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परमेश्वर

वचन देह में प्रकट होता है

सृजन के बाद यह पहली बार था कि परमेश्वर ने समस्त मानव जाति को संबोधित किया था। इससे पहले परमेश्वर ने कभी भी इतने विस्तार से और इतने व्यवस्थित तरीके से निर्मित मानव जाति से बात नहीं की थी। निस्संदेह, यह भी पहली बार ही था कि उन्होंने इतनी अधिक, और इतने लंबे समय तक, मानव जाति से बात की थी। यह पूर्णतः अभूतपूर्व था। इसके अलावा, ये कथन मानवता के बीच परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया पहला पाठ थे जिसमें उन्होंने लोगों के पापों को उघाड़ा, उनका मार्गदर्शन किया, उनका न्याय किया, और उनसे खुल कर बात की और इसलिए भी, वे पहले कथन थे जिसमें परमेश्वर ने अपने पदचिह्नों को, उस स्थान को जिसमें वे रहते हैं, परमेश्वर के स्वभाव को, परमेश्वर के पास क्या है और वे क्या हैं, परमेश्वर के विचारों को, और मानवता के लिए उनकी चिंता को लोगों को जानने दिया। यह कहा जा सकता है कि ये ही पहले कथन थे जो परमेश्वर ने सृष्टि के बाद तीसरे स्वर्ग से मानव जाति के लिए बोले थे, और पहली बार था कि परमेश्वर ने मानव जाति हेतु शब्दों के बीच अपनी आवाज प्रकट करने और व्यक्त करने के लिए अपनी अंतर्निहित पहचान का उपयोग किया।

सूचीपत्र

कलीसियाओं में चलने के दौरान मसीह द्वारा बोले गए वचनों (IV)

(1994 से 1997, 2003 से 2005)

1जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा
2वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं
3बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं
4तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए
5क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?
6मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है
7क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है
8केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
9अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो
10तुम किसके प्रति वफादार हो?
11गंतव्य के बारे में
12तीन चेतावनियाँ
13उल्लंघन मनुष्य को नरक में ले जाएगा
14परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है
15पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें
16एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (1)
17एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (2)
18दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए
19तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए
20परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है
21सर्वशक्तिमान की आह
22परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है
23परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है
24केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है

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