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कठिनाइयों में, परमेश्‍वर का प्रेम मेरे साथ है

ली लिंग, हेनान प्रांत

मेरा नाम ली लिंग है, और मैं इस वर्ष 76 साल की हो गई हूँ। 1978 में बीमार पड़ने के बाद मैंने प्रभु यीशु पर विश्वासकरना शुरू किया, और उस अवधि के दौरान मुझे उनकी कृपा का बहुत लाभ मिला। इसने वास्तव में मुझे उत्साहपूर्वक प्रभु के लिए काम करने को प्रेरित किया; मैं हर जगह जाकर धर्मोपदेश देने और सुसमाचार को साझा करने लगी, और साथ ही अपने घर में भाइयों और बहनों की मेज़बानी करने लगी। हमारा कलीसिया बहुत तेज़ी से बढ़कर 2,000 से अधिक लोगों की मंडली बन गया, और इसके परिणामस्वरूप, कुछ ही समय बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की सरकार ने हमारा उत्‍पीड़न शुरू कर दिया। मुझे अपने विश्वास पर अमल करने और सुसमाचार के प्रसार से रोकने की कोशिश में पुलिस ने कई बार आकर मेरे घर की तलाशी ली, और हर बार जब वे आते, तो हर मूल्‍यवान वस्‍तु को और उठा ले जाने लायक हर वस्‍तु को ले जाते थे—यहाँ तक कि बिजली के बल्‍ब भी नहीं छोड़ते थे। इतना ही नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो (पीएसबी) के अधिकारियों ने एक दर्जन से अधिक बार मुझे गिरफ्तार किया और हिरासत में रखा। मैंने 1996 में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को स्वीकार किया, और उसके दो साल बाद मुझे एक बार फिर से सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ्तारी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, लेकिन इस बार यह और भी अधिक पागलपन भरा था। मैंने पहली बार अनुभव किया कि चीन जैसे नास्तिक देश में परमेश्‍वर के प्रति आस्था रखना कितने अविश्वसनीय रूप से कठिन था। इन सभी कठिनाइयों के बावजूद, मैं अब भी अपने लिए परमेश्‍वर के उद्धार और प्रेम को महसूस कर सकती थी।

मई 1998 में एक दिन देर रात 2:00 बजे के करीब, ज़ोर से मेरा दरवाज़ा पीटे जाने की आवाज़ से मैं गहरी नींद से चौंककर जाग गई। मैं घबरा गई और सोचने लगी, "शायद यह पुलिस है! सुसमाचार फैलाने के लिए शहर के बाहर से आए पाँच भाई-बहन यहाँ हैं। मैं उनकी रक्षा कैसे करूँ?" मुझे दहशत हो गई। इससे पहले कि मैं दरवाजे तक पहुँच पाती, पुलिस ने जोर के धमाके के साथ लात मारकर उसे खोल दिया। हाथ में पिस्‍तौल लिए पीएसबी राजनीतिक सुरक्षा विभाग के प्रमुख और बिजली वाले डंडे लिए हुए एक दर्जन से अधिक पुलिस अधिकारी आक्रामक तरीके से कमरे में घुस आए। दहलीज को पार करते ही एक अधिकारी ने मेरी ओर मुड़कर, मुझे बेरहमी से लात मारी और चिल्लाया, "क्या बकवास है? तुझे कई बार गिरफ्तार किया गया है, लेकिन तू अब भी परमेश्‍वर पर विश्वास करने की जुर्रत करती है। मेरी बात याद कर ले, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि तेरे पास जो कुछ भी है तू उसे खो दे और तेरा परिवार तबाह हो जाए!" दुष्‍ट अधिकारी शयनकक्षों में जाकर चिल्लाने लगे। "हम पुलिसवाले हैं, फौरन उठ जाओ!" अन्य भाई-बहनों के कपड़े पहनने का भी इंतज़ार