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दुष्टात्माओं के अत्याचारों को सहने के बाद, मुझे और भी अधिक एहसास हो गया कि परमेश्वर का अनुग्रह कितना अनमोल है

लेखक: शू कियांग, आंतरिक मंगोलिया स्वायत्त क्षेत्र

मेरा नाम शू कियांग है। मैं एक इंजीनियरिंग कांट्रैक्टर के तौर पर काम करता था। मैं साल भर चलने वाली इंजीनियरिंग परियोजनाओं की एक बड़ी टीम का लीडर था और अच्छा-खासा कमा लेता था। मेरे साथियों की नज़र में मेरा परिवार एक आदर्श परिवार था, करियर अच्छा चल रहा था, मेरा भविष्य अपार संभावनाओं से भरा था; उनको ज़रूर लगता होगा कि मैं सबसे खुशकिस्मत इंसान हूँ। लेकिन इन सब भौतिक सुविधाओं के बावजूद, कहीं न कहीं मुझे अंदर एक अजीब-सा ख़ालीपन महसूस होता था। भूमि परियोजनाओं से जुड़े मेरे लगातार प्रयासों के मामले में यह बात ख़ासकर सही बैठती थी: मुझे प्रॉजेक्ट हासिल करने के लिए संबंधित विभागों के प्रमुखों की चापलूसी करनी पड़ती थी, उनके हाव-भाव से उनके विचारों को पढ़ना पड़ता था, अपना काम निकलवाने के लिए उनकी चापलूसी और खुशामद करनी पड़ती थी; वरना मैं पैसे नहीं कमा पाता। और तो और, मुझे अपने सहकर्मियों के बीच चल रही साज़िशों से, एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी की गयी दीवारों से और उनके जोड़-तोड़ से निपटना पड़ता था। इन सबसे मेरा दिमाग और भी खराब हो जाता था…। मैं हतोत्साहित हो जाता था, बुरी तरह से थक जाता था; मुझे लगता था कि मैं कठपुतली बन गया हूँ, पैसा कमाने वाली मशीन बन गया हूँ, मानो मैंने अपनी सारी गरिमा और सत्यनिष्ठा गँवा दी है। यह सब तब तक चलता रहा, जब तक मैंने 1999 में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार न कर लिया। कलीसियाई जीवन से मिले मुक्ति के एहसास ने और भाई-बहनों की सादगी, ईमानदारी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैं इसी तरह का कलीसियाई जीवन जीना चाहता था, भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करना चाहता था, आपस में व्यक्तिगत अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान पर चर्चा करना चाहता था। मुझे इस तरह से समय व्यतीत करना भी बहुत भाता था। लगातार परमेश्वर के कथनों को पढ़ने और सभाओं में जाने से, मुझे बहुत से सत्य समझ में आने लगे, मेरी आत्मा को अत्यंत मुक्ति का एहसास हुआ। मुझे इस बात की बेहद खुशी हुई कि अंतत: जीने के लिए मुझे एक सच्चा मार्ग मिल गया है और सच्ची खुशी मिल गई। मैंने तहेदिल से परमेश्वर का आभार व्यक्त किया: अगर परमेश्वर ने संसार के दुखों के सागर से मेरी रक्षा न की होती, तो जीवन में ऐसा कुछ नहीं था जिसके सहारे मैं जी पाता। उसके बाद, मैं सक्रिय रूप से सुसमाचार के प्रचार में जुट गया, जो लोग सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल कर रहे थे, मैं उनसे बिना थके प्रसन्नता से मिलता, उन्हें समझाता, और उन्हें परमेश्वर की वाणी सुनने में मदद करता, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उद्धार को पाने में सहायता करता।

लेकिन, नास्तिक देश चीन में, लोगों के लिए न तो कोई लोकतंत्र है, न मानवाधिकार हैं। जो लोग परमेश्वर में आस्था रखते हैं, उसकी आराधना करते हैं, उन्हें ख़ासतौर से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के दबाव और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। परमेश्वर में आस्था के कारण, मुझे भी सीसीपी सरकार ने पकड़ा, मुझे भी उसकी क्रूरता, अमानवीय यातना का शिकार होना पड़ा। करीब दो साल मैंने सीसीपी की नारकीय जेल में गुज़ारे…। इस मुश्किल और दर्दनाक अनुभव के बाद, मैंने सीसीपी सरकार के कट्टर परमेश्वर–विरोधी शैतानी सार को, सत्य के प्रति उसकी घृणा को अच्छी तरह से समझ लिया। मैंने इस बात को भी गहराई से जान लिया कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। उसके वचन मेरा जीवन बनकर, मुझे आगे की राह दिखाएँगे। अगर परमेश्वर के वचन मुझे निरंतर राह न दिखाते, मुझे शक्ति और विश्वास न देते, तो शायद आज मैं ज़िंदा न होता। मैं परमेश्वर के उद्धार के अनुग्रह को आजीवन नहीं भूलूँगा!

18 दिसम्बर, 2005 की बात है, भाई-बहनों के साथ एक सभा के दौरान अचानक, दरवाज़े से कुछ ज़बर्दस्त तो‌ड़-फोड़ की आवाज़ें आने लगीं। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, दस से ज़्यादा पुलिस अधिकारी धड़धड़ाकर अंदर घुसे, वे सभी को खा जाने वाली नज़रों से देख रहे थे। जितने ताम-झाम के साथ पुलिस आई थी, उससे पूरा नज़ारा किसी फिल्म का दृश्य लग रहा था, जहां किसी ख़ूँख़ार भगोड़े को गिरफ़्तार किया जा रहा हो। ख़ैर, उन्होंने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए, हमारे जूते उतरवा लिए ताकि हम लोग भाग न सकें, फिर हमारी बेल्ट उतरवाकर उससे हमारे हाथ हमारी पीठ के पीछे बाँध दिए गए। हमारे पास जो कुछ था, जैसे सेल फ़ोन, घड़ी, नकदी वगैरह, उन्होंने सब लूट लिया। फिर उन्होंने गुर्राकर हमें एक कतार में दीवार से सटकर घुटनों के बल बैठने के लिए कहा, अगर हम में से किसी ने ऐसा करने में ढीलापन दिखाया, तो उस पर लात-घूँसे बरसाकर, हमें ज़मीन पर बैठने के लिए मजबूर किया गया। उसके बाद, उन्होंने पूरी तलाशी ली, फ़र्नीचर तो‌ड़-फोड़ डाला, घर का सारा सामान उलट-पलट कर दिया; उन्होंने पूरा घर उजाड़ दिया। कुछ ही देर में, सब-कुछ अस्तव्यस्त हो गया। यह सब देखकर, मैंने गुस्से से पूछा, “जब हमने कोई कानून नहीं तोड़ा, तो आप हमें गिरफ़्तार क्यों कर रहे हैं?” मैं स्तब्ध रह गया जब मैंने देखा कि एक पुलिसकर्मी लपककर आया और उसने मुझे एक ही घूँसे में ज़मीन पर गिरा दिया, और चिल्लाया, “हम तुम जैसे परमेश्वर के विश्वासियों को गिरफ़्तार कर रहे हैं! जब तक हम एक-एक विश्वासी को गिरफ़्तार नहीं कर लेते, तब तक हमें नींद नहीं आएगी!” मैं उसकी भड़ास देखकर हक्का-बक्का रह गया, और चुप हो गया: जब सीसीपी को परमेश्वर से ही सबसे ज़्यादा नफ़रत है, तो ये हम विश्वासियों को जाने कैसे देगी? मैं भी कितना अंधा और मूर्ख था! उस पल, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे याचना की कि वो हमारी रक्षा करे ताकि हम उसकी गवाही दे सकें और उसे धोखा देने से बचें। तभी जो पुलिसकर्मी हम पर नज़र रख रहा था, उसने मुझसे पूछा, “हर जगह अपने धर्म का प्रचार करने के लिये तुमसे किसने कहा? तुम्हारा अगुवा कौन है?” मैंने कहा, “हम लोग अपनी मर्ज़ी से सुसमाचार का प्रचार करते हैं।” उसने लानत भेजते हुए कहा, “बकवास! बेटा, अपने जुर्म से बचने की कोशिश मत कर, वरना हम तुम्हें दिन में तारे दिखा देंगे!” तभी दूसरे कमरे से एक महिला पुलिसकर्मी के चिंघाड़ने की आवाज़ आई, “एक सुई दो! तू मुझसे छिपने की कोशिश कर रही है न…।” एक पल को मेरा कलेजा मुँह को आ गया, मुझे एहसास हुआ कि एक युवा बहन कहीं नज़र नहीं आ रही थी; पुलिस से बचने के लिए उसने छिपने की कोशिश की थी, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उसे ढूँढ़ निकाला। महिला पुलिसकर्मी ने उसे पकड़ा और उसके नाखूनों और पाँव के तलवों में सुई चुभा दी, वह उसके बालों को पकड़कर बुरी तरह खींचने लगी। आख़िरकार, जब वो बेहोश हो गई, तो उन्होंने उसे छोड़ दिया, और हम सबको हिरासत में ले लिया, लूटा हुआ हमारा सारा सामान साथ में लेकर वे हमें गाड़ी में डालकर चल दिए।

