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मौत के कगार से जीवन में वापसी

यांग मेई, चीन

2007 में मैं अचानक गुर्दे फेल होने की लंबी बीमारी से ग्रस्त हो गई। जब मेरी ईसाई माँ और भाभी तथा कुछ कैथोलिक दोस्तों ने यह खबर सुनी, तो वे सभी मुझे सुसमाचार सुनाने आ गए। उन्होंने मुझसे कहा कि प्रभु की ओर मुड़ने पर मेरी बीमारी ठीक हो जाएगी। पर मुझे परमेश्वर पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं था। मैं सोचती थी कि बीमारी केवल वैज्ञानिक इलाज से ही ठीक हो सकती है और जो बीमारी विज्ञान से ठीक न हो सके, वह लाइलाज है। आखिर, क्या विज्ञान की शक्ति से भी बड़ी कोई शक्ति धरती पर है? परमेश्वर में विश्वास एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक बैसाखी मात्र है, और मैं एक प्रतिष्ठित राजकीय विद्यालय की अध्यापिका हूँ, एक सुशिक्षित और सुसंस्कृत इंसान, इसलिए किसी भी तरह मैं परमेश्वर में विश्वास करना शुरू नहीं कर सकती थी। इसलिए मैंने उन्हें मना कर दिया और डाक्टरी इलाज करवाने लगी। कुछ ही वर्षों के भीतर मैं अपने गृह-जिले और पूरे प्रांत के लगभग हर बड़े अस्पताल में हो आई, लेकिन मेरी हालत फिर भी नहीं सुधरी। वास्तव में वह पहले से ज्यादा बिगड़ती गई, लेकिन मैं इस स्थिति को देखने के अपने तरीके पर कायम रही और इस बात पर अड़ी रही कि विज्ञान सब-कुछ बदल सकता है, और बीमारी के इलाज की प्रक्रिया में समय लगता है।

2010 में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की एक बहन मुझे परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने के लिए आई। उसने कहा कि प्रभु यीशु नया काम करने के लिए संसार में लौट आया है, जिसमें लोगों का न्याय करने और उन्हें निर्मल बनाने के लिए सत्य प्रदान करना शामिल है। यह मानव-जाति को पूरी तरह से बचाने के लिए नियत किए गए परमेश्वर के कार्य का एक चरण है, और मानव-जाति के लिए परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का आखिरी मौका भी है। मैं अभी भी यह सब स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डाक्टरी इलाज के दौरान झेली गई तमाम असफलताओं और हताशा के कारण मेरा रवैया पहले जितना कठोर नहीं रहा था और मैं उस बहन से परमेश्वर के वचनों की पुस्तक लेने के लिए राजी हो गई। पर उस समय मैं यह बिलकुल नहीं मानती थी कि उस पुस्तक के वचन परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य हैं। मैं अभी भी अपनी इस बात पर कायम थी कि केवल विज्ञान ही मेरी किस्मत बदल सकता है, और इस तरह मैं यह विश्वास करती रही कि केवल दवाएँ ही मेरी हालत सुधार सकती हैं। अंतत: मैं रोजाना भोजन से भी ज्यादा दवाएँ खाने लगी, पर फिर भी मेरी हालत में सुधार के मामूली संकेत भी नहीं दिखे। वह बहन इतनी बार मेरे घर आई कि मैं उसकी संख्या ही भूल गई, फिर भी मैंने परमेश्वर पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। ऐसा करीब एक साल तक चला।

