वह तुम्हारी मदद कर सकता है।" लेकिन, बचपन से नास्तिकता की शिक्षा पाने की वजह से मैं चुटकी बजाकर तो परमेश्वर में विश्वास कर नहीं सकती थी! मैंने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। बाद में लिन टिंग ने एक बार फिर मुझसे बात की और कहा, "परमेश्वर के वचन पढ़ो। परमेश्वर ही तुम्हें तुम्हारे दर्द से बचा सकता है…।" उसने इतनी ईमानदारी से ये बातें कहीं कि मैं भावनात्मक रूप से द्रवित हो गई। मैंने दूसरी बार उसे मना करने में झेंप महसूस की, इसलिए मैंने 'वचन देह में प्रकट होता है' पुस्तक की एक प्रति स्वीकार कर ली। जब मैंने उसे खोला, निम्नलिखित अवतरण दिखाई दिया : "सर्वशक्तिमान के जीवन के प्रावधान से भटके हुए मनुष्य, अस्तित्व के उद्देश्य से अनभिज्ञ हैं, लेकिन फिर भी मृत्यु से डरते हैं। उनके पास मदद या सहारा नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपनी आंखों को बंद करने के अनिच्छुक हैं, इस दुनिया में एक अधम अस्तित्व को घसीटने के लिए खुद को मजबूत बनाते हैं, जो आत्मा की भावना के बगैर बस माँस के बोरे हैं। तुम और अन्य लोग इस तरह से आशा और उद्देश्य के बिना जीते हैं। केवल पौराणिक कथा का पवित्र जन ही उन लोगों को बचाएगा, जो अपने दु:ख में कराहते हुए उसके आगमन के लिए बहुत ही बेताब हैं। … जब तुम थके हुए होते हो और जब तुम्हें इस दुनिया की बेरंग उजाड़ता का कुछ अहसास होने लगता है, तो हारो मत, रोओ मत। द्रष्टा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान की आह")। जब मैंने परमेश्वर के इन मर्मस्पर्शी वचनों को पढ़ा, तो मैं ज़ोर से रो पड़ी और मैंने महसूस किया कि परमेश्वर वास्तव में मानवजाति को समझता है। अपने पति से धोखा खाने के बाद मै मरना चाहती थी, लेकिन मुझमें ऐसा करने की हिम्मत नहीं थी, न ही मैं इस तरह से मरना चाहती थी। मैंने अपने जीवन की दिशा और उद्देश्य खो दिया था और मैं अब अपना ज़रा भी ख्याल नहीं रखती थी। जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, तो ऐसा लगा जैसे जीवन में आशा है, और मेरे दिल को थोड़ी शांति मिली। भले ही मेरे पति ने मुझे धोखा दे दिया था, लेकिन मैं परमेश्वर पर भरोसा कर सकती थी। मैं अकेली नहीं थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा है, "जब तुम थके हुए होते हो और जब तुम्हें इस दुनिया की बेरंग उजाड़ता का कुछ अहसास होने लगता है, तो हारो मत, रोओ मत। द्रष्टा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा।" मैं परमेश्वर पर भरोसा करने को तैयार हो गयी, क्योंकि मुझे दुख पहुंचा था और मेरी परवाह करने वाला कोई नहीं था। मुझे परमेश्वर के आलिंगन की जरूरत थी। मुझे हर दिन बहुत कठिन और थकाऊ लगता था और मैं ऐसे जीना नहीं चाहती थी। मैंने विचार किया कि चूंकि परमेश्वर मानवजाति को इतनी अच्छी तरह से समझता है, इसलिए वह निश्चित रूप से इस दर्द से बाहर निकलने में मेरा मार्गदर्शन कर सकता है। इसलिए मैं लिन टिंग के साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़ने लगी और परमेश्वर के स्तुति-भजन गाना सीखने लगी। उसने मुझे बताया, "जब तुम बुरे समय से गुजर रही हो, तो परमेश्वर से प्रार्थना करो और परमेश्वर के वचनों को पढ़ो। परमेश्वर हमारे आहत दिल को राहत दे सकता है।" मैंने वैसा ही किया। जब मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया के भाई-बहनों द्वारा शूट किए गए संगीत और भजन के वीडियो को देखती थी, तो मेरा दिल खुशी से झूमने लगता था। खास तौर पर जब मैंने कनान की धरती पर खुशियाँ नामक वीडियो देखा, तो मुझे लगा कि मेरा दिल भी इन नाचते-गाते भाई-बहनों के साथ-साथ नाच और गा रहा है। मेरे दिल के कष्ट और अवसाद धीरे-धीरे खत्म हो गए और अंतत: मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आनी शुरू हो गई। अचानक मैंने महसूस किया कि यही वह परिवार है, जिसे मैं सच में चाहती हूँ, और सच्ची खुशी इन भाई-बहनों के साथ ही मिल सकती है। इस कारण, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सदस्य बन गयी और अपने भाई-बहनों के साथ कलीसिया का जीवन जीने लगी।

