सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

मैंने सीखा कि लोगों के साथ ठीक ढंग से कैसे पेश आया जाए

फ्रांस निवासी सीयुआन द्वारा

एक दिन, हमारी कलीसिया से भाई चेन मेरे पास आया। वह बोला कि अपने ख़ाली समय में वह गवाही प्रस्तुत करने का अभ्यास करना चाहता है और अपने कुछ गुणों का इस्तेमाल सुसमाचार के कार्य के लिए करना चाहता है। भाई चेन से पहले हुई बातचीत के कारण मैं जानती थी कि उसका स्वभाव बहुत ही अहंकारी है। इसलिये उसे लेकर मेरे मन में पहले से ही कुछ ख़्याल थे और मैंने एक राय बना रखी थी। इसके अलावा, मैंने सोचा कि जो लोग गवाही प्रस्तुत करना चाहते हैं, उन्हें बाइबल का एक निश्चित स्तर का ज्ञान होना चाहिये। वे लोग ऐसे होने चाहिये जो सत्य को साफ़ तौर पर बता पाएँ और उन लोगों के सवालों के जवाब दे पाएँ जिन्हें हम सुसमाचार का उपदेश देते हैं। मुझे लगा कि उसके अंदर ये सब गुण नहीं हैं, इसलिये मैं उसके सुसमाचार प्रचार करने की बात से सहमत नहीं हुई। जब उसने यह देखा, तो वह बोला, “मेरी योग्यताओं को देखकर क्या आपको नहीं लगता कि मैं गवाही प्रस्तुत करने का अभ्यास कर सकता हूँ? अगर मैं गवाही प्रस्तुत न करूँ तो क्या मेरी प्रतिभा व्यर्थ नहीं चली जाएगी?” जब मैंने यह सुना, तो मैं उखड़ गई। मैंने सोचा, “तुम्हें लगता है कि गवाही प्रस्तुत करना इतना आसान है? अगर तुम में असल प्रतिभा नहीं है, तो क्या तुम्हें लगता है कि तुम इस काम को कर पाओगे? तुम्हें अपने बारे में कुछ ज़्यादा ही गलतफ़हमी है। तुमने ख़ुद को सही तरीके से आंका नहीं है!” उसके बाद, मैंने कुछ दूसरे भाई-बहनों से भाई चेन की स्थिति के बारे में सहभागिता की ताकि हम उसकी अवस्था को समझ सकें। मेरी बात सुनने के बाद, कुछ भाई-बहन ने मुझे भाई चेन के अहंकारी व्यवहार के बारे में बताया। इससे भाई चेन के बारे में मेरी राय की पुष्टि हो गई। मैं इस बात से अनजान थी कि मैंने भाई चेन को समझन के लिए सत्य की खोज किए बिना ही उस पर सहजता से टिप्पणी कर दी थी। मूलत: मैं दूसरों से साँठ-गाँठ करके उसे आँक रही थी।

एक बार, मैं भाई चेन के साथ एक सभा में भाग ले रही थी। जब हम लोग कलीसियाई जीवन जीते हुए परमेश्वर के परिवार की फ़िल्मों को किस प्रकार से देखा जा सकता है इस के बारे में कार्य प्रबंध पढ़ रहे थे, तो वह बोला, “मेरा ख़्याल है कि अगुवाओं और सहकर्मियों में सत्य की वास्तविकता नहीं है। ये लोग सभाओं में केवल सिद्धांतों और शब्दों का ही उपदेश देते हैं, भाई-बहनों की व्यवहारिक समस्याओं को नहीं सुलझा पाते। यह बहुत अच्छी बात है कि अब हम लोग सभाओं में फ़िल्में देख सकते हैं। इससे हम लोग सत्य को समझ सकेंगे।” उसने अपनी बात जारी रखी, “शुरू-शुरू में जब मैं यह काम कर रहा था, तो चूँकि मैं सिद्धांतों को समझता नहीं था, इसलिये मुझे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन अब जबकि मैंनें सिद्धांतों को समझ लिया है, तो मुझे लगता है कि यह काम करना आसान हो गया है। मेरे काम के परिणाम भी ख़ास तौर से अच्छे आ रहे हैं…।” जब मैंने उसे यह कहते सुना, तो मेरे दिल में घृणा और प्रतिरोध पैदा हो गया। मैंने सोचा, “तुम्हें मौके का फ़ायदा उठाना ख़ूब आता है। तुम हम अगुवाओं और सहकर्मियों को नीचा दिखाने के लिये ऊंचाई पर के भाई की सहभागिता का इस्तेमाल कर रहे हो। साथ ही, तुम अपनी गवाही देना और अपना दिखावा करना भी नहीं भूले हो। तुम सचमुच बहुत ही अहंकारी और विवेकशून्य हो…।” फिर, हम लोग उन पाँच सवालों पर चर्चा करने लगे जिन्हें अगली सभा में बताया जाना था। उस वक्त, भाई चेन ने कहा कि वह तीन सवालों का प्रभारी बनना चाहता है। यहाँ तक कि उसने बाकी दो सवालों का दायित्व लेने वाले व्यक्तियों का नाम भी प्रस्तावित कर दिया। जब मैंने अगली सभा का कार्यभार सँभालने के लिये समूह अगुवा की व्यवस्था कर दी, तो उसने तुरंत शक्की अंदाज़ में समूह अगुवा से पूछा, “आपको लगता है कि आप इस काम को सम्भाल लेंगे?” उसके बोलने के लहजे से लगा कि जैसे सभा का काम सम्भालना केवल उसे ही आता है। उसके व्यवहार को देखते हुए, मैंने सोचा, “तुम बहुत ही विवेकशून्य हो। क्या तुम इस काम को कर सकते हो? तुम भाई-बहनों के सामने दिखावा करने के लिये इस अवसर का इस्तेमाल केवल एक मंच के रूप में करना चाहते हो। तुम सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचना चाहते हो, लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।” मैंने उसकी मँशा पर पानी फेरने के लिये, अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, सारी