फिर एक दिन अचानक मेरी दोनों आँखों की दृष्टि धुँधली हो गई और मेरे दोनों पैर इतने सुन्न हो गए कि मैं चल भी नहीं सकती थी। डॉक्टरों ने कहा कि मेरे ये लक्षण कई वर्षों से बड़ी मात्रा में दवा लेने से दवा की विषाक्तता के परिणाम हैं। पहले मैंने एक हफ्ता जिला अस्पताल में बिताया और फिर बीजिंग में एक सैन्य अस्पताल में स्थानांतरित कर दी गई, जहाँ मेरा एक महीने तक इलाज चला। फिर मुझे टीसीएम से इलाज करवाने के लिए बीजिंग के एक प्रसिद्ध परंपरागत चीनी चिकित्सा अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। पर इन 2 महीनों के इलाज से मेरी स्थिति में जरा भी सुधार नहीं हुआ। मेरे प्राथमिक चिकित्सक ने अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के सेवानिवृत्त पूर्व प्रमुख से आकर मुझे देखने के लिए भी कहा, पर मेरी हालत में जरा भी सुधार नहीं हुआ। फिर मैंने अपनी भावी पुत्रवधू को कहते सुना कि युन्नान में एक डॉक्टर है, जो मेरी जैसी कठिन और जटिल स्थितियों का इलाज करने के लिए प्रसिद्ध है। काफी ऊहापोह के बाद मुझे व्हीलचेयर पर वहाँ ले जाया गया। लेकिन महीने भर के इलाज के बाद भी न केवल मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि जो दवाएँ मैं अपनी आँखों और पैरों के लिए ले रही थी, उन्होंने असल में मेरी गुर्दे की बीमारी और बढ़ा दी। असहाय अनुभव करते हुए और बड़ी बेचैनी की हालत में मैंने घर जाने का फैसला किया। उसके बाद मैंने अपने गुर्दे बचाने के लिए अपनी आँखों और पैरों का समस्त इलाज और दवाएँ लेनी छोड़ दीं।

उस अवधि के दौरान मुझे लगा कि मेरे लिए बिल्कुल भी उम्मीद नहीं बची है। मैं अक्सर इस बारे में सोचती कि किस तरह मैंने विज्ञान में पूरा भरोसा रखा, पर विज्ञान मेरी बीमारी के इलाज में पूरी तरह से निष्फल साबित हुआ। विज्ञान द्वारा मेरी बीमारी ठीक हो सकने की हर आशा टूटने के बाद मैं बहुत दुखी हुई और पूरी तरह से टूट गई। मुझे नहीं पता था कि मैं जीवन में कैसे आगे बढ़ूँगी। दर्द और पीड़ा के कोहरे में अक्सर मेरे मन में तरह-तरह विचार आते थे: "मुझे इतनी ज्यादा बीमारियों का सामना क्यों करना पड़ा और दवाओं से उनका इलाज क्यों नहीं हो सकता? मैंने विज्ञान में विश्वास किया और उस पर भरोसा रखकर सर्वोत्तम इलाज करवाने की भरपूर कोशिश की, फिर भी कुछ भी काम नहीं आया। वास्तव में, मेरी हालत और खराब हो गई। क्या विज्ञान वास्तव में मुझे बचा नहीं सकता? क्या इस दुनिया में वाकई कोई परमेश्वर है? क्या हर आदमी का भाग्य वाकई परमेश्वर के हाथों में है?" इन मुद्दों के बारे में मैंने कितना भी क्यों न सोचा, मुझे कोई जवाब नहीं मिला। उस दौरान मैं रोजाना बहुत दर्द और पीड़ा में जीती थी, और हर बार जब मैं अपने बेकार और लाचार होने के बारे में सोचती, तो गुपचुप आँसुओं में डूब जाती। मुझे लगा कि मैं अपने परिवार को बहुत ज्यादा परेशान कर रही हूँ और मैं अब उन पर और ज्यादा बोझ नहीं बनना चाहती थी। अनेक मौकों पर मैंने अपना जीवन समाप्त कर लेना चाहा, पर मैं मृत्यु से डरती थी। इसलिए मैंने हर दिन को जैसा वह आया, वैसा ही लिया और मौत का इंतजार करने लगी…

