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काले दानव की मांद में जीवन की चमकती रोशनी

लेखिका लिन यिंग, शांडोंग प्रांत

मेरा नाम लिन यिंग है और मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में एक ईसाई हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने से पहले, मैं हमेशा अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना और कड़ी मेहनत करना चाहती थी, ताकि मैं अपने जीवन को बेहतर बना सकूं, लेकिन मैं जैसा चाहती थी वैसा नहीं हुआ। इसके बजाय, मैं एक के बाद एक मुसीबतों की दीवारों से टकराती रही और मैंने बार-बार नाकामी का सामना किया। जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बाद, मेरा शरीर और मन दोनों थककर चूर हो गये और मैंने अकथनीय कष्ट उठाया। मेरी पीड़ा और निराशा के बीच, एक बहन ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का सुसमाचार सुनाया। जब मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, “जब तुम थके हो और इस संसार में खुद को तन्हा महसूस करने लगो तो, व्याकुल मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, रखवाला, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “सर्वशक्तिमान का आह भरना”), तो मैं अपने आंसुओं को ढलकने से न रोक पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ममता भरे वचनों ने मुझे बड़ी सांत्वना दी और मैंने खुद को उस अनाथ की तरह महसूस किया, जो कई सालों से भटक रही थी और अंत में उसे अपनी माँ की गोद वापस मिल गई—अब मैं खुद को अकेला और बेसहारा महसूस नहीं करती थी। उस दिन से, मैं हर दिन उत्सुकतापूर्वक परमेश्वर के वचनों को पढ़ती हूँ। सभाओं में भाग लेकर और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहनों के साथ सहभागिता करके, मुझे कई सत्य समझ में आए और मैंने देखा कि ये सभी लोग बड़े ही नेक और सच्चे हैं। उनके बीच ईर्ष्या से उपजा कोई विवाद नहीं था और वे एक दूसरे के ख़िलाफ़ कोई साजिश नहीं करते थे। जब कभी भी किसी को कोई समस्या होती थी, तो सभी भाई-बहन पूरी ईमानदारी से सत्य के बारे में सहभागिता करते थे, ताकि समस्या को हल करने में मदद की जा सके। यह मदद हमेशा बिना किसी शर्त के दी जाती थी और कोई भी इसके बदले में कुछ नहीं माँगता था। उन लोगों के बीच मैंने उस आज़ादी और खुशी का अनुभव किया जो मैंने कभी नहीं महसूस की थी। मुझे इस बात का गहराई से एहसास हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक शुद्धता की जगह थी। मुझे यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर है जो इंसान को कष्टों के महासागर से बचा सकता है! हालांकि, जब मैं परमेश्वर के प्रेम का आनंद उठा रही थी, तभी सीसीपी सरकार ने मुझे गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार कर लिया और सताया। इसने मेरे आनंदमय और खुशहाल जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया।

12 अगस्त, 2003 की आधी रात को, जब मैं गहरी नींद में सो रही थी तभी तेज़ी से दरवाज़ा पीटने की आवाज़ सुनकर अचानक मेरी नींद खुल गई। मैंने किसी को दरवाज़े पर ज़ोर से चिल्लाते हुए सुना, “खोलो! दरवाज़ा खोलो!” इससे पहले कि मैं कपड़े ठीक कर पाती, मैंने एक ज़ोर की आवाज़ सुनी, मेरे अपार्टमेंट का दरवाज़ा धड़ाके के साथ खुल गया था, इसी के साथ छः हिंसक और क्रूर पुलिस वाले अंदर आ धमके। इस घटना से हैरान होकर, मैंने पूछा, “यह सब क्या है?” मुख्य पुलिसकर्मी ने यह कहते हुए मुझे धमकाया, “ज़्यादा भोली मत बनो!” फिर अपने हाथ लहराते हुए, वह चिल्लाया, “इस जगह को अस्त-व्यस्त कर दो!” इसके बाद कई पुलिसकर्मियों ने मेरे कमरे और अलमारी को ऐसे तहस-नहस करना शुरू कर दिया, जैसे कि वे लुटेरे हों। कुछ ही पलों में, मेरे सारे बर्तन, कपड़े, चादरें, खाने-पीने का सामान… सब फ़र्श पर बिखरे पड़े थे, मेरा अपार्टमेंट पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था। मेरे घर की तलाशी लेने के बाद, उन्होंने मुझे धक्का देते और खींचते हुए एक पुलिस की गाड़ी में बिठा लिया। उन लोगों ने मेरे घर से एक सीडी प्लेयर उठा लिया, जिसे मैंने हाल ही में 240 युआन में खरीदा था। साथ ही, उन्होंने 80 युआन की नकदी और परमेश्वर के वचनों की कुछ किताबें भी ले लीं। मैंने कभी सपने में भी इस तरह के दृश्य की कल्पना नहीं की थी: यह कुछ ऐसा था जो केवल टीवी कार्यक्रमों में देखने को मिलता है, लेकिन अब यह सब मेरे साथ हो रहा था। मैं बुरी तरह से डर गई और घबरा गई, मेरा दिल बड़ी तेज़ी से धड़कने लगा। मैं लगातार परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, उनसे मेरी रक्षा करने की गुहार लगाती रही, ताकि मैं उनके लिए गवाही दे सकूं, ताकि मैं अपने भाई-बहनों को धोखा देकर यहूदा बनने से पहले मर जाऊं। तभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ये वचन तेज़ी से मेरे जेहन में कौंध गए: “आपको इससे या उससे भयभीत नहीं होना चाहिए। चाहे तुम कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करो, तुम मेरे सम्मुख स्थिर रहो; किसी भी चीज से बाधित ना हो, ताकि मेरी इच्छा पूरी हो सके। … मत डरो; मेरी सहायता के कारण कौन तुम्हारे मार्ग में बाधा डाल सकता है? यह स्मरण रखो!” (“वचन देह में प्रकट होता है” में आरम्भ में मसीह के कथन के “अध्याय 10”)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे काफ़ी सुकून दिया और मेरे हृदय को धीरे-धीरे शांत होने में मदद की। इन वचनों से मुझे यह एहसास हुआ कि मैं जिन पर विश्वास करती हूँ, वह वही शासक है जिसने स्वर्ग और धरती पर सभी चीज़ों को बनाया है, सभी चीज़ों का नियंत्रण उसके हाथों में है, शैतान और दुष्टात्माएँ उसके पैरों के नीचे हैं, परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान मेरे साथ कुछ भी नहीं कर सकता है। अब मैंने शैतान के साथ परमेश्वर की लड़ाई में खुद को एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पाया: यही वह समय था जब परमेश्वर को मेरी गवाही की ज़रूरत थी, और यही मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य को हासिल करने का समय था; मैं जानती थी कि मुझे दृढ़तापूर्वक अपना पक्ष रखना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना होगा, मैं कतई शैतान के आगे दंडवत नहीं करूंगी, न ही उसकी चलने नहीं दूंगी!