किए बिना, उन्होंने हमें दो-दो साथ करके हथकड़ी लगाई, हमारी तलाशी ली, और एक अंगूठी भी ले ली जो मैंने पहन रखी थी। उन्होंने फिर पूरी जगह को उलट-पुलट करना शुरू कर दिया, यहाँ तक कि मेरे आटे के भंडार की छानबीन करते हुए इसे पूरे फर्श पर फैला दिया। उन्होंने पूरे फर्श पर सामान फेंक दिया। अंत में वे ग्यारह टेप रिकार्डर, एक टेलीविज़न, एक पंखा, एक टाइपराइटर, और परमेश्‍वर के वचनों की 200 से अधिक पुस्तकें उठाकर ले गए। उन्होंने मेरे बेटे की दराज़ें भी खोल डालीं और एक हज़ार युआन चुरा लिए जो उसे अभी वेतन के तौर पर मिले थे। जिस समय करीब दर्जन भर अधिकारी हम सभी को पुलिस स्टेशन ले जाने वाले थे, उसी समय मेरा बेटा काम से घर वापस आ रहा था। जैसे ही उसने देखा कि उसका वेतन चुरा लिया गया है, वह अधिकारियों के पास गया और उनसे अपने पैसे वापस मांगे। अधिकारियों में से एक ने धूर्तता से कहा, "हम स्टेशन पर इसकी जांच करेंगे और अगर यह तुम्हारा है, तो हम इसे वापस दे देंगे।" लेकिन इसके बजाय, उस शाम वे मेरे बेटे को "सरकारी काम में बाधा डालने" के आरोप में गिरफ्तार करने आ गए। सौभाग्य से, वह पहले ही छिप गया था, वरना उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया होता।

पुलिस ज़ब्त की गई पुस्तकों और अन्य वस्तुओं को पुलिस स्टेशन ले गई, और फिर हम सभी छह लोगों को काउंटी पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो में रात भर अलग-अलग बंद रखा। वहाँ बैठे हुए, मैं थोड़ी देर के लिए भी, कहीं भी शांति से नहीं रह पा रही थी। मैंने 1987 की अपनी गिरफ्तारी के बारे में सोचा; मेरे साथ पुलिस ने शारीरिक और मौखिक रूप से दुर्व्यवहार किया था और यातनाएं देकर मुझे लगभग मौत के मुँह में पहुँचा दिया था। मैंने अपनी आंखों से यह भी देखा था कि बीसेक साल के एक युवक को पुलिस ने दो घंटे से कम समय में पीट-पीट कर मार डाला था, और एक महिला ने बताया कि पूछताछ के दौरान दो अधिकारियों ने उसके साथ बारी-बारी से बलात्कार किया था। अधिकारी लोगों को टाइगर बेंच पर भी बिठाते थे, उन्हें जलते लोहे की छड़ से जलाते थे, और बिजली के डंडों से उनकी जीभ पर इतने झटके देते थे कि उसमें बिल्‍कुल खून नहीं रह जाता था। लोगों को यातनाएं देने के लिए वे तमाम तरह के घृणित, राक्षसी तरीकों का इस्तेमाल करते थे—यह एकदम भयानक है। अपनी दर्जन के करीब गिरफ्तारियों के दौरान मैंने पुलिस की इस क्रूर और निर्दयी यातना को व्यक्तिगत रूप से देखा है और व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव किया है। वे किसी भी तरह का अत्याचार करने में सक्षम हैं। एक बार फिर इस "नरक के द्वार" पर लाए जाने और पुलिस को यह कहते हुए सुनकर कि "मेरी ज़ीते-जी चमड़ी उधेड़ी जाएगी", मैं आतंकित हो गई। उन्होंने उस दिन मेरे घर से बहुत सारी चीज़ें ज़ब्‍त की थीं और कई अन्य भाई-बहनों को भी गिरफ्तार किया था। वे मुझे आसानी से कतई छोड़ने वाले नहीं थे। और इसलिए मैंने दिल ही दिल में परमेश्‍वर से प्रार्थना की। "हे परमेश्‍वर! मुझे पता है कि हम तेरी इजाज़त से आज