मौत के कगार से जीवन में वापसी

एक दिन मेरे पति ने वह किताब खोलकर देखी, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बहन मेरे लिए छोड़ गई थी। उसमें उन्होंने निम्नलिखित शीर्षक देखा, "क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है," जिसने तुरंत उनका ध्यान खींच लिया। इसलिए उन्होंने मुझे उसका निम्नलिखित अंश पढ़कर सुनाया: "परमेश्वर का कार्य ऐसा है जिसे तुम समझ नहीं कर सकते। जब तुम यह भी नहीं जान सकते कि क्या तुम्हारा निर्णय सही है, और न ही यह जान सकते हो कि परमेश्वर का कार्य सफल होगा या नहीं, तब तुम किस्मत क्यों नहीं आजमाते, और देखते कि यह साधारण मनुष्य तुम्हारे बड़े काम का है या नहीं और परमेश्वर ने बहुत महान काम किया है या नहीं" (वचन देह में प्रकट होता है)। यह छोटा अंश मेरे दिल को झटका देने जैसा था! खासकर यह वाक्यांश कि "तब तुम किस्मत क्यों नहीं आजमाते," मेरे दिमाग में बार-बार आता रहा। यह मेरे सूने दिल में चमकने वाले प्रकाश की एक किरण की तरह था, और ऐसा लगा कि मैं जीवित रहने की आशा की एक झलक देख सकती हूँ। मैंने तुरंत अपने पति से परमेश्वर के वचनों के 2 अन्य अंश पढ़ने के लिए कहा, जिनमें परमेश्वर द्वारा लोगों का न्याय करने, उन्हें निर्मल बनाने और उनके जीवन का स्वभाव बदलने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल करने से संबंधित सत्य शामिल थे। यह सब मेरे लिए पूरी तरह से नया था, और भले ही मुझे वास्तव में पूरी तरह से समझ नहीं आया कि क्या कहा जा रहा है, फिर भी मैं अपने दिल में महसूस कर सकती थी कि ये शिक्षाएँ प्रभु यीशु के उस सुसमाचार से अलग थीं, जो मैंने अन्य लोगों से सुना था। उन्होंने ज्यादातर मुझे यह बताया था कि अनुग्रह कैसे प्राप्त किया जाए, और मुझे सिर्फ परमेश्वर में विश्वास करने की जरूरत है और मेरी बीमारी ठीक हो जाएगी, जिस पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहीं ज्यादा व्यावहारिक लग रहे थे, और जितना ज्यादा मैंने उन्हें सुना, उतनी ज्यादा मेरी इच्छा उन्हें सुनने की हुई।

उसके बाद मैंने अपने पति से रोजाना परमेश्वर के कुछ वचन सुने। पुस्तक में कहा गया था कि धार्मिक लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन परमेश्वर को जानते नहीं, यहाँ तक कि उसका विरोध भी करते हैं, वे अक्सर दिन में पाप करते हैं और रात में उन्हें स्वीकार करते हैं। यह मेरे लिए कहीं अधिक विश्वसनीय था, क्योंकि मेरी माँ और दो भाभियाँ सभी ईसाई थीं और उनके जीने का तरीका ठीक वैसा ही था, जैसा परमेश्वर के वचनों में बताया गया था। वे वाकई पाप करतीं और फिर उन्हें स्वीकार करतीं और फिर से पाप करतीं। ठीक तभी मेरे भीतर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न हुई: क्या यह वाकई परमेश्वर की आवाज है? यदि यह परमेश्वर नहीं है, तो लेखक कैसे धार्मिक दुनिया को इतनी अच्छी तरह समझता है? अविश्वासियों को समझ में नहीं आता, महान और प्रसिद्ध लोगों को उसका सुराग नहीं, यहाँ तक कि खुद धार्मिक लोग भी नहीं मानते कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, बल्कि वे उसका विरोध भी करते हैं। जितना अधिक मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही अधिक मुझे लगा कि पुस्तक में दिए गए वचन लोगों द्वारा व्यक्त की जा सकने वाली बातें नहीं हैं, और वे शायद संसार में देहधारी परमेश्वर के कथन हैं।

कुछ ही दिनों के बाद उस बहन ने, जिसने मुझे पहले सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया था, सुना कि मैं अस्पताल में रहने के बाद घर पर वापस आ गई हूँ, तो वह एक दूसरी बहन के साथ फिर से मुझे सुसमाचार सुनाने के लिए मेरे घर पर आई। इस बार मैं अपने विवेक की आवाज से अवगत थी, जो मुझसे कह रहा था: "मैं लाचार हो गई हूँ, लेकिन बहनों ने मुझे घृणापूर्वक छोड़ा नहीं है, यहाँ तक कि वे बार-बार मुझे सुसमाचार सुनाने आई हैं। यह ऐसी बात है, जिसे सामान्य लोग नहीं कर पाएँगे। कोई और होता, तो मुझे बहुत पहले ही भूल गया होता।" मेरे मन में यह बात बहुत साफ थी कि इस तरह का प्यार परमेश्वर से आया होगा, क्योंकि संसार में यह कभी नहीं मिल सकता। जैसा कि कहा जाता है, "मित्र वही जो मुसीबत में काम आए," और उस दिन मैंने इसे गहराई से अनुभव किया। मेरे परिवार का मेरे साथ रहना ऐसी बात थी, जिसे वे टाल नहीं सकते थे, पर इन लोगों का, जिनसे मेरा कोई संबंध नहीं था और जिनके कोई गूढ़ मकसद या शर्तें नहीं थीं, एक साल से अधिक समय से नियमित रूप से मुझे सुसमाचार सुनाने आना और मेरे जैसी लाचार के लिए तकलीफ उठाना दिखाता था कि उनका विश्वास, प्यार और धैर्य वास्तव में कितना अद्भुत है! मैं सचमुच परमेश्वर के प्यार से द्रवित हो गई और तब से मेरे पास परमेश्वर के सुसमाचार को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं रहा। परिणामस्वरूप, मैं और मेरे पति दोनों ने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया।

