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29. अंधेरी सुरंग के बाद स्‍नेही रोशनी

29. अंधेरी सुरंग के बाद स्‍नेही रोशनी

वांग युपिंग, चीन

दूसरे सभी भाइयों और बहनों की तरह, जो प्रभु यीशु के वापस आने की कामना करते हैं, मैंने भी स्‍वर्ग के राज्‍य में हमारी अगवानी करने के लिए हमारे प्रभु के जल्‍दी वापस आने की हमेशा कामना की है ताकि हम उनके आर्शीवाद का आनंद ले सकें। फिर 2006 में नवंबर में एक दिन आखिरकार मैंने प्रभु की वापसी का समाचार सुना। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा कहे गए वचनों को पढ़कर और भाइयों एवं बहनों की संगति तथा अंत के दिनों में परमेश्‍वर के कार्य के साक्ष्‍य के माध्‍यम से, अंतत: मैं जान गई कि देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर वापस आए प्रभु यीशु हैं। उसके बाद, मैंने अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कार्य को बहुत खुशी से स्‍वीकार कर लिया।

एक बार एक सभा में, बहन यांग ने बहुत गंभीर लहजे में मेरे साथ यह संगति साझा की: "हाल ही में, ढेर सारे भाइयों और बहनों को अंत के दिनों में परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार करने के बाद शैतान की ओर से कुछ परेशानी और बहकावे का सामना करना पड़ा है। कुछ को सीसीपी सरकार के झूठों के द्वारा धोखा दिया गया, कुछ को पुरोहितों और एल्‍डरों द्वारा परेशान किया गया और धमकाया गया, कुछ को उनके परिवारों ने मजबूर किया या रोका, और कुछ के परिवार में ऐसे सदस्‍य थे जो बीमार पड़ गए या उन्‍हें आपदा का सामना करना पड़ा। ये सभी चीजें परमेश्‍वर के पास वापस जाने से हमें रोकने के लिए शैतान के छल-कपट हैं। हम सभी समझते ही हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की बुद्धि का कार्य परमेश्‍वर के घर से शुरु होता है, और यही मानवजाति को बचाने में परमेश्‍वर के कार्य का अंतिम चरण है। वे मनुष्‍य को बचाने के लिए अपने परम प्रयास कर रहे हैं और शैतान हमें परमेश्‍वर के सामने आने एवं उनका उद्धार प्राप्‍त करने के रास्‍ते को रोकने के इरादे से हम पर अपनी चालें चल रहा है और हमें परेशान कर रहा है। अभी आध्‍यात्मिक संसार में जो युद्ध चल रह है, वह बहुत अधिक प्रचंड होता जा रहा है। इसलिए हमें सत्‍य से लैस होने और विवेक प्राप्‍त करने की तत्काल जरूरत है, ताकि जब कभी शैतान के छल-कपट से हमारा सामना हो तो हम धोखा न खाएं, बल्कि, हम परमेश्‍वर के लिए साक्षी बनें। आओ, हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों का एक अंश पढ़ते हैं।" इसलिए मैंने परमेश्‍वर के वचनों की पुस्‍तक ली और मन लगाकर निम्‍नलिखित अंश को पढ़ा: "जब परमेश्वर कार्य करता है, तो शैतान परेशान करता है। अंत के दिनों में, वह अपने उत्पीड़न को समाप्त कर देगा; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिस प्रकार के व्यक्ति को पूर्ण बनाना चाहता है वह पूर्ण बना दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अमापनीय और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को पूर्ण बनाएगा, और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और उसका कार्य करना असंभव हो जायेगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त कर लेगा। शैतान तब भी इसे अब मानने से मना करता है; वह लगातार स्वयं को परमेश्वर के विरोध में खड़ा करता है, परंतु परमेवश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। उसने कहा है, मैं शैतान की सभी