पुलिस के हाथों में पड़ गए हैं। मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही हूँ क्योंकि वे सभी राक्षस हैं जिनमें ज़रा भी मानवता नहीं है, और इसलिए मैं तुझसे विनती करती हूँ कि मुझे साहस और ज्ञान दे, और मुझे कहने के लिए सही शब्द प्रदान कर। मैं तेरी साक्षी बनने के लिए तैयार हूँ—मैं किसी भी हाल में यहूदा बनकर तेरे साथ विश्‍वासघात नहीं करूंगी! मैं यह भी आशा करती हूँ कि तू गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों की रक्षा करेगा ताकि वे इस स्थिति के दौरान मज़बूती से खड़े हो सकें। परमेश्‍वर, तू पूरे ब्रह्मांड के राजा है, और सभी घटनाएँ, सभी चीज़ें तेरे नियम और व्यवस्थाओं के अधीन हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब तक मैं सच्चाई से तुझ पर निर्भर रहूँगी, तब तक तू निश्चित रूप से हमें शैतान के अंधेरे के प्रभाव को दूर करने की राह दिखाएगा।" जब मैं प्रार्थना कर रही थी तब परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया, और इससे मुझे उसके इन वचनों का ख्याल आया: "मसीह का अतींद्रिय जीवन प्रकट हो चुका है, ऐसा कुछ भी नहीं जिससे तुम डरो। शैतान हमारे पैरों के नीचे है और उसका समय सीमित है। ...मेरे प्रति विश्वासयोग्य रहो, सबसे बढ़कर, बहादुरीसे आगे बढ़ो; मैं तुम्हारी चट्टान हूँ, मुझ पर भरोसा रखो!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 10")। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझे विश्वास से भर दिया। यह सच है—परमेश्‍वर सर्वशक्तिमान है और शैतान हमेशा परमेश्‍वर के हाथों पराजित होगा। परमेश्‍वर की अनुमति के बिना यह मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता। मैंने सोचा कि अपने विश्वास को प्राप्त करने के बाद से सीसीपी सरकार द्वारा मुझे कितनी बार गिरफ्तार किया गया; क्या मैंने परमेश्‍वर की सुरक्षा में बार-बार इन चुनौतियों पर विजय नहीं प्राप्‍त की है? मैंने नबी दानिएल के बारे में भी सोचा कि किस तरह उसे और उसके तीन दोस्तों को दुष्‍ट लोगों द्वारा फंसाया गया, फिर शेरों की मांद में फेंक दिया गया और आग की भट्ठी में जला दिया गया, केवल इसलिए क्योंकि वे यहोवा के नाम को मानते थे और यहोवा परमेश्‍वर की आराधना करते थे। लेकिन वे परमेश्‍वर की सुरक्षा में थे और उन्‍हें आंच भी न आई। यह सब सोचकर मैं अचानक साहस मेरे अंदर उमड़ने लगा और मुझे लगा कि मैं ताकत से भरी हुई हूँ। मैं जान गई कि शैतान मुझे चाहे जितना भी प्रताड़ित करे या नुकसान पहुँचाए, जब परमेश्‍वर मेरा मज़बूत रक्षक है, तो मेरे लिए डरने की कोई बात नहीं है। मैं अपने विश्वास पर भरोसा करने और परमेश्‍वर के साथ सहयोग करने के लिए, शैतान के सामने परमेश्‍वर की साक्षी बनने के लिए तैयार थी।