जून 2011 में, मेरे पति और मैंने औपचारिक रूप से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में अपना कलीसियाई जीवन शुरू कर दिया। चूँकि मेरी दृष्टि इतनी अच्छी नहीं थी कि मैं खुद पढ़ पाती, इसलिए मेरे पति आम तौर पर मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाते, और कलीसिया की बैठकों के दौरान भाई-बहन भी मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाया करते। जब कभी मैं अकेली होती, तो मैं स्तुति-गीत भी सुनती। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों में अपनी बीमारी और पीड़ा का कारण पाया: "मनुष्य के पूरे जीवन में मौजूद जन्म, मृत्यु, बीमारी और वृद्धावस्था की पीड़ा कहाँ से आई? सबसे पहले किस वजह से लोगों को ये चीज़े हुईं? क्या जब मनुष्य को पहली बार सृजित किया गया था तब उसमें ये चीजें थीं? वे नहीं थीं, है ना? तो ये चीज़ें कहाँ से आईं? जैसे कि देह की पीड़ा, देह की परेशानियाँ और खोखलापन और दुनिया की चरम दुर्दशा। शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करने के बाद उसे यंत्रणा देनी आरम्भ कर दी। तब मनुष्य अधिकाधिक अपभ्रष्ट हो गया, मनुष्य की बीमारियाँ गहरी हो गईं, और उसका कष्ट अधिकाधिक गंभीर हो गया। मनुष्य दुनिया में अधिकाधिक खोखलापन, त्रासदी और जीवित रहने में असमर्थता महसूस करने लगा, और दुनिया के लिए कम से कमतर आशा महसूस करने लगा। इस प्रकार यह दुःख मनुष्य पर शैतान द्वारा लाया गया था, और यह केवल तब आया जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था और मनुष्य का देह अपभ्रष्ट हो गया था। … यही कारण है कि आपके लिए बीमारियाँ, परेशानियाँ होना और आत्मघाती महसूस करना संभव है, और कभी-कभी दुनिया की वीरानी महसूस करना, या यह महसूस करना भी संभव है कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है, कि यह पीड़ा अभी भी शैतान के स्वामित्व के अधीन है; यह मनुष्य की घातक कमज़ोरियों में से एक है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परमेश्वर के अनुभव करने के मायने")। परमेश्वर के वचनों में यह पूर्णतया सही बताया गया था कि किस तरह मेरी बीमारी के दर्द से उत्पन्न पीड़ा इतनी ज्यादा थी कि मेरी जीने की सारी इच्छा खत्म हो गई और मैं अपना जीवन समाप्त करने की बात सोचने लगी। लेकिन परमेश्वर के वचनों में कहा गया था कि बीमारी का वह सारा दर्द और पीड़ा शैतान के हानिकारक तरीकों के कारण थी। पहले तो मैं वास्तव में यह नहीं समझ पाई कि परमेश्वर ने ये बातें क्यों कहीं, लेकिन परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़ने के बाद मैं धीरे-धीरे इन सच्चाइयों को समझने लगी।

