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न्याय प्रकाश है

चाओ शिया शैन्डोंग प्रांत

मेरा नाम चाओ शिया है। मैं एक साधारण परिवार में पैदा हुई थी। कुछ अभियुक्तियों जैसे कि "एक मनुष्य जहां भी रहता है, एक नाम पीछे छोड़ जाता है, वैसे ही जैसे हंस जहां भी उड़ता है अपनी बोली छोड़ जाता है" और "एक वृक्ष अपनी छाल के लिए जीता है; एक मनुष्य अपने चेहरे के लिए जीता है" कारण प्रतिष्ठा और सम्मान मेरे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गए। मैंने जो कुछ किया वह अन्य लोगों की प्रशंसा, अभिनंदन और सराहना पाने के लिए था। विवाह करने के बाद, मैंने अपने लिए ये लक्ष्य निर्धारित किए: मैं दूसरों की अपेक्षा अधिक धन-सम्पन्न जीवन जीऊँगी; मैं बुजुर्गों के साथ कैसे व्यवहार करती हूँ इस बारे में या मेरे व्यवहार और आचरण के बारे में किसी को भी नकारात्मक चीज़ें कहने का मौका नहीं दूँगी; और मैं यह सुनिश्चित करूँगी कि मेरा बच्चा एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में जाए और उसे भविष्य की अच्छी संभावनाएँ मिलें, ताकि मेरे सम्मान में चार चाँद लग जाएँ। इसलिए, मैंने अपने ससुराल वालों से कभी झगड़ा नहीं किया। कभी-कभी, जब वे मुझे कठोर बातें सुनाते थे, तो मैं इतना व्यथित महसूस करती थी कि मैं छिप कर रोती थी लेकिन उन्हें अकड़ नहीं दिखाती थी। जब मैं दूसरों को चीनी नव वर्ष और अन्य अवसरों पर अपने माता-पिता के लिए कपड़े खरीदते देखती, तो मैं तुरंत अपनी सास के लिए कुछ खरीद लेती, और यह सबसे अच्छी किस्म का भी होता। जब रिश्तेदार मुलाकात के लिए आते, तो मैं खाने का समान खरीदने और खाना पकाने में सहायता करती थी। यहाँ तक कि जब यह थोड़ा कठिन या थकाऊ भी होता था, तो भी मैं पूरी तरह से तैयार रहती थी। इस डर से कि कहीं मैं धन-दौलत के मामले में दूसरों से पीछे न रह जाऊँ, मैं अपनी एक महीने कि नन्ही बेटी छोड़ कर सीधे काम पर वापस चली गई। परिणामस्वरूप, मेरी बेटी कुपोषण से पीड़ित हो गई और हाड़-मांस का ढांचा बन कर रह गई क्योंकि उसे मेरा दूध नहीं मिल पाया था। 100 पोषण इंजेक्शन के बाद ही उसकी हालत में सुधार हुआ, जबकि मैं इतनी थकी हुई होती थी कि मुझे हर दिन पीठ में दर्दहोता था। भले ही यह मुश्किल और थकाऊ था, फिर भी मैंने कठिनाई को सहन किया और अथक प्रयास किया ताकि अच्छा नाम कमा सकूँ। केवल थोड़े से वर्षों में ही, मैं गाँव में एक प्रसिद्ध बहू बन गई, और मेरा परिवार अमीर बन गया और हमारे आस-पास के लोग हमसे ईर्ष्या करने लगे। परिणामस्वरूप, मेरे ससुराल वाले, पड़ोसी, रिश्तेदार और दोस्त सभी मेरे लिए प्रशंसा से भरे होते थे। अपने आस-पास के लोगों की प्रशंसा और अभिनंदन सुनकर मेरा खोखला घमंड बहुत संतुष्ट होता था। मुझे लगता था कि पिछले कुछ वर्षों की मेरी कठिनाइयाँ बेकार नहीं गईं थीं, और मैं अंदर से झूठी प्रशंसा से भरी थी। लेकिन, मेरे देवर के विवाह के बाद मेरे शांत जीवन में अवरोध आ गया। उनकी पत्नी हमेशा मुझसे व्यंग्यात्मक ढंग से बोलती थी, कहती थी कि मेरी सास के साथ अच्छी तरह से व्यवहार करने में मेरा गुप्त अभिप्राय है, मैं ऐसा सिर्फ उनकी संपत्ति के लिए कर रही हूँ। वह हमेशा कहती थी कि हमारी सास पक्षपाती हैं क्योंकि उन्होंने उसके परिवार को जितनी सम्पत्ति दी है उससे अधिक मेरे परिवार को दी है, और हम इस कारण हम अक्सर बहस करते थे। मैं बहुत व्यथित महसूस करती थी और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सार्वजनिक रूप से उसके साथ बहस करना चाहती थी, किन्तु इससे वह छवि बर्बाद हो जाती जो मैंने लोगों के हृदयों में बनाई थी। इसलिए, मैं स्वयं को रोक लेती, और जब मैं इसे और सहन नहीं कर पाती थी तो मैं अकेले में ज़ोरों से रोती थी। इसके बाद, भाभी ने अपना भाग्य आज़माते हुए मेरे परिवार को दी गयी ज़मीन पर कब्जा कर लिया, यह देखकर मैं गुस्से से काँपने लगी और कई दिनों तक मैंने न खाया न पिया। मैं इस पर उसके साथ लड़ना भी चाहती थी। हालाँकि, यह सोचकर कि इससेमेरी इज्ज़त कम हो जाएगी, यह मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएगा, और मेरे आस-पास के लोगमुझे तुच्छ समझेंगे, मैं कड़वा घूंट पीकर रह गयी, किन्तु अंदर से मुझे इतना दमन किया गया महसूस हुआ कि मैं बहुत कष्ट में थी। मैं सारा दिन उदास दिखती और आह भरती थी, मुझे लगता था कि जीवित रहना बहुत पीड़ादायक और थकाने वाला है और नहीं जानती थी कि ऐसे जीवन का अंत कब होगा।

मनुष्य का अंत वास्तव में परमेश्वर की शुरुआत है। जब मैं पीड़ा में थी और असहाय महसूस कर रही थी तभी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने उद्धार के अपने हाथों को मेरी ओर बढ़ाया। एक दिन, मेरे पड़ोसी ने मुझसे कहा: "क्या आप परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करती हैं?" मैंने उत्तर दिया: "कौन नहीं करता है? मेरा मानना है कि परमेश्वर विद्यमान है।" उसने फिर कहा कि वह जिस परमेश्वर पर विश्वास करती है वही एकमात्र और सच्चा परमेश्वर है जिसने ब्रह्मांड और सभी चीजों को बनाया है, और शुरुआत में, मानवजाति परमेश्वर के आशीष में रहती थी क्योंकि वे परमेश्वर की आराधना करते थे, किन्तु शैतान द्वारा उन्हें भ्रष्ट कर दिए जाने के बाद, वे परमेश्वर की आराधना अब और नहीं करते और इसलिए परमेश्वर के शाप और दर्द के अधीन रहते हैं। अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों को सत्य प्रदान करने और उन्हें दुःख की खाई से बचाने के लिए आया। इसके अतिरिक्त, उसने परमेश्वर में विश्वास करने के अपने स्वयं के अनुभव का भी संवाद किया। उसके संवाद को सुनने के बाद, मुझे लगा कि मुझे मेरी सबसे बड़ी विश्वासपात्र मिल गयी है, और मैं उसे अपने हृदय की समस्त पीड़ा बताए बिना न रह सकी। इसके बाद, उसने मेरे लिए परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ा: "जब तुम थके हो और इस संसार में खुद को तन्हा महसूस करने लगो तो, व्याकुल मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, रखवाला, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारे ऊपर नज़र रखे हुए है, वह तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में बैठा है। वह उस दिन की प्रतीक्षा में है जब तुम्हारी याददाश्त एकाएक लौट आयेगी: और इस सत्य को पहचान लेगी कि तुम परमेश्वर से ही आए हो, किसको पता किस तरह और किस जगह बिछड़ गए थे, किसको पता किस मोड़ पर सड़क के किनारे बेहोश पड़े थे, और फिर अनजाने में किस मोड़ पर "पिता" मिल जाए। और फिर तुम्हें यह भी एहसास है कि सर्वशक्तिमान निरंतर साथ रहा है, लगातार नज़र रखता रहा है, तुम्हारे लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना")। परमेश्वर के वचन, मेरे दुःखी और उदास हृदय को सान्त्वना देते हुए, मेरे हृदय में एक स्नेहमयी धारा की तरह बह रहे थे, और मैं अपने आँसुओं को गिरने से नहीं रोक पायी। उस पल में, मैं कष्ट में भटकते हुए एक बच्चे की तरह महसूस कर रही थी जो अचानक अपनी माँ के आलिंगन में वापस आ गया हो। मेरे हृदय में एक अकथनीय उत्तेजना और भावना थी। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती रही, क्योंकि जब मेरे पास जाने के लिए कोई जगह न थी तो वह मुझे अपने घर ले आया था और मेरी देखभाल कर रहा था। मैं अपने हृदय और आत्मा से परमेश्वर का अनुसरण करूँगी! तब से, मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ती, परमेश्वर से प्रार्थना करती, और हर दिन परमेश्वर की स्तुति करने के लिए भजनों को गाती थी, जिसने मुझे मेरे हृदय में विशेष रूप से सुकून महसूस हुआ। सभाओं में भाग लेने के माध्यम से, मैंने देखा कि सभी भाई और बहनें बिल्कुल एक बड़े परिवार की तरह थे, भले ही वे रक्त से संबंधित नहीं थे। उनकी बातचीत सरल और स्पष्ट थी, समझ, सहिष्णुता और धैर्य से भरी थी, और ईर्ष्या, संघर्ष और षडयंत्र या मिथ्याभिमान और छल-कपट से रहित थी। वे अमीरों को प्रेम करते हुए गरीबों को धमकाते नहीं थे, और वे सभी हर किसी के साथ ईमानदारी और समानता के साथ व्यवहार करने में समर्थ थे। जब हम मिलजुल कर परमेश्वर की स्तुति में भजन गाते तो मेरा हृदय विशेष रूप से मुक्त महसूस करता। इसलिए मैं इस प्रेममय, स्नेहमय, निष्पक्ष और आनंदमय कलीसिया जीवन से प्रेम करने लगी। मैं आश्वस्त हो गई कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही एक सच्चा परमेश्वर है और मैंने अपना मन बना लिया कि मैं बिल्कुल अंत तक उसका पालन करूँगी।

परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से, मानवजाति को अधिकतम संभव सीमा तक बचाने की परमेश्वर की अत्यावश्यक इच्छा मेरी समझ में आई, और मैंने देखा कि कई भाई-बहन राज्य का सुसमाचार फैलाने के वास्ते स्वयं को खपाने और अर्पित करने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे। इसलिए मैं भी सुसमाचार का उपदेश देने में सक्रिय रूप से शामिल हो गई। मुझे शुद्ध करने और बदलने के लिए, परमेश्वर ने मेरी भ्रष्ट प्रकृति को लक्षित किया और मुझ पर समय-समय पर अपनी ताड़ना और न्याय को कार्यान्वित किया। एक बार, मैं एक संभावित विश्वासी को सुसमाचार का उपदेश देने गई। उस समय खेती का व्यस्त समय चल रहा था। यह देखकर कि वह महिला खेत के कार्य में कितनी व्यस्त है, मैं उसके साथ कार्य करने लगी और साथ में उसे अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्यों की गवाही देती रही। कौन जानता था कि उसके साथ लगातार तीन दिन तक संगति करने के बाद उसका न केवल स्वीकार करने का कोई इरादा नहीं होगा और बल्कि वह मुझ पर चिल्लाएगी: "तू कितनी बेशर्म हो! मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मैं इसमें विश्वास नहीं करती, और फिर भी तू उपदेश देना बंद नहीं करती है।" उसके वचनों ने मुझे ठीक वहाँ चोट पहुँचाई जहाँ पीड़ा होती है। मेरा चेहरा लाल पड़ गया मानो कि मुझे अभी-अभी सभी के सामने कई बार थप्पड़ मारा गया हो, जबकि मेरा हृदय मंद पीड़ा की लहरों से व्यथित हो रहा था। मैंने सोचा: मैं अच्छे इरादों के साथ तुम्हें उपदेश देने के लिए आयी और जब तक मेरी पीठ में दर्द नहीं हो गया तब तक मैंने तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सहायता करके स्वयं को बुरी तरह थका दिया, और फिर भी इसे स्वीकार करने के बजाय, तुमने मेरे साथ इस तरह से व्यवहार किया। तुम कितनी निर्मम हो! मैंने बेहद अपमानित महसूस किया। इसके आगे मैं उससे बात नहीं करना चाहती थी, किन्तु मुझे यह भी लगता था कि यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है, इसलिए मैंने अपने हृदय में चुपचाप प्रार्थना की और उसके कार्य में मदद करते हुए उसके साथ संवाद करना जारी रखने के लिए अपनी आंतरिक पीड़ा को दबा दिया। लेकिन, संवाद करने का बहुत प्रयास करने के बाद भी मैं उसे नहीं जीत सकी थी। घर लौटने पर मैं पिचके गुब्बारे की तरह ढह जाती थी। उस महिला की बातें मेरे दिमाग में घूम रही थीं। मैं इसके बारे जितना अधिक सोचती थी मुझे उतना ही अधिक कष्ट महसूस होता था: मैं क्यों परेशान हो रही हूँ? मेरे अच्छे इरादों के बदले मुझे बस उपहास, अपयश और अपशब्द ही मिले। यह वास्तव में बहुत अन्यायपूर्ण है! किसी ने भी कभी भी मेरे साथ इस तरह से व्यवहार नहीं किया था। सुसमाचार फैलाना बहुत ही कष्टदायक और कठिन है! नहीं, मैं सुसमाचार का उपदेश देने के लिए अब और बाहर नहीं जा सकती हूँ! यदि मैं उपदेश देना जारी रखती हूँ तो मैं किसी को सर उठाकर देख नहीं सकूँगी। जैसे ही मुझे लगा कि मेरे साथ बहुत गलत हुआ है और मैंने इस हद तक पीड़ा महसूस की कि मैं अब सुसमाचार का उपदेश देना नहीं चाहती थी, तभी परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "क्या तू अपने कधों पर बोझ, अपने आदेश और अपनी उत्तरदायित्व के प्रति जागृत है? मिशन के प्रति तेरा ऐतिहासिक एहसास कहाँ चला गया? ...वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं, 'मार्ग कहां है?' उनमें गिरते हुए तारे जैसी ज्योति के लिए कैसी ललक है, कि वह अचानक नीचे आकर उस अंधकार की शक्ति को तितर बितर करे, जिसने कई वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे कैसे उत्सुकतापूर्वक आशा करते हैं और कैसे वे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? ये लोग जो बुरी तरह से सताए जाते हैं, अंधकार की जेल में कैद रहते हैं, छूटने की आशा के बिना, उस दिन भी जब किरण चमकती है; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएं, जिन्हें विश्राम की अनुमति ही नहीं दी गयी, सच में दुर्भाग्य से पीड़ित हैं। वे सदियों से क्रूर रस्सियों के बधंन में हैं, और इतिहास में उनको जमी हुई बर्फ के समान मुहरबंद करके रखा गया है। किसने उनके कराहने की आवाज को कभी सुना है? किसने उनके दयनीय चेहरे को कभी देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिसे उसने अपने हाथों से रचा उस निर्दोष मानव जाति को ऐसी पीड़ा में दुख उठाते हुए देखकर वह कैसे सह सकता है? वैसे भी मानव जाति तो वह दुर्भाग्यशाली है जिस पर विष प्रयोग किया गया है। यद्यपि वे आज के दिन तक जीवित हैं, कौन यह सोच सकता था कि उन्हें लंबे समय से उस दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि तू शिकार हुए लोगों में से एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के खातिर, क्या तू उन्हें बचाने को इच्छुक नहीं है जो जीवित बच गए हैं? क्या तू उस परमेश्वर को कीमत चुकाने हेतु अपना सारा ज़ोर लगाने के लिए इच्छुक नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए?")