करीब दोपहर तक, पुलिस ने हमें पुलिस स्टेशन में हिरासत में रखा, और जल्दी ही उन्होंने हमसे अलग-अलग पूछताछ शुरू कर दी। मुझसे पूछताछ करने वाला इंचार्ज एक हट्ट-कट्टा, दबंग अधिकारी था, जैसे ही मैंने पूछताछ कक्ष में कदम रखा, वो ज़ोर से चिल्लाया और मुझे घुटनों के बल बैठने के लिए कहा। मैंने कहा, “मैं केवल परमेश्वर की आराधना करता हूँ; सिर्फ़ स्वर्ग, पृथ्वी, और सभी चीज़ों के प्रभु ही इस योग्य हैं जिनके सामने झुका जाना चाहिये। मैं आपके सामने बिल्कुल घुटने नहीं टेकूँगा!” यह सुनते ही मुझे उंगली दिखाकर दहाड़ते हुए बोला, “तुझे पता होना चाहिए कि यहाँ तो नरक के राजा को भी हुकुम बजाना पड़ता है! तेरी क्या औकात है? जब तक तेरी थोड़ी-बहुत धुनाई नहीं होगी, तुझे समझ में नहीं आएगा कि मालिक कौन है! अब, सीधे-सीधे घुटनों पे आ जा!” चिल्लाते हुए उसने मुझे लात मारी और मैं फ़र्श पर लुढ़क गया। उसके बाद उसने सवाल-जवाब शुरू किए: “अब सच-सच बता: तू कलीसिया का अगुवा है न? अपनी कलीसिया की किताबें कहाँ रखता है?” मैं घबरा गया और मुझे समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दूँ, मैंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की कि मुझे सद्बुद्धि दे ताकि मैं इस दुष्ट पुलिसवाले के सवालों का जवाब दे सकूँ। प्रार्थना करने के बाद, मैंने सुकून और ऊर्जा महसूस करते हुए सोचा, “मैं भाइयों-बहनों को बेचने के बजाय मरना पसंद करूँगा। मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता!” मैंने पुलिस वाले से कहा, “आप जो कुछ मुझसे पूछ रहे हैं, उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। आप मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं?” जैसे ही मैंने ये कहा, उस पुलिसवाले ने मेरे चेहरे पर एक ज़ोरदार मुक्का मारा, और फिर तुरंत ही उसने लात-घूँसों की बरसात शुरू कर दी। उसने मुझे इतनी बुरी तरह से पीटा कि मेरी आँखों के आगे तारे नाचने लगे, सिर चकराने लगा, लगा जैसे खोपड़ी चटक गई है। मैं सिर के बल फ़र्श पर जा गिरा। उसके हाथ में सुसमाचार का वो नोटपैड था जो उसे मेरे पास से मिला था, उसे दिखाते हुए बोला, “यह देख रहा है? हमारे पास सबूत है, इसलिए कमीने, ज़बान खोलने में आनाकानी मत कर। सीधे-सीधे जवाब दे। तू ही अगुवा है न? अगर तू नहीं होता, तो तेरे पास से यह नोट्स नहीं मिलते!” जब उसने देखा कि मैं ज़बान नहीं खोलूँगा, तो उसने दूसरी चाल चली, थोड़ी नरमी दिखाते हुए बोला, “मूर्खों की तरह पेश मत आ समझा, हमारी मदद कर। जो कुछ तुझे पता है, बता दे, कल मैं तुझे छोड़ दूँगा।” तभी, परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया और उसकी कृपा से मुझे उसके कथन के ये अंश याद आ गए: “जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी लिए गवाही में तुम्हें अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है जब परमेश्वर चाहता है तुम उसके लिए एक गवाही दो। बाह्य तौर पर, ये कोई बड़े कार्य जैसे न प्रतीत न हों, किन्तु जब ये चीज़ें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे …” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है”)। परमेश्वर के वचनों से मैं साफ़ तौर पर देख पाया कि यह एक आध्यात्मिक जगत की लड़ाई है। मैं शैतान के झाँसे में नहीं आ सकता, मुझे परमेश्वर की गवाही देनी होगी। इनके पास चाहे जो प्रमाण हों, मैं उन्हें कलीसिया की कोई भी जानकारी नहीं दे सकता था। यह परमेश्वर के प्रति मेरे प्रेम की गवाही और भक्ति थी जो मुझे परमेश्वर के सामने बनाए रखनी चाहिए। उसके बाद, मैंने प्रार्थना की, और धीरे-धीरे मेरा मन शांत हो गया। उसने जी भरकर मुझे यातना दी, लेकिन मैंने ज़बान नहीं खोली। आख़िरकार, वो इतना तंग आ गया कि उसने धड़ाक से दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया।

