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XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

(VI) अपने स्वयं के शैतानी स्वभाव और प्रकृति को समझने के तरीक़े पर वचन

70. कोई भी अपना सच्चा चेहरा दर्शाने के लिए अपने स्वयं के वचनों और क्रियाओं का उपयोग कर सकता है। यह सच्चा चेहरा निश्चित रूप से उसकी प्रकृति है। यदि तुम बहुत गोलमोल ढंग से बोलने वाले कोई व्यक्ति हो, तो तुम कुटिल प्रकृति के हो। यदि तुम्हारी प्रकृति बहुत धूर्त है, तो जिस तरह से तुम चीजों को करते हो वह करने का तुम्हारा तरीका बहुत चालाक और कपटी होता है, और इससे तुम बहुत आसानी से लोगों को धोखा दे देते हो। यदि तुम्हारी प्रकृति अत्यंत कुटिल है, तो हो सकता है कि तुम्हारे वचन सुनने में सुखद हों, लेकिन तुम्हारे कार्य तुम्हारे कुटिल साधन को छिपा नहीं सकते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति बहुत आलसी है, तो तुम जो कुछ भी कहते हो, उस सबका उद्देश्य तुम्हारी लापरवाही और अकर्मण्यता के लिए दोष और उत्तरदायित्व से बचना है, और तुम्हारे कार्य बहुत धीमे और लापरवाह होंगे, और सच्चाई को छिपाने में बहुत माहिर होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण है, तो तुम्हारे वचन उचित होंगे और तुम्हारे कार्य भी सत्य के अत्यधिक अनुरूप होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति बहुत निष्ठावान है, तो तुम्हारे वचनों को अवश्य निष्कपट होना चाहिए और जिस तरीके से तुम चीजों को करते हो, वह भी व्यावहारिक और यथार्थवादी अवश्य होना चाहिए, जिसमें तुम्हारे मालिक को तुम पर अविश्वास करने जैसा कुछ न लगे। यदि तुम्हारी प्रकृति बहुत कामुक या धन लोलुप है, तो तुम्हारा हृदय प्रायः इन चीजों से भरा होगा और तुम बेइरादा कुछ विकृत, अनैतिक चीजें करोगे, जिन्हें भूलना लोगों के लिए कठिन होगा और इसके अलावा, वे चीज़ें उन्हें अप्रसन्न करेंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक बहुत गंभीर समस्या: विश्वासघात (1)" से उद्धृत

71. यदि लोगों को खुद को समझना हो, तो उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति को समझना होगा। अपनी स्थिति को समझने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है अपने विचारों और अभिप्रायों की समझ होना। हर कालावधि में, लोगों के विचार एक प्रमुख चीज़ द्वारा नियंत्रित होते रहे हैं। यदि तुम अपने विचारों पर नियंत्रण पा सकते हो, तो तुम उनके पीछे की चीज़ों पर भी नियंत्रण पा सकते हो। लोग अपने विचारों और अभिप्रायों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं लेकिन उन्हें यह जानने की आवश्यकता है कि ये विचार और अभिप्राय कहाँ से आते हैं, उनके पीछे क्या इरादे हैं, ये विचार और अभिप्राय कैसे उत्पन्न होते हैं, वे किसके द्वारा नियंत्रित होते हैं, और उनकी प्रकृति क्या है? तुम्हारे स्वभाव में रूपांतरण होने के बाद, तुम्हारे विचार और अभिप्राय, वे इच्छाएँ जिनका पीछा तुम्हारा हृदय करता है, और उन चीज़ों पर तुम्हारा दृष्टिकोण जिनका तुम अनुसरण करते हो—जो तुम्हारे रूपांतरित हिस्सों से पैदा हुए हैं—अलग होंगे। जो विचार और अभिप्राय उन चीजों से उत्पन्न होते हैं जो परिवर्तित नहीं हुए हैं, जिन चीजों को तुम स्पष्ट रूप से नहीं समझते हो, और जिन चीज़ों को तुमने सत्य के अनुभवों से नहीं बदला है—वे सब गंदी, मैली और बदसूरत होते हैं। आजकल जिन लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, उनमें इन मामलों की कुछ समझ और भान होता है। जिन्होंने थोड़े ही समय के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है वे अभी तक इन मामलों को नहीं समझते हैं; वे अभी भी अस्पष्ट हैं। वे नहीं जानते कि उनका दुर्बल स्थान कहाँ है या किस क्षेत्र में वे आसानी से गिर सकते हैं! आप लोग अभी नहीं जानते कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, और भले ही अन्य लोग कुछ हद तक इसे देख पाते हैं कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, पर इसे आप लोग नहीं भांप सकते। आप लोग अपने सामान्य विचारों या इरादों को स्पष्ट रूप से अलग नहीं कर सकते, और आप लोगों मेंइन मामलों के सार की स्पष्ट समझ नहीं है। किसी पहलू को तुम जितना अधिक समझते हो, उस पहलू में तुम उतना ही अधिक रूपांतरित होते हो; अपने आप में, जिन चीज़ों को तुम करते हो वे सत्य के अनुरूप होंगी, तुम परमेश्वर परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर पाओगे, और तुम परमेश्वर की इच्छा के निकट होगे। केवल इस तरह से खोज करके ही तुम परिणामों को प्राप्त कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "जिन लोगों की परमेश्वर से हमेशा अपेक्षाएँ होती हैं, वे सबसे कम विवेकी होते हैं" से उद्धृत

72. तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई का विश्लेषण करना है; इसमें वह शामिल है जो तुम्हारे जीवन में है। यही शैतान का तर्क और शैतान के कई दृष्टिकोण हैं जिनके अनुसार तुम हमेशा से जीते आ रहे हो। केवल अपने आत्मा के गहरे हिस्सों को अनावरित करके ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीज़ों को कैसे अनावरित किया जा सकता है? मात्र कार्यों के द्वारा, बहुत से लोग उन्हें अनावरित और विश्लेषित नहीं कर सकते; और तो और, उनकी थोड़ी-सी भी पहचान और समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। अब, अपनी प्रकृति को समझने के लिए, तुम्हें कुछ चीज़ों को अवश्य करना चाहिए: सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो; बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीज़ों का आनन्द लेते हो, किन चीज़ों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीज़ों की तुम आराधना करते हो, किन चीज़ों की तुम्हें तलाश है, और किन चीज़ों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो। क्या तुम इसे स्पष्टता से समझते हो? क्या तुम जानते हो कि तुम्हें जो चीज़ें पसंद हैं उसमें किस तरह की चीज़ें शामिल हैं? ये वे चीज़ें हैं जिन पर तुम अक्सर ध्यान देते हो, जिनकी तुम आराधना करते हो, जिस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, जिस प्रकार की चीज़ें तुम करना चाहते हो, हो, और जिस प्रकार के लोगों को तुम अपने हृदय में आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों, या ऐसे हों जो वाक्पटु चापलूसी से बात करते हों या कुछ लोग ऐसे व्यक्तियों को पसंद करते हैं जो एक ढोंग करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं इस बात का प्रश्न है, इसमें शामिल है कुछ चीज़ों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीज़ों को करने का आनन्द लेना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिनके कारण लोगों की प्रशंसा और सराहनाएँ मिलेंगी। लोगों की प्रकृति में, जिन चीज़ों को वे पसंद करते हैं, उनकी समग्ररूप से एक विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन चीजों और लोगों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जो अपनी दिखावट के कारण अन्य लोग से अपनी आराधना करवाते हैं। जिन चीज़ों को लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ... तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किसकी ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में, तुम्हारी प्रकृति बुरी और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; अर्थात्, यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। शायद तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उस व्यक्ति के चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है।