टायरों की तेज़ चरमराहट के साथ पुलिस की गाड़ी तेज़ी से पुलिस थाने में प्रवेश कर गई। जैसे ही गाड़ी रुकी, एक पुलिसवाले ने मुझे धकेलकर गाड़ी से बाहर निकाला जिससे मैं लड़खड़ाते हुए और अपने हाथों से खुद को संभालने की कोशिश करते हुए, सीधे दीवार से जा भिड़ी। मैंने अपने पीछे उन लोगों को पागलों की तरह हँसते हुए सुना। फिर उन लोगों ने मुझे एक छोटे से कमरे में धकेल दिया, इससे पहले कि मैं अपनी साँसों पर काबू पाती, उनमें से एक पुलिसवाले ने नामों की एक सूची पढ़कर सुनाई और मुझसे पूछा कि क्या मैं उनमें से किसी को जानती हूँ। यह देखकर कि मैंने कोई जवाब नहीं दिया, उन लोगों ने मुझे घेर लिया और गालियां देते हुए मुझ पर लात-घूंसे चलाने लगे। फिर एक दुष्ट पुलिसवाले ने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और मुझे ऊपर की ओर खींचा, मेरे चेहरे पर दो बार कसकर प्रहार किया। मेरा सिर घूम गया और मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया, मेरे मुँह के एक कोने से खून की धारा निकलने लगी।

उसके बाद उनमें से एक पुलिसवाले ने नामों की सूची वाला एक पेपर निकाला और गुस्से में इसे मेरे सामने यह कहते हुए फ़ेंक दिया, “तुम इन लोगों के नाम जानती हो ना? तुम्हारा नाम क्या है?” उस समय मुझे इतना दर्द हो रहा था कि मैं बोल भी नहीं पा रही थी। यह देखकर कि मैं कोई जवाब नहीं दे रही थी, तीन दुष्ट पुलिसवाले मुझ पर झपट पड़े, मुझे एक बार फिर लात-घूंसों से पीटने लगे और तब तक पीटते रहे जब तक कि मैं बेहोश नहीं हो गई।

अगले दिन सवेरे दुष्ट पुलिसवाले मुझे पुलिस सुरक्षा ब्यूरो के आपराधिक जांच अनुभाग के पूछताछ कक्ष में ले गये। जब मुझे कमरे में ले जाया गया, तो मैंने देखा कि कई हट्ठे-कट्ठे लोग मुझे इस तरह घूर रहे थे जैसे वे मुझे मार ही डालना चाहते थे। कमरे में यातना देने वाले हर तरह के उपकरण भरे-पड़े थे, इस नज़ारे को देखकर मुझे काफ़ी चिंता होने लगी—मुझे महसूस हुआ कि मैं दुष्टात्माओं के बीच घिर गई हूँ। मैं बुरी तरह से डर गई थी, भय और असुरक्षा का एहसास एक बार फिर से गहरा हो गया। मैंने मन ही मन सोचा: “कल, उन लोगों ने मुझे इतनी यातनाएं दीं और वह तो आधिकारिक पूछताछ भी नहीं थी। ऐसा लगता है कि आज जो कुछ होने वाला है, उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। अगर वे लोग मुझे क्रूरता से यातना देने लगे, तो क्या मैं इसे सहन कर पाऊँगी?” मैंने सच्चे दिल से परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर, मैं इस समय काफ़ी डरी हुई हूँ, मुझे भय है कि मैं इन दुष्टात्माओं की यातनाओं को सहन नहीं कर पाऊँगी और मैं गवाही देने का अपना मौक़ा गँवा दूंगी। कृपया मेरे हृदय की रक्षा कीजिये। मैं आपको धोखा देने के बजाय मार खाकर मर जाना पसंद करूंगी!” तब परमेश्वर के वचनों की एक पंक्ति मेरे जेहन में उभरी: “सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है तुम सब का विश्वास बहुत कम है। जब तक तुम सभी का विश्वास बढ़ता है, तब तक कुछ भी मुश्किल नहीं होगा” (“वचन देह में प्रकट होता है” में आरम्भ में मसीह के कथन के “अध्याय 75”)। परमेश्वर के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है। इन वचनों ने तत्काल मुझे आंतरिक शक्ति से भर दिया, और मैंने सोचा: “परमेश्वर मेरे साथ हैं, तो मैं किसी भी चीज़ से नहीं डरूँगी। वे चाहे मुझ पर कितना ही बल प्रयोग करें, वे बस काग़ज़ी शेर हैं जो केवल बाहर से भयानक दिखते हैं। उनसे डरने जैसी कोई बात नहीं, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा पहले ही परास्त किये जा चुके हैं।” तभी, उनमें से एक दुष्ट पुलिसवाला चिल्लाया, “बताओ हमें, कलीसिया में तुम्हारा पद क्या है! तुम किसे रिपोर्ट करती हो?” क्योंकि मुझे परमेश्वर के वचनों का सहारा था, मुझे बिल्कुल भी डर नहीं लगा, और इसीलिए मैंने उसके सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। मैंने जिस तरह जवाब देने से इनकार कर दिया था, इसे देखकर वह पुलिसवाला खतरनाक जंगली जानवर की तरह मेरे ऊपर गुर्राया: “इस बदजात कुतिया को खड़ा करो! उसे पंजों के बल खड़ा कर दो जिससे उसे पता चल जाए कि हम कितने खतरनाक