अँधेरी शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अँधेरे प्रभावों के ऊपर विजेता बनूँगा। ... परमेश्वर उसकी अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, मैंने पहले निम्नलिखित कहा है: मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है। अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा। जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो शैतान पीछे से छुप कर उसका पीछा करता है, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर चोट किसने की! एक बार जब उसे पहले ही कुचला और चूर—चूर कर दिया गया होगा, केवल तभी उसे सत्य का ज्ञान होगा; उस समय तक उसे पहले से ही आग की झील में जला दिया गया होगा। तब क्या वह पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास आनंद लेने के लिए और कोई योजनाएँ नहीं हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई")। बहन यांग ने कोमलता से कहा: "परमेश्‍वर के वचनों से हम देख सकते हैं कि शैतान हमेशा परमेश्‍वर के प्रबंधन कार्य के प्रत्‍येक कदम के पीछे साये सा लगा रहता है। परमेश्‍वर मनुष्‍य को बचाने के लिए सामने से कार्य करते हैं जबकि शैतान पीछे बाधा और विनाश का कार्य करता है। यह मनुष्‍य को लेकर परमेश्‍वर से लगातार होड़ करता है, और यह मनुष्‍य को पूर्णत: बचाने के लिए परमेश्‍वर के कार्य के अंतिम चरण में विशेष रूप से सत्‍य है। अब और भी अधिक सीमा तक, शैतान हमें परेशान करने और परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार करने एवं उनके कार्य के प्रति समर्पण करने से हमें रोकने के लिए सभी प्रकार के लोगों और वस्‍तुओं का गलत फ़ायदा उठाते हुए वो सब कुछ कर रहा है जो उसके बस में है। मनुष्‍य को परमेश्‍वर से दूर करना, हम से परमेश्‍वर को अस्‍वीकार करवाना और उनके साथ विश्‍वासघात करवाना, और इसके द्वारा हमें परमेश्‍वर के उद्धार को गँवाने पर मजबूर करना शैतान का घृणित लक्ष्‍य है। लेकिन शैतान के छल-कपट के प्रत्‍युत्तर में परमेश्‍वर की बुद्धि कार्यान्वित होती है। वे हमें अपने कार्य, अपनी बुद्धि और अपनी सर्वशक्तिमत्ता की समझ प्रदान करने के लिए शैतान की बाधा को प्रयोग करते हैं, और हमें शैतान की दुष्‍टता एवं बदसूरती को साफ-साफ देखने भी देते हैं। इसलिए, भले ही हमें बाद में कुछ भी का सामना क्‍यों न करना पड़े, हम सभी को परमेश्‍वर की आराधना अवश्‍य करनी चाहिए और उन पर विश्‍वास रखना चाहिए, और सत्‍य की खोज करनी चाहिए। हमें शैतान के छल-कपट को भी अवश्‍य समझना चाहिए, ताकि हम परमेश्‍वर के लिए साक्षी बन सकें। यह ठीक उन परीक्षणों की तरह है जिनसे अय्यूब को गुजरना पड़ा था। वह परमेश्‍वर के लिए साक्षी बना और शैतान को अपमानित होकर पीछे हटना पड़ा।" मैंने बहन यांग की संगति को सुना और पूरे विश्‍वास से उत्तर दिया: "हां, हम वास्‍तविक परमेश्‍वर पर विश्‍वास करते हैं। यदि हम परमेश्‍वर पर भरोसा रखते हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है; यदि मुझे शैतान के बहकावे का सामना करना पड़ा तो मैं निश्चित रूप से परमेश्‍वर की ओर खड़ी होऊंगी।"