अगली सुबह पुलिस ने मुझसे पूछताछ शुरू की। एक अधिकारी जिसने मुझसे पिछले कई अवसरों पर पूछताछ की थी, उसने मेरी तरफ घूरकर देखा, मेज पर हाथ मारा और गुर्राकर बोला, "तो तुम फिर आ गई, बुड्ढी कुतिया। तू फिर से मेरे हाथों में आ गई है। अगर तू इस बार नहीं बताती कि तू क्‍या-क्‍या जानती है तो तू भारी मुश्किल में पड़ने वाली है। बता! वे सभी लोग कहाँ हैं जो तेरे घर पर रह रहे थे? कलीसिया का नेता कौन है? वो किताबें कहाँ से आईं? टाइपराइटर किसका है?" मैं बहुत घबरा गयी; वह अधिकारी बेहद दुष्‍ट और अहंकारी था, किसी को पीट-पीटकर मार डालने में उसे कोई हिचकिचाहट नहीं होगी। मैंने डर से अपना सिर नीचे कर लिया और कोई आवाज़ नहीं की, और पूरे समय चुपचाप परमेश्‍वर से प्रार्थना करती रही कि मेरे हृदय का ध्‍यान रखे। यह देखकर कि मैं बोल नहीं रही थी, अधिकारी चिल्‍लाकर मुझे गालियाँ देने लगा। "बुढ़िया डायन, मरे सुअर को खौलते पानी से डराने का कोई फ़ायदा नहीं!" वह चिल्लाते हुए मेरी ओर दौड़ा और मेरी छाती की हड्डी पर उछलकर लात मारी। मैं कई मीटर पीछे जाकर पीठ के बल फर्श पर ज़ोर से गिरी। इससे इतना दर्द हुआ कि मैं सांस नहीं ले पा रही थी। वह मुझे छोड़ने को तैयार नहीं था, वह झपटकर आगे आया और मेरे कपड़े पकड़कर फर्श से मुझे उठाते हुए कहा, "मूर्ख बुड्ढी कुतिया! मैं आज तुझे मरने नहीं दूंगा, लेकिन मैं ऐसा कर दूंगा कि तेरा जीवन जीने लायक नहीं रह जाएगा। तू बाकी जीवन कष्‍ट भोगेगी!" यह कहते हुए, उसने बिजली के डंडे से झटका दिया; उसकी नीली रोशनी निकलते देखकर, मुझे वास्तव में डर लगा। मैंने चुपचाप परमेश्‍वर से प्रार्थना की, और तभी उनके कुछ वचन मेरे ध्यान में आए: "तुम्हें सब कुछ सहना होगा, तुम्हारे पास जो कुछ है उसे तुम त्याग दोगे और मेरा अनुसरण करने के लिए जो कुछ तुम कर सकते हो वह तुम करोगे; मेरे लिए पूरी कीमत चुकाओगे। यह वह समय होगा जब मैं तुम्हें परखूंगा, क्या तुम अपनी निष्ठा मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम अपनी ईमानदारी से मार्ग के अंत तक मेरे पीछे चलोगे? मत डरो; मेरी सहायता के कारण कौन तुम्हारे मार्ग में बाधा डाल सकता है? यह स्मरण रखो! स्मरण रखो! जो कुछ घटित होता है वह मेरी भली इच्छा से और मेरी देख-रेख में होता है। क्या तुम्हारा हर शब्द व कार्य मेरे वचन के अनुसार हो सकता? जब अग्नि परीक्षा तुम पर आती हैं, क्या तुम घुटने टेक कर पुकारोगे? या दुबक कर आगे बढ़ने में असमर्थ होगे?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 10")। परमेश्‍वर के वचनों के माध्यम से, मैंने न केवल मज़बूत और साहसी महसूस किया, बल्कि उसकी इच्छा को समझ लिया। जिस परीक्षा से मैं उस समय गुज़र रही थी, वह परमेश्‍वर द्वारा मुझे परखने का समय था। वह अधिकारी मुझे शारीरिक यातनाएँ देकर मुझसे परमेश्‍वर के साथ विश्‍वासघात करवाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मेरे लिए परमेश्‍वर की इच्छा थी कि मैं उसके प्रति अपनी भक्ति और प्रेम का समर्पण करूं। वह मुझ पर अपनी उम्मीदें लगा रहा था, और इसलिए मैं अपनी देह से हार मानकर शैतान की शक्तियों के आगे झुक नहीं सकती थी। मुझे पता था कि मुझे परमेश्‍वर के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होना होगा और उसकी एक शानदार साक्षी बनना होगा। अधिकारी ने अपने डंडे से मुझ पर बेतहाशा प्रहार