हैं!” फिर दो दुष्ट पुलिसवाले मेरी ओर बढ़े और मेरे हाथों को बुरी तरह से मेरी पीठ के पीछे मोड़कर ऊपर उठा दिया। मुझे तत्काल असहनीय दर्द महसूस हुआ और मेरे मुँह से चीख निकल गई और फिर मैं बेहोश हो गई…। जब मैं होश में आई, तो मैंने देखा कि मैं फ़र्श पर पड़ी हुई थी और मेरी नाक से खून निकल रहा था। मुझे साफ़ पता चल गया कि मेरे बेहोश होने के बाद, दुष्ट पुलिसवालों ने मुझे फ़र्श पर पटक दिया था। मुझे होश में आया देखकर, उन लोगों ने मुझे एक कमरे में खींच लिया, जो इतना अँधेरा था कि मैं अपने चेहरे के सामने अपने हाथों को भी नहीं देख पा रही थी। कमरा घुप्प अँधेरा, ठंडा और बदबूदार था। इसमें से पेशाब की दुर्गंध आ रही थी और मैं बड़ी मुश्किल से साँस ले पा रही थी। एक दुष्ट पुलिसवाले ने दरवाज़ा बंद करते हुए गुस्से में कहा, “ज़रा सोचो, अगर तुम गलती को नहीं स्वीकार करोगी, तो हम तुम्हें भूखों मरने पर मज़बूर कर देंगे।” मैं ठंडे फ़र्श पर गिर गई। मेरे पूरे शरीर में दर्द हो रहा था और मैं अंदर से काफ़ी कमज़ोर और व्याकुल महसूस कर रही थी। मैंने सोचा: “एक सृजित मनुष्य के लिए परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर की आराधना करना एक अपरिवर्तनीय नियम है, तो फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने में क्या गलत हो सकता है? परमेश्वर में विश्वास करने से हम सही मार्ग पर चल पाते हैं, यह न तो गैरकानूनी है और न ही कोई अपराध। फिर भी शैतानों का यह गिरोह मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसे कि मैंने मौत की सजा पाने लायक कोई बड़ा अपराध कर दिया है। इसे सहन नहीं किया जा सकता!” जब मैं अपनी पीड़ा में डूबी थी, परमेश्वर के वचनों का एक भजन मेरे मन में आया: “तुम लोगों में जो कार्य किया गया है, और तुम सब के भीतर जो आशीर्वाद दिए गए हैं उन्हें कोई भी दूर नहीं कर सकता है, और जो सब तुम सभी को दिया गया है वह कोई भी छीन कर नहीं ले जा सकता है। … इस वजह से, तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक समर्पित होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति और भी अधिक निष्ठावान। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को संभालना होगा, और परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करने के लिए अपने कद को तैयार करना होगा। परमेश्वर द्वारा दी गई जगह में तुम्हें दृढ़ खड़ा होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का अनुसरण करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा विजित होना चाहिए और अंततः परमेश्वर का एक गौरवपूर्ण गवाही बनना चाहिए। यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त होगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है” (“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” में “तुम परमेश्वर की इच्छा को निराश नहीं कर सकते”)। मैं मन ही मन ये पंक्तियां गाती रही और मेरे पूरे शरीर में जोश का संचार हो गया। मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो कि परमेश्वर मेरे बिल्कुल बगल में खड़े थे, मुझे सांत्वना दे रहे थे और एक ममतामयी माँ की तरह मेरा प्रोत्साहन कर रहे थे, इस आशंका में कि कहीं मैं कमज़ोर न पड़ जाऊं, गिर न जाऊं और अपना विश्वास न खो बैठूं, वे मुझे विनम्रता से समझा रहे थे और निर्देश भी दे रहे थे। यह सब ऐसा था मानो वे मुझसे कह रहे हों कि मैं जिस पीड़ादायक स्थिति में थी वह दरअसल राज्य के लिए प्रशिक्षण था, यह परमेश्वर का शाश्वत आशीष पाने के लिए शैतान पर जीत की एक गवाही थी, यह जीवन का सबसे कीमती धन था जो मुझे परमेश्वर ने दिया था, यह विशेष रूप से राज्य में प्रवेश के लिए दी गई एक सुंदर गवाही थी। मेरा दिल इस कदर भर आया कि मेरी आँखों से आंसू ढलक पड़े, और मैंने सोचा: “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं यह अच्छी तरह से याद रखूँगी कि आपने मुझे क्या सौंपा है और मुझे इस प्रशिक्षण का बीड़ा उठाना स्वीकार है। मैं पूरी सच्चाई से आपके साथ सहयोग करूंगी और आपके लिए शानदार गवाही दूंगी, मैं कमज़ोर नहीं पडूंगी और शैतान के हाथों उपहास की पात्र नहीं बनूंगी!”