उसके बाद, एक और पुलिसवाला आया, जिसकी उम्र तीस एक साल की थी, उसने धीरे से मुझे सहारा देकर उठाया और एक कुर्सी पर बैठा दिया। उसने मुझे एक कप पानी दिया, और फिर बोला, “यह लो, भाई; पानी पी लो। तुम्हें बहुत चोट लगी है।” मुझे झटका लगा: यह क्या हो रहा है? ऐसी जगह पर कोई मुझे “भाई” कहकर बुला रहा है? इससे पहले कि मैं कुछ और सोच पाता, उसने अपनी बात जारी रखी: देखो भाई, आजकल हमें थोड़ा व्यवहारिक होने की ज़रूरत है, परिस्थिति के अनुसार ढलना ज़रूरी है। तुम्हारे जैसे इंसान के पास, मार खाते-खाते मर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। सच बताऊँ, मैं भी कभी परमेश्वर में विश्वास रखता था, तो मैं जानता हूँ कि परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छी बात है—लेकिन उसके लिए इतने कष्ट उठाना, अपनी ज़िंदगी को दाव पर लगा देना, यह ठीक नहीं है! अगर तुम्हें कैद हो गई, तो यह तुम्हारे पूरे परिवार पर एक कलंक होगा। मेरा ख़्याल है, अभी तुम्हारे माँ-बात ज़िंदा हैं? अगर तुमने कुछ साल जेल में काट दिए, तो जब तक तुम बाहर निकलोगे, तब तक वे लोग इस दुनिया में नहीं रहेंगे। तुम्हारे घरवाले तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे? …” मुझे अपने माँ-बाप से सबसे ज़्यादा लगाव था, इसलिए उस आदमी की एक-एक बात जैसे अंदर तक मुझे डंक मार रही थी। जैसे ही अपने बूढ़े माँ-बाप की तस्वीर मेरी आँखों के सामने आई, मुझे अचानक अंधेरा नज़र आने लगा, मैंने अपने आपको बहुत कमज़ोर महसूस किया, मैंने सोचा, “यह सच है; अगर मुझे कैद हो गई, तो मेरे माँ-बाप का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा? …” इस ख़्याल से ही मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, मैं उन्हें रोक न पाया। उस पुलिसवाले ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया, मुझे मनाने और लुभाने की कोशिश करते हुए बोला, “इसलिए बेहतर होगा कि तुम इन लोगों के साथ हर संभव सहयोग करो; अगर ऐसा करोगे, तो तुम्हें कल छोड़ दिया जाएगा।” इन शब्दों ने जैसे मुझे झिंझोड़कर जगा दिया, और मेरे दिमाग में स्पष्ट तौर पर ये शब्द कौंधे: तुम्हें यहूदा नहीं बनना है जिसने परमेश्वर को धोखा दिया था! जैसे मैं बाल-बाल बच गया! मुझे ललचाने और परमेश्वर को धोखा देने के लिए, इस धूर्त पुलिसवाले को ख़ुद शैतान ने भेजा है। उस पल, परमेश्वर के इन वचनों ने मेरा मार्गदर्शन किया: “केवल वफादारी से ही तुम शैतान की धूर्तता के विरूद्ध पलटकर वार कर सकते हो” (“वचन देह में प्रकट होता है” में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के “अध्याय 10”)। मैं समझ गया कि उस पुलिसवाले ने जो कुछ कहा है, वह सब शैतान की चाल है; वो लोग मेरे शरीर के भावनात्मक लगाव का फ़ायदा उठाकर मुझे परमेश्वर से विमुख करना चाहते हैं। लेकिन मैं किसी भी सूरत में शैतान की चाल में नहीं आ सकता था। उसके बाद, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की, इस विश्वास के साथ कि मेरे माँ-बाप की देखभाल करना उसकी ज़िम्मेदारी है, और पूरी तरह से उसी के हाथ में है। मैंने उन्हें परमेश्वर के सशक्त हाथों के हवाले करते हुए, परमेश्वर की गवाही देने का संकल्प लिया। मैंने दृढ़ता से उस पुलिसकर्मी से कहा, “आपके नेक इरादों के लिए धन्यवाद; मैं आपकी दयालुता की कद्र करता हूँ। लेकिन मुझे कलीसिया के मामलों की कोई जानकारी नहीं है।” जब उसने अपनी चाल कामयाब होते नहीं देखी, तो उस दुष्ट पुलिसकर्मी ने अपना असली रंग दिखाया, वो अचानक गुस्से में आ गया। उंगली नचाते हुए, वह अपनी ज़हरीली ज़बान में बोला, “तो फिर तू यहाँ मरने का इंतज़ार कर!” दोपहर करीब दो बजे, तीन-चार पुलिसकर्मी आए। उन्होंने मुझे कुर्सी से खींचा और कॉलर से पकड़कर घसीटते हुए मुझे दरवाज़े तक ले गए, और मुझे हथकड़ी लगाकर आड़े शहतीर से लटका दिया। फिर उन्होंने एक तंज़ कसा “ये ले बेटा, आराम से यहाँ ‘मज़े’ कर,” और मुझे छोड़कर चल दिए। मैं अपने दोनों पैरों से ज़मीन को एकसाथ नहीं छू पा रहा था; अगर मैं एक पैर से छूता, तो दूसरे को मजबूरन ऊपर उठाना पड़ता। इधर-उधर हिलने से हथकड़ी चुभती थी, और असह्य पीड़ा होती थी। करीब एक घंटे के बाद, खा-पीकर, वे दुष्ट पुलिसकर्मी वापस आए। एक कुटिल मुस्कान के साथ, उन्होंने मुझसे पूछा कि अब कैसा लग रहा है। तब तक, दर्द के मारे, मेरी सूती पैंट-शर्ट पसीने में तर-बतर हो चुके थे, और जब मुझे नीचे उतारा गया, मेरे दोनों हाथ डबलरोटी की तरह सूजकर सुन्न हो चुके थे, दुष्ट पुलिसकर्मियों का ये गिरोह बेहद नीच और क्रूर था। मुझे उनसे बेइंतिहा नफ़रत हो गई और मुझे साफ़ तौर पर सीसीपी सरकार की नीचता और क्रूरता समझ में आ गई। ये शैतानों का एक ऐसा गिरोह है जो परमेश्वर का विरोध और उससे घृणा करता है, इस दुष्ट पार्टी के प्रति मेरी नफ़रत तेज़ी से बढ़ती जा रही थी।