अब, अपनी प्रकृति को समझने के लिए, तुम्हें कुछ चीज़ों को अवश्य करना चाहिए: सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो; बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीज़ों का आनन्द लेते हो, किन चीज़ों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीज़ों की तुम आराधना करते हो, किन चीज़ों की तुम्हें तलाश है, और किन चीज़ों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, किस प्रकार के लोगों की तुम आराधना करते हो, और किस प्रकार के लोगों को तुम अपने हृदय में आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों, या ऐसे हों जो वाक्पटु चापलूसी से बात करते हों; कुछ लोग ऐसे व्यक्तियों को पसंद करते हैं जो एक ढोंग करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं इस बात का प्रश्न है, इसमें शामिल है कुछ चीज़ों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीज़ों को करने का आनन्द लेना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिनके कारण लोगों की प्रशंसा और सराहनाएँ मिलेंगी। लोगों की प्रकृति में, जिन चीज़ों को वे पसंद करते हैं, उनकी समग्ररूप से एक विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन चीजों और लोगों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन चीज़ों और लोगों को पसंद करते हैं जो अपनी दिखावट के कारण अन्य लोग से अपनी आराधना करवाते हैं। जिन चीज़ों को लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ...

... तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किसकी ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में, तुम्हारी प्रकृति बुरी और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; अर्थात्, यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। शायद तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उस व्यक्ति के चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपने स्वभाव को बदलने के बारे में तुम्हें क्या पता होना चाहिए" से उद्धृत

73. अपने स्वयं के स्वभाव को समझना क्या है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना जा सकता है? इसके अलावा, किसी के द्वारा प्रकट की गई चीज़ों के माध्यम से किसी की प्रकृति को विशिष्ट रूप से कैसे देखा जाना चाहिए? सबसे पहले, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को उसकी रुचि के माध्यम से देख सकते हो। कैसे? उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को नृत्य करना विशेष रूप से पसंद है, कुछ लोगों को विशेषरूप से गायक या फ़िल्मी सितारे पसंद हैं, कुछ लोग विशेष रूप से कुछ निश्चित प्रसिद्ध लोगों को आदर्श मानते हैं। इन रुचियों को देखने से, इन लोगों की प्रकृति क्या है? मैं एक और सरल उदाहरण दूँगा: कुछ लोग किसी गायक को आदर्श मान सकते हैं, यहाँ तक कि इस हद तक कि जहाँ वे गायक की हर हरकत, हर मुस्कान, और हर शब्द के प्रति आसक्त हो जाते हैं। वे गायक पर ध्यान लगाए रहते हैं, उस हर चीज़ की तस्वीर खींचते हैं जो गायक पहनता है और उसकी नक़ल करते हैं। इस स्तर का आदर्शीकरण एक व्यक्ति की प्रकृति के बारे में क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के हृदय में केवल वही चीज़ें हैं, परमेश्वर नहीं। वे सभी बातें जो यह व्यक्ति सोचता है, प्यार करता है, और खोजता है, पूरी तरह से शैतान द्वारा प्रकट की जाती हैं; वे इस व्यक्ति के हृदय पर कब्ज़ा कर लेती हैं, जिसे उन चीज़ों को अर्पित कर दिया जाता है। यहाँ क्या समस्या है? अगर किसी चीज़ को चरम सीमा तक प्रेम किया जाता है, तो वह चीज़ किसी का जीवन बन सकती है और उसके हृदय पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करती है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो परमेश्वर को नहीं चाहता है और उसके बजाय शैतान से प्यार करता है। इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ऐसे व्यक्ति की प्रकृति ऐसे व्यक्ति की होती है जो शैतान से प्रेम करता है और उसकी आराधना करता है, सच्चाई से प्रेम नहीं करता है, और परमेश्वर को नहीं चाहता है। यह किसी व्यक्ति के स्वभाव को देखने का पूरी तरह से सही तरीका है। यही वह तरीका है जिससे किसी व्यक्ति की प्रकृति का विश्लेषण किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं: उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें आपस में मिलना और बोलना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें घेरे रहते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनकी छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आइए हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: इस तरह के व्यवहारों वाले लोगों की किस प्रकार की प्रकृति होती है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृतियों के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृतियों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से उद्धृत