इसके बाद ज्‍यादा समय नहीं बीता था कि एक दिन सुमाचार सुनाने के बाद जब मैं अपने घर के दरवाजे पर पहुँच रही थी तभी मेरी पड़ोसन अपने हाथ हिलाते हुए दौड़ती हुई मेरे पास आई और बोली: "तुम इतनी देर से वापस क्‍यों आई हो? यहां एक भयंकर दुर्घटना हो गई है! आज तुम्‍हारे बेटे का दोस्‍त लियू तुम्‍हारा ट्रक मांगने आया, लेकिन वह उसे स्‍टार्ट नहीं कर पा रहा था। इसलिए वह इसे उठा ले जाने के लिए ट्रैक्‍टर लाया, लेकिन कई बार कोशिश करने पर भी यह हिला तक नहीं। तभी हू भी वहां आ गया, वह ट्रैक्‍टर पर चढ़ा और उसने ट्रैक्‍टर को सीधे पांचवे गियर में डाल दिया। ट्रैक्‍टर डगमगा गया और ट्रक के साथ जुड़ी केबल अचानक टूट गई, और—हुश!— टूटी केबल पलट कर हू के माथे से टकरा गई। तुरंत ही खून बहने लगा। लोग उसे अस्‍पताल ले गए हैं।" मेरा दिमाग अचानक पूरी तरह से भावशून्य हो गया। मैं दौड़ती हुई अंदर गई और मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्‍वर! मुझे नहीं मालूम कि आपकी क्‍या इच्‍छा है। यह अचानक मेरे साथ क्‍यों हुआ है? कृपया मुझे प्रबुद्ध कीजिए।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे इस आध्‍यात्मिक युद्ध से जुड़े सत्‍यों के बारे में बहन यांग की संगति का स्‍मरण हुआ, और फिर मैं समझ गई। शैतान केवल मुझे लालच देने और मुझे अशांत करने के लिए ये सब कर रहा था। शैतान केवल मुझ पर हमला करने के लिए इन प्रतिकूल घटनाओं को इस्‍तेमाल करना चाहता था ताकि मैं परमेश्‍वर पर संदेह करूँ, उन्‍हें दोष दूँ और उन्‍हें अस्‍वीकार करूँ। मुझे अहसास हुआ कि यह वास्‍तव में एक आध्‍यात्मिक युद्ध है! ठीक तभी मुझे परमेश्‍वर के वचनों का स्‍मरण हुआ: "तुम उस समय परमेश्वर की ओर खड़े होने में समर्थ हो जब वह शैतान के साथ संघर्ष करता है, और तुम शैतान की ओर वापस नहीं जाते हो, तब तुमने परमेश्वर के लिए प्रेम प्राप्त कर लिया होगा, और तुम अपनी गवाही में दृढ़ खड़े रहे होगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है")। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझमें अत्‍यधिक विश्‍वास भर दिया और मैंने मन ही मन सोचा: "शैतान, भले ही तू मुझे कितना भी परेशान क्‍यों न करे, मैं तेरे छल-कपट का शिकार नहीं बनूँगी; मैं परमेश्‍वर को दोष नहीं दूँगी या उन पर संदेह नहीं करूंगी, बल्कि मैं उनकी ओर खड़ी होऊंगी। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का वैसे ही अनुसरण करूंगी जैसे कि मुझे करना चाहिए।" परमेश्‍वर की इच्‍छा समझ आने के बाद मुझे अपने मन में अधिक दृढ़ता महसूस हुई।

लेकिन शैतान हार मानने को तैयार नहीं था—इसने दूसरे लोगों और वस्‍तुओं के जरिये मुझे परेशान करने की अपनी मुहिम को नहीं छोड़ा। जब हू अस्‍पताल में भर्ती था तो उसके परिवार ने इसकी सारी जिम्‍मेदारी मेरे परिवार पर थोप दी; वे चाहते थे कि हम इलाज का सारा खर्चा उठाएं। मैं उनके साथ बातचीत करने की कोशिश करती रही, उन्‍हें बताया कि मैं आधा खर्चा उठाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन वो बस इंकार करते रहे। बीस दिन बाद हू ठीक हो चुका था, लेकिन अभी भी उसकी अस्‍पताल से छुट्टी नहीं करवाई गई थी। यह मेरे परिवार से उगाही करने के लिए जानबूझकर किया गया था। फिर एक दिन हू बोला: "ट्रक तुम्‍हारा है, इसलिए सारा खर्चा भी तुम्‍हें उठाना चाहिए।" हू की पत्‍नी भी खड़ी होकर चिल्‍लाने लगी, "बिल्‍कुल ठीक! दुर्घटना तुम्‍हारे ट्रक से हुई थी, इसलिए सारा खर्चा तुम्‍हें उठाना चाहिए।" मैं वहां खड़ी रही, वे लोग मुझे इतना सता रहे थे कि उसकी कोई सीमा नहीं थी और मुझे बहुत गुस्‍सा आना शुरु हो गया। मैं अनजाने में ही इस मामले में उलझ गई थी। मुझे बहुत कष्ट हो रहा था और मन में भावनात्‍मक उथल-पुथल चल रही थी। मैं अब उनसे और ज्‍यादा बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं ख़फ़ा होकर अस्‍पताल के कमरे से बाहर चली आई। जब मैं