एक दोपहर मेरे पति हमेशा की तरह मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुना रहे थे, तो मैंने परमेश्वर के ये वचन सुने: "जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थीं। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। … विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी सुख हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य निश्चित रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और यह नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")। इन वचनों को सुनने के बाद ही अंतत: मेरी समझ में आया कि परमेश्वर ने यह क्यों कहा कि मानव-जाति की सभी बीमारियाँ और पीड़ाएँ शैतान से उत्पन्न होती हैं: शैतान हमें भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान और विज्ञान का इस्तेमाल करता है। शैतान हमें अपने बेतुके विचारों से भर देता है, जैसे कि "मनुष्य का विकास बंदरों से हुआ है," "यहाँ कभी भी कोई उद्धारकर्ता नहीं हुआ है," "ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है," "किसी व्यक्‍ति की नियति उसी के ही हाथ में होती है," "विज्ञान लोगों को बचाता है," और "मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है।" शैतान ने इन दर्शनों, नियमों, विचारों और धारणाओं से मानव-जाति का दिमाग बदल दिया। उन्होंने लोगों के दिलों और आत्माओं पर कब्जा कर लिया है और उन्हें ज्ञान पर अंधविश्वास रखने और विज्ञान की पूजा करने के लिए मजबूर कर दिया है। लोगों को भ्रम है कि वे ज्ञान से अपना भाग्य बदल सकते हैं या विज्ञान के इस्तेमाल से हर कठिन समस्या को हल कर सकते हैं। लोगों ने शैतान के बेतुके विचारों को अपने जीवन का आधार बना लिया है और इस तरह वे शैतान द्वारा कैद, मजबूर और नियंत्रित कर लिए गए हैं। लोगों ने परमेश्वर से आने वाली हर चीज को नकारना शुरू कर दिया है, उसकी देखभाल और सुरक्षा से दूरी बनानी शुरू कर दी है। शैतान उन्हें इस तरह नचाता है, जैसे कठपुतली वाला अपनी कठपुतलियाँ नचाया करता है, और मैं इस तरह नुकसान उठाने वाले लाखों लोगों में से एक थी। जब मैं बीमार थी, तो मैंने इलाज के लिए विज्ञान पर भरोसा किया; मैं आँख मूँदकर विज्ञान पर विश्वास और उसकी पूजा करती थी। मैं सचमुच सोचती थी कि प्रसिद्ध अस्पतालों के विशेषज्ञ अपनी उन्नत तकनीकों और आधुनिक चिकित्सा-सुविधाओं की सहायता से मेरी बीमारी का इलाज करने में सक्षम होंगे। पर न केवल मेरी स्थिति में सुधार नहीं हुआ, बल्कि मैं वास्तव में मृत्यु के कगार पर पहुँच गई। विज्ञान मेरे लिए केवल सपने जैसी आशा और लाइलाज दर्द ही लाया। विज्ञान ने मुझे परमेश्वर में विश्वास नहीं करने दिया और इसलिए मैंने बार-बार परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया, उसका विरोध किया और उसके उद्धार से इनकार कर दिया। लेकिन मेरे विद्रोह के बावजूद परमेश्वर ने कभी मेरा उद्धार करना नहीं छोड़ा और इसलिए मेरा मार्गदर्शन करने के लिए उसने अपने वचनों का इस्तेमाल किया है। थोड़ा-थोड़ा करके उसने मेरी आत्मा को जगाया है, जो एक समय ज्ञान और विज्ञान से इतनी बोझिल थी। कभी मैं मृत्यु के करीब थी, अब परमेश्वर के सामने आ गई और उसका उद्धार प्राप्त किया।