किए और बिजली का करेंट मुझमें दौड़ता रहा जिससे मेरा शरीर सिमट कर गेंद जैसा हो गया। मुझे बिजली के झटके देते हुए वह चिल्लाया, "बोल! अगर नहीं बताएगी तो मैं बिजली के झटके दे-देकर तुझे मौत के घाट उतार दूंगा!" मैंने दांत भींच लिए और तब भी एक शब्द भी नहीं कहा। यह देखकर, वह गुस्से से पागल हो गया। उस वक्‍त, मुझे नस-नस से उस विक्षिप्त दानव से नफरत हो गयी थी। मनुष्य को परमेश्‍वर ने बनाया है; उस पर विश्वास करना और उसकी पूजा करना, निस्संदेह सही और उचित है, लेकिन सीसीपी पागलों की तरह परमेश्‍वर का विरोध करती है, विश्‍वास करने वालों को क्रूरता से उत्पीड़ि‍त करती और सताती है, यहां तक कि मेरे जैसी 60 साल की बुजुर्ग महिला को भी नहीं बख्शती है। यहां तक कि वे मुझे मार डालना चाहते थे! जितना अधिक उन्होंने मुझे नुकसान पहुँचाया, उतनी ही घृणा से मैंने अपने दांतों को भींचा और अपने दिल में शपथ ली: भले ही मैं मर जाऊँ, पर मैं परमेश्‍वर की साक्षी बनूंगी। मैं एक शर्मनाक ज़िंदगी जीने वाली विश्‍वासघाती नहीं बनूंगी जिस पर शैतान तिरस्‍कार से हंसता है। अधिकारी मुझे पीट-पीटकर और मुझ पर चिल्लाकर थक गया, इसलिए जब एक अधिकारी ने देखा कि मैं अब भी कुछ नहीं कह रही थी, तो उसने मुझे फुसलाने की कोशिश की: "आप इतनी बूढ़ी हैं—यह सब किसलिए कर रही हैं? बस हमें वह बता दीजिए जो हम जानना चाहते हैं, आपको वो चीज़ें किसने दीं और वे लोग कहाँ रहते हैं और हम आपको घर पहुँचा देंगे।" परमेश्‍वर ने मुझे प्रबुद्ध कर दिया जिससे मैं शैतान की इस चालबाज़ी को समझ गई, इसलिए मैंने अब भी कुछ नहीं कहा। यह देखकर कि मैं मुँह नहीं खोल रही हूँ, वह अचानक उल्टा व्यवहार करने लगा और मुझे धमकाना शुरू कर दिया। "सच-सच बता दो तो तुम्‍हें ज़्यादा बुरी सजा नहीं मिलेगी, वरना तुम्हें अधिक कठोर सज़ा मिलेगी। अगर तुम नहीं बताओगी तो तुम्‍हें 12 साल कैद की सज़ा होगी और तुम जीवन भर के लिए कैद कर दी जाओगी!" जब मैंने उसे यह कहते हुए सुना कि मुझे 12 साल की जेल होगी तो मेरा सिर घूम गयाऔर मैंने सोचा, "मेरी शारीरिक स्थिति इतनी बुरी है कि मैं एक साल भी नहीं टिक सकती, 12 तो बहुत हैं। शायद मैं जेल में ही मर जाऊंगी।" अपने बाकी दिन बिना सूरज देखे मनहूस जेल में बिताने के विचार से मैं बेहद उदास हो गई। क्या मैं कलीसिया के जीवन और परमेश्‍वर के वचनों के सहारे के बिना टिकी रह पाउंगी? निराश होकर, मैंने चुपचाप परमेश्‍वर से प्रार्थना की। उसने तुरंत मुझे प्रबुद्ध कर दिया, जिससे में उसके इन वचनों के बारे में सोचने लगी: "संसार में जो कुछ भी होता है, उसमें से ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर अंतिम बात मेरी न हो। ऐसा क्या मौजूद है जो मेरे हाथों में नहीं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1")। यह सच है! मनुष्यों के भाग्य परमेश्‍वर के हाथों में हैं, और सभी घटनाएं और सभी चीज़ें उसके शासन और व्यवस्थाओं के अधीन हैं। बिना किसी अपवाद के, परमेश्‍वर जो कहता है वही होता है; अगर परमेश्‍वर मुझे जेल जाने की इजाज़त नहीं