। परमेश्वर के वचनों की सभी पंक्तियों ने निर्दोष लोगों के लिए उसकी चिंता और बेचैन उदासी और परवाह को प्रकट कर दिया। परमेश्वर अपने हाथ से सृजित किए गए लोगों को शैतान के द्वारा बेवकूफ़ बनते हुएऔर नुकसान पहुंचाए जाते हुए नहीं देख सकता है। परमेश्वर मानवजाति की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा है कि वे जल्दी से परमेश्वर के घर लौटें और उस महान उद्धार को प्राप्त करें जो उसने उन्हें प्रदान किया है। मगर जब मुझे उस महिला ने कुछ कठोर शब्द सुना दिये, तो मुझे लगा कि मेरे साथ गलत हुआ है और मैंने संतप्त महसूस किया, मैंने कठिनाई और कष्ट को लेकर शिकायत कर दी। मैं तो अब और सहयोग करने के लिए भी तैयार नहीं थी क्योंकि मेरा अपमान हुआ था। मेरा विवेक और तर्क कहाँ थे? अंत के दिनों में हम भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए, परमेश्वर का सरकार द्वारा लगातार पीछा किया गया और उसे सताया गया है, धार्मिक जमातों द्वारा परित्यक्त, दण्डित और निंदित किया गया है और परमेश्वर के हम जैसे अनुयायियों द्वारा उसे गलत समझा और उसका विरोध किया गया है। वह पीड़ा और अपमान जो परमेश्वर ने झेला है बहुत अधिक है, बहुत बड़ा है! तब भी, परमेश्वर ने मानवजाति के अपने उद्धार का त्याग नहीं किया, और गुमनाम रहते हुए मानवजाति की आवश्यकता की आपूर्ति जारी रखी। परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है! उसका सार बहुत सुंदर और दयालु है! आज की मेरी कठिनाइयाँ मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर द्वारा सहन किए गए कष्टों की तुलना में कुछ भी नहीं हैं! मैंने स्मरण किया कि मैं भी एक पीड़िता थी, जिसे वर्षों तक शैतान द्वारा नुकसान पहुंचाया गया था। यदि परमेश्वर ने मेरी ओर अपने उद्धार के हाथों को नहीं बढ़ाया होता, तो मैं, प्रकाश और जीने की आशा को पाने में असमर्थ, अभी भी अंधकार में कष्टपूर्वक संघर्ष कर रही होती। चूंकि मैंने परमेश्वर के उद्धार का आनंद लिया है, इसलिए मुझे अपमान और पीड़ा को सहन करना चाहिए ताकि मैं अपना पूरा प्रयास लगाकर परमेश्वर से सहयोग कर सकूँ, अपने कर्तव्य को ठीक से पूरा करूँ और उन निर्दोष लोगों को परमेश्वर के सामने ला सकूँ जिन्हें अभी भी शैतान द्वारा नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यह दुनिया की किसी भी काम की अपेक्षा अधिक मूल्यवान और सार्थक है, और चाहे मुझे कितने भी दुःख का सामना करना पड़े, यह उसके योग्य है! जब मैं इस बारे में सोचा, तो मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ कि सुसमाचार का उपदेश देना एक कष्टदायक कार्य है, और इसके बजाय, मैंने राज्य के सुसमाचार के साथ समन्वय करने में समर्थ होने के लिए खुद को भाग्यशाली माना। यह मेरा सम्मान की बात थी और यह परमेश्वर का उत्कर्ष भी था। मैंने अपना मन बना लिया था: इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे सुसमाचार के कार्य में मुझे किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, मैं अपना सर्वस्व दे दूँगी और परमेश्वर पर भरोसा करूंगी ताकि परमेश्वर के हृदय को सुख पहुँचाने के लिए ऐसे अधिक से अधिक लोगों को उसके सामने लाऊँ जो परमेश्वर के लिए भूखे हैं! इसके बाद, मैंने स्वयं को वापस सुसमाचार के कार्य में लगा दिया।

प्रशिक्षण की अवधि के बाद, जब भी अपने कर्तव्य को पूरा करते समय मैं किसी ऐसे उपदेश के लक्ष्य का सामना करती जिसका रवैया ख़राब था या जो मुझसे कठोर बातें कहता था, तो मैं इसे सही तरीके से निपटने में सक्षम होती और एक प्रेमपूर्ण हृदय से सहयोग करना जारी रखती। इस वजह से, मैं सोचती थी कि मैं बदल चुकी हूँ और अब इज्ज़त और हैसियत के बारे में ज्यादा परवाह नहीं करती हूँ। किन्तु जब जीवन में जिस चीज़ की मुझे आवश्यकता है उसके आधार पर परमेश्वर ने मेरी परीक्षा लेने के लिए एक अन्य परिवेश स्थापित किया, तो मैं एक बार फिर से पूरी तरह से उजागर हो गई। एक दिन, कलीसिया की अगुआ ने मुझसे मेरा हाल-चाल पूछा और परमेश्वर के वर्तमान इरादों और अभ्यास के तरीकों के बारे में संवाद किया। जब बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि उसे उसका कर्तव्य पूरा करने के लिए दूसरी कलीसिया में स्थानांतरित किया जाएगा, तो मैं उत्तेजना की लहर महसूस किए बिना न रह पायी: यह संभव है कि उसके जाने के बाद मुझे कलीसिया का अगुवा बनाया जाये। यदि ऐसा होता है, तो मुझे अवश्य अच्छी तरह से सहयोग चाहिए! मैं मन ही मन खुश हो ही रही थी कि तभी बहन ने कहा कि मेरे गाँव से एक अन्य बहन कल आयेगी। जैसे ही मैंने यह सुना मेरे हृदय में हलचल मच गयी: वह किसलिए आ रही है? क्या उसे कलीसिया का नया अगुआ बनाया जायेगा? मैं बहुत परेशान हो गयी: उसने उतने लंबे समय तक परमेश्वर में विश्वास नहीं किया है जितने समय तक मैंने किया है, और वह भी उसी गाँव से है जहाँ की मैं हूँ। यदि उसे अगुआ बनाया गया, तो मेरी क्या इज्ज़त रह जाएगी? भाई-बहन मुझे किन नज़रों से देखेंगे? वे निश्चित रूप से कहेंगे कि मैं सत्य का उतना अनुसरण नहीं करती हूँ जितना वह करती है। मैं इस बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रही थी। नींद से कोसों दूर मैं बिस्तर में उलटती-पलटती रही। अगले दिन सभा के दौरान, मैंने अगुआ की बातों में उसके स्वर और उसके रवैये पर लगातार ध्यान दिया क्योंकि मैं यह जानने के लिए बेकरार थी कि कलीसिया के नए अगुआ के रूप में कौन चुना जाएगा। जब भी ने अगुआ ता बोलते समय मुझे देखती, तो मुझे अगुआ बनाए जाने की आशा होती। मेरा चेहरा प्रसन्नता से भर जाता और वह जो कुछ भी कहती मैं उस पर सहमति में सिर हिला देती। दूसरी ओर, जब भी अगुआ बोलते हुए दूसरी बहन की ओर देखती, तो मैं निश्चित हो जाती कि उस बहन को अगुआ बनाया जाएगा, और परिणामस्वरूप खिन्नता और यंत्रणा महसूस करती। उन दो-चार दिनों में, मैं इज्ज़त और हैसियत sए इतना अधिक संतप्त हो गयी थी कि मैं चिंतित और अन्यमनस्क हो गई। मेरी भूख मिट गयी थी, मुझे तो ऐसा भी लग रहा था कि यह समय विशेष रूप से धीमी गति से गुज़र रहा है, मानो कि यह जम गया हो। कलीसिया की अगुआ उस स्थिति को देख सकती थी जिसमें मैं थी, इसलिए उसने मेरे पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन का एक अंश ढूँढा: "अब तुम लोग अनुयायी हो, और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ है। हालाँकि, तुम लोगों ने अभी तक हैसियत के लिए अपनी अभिलाषा की उपेक्षा नहीं की है। जब तुम लोगों की हैसियत उच्च होती है तो तुम लोग अच्छी तरह से प्रयास करते हो, किन्तु जब तुम्हारी हैसियत निम्न होती है तो तुम लोग अब और प्रयास नहीं करते हो। हैसियत के आशीष हमेशा तुम्हारे मन में होते हैं।" "यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत को जाने नहीं दिया है, बल्कि तुम लोग हमेशा इस बारे में पूछताछ करने और इस पर ध्यान देने के लिए संघर्ष करते रहते हो...। जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह का व्यक्ति अत्यधिक व्यर्थ है! उसके द्वारा इसे पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह अनुकरण करते रहते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं हो सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?")। परमेश्वर के वचनों की हर पंक्ति ने मेरे हृदय पर दस्तक दी, मुझे यह महसूस करवाया कि परमेश्वर मेरे निकट है, मेरे हर शब्द और हरकत की निगरानी कर रहा है। मैं इन पिछले दो दिनों में अपने विचारों और कार्यकलापों पर आत्म-चिंतन करने लगी। मुझे एहसास हुआ कि अनुसरण करने के बारे में मेरा दृष्टिकोण बहुत ही अधम था और "जैसे एक वृक्ष अपनी छाल के लिए जीता है; एक मनुष्य अपने चेहरे के लिए जीता है" और "एक मनुष्य जहां भी रहता है, एक नाम पीछे छोड़ जाता है, वैसे ही जैसे हंस जहां भी उड़ता है अपनी बोली छोड़ जाता है" जैसी अभ्युक्तियों से प्रभावित थी। मैं हमेशा हैसियत चाहती थी ताकि मैं दूसरों की अधिक प्रशंसा प्राप्त सकूँ, जिस कारण मैं इज्ज़त और हैसियत को लेकर इतना अधिक संतप्त हो गयी कि मैं चिंतित और अन्यमनस्क हो गई, मेरी भूख मिट गयी और मैं सो नहीं पाती थी, और मैंने एक बंदर की तरह अपना मज़ाक बना दिया था। मेरी स्थिति के अनुसार परमेश्वर द्वारा इस तरह का परिवेश बनाया गया था। यह मुझ पर परमेश्वर के प्रेम की वर्षा थी। परमेश्वर का कार्य आज मुझे बचाने के लिए, शैतान के अंधकारमय प्रभावों से बचने में मेरी सहायता करने के लिए था ताकि मैं उद्धार प्राप्त कर सकूँ। जिस तरह से मैं अनुसरण कर रही थी वह परमेश्वर की इच्छा के विपरीत था। अगर मैंने अंत तक परमेश्वर में विश्वास किया होता तब भी मैं परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में समर्थ नहीं होती। मेरे पास कुछ भी नहीं बचता! इसलिए मैंने परमेश्वर से मन में प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं तेरे कार्य का आज्ञापालन करने, तेरी अपेक्षाओं के अनुरूप परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर चलने, और सत्य की समझ प्राप्त करने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाने की इच्छुक हूँ। चाहे मुझे अगुआ बनाया जाये या न बनाया जाए, मैं सत्य का अनुसरण करूँगी और अपने भीतर की उन चीजों को बदलने पर ध्यान दूँगी जो तेरे इरादों को संतुष्ट नहीं करती हैं।" परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद, मैंने अपने हृदय में विशेष रूप से शांति महसूस की और इस बात की परवाह किए बिना कि विषयवस्तु क्या थी संवाद का आनन्द लिया। सभा के बाद, कलीसिया की अगुआ ने कहा कि, अधिकांश भाइयों और बहनों की अनुशंसाओं के आधार पर, वह बहन कलीसिया की नई अगुआ होगी, और मैं उसके कार्य के साथ समन्वय करूँगी। मैं अंदर से बहुत शांत थी और, मैंने अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए बहन के साथ सामंजस्य से कार्य करने के लिए सहमत होते हुए, खुशी से इसे स्वीकार कर लिया।

इस बार परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद, मुझे इज्ज़त और हैसियत पर ध्यान देने की अपनी प्रवृत्ति का कुछ ज्ञान मिला, और मैं अपने देह-सुख को त्यागने और परमेश्वर में विश्वास करने और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए तैयार थी। हालाँकि, शैतान के विषैले पदार्थों द्वारा मेरा संदूषण बहुत गहरा था। मेरी आत्मा की गहराई अभी भी शैतान के प्रभाव द्वारा नियंत्रित होती थी। मुझे शैतान के नुकसान से बेहतर ढंग से बचाने के लिए, परमेश्वर ने एक बार पुनः अपने उद्धार के हाथों को मेरी ओर बढ़ाया। एक दिन, मुझे बताया गया कि कलीसिया में एक बहन है जिसकी हालत अच्छी नहीं है, इसलिए मैंने उस बहन के साथ जिसके साथ मैं भागीदार थी, इस बारे में परामर्श किया कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए। चूँकि मेरी भागीदार बहन की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए हमारी चर्चा के बाद इस समस्या को हल करने के लिए मैं अकेले चली गई। मैंने उसी रात को उस बहन के साथ संवाद करने का प्रयास किया, और समस्या बहुत जल्दी हल हो गई। उस समय मेरा हृदय प्रसन्नता से लबालब भरा हुआ था, मैं सोच रही थी कि ऊपरी-स्तर-की अगुआ निश्चित रूप से मेरी तारीफ़ करेगी क्योंकि मैंने बहुत प्रयास किया है। हालाँकि, जब मैं अच्छे समाचार की प्रतीक्षा कर रही थी तभी ऊपरी-स्तर-के अगुआ ने उस बहन की हालत को समझना समझने के लिए एक पत्र लिखा। मैंने सोचा कि यह मेरी प्रशंसा के लिए है, इसलिए मैंने खुशी से पत्र खोला और पढ़ा। किन्तु जब मैंने देखा कि पत्र विशेष रूप से मेरी साथी बहन से यह पूछने के लिए थी कि वह इस समस्या से कैसे निपटी, तो मैं तुरंत क्रोधित हो गई: स्पष्ट रूप से मैंने ही इस मुद्दे को सुलझाया था। इसके बारे में पूछने के लिए मुझे क्यों नहीं लिखा? ऐसा लगता है कि अगुआओं के हृदय में मेरे लिए कोई स्थान नहीं है और मुझे तुच्छ समझा जाता है। मैं सिर्फ छोटे-मोटे काम करने वाली लड़की हूँ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं कितनी अच्छी तरह काम करती हूँ, मुझे कोई श्रेय नहीं मिलता है क्योंकि कोई भी इस पर ध्यान नहीं देता है। मैं इस बारे जितना अधिक सोचती थी, उतना ही अधिक मुझे लगता था कि मेरे साथ गलत हुआ है और मैं उदास महसूस करने लगी। मुझे लगता था कि मैंने अपना सारा सम्मान खो दिया है। इस समय, मेरी भागीदार बहन के हाथ में पत्र था और वो मुझसे बात करने ही वाली थी, लेकिन मैं अपने अंदर की भावनाओं को रोक नहीं पायी और उस पर चिल्लाने लगी: "ऊपरी-स्तर-के अगुआ को यह नहीं पता कि इस समस्या को कैसे हल किया गया। क्या आप इस बारे में स्पष्ट नहीं हैं? मैंने इस पर बहुत लंबे समय तक मेहनत से कार्य किया किन्तु किसी ने इसके बारे में एक भी अच्छा शब्द नहीं कहा, और अंत में समस्त श्रेय आपको मिला। हर किसी की नज़रों में, मैं बस छोटे-मोटे काम करने वाली और सहायता प्रदान करने वाली महिला हूँ। चाहे मैं इसमें कितना प्रयास क्यों न लगाऊँ, कोई भी इसकी सराहना नहीं करेगा।" यह कहने के बाद, मुझे इतना दुःख महसूस हुआ कि मैं रोने लगी। उस पल में, परमेश्वर के वचन मेरे कानों में गूँजे थे: "यदि तुमने बहुत सारे प्रयास व्यय कर दिए हैं लेकिन मैं तब भी तुम्हारे प्रति बहुत रूखा रहूँ, तो क्या गुमनामी में तुम मेरे लिए कार्य करना जारी रख पाओगे? ...