उस शाम, सात बजे के आस-पास उन दुष्ट पुलिसकर्मियों ने मुझे और चार बहनों को एक पुलिस की गाड़ी में ठूँसा और किसी अन्य स्थान पर ले गए। सारी बहनों के चेहरे पीले पड़े हुए थे; ज़ाहिर है, उनके साथ भी ऐसी ही क्रूरता हुई थी। हमने दृढ़ता भरी अर्थपूर्ण नज़रों से एक-दूसरे को हिम्मत बँधाई। जब हम लोग नज़रबन्दी गृह पहुँचे, तो उन दुष्ट पुलिसकर्मियों ने उन चार बहनों को गाड़ी से उतरने के लिए कहा, और मुझे गाड़ी में बैठे रहने को कहा। मेरी गाड़ी फिर चल पड़ी। जब मैंने उनसे पूछा कि मुझे कहाँ ले जाया जा रहा है, तो एक पुलिसकर्मी षडयंत्रकारी मुस्कान के साथ बोला, “हालाँकि तूने हमें अभी तक कोई जानकारी नहीं दी है, लेकिन हमें पता है कि तू कलीसिया का कोई छोटा-मोटा खिलाड़ी नहीं है। हम खराब मेज़बान नहीं साबित होना चाहते, इसलिए तुझे थोड़ा ‘खिलाने-पिलाने’ ले जा रहे हैं। …” मुझे अच्छी तरह से पता था कि इन दुष्ट पुलिसकर्मियों के इरादे बिल्कुल भी नेक नहीं हैं, इसलिए मैं पूरी तरह से सतर्क था। मैं लगातार परमेश्वर से विनती कर रहा था कि मुझे शक्ति प्रदान करे, और मेरी रक्षा करे मैं उसे धोखा न दूँ। जल्दी ही, मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड ले जाया गया। वहाँ मेरा सामना दो कर्कश आवाज़ वाले निर्दयी किस्म के लोगों से हुआ। वे मुझे पूछताछ के लिए एक कमरे में ले गए। वहाँ का फ़र्श ज़ुल्म ढाने के औज़ारों भरा पड़ा था, जैसे कोई ख़ूँख़ार शेरों का झुंड शांत बैठा हो। मेरी रीढ़ में कँपकँपा देने वाली एक ठंडी लहर-सी दौड़ गई। तभी एक दुष्ट पुलिसकर्मी मुझ पर गुर्राया, “मैंने सुना है तू बहुत ही ज़िद्दी है। ख़ैर, हमें तेरी जैसी अड़ियल हड्डियों को चबाने में बहुत मज़ा आता है!” जैसे ही उसने यह बात कही, दो दुष्ट पुलिसकर्मी मेरी ओर लपके, चिल्लाते हुए मुझे कानों से पकड़कर पूरी ताकत से घसीटने लगे। हल्की रोशनी में मुझे दो निकृष्ट और विकृत चेहरे नज़र आए, मेरा दिल बेकाबू होकर धड़कने लगा। तभी मुझे एक दूसरे दुष्ट पुलिसकर्मी के हँसी के ठहाके सुनाई दिये, “यह तेरी बदकिस्मती है जो तू आज मेरे हत्थे चढ़ गया। चल, तेरी शुरुआत तुझे नहलाने से करते हैं।” यह कहते हुए, उन लोगों ने मुझे पकड़ा और मेरे कपड़ों के चिथड़े कर दिए। मैं बर्फ़ से फ़र्श पर एकदम नंगा खड़ा था, मेरा पूरा बदन काँप रहा था, दाँत किटकिटा रहे थे। उस दुष्ट पुलिसकर्मी ने पानी के पाइप का मुँह सीधा मेरी तरफ़ किया और वॉल्व खोल दिया, देखते ही देखते मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे बर्फ़ के दरिया में डुबो दिया गया है। दर्द इतना असह्य हो रहा था जैसे कोई मेरी चमड़ी को चाकू से छील रहा हो; जैसे बहता हुआ खून जम गया हो। थोड़ी देर बाद, मुझे कुछ भी महसूस होना बंद हो गया। वो दुष्ट पुलिसकर्मी मुझे पानी में भिगोए जा रहे थे, और चिल्लाकर मुझे धमकी दे रहे थे, “अगर अपनी भलाई चाहता है, तो जल्दी ज़बान खोल दे; अगर नहीं खोली, तो तू कल का सूरज नहीं देख पाएगा!” इस भयंकर यातना को सहने को खुद को मजबूर करते हुए, बिना कुछ कहे, मैंने अपनी गर्दन लटका दी। एक दुष्ट पुलिसकर्मी दाँत पीसते हुए बोला कि वो अब मुझे गर्म करेगा, यानी कि वो मुझे बिजली के झटके देगा। तब तक मैं इतनी यातना झेल चुका था कि मेरे अंदर रत्ती भर भी ताकत नहीं बची थी। यह सोचकर कि अब मैं हर पल मौत की तरफ़ बढ़ रहा हूँ, मैंने हताश होकर परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर! मैं तेरे लिए कुछ भी कर पाने के योग्य नहीं हूँ, लेकिन मैं आज अपनी मौत से शैतान को अपमानित करना चाहता हूँ। बस मैं इतना चाहता हूँ कि तू तेरे हृदय की रक्षा करे ताकि ये तुझसे कभी दूर न हो, ताकि मैं तुझसे कभी दगा न करूँ।” पुलिसकर्मियों ने ज़बर्दस्ती मेरा मुँह खोलकर उसमें गीला कपड़ा ठूँस दिया, उसका दूसरा सिरा एक बिजली के तार से जुड़ा हुआ था। उन्होंने तार के एक सिरे को मेरे कान से जोड़ दिया, और स्विच से लगे हुए दूसरे सिरे को ऑन कर दिया। अचानक ऐसा लगा, जैसे मेरे जिस्म का सारा खून ऊपर की तरफ़ दौड़ रहा है, जैसे मेरा सिर फट जाएगा। इतनी भयानक पीड़ा हुई लगा जैसे मेरी आँखें फटकर बाहर निकल आएँगी, शरीर की एक-एक नस फड़क रही थी, जैसे अभी टूट जाएँगी। मुझे इस तरह यातना झेलते देख, दुष्ट पुलिसकर्मियों का गिरोह अट्टहास करने लगा। थोड़ी देर बाद, मैं बेहोश हो गया। लेकिन तुरंत ही, ठंडे पानी से भरी बाल्टी मेरे ऊपर उलटकर मुझे जगा दिया गया। होश में आने पर देखा, कपड़ा अभी भी मेरे मुँह में ही ठुँसा हुआ था। एक पुलिसकर्मी नीचता से हँसते हुए पूछा, “कैसा स्वाद है? अगर कुछ कहना हो, तो सिर्फ़ गर्दन हिला देना।” तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया: “जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता” (“वचन देह में प्रकट होता है” में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के “अध्याय 36”)। परमेश्वर के वचनों ने शैतान के आगे झुकने के बजाय मेरे गवाही देने के संकल्प को मज़बूती दी। मैंने सोचा, “जो करना है करो। आख़िर एक ही तो जीवन है; ज़्यादा से ज़्यादा, मैं मर जाऊँगा, लेकिन भूल जाओ कि तुम मुझसे एक भी शब्द उगलवा पाओगे!” मैंने पुलिसकर्मी को कोई जवाब नहीं दिया; उसकी ओर देखने के बजाय, मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरी इस हरकत से वह दुष्ट पुलिसकर्मी उखड़ गया, उसने मुझे बिजली का एक और झटका दिया, अब की बार झटका और भी ज़्यादा तेज़ था। मन ही मन मैं पुकार उठा, “हे परमेश्वर! मुझे बचा ले! अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता!” तभी, प्रभु यीशु के सूली पर चढ़ने की एक साफ़ तस्वीर मेरी आँखों के सामने छा गई: ख़ूँख़ार सैनिक प्रभु यीशु की हथेली में कील ठोक रहे हैं, जो चमड़ी और हड्डी को बेध रही है। प्रभु यीशु का उत्पीड़न देखकर मेरे दिल में असीम दर्द उठा, और मैं फूट-फूटकर रो पड़ा। मैंने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर! तू पवित्र है; तू पापरहित है। फिर भी, तूने इंसान के उद्धार के लिए, अपने आपको आतातायियों के हवाले कर दिया, उन्हें तुझे सूली पर चढ़ाने दिया, तेरे खून का आख़िरी कतरा निचोड़ने दिया जिससे हमें पापों से छुटकारा मिल सके। हे परमेश्वर! मैं बेहद भ्रष्ट इंसान हूँ, नष्ट कर दिए जाने योग्य हूँ। मैंने तेरे उद्धार को स्वीकार कर लिया है, मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने तेरे कार्य का अनुभव किया है, इसलिए मैं अपने आपको तुझे अर्पित करना चाहता हूँ। हे परमेश्वर, मुझे इस बात में कोई शक नहीं है कि तू मेरे संग खड़ा है, इस वक्त मेरी पीड़ाओं में तू मेरे साथ है। तूने हमेशा मुझे प्रेम किया है, मुझे ऊर्जा दी है। मैं तेरी संतुष्टि के लिए तुझे अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहता हूँ, ताकि मेरे बदले तुझे दुख न उठाने पड़ें या मेरी चिंता न करनी पड़े।” तभी उन दोनों दुष्ट पुलिसकर्मियों ने मुझे बिजली के झटके देने बंद कर दिए। यह देखकर कि परमेश्वर मेरी कमज़ोरी में मेरे साथ सहानुभूति दिखा रहा है, मेरा दिल उसके प्रति कृतज्ञता से भर उठा! उसके बाद, इसके बावजूद कि पुलिसकर्मियों ने मुझे यातनाएँ देना जारी रखा, अब मुझे दर्द का एहसास नहीं हो रहा था। अब मैं जान गया था कि परमेश्वर मेरी रक्षा कर रहा है, और उसने मेरे कष्टों को अपने ऊपर ले लिया है, मैं परमेश्वर के प्रेम से अभिभूत हो गया, लगातार मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। बाद में, एक पुलिसकर्मी आया, उसने मेरी ओर एक नज़र डाली, और उन दोनों दुष्ट पुलिसकर्मियों से बोला, “बस बहुत हुआ; तुमने मार-मार कर इसका भुर्ता बना दिया, लेकिन यह ज़बान नहीं खोल रहा है। यकीनन यह कुछ नहीं जानता।” तब जाकर उन्होंने मेरा उत्पीड़न बंद किया। मुझे पता था कि यह सब परमेश्वर का अद्भुत आयोजन और व्यवस्थाएँ हैं; परमेश्वर ने दुष्टात्माओं के इस गिरोह को मुझे जान से मारने की इजाज़त नहीं दी है, और उसी ने किसी को आकर यह सब रोकने के लिए कहा। मैंने सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रेम की सराहना की।