देता, तो पुलिस कुछ नहीं कर सकती, लेकिन अगर वह ऐसा चाहता है, तो मैं बिना किसी शिकायत के जेल जाने के लिए प्रस्तुत रहूँगी। पतरस परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना के लिए, परीक्षाओं और क्‍लेश के लिए खुद को प्रस्‍तुत कर सका था। उसके पास विकल्प नहीं था, और उसने खुद को पूरी तरह से परमेश्‍वर को सौंप दिया और परमेश्‍वर की व्यवस्थाओं का पालन किया। अंत में उसे परमेश्‍वर के लिए उल्टा सूली पर चढ़ा दिया गया—उसने मरते समय तक आज्ञापालन किया और परमेश्‍वर के लिए प्रेम का सूत्रधार बन गया। मैं जानती थी कि उस दिन मुझे पतरस के उदाहरण से सीखना था और खुद को परमेश्‍वर के हाथों में सौंप देना था। भले ही इसका मतलब उम्र कैद की सज़ा हो, मुझे तो परमेश्‍वर के प्रति समर्पित होना था। अंत में पुलिस ने मुझे एक हिरासत केंद्र में भेज दिया।

हिरासत केंद्र में, मुझे लगा जैसे मैं एक जीते-जागते नरक में थी। कोठरियों में कोई खिड़की नहीं थी, न ही बिजली थी, और सिर्फ लगभग 10 वर्ग मीटर की एक कोठरी में 20 से अधिक लोगों को ठूंस दिया गया था। हमें कोठरी के भीतर ही खाना, पीना और निवृत्त होना पड़ता था। पूरे फर्श पर पानी से भरे छोटे-छोटे गड्ढे थे और कुछ दरियां बिछी हुई थीं, लेकिन कोई कंबल या चादर नहीं थी। हम सभी को सोने के लिए उन पानी भरे गड्ढों पर ही लेटना पड़ता था। शौच के लिए कोने में एक बाल्टी थी, और हर जगह मच्छर और मक्खियाँ भरी थीं। बदबू इतनी बुरी थी कि मैं मुश्किल से सांस ले पाती थी; सभी लोग लोहे के फाटक के पास जगह के लिए जूझते थे ताकि उन्हें एक फुट से भी कम की खुली जगह से कुछ हवा मिल सके। गर्मी के मौसम बहुत गर्मी हो जाती थी और इतने सारे लोग उस छोटी-सी कोठरी में ठूंसे गए थे, इसलिए कई कैदी नग्न रहते थे, कुछ भी नहीं पहनते थे। अक्सर छोटी-छोटी बातों पर कैदियों के बीच झगड़े होते थे और वे लगातार अश्लील गालियों का इस्‍तेमाल करते थे। हमारा दैनिक भोजन अधपकी आटे की लपसी और पतले नूडल्स और बिना तेल या नमक के उबली हुई सब्जियों का होता था। कटोरे में नीचे हमेशा गंदगी रहती थी, और सभी कैदियों को दस्त होते रहते थे। हाजिरी के दौरान एक दिन जब हम कुछ ताजी हवा के लिए बाहर थे, मैंने गलती से गलत कैदी नंबर बोल दिया। सुधारगृह का अधिकारी बुरी तरह नाराज़ हो गया, चिल्लाते हुए बोला, "देखो खुद को, क्‍या हालत है! और तुम परमेश्‍वर में विश्वास करती हो!" फिर उसने अपना चमड़े का जूता लिया और उससे मेरे चेहरे पर दस बार वार किया, जिससे मेरे चेहरे पर काले-नीले दाग पड़ गए। मेरी वजह से मेरी कोठरी के सभी लोग मुश्किल में पड़ गए, और सभी पर दस-दस वार हुए। उनके चेहरे भी काले-नीले पड़ गए थे; वे अपने चेहरों को ढँके हुए दर्द से कराह रहे थे। उस समय से सुधारगृह का अधिकारी मुझसे अपनी वर्दियां और कमीजें और बिछावन धुलवाने लगा। मुख्‍य गार्डों में से एक अपने घर पर एक हॉस्‍टल चलाता था और वह वहां से निकलने वाले सभी बिछावनों को मुझसे धुलवाने के लिए ले आता और उनके साफ होने के बाद मुझे उन सभी की हाथ से मरम्‍मत करनी