इसके बाद मैंने परमेश्वर के निम्नलिखित वचन पढ़े : "शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का लाभ उठाता है। इन सामाजिक प्रवृत्तियों में अनेक बातें शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं: 'क्या वे उन कपड़ों के बारे में हैं जिन्हें हम पहनते हैं? क्या वे नवीतनम फैशनों, सौन्दर्य प्रसाधनों, बाल सँवारने एवं स्वादिष्ट भोजन के विषय में हैं?' क्या ये इन चीज़ों के बारे में हैं? ये प्रवृतियों का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ इन बातों के बारे में बात करना नहीं चाहते हैं। ऐसे विचार जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों के लिए ले कर आती हैं, जिस तरह से वे संसार में लोगों से स्वयं का आचरण करवाती हैं, जीवन के लक्ष्य एवं जीवन को देखने का नज़रिया जिन्हें वे लोगों के लिए लाती हैं, हम केवल उनके बारे में ही बात करने की इच्छा करते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की अवस्था को नियन्त्रित और प्रभावित कर सकती हैं। एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करते रहते हैं, जिसके कारण वे लगातार विवेक, मानवता और कारण को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाते हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। … जब किसी प्रवृत्ति की हवा आर-पार बहती है, तो कदाचित् सिर्फ छोटी सी संख्या में ही लोग प्रवृत्ति स्थापित करने वाले बनेंगे। वे इस किस्म की चीज़ों को करते हुए शुरुआत करते हैं, इस किस्म के विचार या इस किस्म के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी अनभिज्ञता के बीच इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, और सभी इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए जो स्वस्थ्य शरीर और मन के नहीं है, जो कभी नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकते हैं, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभी से स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को स्वीकार करवाती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें 'प्रदान' करता है। उनमें सामर्थ्य नहीं है, न ही उनमें योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI")। परमेश्वर के इन वचनों से मेरे दिमाग में वो बातें आयीं, जो मेरे पति ने मुझसे कहीं थी : "यह बहुत आम बात है। यहाँ बहुत लोग ऐसा करते हैं!" क्या मेरे पति के विचार और दृष्टिकोण उस बात के वास्तविक जीवन के उदाहरण नहीं हैं, जो परमेश्वर के वचनों में उजागर की गई है कि कैसे समाज की बुरी रीतियां लोगों को अपनी तरफ खींचकर उन्हें बर्बाद कर देती हैं? देश छोड़ने से पहले मेरा पति वह अपने परिवार का ध्यान रखता था और मेरी और हमारे बच्चों की परवाह करता था। लेकिन काम के लिए घर छोड़कर जाने के बाद केवल तीन सालों में वह समाज की बुरी रीतियों का पूरी तरह से अनुसरण करने लगा था—उसने अपने सबसे करीबी लोगों को धोखा दे दिया था। जब मैंने आज के समाज के बारे में सोचा, तो मुझे एहसास हुआ कि कई औरतों को किसी की रखैल बनना शर्मिंदगी की बात नहीं लगती—उलटे वे समझती हैं कि उन्हें ज्यादा ज्ञान है। कई पुरुषों को इस तरह के खतरनाक विचारों से नुकसान पहुंचाया गया है : "घर का लाल झंडा ऊपर हवा में स्थिर रहता है, जबकि बाहर का रंगीन झंडा मंद हवा में लहराया करता है।" इस तरह के विचारों के कारण वे ढिठाई से विवाहेतर संबंध बना लेते हैं। उन्हें इससे शर्मिंदगी महसूस नहीं होती, बल्कि इसे वे गौरव की बात समझते हैं। मेरा पति मुझे तलाक नहीं देना चाहता, लेकिन वह उस महिला को छोड़ना भी नहीं चाहता। क्या वह इस प्रकार के बुरे विचारों व दृष्टिकोण से नियंत्रित नहीं है? परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मैं यह समझने में सक्षम हो गई कि असल में हर कोई पीड़ित है। हर कोई शैतान द्वारा दिमाग में भरे गए बुरे विचारों से ठगा गया है। यही वजह है कि हम इस हद तक भ्रष्ट हो गए हैं कि हममें कोई नैतिकता और शर्म नहीं रह गई है। मैंने सोचा, "लोगों को अपनी खुद की स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ पूरी करके क्या मिलता है? क्या वे वाकई खुशी पा सकते हैं?" अगर मेरे पति और उस महिला की बात करें, तो मुझे नहीं लगता कि वे किसी भी तरह से मुझसे ज्यादा खुश हैं। इसके अलावा, वो बच्चा भी एक बेगुनाह पीड़ित है। क्या यह विपदा नहीं है कि हमारे पूरे परिवार को शैतान के भ्रष्टाचार और नुकसान की वजह से कष्ट भोगना पड़ा है? जब मैं खुद के बारे में सोचती हूँ, तो अगर मुझे परमेश्वर का उद्धार मुझे प्राप्त नहीं हुआ होता, तो मैं भी समाज की बुरी रीतियों से अंदर तक सड़ गई होती। मैंने सोचा था कि चूंकि मेरे पति ने दूसरी महिला ढूँढ़ है, तो मैं भी इसी तरह से दूसरा पुरुष खोज सकती हूँ, क्योंकि बहुत-से दूसरे पुरुष मुझे चाह सकते हैं। मैं आभारी हूँ कि परमेश्वर ने मुझे ठीक उस समय बचा लिया, जब शैतान मुझे निगलने ही वाला था। परमेश्वर ने मुझे अपने समक्ष आने और अपनी सुरक्षा हासिल करने की अनुमति दी थी, अन्यथा समाज की बुरी रीतियों ने मुझे बर्बाद कर दिया होता।