सीढ़ी उतर रही थी तब मैंने मन ही मन सोचा: "मैं परमेश्‍वर पर विश्‍वास रखती हूँ, तो जब मेरे साथ ऐसी घटनाएं होती हैं तो मुझे इतना गुस्‍सा नहीं करना चाहिए, मुझे यह मामला परमेश्‍वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। मुझे परमेश्‍वर पर भरोसा रखने की जरूरत है।" घर पहुँचकर मैंने परमेश्‍वर के वचनों की अपनी पुस्‍तक को खोला और यह पढ़ा: "मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो कि यह मानव व्यवस्थाओं के द्वारा, या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षा करता है कि परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में वे अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। ... तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है जब परमेश्वर चाहता है तुम उसके लिए एक गवाही दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है")। जब मैंने इन वचनों को पढ़ा तो मुझे याद आया कि उस दिन कैसे मैंने बहन यांग के सामने बढ़-चढ़कर बात की थी कि जब कभी मुझे शैतान बहकाने की कोशिश करेगा तब मैं निश्चित रूप से परमेश्‍वर की ओर खड़ी रहूँगी। मैंने कल्‍पना नहीं की थी कि जब शैतान समय-समय पर मुझे सताएगा तब मैं शांति से परमेश्‍वर के सामने आने और उनकी इच्‍छा जानने की कोशिश करने में समर्थ नहीं हो सकूंगी, बल्कि मेरा मन हमेशा दूसरी बातों में उलझा रहेगा। मुझे इसे लेकर बहुत बुरा लग रहा था— क्‍या यह शैतान की चाल में फंस जाना नहीं था? जब मैंने इस मामले के पूरे विवरण पर विस्तार से मनन किया तब अंतत: मैंने देखा कि शैतान वास्‍तव में कितना कुटिल और दुष्‍ट है। उसने मुझे परेशान करने, मेरे सांसारिक हितों को लेकर मुझे नाराज करवाने के लिए इस समस्‍या को इस्‍तेमाल किया था; इससे भी कहीं अधिक, वह मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर को अस्‍वीकार करवाने और उनके साथ विश्‍वासघात करवाने के लिए इस समस्‍या को इस्‍तेमाल करना चाहता था। मैं जानती थी कि मुझे शैतान के छल-कपट में नहीं फंसना है, मैं परमेश्‍वर पर भरोसा रखना चाहती थी और यह मामला परमेश्‍वर को सौंपना चाहती थी। मेरा विश्‍वास था कि हू की अस्‍पताल से छुट्टी का मामलाऔर आखिर में मुझे कितना पैसा खर्चकरना पड़ता है, यह सब परमेश्‍वर के हाथों का आयोजन है, और मैं परिणाम को स्‍वीकार करूंगी, भले ही कुछ भी परिणाम निकले। जब मैं परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझ गई और परमेश्‍वर के लिए गवाही देने को इच्‍छुक थी, तब अगले दिन परमेश्‍वर का एक अद्भुत कर्म देख कर मैं हैरान रह गयी। परमेश्‍वर ने एक नौजवान को अस्‍पताल में हू के पास जाने और उसकी फटकार लगाने के लिए प्रेरित किया: "मुझे तो तुम्‍हारी शक्ल तक देखने में कोफ्त हो रही है, जो अच्‍छे लोगों पर धौंस जमाता है, जो दूसरों से पैसों की उगाही करता है। अगर उनकी जगह मैं होता तो तुम्‍हें एक पैसा नहीं देता!" उसी कमरे में दूसरे मरीज भी सहमति में कहने लगे: "बिल्‍कुल ठीक कहा, यही अपनी मरज़ी से ट्रैक्‍टर पर चढ़ा था और अब यह उस इंसान के पैसे चाहता है। कितनी बेतुकी बात है!" "हां! जिस व्‍यक्ति ने ट्रक मांगा, उसे भी कुछ पैसे देने चाहिए! ये सब चीजों के पैसे ट्रक के मालिक से नहीं ले सकते हैं!" यह सुनकर हू ने अपना सिर झुका लिया और एक भी शब्‍द नहीं बोला। तीन दिन बाद हू की अस्‍पताल से छुट्टी हो गई। मैं अपने मन की गहराई में जानती थी कि इन सबके पीछे परमेश्‍वर थे और उन्‍होंने मेरे लिए यह मार्ग खोला था।