व्यवस्था को बदल दिया ताकि वह प्रभारी न बन सके। भाई चेन के बर्ताव के बारे में सोचकर, मुझे उससे नफ़रत हो गई। उसके प्रति मेरा पूर्वाग्रह और भी ज़्यादा कठोर हो गया। मैंने विशेष तौर पर, उसके अहंकारी स्वभाव के बारे में उससे कई बार बातचीत की थी। उसने इस बात को ज़बानी तौर पर तो स्वीकारा, लेकिन बाद में मुझे उसके व्यवहार में कोई स्पष्ट बदलाव नज़र नहीं आया। तब मुझे लगा कि इसके अंदर हद दर्जे का अहंकार भरा पड़ा है। वह इस हद तक अहंकारी था कि मुझे लगा इसमें बदलाव आना नामुमकिन है, उससे कोई आशा नहीं की जा सकती। कभी-कभी तो मुझे यह भी लगता था कि उसके अहंकार के कारण वह अपने वर्तमान दायित्वों का निर्वाह करने के काबिल भी नहीं है। उसकी जगह यह ज़िम्मेदारी मैं किसी और को दे दूँगी।

सभा ख़त्म होने के बाद, और जो सोच-विचार मैंने सभा के दौरान प्रकट किये थे, उन पर आत्म-चिंतन करने के पश्चात, मेरे दिल ने मुझे धिक्कारा, मुझे बेचैनी होने लगी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मेरे मन में भाई चेन के प्रति कई तरह के विचार और पूर्वाग्रह हैं। मुझे लगता है कि वह बहुत ही अहंकारी है। जब भी वह बोलता है, तो मेरे मन में उसके प्रति घृणा और विरोध पैदा होने लगता है। मैं उसे हटाने तक की सोच रही हूँ। हे परमेश्वर! मैं जानती हूँ कि मैं सही अवस्था में नहीं हूँ। मैं आपकी इच्छा को भी समझती नहीं हूँ। मैं यह भी नहीं जानती कि मुझे सत्य के किस पहलू में प्रवेश करना चाहिए। हे परमेश्वर, कृपया मुझे प्रबुद्ध करें, मुझे राह दिखाएँ।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे उपदेश से एक अंश याद आया: “क्या तुम्हारे दिल में इस तरह की सोच पलती है? जब तुम किसी के बारे में सोचते हो, तो पहले तुम उसकी कमज़ोरियों के बारे में ही सोचते हो, यही सोचते हो कि वह किस तरह से भ्रष्ट है। यही बात है न? अगर तुम इसी तरह से सोचते रहे, तो तुम कभी भी किसी के साथ सामान्य तरीके से काम नहीं कर पाओगे। … लेकिन चूँकि वह सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास रखता है, और सत्य का अनुसरण करना चाहता है, इसलिये, जल्दी ही उसके अंदर की भ्रष्टता में बदलाव आएगा और फिर वह दूर हो जाएगी। हमें इसी तरह से मामले को देखना चाहिये, हमें मसलों को विकास के नज़रिये से देखना चाहिये। हमें किसी की कमज़ोरियों को लेकर नहीं बैठ जाना चाहिए, हमें हमेशा के लिये यह कहकर उसका तिरस्कार नहीं कर देना चाहिए कि यह व्यक्ति तो अब जीवन भर ऐसा ही रहेगा, या यह व्यक्ति तो ऐसा ही है। ऐसा करना उसे आँकना और एक सीमा में बाँध देना होगा! लोगों को बचाने के लिये परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा है, यह कभी नहीं कहा कि चूँकि इंसान इस हद तक भ्रष्ट हो चुका है, इसलिये उसे बचाना बेकार है, कि बस यही मानवजाति का अंत है। परमेश्वर इन चीज़ों को इस ढंग से बिल्कुल नहीं देखता। इसलिये, हम सभी लोग अब सत्य का अनुसरण कर रहे हैं। हम सब लोग चाहते हैं कि हम सत्य का अनुसरण करें। हम लोग मानते हैं कि हम अगर, कम से कम, अपने लक्ष्य पर टिके रहें, तो कुछ सालों में हमारे अंदर थोड़ा-बहुत बदलाव तो अवश्य आएगा। आख़िरकार हमारा स्वभाव पूरी तरह से बदल जाएगा और हम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाएँगे। तुम सभी लोगों में इस तरह का विश्वास है, है न? चूँकि तुम्हारा विश्वास इस तरह का है, इसलिये तुम्हें मानकर चलना चाहिए कि दूसरों के अंदर भी ऐसा ही विश्वास है” (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। सहभागिता के इस अंश ने साफ़ तौर पर मेरी अवस्था को उजागर कर दिया। मुझे बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने जाना कि मेरी प्रकृति बहुत ही अहंकारी और दंभपूर्ण है। मैं इस ढंग से व्यवहार कर रही थी जैसे मेरे अंदर सत्य है और मैं एक ही नज़र में किसी भी व्यक्ति को ठीक-ठीक आँक सकती हूँ और उसके सार को पूरी तरह से समझ सकती हूँ। उपदेश के वचनों को अपने ऊपर लागू करके, मुझे एहसास हुआ: भाई चेन के साथ पारस्परिक बातचीत में, जब उसने अपनी बातों और कार्यों में अपने अहंकारी स्वभाव को व्यक्त किया, तो उससे मुझे लगा कि वह अनुभवहीन और अभिमानी है। मुझे महसूस हुआ कि उसमें कोई आत्म-ज्ञान नहीं है। मैंने मन में यह भी सोचा कि वो बहुत ही अहंकारी है, पूरी तरह से विवेकशून्य है, उसमें बदलाव की कोई संभावना नहीं है। यही वजह है कि मैं उसके साथ कभी भी उचित ढंग से या भेदभाव किए बिना व्यवहार नहीं कर पाई। परमेश्वर इंसान को बचाने का यथासंभव प्रयास