74. जब मनुष्य की प्रकृति को पहचानने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात इसे उनके विश्व दृष्टिकोण, जीवन के दृष्टिकोण, और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से जानना है। जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यत: शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए।" पृथ्वी के उन पिशाचों, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए वचन उनका जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसके बारे में चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में शेखी बघारी जाती है, के अधिकांश वचन, लोगों का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों की अक्सर उद्धृत की गई विशेष कहावते हैं; ये सभी शैतान के फ़लसफ़े और शैतान की प्रकृति की रूपरेखाएँ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मानव जाति के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये झूठ और बकवास भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों से जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। "हर कोई अपने लिए और बाकियों को शैतान ले जाये" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मानव जीवन बन गया है। जीवन दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवता को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसमें निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे कि "तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है; ऐसी कौन-सी प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनका तुम लोग अनुसरण करते हो?" "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'जो लोग अधिकारियों को उपहार देते हैं, उन्हें वे मार गिराते नहीं, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या इस तरह की भाषा उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करती है? उसका स्वभाव है कि पद पाने के लिए कोई भी साधन न छोड़ो; अधिकारी होना उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, उनके बातों को संभालने में, और दूसरों के साथ उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें लगभग बिल्कुल सच्चाई नहीं है—उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इसलिए, जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहता है, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और सफलता पाने वाले लोगों का सफलता पाने का अपना ही मार्ग और रहस्य होता है, तो क्या वो रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता है? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन चीजों के पीछे उनकी जो चालें हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति बहुत कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मानवीय प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं। इस तरह से अगर विच्छेदित किया जाए तो मनुष्य की प्रकृति को सब जान सकते हैं।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से उद्धृत

75. यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है—जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना—और यह जानना कि उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा होते हैं और वे कहाँ से आतेहैं। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं; वे सही और न्यायोचित महसूस करते हैं कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं। इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करते हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आप को क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते है। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आप को पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत दयनीय है, को इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है।" इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात या उसके खिलाफ शिकायत तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "स्वयं को जानना मुख्यतः मानव स्वभाव को जानना है" से उद्धृत

76. परमेश्वर ने कई अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया है ताकि लोग खुद को जान सकें। वह लोगों को अनुभव के माध्यम से धीरे-धीरे खुद को जानने देता है। चाहे परीक्षण हो, न्याय या ताड़ना हो, परमेश्वर अपने वचनों में, और वास्तविक तथ्यों में, लोगों को बिना रुके अनुभव करने देता है। लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना और अनुशासन का अनुभव करते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन और प्रकाश का भी अनुभव करते हैं। साथ ही, वह लोगों को अपनी भ्रष्टता, अपने विद्रोह और अपनी प्रकृति को पहचानने की अनुमति देता है। तो इन सबका अंतिम लक्ष्य क्या है? यह अंतिम लक्ष्य है उस प्रत्येक व्यक्ति को जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, यह जानने देना कि लोग क्या हैं। "लोग क्या हैं" इसमें कौन-सी बातें शामिल हैं? इसमें लोगों को अपनी पहचान, स्थिति, अपने कर्तव्य और दायित्व को पहचानने की अनुमति देना शामिल है। यह तुम्हें यह जानने देने के लिए है कि लोग कौन हैं और तुम स्वयं कौन हो। परमेश्वर द्वारा लोगों को स्वयं को जानने देने का अंतिम लक्ष्य यही है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से उद्धृत