इन हालातों से गुजरने के बाद, मैं शैतान की दुष्‍टता और घिनौनेपन को देख सकती थी। उसने मुझे परेशान करने और मुझ पर हमला करने के लिए मेरे चारों ओर के लोगों एवं वस्‍तुओं को इस्‍तेमाल किया और चूँकि मैं कुछ पैसे गँवाने वाली थी इसलिए मुझसे परमेश्‍वर से शिकायत करवाने, उन्‍हें दोष दिलवाने और मुझे उनसे दूर करवाने की कोशिश की थी। शैतान चाहता था कि मैं अपना जीवन कष्‍ट में बिताऊं। साथ ही, मैं देख सकती थी कि जब मैंने अपने दैहिक लाभों और हानियों के बारे सोचना बंद कर दिया, जब मैंने अपनी आस्‍था में परमेश्‍वर पर भरोसा रखा, जब मैं परमेश्‍वर की ओर खड़ी हुई तो उन्‍होंने शैतान को शर्मिंदा होकर पीछे हटने के लिए मजबूर करते हुए मेरे वास्‍ते मार्ग खोलने के लिए अविश्‍वासियों के वचनों को प्रयोग किया। इससे मैं कोई भी वस्‍तु प्रयोग करने और सब कुछ पर शासन करने के परमेश्‍वर के अधिकार को देख पाई। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि परमेश्‍वर के वचनों में लिखा है: "मैं सभी को अपनी सेवा करने के लिए संगठित करूँगा, और इसके अलावा, मैं अपनी सामर्थ्य प्रकट करूँगा, ताकि प्रत्येक व्यक्ति देख सके कि संपूर्ण ब्रह्मांड की दुनिया में एक भी वस्तु ऐसी नहीं है जो हमारे हाथों में नहीं है, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो हमारी सेवा में नहीं है, और एक भी उपलब्धि ऐसी नहीं है जो हमारे लिए नहीं की जाती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 119")। जितना अधिक मैंने परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ा, उतना ही अधिक मैं परमेश्‍वर की सर्वशक्तिमत्ता और उनके चमत्‍कार को देख सकती थी। यह देखकर कि सभी वस्‍तुएं परमेश्‍वर के हाथों में हैं, परमेश्‍वर में मेरी आस्‍था बढ़ गई तथा मैं आगे जो कुछ होगा उसमें उनके कार्य को और अधिक अनुभव करने, और शैतान के बहकावों पर जीत हासिल करने के लिए परमेश्‍वर पर भरोसा रखने को तैयार हो गयी।

एक महीने बाद मेरा शैतान के लालच से दुबारा सामना हुआ। एक दिन मेरी नवविवाहित बेटी मिलने के लिए घर आई, लेकिन ठीक सामने के दरवाजे पर अचानक ही बेहोश हो गई। मेरी पड़ोसन ने उसे उठाया और घर के अंदर आने में उसकी मदद की। पहले-पहल मैंने सोचा कि यह बस आम ज़ुकाम है और इस बारे में ज्‍यादा नहीं सोचा, लेकिन मैं यह बिल्कुल उम्‍मीद नहीं कर रही थी कि बीच रात में वह अचानक सिर से लेकर पैर तक कांपना शुरु कर देगी। मैं बहुत डर गई और मुझे तनिक भी आभास नहीं था कि क्‍या करना है, लेकिन मैंने बस जल्‍दी से उसे थामा और कसकर अपनी छाती से लगा लिया, और थोड़ी देर बाद वो थोड़ा बेहतर दिखाई देने लगी। अगली सुबह वो बोली, "मां, आप जाओ, अपना काम करो, मैं ठीक हो जाऊँगी।" मैंने मन ही मन परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे प्रिय परमेश्‍वर! सभी वस्‍तुएं आपके हाथों में है, इसलिए मैं अपनी बेटी आपको सौंपती हूँ।" फिर मैं अपनी बेटी की ओर मुड़ी और बोली: "जिंग, तुम्‍हें परमेश्‍वर की अधिक आराधना करने और परमेश्‍वर पर भरोसा रखने की जरूरत है, क्‍योंकि वे हमारा शक्तिशाली सहारा हैं।" उसे यह समझाने के बाद, मैं अपन कार्य करने के लिए चली गई। दो दिन बाद जब मैं वापस आई तो मैं हैरान रह गई, मेरी बेटी अस्‍पताल में थी, दुनिया के लिए लगभग मर चुकी थी। मेरी बहू ने मेरी ओर देखा और बड़े दुख से बोली: "मां, आपके जाने के बाद जिंग की तबीयत और खराब होने लगी। डॉक्‍टर ने उसकी जांच करने के बाद बोला है कि उसके मस्तिष्‍क में रक्‍तस्राव