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I मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

I मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

(III) राज्य के युग—अंतिम युग—पर वचन

28. जब यीशु मनुष्य के संसार में आया, तो वह अनुग्रह का युग लाया, और उसने व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर एक बार फिर देहधारी बन गया, और इस बार जब उसने देहधारण किया, तो उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग ले आया। उन सब को जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करते हैं, राज्य के युग में ले जाया जाएगा, और वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

29. मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से उद्धृत

30. अंत के दिनों के दौरान, देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से वचनों को कहने के लिए आया है। जब यीशु आया, उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया और सलीब पर चढ़कर छुटकारे का कार्य पूरा किया। वह व्यवस्था के युग का अंत लाया और उसने सभी पुरानी बातों को समाप्त कर दिया। यीशु के आगमन से व्यवस्था के युग का अंत हो गया और अनुग्रह के युग का आरम्भ हुआ। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग के अंत को लाया है। वह मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर के स्थान को हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है जो यीशु ने तब किया था जब वह आया था। जब यीशु आया, तो उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को निकाला, और सलीब पर चढ़ने का छुटकारे का कार्य पूर्ण किया। परिणामस्वरूप, अपनी धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, तो उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि को हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, तो उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को बाहर निकाला, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। एक विचार से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा धारण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और नहीं रहे। अपने वास्तविक कार्य और वचनों का उपयोग करके, वह सम्पूर्ण देशों में जाता है और मनुष्यों के बीच वह जो कार्य करता है वह असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य होता है, इतना कि मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई पता लग जाती है, और मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त हो जाता है। दूसरे विचार से, परमेश्वर अपनी देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण करने, और सभी बातों को निष्पादित करने के लिए करता है। यही वह कार्य है जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "आज परमेश्वर के कार्य को जानना" से उद्धृत