करता है, फिर भी मैं भाई चेन को हर तरह से सीमा में बाँध रही थी। अब, परमेश्वर ने मुझे उजागर कर दिया था और साफ़ तौर पर मुझे मेरी अहंकार और दंभपूर्ण प्रवृत्ति दिखा दी थी। मैंने अपने ही नज़रिये और विश्वासों को सत्य मान लिया था, उन्हें ऐसा पैमाना मान लिया था जिससे मैं लोगों को आँकती थी—मैं बेहद विवेकशून्य थी। क्या मैं दूसरों को सिद्धाँतों और मानकों के आधार पर माप रही थी? क्या लोगों को देखने और सीमांकित करने का मेरा तरीका सत्य के अनुरूप था? मैं कीड़े-मकौड़े से भी गई गुज़री थी। मुझे दूसरों को आँकने और उनका तिरस्कार करने का क्या अधिकार था? परमेश्वर के वचन कहते हैं: “जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है वे वही लोग हैं जिनके स्वभाव शैतान की भ्रष्टता के कारण भ्रष्ट हो गये हैं; वे निष्कलंक, पूर्ण किये गए लोग नहीं हैं, न ही वे ऐसे लोग हैं जो रिक्तता में जीवन जीते हैं” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “परमेश्‍वर में विश्‍वास के लिए जीवन में प्रवेश सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है”)। हम लोगों को अभी पूर्ण नहीं किया गया है, हम लोग अभी भी अपने परमेश्वर के कार्य के अनुभव के ज़रिये क्रमिक बदलाव के दौर में हैं। भले ही हम अपने भ्रष्ट स्वभावों को व्यक्त कर दें या अपने काम के दौरान कुछ अपराध कर बैठें, पर अगर हम लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, तो हम बदल सकते हैं। लेकिन, मैं दूसरों को विकास की दृष्टि से नहीं देख रही थी। बल्कि, मैं दूसरों को अपने नज़रिये से और भ्रष्ट स्वभाव से सीमाओं में बाँध रही थी। मैं दरअसल बेहद अहंकारी हो रही थी।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा: “तुम्हें परमेश्वर के परिवार के लोगों के साथ किस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए? (हर एक भाई-बहन के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।) तुम उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कैसे करोगे? हर किसी में छोटे-मोटे दोष और कमियां होती हैं, साथ ही उनमें कुछ विलक्षणताएं भी होती हैं; सभी लोगों में दंभ, कमज़ोरी और ऐसी बातें होती हैं जिनकी उनमें कमी होती है। तुम्हें प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए, तुम्हें बहुत कठोर नहीं बनना चाहिए या हर छोटी सी बात का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसे लोगों के साथ, जिनकी उम्र कम है या जिन लोगों ने ज़्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया है, या जिन लोगों ने हाल ही में अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है या जिन लोगों के कुछ ख़ास अनुरोध हैं, अगर तुम उन्हें चोटी से पकड़ लेते हो और छोड़ते नहीं हो, तो इसे ही कठोर होना कहा जाता है। तुम उन झूठे अगुवाओं और मसीह विरोधियों द्वारा किये गये बुरे कर्मों को अनदेखा कर देते हो, और फिर भी अपने भाई-बहनों में छोटी-मोटी कमियां देखने पर उनकी मदद करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय उन बातों का बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश करते हो और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हो, जिसके कारण और भी लोग उनका विरोध करने लगते हैं, उनका बहिष्कार करके निष्कासित कर देते हैं। यह किस तरह का व्यवहार है? यह सिर्फ़ अपनी निजी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना, और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम नहीं होना है; यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दर्शाता है! यह एक उल्लंघन है! जब लोग कोई काम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें देख रहा होता है; तुम जो भी करते हो और जैसा भी सोचते हो, वह सब देखता है! अगर तुम सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सत्य को समझना होगा। एक बात जब तुम सत्य को समझ जाते हो, तब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम निश्चित ही परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाओगे। सत्य यह बताता है कि तुम्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और एक बार जब तुम इस बात को समझ जाते हो, तो तुम यह जान जाओगे कि लोगों से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये, यह परमेश्वर के वचनों में साफ़ तौर पर दिखाया और बताया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के साथ जिस रवैये से व्यवहार करता है, वही रवैया लोगों को एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में अपनाना चाहिये। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोग अपरिपक्व अवस्था वाले या कम उम्र के होते हैं, या उन्होंने सिर्फ़ कुछ समय के लिये परमेश्वर में विश्वास किया होता है। कुछ लोगों की प्रकृति और सार बुरे या दुर्भावनापूर्ण नहीं होते हैं, बात बस इतनी है कि वे लोग कुछ हद तक अज्ञानी होते हैं या उनमें क्षमता की कमी होती है, या वे लोग समाज के द्वारा बहुत अधिक संदूषित किये गये हैं। उन लोगों ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसी वजह से उनके लिए कुछ मूर्खतापूर्ण चीज़ें करने या कुछ नादानी वाले काम करने से खुद को रोक पाना मुश्किल है। हालांकि, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं; वह सिर्फ़ लोगों के दिलों को देखता है। अगर वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, और यही उनका उद्देश्य है, फिर परमेश्वर उन्हें देख रहा है, उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमेश्वर उन्हें वह समय और अवसर दे रहा है जो उन्हें प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन्हें एक झटके से गिरा देता है या सिर बाहर निकालते ही उन्हें मारने लगता है; परमेश्वर ने कभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया है। इसे देखते हुए, अगर लोग एक दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो क्या यह उनके भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाता है? यह निश्चित तौर पर उनका भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें यह देखना होगा कि परमेश्वर अज्ञानी और मूर्ख लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, वह अपरिपक्व अवस्था वाले लोगों के साथ कैसे पेश आता है, वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के सामान्य प्रकटीकरण से कैसे पेश आता है, और वह दुर्भावनापूर्ण लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। परमेश्वर के पास अलग-अलग तरह के लोगों के साथ व्यवहार करने के कई तरीके हैं, और उसके पास विभिन्न लोगों की बहुत सी परिस्थितियों को प्रबंधित करने के भी कई तरीके हैं। तुम्हें इन चीज़ों के सत्य को समझना होगा। एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तब तुम उन्हें अनुभव करने का तरीका जान जाओगे” (“मसीह की बातचीतों के अभिलेख” में “सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए”)। परमेश्वर के वचन साफ़ तौर पर सिद्धांतों और मार्ग का वर्णन करते हैं कि लोगों के साथ कैसे पेश आया जाए। परमेश्वर के वचन यह भी बताते हैं कि मसीह-विरोधी और दुष्ट लोगों के प्रति परमेश्वर का रवैया घृणा, शाप और दण्ड से भरा हुआ है। जहाँ तक ऐसे लोगों का सवाल है जिनकी आध्यात्मिक हैसियत बहुत छोटी है, जो कम क्षमता वाले हैं, जिनका स्वभाव हर तरह से भ्रष्ट है और जिनमें कमियाँ हैं, अगर वे लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, सत्य का अनुसरण करने को तैयार हैं, सत्य को अमल में ला सकते हैं, तो उनके प्रति परमेश्वर का रवैया प्रेम, करुणा और उद्धार का होगा। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि परमेश्वर के जिस तरह से हर व्यक्ति से पेश आता है उसे लेकर उसके अपने सिद्धांत और मानक हैं। परमेश्वर चाहता है कि जिसे वह प्यार करता है, उससे हम प्यार करें और जिससे वह नफ़रत करता है उससे हम नफ़रत करें। जो भाई-बहन सच्चे मन से परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उनके प्रति हमें सहिष्णु और क्षमाशील होना चाहिये। हमें उन्हें प्रायश्चित करने और सुधरने का अवसर देना चाहिये। अगर वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करते हैं, तो हमें उन्हें एक ही झटके में अस्वीकार नहीं कर सकते। ऐसा करना परमेश्वर के सिद्धांतों और लोगों से पेश आने के तरीकों के अनुरूप नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो बिल्कुल ही नहीं है। मैं सोचने लगी कि किस तरह से भाई चेन ने अपने दायित्वों का भार अपने ऊपर ले लिया था, किस तरह से उसके अंदर ज़िम्मेदारी का एहसास था और किस तरह से वह कुछ व्यवहारिक कार्य कर पाया था। मैंने कभी उसकी क्षमता और ख़ूबियों पर पूरी तरह से विचार ही नहीं किया। बल्कि, मेरा सारा ध्यान उसकी भ्रष्टता पर ही अटककर रह गया, उन चीज़ों को मैंने मन से निकाला ही नहीं। मैं उसे आँकने और उसकी निंदा करने में ही लगी रही। मेरी प्रकृति सचमुच विद्वेषपूर्ण थी!