हुआ है और उसके सिर में चीरा लगाकर ऑपरेशन करना होगा। लेकिन पिछले कुछ दिन से उसका पति यहां नहीं था और आप भी नहीं थीं, इसलिए उसके फॉर्म पर दस्‍तखत करने वाला कोई नहीं था। ऑपरेशन करने का उचित समय हमारे हाथों से निकल चुका है। मैंने डॉक्‍टर को जिंग की सास को यह बताते हुए सुना था कि उसकी बीमारी का इलाज नहीं हो सकता है और भले ही वह होश में आ जाए लेकिन वो पूरी तरह निष्क्रिय हालत में रहेगी।" यह सुनकर मेरे हृदय में जैसे नश्‍तर चुभने लगा, और मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मैं इस हकीकत को स्‍वीकार नहीं कर पा रही थी। रत्ती भर आशा के साथ, मैं विशेषज्ञ से बात करने के लिए गई लेकिन वह अपना सिर इंकार में हिलाते हुए बोला: "हम जो कुछ कर सकते थे वो हम कर चुके हैं, हम अपनी पूरी कोशिश कर चुके हैं, लेकिन सबसे अच्‍छा नतीजा शायद यही होगा कि वह होश में तो आ जाएगी लेकिन निष्क्रिय हालत में रहेगी।" यह सुनकर ऐसा लग रहा था मानो आसमान मेरे ऊपर आ गिरा हो। मैं अनंत कष्‍ट में जी रही थी। जब मेरे दामाद ने देखा कि मेरी बेटी किस हालत में है तो उसे इसकी परवाह नहीं थी कि क्‍या वह जियेगी या मर जाएगी, बल्कि वो मेरी ओर मुड़ा और उसने बड़ी बेदर्दी से मुझे मँगनी की वह रकम वापस देने के लिए कहा जो उसने हमें शादी के समय दी थी। उस दिन अस्‍पताल से घर का रास्‍ता बहुत ही लंबा महसूस हुआ; मैं सड़क पर भटक रही एक खोयी हुई आत्‍मा थी। लग रहा था जैसे मैं एक लंबी, अंधेरी सुरंग में चल रही हूँ और मुझे अपने सामने कोई रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी।

जब मैं घर पहुँची तो मैंने बड़े कमजारे हाथों से परमेश्‍वर के वचनों की अपनी पुस्‍तक को खोला और यह पढ़ा: "पृथ्वी पर, सब प्रकार की दुष्ट आत्माएँ आराम करने के लिए एक स्थान की ओर चुपके चुपके निरन्तर आगे बढ़ती हैं, और वे लगातार मनुष्यों की लाशों की खोज कर रही हैं कि उन्हें खा सकें। मेरी प्रजा! तुम लोगों को मेरी देखभाल और सुरक्षा के भीतर रहना होगा। कामुकता का व्यवहार कभी भी न करो! बिना सोचे समझे कभी भी व्यवहार न करो! उसके बजाए, मेरे घराने में अपनी वफादारी अर्पित करो, और केवल वफादारी से ही तुम शैतान की धूर्तता के विरूद्ध पलटकर वार कर सकते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 10")। "जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करनी चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को बिना लड़खड़ाने या मिटने देते हुए बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मनसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए")। जब मैंने परमेश्‍वर के इन वचनों को पढ़ा तो मैंने आज के दिन की उन घटनाओं पर मनन किया जो अभी-अभी घटित हुई थीं, और मैं शैतान के घिनौनेपन, कपट और क्रूरता को वास्‍तव में देख सकती थी। मुझे परमेश्‍वर के हाथों से छीन लेने की अपनी कोशिश में यह मुझे परेशान करने और मुझ पर हमला करने के लिए हर मोड़ पर अपने धूर्त छल-कपटों को आजमा रहा था। पहले, किसी ने मुझसे उगाही की और मुझे आर्थिक नुकसान का कष्‍ट उठाना पड़ा; इस बार शैतान मुझे दुबारा बहकाने के लिए मेरी प्‍यारी बेटी को इस्‍तेमाल कर रहा था, ताकि मैं परमेश्‍वर से शिकायत करूं, परमेश्‍वर को अस्‍वीकार करूं और उनके साथ विश्‍वासघात करूं, जिससे मैं अंत के दिनों के परमेश्‍वर के उद्धार को गँवा दूँ। ये सब शैतान के धूर्त छल-कपट थे। ये ठीक उन परीक्षणों जैसे थे जिनका अय्यूब को अपने समय में सामना करना