पराजित, दुष्ट पुलिसकर्मियों ने फिर मुझसे कोई पूछताछ नहीं की, आधी रात के करीब, वे मुझे नज़रबंदी गृह ले गए। एक सुधार अधिकारी मुझे एक कोठरी में ले गया जिसमें तीस से ज़्यादा अधराधी थे, जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, मुझे उसकी शातिर हँसी सुनाई दी, वह बंदी प्रमुख को कोई निर्देश दे रहा था, “थोड़े वक्त के लिए ज़रा शांत रहना, ज़्यादा शोर-शराबा नहीं।” बंदी प्रमुख ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, और खीसें निपोरते हुए, सुधार अधिकारी से बोला, “फ़िक्र मत कीजिये!” इससे पहले कि मैं कोई प्रतिक्रिया देता, उस बंदी प्रमुख के हाव-भाव गहरा गए और उसने दूसरों से धीमे मगर खतरनाक लहजे में कहा, “हमेशा की तरह, पट्ठो। इसकी ख़बर लो!” सारे कैदी उठ खड़े हुए और मुझे ऐसे घूर कर देखने लगे जैसे शेर अपने शिकार को देखता है, मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर-सी दौड़ गई। फिर जैसे ही उसने अपना हाथ हवा में लहराया और सारे कैदी मुझ पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े। उन्होंने मुझे दबोच लिया, मेरे सारे कपड़े फाड़ दिए, मुझे लात-घूँसों और अपने जूतों के सपाट तलों से बुरी तरह से पीटने लगे। उन्होंने मुझे इतना मारा कि मैं मूर्च्छित हो गया। दूसरे दिन सुबह छ्ह बजे मुझे होश आया। मैंने देखा कि मुझे एक कोने में ठूँस दिया गया है, मेरा पूरा जिस्म इतनी बुरी तरह से सूज गया कि मैं कपड़े पहनने की स्थिति में भी नहीं था। मैं छह दिनों तक उसी स्थिति में एक तख्त पर सीधा पड़ा रहा, मेरे पूरे शरीर पर बुरी तरह खरोंच आ गए थे, जगह-जगह नील पड़ गई थी। इसके अलावा, उन दुष्ट पुलिसकर्मियों ने मुझे इस हद तक बिजली के झटके दिए कि मेरा मुँह अंदर से जल-भुन गया था, माँस-तंतु गल गए थे। मुँह में इतनी भयानक पीड़ा हो रही थी कि मैं एक निवाला तक नहीं निगल पा रहा था। इस डर से कि मैं कहीं मर न जाऊँ, मुझे सब्ज़ियों का सूप पिलाने के लिए सुधार अधिकारियों ने कुछ कैदियों को बारी-बारी से मेरे पास भेजा।