तभी, मुझे परमेश्वर के वचनों का ख़्याल आया: “वह रवैया एवं तरीका जिसके अनुसार परमेश्वर आदम और हव्वा के साथ व्यवहार करता है वह इसके समान है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने बच्चों के लिए चिंता करते हैं। यह इसके समान भी है कि किस प्रकार मानवीय माता-पिता अपने पुत्र एवं पुत्रियों से प्रेम करते हैं, उन पर ध्यान देते हैं, और उनकी देखरेख करते हैं—वास्तविक, दृश्यमान, और स्पर्शगम्य। अपने आपको एक ऊँचे एवं सामर्थी पद पर रखने के बजाए, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के लिए पहरावा बनाने के लिए चमड़ों का उपयोग किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी लज्जा को छुपाने के लिए या उन्हें ठण्ड से बचाने के लिए इस रोएँदार कोट का उपयोग किया गया था। संक्षेप में, यह पहरावा जो मनुष्य के शरीर को ढंका करता था उसे परमेश्वर के द्वारा उसके अपने हाथों से बनाया गया था। इसे लोगों की सोच के अनुसार सरलता से विचार के माध्यम से या चमत्कारी तरीके से बनाने के बजाय, परमेश्वर ने वैधानिक तौर पर कुछ ऐसा किया जिसके विषय में मनुष्य सोचता है कि परमेश्वर नहीं कर सकता था और उसे नहीं करना चाहिए। यह एक साधारण कार्य हो सकता है कि कुछ लोग यहाँ तक सोचें कि यह जिक्र करने के लायक भी नहीं है, परन्तु यह ऐसे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं लेकिन उसके विषय में पहले अस्पष्ट विचारों से भरे हुए थे, उन्‍हें उसकी विशुद्धता एवं मनोहरता में अन्तःदृष्टि प्राप्त करने, और उसके विश्वासयोग्य एवं दीन स्वभाव को देखने की गुंजायश भी देता है। यह अत्यधिक अभिमानी लोगों को, जो सोचते हैं कि वे ऊँचे एवं शक्तिशाली हैं, परमेश्वर की विशुद्धता एवं विनम्रता के सामने लज्जा से अपने अहंकारी सिरों को झुकाने के लिए मजबूर करता है” (“वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I”)। परमेश्वर के प्रत्येक वचन से मुझे स्नेह की प्राप्ति हुई। मैंने लोगों के लिये परमेश्वर की चिंता और सहानुभूति को महसूस किया कि उसकी परवाह और व्याकुलता वास्तविक है। जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करके भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया, तो परमेश्वर ने भले ही ख़ुद को उनसे छिपा लिया और उन्हें अदन के बगीचे से निष्कासित कर दिया, लेकिन फिर भी परमेश्वर ने उन पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखी और उसने ख़ुद उनके पहनने के लिये चमड़े के वस्त्र बनाए। परमेश्वर सचमुच प्यारा है, उसका स्वभाव वाकई सुंदर और नेक है। भ्रष्ट लोगों और अपराध करने वालों के प्रति वह धैर्य रखता है। अपनी करुणा के कारण, वह इंसान की अज्ञानता, कमी और अपरिपक्वता को क्षमा कर देता है। वह इंसान को प्रायश्चित करने का समय और अवसर देता है। प्रतीक्षा करने के दौरान, वह इंसान को निरंतर सत्य उपलब्ध कराता रहता है ताकि इंसान उसमें प्रवेश करे। परमेश्वर द्वारा इंसान का उद्धार बहुत ही वास्तविक है। परमेश्वर निष्ठावान है, इंसान के लिये उसका प्रेम सच्चा है, ज़रा भी झूठा या बनावटी नहीं है, बल्कि यथार्थ और प्रशंसनीय है। इन बातों को सोचकर, मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। मैं अपने सभी अनुभवों पर आत्म-चिंतन करने लगी। चूँकि अगुवाओं और कर्मियों के समायोजन के कार्य में, मैंने सिद्धांतों का पालन नहीं किया था, मैंने कुछ हरकतें ऐसी कर दी थीं जिसके कारण कलीसिया के काम में बाधा और रुकावट पैदा हो गई थी। फिर भी, परमेश्वर ने मुझे न तो हटाया और न ही दण्डित किया। बल्कि, उस रिपोर्ट का इस्तेमाल किया जो भाई-बहनों ने लिखी थी जिससे कि मैं आत्म-चिंतन करूँ, प्रायश्चित करूँ, ख़ुद को बदलूँ ताकि मैं सिद्धांतों के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वाह कर सकूँ। मेरी नकारात्मकता और कमज़ोरियों के पल में, परमेश्वर ने मुझे दिलासा और संबल देने के लिए अपने वचनों का प्रयोग किया। उसने उन भाई-बहनों को भी जो मेरे साथ थे, प्रेरित किया कि वे मुझसे परमेश्वर की इच्छा पर विचार-विमर्श करें, जिससे मुझे बहुत बल मिला। उस दौरान जब मैंने अपराध किए या अपने काम में गलतियाँ कीं, जब मैंने गलतफ़हमियाँ पाल रखी थीं, मैं परमेश्वर के विरुद्ध थी, जब मैंने अपने काम में नकारात्मकता दिखाई और ढिलाई बरती, तो उस वक्त परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया और मार्गदर्शन दिया ताकि मैं उसकी इच्छा को समझ सकूँ। उस समय मैंने परमेश्वर के प्रेम और उसके उद्धार को जाना। तब मैं अपनी नकारात्मकता और गलतफ़हमियों का त्याग कर पाई…क्या परमेश्वर ने यह कृपा मुझ पर पहले ही नहीं कर दी थी? मैंने जब परमेश्वर का अनंत प्रेम देखा, तो उसके सच्चे प्रेम ने मेरे ज़िद्दी और चेतनाशून्य हृदय को पिघला दिया। मैंने परमेश्वर से प्रायश्चित की प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैंने बार-बार आपकी आज्ञा का उल्लंघन और विरोध किया है। फिर भी, आप मुझसे प्रेम और सहिष्णुता से पेश आते हैं, मेरी कमज़ोरियों के प्रति समझदारी दिखाते हैं। आपने बार-बार अपने वचनों से मुझे प्रबुद्ध किया, मुझे राह दिखाई, संबल और पोषण दिया। आप आज तक चरणबद्ध तरीके से मेरी अगुवाई करते आए हैं। मैं इस लायक नहीं कि आप मेरी इतनी परवाह करें, मुझे बचाने के लिये इतने प्रयास करें। हे परमेश्वर! मैं आपके प्यार को अपनी ज़बान से व्यक्त नहीं कर सकती। एक तरफ़ तो आप धैर्य से इंतज़ार करते हैं कि मुझमें बदलाव आए, दूसरी तरफ़ आप मुझे प्रायश्चित करने का अवसर भी देते हैं। मैं बस केवल इतना चाहती हूँ कि अब से मैं आपकी इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करूँ। मैं चाहती हूँ कि आप में सच्चा विश्वास रखने वाले भाई-बहनों के साथ मैं सत्य के सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करूँ।”

फिर, मैंने उपदेश में एक और अंश पढ़ा जिसमें लिखा है: “मिसाल के तौर पर, आप एक अगुवा हैं, तो आपको भाई-बहनों के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिये। मान लीजिये, अगर कोई भाई-बहन सत्य का पालन नहीं करता/करती है या सही मार्ग पर नहीं चल रहा/रही है, तो आपको क्या करना चाहिये? आपको ऐसे व्यक्ति की मदद करनी चाहिये। इस मदद में उसकी काट-छाँट और उससे निपटना शामिल है। इसमें फटकार और आलोचना शामिल है। यही मदद करने का तरीका है। यह सब प्रेम है। क्या उसे मनाना या परामर्श देना आवश्यक है? ज़रूरी नहीं। अगर काट-छाँट और निपटने की ज़रूरत है, तो ऐसा ही करें। जो चीज़ उजागर करनी आवश्यक है, उसे उजागर करें। क्योंकि आप अगुवा हैं और एक कार्यकर्ता हैं। अगर आप मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा? आपको इसी दायित्व का निर्वाह करना चाहिये” (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। इस सहभागिता से मैंने यह सीखा कि जिस अगुवा या कर्मी में सत्य की वास्तविकता होती है, वह अपने भाई-बहनों के साथ सिद्धांतों से पेश आता है। वह अपने दायित्व और आदेश को जानता है। वह लोगों की प्रकृति और सार के अनुसार उनसे व्यवहार करने के लिये सत्य के सिद्धांतों का सहारा ले सकता है। वह लोगों की भ्रष्टता और कमियों के आधार पर व्यवहारिक रूप से उनकी मदद कर सकता है। वह जानता है कि प्रेमी हृदय से उसे लोगों की मदद कब करनी चाहिये, कब उसे उनके साथ सख़्ती से निपटना और उनकी काट-छाँट करनी चाहिये, कब उन्हें झिड़कना चाहिये। वह सही ढंग से व्यवहार कर पाता है, सिद्धांतों को अंगीकृत कर सकता है। जिन भाई-बहनों ने अपनी भ्रष्टता को उजागर कर दिया है, वह उनके साथ शत्रुओं की तरह मनमर्ज़ी से पेश नहीं आएगा। मैं फिर सोचने लगी कि मैं भाई चेन के साथ किस ढंग से पेश आई थी। जब उसने अपना अहंकारी स्वभाव प्रकट किया था, तो मैंने व्यवहारिक तरीके से उसकी मदद नहीं की थी, या उसे सहारा नहीं दिया था। मैंने उसकी अहंकारी प्रकृति का विश्लेषण नहीं किया था ताकि उसे अपनी प्रकृति के सार को जानने में मदद मिले। न मैंने उसकी मदद की जिससे वह देख सके कि अगर उसका अहंकारी स्वभाव नहीं बदला तो वह साफ़ तौर पर उसके क्या ख़तरनाक नतीजे होंगे। बल्कि, मैंने मनमाने ढंग से उसे आँका, उसे निकाल दिया और उसकी निंदा की। मैंने उसके बारे में उसकी पीठ पीछे अपने पूर्वाग्रहों को भी फैलाया। प्रेमपूर्ण हृदय लेकर उससे पेश आने की तो छोड़िये, मैंने उसके प्रति ज़रा-सी भी सहिष्णुता या सहनशीलता नहीं दिखाई। इस मुकाम पर, मुझे लगा कि जिस ढंग से मैं इस भाई के साथ पेश आ रही थी, उसमें मेरे पास सत्य के सिद्धांत नहीं थे और मैं अपने कर्तव्य और दायित्वों का निर्वाह नहीं कर रही थी। मैं परमेश्वर की इच्छा को समझ गई। मुझे अभ्यास का मार्ग मिल गया। परिणामस्वरूप, मैं