31. आज, परमेश्वर मुख्य रूप से "वचन का देह में प्रकट होना" के कार्य को पूरा करने, वचन को मनुष्यों को पूर्ण बनाने में उपयोग करने, और मनुष्य से वचन के व्यवहार और शुद्धिकरण को स्वीकार करवाने के लिए देह बना है। अपने वचनों से वह तुम्हें कृपा और जीवन प्राप्त करवाने का कारण बनता है; उसके वचनों में, तुम उसके कार्य और कर्मों को देखते हो। तुम्हें ताड़ना देने और तुम्हारे शुद्धिकरण के लिए परमेश्वर वचन का उपयोग करता है, और इस प्रकार यदि तुम्हें कठिनाई सहनी पड़ती है, तो यह भी परमेश्वर के वचन के कारण है। आज, परमेश्वर तथ्यों का नहीं, बल्कि वचनों का उपयोग करके कार्य करता है। केवल जब उसके वचन तुम पर आ जाएँ तभी पवित्रात्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर सकता है, और तुम्हें पीड़ा भुगतने या मिठास का अनुभव करने का कारण बन सकता है। केवल परमेश्वर का वचन ही तुम्हें वास्तविकता में ला सकता है, और केवल परमेश्वर का वचन ही तुम्हें पूर्ण बनाने में सक्षम है। और इसलिए, कम से कम तुम्हें यह समझना चाहिए: अंत के दिनों में परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण बनाने और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए उसके वचन का उपयोग है। जो कुछ भी कार्य वह करता है वह सब वचन के द्वारा किया जाता है; वह तुम्हें ताड़ना देने के लिए तथ्यों का उपयोग नहीं करता है। ऐसे अवसर आते हैं जब कुछ लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। परमेश्वर तुम्हारे लिये भारी असुविधा उत्पन्न नहीं करता है, तुम्हारी देह को ताड़ना नहीं दी जाती है न ही तुम कठिनाईयों को सहते हो—किन्तु जैसे ही उसका वचन तुम पर आता है, और तुम्हारा शुद्धिकरण करता है, तो यह तुम्हारे लिए असहनीय हो जाता है। क्या यह सही नहीं है? सेवा करने वालों के समय पर, परमेश्वर ने मनुष्य को अथाह गड्ढे में डालने के लिये कहा। क्या मनुष्य वास्तव में अथाह गड्ढे में पहुँच गया? मनुष्य के शुद्धिकरण हेतु केवल वचनों के उपयोग के माध्यम से, मनुष्य ने अथाह गड्ढे में प्रवेश कर लिया। और इसलिए, अंत में दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो सब कुछ सम्पन्न करने, और सब कुछ स्पष्ट करने के लिए वह मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। केवल उसके वचनों में ही तुम देख सकते हो कि वह क्या है; केवल उसके वचनों में ही तुम देख सकते हो कि वह स्वयं परमेश्वर है। जब देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह वचन बोलने के अलावा कोई अन्य कार्य नहीं करता है—इस कारण से तथ्यों की कोई आवश्यकता नहीं होती है; वचन काफ़ी हैं। ऐसा इसलिये है क्योंकि वह मुख्य रूप से इसी कार्य को करने के लिए, मनुष्यों को उसके वचनों की सामर्थ्य और सर्वोच्चता को देखने देने, मनुष्यों को यह देखने देने कि वह कैसे विनम्रतापूर्वक अपने आपको अपने वचनों में छिपाता है, और अपने वचनों से अपनी समग्रता को मनुष्य को जानने देने के लिए आया है। जो कुछ भी वह है और उसके पास है वह उसके वचनों में है, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता उसके वचनों में है। इसमें तुम्हें उन कई तरीकों को दिखाया जाता है जिनके द्वारा परमेश्वर अपने वचनों को बोलता है। इस संपूर्ण समय के दौरान परमेश्वर का अधिकांश कार्य मनुष्य को भोजन देना, प्रकाशन और व्यवहार रहा है। वह मनुष्य को बिना विचार किए शाप नहीं देता है, और जब वह शाप देता भी है, तो इसे वचन के द्वारा देता है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारी होने के इस युग में, परमेश्वर को पुनः बीमारों की चंगाई करते और दुष्टात्माओं को निकालते हुए देखने का प्रयास न करें, सदैव संकेतों को देखने का प्रयास न करें—कोई फायदा नहीं है! वे संकेत मनुष्य को पूर्ण नहीं बना सकते हैं! साफ शब्दों में कहें तो, आज देह वाला वास्तविक परमेश्वर स्वयं केवल बोलता है, और कार्य नहीं करता है। यही सत्य है! वह तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, वह तुम्हें भोजन और पानी देने के लिए वचनों का उपयोग करता है। वह कार्य करने के लिए वचनों का उपयोग करता है, और वह तुम्हें अपनी वास्तविकता का ज्ञान कराने के लिये तथ्यों के स्थान पर अपने वचन का उपयोग करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के इस प्रकार को समझने में सक्षम हो, तो तुम्हारे लिये निष्क्रिय बने रहना कठिन है। नकारात्मक बातों पर ध्यान केंद्रित करने के बदले, तुम्हें केवल उन बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो सकारात्मक हैं—कहने का अभिप्राय है कि इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के वचन पूरे होते हैं या नहीं या तथ्यों का आगमन होता है या नहीं, परमेश्वर अपने वचनों से मनुष्य को जीवन प्राप्त करवाता है, और यह सभी संकेतों में से महानतम संकेत है, और इससे भी अधिक, यह अविवादित तथ्य है। यह सर्वोत्तम गवाही है जिसके माध्यम से परमेश्वर का ज्ञान मिलता है और यह सभी संकेतों की अपेक्षा और भी बड़ा संकेत है। केवल ये वचन ही मनुष्य को पूर्ण बना सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से उद्धृत

32. राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिये काम करने की ख़ातिर अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के सार और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, यह जाना जा सकता है। वचन के युग में परमेश्वर जिन सभी कार्यों को करना चाहता है, वे वचन के द्वारा संपन्न होते हैं। वचन के द्वारा ही मनुष्य की असलियत का पता चलता है, उसे नष्ट किया जाता है और परखा जाता है। मनुष्य ने वचन देखा है, सुना है और वचन के अस्तित्व को जाना है। इसके परिणाम स्वरूप वह परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करता है, मनुष्य परमेश्वर के सर्वशक्तिमान होने और उसकी बुद्धि पर, साथ ही साथ मनुष्यों के लिये परमेश्वर के हृदय के प्रेम और मनुष्यों का उद्धार करने की उसकी अभिलाषा पर विश्वास करता है। यद्यपि "वचन" शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कंपाता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों में जीता है और उससे भी अधिक वह परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीता है। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल रूप रंग को बदलने के लिये है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "राज्य का युग वचन का युग है" से उद्धृत

33. इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना, मनुष्य की प्रकृति के सार और भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना, और धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच के साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना था। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ित करने और पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "आज परमेश्वर के कार्य को जानना" से उद्धृत

34. अंतिम दिनों में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए मुख्यतः वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्यों का दमन करने, या उन्हें मनाने के लिये संकेतों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता है; इससे परमेश्वर की सामर्थ्य को स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। यदि परमेश्वर केवल संकेतों और चमत्कारों को दिखाता, तो परमेश्वर की वास्तविकता को प्रकट करना लगभग असंभव होता, और इस तरह मनुष्य को पूर्ण बनाना भी असंभव हो जाता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों के द्वारा मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता है किन्तु वचन का उपयोग मनुष्यों को सींचने और उनकी चरवाही करने के लिए करता है, जिसके बाद मनुष्य क पूर्ण आज्ञाकारिता प्राप्त होती है और मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है। यही उसके द्वारा किये गए कार्य और बोले गये वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिए संकेतों एवं चमत्कारों को दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता है—वह मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, और कार्य की कई भिन्न विधियों का उपयोग करता है। चाहे यह शुद्धिकरण, व्यवहार, काँट-छाँट, या वचनों का प्रावधान हो, मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिए, और मनुष्य को परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का और अधिक ज्ञान देने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से उद्धृत

35. वचनों का सबसे बड़ा महत्व लोगों को, सत्य को समझने के बाद, सत्य को अभ्यास में लाने देना, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने देना, और स्वयं के ज्ञान और परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने देना है। केवल बोलने के माध्यम से कार्य करने का साधन ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच सम्‍प्रेषण को सक्षम कर सकता है, केवल वचन ही सत्य को समझा सकते हैं। इस तरह से कार्य करना मनुष्य को जीतने का सर्वोत्तम साधन है; वचनों के कथन के अलावा, कोई अन्य तरीका मनुष्य को सत्य और परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ देने में सक्षम नहीं है, और इसलिए अपने कार्य के अंतिम चरण में, परमेश्वर मनुष्य के प्रति सभी सत्यों और रहस्यों को, जो उसकी समझ में नहीं आते हैं, खोलने के उद्देश्य से मनुष्य से बोलता है, उसे सच्चे मार्ग और परमेश्वर से जीवन प्राप्त करने की अनुमति देता है, और इस प्रकार परमेश्वर की इच्छा को पूरा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से उद्धृत

36. युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें, सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय करने, और उन लोगों को सिद्ध बनाने के लिए, जो एक ईमानदार हृदय से उसे प्यार करते हैं, वह सब कुछ प्रकट करता है जो अधार्मिक है। केवल इस तरह का एक स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। इसलिए, इस तरह का स्वभाव युग के महत्व से सम्पन्न होता है, और उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन प्रत्येक नए युग के कार्य के वास्ते अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने ढंग से और महत्व के बिना प्रकट करता है। माना कि, जब अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में, मनुष्य को धार्मिक न्याय के अधीन नहीं करके, बल्कि इसके बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाते हुए, और चाहे मनुष्य का पाप कितना ही गंभीर क्यों न हो उसे माफ़ करते हुए, रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के बिना, परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर अनन्त करुणा और प्रेम प्रदान करता और उसके प्रति प्रेममय रहना जारी रखता: तब परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का कभी भी कब अंत किया जाता? इस तरह का कोई स्वभाव कब मानव जाति की उचित मंज़िल में अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, ऐसे न्यायाधीश को लें जो हमेशा प्रेममय है, ऐसा न्यायाधीश जिसका उदार चेहरा और सौम्य हृदय हो। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता हो, और चाहे कोई भी हो वह उसके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता हो। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय तक पहुँचने में समर्थ होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्य का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से उद्धृत