तीसरे दिन सवेरे, कई पुलिसवाले मुझे एक बार फिर पूछताछ वाले कमरे में ले गये। एक दुष्ट पुलिस अधिकारी ने अपने डंडे से मेरे सिर पर ज़ोरदार प्रहार किया, और झूठी मुस्कान के साथ कहा, “क्या तुमने इसके बारे में सोचा?” फिर उसने कलीसिया के सदस्यों के नामों वाली एक सूची दिखाई और मुझसे उनकी पहचान करने के लिए कहा। मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, शैतान एक बार फिर मुझे लालच देने के लिए आया है और वह इस कोशिश में है कि मैं आपको धोखा दे दूं और अपने भाई-बहनों को बेच दूं। मैं यहूदा की तरह एक पापी जीवन जीने के रस्ते को पूरी तरह नकारती हूँ। मैंने सिर्फ यही मांगती हूँ कि आप मेरे हृदय की रक्षा करें, और अगर मैंने आपको धोखा देने के लिए कुछ भी किया, तो आप मुझे शाप दें!” मैंने तत्काल अपने अंदर शक्ति का संचार होता महसूस किया, और मैंने दृढ़तापूर्वक कहा, “मैं इनमें से किसी को नहीं जानती!” जैसे ही मैंने यह बात कही, तभी दो दुष्ट पुलिसवाले मुझ पर झपट पड़े। उनमें से एक ने मेरे पैर को पकड़कर खींचा और दूसरे ने एक कठोर चमड़े के जूते से मेरे घुटनों पर कसकर प्रहार किया। मुझ पर प्रहार करते हुए, उसने भयानक तरीके से कहा, “किसी को नहीं जानती, हाँ? तुम वाकई इनमें से किसी को नहीं जानती?” तेज़ दर्द के कारण मैं फिर से बेहोश हो गई। मुझे नहीं पता कि मैं कितनी देर तक बेहोश रही, मैं तब उठी जब उन्होंने मेरे ऊपर ठंडा पानी फेंककर मुझे जगाया। जैसे ही मैं होश में आयी, एक दुष्ट पुलिसवाले ने अपना मुक्का उठाकर मेरी छाती में ज़ोर से प्रहार किया। उसने मुझ पर इतनी ज़ोर से प्रहार किया कि मैं काफ़ी देर तक साँस ही नहीं ले पाई। फिर दूसरे दुष्ट पुलिसवाले ने मुझे बालों से पकड़ लिया, मुझे खींचकर एक लोहे की कुर्सी पर बिठा दिया और हथकड़ी लगा दी, ताकि मैं हिल-डुल न सकूं। फिर उसने एक गंदे कपड़े से मेरी आँखें ढँक दीं। वे अपनी पूरी ताकत लगाकर बारी-बारी से मेरे दोनों कानों को ऊपर की ओर खींचते रहे और जितनी ज़ोर से मेरे पैरों पर मार सकते थे, मारते रहे—इसके दर्द से मैं बुरी तरह कराहने लगी। मुझे दर्द और तकलीफ़ को सहन करते देख, दुष्ट पुलिसवालों का गिरोह ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगा। उनकी हँसी मुझे नर्क के भीतर से आती हुई लग रही थी—इसे सुनना भयानक अनुभव था और इससे मेरे हृदय में भूचाल आ गया। इस तरह की क्रूरता का सामना करते हुए, मैंने सही मायनों में यह साफ़ तौर पर देखा कि यह “जनता की पुलिस”, जैसा कि सीसीपी सरकार उनके होने का दावा करती है, दरअसल क्रूर और दुष्ट जंगली जानवर के समान थी। वे लोग ऐसे पिशाच थे जिनका काम सिर्फ़ लोगों को कष्ट पहुंचाना था! मैं हमेशा पुलिस को नायकों की तरह देखती थी जिनका काम न्याय दिलाना था, जो बुरे लोगों को हवालात में डालते थे और नेक लोगों को सुरक्षित रखते थे, और लोग जब कभी भी किसी खतरे या परेशानी में होते, वे पुलिस को मदद के लिए पुकार सकते थे। भले ही जब से मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, मैं उनके द्वारा गिरफ़्तार करके सताये जाने के ख़तरे में थी, लेकिन असल में मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे शैतान के दैत्य हैं। अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने निजी तौर पर मुझे इस तथ्यात्मक सच्चाई का एहसास कराया है, और तब जाकर मैं यह देख पा रही हूँ कि उन लोगों ने शैतानी राक्षसों का क्रूर और भयानक मुखौटा पहन रखा है। अपने दिल में, मैंने आखिरकार मेरी आध्यात्मिक आँखों को खोलने और मुझे सही-गलत के बीच के अंतर को साफ़ तौर पर देखने लायक बनाने के लिए चुपचाप परमेश्वर का धन्यवाद किया। मैंने यह महसूस किया कि इन सारी सच्चाइयों को जानने के लिए इस तरह का कष्ट उठाना सार्थक था! अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो मैं शैतान के झूठ और धोखे को कभी नहीं समझ पाती, शैतान के अँधेरे प्रभाव से बच निकलना और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करना मेरे लिए लगभग असंभव हो जाता।

कुछ समय बाद, दुष्ट पुलिस अधिकारी ने कहा, “अब भी नहीं बोल रही? बोलोगी या नहीं?” यह देखकर मैंने कुछ नहीं कहा, तभी दो पुलिसवाले मेरी ओर बढ़े, मेरे सिर को पकड़ लिया और मेरी भौहों को उखाड़ने लगे। उनमें से एक ने जिसने मुझे पकड़ रखा था, कई बार मेरे चेहरे पर थप्पड़ लगाये, थप्पड़ इतनी ज़ोर से लगे थे कि मेरा सिर चकराने लगा। इस अपमान और पीड़ा की वजह से मुझे उदासी और घृणा दोनों का अनुभव हुआ, इन हरकतों के कारण शर्म के मारे मेरी आँखों से आंसुओं को धार बहने लगी। ओह, मुझे इन क्रूर विवेकहीन दुष्टों से बहुत नफ़रत हो गई थी, जिन्होंने परमेश्वर का अपमान किया था! अपनी पीड़ा में, मैंने उन हालातों के बारे में सोचा कि प्रभु यीशु ने इस तरह के अपमान को कैसे सहन किया होगा, मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए सैनिकों द्वारा किये गए तिरस्कार और मारपीट को कैसे सहन किया होगा, और कैसे उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया था। मैंने परमेश्वर द्वारा बार-बार दी गई इन चेतावनियों और उपदेशों पर विचार किया: “संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: ‘क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’ अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?”)