यदि, तुम्हारे द्वारा मेरे लिए कुछ चीजें खर्च कर दिए जाने के बाद, मैंने तुम्हारी छोटी सी माँगों को पूरा नहीं किया है, तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि क्रोधित हो कर गालियाँ भी बकने लगोगे?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (2)")। परमेश्वर के दोष देते वचनों ने धीरे-धीरे मुझे शांत कर दिया, और मेरा मन भी बहुत अधिक साफ हो गया। जो अभी-अभी हुआ था, वह एक चलचित्र की तरह मेरे मन में बार-बार चलता रहा। परमेश्वर के प्रकाशन ने मुझे यह दिखा दिया कि मेरी प्रकृति बहुत भयानक और ख़तरनाक थी, और परमेश्वर में मेरा विश्वास और मेरा कर्तव्य को पूरा करना परमेश्वर को संतुष्ट करने या उसकी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए नहीं था, बल्कि अन्य लोगों की प्रशंसा और अभिनंदन प्राप्त करने के लिए था। जैसे ही मेरी इच्छाएँ संतुष्ट नहीं होतीं, मैं असंतोष से भर जाती; मेरी पाश्विक प्रकृति फूट पड़ती, और इसके अलावा परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना एक अत्यंत आसान बात बन गई। इस समय, मैंने देखा कि मैं बहुत दूर चली गई थी और मैं अमानवीय हो गई थी। जिस पीड़ा को मैंने महसूस करती किया वह हृदयविदारक थी। पश्चाताप करते हुए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं सोचती थी कि मैं बदल चुकी हूँ और इज्ज़त और हैसियत के लिए अब और नहीं जीती हूँ, और बहन के साथ भी मैं अच्छे से रह सकती हूँ। किन्तु आज तेरे प्रकाशन में, मैंने एक बार फिर अपनी शैतानी कुरूपता को उजागर कर दिया, हमेशा ऐसा महसूस करती थी जैसे कि लोगों के बीच मेरी कोई हैसियत नहीं है और इसलिए कष्ट झेलती थी क्योंकि मेरे प्रयासों की दूसरों के द्वारा प्रशंसा नहीं की जाती थी। हे परमेश्वर, शैतान ने मुझे वास्तव में बहुत गहराई तक नुकसान पहुंचाया है। हैसियत, प्रतिष्ठा, और घमंड सभी मेरे बंधन बन गए। मैं प्रार्थना करती हूँ कि तू मार्गदर्शन करके मुझे फिर से शैतान के प्रभाव से बाहर निकाल।" इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के निम्नलिखित अंश को देखा: "तुम लोगों में से हर एक जनसाधारण के शिखर तक उठ चुका है; तुम लोग जनसाधारण के पूर्वज होने के लिए आरोहण कर चुके हो। तुम लोग अत्यंत स्वेच्छाचारी हो, और आराम के स्थान की तलाश करते हुए, और अपने से छोटे भुनगों को निगलने का प्रयास करते हुए, उन सभी भुनगों के बीच तुम्हारे सिर पर खून सवार हो जाता है। अपने हृदयों में तुम लोग द्वेषपूर्ण और कुटिल हो, उन भूतों से भी आगे हो जो समुद्र के तले में डूबे हुए हैं। तुम लोग, भुनगों को ऊपर से नीचे तक परेशान करते हुए, गोबर के तले में रहते हो, जब तक कि ऐसा न हो जाए कि उनके पास कोई शांति न रहे, थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से लड़ते हो और फिर शांत हो जाते हो। तुम लोगों को अपनी जगह तक का पता नहीं है, मगर तब भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। ऐसे संघर्ष से तुम लोग क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय में वास्तव में मेरे लिए आदर होता, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक दूसरे के साथ कैसे लड़ सकते थे? तेरी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तू अभी भी गोबर में एक बदबूदार छोटा सा कीड़ा नहीं है? क्या तू पंख विकसित करने में सक्षम होगा और आकाश में कबूतर बन पाएगा?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी, तो तुझे उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तूने की हैं")। परमेश्वर के न्याय का प्रत्येक वचन एक तीखी तलवार की तरह दर्दनाक ढंग से मेरे हृदय में चुभ गया, मेरी आत्मा को जागृत करते हुए और मुझे एहसास करवाते हुए कि मैंने अपना कर्तव्य परमेश्वर का उत्कर्ष करने और उसकी गवाही देने के लिए नहीं किया है, बल्कि इसलिए किया है क्योंकि मैं हमेशा से दिखावा करना, अपने आप की गवाही देना चाहती थी, और लोगों के बीच ऊँचा खड़े होने का सपना देखती थी ताकि वे मेरी प्रशंसा और मेरा आदर करें। क्या मेरे हृदय में परमेश्वर का कोई भय था? क्या मैंने जो अनुसरण किया वह वास्तव में उस प्रधान स्वर्गदूत के समान नहीं था जिसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया था? मैं शैतान के द्वारा गहराई तक भ्रष्ट की गई एक सृजित प्राणी हूँ। मैं परमेश्वर के सामने, गंदगी, एक कीड़े की तरह हूँ। मुझे परमेश्वर की आराधना करते रहनी चाहिए थी और हर समय अपने हृदय में डर के साथ अपने कर्तव्य को पूरा करते रहना चाहिए था, किन्तु मैं ईमानदार कार्य में शामिल नहीं हुई, और हमेशा अपने कर्तव्य को पूरा करने को दिखावा करने और स्वयं के लिए गवाही देने के एक अवसर के रूप में उपयोग करना चाहती थी। परमेश्वर इससे घृणा और इसका तिरस्कार कैसे नहीं कर सकता था? परमेश्वर बहुत पवित्र और महान है, अधिकार और सामर्थ्य से परिपूर्ण है, और फिर भी, लोगों से आदर और प्रशंसा पाने के लिए अपनी पहचान को कभी भी प्रकट नहीं करता है, विनम्र और छुपा हुआ रहता है। वह मानव जाति को बचाने के लिए चुपचाप अपना सर्वस्व देना जारी रखता है, कभी भी स्वयं को उचित सिद्ध नहीं करता है या न ही श्रेय मांगता है, और कभी भी मानवजाति से किसी भी चीज़ भी माँग नहीं करता है। परमेश्वर की विनम्रता, श्रेष्ठता और निःस्वार्थता ने मुझे मेरा अहंकार, मेरी नीचता और स्वार्थपरायणता दिखा दी। मैं शर्मिंदा हो गयी, मुझे लगा कि मुँह छुपाने के लिए मेरे पास कोई जगह नहीं बची और मुझे यह महसूस हुआ कि मैं शैतान के द्वारा बहुत गहराई तक भ्रष्ट की जा चुकी हूँ और मुझे परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शुद्धिकरण द्वारा उद्धार की बहुत आवश्यकता है। इसलिए मैं फिर से परमेश्वर के सामने गिर गई: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तेरी ताड़ना और न्याय के माध्यम से मैं अपनी अवज्ञा को और साथ ही तेरी श्रेष्ठता और महानता को देख सकती हूँ। अब से, जब मैं अपने कर्तव्य को पूरा करूँ, तो मैं केवल एक ऐसे उचित इंसान की तरह व्यवहार करने की आशा करूँ जिसके हृदय में तेरा भय हो, और तेरे वचनों पर भरोसा करके मैं अपने शैतानी स्वभाव का निपटारा करूँ।"