मेरे पति ने रोजाना मुझे परमेश्वर के वचन सुनाना जारी रखा, और एक दिन मैंने परमेश्वर के ये वचन सुने: "परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इसके अलावा वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव सभ्यता का वास्तुकार था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की सम्प्रभुता से जुड़ी है, मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर की योजनाओं में निहित है। … यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को अवश्य परमेश्वर की आराधना में झुकना चाहिए, पश्चाताप करना चाहिए और परमेश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और मंज़िल निश्चित रूप से तबाह हो जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")। इस अंश ने मुझे यह समझने में मदद की कि सभी लोगों का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और परमेश्वर ही मानव-जीवन का स्रोत है। केवल परमेश्वर के सामने आने, परमेश्वर का अनुसरण करने और परमेश्वर की आराधना करने से ही लोगों को अच्छी नियति प्राप्त हो सकती है। जब लोग परमेश्वर से दूर जाते हैं, उसका विरोध और त्याग करते हैं और उसके बजाय शैतान पर भरोसा करते हैं, तो वे खुद को शैतान के हवाले कर देते हैं। नतीजतन, उन्हें शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया जाएगा और रौंदा जाएगा, और उन्हें अनंत आपदाओं और असीम दुखों का सामना करना पड़ेगा। इस तरह से लोग खुद को नुकसान पहुँचाते हैं और खुद अपना ही अंत कर लेते हैं। उस समय मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी मूर्ख, अंधी और दयनीय थी। मैंने देखा कि ज्ञान और विज्ञान के बारे में मेरे विचार सिर्फ जहर थे, शैतान द्वारा मुझे भ्रष्ट करने के उपकरण थे। इन सभी वर्षों में मुझे शैतान द्वारा जहर दिया जा रहा था और अब मुझे इसका बहुत पछतावा था। अपने दिल की गहराई से मैंने परमेश्वर के लिए एक सच्ची तड़प का अनुभव किया। मैं बाइबल में दर्ज नीनवे के लोगों की तरह व्यवहार करने की इच्छुक थी, ताकि मैं परमेश्वर के सामने जमीन पर लेटकर अपने पाप स्वीकार कर सकूँ और पश्चात्ताप कर सकूँ। मैं अपने सभी बुरे तौर-तरीके छोड़ देना चाहती थी और परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया मार्गदर्शन और जीविका स्वीकार करना चाहती थी। मैं परमेश्वर का अनुसरण करना चाहती थी और उसकी आराधना करना चाहती थी, इसलिए मैंने सक्रिय रूप से कलीसिया में खुद को परिचारिका का काम सौंपे जाने का अनुरोध किया। भाई-बहनों के साथ बातचीत के दौरान किसी ने मेरी बीमारी के कारण मुझे तुच्छ नहीं समझा या मुझे नीचा नहीं दिखाया। असल में उन्होंने मुझे बहुत मदद और समर्थन दिया और मुझे हमेशा लगा कि मैं उनके सच्चे प्यार से घिरी हुई हूँ।

इसी तरह कुछ समय बीत गया, लेकिन मेरी बीमारी अभी भी सुधर नहीं रही थी और इसलिए मैंने परमेश्वर से विनती करनी शुरू कर दी और उससे कहा कि वह स्वस्थ होने में मेरी मदद करे। लेकिन बहनों ने अपनी संगति में मुझसे कहा: "परमेश्वर सभी चीजों का रचयिता है और हम सब उसकी रचनाएँ हैं, इसलिए परमेश्वर हमसे कैसा भी व्यवहार क्यों न करे, हमें उसके आयोजन और व्यवस्थाएँ स्वीकार करनी ही पड़ती हैं। अगर हम परमेश्वर से चीजें माँगते हैं, तो हम अपनी विवेकहीनता ही दिखाते हैं। बीमारियों का इलाज करना, भूत भगाना और चमत्कार करना अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अंग थे, पर अब हम राज्य के युग में हैं और परमेश्वर का मुख्य कार्य अब हर चीज अपने वचनों के माध्यम से पूरी करना है, लोगों के भ्रष्ट स्वभाव निर्मल और परिवर्तित करने के लिए अपने वचनों का प्रयोग करना है। परमेश्वर हमें ऐसा इंसान बनाना चाहता है, जो उसकी आज्ञा मानें, उसके प्रति वफादार रहें, उसे जानें और उससे प्यार करें, ताकि वह ऐसे लोगों के समूह को अगले युग में ले जा सके। परमेश्वर प्यार और फर्माबरदारी चाहता है, जिसे लोग परमेश्वर को जानने के बाद स्वाभाविक रूप से प्रदर्शित करें। वह यह नहीं चाहता कि लोग अपनी बीमारियाँ ठीक होने की कृतज्ञता के भाव से उसका अनुसरण करें। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है: 'लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो वे उन्हें स्पर्श करके और अपने आशीषों और अनुग्रह के माध्यम से उनसे उनके हृदय समर्पित करवाकर ऐसा करता है। कहने का तात्पर्य है कि, उसका मनुष्य को स्पर्श करना,उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार ऐसा उद्धार है जिसमें एक लेन-देन किया जा रहा है। केवल जब परमेश्वर उन्हें सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नामके प्रति समर्पित होंगे, और परमेश्वर के लिए अच्छा करने और उन्हें महिमामण्डित का प्रयत्न करेंगे। यह मानव जाति के लिए परमेश्वर की अभिलाषा नहीं है। भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है; यदि नहीं, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित रूप से नहीं आता। अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके' ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए")। इसलिए हमें विश्लेषण करना चाहिए और समझना चाहिए कि किस तरह हम आशीर्वादों की इच्छा से प्रेरित होते हैं और किस तरह परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता लेनदेन का है। हमें परमेश्वर के वचन और अधिक पढ़ने चाहिए और उन्हें अपने जीवन में लागू करना चाहिए; परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए, व्यवहार, काट-छाँट, परीक्षण और शोधन को स्वीकार करना चाहिए और अपने भ्रष्ट स्वभावों में शुद्धि और परिवर्तन हासिल करना चाहिए। आपकी बीमारी का ठीक होना या न होना परमेश्वर के हाथों में है, और हमें परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पण कर देना चाहिए।"