जब मेरे ज़ख्म कुछ ठीक होने लगे, तो दुष्ट पुलिसकर्मियों ने मेरे साथ फिर से गुंदागर्दी और बदमाशी करने के लिए उन कैदियों को उकसाया। सुबह-सुबह, उन्होंने मुझसे जेल के नियम बुलवाए; अगर मैं ठीक से न बोलता, तो मुझे पीटते। वो लोग मुझसे साफ़—सफ़ाई करवाते, कैदियों कपड़े धुलवाते। अगर मुझसे ज़रा-सी भी गलती हो जाती, तो लात-घूँसे बरसाते। चूँकि वो जानते थे कि मैं परमेश्वर में आस्था रखता हूँ, इसलिए जानबूझकर मुझे चिढ़ाने के लिए मेरे सामने ईश-निंदा करते, कुछ इस तरह की बातें कहकर मुझे अपमानित करते, “परमेश्वर में आस्था रखने वालों की जब पिटाई होती है, तो उन्हें दर्द नहीं होता है ना? तू बिना थके काम कर सकता है ना? तू इस बात की परवाह नहीं करता न कि तू कितनी तकलीफ़ उठा रहा है, है कि नहीं?” मुझे यातना देने के लिए वो लोग मुझे टॉयलेट को अंदर तक हाथ से साफ़ करने के लिए कहते, यह काम इतना घिनौना था कि मुझे मतली आने लगती; यहाँ तक कि वे लोग मुझसे फ़र्श की टाइलों को मेरे टूथब्रश से साफ़ करवाते, और जानबूझकर मेरी स्टीम ब्रेड रोल को टॉयलेट में फेंक देते। जब सुधार अधिकारी साफ़-सफ़ाई का मुआयना करने आता, तो वो अपने जूते उतारकर सफ़ेद जुराबों में चारों ओर चक्कर लगाता। अगर उसे कहीं धूल-मिट्टी नज़र आ जाती, तो मुझे मार पड़ती। … दुष्ट पुलिसकर्मियों और कैदियों के ज़ुल्म और अत्याचार सह-सहकर मैं एकदम कमज़ोर और बहुत अवसादग्रस्त हो गया। मुझे लगने लगा कि इस तरह से जीने से तो मौत अच्छी। जब मैं कमज़ोरी और दुख में डूबा हुआ था, तो परमेश्वर के वचनों ने मुझे ज़िंदा रहने के लिए आस्था और प्रेरणा प्रदान की। मुझे याद आया उसने कहा था, “संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: ‘क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’ अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?”)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे सिखाया कि आस्था के कारण अपमान और उत्पीड़न को सहन करना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर ने मुझे विशेष रूप से उन्नत किया है—यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी! लेकिन मैं डरपोक और कायर था; चूँकि मुझे थोड़ा-बहुत कष्ट और अपमान सहन करना पड़ा, इसलिए परमेश्वर से मेरा विश्वास उठ गया, और मैं उत्पीड़न के ज़रिये परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान की ख़ातिर, गवाही देने को तैयार नहीं हुआ। मुझे बचाने के लिए परमेश्वर को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, तो मैं उसका प्रतिदान इस तरह कैसे दे सकता हूँ? मैं इस तरह से अपने ज़मीर के ख़िलाफ़ जाकर ऐसी नकारात्मक प्रतिक्रिया कैसे दे सकता हूँ? यह सही नहीं है! मैं एक अस्थिर मन वाला कायर इंसान बिल्कुल नहीं बनूँगा; मैं परमेश्वर के नाम को कलंकित नहीं कर सकता! उसके बाद, मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की: “हे परमेश्वर, मुझे प्रबुद्ध करने और दुखों का अर्थ समझाने के लिये मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। तेरे सम्मान के लिए, मैं हर तरह के दुख झेलने को तैयार हूँ; मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए, आजीवन जेल मैं रहने को तैयार हूँ। मैं बस इतना चाहता हूँ कि तू मेरे साथ रहे, मुझे प्रबुद्ध करे, मुझे राह दिखाए, और जितने समय तक शैतान मुझे यातना देता है, मैं तेरी शानदार गवाही देता रहूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मेरे अंदर एक नई जान आ गई, मुझमें मुश्किल हालात का सामना करने का हौसला आ गया।

एक हफ़्ते के बाद, मुझसे पूछताछ करने के लिए दुष्ट पुलिसकर्मी वापस आए, उनका कहना था कि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है, मैं उनसे सहयोग कर सकता हूँ, और सहयोग न करने पर धमकी दी कि आने वाले दिनों में मेरे लिये हालात और भी मुश्किल हो जाएँगे। पाशविक यातना के कई दौर से गुज़रने के बाद, मैं उनके शैतानी सार को देख चुका था, मैं उनसे बेइंतिहा घृणा करने लगा था। इसलिए, वे मुझे जैसे चाहें लालच दें, मुझे डराएँ-धमकाएँ, लेकिन मेरी आस्था डिगने वाली नहीं थी। बाद में, वे लोग मुझसे दो हफ़्ते में एक बार पूछताछ करने लगे। आख़िरकार, जब उन्हें लगा कि मुझसे उन्हें कोई जानकारी नहीं मिलने वाली, तो उन्होंने मुझे “सार्वजनिक जीवन में बाधा डालने” और “गैर-कानूनी सभाओं में लिप्त रहने” का इल्ज़ाम लगाकर दो साल के लिए सश्रम पुनर्शिक्षा की सज़ा सुना दी।