पड़ती। हर दिन बीतने तक मैं इस कदर थककर चूर हो जाती थी कि मेरा पूरा शरीर दर्द से टीसता था; मुझे वाकई ऐसा लगता था कि मैं बिखर रही हूँ। कुछ ही दिनों में मेरे हाथ सूज गए। कभी-कभी जब मैं वास्तव में इसे बर्दाश्त नहीं कर पाती और एक पल के लिए आराम करने लगती, तो सुधारगृह का अधिकारी मुझे बुरी तरह फटकारता था, इसलिए मेरे पास आंसू बहाते हुए काम करते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। रात को आराम करने के समय, हालांकि मुझे नींद आती रहती और मैं शारीरिक रूप से थकी हुई रहती थी, फिर भी मैं अच्छी तरह से सो नहीं पाती थी। मेरी बाहें दर्द से टीसती थीं और मेरी पीठ में इतनी तकलीफ होती थी कि मैं उसे सीधा नहीं कर सकती थी। मेरे पैर भी सुन्न हो जाते थे। आज भी मैं अपनी बाहों को बस चालीस या पचास डिग्री तक ही उठा सकती हूँ—मैं उन्हें सीधे भी नहीं रख सकती। बिना पर्याप्‍त भोजन के इतना कठोर श्रम करने से मुझे पेट की गंभीर समस्याएं हो गई, जिससे मुझे अक्‍सर दस्त होते रहते। ऊपर से, उन दुष्ट पुलिस अधिकारियों द्वारा पीटे जाने से हुए घाव कभी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे। मेरी सेहत बद से बदतर होती गई। बाद में मुझे लगातार हल्का बुखार रहने लगा लेकिन जेल के गार्डों ने मुझे इलाज की अनुमति देने से इनकार कर दिया। न चाहते हुए भी, मैं कमजोर पड़ गई और सोचने लगी, "इस उम्र में अगर इस तरह की यातना जारी रही तो मैं किसी भी दिन यहाँ मर सकती हूँ।" अकेलेपन और बेबसी की भावना मेरे दिल में भर गई और दर्द से भरकर मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की। "हे परमेश्‍वर, इस समय मैं वास्तव में कमजोर हूँ और नहीं जानती कि तेरी इच्छा क्या है। परमेश्‍वर, कृपया मेरा मार्गदर्शन कर, ताकि मैं तेरी साक्षी बन सकूं और तुझे संतुष्ट कर सकूं।" मैंने अपने हृदय से परमेश्‍वर को बार-बार पुकारा, मुझे एहसास भी नहीं हुआ, और परमेश्‍वर के वचनों का एक भजन मेरे मन में लाकर, परमेश्‍वर ने मुझे प्रबुद्ध कर दिया। मैं चुपचाप इस भजन को गुनगुनाने लगी: "इस समय, परमेश्वर इस तरह का कार्य करने के लिए देहधारी बना है, उस कार्य को पूरा करने के लिए जो उसने अभी पूर्ण नहीं किया है, इस युग को समाप्ति की तरफ़ ले जाने के लिए, इस युग का न्याय करने के लिए, दुख के समुन्दर की दुनिया से अत्यंत पापियों को बचाने के लिए और पूरी तरह उन्हें बदलने के लिए। मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से 'नरक' और 'अधोलोक' में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण मनुष्य के जीवन के लिए है")। मैं गुनगुनाती रही और आँसू लगातार मेरे चेहरे पर ढुलकते रहे, और मैं सोचने लगी कि कैसे परमेश्‍वर सर्वोच्च है, और फिर भी उसने विनम्रता से दो बार देहधारण किया है, मानव जाति को बचाने के लिए अंतहीन कष्‍ट और अपमान सहा है। न केवल उसने भ्रष्ट मानव जाति का प्रतिरोध और निंदा सही है, बल्कि उसने सीसीपी के उत्पीड़न और पीछा करने का भी सामना किया है। परमेश्‍वर दोषरहित है और उसने कष्‍ट इसलिए उठाए हैं