बार-बार परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद, अनुसरण पर मेरे दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदल गए, किन्तु मेरे जीवन स्वभाव में अभी तक वास्तव में परिवर्तन नहीं हुआ था। मेरी और अच्छी तरह से शुद्धि करने और जीवन के सही मार्ग पर ले चलने के लिए, परमेश्वर ने एक बार फिर मुझे अपना उद्धार प्रदान किया। बाद में, मुझे एक कलीसिया का अगुआ होने के लिए चुना गया, मैं अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए दूसरी बहन के साथ सहयोग कर रही थी। मेरी पिछली विफलताओं के कारण, मैं हर समय अपने आप को याद दिलाती रहती थी कि मुझे कलीसिया के कार्य को ठीक से करने के लिए बहन के साथ एक मत होने की आवश्यकता है। शुरुआत में, मैं बहन के साथ हर चीज़ पर चर्चा करती थी और हम मिलजुल कर परमेश्वर के मार्गदर्शन का अनुसरण करते थे, इसलिए हमने कार्य के सभी पहलुओं में परिणाम प्राप्त किए। किन्तु कुछ समय के बाद, मुझे पता चला कि बहन में अच्छे अंतर्निहित गुण थे, सत्य का उसका संवाद स्पष्ट और रोशन था, और उसकी कार्य क्षमताएँ मेरी अपेक्षा अधिक मजबूत थीं। सभाओं के दौरान, भाई-बहन सभी उसके संवाद को सुनने के इच्छुक होते थे और समस्याएँ आने पर सभी उससे परामर्श करते थे। इस तरह के परिवेश को सामने पाकर, मैं एक बार पुनः शैतान के फंदे में फँस गई और उसके हाथों बेवकूफ़ बन गई: बहन हर मामले में मुझसे बेहतर है और चाहे वो जहां भी जाए भाई-बहन उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसा नहीं हो सकता! चाहे कुछ भी हो मुझे उससे बढ़ कर होना होगा, और भाई-बहनों को यह देखने देना होगा कि मैं उससे हीन नहीं हूँ। इस कारण से, मैं हर दिन कलीसिया में बिना रुके दौड़-धूप करती, भाई-बहनों के लिए सभाओं की व्यवस्था करती रहती और जो कोई भी समस्याओं में घिरा होता था, मैं समस्या को हल करने में सहायता करने के लिए उसके पास भागती थी। ... हो सकता है कि मैं बाहर से वफ़ादार और आज्ञाकारी लगूँ, किन्तु मेरी आंतरिक महत्वाकांक्षाएँ परमेश्वर की नज़र से कैसे बच सकती हैं? मेरी अवज्ञा ने परमेश्वर का क्रोध भड़का दिया, और परिणामस्वरूप मैं अंधकार में गिर पड़ी। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय मुझे कोई प्रबुद्धता प्राप्त नहीं होती थी, प्रार्थना करते समय मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं होता था, सभाओं के दौरान शुष्क संक्षिप्त तरीके से संवाद करती थी, और यहाँ तक कि भाई-बहनों के साथ सभा करने से भी डरती थी। मैं इज्ज़त और हैसियत से पूरी तरह से बँध गई थी। हर दिन गुज़र रहा था लेकिन मुझे कुछ नहीं पता था कि ये सब क्यों हो रहा है, ऐसा लगता था मानो कि मैं अपनी पीठ पर एक बड़ा बोझ ढो रही थी और दबाव से साँस नहीं ले पा रही थी। मैं कलीसिया के कुछ मुद्दों की वास्तविक प्रकृति को भी अब नहीं समझ पा रही थी, और मेरी कार्यकुशलता में तेजी से गिरावट आ गई थी। परमेश्वर द्वारा इस तरह के प्रकाशन का सामना करते हुए मैंने स्वयं को जानने का प्रयास नहीं किया और इस डर से कि भाई-बहन मुझे तुच्छ समझेंगे, मैं अपनी स्थिति के बारे में उनसे भी खुल कर बोलने और इसे सुलझाने के लिए सत्य की तलाश करने की अनिच्छुक थी। बाद में, परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन मुझ पर आ पड़े। मेरे पेट में अचानक इतनी बुरी तरह से दर्द होने लगा कि मैं शांति में बैठ या खड़ी नहीं हो पा रही थी। बीमारी के संताप और हैसियत प्राप्त न कर पाने के असंतोष से मैं जीवन और मृत्यु के बीच झूलने लगी। अपनी समस्याओं को स्वीकार करने से इनकार करने और कलीसिया के कार्य के साथ सहयोग करने में मेरी असफलता के कारण, कलीसिया के पास मुझे प्रतिस्थापित करने और आध्यात्मिक भक्ति और आत्म-चिंतन के लिए घर भेजने के अलावा कोई चारा नहीं था। अपनी हैसियत को खोने के बाद, मैं ऐसा महसूस करती थी मानो कि मुझे नरक का दण्ड दिया गया था। भावनात्मक रूप से, मैं अपनी निम्नतम स्थिति तक गिर गई थी और महसूस कर रही थी कि मैंने अपनी सारी इज्ज़त गँवा दी है। मैं विशेष रूप से तब और भी अधिक संतप्त हो गई जब मैंने भाई-बहनों को उनके कर्तव्यों को सक्रिय रूप से पूरा करते देखा, जबकि मैंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया था और किसी भी कर्तव्य को पूरा करने में असमर्थ थी। पीड़ा में, मैंने स्वयं से पूछा: ऐसा क्यों है कि दूसरे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और अधिक से अधिक सत्य को समझते हैं, जबकि मैं इज्ज़त और हैसियत के कारण बार-बार परमेश्वर की अवज्ञा और उसका विरोध करती रहती हूँ? मैंने अपनी विफलताओं के मूल का पता लगाने में मेरी अगुआई करने के लिए कई बार परमेश्वर से विनती की। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों में से निम्नलिखित अंश देखा: "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं: उन्हें बाहर जा कर भाषण देना पसंद होता है, उन्हें आपस में मिलना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें घेरे रहते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनकी छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आइए हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: इस तरह के व्यवहारों वाले लोगों की किस प्रकार की प्रकृति होती है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। उनकी प्रकृतियों के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। यह शैतान की एक विशेष छवि है। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृतियों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें")। इसके अलावा, यह "जीवन प्रवेश के बारे में संगति और उपदेश" में यह कहा गया है कि: "शैतान का सार और प्रकृति विश्वासघात है। उसने परमेश्वर के साथ बिल्कुल शुरुआत से विश्वासघात किया, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के बाद, परमेश्वर के साथ एक समान रूप में खड़ा होने और एक पृथक राज्य स्थापित करने का प्रयास करते हुए, इसने परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर सृजित मनुष्यों को धोखा दिया, बेवकूफ बनाया, हेरफेर किया, नियंत्रित किया। ...