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को काफ़ी सुकून दिया और मैंने महसूस किया कि जिस अपमान और पीड़ा को अभी मैं सहन कर रही हूँ, परमेश्वर उसे याद रखेंगे; मैं यह पीड़ा सत्य को हासिल करने के लिये सहन कर रही थी, यह एक शानदार गवाही थी और यह मेरे जीवन में एक आशीष था। मैंने सोचा, “चूंकि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, तो मेरे पास परमेश्वर के आशीष को स्वीकार करने का विश्वास और साहस होना चाहिये, और मेरे अंदर परमेश्वर की जीत की एक गवाह होने का दम होना चाहिये।” तभी, पुलिस अधिकारी के चेहरे के भाव बदले और उसने कहा, “हम जो भी जानना चाहते हैं बता दो और मैं तुम्हें अभी जाने दूंगा।” मैंने उसे घृणा के भाव से देखा और कहा, “मेरे जिंदा रहते ऐसा नहीं होगा!” गुस्से से तमतमाते हुए, उसने दो दुष्ट पुलिसवालों को मुझे पीछे खींचकर हवालात की अँधेरी कोठरी में डाल देने का निर्देश दिया।

क्रूर यातना के कई सत्रों के बाद, मेरा शरीर बुरी तरह से टूट गया था और इस पर कई घाव बन गये थे, मेरे पास कोई ताकत नहीं बची थी। खास तौर पर मेरे हाथ और पैर इस कदर बुरी तरह से फूल गये थे कि मैं उन्हें हिला-डुला भी नहीं पा रही थी। मैं पूरी तरह से शक्तिहीन होकर निढाल पड़ गई थी जैसे कि कोई मेमना अपने वध की प्रतीक्षा कर रहा हो। जब भी मैं यातना के उन क्रूर तरीकों का प्रयोग करते दुष्ट पुलिसवालों के क्रूर चेहरों और घिनौनी हँसी के बारे में सोचती, तो मेरा मन न चाहते हुए भी गहरी चिंता से भर जाता था। खास तौर पर तब, जब मैं हवालात की कोठरी के करीब आते कदमों की आहट सुनती थी, तो मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता था। तब मेरे अंदर आतंक और भय गहराने लगता, मैं अपने आपको असहाय और लाचार महसूस करने लगती थी। मैं रोने लगती थी; ओह, मैं किस बुरी तरह से रोती थी! मैंने परमेश्वर से अपने दिल की बात कही: “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! अभी मैं बुरी तरह डरी हुई हूँ और बहुत कमज़ोर महसूस कर रही हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं किस ओर जाऊं। कृपा करके मेरी रक्षा कीजिये। मैं वाकई अब इस नर्क में अब और नहीं रहना चाहती।” जब मैं अपने आपको कमज़ोर और मायूस महसूस कर रही थी, तभी परमेश्वर के वचन मेरे अंदर उभर आये, मुझे प्रोत्साहन और सहारा देने लगे: “इस विशाल दुनिया में, कौन मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से जाँचा गया है? … मैंने अय्यूब का उल्लेख बार-बार क्यों किया है? और मैंने पतरस को बार-बार संदर्भित क्यों किया है? क्या तुम लोगों ने कभी अपने लिए मेरी आशाओं को महसूस किया है? तुम लोगों को ऐसी बातों पर विचार करने के लिए अधिक समय व्यतीत करना चाहिए” (“वचन देह में प्रकट होता है” में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के “अध्याय 8”)। परमेश्वर के वचनों से मेरे अंदर विश्वास और शक्ति का संचार हुआ। मैंने सोचा, “हाँ!, पूरे स्वर्ग और धरती में, इंसानों में से ऐसा कौन है जो वैसा कर सकता है जैसा हम करते हैं और ऐसा कौन है जो दैत्यों की इस मांद में परमेश्वर की परीक्षा को निजी तौर पर स्वीकार कर सकता है? किसे परमेश्वर द्वारा उठाया जा सकता है और किसे चारों तरफ़ से शैतानों की फौज़ के बीच इस अग्निपरीक्षा से गुज़रने का सौभाग्य मिला है? मैं बुरी तरह से कमज़ोर और शक्तिहीन हो गई हूँ, फिर भी आज परमेश्वर मुझे इतना प्यार दे रहे हैं। परमेश्वर द्वारा चुना जाना मेरे जीवन का आशीष है और यही मेरा सम्मान है। मैं इस परीक्षा से बचकर नहीं भाग सकती, न ही मुझे इससे बच निकलने की कोशिश करनी चाहिये। इसके बजाय, मेरे पास आत्मसम्मान होना चाहिये, मुझे शैतान के सामने मज़बूती से खड़ा रहना चाहिये, जैसा कि अय्यूब और पतरस ने किया था। मुझे अपने जीवन का उपयोग परमेश्वर की गवाह बनने और परमेश्वर के नाम की मर्यादा बनाये रखने के लिए करना चाहिए, मुझे परमेश्वर के दुखी और निराश होने का कारण नहीं बनना चाहिये।” उस समय, मेरा हृदय कृतज्ञता और गर्व से भर गया। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कि मुझे इस जीवन में ऐसी पीड़ा और परीक्षा से गुज़रने का जो सौभाग्य मिला है, वो बिल्कुल असाधारण और सार्थक है!