बहनों की संगति के जरिये मुझे समझ में आया कि अपने शैतानी स्वभाव को बदलने के लिए परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करना ही काफी नहीं है। केवल परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय और ताड़ना स्वीकार करके ही हम अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा पा सकते हैं, अपनी चेतना और विवेक पुन: प्राप्त कर सकते हैं, और इस तरह परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं और उसकी इच्छा के अनुरूप हो सकते हैं। वे सभी ईसाई, जो अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकार नहीं करते, वे भी परमेश्वर का प्रचुर अनुग्रह बखूबी प्राप्त कर सकते हैं, पर वे अभी भी पाप करने और उन्हें स्वीकार करने के चक्र में जीते हैं। इसका कारण यह है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव निर्मल नहीं किए गए हैं, और इसलिए वे परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह प्राप्त करने के लक्ष्य के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं और उसी में खुद को खपा देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे परमेश्वर के साथ एक सौदा करना चाहते हैं और इसलिए वे कभी भी उसका अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाएँगे। परमेश्वर की इच्छा समझने के बाद मैंने उससे अपनी बीमारी ठीक करने का अनुरोध करना बंद कर दिया और उसके बजाय परमेश्वर में विश्वास करने और उसकी आराधना करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की, चाहे मेरी स्थिति कितनी भी अच्छी या बुरी क्यों न हो जाए। मैंने एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने, सच्चाइयों का अनुसरण करने और अधिक ईमानदारी से परमेश्वर को जानने, अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए एक सच्चे इंसान की तरह जीने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया। जब मैंने इस सबको अमल में लाना शुरू किया, तो मुझे अपने दिल में बड़ी राहत महसूस हुई और अब मुझे अपनी बीमारी के दर्द से लाचार या प्रतिबंधित महसूस होना बंद हो गया, और मौत का उतना डर भी नहीं रहा। मैंने केवल खुद को पूरी तरह से परमेश्वर के हवाले करने और उसकी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं का पालन करने की कामना की।

उसके बाद, मैं ईश्वर के वचन सुनने, सच्चाइयों के बारे में संगति करने और परमेश्वर की स्तुति के गीत गाने के लिए बार-बार भाई-बहनों से मिलती रही। मुझे लगा कि मेरा दिल बहुत समृद्ध हो गया है, और इस समृद्धि के साथ मेरी पीड़ा में कमी आई। इससे भी ज्यादा रहस्यमय यह रहा कि लगभग बिना पता चले मेरे पैरों की सुन्नता दूर होने लगी और मैं धीरे-धीरे चलने की क्षमता हासिल करने लगी और आखिरकार मैं व्हीलचेयर पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं रही। इससे भी ज्यादा अप्रत्याशित यह रहा कि एक दिन मेरी दृष्टि अचानक लौट आई और मैं परमेश्वर के वचनों की किताबों में छपे शब्द देख पाने में सक्षम हो गई। अंतत: मैं परमेश्वर के वचन देख सकती थी! मुझे इस पर विश्वास नहीं हुआ, पर मैंने सचमुच एक चमत्कार का अनुभव किया था। मुझे दिल में जो खुशी महसूस हुई, वह अवर्णनीय थी, और इसलिए मैं परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए और उसकी स्तुति करते हुए लगातार उससे प्रार्थना करने लगी। जब मैंने रोमांचित होकर अपने पति को यह खुशखबरी सुनाई, तो वे भावनाओं से अभिभूत हो गए। आँखों में आँसू लिए वे बार-बार चिल्लाने लगे, "धन्यवाद परमेश्वर, धन्यवाद परमेश्वर!" हाँ, यह सच है—मैंने परमेश्वर के सामने बस जरा-सा समर्पण किया और परमेश्वर ने मुझ पर यह महान कृपा कर दी। मैंने गहराई से महसूस किया कि भले ही अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य में चमत्कार करना शामिल न हो, लेकिन परमेश्वर के वचनों का अधिकार परमेश्वर के चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर वास्तव में सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, परमेश्वर जो लोगों से प्यार करता है!