24 फरवरी, 2006 को, मुझे लेबर कैम्प में भेज दिया गया। परमेश्वर में आस्था रखने के कारण, मुझे “राजनैतिक अपराधी” घोषित किया गया, जेल सुरक्षाकर्मियों ने मुझे श्रमिक सुधार के तहत सबसे मुश्किल, सबसे अधिक थका देने वाले, और सबसे ख़तरनाक भट्ठे का काम दिया। मेरा काम था भट्ठे से पकी हूई ईंटों को निकालना, जिसके अंदर कम से कम तीन सौ डिग्री सेल्सियस (572 डिग्री फार्नहाइट) तापमान होता था। सुबह के वक्त, तपामान सबसे कम होता था, लेकिन वो भी सौ डिग्री (212 डिग्री फार्नहाइट) से ऊपर होता था। इतने ऊंचे तापमान में काम करने के बावजूद, सुरक्षाकर्मी हमें ताप-रोधी कार्य-वस्त्र नहीं देते थे। हमारे सुरक्षा हेल्मेट भट्ठे के अंदर दो मिनट में ही पिघल जाते थे, अपने आपको झुलसने से बचाने के लिए, हमें जल्दी से जल्दी दौड़कर अंदर जाने और बाहर आने तक साँस रोककर रखनी पड़ती थी। क्योंकि हमारे पास ताप-रोधी जूते नहीं थे, जब हम अंदर जाते थे, तो हमें ज़मीन पर खड़े रहने के लिए अपने पैर को बदलते रहना पड़ता था; अगर हम सतर्क न रहें, तो छाले पड़ने का डर रहता था। नए बंदी इसके अभ्यस्त नहीं थे; वे लोग पाँच सेकेंड भी अंदर नहीं रह पाते थे, उन्हें तुरंत दौड़कर वापस आना पड़ता था। इसलिए हमारे दल के कप्तान ने ग्रुप लीडर बना दिए थे, हर एक को रेत से भरा हुआ एक पीवीसी पाइप दे दिया गया था; अगर कोई भाग कर आता था, तो उसी पाइप से उसकी पिटाई होती थी। हालाँकि उन पाइपों से हड्डियाँ तो नहीं टूटती थीं, लेकिन चमड़ी उधड़ जाती थी। कैदी उसे “चमड़ी उधेड़” कहते थे। जब हम लोग भट्ठी में घुसते थे, तो हमारी साँस लेने की हिम्मत नहीं होती थी; साँस लेने का मतलब था नथुनों में आग भरना। कुछ ही ईंटें हटाने के बाद, हमें ठेले को बाहर निकालना पड़ता था, और अगर टायर फट जाता, तो हमें न सिर्फ़ उसके लिए सज़ा मिलती थी, बल्कि हमारी कैद की अवधि को बढ़ा दिया जाता था, उसे “उत्पादन उपकरण का नुक्सान और सुधार-प्रतिरोध” के अपराध तौर पर माना जाता था। बतौर बंदी, हमें रोज़ाना बड़ी-बड़ी ईंटों से भरे 115 और छोटी ईंटों से भरे 95 ठेले ढोने पड़ते थे। इतनी भयानक गर्मी में यह काम पूरा करना नामुमकिन था, लेकिन गार्ड हमसे यह कभी नहीं पूछते थे कि यह काम तुमने पूरा क्यों नहीं किया; वो सिर्फ़ इतना पूछते थे कि तुमने यह श्रम-विरोधी रवैया क्यों अपना रखा है। चूँकि गर्मी में काम करने से मुझे पसीना बहुत आता था, इसलिए मेरे अंदर पोटैशियम की ज़बर्दस्त कमी हो गई। मैं कई बार बेहोश होकर गिर पड़ा, ऐसा होने पर वे लोग मुझे ठंडा होने के लिए कुछ मिनटों के लिए भट्ठे की दीवार पर पटक देते। जब मुझे होश आ जाता, तो वे मुझे नमक का पानी पिलाकर, ज़बर्दस्ती फिर से काम पर लगा देते। अपनी क्षमताओं के चरम को जानने का, या असह्य मुश्किलें क्या होती हैं, और ज़िंदा रहने के बजाय मरने की इच्छा करना कैसा लगता है, ये सब जानने का यह मेरा पहला अनुभव था। यहाँ इस बात की परवाह किसी को नहीं थी कि आप मरते हैं या जीते हैं; टीम कप्तान को सिर्फ़ इस बात की परवाह थी कि आपके ग्रुप ने अपना काम पूरा किया है या नहीं। अगर काम पूरा कर लिया, तो वो कुछ नहीं कहेगा, अगर पूरा नहीं किया, तो भी वो कुछ नहीं कहेगा, सिर्फ़ भट्ठे के दरवाज़े की तरफ़ इशारा करेगा अंदर चला जाएगा। उसके बाद, ग्रुप लीडर ऐसे किसी भी बंदी को जिसने काम पूरा नहीं किया, बुलाएगा और उसे भट्ठे क्षेत्र में खड़ा होने के लिए कहेगा और उसकी पिटाई की जाएगी; जब वो ज़मीन पर गिर जाएगा, तो तपती ज़मीन से वो इतनी बुरी तरह से जल जाता कि उसकी सारी चमड़ी पर फफोले पड़ जाते। इसके अलावा, उसे हर रोज़ ईंटों से भरे अतिरिक्त बीस ठेले ढोने पड़ते थे। वह तब तक नहीं रुक सकता था, जब तक कि वो दया की भीख के लिए चिल्लाने न लगता। इस तरह के हालात में, मैं बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था; कुछ ही दिनों के उत्पीड़न से मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने नरक भोग लिया है। मुझे तो दो साल का वक्त एक युग की तरह लंबा लगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इतना लम्बा वक्त कैसे कटेगा, मुझे यही डर सता रहा था कि या तो मेरी मौत उन दुष्ट पुलिसकर्मियों से मार खाते-खाते हो जाएगी, या मैं उस भयंकर गर्मी में झुलस कर मर जाऊँगा। मैं इन संभावनाओं पर जितना सोचता, उतना ही अपने आपको फँसा हुआ महसूस करता; मुझे वाकई लगने लगा कि इस शैतानी जेल को बर्दाश्त करना अब मेरे बूते से बाहर है—इसलिए मैंने मरने का विचार किया। उस दिन के बाद से, मैं “आज़ाद” होने का मौका तलाशने लगा।

आख़िरकर, एक दिन मुझे ऐसा मौका मिल ही गया। ईंटों से भरा एक ट्रक जब बाहर जा रहा था, तो मैं सामने से उसके आगे कूद पड़ा। लेकिन ट्रक के पहिए मुझसे ठीक एक इंच पहले रुक गए; पता चला कि उसी वक्त ट्रक खराब हो गया था। कुछ कैदियों ने मुझे खींच कर हटाया, सुधार अधिकारी ने कहा कि मैंने अनुशासन को नकारा है और मैं अपनी पुरानी आदतें बदलने को तैयार नहीं हूँ। वो मुझे सज़ा देने लगा। उसने बिजली की छड़ी जिसमें से चिंगारियाँ निकल रही थीं, मेरे सीने से सटा दी, इससे इतना भयंकर दर्द हुआ कि मैं ज़मीन पर गिर पड़ा, मेरा शरीर ऐंठने लगा। उसके बाद, उन्होंने मेरे हाथ पीछे की ओर एक टेलीफोन के खंभे से बाँध दिए और बिजली की छड़ी से मुझे बुरी तरह से पीटने लगे। रात के खाने के बाद, पुनर्शिक्षा और मेरी सोच में “सुधार” के लिए मुझे सबके सामने दंडित किया गया। … इस अंतहीन उत्पीड़न और यातना ने मेरे अंदर बेइंतिहा आतंक, मायूसी और बेबसी भर दी। जब मैं इस बात को लेकर माथापच्ची कर रहा था कि आगे ज़िंदगी कैसे चलेगी, तभी मेरे दिमाग में परमेश्वर के वचनों का यह अंश आया: “इसके कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हारा कैसे शुद्धिकरण करता है, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर विश्वास कभी नहीं खोते हो। तुम वह करते हो जो मनुष्य को करना चाहिए। यह वही है जो परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल हर पल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने और उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। यही एक विजेता है। जिन लोगों को परमेश्वर विजेताओं के रूप में संदर्भित करता है ये वे लोग हैं जो अभी भी गवाह बनने, और शैतान के प्रभाव में होने और शैतान की घेराबंदी में होने पर, अर्थात्, जब अंधकार की शक्तियों के भीतर हों, तो अपना आत्मविश्वास और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखने में सक्षम हैं। यदि तुम अभी भी परमेश्वर के लिए पवित्र दिल और अपने वास्तविक प्यार को बनाए रखने में सक्षम हो, तो चाहे कुछ हो जाए, तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और यही वह है जिसे परमेश्वर एक विजेता होने के रूप में संदर्भित करता है” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए”)। जब मैं लगभग सारी उम्मीदें छोड़ चुका था, तभी परमेश्वर के वचनों मे मेरे दिल को रोशनी की एक किरण और गरमाहट दी, यह सच है; आख़िरकार, परमेश्वर ऐसे विजेताओं का समूह बनाना चाहता था जो कठिन से कठिन हालात में भी परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था और भक्ति को कायम रख सकें, उसके वचनों के अनुसार जी सकें, और अंतत: शैतान के आगे परमेश्वर की एक मज़बूत और शानदार गवाही दे सकें। शैतान मुझ पर हर तरह के ज़ुल्म और अत्याचार कर रहा था क्योंकि वो मेरी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना चाहता था, जब मैं असहाय था तो मुझ पर हमला कर रहा था और परमेश्वर से कपट करने के लिए मुझे विवश कर रहा था—लेकिन मैं परमेश्वर के अपमान का प्रतीक नहीं बन सकता था! मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम कितना सच्चा और व्यवहारिक था; अपने सबसे कमज़ोर पलों में, जब मैं मरना चाहता था, तो परमेश्वर मुझे गुप्त रूप से देख रहा था, मेरी रक्षा कर रहा था, मुझे जीवित रख रहा था। मैं भले ही कितना भी कमज़ोर पड़ गया, लेकिन मुझे त्याग देने का उसका ज़रा भी इरादा नहीं था; मेरे लिए उसका प्रेम शुरू से ही अविचल था, वह अब भी मुझे प्रबुद्ध कर रहा था, राह दिखा रहा था, दर्द से छुटकारा पाने में मेरी मदद कर रहा था। मैं किसी भी सूरत में उसे निराश नहीं कर सकता था या उसकी भावनाओं को आहत नहीं कर सकता था। मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका आभारी था; इसने फिर से मुझे शैतान की चालबाज़ियों से अवगत कराया था जिससे कि मैं मौत के मुँह से वापस आ पाया। मैं बरबस यह भजन गा उठा: “मैं अपना प्यार और अपनी निष्ठा परमेश्वर को अर्पित कर दूँगा और परमेश्वर को महिमान्वित करने के अपने लक्ष्य को पूरा करूँगा। मैं परमेश्वर की गवाही में डटे रहने, और शैतान के आगे कभी हार न मानने के लिये दृढ़निश्चयी हूँ। मेरा सिर फूट सकता है, मेरा लहू बह सकता है, मगर परमेश्वर-जनों का जोश कभी ख़त्म नहीं हो सकता। परमेश्वर के उपदेश दिल में बसते हैं, मैं दुष्ट शैतान को अपमानित करने का निश्चय करता हूँ। पीड़ा और कठिनाइयाँ परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं, मैं उसके प्रति वफादार बने रहने के लिए अपमान सह लूँगा। मैं फिर कभी परमेश्वर के आँसू बहाने या चिंता करने का कारण नहीं बनूँगा” (“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” में “तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए”)।