ताकि मानव जाति भविष्य में अच्छा और खुशहाल जीवन जी सके। उसने बहुत अधिक दर्द और अपमान सहा है, लेकिन उसने कभी इस बारे में कोई झुंझलाहट नहीं प्रकट की है और न ही किसी से शिकायत की है। मैं जो कष्‍ट सह रही थी, वह मुझ पर परमेश्‍वर की कृपा थी और इस सबके पीछे परमेश्‍वर की इच्छा थी। यह इसलिए था ताकि मैं उन राक्षसों की दुष्‍टतापूर्ण असलियत को देख सकूं और फिर शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकूं, शैतान के अंधकारमय प्रभाव से बच सकूं और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकूं। लेकिन मैं परमेश्‍वर के भले इरादों को नहीं समझ पाई थी, थोड़े से ही कष्ट के बाद नकारात्मक और कमजोर हो गई थी। परमेश्‍वर के प्रेम के साथ इसकी तुलना करते हुए, मैंने देखा कि मैं बेहद स्वार्थी और विद्रोही थी। और इसलिए मैंने संकल्प किया कि हालात चाहे जितने भी कड़वे या कितने भी कठोर क्यों न हो जाएं, मैं परमेश्‍वर को संतुष्ट करूंगी और अब उसे चोट नहीं पहुंचाउंगी। मैंने अपने जीवन की शपथ ली कि मैं परमेश्‍वर की साक्षी बनूंगी। अपने आपको समर्पित करने के बाद, मुझे परमेश्‍वर के कार्य दिखाई दिए। पुलिस द्वारा मुझे बंद करने के बाद, परमेश्‍वर ने मेरी उस बहन को प्रेरित किया, जो कि विश्वास नहीं करती थी, उसने पुलिस को 16,000 युआन का जुर्माना और मेरे रहने-खाने के एवज में 1,000 युआन दिये और मुझे रिहा कर दिया गया।

हालाँकि मुझे जेल में तीन महीनों में देह की यातना झेलनी पड़ी, लेकिन मैंने सीसीपी राक्षसों के गिरोह का असली चेहरा और परमेश्‍वर के प्रति उनका प्रतिरोध देख लिया था। सीसीपी सरकार द्वारा कई बार गिरफ्तारियों से गुजरने से मुझे परमेश्‍वर के कार्य, उसकी सर्वशक्तिमानता और बुद्धिमत्ता, और उसके प्रेम की कुछ व्यावहारिक समझ भी हासिल हुई। मैंने देखा कि परमेश्‍वर मेरी निगहबानी कर रहा है और हर समय मेरी रक्षा कर रहा है, और वह कभी भी मेरा साथ नहीं छोड़ता, एक पल के लिए भी नहीं। जब मैं उन राक्षसों द्वारा हर तरह की यातना से गुज़र रही थी और तड़प रही थी, तब परमेश्‍वर के वचनों ने ही बार-बार मुझे शैतान के नुकसान और तबाही पर विजय दिलाई, जिससे मुझे अंधेरे के प्रभाव को दूर करने का विश्वास और साहस मिला। जब मैं कमज़ोर और असहाय थी, तो परमेश्‍वर के वचन ही थे जिन्होंने तुरंत मुझे प्रबुद्ध और निर्देशित किया, मेरे लिए एक सच्चे स्तंभ के रूप में कार्य किया और एक के बाद एक असहनीय दिनों में मेरा साथ निभाया। इस तरह के उत्पीड़न और कठिनाई से गुज़रकर मैंने जीवन का ऐसा खज़ाना हासिल कर लिया है जो शांति और आराम के समय में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इस अनुभव से गुज़रकर, मेरे विश्वास में मेरा संकल्प और भी मज़बूत हो गया है और भविष्य में मुझे चाहे जैसी भी भयंकर चीज़ों का सामना करना पड़े, मैं सत्य और जीवन का अनुसरण करूंगी। मैं अपना हृदय परमेश्वर को देती हूँ क्योंकि वह सृष्टि का स्वामी है, और वह मेरा एकमात्र उद्धारकर्ता है।

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