एक दिन मेरे पति जिला अस्पताल में थे कि अचानक उन्हें वह डॉक्टर दिखा, जो मेरे इलाज के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार था। डॉक्टर ने उनसे पूछा कि मेरी गुर्दे की बीमारी का इलाज कैसा चल रहा है और क्या मुझे डायलिसिस करवाना पड़ रहा है। मेरे पति ने जवाब दिया: "उसे डायलिसिस नहीं करवाना पड़ा, लेकिन उसकी हालत में पहले से सुधार हो रहा है। वह अब चल सकती है और देख भी सकती है!" डॉक्टर बहुत हैरान हुआ और बोला: "अच्छा, यह तो चमत्कार हो गया। मैंने तो सोचा था, वह अब तक डायलिसिस पर आ गई होगी।"

आजकल मैं एक सामान्य जीवन जीती हूँ। मेरे रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी हमेशा आश्चर्य व्यक्त करते हैं और ऐसी बातें कहते हैं: "मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम्हारी हालत इतनी जल्दी सुधर जाएगी। शारीरिक और मानसिक रूप से तुम एक सामान्य व्यक्ति की तरह लगती हो!" जब भी मैं ऐसा कुछ सुनती हूँ, तो चुपचाप परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता के कुछ शब्द कह देती हूँ: "परमेश्वर, अपने प्रति प्रदर्शित तुम्हारे प्यार और तुम्हारे उद्धार को मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। हालाँकि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, लेकिन तुम्हारे प्रेम का बदला चुकाने के लिए मैं अपने बाकी जीवन में तुम्हारा अनुसरण करने, तुम्हारी आराधना करने और तुम्हारे द्वारा पैदा किए गए प्राणियों में से एक के रूप में अपने कर्तव्य निभाने का संकल्प करती हूँ।" मैं अत्यधिक भ्रष्ट रही हूँ, मैंने पहले कभी परमेश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया था, और मैंने बार-बार परमेश्वर के उद्धार से इनकार किया था, लेकिन न केवल परमेश्वर ने मेरे अपराधों के कारण मुझसे नाराज़ नहीं हुआ, वरन् उसने मुझे वास्तव में शानदार तरीके से बचाया भी। मुझे परमेश्वर की असीम दया प्राप्त हुई है, और मैं जानती हूँ कि मैं इस अनुग्रह के लिए पूरी तरह से अयोग्य हूँ। इन सशक्त और स्थायी अनुभवों ने मुझे दिखाया है कि विज्ञान और ज्ञान लोगों को नहीं बचा सकते, वे केवल लोगों को अनंत पीड़ा, भय और मृत्यु ही दे सकते हैं। केवल ब्रह्मांड में हर चीज का स्रष्टा और शासक ही मनुष्यों को जीवन दे सकता है और उनकी जरूरतों का निर्वाह कर सकता है। परमेश्वर मानव-जाति के अस्तित्व का एकमात्र आधार है, और वह मानव-जाति की एकमात्र आशा और मुक्ति है। लोगों की अच्छी नियति प्राप्त करने की एकमात्र उम्मीद परमेश्वर की आराधना करना है। मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उसने मेरी जैसी इंसान को शैतान के प्रभाव से बचाया, जो शैतान द्वारा बुरी तरह से छली गई थी और मौत के करीब पहुँच गई थी। परमेश्वर, सभी चीजों का सिरजनहार, मुझे जीवन में वापस लाया और वापस अपने सामने लाया। मैं अब जीवन के शानदार पथ पर चलती हूँ!

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