चौथे दिन, एक बार फिर कलीसिया के सदस्यों की सूची हाथ में लेकर, दुष्ट पुलिस अधिकारी ने यह कहते हुए अपनी उंगली दिखाई, “इनमें से जिन लोगों को तुम जानती हो उनके नाम मुझे बताओ और मुझे अपने अगुवा का नाम भी बताओ। अगर तुम मुझे ये नाम बता दोगी, तो मैं तुम्हें जाने दूंगा। अगर नहीं, तो तुम यहीं मरोगी!” उसने देखा कि मैं अब भी उससे कुछ नहीं कहने वाली, तो उसने गुस्से से कहा, “आओ, उसके हाथों को उसकी पीठ पीछे बांधकर उसे लटका दो। उसे मार ही डालो!” दो पुलिसवालों ने तुरंत मेरे हाथों को मेरी पीठ पीछे बाँध दिया और उनके सहारे मुझे एक रस्सी से लटका दिया, ताकि मैं सिर्फ़ पैरों की उंगलियों के सहारे खड़ी रह पाऊं। फिर पुलिस अधिकारी ने थोड़ा धमकाते और थोड़ा प्रलोभन देते हुए कहा, “इस तरह से क्यों तकलीफ़ उठा रही हो? तुम जिन हालातों में हो, उसकी वास्तविकता को तुम्हें समझना होगा। चीन कम्युनिस्ट पार्टी का है और हम जो कहते हैं, वही होता है। अगर तुम वह सब बता देती हो, जो हम जानना चाहते हैं, तो मैं तुम्हें सीधे यहाँ से जाने दूंगा। इतना ही नहीं, मैं तुम्हें एक नौकरी भी दिला दूंगा। अगर तुम नहीं बताती हो, तो मैं तुम्हारे बारे में तुम्हारे बेटे के स्कूल में बता दूंगा और उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा…।” जब मैंने उसकी बेशर्मी भरी बातों को सुना, तो मुझे दुःख और गुस्सा दोनों का अनुभव हुआ। परमेश्वर के कार्य को रोकने और नष्ट करने के लिए और उद्धार पाने के हमारे अवसर को बर्बाद करने के लिए, सीसीपी सरकार किसी भी हद तक जाएगी और किसी भी तरह का बुरा काम करेगी! जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं: “इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। … धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं!” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “कार्य और प्रवेश (8)”)। तभी, मुझे सीसीपी सरकार के बदसूरत चेहरे का बिल्कुल स्पष्ट अंदाज़ा मिल गया, और मैंने स्वर्ग के विरुद्ध इसकी भ्रष्टता और जघन्य अपराध को देख लिया। सीसीपी सरकार वह शत्रु है जो परमेश्वर से नफ़रत करती है और यह परमेश्वर के बिल्कुल ख़िलाफ़ है, यह मेरी बिल्कुल कट्टर विरोधी हो—मैं इसकी बात कभी नहीं मान सकती! यह देखकर कि मैं चुपचाप रही, उन लोगों ने मुझे वहीं लटकता छोड़ दिया और धीरे-धीरे मैं बेहोश हो गई: उन लोगों ने मुझे पूरा एक दिन और पूरी एक रात वहीं लटकता छोड़ दिया। जब उन लोगों ने मुझे नीचे उतारा, तो मुझे सिर्फ़ यह महसूस हुआ कि कोई मेरी नाक को छू रहा था। वह जो भी था, जब उसने देखा कि मेरी साँसें अब भी चल रही हैं, तो उसने मुझे वहीं फ़र्श पर पड़ा रहने दिया। मेरे दिमाग में छा रहे धुंधलके के बीच, मैंने उन्हें यह कहते सुना, “मैंने सारी तरकीबें आज़मा लीं। मैं हैरान हूँ कि यह कुतिया इतनी मजबूत कैसे है। वह तो कम्युनिस्ट पार्टी से भी ज़्यादा मजबूत है। ये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासी कुछ और ही हैं!” जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना, तो मेरे अंदर कुछ ऐसा महसूस हुआ जिसे मैं बयां नहीं कर सकती, मैं परमेश्वर का धन्यवाद व्यक्त करते हुए उनकी प्रशंसा करने से खुद को नहीं रोक पाई, क्योंकि परमेश्वर ने ही मुझे शैतान पर काबू पाने में मेरी अगुआई की थी।

मैं आठ दिनों तक पुलिस सुरक्षा ब्यूरो की अंधेरी कोठरी में बंद रही। सीसीपी सरकार ने हर तरह की चाल चल कर और हर तिकड़म आज़मा कर देख लिया, फिर भी वे लोग ऐसी कोई भी जानकारी मुझसे नहीं पा सके जो वे पाना चाहते थे। अंत में, जब दुष्ट पुलिसवालों को कोई उपाय न सूझा, तो उन लोगों ने मुझे सुधार-गृह भेज दिया। इस दौरान, उन लोगों ने मेरे परिवार से पैसे उगाहने के अवसर का लाभ उठाया, जब मेरे परिवार के लोग मुझसे मिलने आते। उन्होने मेरे पति से 3,000 युआन वसूले। मैंने सोचा था कि सुधार-गृह थोड़ा बेहतर होगा, लेकिन मैं गलत थी। परमेश्वर से नफ़रत करने वाले इस देश, चीन का हर एक कोना बिल्कुल काला है और हिंसा, क्रूरता और हत्या की घटनाओं से भरा हुआ है। इस तरह की जगह में सत्य का होना संभव नहीं है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के किसी विश्वासी को यहाँ पैर टिकाने की जगह मिलने का तो