आप देखें, क्या शैतान की प्रकृति ऐसी नहीं है जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है? शैतान ने समस्त मानवजाति को जो कुछ किया है उससे, हम यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि शैतान एक असली परमेश्वर-विरोधी दानव है और यह कि शैतान की प्रकृति ऐसी है जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। यह सब परम है" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। इन वचनों पर मनन करते हुए, मैं डर से काँपने लगी। मैंने देखा कि मैंने जो जीवन बिताया था वह पूरी तरह से शैतान की छवि में था, और मैं अहंकारी और दंभी थी, और परमेश्वर की आराधना बिल्कुल भी नहीं करती थी। परमेश्वर ने कलीसिया में कर्तव्य करने के लिए मेरा उत्कर्ष किया है, ताकि मैं अपने हृदय में परमेश्वर से भय के साथ भाइयों और बहनों को परमेश्वर के सामने ला सकूँ, और लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए एक जगह बनवा सकूँ, और साथ ही लोगों को प्रेरित करूँ कि वे परमेश्वर का भय मानें और उसका आज्ञापालन करें। किन्तु परमेश्वर के उत्कर्ष के सामने, मैं अपने कर्तव्य को पूरा करने में परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील नहीं थी, और जीवन में प्रवेश करने में भाई-बहनों की सहायता करने की किसी ज़िम्मेदारी का मुझे एहसास नहीं था। इसके बजाय, मैं हमेशा लोगों को मुझ पर ध्यान देने और मुझे सुनने पर मजबूर करना चाहती थी, और अपनी स्वयं की इच्छाओं के वास्ते, जहां भी मैं जाऊँ मैं हमेशा अपने आप को ऊँचा बनाने का प्रयास करती थी। यहाँ तक कि मैं परमेश्वर से भी डाह करती थी और मजबूत लोगों से ईर्ष्या करती थी, और श्रेष्ठता के लिए दूसरों के साथ अड़ियल ढंग से प्रतिस्पर्धा करती थी। बाहर से, मैं लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही थी, किन्तु वास्तव में मैं परमेश्वर के विरुद्ध लड़ रही थी। यह कुछ ऐसी चीज है जो परमेश्वर के स्वभाव को गंभीर रूप से अपमानित करती है। उसने मेरा न्याय किया और ताड़ित किया, मुझे ताड़ना दी और अनुशासित किया, और मुझसे आत्म-चिंतन और पश्चाताप करवाने के लिए मुझे हैसियत से वंचित कर दिया। मैंने देखा कि मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत गहरा और बहुत महान था! मैं मन में अफसोस और आत्म-दोषी महसूस करने लगी, इससे भी बढ़कर मुझे घृणा होती थी कि मेरी भ्रष्टता बहुत गहरी थी। मैं परमेश्वर का अनुसरण करती थी किन्तु सत्य का अनुसरण नहीं करती थी, बल्कि आँख बंद करके केवल हैसियत और इज्ज़त के लिए श्रम करती थी। मैं परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के लिए जीवन बिताने में वास्तव में विफल रही थी। मैं जितना अधिक आत्‍मविश्‍लेषण करती, उतना ही अधिक मैं स्पष्ट रूप से देखती कि मैं जिस अभ्युक्तियों को मैं जीती थी, जैसे कि "एक मनुष्य जहां भी रहता है, एक नाम पीछे छोड़ जाता है, वैसे ही जैसे हंस जहां भी उड़ता है अपनी बोली छोड़ जाता है" और "एक वृक्ष अपनी छाल के लिए जीता है; एक मनुष्य अपने चेहरे के लिए जीता है", वे शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने और नुकसान पहुँचाने के लिए उपयोग किए गए झूठ थे। मुझे समझ आया कि शैतान इन चीजों का इस्तेमाल लोगों की आत्माओं को पंगु बनाने, उनके मन को विकृत करने, और उनसे जीवन के बारे में गलत दृष्टिकोण विकसित करवाने के लिए करता है, जिससे वे हैसियत, प्रसिद्धि, सम्पत्ति और इज्ज़त जैसी खोखली चीजों का अनुसरण करने हेतु अथक प्रयास करते हैं, और अंततः परमेश्वर से दूर भटक जाते और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं। वो ऐसा इसलिए करता है ताकि वे सब उसकी भ्रांतियों का पालन करें और उसके लिए कार्य कर सकें और इच्छानुसार उसके द्वारा तबाह किए और नुकसान पहुंचाए जा सकें। मैं उन लोगों में से एक थी जिन्होंने शैतान के झूठ के आधार पर जीवन के बारे में गलत दृष्टिकोण विकसित कर लिया था और अहंकारी, दंभी, तिरस्कारपूर्ण हो गए थे, जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। मैं भ्रष्टता में रहती थी और परमेश्वर को दुश्मन समझती थी। अब, उसकी दया का आनंद लेते हुए मुझे अवश्य पुनः परमेश्वर के विरुद्ध कभी नहीं जाना चाहिए। परमेश्वर के हृदय को सुख देने के लिए मैं पूरी तरह से अपने आप को सुधार लूँगी, शैतान को पूरी तरह से त्याग दूँगी, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को दे दूँगी, और एक सच्चे व्यक्ति की सदृशता में जीवन बिताऊँगी। इसके बाद, मैंने खोजा कि अपने भविष्य के मार्ग पर मुझे कैसे बने रहना चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण कैसे किया जाए। एक बार पुनः मेरा मार्गदर्शन करने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को देखा: "आज, भले ही तू एक कार्यकर्ता नहीं हैं, फिर भी तुझे परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को निभाने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के सभी आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश करनी चाहिए। परमेश्वर जो कुछ भी कहे तुझे उसका पालन करने, और सभी प्रकार के क्लेशों एवं परिष्करणों का अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए, और हालाँकि तू कमज़ोर है, फिर भी तुझे अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम होना चाहिए। ऐसे लोग जो अपने स्वयं के जीवन की ज़िम्मेदारी लेते हैं वे परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हैं, और अनुसरण के प्रति ऐसे लोगों का दृष्टिकोण ही सही दृष्टिकोण है। ये ऐसे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को ज़रूरत है। ...परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में, मनुष्य को परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को निभाने की कोशिश करनी चाहिए, और अन्य चुनाव किए बिना परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। ऐसे लोग जो परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करते हैं उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ पाने या उस चीज़ की खोज नहीं करनी चाहिए जिसकी वे व्यक्तिगत रूप से अभिलाषा करते हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है")। एक प्रकाशस्तम्भ की तरह, परमेश्वर के वचनों ने मेरे हृदय को प्रबुद्ध किया, उन्होंने मुझे वह मार्ग बताया जिस पर मुझे चलना चाहिए। परमेश्वर आशा करता है कि लोग, इस बात की परवाह किए बिना कि उनके पास हैसियत है या नहीं और कौन सा परिवेश उन पर आ पड़ा है, सत्य का अनुसरण करने का पूरा प्रयास करें, और परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था का पालन कर सकें और परमेश्वर को प्रेम और संतुष्ट करने का प्रयास करें। अनुसरण का यह सबसे सही तरीका है और साथ ही जीवन का वो सही मार्ग है जिस पर एक सृजित प्राणी को चलना चाहिए। इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने अपना मन बना लिया: हे परमेश्वर, मुझे जीवन का सही मार्ग दिखाने के लिए तेरा धन्यवाद। अतीत की मेरी हैसियत तेरे उत्कर्ष के कारण थी। आज बिना हैसियत के होना भी तेरी धार्मिकता के कारण है। मैं मात्र एक छोटी सृजित प्राणी हूँ। अब से, मैं केवल सत्य का अनुसरण करना और तेरी सभी व्यवस्थाओं का पालन करना चाहती हूँ।