77. हमारे दिल में मौजूद हर एक चीज़ परमेश्वर के विरोध में है। इसमें वे चीज़ें शामिल हैं जो हमें लगता है कि अच्छी हैं, और वे चीज़ें भी जिन्हें हम पहले से ही सकारात्मक मानते हैं। हमने इन चीज़ों को सत्यों के रूप में, सामान्य मानवता के हिस्से के रूप में और सकारात्मक चीज़ों के रूप में सूचीबद्ध किया है; हालाँकि, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ये वे चीजें हैं जिनसे वह घृणा करता है। जिस सत्य के बारे में परमेश्वर बोलता है और जो हम सोचते हैं, उसके बीच की खाई कितनी बड़ी है? इसे नापा नहीं जा सकता। इसलिए, हमें स्वयं को जानना चाहिए। हमारे विचारों, दृष्टिकोणों और क्रियाओं से लेकर हमें जो सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त हुई है, उसमें से प्रत्येक चीज़ गहराई से समझने और विश्लेषण किए जाने के योग्य है। इनमें से कुछ चीज़ें सामाजिक परिवेश से आती हैं, कुछ परिवारों से आती हैं, कुछ स्कूली शिक्षा से आती हैं, और कुछ किताबों से आती हैं। कुछ हमारी कल्पनाओं और धारणाओं से भी आती हैं। इस प्रकार की चीज़ें सबसे अधिक भयावह होती हैं, क्योंकि वे हमारे शब्दों और कार्यों को बांधती और नियंत्रित करती हैं, हमारे मन पर हावी होती हैं, और हम जो भी करते हैं, उसमें हमारे उद्देश्यों, इरादों और लक्ष्यों का मार्गदर्शन करती हैं। अगर हम इन चीजों को बाहर न निकालें तो हम स्वयं में कभी भी परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाएंगे, और हम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को बेझिझक स्वीकार कर उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाएंगे। जब तक तुम अपने स्वयं के विचारों और दृष्टिकोणों को, और जिन चीज़ों को तुम सही मानते हो, उन्हें मन में रखोगे, तब तक तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी पूरी तरह से या बेहिचक स्वीकार नहीं करोगे, न ही तुम उनका मूल रूप में अभ्यास करोगे; निश्चित रूप से पहले अपने मन में उन्हें संसाधित करने के बाद ही तुम उन्हें अभ्यास में डालोगे। तुम इसी तरीक़े से काम करोगे, और दूसरों की मदद करने में भी तुम्हारा यही तरीक़ा होगा: कुछ मानवीय तत्वों के साथ परमेश्वर के कुछ तत्वों को मिलाना। तुम ऐसा मानने लगोगे कि ऐसे व्यवहार का अर्थ है तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, तुमने सत्य की समझ को पा लिया है, और सब कुछ तुम्हारे पास है। क्या मानव जाति की स्थिति दयनीय नहीं है? क्या यह भयावह नहीं है?

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपने पथभ्रष्‍ट दृष्टिकोणों को जानकर ही आप स्‍वयं को जान सकते हैं" से उद्धृत

78. खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपने खुद के भ्रष्ट सार, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग" से उद्धृत

79. स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और आप वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाएँ, लगातार परमेश्वर के वचन को पूरा करें, और आपमें पूरी तरह से पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के लिए समर्पित होने की इच्छा हो जाए, तो आप पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होंगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "स्वयं को जानना मुख्यतः मानव स्वभाव को जानना है" से उद्धृत

80. तुम यह कैसे बता सकते हो कि किसी व्यक्ति का सार क्या है? यदि कोई व्यक्ति कुछ भी न करे या कोई मामूली काम करे तो तुम यह नहीं बता सकते कि उस व्यक्ति की प्रकृति और उसका सार क्या है। इन्हें उनके द्वारा उन बातों में दिखाया जाता है जिन्हें वे निरंतर उनके कार्यों के पीछे रहे इरादों में, वे जो भी करते हैं उनके पीछे रहे उद्देश्यों में, वे जो इच्छाएं रखते हैं और वे जिस राह पर चलते हैं उसमें दिखाया जाता है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि इन चीज़ों को उन प्रतिक्रियाओं में दिखाया जाता है जो वे तब देते हैं जब वे परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित किसी परिवेश का सामना करते हैं, जब परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से उनके साथ कुछ जाता है, जब उनका परीक्षण और शुद्धिकरण किया जाता है, या उनसे निपटा जाता है या उनकी काट-छाँट की जाती है, या जब परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से उनका प्रकाशन और मार्गदर्शन करता है। यह सब किन बातों से संबंधित है? यह एक व्यक्ति के कार्यों, उनके जीने के तरीक़ों और उन सिद्धांतों से संबंधित है जिनके द्वारा वे स्वयं का संचालन करते हैं। यह उनकी खोज की दिशा और लक्ष्यों से, और उन साधनों से जिनके माध्यम से वे आगे बढ़ते हैं से संबंधित है। दूसरे शब्दों में, यह उस राह से जिस पर वे चलते हैं, कैसे जीते हैं, वे किसके सहारे जीते हैं, और उनके अस्तित्व का आधार क्या है, इन सभी बातों से भी संबंधित है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "पौलुस की प्रकृति और स्‍वभाव को कैसे पहचाना जाए" से उद्धृत

81. आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है: जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा कर लिया है या सही चीज़ को कर लिया है, जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो या तुम विशेष क्षेत्रों में शेखी बघारने के योग्य हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना तुम्हारे लिए उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन सी चीजें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकतीं हैं उतना ही अधिक गहरा उनमें कठोर प्रयत्न करना तुम्हारे लिए उचित है। आओ, एक उदाहरण के रूप में हम पौलुस को लें। पौलुस विशेष रूप से जानकार था, और प्रचार के अपने काम में उसने बहुत कष्ट उठाये थे। बहुत सारे लोगों ने उसका अतीव सम्मान किया। नतीजतन, बहुत सारे कामों को पूरा करने के बाद, उसने मान लिया था कि उसके लिए एक अलग मुकुट रखा होगा। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। अगर उस समय, उसने खुद पर चिंतन किया होता और अपना विश्लेषण किया होता, तो उसने ऐसा नहीं सोचा होता। दूसरे शब्दों में, पौलुस ने प्रभु यीशु के वचनों में सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था; उसे केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास था। उसने सोचा था कि जब तक वह कुछ अच्छा काम करेगा और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करेगा, तब तक परमेश्वर द्वारा उसकी प्रशंसा की जाएगी और उसे सम्मानित किया जाएगा। अंत में, उसकी अपनी धारणाओं और कल्पना ने उसकी आत्मा को अंधा बना दिया और उसके सच्चे चेहरे को ढंक दिया। बहरहाल, लोगों को यह पता नहीं था, और परमेश्वर द्वारा इसे प्रकाश में न लाये जाने से, लोगों ने पौलुस को एक मानक के रूप में स्थापित करना और जीने का एक उदाहरण मान लेना जारी रखा, और वे यही मानते रहे कि वे भी उसकी तरह बनने के लिए तरसते हैं। पौलुस उनकी खोज का उद्देश्य और उनके अनुकरण का आदर्श बन गया। पौलुस के बारे में यह कहानी उन सभी के लिए चेतावनी का काम करती है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो है कि जब कभी भी हम महसूस करते हैं कि हमने विशेष रूप से अच्छा किया है, या विश्वास करते हैं कि हम किसी पहलू में विशेष रूप से प्रतिभावान हैं, या सोचते हैं कि किसी संबंध में हमें बदले जाने या हमसे निपटे जाने की आवश्यकता नहीं है, तो हमें उस विशेष संबंध में स्वयं को बेहतर ढंग से जानने और सोच-विचार करने का प्रयास करना चाहिए; यह महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि तुमने, यह देखने के लिए कि क्या उनमें ऐसी चीजें समाविष्ट हैं या नहीं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, निश्चित रूप से उन पहलुओं की खोज नहीं की है, उन पर ध्यान नहीं दिया है, या उनका विश्लेषण नहीं किया है जिनमें तुम सोचते हो कि तुमने अच्छा किया है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपने पथभ्रष्‍ट दृष्टिकोणों को जानकर ही आप स्‍वयं को जान सकते हैं" से उद्धृत

82. लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को जैसे समझते हैं और परमेश्वर मानवीय प्रकृति के बारे में जो प्रकट करता है, उसमें हमेशा बहुत बड़ा अंतर होता है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या सारभूत समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग स्वयं को इस तरह से समझते हैं वे सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम नहीं होते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, मानकों के अनुसार, इसमें एक बड़ा अंतर है, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में शामिल करना" से उद्धृत

83. जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को प्राप्त नहीं कर लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। वह प्रकृति विशिष्ट रूप से किस चीज़ को अपरिहार्य बनाती है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन चीज़ों से प्यार क्यों करते हो जो अधार्मिक हैं? तुम उन बुराइयों से क्यों प्यार करते हो? ये चीज़ें किस पर आधारित हैं? वे कहाँ से आती हैं? तुम्हें इन चीजों को स्वीकारने में इतनी खुशी क्यों होती है? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे शैतान के जहर से युक्त हैं। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि शैतान का जहर क्या है, इसे वचनों के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ कुकर्मियों से पूछते हो कि वे उस तरह से क्यों करते हैं, तो वे जवाब देंगे: "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए।" यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है: शैतान का तर्क लोगों का जीवन बन गया है। चाहे वे चीज़ों को इस या उस उद्देश्य से करें, वे इसे केवल अपने लिए ही कर रहे होते हैं। सब लोग सोचते हैं कि "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए," जीवन का यही नियम है, इसलिए सभी को बस अपने लिए ही जीना चाहिए—"भौतिक सुखों के लिए एक अच्छी पद-प्रतिष्ठा हासिल करो।" "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए"—यही मनुष्य का जीवन और फ़लसफ़ा है, और उनकी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह कथन वास्तव में शैतान का जहर है और जब इसे मनुष्य के द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है तो यह उनकी प्रकृति बन जाता है। इस वचनों के माध्यम से शैतान की प्रकृति उजागर होती है; ये पूरी तरह से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जहर मनुष्य का जीवन और साथ ही उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है; यह भ्रष्ट मानवजाति पर लगातार हजारों सालों से हावी रहा है। शैतान जो कुछ भी करता है, वह उसके स्वयं के लिए होता है। यह परमेश्वर से परे जाना, परमेश्वर से मुक्त होना और स्वयं सामर्थ्य का प्रयोग करना, और उन सभी चीज़ों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है जो परमेश्वर ने रची हैं; इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, बहुत से लोगों के नीति-वाक्य उनकी प्रकृति के प्रतिनिधि और प्रतिबिंब बन सकते हैं। चाहे इसे छिपाने की लोग कितनी भी कोशिश करें, जो कुछ भी वे करते हैं और हर बात जो वे कहते हैं, उनमें वे अपनी प्रकृति को छिपा नहीं सकते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी सच नहीं बोलते हैं और वे दिखावा करने में अच्छे होते हैं, लेकिन एक बार जब दूसरे लोग उनसे साथ थोड़ी देर बातचीत करते हैं, तो उनकी कपटी प्रकृति और पूरी बेईमानी का खुलासा हो जाता है। अंत में, लोग यही निष्कर्ष निकालते हैं: वह व्यक्ति कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलता, और वह धोखेबाज़ है। यह कथन इस तरह के एक व्यक्ति की प्रकृति की सच्चाई है;यह उनकी प्रकृति का प्रमाण, उसका चित्रण है; किसी को सच नहीं बताना, और किसी पर भी विश्वास नहीं करना उनके जीवन का दर्शन होता है। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में फ़लसफ़े से युक्त है। कभी-कभी तुम स्वयं ही इसके बारे में अवगत नहीं होते हो और इसे नहीं समझते हो, मगर तुम्हारे जीवन का हर पल इस पर आधारित है। इसके अलावा तुम्हें लगता है कि यह फ़लसफ़ा बहुत सही है, बहुत उचित है और गलत नहीं है। शैतान का फ़लसफ़ा लोगों की सच्चाई बन गया है और वे इसका जरा सा भी विद्रोह किए बिना पूरी तरह से शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं। इसलिए, वे लगातार शैतानी प्रकृति को प्रकट कर रहे हैं, और सभी पहलुओं में, वे निरंतर अपने शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ" से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

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