सवाल ही नहीं है। सुधार-गृह में रहना तो आसमान से टपकने और खजूर में अटकने जैसा है। दुष्ट पुलिसवाले अब भी हार मानने को तैयार नहीं थे, और इसलिए मेरे वहाँ पहुँचते ही वे मुझसे पूछताछ करने लगे। चूँकि वे मुझसे जो भी जानकारी पाना चाहते थे, उनमें से कोई भी जानकारी उन्हें नहीं मिली थी, इसलिए तीन पुलिसवाले तत्काल मेरे ऊपर झपटे और मुझ पर लात-घूसों की बौछार कर दी। मेरे पुराने घाव, जो अब तक ठीक नहीं हुए थे, उन पर फिर से नये चोट और घाव बन गये। मुझे तब तक बुरी तरह से मारा गया जब तक मैं फ़र्श पर निढाल न हो गई और हिलने-डुलने लायक भी न रही। पुलिस प्रमुख उकडूँ होकर नीचे बैठ गया, मेरे सिर पर उंगली रखकर मुझे यह कहते हुए धमकाने लगा, “अगर तुम अपना अपराध स्वीकार नहीं करोगी, तो यहाँ जिंदा रहने की उम्मीद भी मत करना!” एक दुष्ट पुलिसवाला मेरे पास आया और उसने फिर से मुझ पर कई बार लातों से प्रहार किया, फिर दो पुलिसवाले मुझे खींचकर आँगन में ले आये और मुझे एक टेलीफ़ोन के खंभे से बाँध दिया। मैं पानी की एक बूंद भी पिये बिना एक पूरे दिन वहाँ बंधी पड़ी रही, मेरा शरीर कटे के निशानों और घावों से भरा हुआ था। इस आशंका से कि मैं वहाँ मर भी सकती हूँ, उन लोगों ने मुझे एक कोठरी में डाल दिया। जब मैं ठीक मौत के दरवाज़े पर थी और मैं सबसे ज़्यादा कमज़ोर महसूस कर रही थी, तभी दो बहनें जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती थीं और जिन्हें सुधार-गृह में कैद करके रखा गया था, वे मेरी ओर दौड़ पड़ीं। उन्होंने अपने कपड़े खोलकर और मुझे उनमें लपेटकर मुझे कसकर पकड़ लिया, वे अपने शरीर की गर्मी से मेरे शरीर को गर्म रखने करने की कोशिश करने लगीं। हालांकि हम एक दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थीं, लेकिन परमेश्वर का प्रेम हमारे दिलों को करीब ले आया था। मैं अपनी बहनों के रोने की अस्पष्ट आवाज़ को सुन पा रही थी, और दूसरे कैदी यह कहते हुए हमारी चर्चा कर रहे थे, “ये पुलिसवाले कितने कठोर हैं! सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने वाले ये लोग कितने दयालु हैं। मैंने सोचा कि तुम सब एक ही परिवार की हो, लेकिन असल में तुम लोग तो एक दूसरे को जानते भी नहीं।” मैंने दोनों बहनों को यह कहते हुए भी सुना, “परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया है और हम सब एक परिवार हैं…।” अंत में मुझे तेज़ बुखार हो गया, मैं बेहद कमज़ोर हो गई और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं मौत के बिल्कुल करीब हूँ। दुष्ट पुलिसवालों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन दोनों बहनों ने कुछ कपड़े और दवाइयां खरीदने की मोटी कीमत चुकाई। उन्होंने बड़ी सावधानी से मेरे घावों का इलाज किया और हर दिन मेरी देखभाल करती रहीं। उनकी सतर्क देखभाल में, धीरे-धीरे मेरी हालत सुधरने लगी। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर का प्रेम था: भले ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ टूटने की अनुमति दी थी, उन्हें हमेशा मेरी कमज़ोरी और तकलीफ़ का ख़याल था, और उन्होंने चुपचाप मेरे लिये सारी व्यवस्था कर ली थी, उन्होंने मेरी देखभाल करने और मुझे सहारा देने के लिये इन दोनों बहनों की व्यवस्था की थी। हमने एक दूसरे को सहारा और प्रोत्साहन दिया, और अपने मन में एक ही इच्छा और लक्ष्य को लेकर, हममें से हर एक ने चुपचाप दूसरे के लिये प्रार्थना की थी। हमने परमेश्वर से विश्वास और शक्ति देने की प्रार्थना की थी, ताकि हम दुष्टात्माओं की इस मांद में परमेश्वर की जीत के गवाह बन सकें।

सुधार-गृह में जाना धरती पर नर्क में प्रवेश करने जैसा था; उन दीवारों के अंदर हम एक अमानवीय जीवन जी रहे थे। हमारे पास कभी भी खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होता था और हमें बहुत कड़ी मेहनत करनी होती थी, हम सुबह के सात बजे से लेकर रात के दस बजे तक लगातार काम करते थे, तब जाकर हम अपनी-अपनी कोठरी में जा पाते थे—हर दिन काम करते हुए हम बुरी तरह से थक जाते और हमारे शरीर की सारी ताकत ख़त्म हो जाती थी। लेकिन क्योंकि मैं अक्सर दोनों बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों के बारे में सहभागिता कर पाती थी, इसलिए भले ही मेरे