एक बार जब मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए हर तरह के कष्टों को स्वीकार कर उन्हें सहने के लिए तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने मेरे बच निकलने लिए राह निकाल दी: चूँकि टीम का कप्तान अनपढ़ था, इसलिए वो मुझसे अपनी रिपोर्टें भरवाता था, और तब से मुझे ईंटें ढोने का काम ज़्यादा नहीं करना पड़ता था। एक बार, कलीसिया से एक बुज़ुर्ग बहन मुझसे मिलने आई। उसने मेरा हाथ पकड़कर आँसुओं भरी आँखों से कहा, “बेटा, तुमने बहुत दुख झेले हैं। सारे भाई-बहन तुम्हें लेकर बड़े चिंतित हैं, हम सब रोज़ तुम्हारे लिए दुआएँ करते हैं। बेटा, मज़बूती से डटे रहना, शैतान के आगे झुकना मत। अडिग रहकर परमेश्वर के लिए गवाही देते रहना। हम सब लोग तुम्हारे घर आने का इंतज़ार कर रहे हैं।” इस बेरहम, क्रूर इंसानी नरक में, परमेश्वर के दिलासा देने वाले वचनों के अलावा, मैंने किसी से स्नेह का एक शब्द नहीं सुना था। अपने भाई-बहनों के इन करुणामय शब्दों को सुनकर, जिन्हें बहुत पहले मैं अक्सर सुना करता था, मेरे दिल को सुकून और हौसला मिला। उसके बाद लम्बे समय तक, मैं परमेश्वर के प्रेम से उत्साहित रहा; मुझे काफ़ी राहत मिली, काम करने के दौरान मेरे अंदर जोश आ गया। जितनी अवधि तक मैं जेल में रहा, उसमें यह समय सबसे तेज़ी से गुज़रा। ख़ासतौर से यह बात आख़िर के चार महीनों पर लागू होती है। जिन कैदियों की सज़ा को कम कर दिया गया है, उनके नामों की मासिक घोषित सूची में मेरा नाम हमेशा पहला होता था। गुज़रे हुए महीनों में, इन सूचियों में कैदी प्रमुखों और टीम लीडरों के ही नाम थे; जिन कैदियों के पास पैसा या ताकत नहीं थी, उनके नाम उस सूची में नहीं थे। मेरे जैसे ईसाई के लिए, जिन्हें सीसीपी ने “राजनैतिक अपराधी” करार दिया था, उनके साथ इस ढंग से पेश आया जाए, इसकी संभावना कम ही होती थी। यही वजह थी, कि दूसरे कैदी हमेशा मुझे घेरकर पूछते, “तुमने यह कैसे किया?” जब भी ऐसा होता, मैं तहेदिल से परमेश्वर को धन्यवाद देता, क्योंकि मैं जानता था कि यह उसी की महान दया का परिणाम है; परमेश्वर के प्रेम ने ही मुझे शक्ति दी थी।

7 अक्टूबर, 2009 को, मुझे जल्दी पैरोल पर छोड़ दिया गया। उसके तुरंत बाद, मैं कलीसिया लौटकर आया, और मैंने कलीसियाई जीवन का कामकाज संभाल लिया, मैं उन लोगों के साथ जुड़ गया जो सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करते थे। इस बार मैं जिस यातना से गुज़रा था, उससे मैं और भी दृढ़निश्चयी और परिपक्व हो गया था, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के अवसरों को और भी अधिक संजोया। चूँकि मैंने सीसीपी का परमेश्वर-विरोधी चेहरा और लोगों के प्रति उसकी क्रूरता को देख लिया था, इसलिये मैं इस बात को और भी अच्छी तरह से समझ गया था कि परमेश्वर का उद्धार कितना अनमोल है। अगर परमेश्वर जेल में न आता, इंसानों के उद्धार का कार्य करने के लिए उसने देहधारण न किया होता, तो वो तमाम लोग जो शैतान के कब्ज़े में हैं, उन्हें शैतान तबाह कर चुका होता, निगल गया होता। तभी से, अपने कर्तव्यों के निर्वाह में, मेरा रवैया पहले से पूरी तरह से बदल गया; मुझे लगा कि सुसमाचार का प्रचार-प्रसार और लोगों की आत्माओं को बचाने का काम सबसे महत्वपूर्ण है, और मैं बाकी के जीवन में अपनी पूरी निष्ठा, पूरी ऊर्जा अधिक से अधिक लोगों को परमेश्वर की शरण में लाने में लगाना चाहता था। मैं यह भी चाहता था कि लोग इस नास्तिक सरकार के भ्रम और कपट के जाल को समझें और जागरुक हों, लोग परमेश्वर के जीवन-पोषण को स्वीकारें, और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करें। जब मैं उन दो सालों की जेल की लम्बी अवधि को याद करता हूँ, तो समझ में आता है कि शैतान ने मुझे परमेश्वर को धोखा देने की ख़ातिर विवश करने के लिये व्यर्थ ही अपनी दमनकारी सत्ता का दुरुपयोग किया। लेकिन परमेश्वर ने मेरी आस्था, मेरी निष्ठा को बढ़ाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, परमेश्वर लिए मेरे प्रेम को शुद्ध करने, परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता का एहसास कराने और इस बात की गहरी समझ हासिल करने के लिए कि परमेश्वर ही इंसान का उद्धार है, वही प्रेम है, उसने इन निकृष्ट हालात का इस्तेमाल किया! मेरा दिल परमेश्वर की असीम आराधना और स्तुति करता है!

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