बाद में मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के आरपार उज्जवल, और सही मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो, केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक मानवता को जी सकते हो, सत्य को धारण कर सकते हो, सत्य को जान सकते हो, और केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सत्य से जीवन को प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की क्षति और नियन्त्रण से मुक्त कर सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम अब और कष्ट नहीं सहो: यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है, केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वही तुम्हारे लिए सभी चीज़ों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजित या सृजित नहीं किया गया प्राणी प्राप्त नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई भी सृजित या सृजित नहीं किया गया प्राणी परमेश्वर के इस प्रकार के सार को धारण नहीं कर सकता है, इसलिए किसी भी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI")। परमेश्वर के वचनों से मैं मानवजाति के लिए उसके प्रेम और परवाह को महसूस कर सकती थी और मुझे ये भी समझ आ गया कि भले ही शैतान हमें भ्रष्ट करने और नुकसान पहुंचाने के लिए सभी प्रकार की सामाजिक रीतियों का प्रयोग करता है, लेकिन परमेश्वर ने कभी भी हमारे उद्धार का परित्याग नहीं किया है। परमेश्वर हमेशा चुपचाप हमारी रक्षा करता रहता है और विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ बनाता रहता है, ताकि हम उसके समक्ष आकर उसका उद्धार स्वीकार कर सकें। यह सोचते हुए कि मैं अपने पति के दगा करने के बाद कैसे नफरत और पीड़ा में जी रही थी, मैं जान गयी कि अगर परमेश्वर की परवाह और दया नहीं होती, अगर उसके वचनों ने मुझे सुकून और प्रोत्साहन नहीं दिया होता, जिससे कि मैं शैतान की उन षडयंत्रों और कपट से भरी योजनाओं को समझ पाऊँ जिनके द्वारा वो लोगों को भ्रष्ट करता है, तो मैं हमेशा ही पीड़ा और नफरत की स्थिति में जीती। मैं कभी इससे खुद को मुक्त न कर पाती। यहाँ तक कि अपने दिल की घृणा खत्म करने के लिए मैं खुद को ही पूरी तरह नष्ट कर लेती। इस अनुभव के माध्यम से न सिर्फ मैंने परमेश्वर के प्रेम का अनुभव किया, बल्कि मुझे इसका भी एहसास हुआ कि केवल परमेश्वर ही मानवजाति को शैतान की भ्रष्टता और नुकसान से बचा सकता है और हमें जीवन में रोशनी के पथ पर ले जा सकता है। मुझे दर्द के रसातल से बचाने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

इन दिनों चूंकि मैंने परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ा है, इसलिए मैं सत्य को थोड़ा—बहुत समझ गई हूँ और कई चीजें देख सकती हूँ। अब मैं अपने पति या उस महिला से नफरत नहीं करती। वे यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि वे किस प्रकार की जिंदगी जीना चाहते हैं। रिश्तेदारों व दोस्तों के साथ भी मैं शांतिपूर्वक पेश आने में सक्षम हूँ। मैं अब अपने परिवार वालों को दोष नहीं देती, क्योंकि हम सभी को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और हम सभी उससे पीड़ित हैं। अब मैं अक्सर ही अपने भाई-बहनों के साथ धर्मसभाओं में शामिल होती हूँ, जहाँ हम परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, संगति करते हैं एवं अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं। मैं परमेश्वर के वचनों से हर रोज फायदा लेती हूँ। मेरे दिल में शांति और आनंद है और मेरी जिंदगी आशा से भरी हुई है। जीवन के सही मार्ग पर मेरा मार्गदर्शन करने के लिए और मुझे सच्चा परिवार देने के लिए मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ। यहीं मुझे सच्ची खुशी मिली है और मेरी बस यही कामना है कि मैं हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करती रहूँ!

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