शरीर को काफ़ी तकलीफ़ उठानी पड़ती थी और हम हमेशा थके होते थे, फिर भी मेरे हृदय को सुकून मिलता था और वह रोशनी से भरा था। उस दौरान अक्सर, मैं परमेश्वर के वचनों के इस भजन के बारे में सोचा करती थी: “इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है” (“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” में “तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास”)। जब भी मैं यह भजन गाती, मुझे ऐसा महसूस होता कि एक असाधारण शक्ति मेरा समर्थन कर रही है, और पूरी तरह अनजान रहते हुए, अंदर से मुझे जो थकान, तनाव और तकलीफ़ महसूस होती थी, वह सब हवा हो जाती। साथ ही साथ, मुझे यह भी एहसास हुआ कि मेरा इस पीड़ा को सहन कर पाने में सक्षम होना सबसे बड़ी करुणा थी और यह परमेश्वर द्वारा मुझे दिया गया सबसे बड़ा आशीष था। मेरी पीड़ा चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो गई हो, मैं अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करके के लिए कृतसंकल्प थी, और यहाँ तक कि आख़िरी साँस बची रह जाने पर भी, मैं परमेश्वर से प्रेम करने और उनको संतुष्ट करने की कोशिश करूंगी। परमेश्वर के प्रेम का प्रोत्साहन पाकर, मैंने सुधार-गृह में तकरीबन 20 दिनों की असहनीय पीड़ा का सामना किया। राक्षसों की उस अँधेरी मांद में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर से मिली जीवन की रोशनी ने अँधेरे को मिटा दिया था और इसने मुझे निरंतर परमेश्वर की स्तुति करने और परमेश्वर के वचनों से मिल रही जीवन की आपूर्ति का आनंद उठाने में सक्षम बनाया था—यह परमेश्वर द्वारा मुझे दिया गया सबसे बड़ा प्रेम और उद्धार था। जब मुझे अंततः रिहा किया जा रहा था, तब भी दुष्ट पुलिसवाले यह कहते हुए बेशर्मी से मुझे धमकाते रहे, “यहाँ तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ, घर पहुँचने के बाद उसके बारे में किसी से ज़िक्र करने की सोचना भी नहीं!” दुष्ट पुलिसवालों के इंसानी चेहरों और जंगली जानवरों वाले हृदय, बुरी चीज़ें करने लेकिन उनकी जिम्मेदारी नहीं लेने उनकी इच्छा की कुरूपता को देखकर मेरा विश्वास और भी मजबूत हो गया, शैतान को त्यागने, परमेश्वर का अनुसरण करने और परमेश्वर के लिये गवाही देने का मेरा संकल्प और भी दृढ़ हो गया। मैंने परमेश्वर के साथ सहयोग करने और सुसमाचार का प्रचार करने, दुष्ट शैतान के क्षेत्र में रह रही अन्य साथी आत्माओं को रोशनी में लाने का संकल्प लिया, ताकि वे भी सृजनकर्ता के प्रेम और उद्धार को प्राप्त कर सकें।

सीसीपी सरकार द्वारा क्रूरतापूर्ण ढंग से सताये जाने के इस पूरे अनुभव में, ये सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही थे जिन्होंने दुष्टात्माओं के घेरे से बाहर निकलने के लिए हर कदम में मेरी अगुवाई की और मुझे दुष्ट शैतान की मांद से निकलने में मदद की। इस अनुभव ने मुझे इस बात का सच्चा एहसास कराया: शैतान चाहे कितना ही वहशी, क्रूर और आक्रामक क्यों न हो, यह हमेशा परमेश्वर द्वारा परास्त किया गया शत्रु होगा। केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही वह सर्वोच्च सत्ता है जो हमारा पक्का समर्थक हो सकता है, जो शैतान पर जीत और मृत्यु पर जीत हासिल करने में हमारी अगुवाई कर सकता है, वही हमें परमेश्वर की रोशनी में दृढ़ता के साथ जीवन जीने में सक्षम बना सकता है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: “परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और अपनी शानदार चमक से चमकती है, चाहे वह कोई भी समय या स्थान क्यों न हो। स्वर्ग और पृथ्वी बहुत बड़े बदलावों से गुज़र सकते हैं, लेकिन परमेश्वर का जीवन हमेशा समान ही रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा। क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है, और उनके अस्तित्व का मूल है” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है”)। इसी दिन से, मैंने दृढ़तापूर्वक सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य की खोज में अपना सर्वोत्तम प्रयास करने और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को दिया जाने वाला अनंत जीवन हासिल करने का संकल्प लिया।

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