इसके बाद, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और कलीसिया का जीवन जीने के माध्यम से मेरी स्थिति शीघ्रता से वापस सामान्य हो गई। कलीसिया ने पुनः मेरे लिए एक उपयुक्त कर्तव्य की व्यवस्था की। इसके अलावा, मैंने अपने कर्तव्य की पूर्ति में सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित किया, जब भी कोई चीज़ होती तो मैं उसमें परमेश्वर के इरादों को ढूँढ़ने का प्रयास करती, स्वयं को जानने का प्रयास करती, और इसे सुलझाने के लिए परमेश्वर के तद्नुरूप वचनों को खोजती। जब मैं इज्ज़त और हैसियत से जुड़ी चीज़ों का सामना करती, तो भले ही मेरे मन में कुछ विचार होते थे, किन्तु प्रार्थना और परमेश्वर के वचन के माध्यम से मैं सत्य की तलाश करती और स्वयं को त्याग देती थी, और धीरे-धीरे मैं इन बातों के नियंत्रण से निकलने में समर्थ हो गई और अब मैं मन की शांति के साथ अपना कर्तव्य पूरा कर सकती थी। जब मैं कुछ भाई-बहनों को कार्य सौंपे जाते हुए देखती जिन्होंने उतने लंबे समय तक परमेश्वर में विश्वास नहीं किया है जितना मैंने किया है, तो मैं सत्य की खोज के माध्यम से समझने में सक्षम हो जाती कि कोई व्यक्ति किस कर्तव्य को पूरा करता है यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है और मुझे परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। परिणामस्वरूप, मैं उसके साथ सही तरीके से व्यवहार करने में समर्थ हो पाती थी। जब भाई-बहन मुझसे व्यवहार करते हुए मेरी प्रकृति और सार को उजागर करते थे, तो भले ही मुझे महसूस होता था कि मैंने सम्मान खो दिया है, तब भी मैं प्रार्थना के माध्यम से आज्ञाकारी बनने में सक्षम थी। इसका कारण यह है कि परमेश्वर का प्रेम मुझ पर आ गया है, और इसने मेरे जीवन स्वभाव को बदलने में बहुत लाभ पहुँचाया है। अतीत में, मैंने अपनी इज्ज़त पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया था और इस डर से किसी के सामने भी खुल कर बोलने की इच्छुक नहीं होती थी कि अन्य लोग मुझे तुच्छ समझेंगे। अब, मैं परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करती हूँ, और यदि मुझे कोई समस्या आती है तो मैं भाई-बहनों को खुल कर बोल सकती हूँ, जो मुझे मेरी आत्मा की गहराइयों तक विशेष रूप से राहत और खुशी देता है। अपने में इन परिवर्तनों को देखकर, मैं परमेश्वर को धन्यवाद देने और उसकी स्तुति करने से खुद को रोक नहीं पायी, क्योंकि मुझमें ये परिवर्तन अंत के दिनों के परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य के द्वारा लाये गए हैं।

मैंने अब कई वर्षों तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण किया है। अतीत की सोचूँ तो, ये शैतान के विषैले पदार्थ थे जिन्होंने मेरी आत्मा को नष्ट कर दिया था। मैं शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहती था और कई वर्षों तक इसके द्वारा बर्बाद की गई थी और मूर्ख बनाई गई थी। मैं जीवन का मूल्य और अर्थ नहीं जानती थी। मैं रोशनी को नहीं देख पाती थी, न ही मुझे सच्ची खुशी और आनन्द मिल सकता था। मैं दुःख की खाई में डूब गई थी और अपने आप को निकालने में असमर्थ थी। यह बार-बार परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के माध्यम से है कि मैं शैतान के नुकसान से छुटकारा पाने और राहत और स्वतंत्रता प्राप्त करने में कामयाब रही हूँ। मैंने अपना विवेक और तर्क वापस पा लिया है, और जीवन के उज्ज्वल और सही मार्ग पर परमेश्वर का अनुगमन करते हुए, मेरे पास अनुसरण करने के लिए सही लक्ष्य है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के माध्यम से, मैंने परमेश्वर के निःस्वार्थ और निष्कपट प्रेम का वास्तव में अनुभव किया, और आशीष का आनंद लिया और उस प्रेम को प्राप्त किया है जिसका मनुष्य की दुनिया आनंद नहीं उठा सकती है। शैतान के दुःखों के सागर से केवल परमेश्वर ही बचा सकता है, और केवल परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव के भीतर के शैतानी विषैले पदार्थों को शुद्ध कर सकता है और उन्हें सच्चे इंसान की सदृशता में जीवन व्यतीत करवा सकता है जीवन के सही मार्ग पर चलवा सकता है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ही प्रकाश है। यह सबसे बड़ा अनुग्रह, सबसे अच्छा संरक्षण, और जीवन की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति है जो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई है। ठीक वैसे ही जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं: "... परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सब से बड़ी सुरक्षा और सब से महान अनुग्रह है। केवल परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा ही मनुष्य जागृत हो सकता है, और शरीर और शैतान से बैर कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, वह उसे उसके छोटे संसार से आज़ाद करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने देता है। ताड़ना और न्याय की अपेक्षा कोई बेहतर उद्धार नहीं है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान")। मुझे बचाने और आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित होने देने के लिए परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का धन्यवाद! परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने भविष्य के मार्ग में मैं हर संभव प्रयास करूंगी कि मैं सत्य का अनुसरण करूँ, परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को और अधिक प्राप्त करूँ, और शुद्धिकरण प्राप्त करने के लिए शैतान के विषैले पदार्थों से पूरी तरह से छुटकारा पा सकूँ, परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करूँ और ऐसी स्त्री बनूँ जो वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करती है। सारी महिमा परमेश्वर की हो। आमीन!

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