पड़ा था। उन सबके पीछे एक युद्ध चल रहा था—शैतान चाहता था कि अय्यूब अपने धन और अपने बच्‍चों को गँवाने के कारण परमेश्‍वर का त्‍याग करे और उन्‍हें अस्‍वीकार करे, लेकिन अय्यूब ने कभी भी परमेश्‍वर को दोष नहीं दिया। इसकी बजाय, उसने परमेश्‍वर के नाम की स्‍तुति की, जिससे शैतान को शर्मिंदा होकर पीछे हटना पड़ा; उसने परमेश्‍वर के लिए सुंदर और ज़बर्दस्‍त गवाही दी। हालांकि मेरी देह कमजोर है, फिर भी मैं जानती थी कि मुझे शैतान के धूर्त छल-कपटों को समझना होगा और परमेश्‍वर की ओर खड़ा होना होगा। परमेश्‍वर कहते हैं: "केवल वफादारी से ही तुम शैतान की धूर्तता के विरूद्ध पलटकर वार कर सकते हो।" "तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है।" परमेश्‍वर शैतान के हमलों को परमेश्‍वर में मेरी आस्‍था और मेरी वफादारी को पूर्ण बनाने के लिए प्रयोग कर रहे थे। मनुष्‍य का जीवन और मृत्‍यु, दोनों परमेश्‍वर के हाथों में है, इसलिए मैं अपनी बेटी को उनके हाथों में सौंपना को तैयार थी। इस बारे में सोचते हुए, मैंने जमीन पर घुटने टेके, मेरी आँखों से कष्ट के आंसू बह रहे थे, मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर! लोगों की किस्‍मत आपके हाथों में हैं। अगर आप यह होने की अनुमति नहीं देंगे तो जब तक मेरी बेटी के शरीर में एक भी सांस बाकी है तब तक उसकी मृत्‍यु नहीं होगी। और अगर डॉक्‍टरों का कहना सही और वह निष्क्रिय हालत में रहने वाली है तो मैं आपको बिल्‍कुल भी दोष नहीं दूँगी, बल्कि आपका अनुसरण करना जारी रखूँगी।"

उस देर रात मैं अस्‍पताल में अपनी बेटी के बिस्‍तर पर बैठी थी और मुझे झपकी आ गई। मैं अपनी बेटी के यह बोल सुनकर आश्‍चर्यचकित होकर जागी, "मां, मां, मुझे पानी चाहिए।" अपनी बेटी की आवाज सुनकर मानो मेरे हृदय ने एक पल धड़कना ही बंद कर दिया और मैं उछलकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई। मैंने अपनी आंखों को मसला और उसे एकटक देखा। उसके हाथ वास्‍तव में हरकत कर रहे थे और उसकी आंखें खुली थीं। मेरे अंदर तुरंत इतनी भावनाएं उमड़ने लगी कि मुझे मालूम नहीं था कि क्‍या बोलना है, और मैं बस इतना ही बोल पा रही थी: "हे! परमेश्‍वर! हे! परमेश्‍वर!" उसी वार्ड में कोई और भी बड़ी हैरानी से बोला: "अरे! ये तो चमत्‍कार है! ये ऐसे कैसे ठीक हो गई?" मैं इतनी खुश थी कि मेरी मुस्‍कान मेरे पूरे चेहरे पर छायी थी। मैंने वास्‍तव में देखा कि मनुष्‍य का जीवन और मृत्‍यु, दोनों परमेश्‍वर के हाथों में है; परमेश्‍वर के कर्म चमत्‍कारी हैं। ये परमेश्‍वर थे जिन्‍होंने मेरी बेटी को बचाया। तीन दिन बाद, मेरी बेटी एक चमत्‍कारिक ढंग से ठीक हो गई, और वो फिर से सामान्‍य लगने लगी। शैतान के हाथों से यह प्रहार झेलने के बाद, मैं यह देख पाने में समर्थ थी कि आध्‍यात्मिक संसार में कितना प्रचंड चुद्ध चल रहा है और मैं शैतान के कुटिल घिनौनेपन एवं दुष्‍ट क्रूरता को साफ-साफ देख सकती थी। साथ ही, मुझे परमेश्‍वर की इच्‍छा की बेहतर समझ भी प्राप्‍त हुई। परमेश्‍वर ने इन परीक्षणों से मेरा सामना इसलिए करवाया ताकि वह मुझे बचा सकें और मुझे पूर्ण बना सकें। इससे मैं परमेश्‍वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को पहचान पाई। इससे मैं परमेश्‍वर के अधिकार और सत्ता को भी देख पाई। इसने परमेश्‍वर के प्रति मेरी आस्‍था, वफादारी और आज्ञापालन को पूर्ण बनाया; इसने मुझे शैतान के प्रभाव से बचाया, जिससे मैं अपने जीवन में आगे बढ़ पाई। परमेश्‍वर वास्‍तव में इतने मनोहर हैं!