भाई चेन से जाकर मिली। मैंने उसकी समस्याओं की ओर इशारा किया और उसे मदद और समर्थन देने की पेशकश की। साथ ही, मैं उसके साथ निपटी और उसकी काट-छाँट की। मैंने लक्ष्य को लेकर उसके गलत नज़रिये और उसके द्वारा चुनी जा रही गलत राह पर भी विश्लेषण किया। मैंने उससे परमेश्वर के पवित्र सार और अपमान सहन न करने वाले स्वभाव पर भी सहभागिता की…। परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिये उसका धन्यवाद। मुझसे बातचीत करने के बाद, भाई चेन को अपनी उस अहंकारी प्रकृति और भ्रष्टता की समझ आई जो उसने प्रकट की थी। उसने कहा, “हालाँकि मैं जानता हूँ कि मैं बहुत अहंकारी हूँ, लेकिन मैं इस बात को अक्सर ज़बानी तौर पर ही स्वीकार करता हूँ। मैंने अपनी अहंकारी प्रकृति का विश्लेषण गहराई से कभी नहीं किया, इससे सचमुच घृणा करने की तो बहुत दूर की बात है। अब जब आज आपने मुझे इसका एहसास दिलाया तो मुझे समझ में आया कि मेरी स्थिति तो बहुत ही ख़राब और ख़तरनाक है। मेरे हृदय में परमेश्वर नहीं है, न ही मैं किसी का सम्मान करता हूँ। मुझे हमेशा यही लगता है कि मैं बहुत काबिल हूँ। ख़ास तौर से, जब मेरे काम से कोई परिणाम हासिल होता है, तो मैं न सिर्फ़ परमेश्वर की महिमा को चुरा लेता हूँ, बल्कि मैं और भी ज़्यादा अहंकारी और दम्भी हो जाता हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं कमाल का इंसान हूँ। मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रहा हूँ, मैं दुष्टता के कार्य और परमेश्वर का विरोध कर रहा हूँ। आज आपकी चेतावनी और मदद ने मुझे एक अवसर दिया है कि मैं आत्म-चिंतन करूँ, प्रायश्चित करूँ और अपने आपको बदलूँ…।” उसकी इन बातों को सुनकर, मैं भावुक हो गई। मुझे गहराई से महसूस हुआ कि मैंने अपने दायित्वों का निर्वाह अच्छी तरह से नहीं किया था, मेरे दिल में करुणा नहीं थी। मैंने अपने भाई मदद नहीं की, उसे समर्थन नहीं दिया। बल्कि, मैं उसकी भ्रष्टता को लेकर उसकी निंदा करती रही। यह तो परमेश्वर के न्याय और ताड़ना की वजह से मैं बच गई, जिससे मैं साफ़ तौर पर देख पाई कि मेरी प्रकृति अहंकारी और विद्वेषपूर्ण है, और मैं अपने बेतुके नज़रिये में सुधार ला पाई। मैंने ऊंचाई से उपदेश के अंश को पढ़ा: “यह कहा जा सकता है कि उन तमाम लोगों का स्वभाव अहंकारी और आत्माभिमानी होता है जिन्हें सचमुच सत्य से प्रेम होता है और जिनमें पूर्ण होने की इच्छा है। अगर ये लोग सत्य को, काट-छाँट और निपटे जाने को स्वीकार कर पाएँ, और किसी भी परिस्थिति में पूरी तरह से सत्य का पालन कर पाएँ, तो इस प्रकार के लोग उद्धार पा सकते हैं और पूर्ण किये जा सकते हैं। दरअसल, ऐसे लोग होते ही नहीं जो वाकई में अच्छी क्षमता के हों और जिनमें वाकई इच्छा तो है लेकिन अहंकारी न हों। यह एक तथ्य है। परमेश्वर के लोगों को अंतर करने के योग्य होना चाहिये। उन्हें किसी को यह कहकर सीमांकित नहीं करना चाहिये कि वह अच्छा नहीं है, या यह नहीं कह देना चाहिये कि चूँकि यह व्यक्ति बहुत ही अहंकारी और आत्माभिमानी है, इसलिये उसे बचाया नहीं जा सकता, न ही उसे पूर्ण किया जा सकता है। कोई इंसान कितना ही अहंकारी क्यों न हो, अगर उसके अंदर अच्छी क्षमता है और वह सत्य का पालन कर सकता है, तो परमेश्वर ऐसे इंसान को पूर्ण करना चाहता है। परमेश्वर के लिये किसी को पूर्ण करने का पैमाना यह है कि मुख्य रूप से वह व्यक्ति अच्छा होना चाहिये, उसमें अच्छी क्षमता होनी चाहिये और वह सत्य का पालन करता हो। अगर किसी व्यक्ति की क्षमता बहुत ही कम है, वह लगातार सत्य को नहीं समझ पा रहा है, तो अगर उसका स्वभाव अत्यंत विनयपूर्ण है, वह बिल्कुल भी अहंकारी नहीं है, तो भी ऐसा व्यक्ति किसी काम का नहीं होता। वह पूर्ण किये जाने लायक नहीं होता। इस मुकाम पर, परमेश्वर की इच्छा को समझना ज़रूरी है। अगर कोई व्यक्ति अच्छी क्षमता वाला है, उसमें इच्छा है, वह अहंकारी और आत्माभिमानी भी नहीं है, तो मानकर चलिये कि वह व्यक्ति मुखौटा पहने है या वह दिखावा कर रहा है, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति होता ही नहीं। इस बात को समझना ज़रूरी है कि इंसान प्रकृति से अहंकारी और आत्माभिमानी होता है। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता” (ऊपर से संगति)। इस सहभागिता से मुझे एक बात साफ़-साफ़ समझ में आ गई कि अहंकारी स्वभाव के लोगों से कैसे निपटना है। मैंने जाना कि अहंकारी स्वभाव के लोगों में बदलाव संभव है, मुख्य बात ये है कि वे सत्य का पालन कर सकते हैं या नहीं, सत्य को स्वीकार कर सकते हैं या नहीं। अगर वे लोग सत्य को स्वीकार कर पाते हैं, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर पाते हैं, काट-छाँट और निपटने को स्वीकार कर पाते हैं, तो निश्चित रूप से उनमें बदलाव आ सकता है और वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। अब जब मैंने भाई चेन की स्थिति पर फिर से गौर किया, तो मुझे एहसास हुआ, चूँकि वह युवा है, उसे परमेश्वर में विश्वास किए हुए बहुत समय नहीं हुआ था, न ही उसने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का ज़्यादा अनुभव किया था, तो उसके लिए अहंकारी और दम्भी स्वभाव का प्रदर्शन एक सामान्य बात थी। हम लोग शैतान के द्वारा भ्रष्ट किये जा चुके हैं, हम लोग अहंकारी स्वभावों के नियंत्रण में हैं, इसलिये हम लोग प्रसिद्धि और दिखावा पसंद करते हैं। ये भ्रष्ट इंसान के सामान्य लक्षण हैं। क्या मैंने अक्सर अहंकारी और दम्भी स्वभाव नहीं प्रकट किया है? मुझे ऐसा क्यों लगता है कि मैं तो बदल सकती हूँ लेकिन वह नहीं बदल सकता? मैंने अपने लिये जो पैमाने तय किये हैं, वे उनसे कम सख्त क्यों हैं जो मैंने उसके लिये तय किये हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि मैं उससे कहीं ज़्यादा अहंकारी हूँ? यह उससे पेश आने का सही तरीका नहीं है। इस एहसास के बाद, मेरे अंदर से वे सारे पक्षपातपूर्ण भाव और पूर्वाग्रह समाप्त हो गए जो मैंने भाई चेन के विरुद्ध पाल रखे थे। मुझे लगा कि उसकी प्रकृति का सार बुरा नहीं था। उसमें सत्य पर चलने का संकल्प था। बात केवल इतनी थी कि उसका अहंकारी स्वभाव थोड़ा ज़्यादा गहन था और मैं समझ गई कि मुझे प्रेमपूर्ण हृदय से उसकी मदद करनी चाहिये और अपने दायित्व को पूरा करना चाहिये।

परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मुझे प्रबुद्ध किया और मुझे राह दिखाई। इस अनुभव से, मैंने एक बात सीखी कि जो लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव में जीते हैं और दूसरों के साथ परमेश्वर के वचनों के सिद्धांत के अनुरूप पेश नहीं आते, जो लोग दूसरों के गुणों और कमज़ोरियों के प्रति सही नज़रिया नहीं रख पाते, वे लोग दूसरों के साथ उचित ढंग से व्यवहार नहीं कर सकते। ऐसे लोग अपने भाई-बहनों को न केवल शारीरिक और मानसिक आघात पहुँचाएँगे, बल्कि वे जीवन में अपने प्रवेश को भी बाधित करेंगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी मार्ग पर चलते हुए, दूसरों के लिये मुश्किलें पैदा कर सकते हैं, उन्हें दण्डित कर सकते हैं। परमेश्वर को धन्यवाद कि उसने इस दौरान मुझ पर न्याय और ताड़ना का कार्य किया। जब मैं अपने विद्रोही स्वभाव में जी रही थी और भाई के साथ सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप पेश नहीं आ पा रही थी, तो परमेश्वर ने मुझे सही समय पर बचाने के लिये फ़ौरन न्याय और ताड़ना का इस्तेमाल किया जिससे कि मैं अपने अहंकारी और विद्वेषपूर्ण स्वभाव को पहचान पाई। जब मैं परमेश्वर की शरण में लौट आई, अपने आपको अलग करके मैंने सत्य की खोज की, तो मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन और अगुवाई प्राप्त हुई, तो परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ में आया कि सिद्धांतों के मुताबिक लोगों के साथ कैसे निपटना है। जब मैं भाई चेन के साथ परमेश्वर के वचनों के अनुसार पेश आई, तो मुझे सचमुच आध्यात्मिक शांति और स्थिरता की अनुभूति हुई। इसके अलावा, भाई चेन के गुणों से अपनी कमियों का पता लगाकर, मैं उन्हें दूर करना सीख पाई। मैंने परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने का मधुर स्वाद भी चखा। मैंने परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से ही सत्य को थोड़ा-बहुत समझा, अपनी भ्रष्टता और कमियों को जाना। साथ ही, मुझे सचमुच ऐसा लगता है कि लोगों के साथ सत्य के सिद्धांतों के अनुसार निपटना बहुत महत्वपूर्ण है। मैं बस इतना चाहती हूँ कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते समय, मैं हमेशा परमेश्वर के वचनों को अमल में लाती रहूँ, और सभी भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार पेश आऊँ।

सम्बंधित मीडिया