मैंने बाद में परमेश्‍वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा: "मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, ऐसी योजना जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः आरंभ में व्यवस्था का युग; उसके बाद अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार इन तीनों युगों में मेरे कार्य का सार अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक चरण में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या बल्कि, अधिक स्पष्ट कहें तो, यह उन छल-कपटों के अनुसार किया जाता है जो शैतान उस युद्ध में काम में लाता है जो मैं उसके विरुद्ध शुरू करता हूँ। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यक्त करना, शैतान के सभी छल-कपटों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को दिखाने के लिए है, साथ ही यह शैतान की असहनीय करालता को भी प्रकट करती है। इससे भी अधिक, यह मेरी रचनाओं को अच्छे और बुरे के बीच में अन्तर करना सिखाने के लिए है, यह पहचानना सिखाने के लिए है कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखना सिखाने के लिए है कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, वह अधम से भी अधम है, दुष्ट है। यह अच्छे एवं बुरे, सत्य एवं झूठ, पवित्रता एवं गन्दगी, महान और हेय के बीच पूर्ण निश्चितता के साथ अंतर करना सिखाने के लिए है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो सकती है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टि का प्रभु—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, मनुष्य को उसके आनन्द की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है जिनकी मैंने रचना की है और जो बाद में मेरे विरुद्ध हो गया" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी")। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझे परमेश्‍वर की इच्‍छा की बेहतर समझ प्रदान की। मैं देख सकती थी कि परमेश्‍वर द्वारा किया जाने वाला प्रत्‍येक कार्य मानवजाति के उद्धार और प्रेम के लिए है। जब मैंने उन परीक्षणों पर मनन किया जिनसे मुझे एक के बाद एक गुजरना पड़ा था, हालांकि मुझे कुछ दुख उठाने पड़े, लेकिन मैंने पाया कि मैंने बहुत कुछ हासिल किया है। इन्‍हीं अनुभवों के माध्‍यम से मैंने देखा कि कैसे शैतान मुझे परेशान करने के लिए मेरे चारों ओर के लोगों और वस्‍तुओं को इस्‍तेमाल कर रहा था, लेकिन मुझे प्रबुद्ध करने और मेरा मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचनों को प्रयोग करते हुए परमेश्‍वर हमेशा मेरे साथ खड़े थे, ताकि मैं अधिक विवेक प्राप्‍त कर सकूँ। वह अनुसरण करने के लिए मुझे एक मार्ग दे रहे थे, मुझे आस्‍था और शक्ति प्रदान कर रहे थे, ताकि मैं निष्क्रियता और निर्बलता के समय में अडिग रहूँ। इस मार्ग के प्रत्‍येक कदम पर, मैं शैतान के अंधेरे प्रभाव से दूर होने और परमेश्‍वर के चमत्‍कारी कर्मों की साक्षी बनने में समर्थ थी। इन अनुभवों के माध्‍यम से, मैं अपने जीवन में परिपक्‍व हुई और मजबूत बनी। इन सबसे गुजरकर मुझे यह अहसास हुआ कि अब से मुझे शैतान की ओर से इन परेशानियों और कष्‍टों से भयभीत होने की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि परमेश्‍वर मेरे साथ खड़े हैं। जब तक हम परमेश्‍वर पर निर्भर रहते हैं और उनके वचनों से दूर नहीं जाते हैं, जब तक हमारे मन में परमेश्‍वर के प्रति आस्‍था है, तब तक वह शैतान के बहकावों और हमलों पर विजयी होने के लिए हमारा मार्गदर्शन करेंगे, और हम परमेवश्‍र की सतर्क दृष्टि के अधीन सुरक्षित रहेंगे। अब मुझे और भी दृढ़ विश्‍वास हो गया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर वापस आए प्रभु यीशु हैं। वह मेरे प्रभु, मेरे परमेश्‍वर हैं! मैं यह भी जान गई हूँ कि हम सृजित प्राणी हैं, और चाहे हम आर्शीवाद का आनंद लें या कष्‍ट उठाएं, हमें हमेशा परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए और उनकी आराधना करनी चाहिए। मैंने यह अटूट संकल्‍प ले लिया है: मेरा हृदय अंत तक सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का अनुसरण करने के लिए संकल्पित है!

मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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