37. ताड़ना और न्याय की बौछारों में, मनुष्य का पुत्र वचनों को बोलने के द्वारा अपने अंर्तनिहित स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और उन सबको जो उसकी ताड़ना और न्याय को स्वीकार करते हैं, मनुष्य के पुत्र के वास्तविक चेहरे को निहारने की अनुमति देता है, ऐसा चेहरा जो यूहन्ना द्वारा देखे गए मनुष्य के पुत्र के चेहरे का ईमानदार चित्रण है (निस्संदेह, यह सब उनके लिये अदृश्य होगा जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार नहीं करते हैं)। मनुष्य के वचनों का उपयोग करके परमेश्वर के वास्तविक चेहरे को पूर्णरूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, और इसलिये मनुष्य को अपना वास्तविक चेहरा दिखाने के लिए परमेश्वर अपने अंर्तनिहित स्वभाव की अभिव्यक्ति का उपयोग करता है। अर्थात्, उन सबने जिन्होंने मनुष्य के पुत्र के अंर्तनिहित स्वभाव का अनुभव किया है, मनुष्य के पुत्र का वास्तविक चेहरा देखा है, क्योंकि परमेश्वर अति महान है और मनुष्यों के वचनों का उपयोग करके उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता है। एक बार जब मनुष्य राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लेगा, तब वह यूहन्ना के वचनों का वास्तविक अर्थ जान लेगा, जो उसने दीवटों के बीच मनुष्य के पुत्र के बारे में कहे थे: "उसके सिर और बाल श्‍वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिये हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्‍वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

38. कार्य के इस अंतिम चरण में, वचन के द्वारा परिणामों को प्राप्त किया जाता है। वचन के माध्यम से, मनुष्य बहुत से रहस्यों को और पिछली पीढ़ियों के दौरान किये गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य को पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी नहीं सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के कार्य को, और उन सिद्धान्तों को समझ जाता है जिनके द्वारा वे काम करते थे; वचन के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर स्वयं के स्वभाव को, और साथ ही मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध को भी समझ जाता है, और स्वयं अपने सार को जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से, मनुष्य आत्मा के कार्य को, परमेश्वर के देहधारी देह के कार्य को, और इसके अतिरिक्त, उसके सम्पूर्ण स्वभाव को जान जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से उद्धृत

39. अंत में, यह वर्तमान चरण परमेश्वर के कार्य का पूर्णतः अंत करेगा, और इसका उपसंहार प्रदान करेगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना सभी की समझ और सभी के ज्ञान में आ जाएगी। मनुष्य के भीतर धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अन्य जातियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और उसकी सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और जीवन के सभी सही मार्ग, और परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से उद्धृत

40. अन्तिम दिन तब हैं जब सभी वस्तुएँ जीतने के द्वारा किस्म के अनुसार वर्गीकृत की जाएँगी। जीतना, अन्तिम दिनों का कार्य है; दूसरे वचनों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अन्तिम दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाएगा? तुम सब के मध्य किया जा रहा वर्गीकरण का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, समस्त राष्ट्रीयताओं के लोग भी हर कहीं से इस जीते जाने वाले कार्य के अधीन किये जायेंगे। इसका अर्थ है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, वह न्याय करवाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आएगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकता और कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु किस्म के अनुसार होने वाले इस वर्गीकरण को टाल नहीं सकती; प्रत्येक को श्रेणीबद्ध किया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट है और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत पर पहुँच रहे हैं। मनुष्य अपने अस्तित्व के अन्त से कैसे बच सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से उद्धृत

41. बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर दुष्टों का नाश नहीं करता बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो संपूर्ण मानव जाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने योग्य नहीं होती, और परमेश्वर समस्त मानवजाति को एक बेहतर राज्य में नहीं पहुँचा पाता। इस प्रकार वह कार्य पूर्णतः समाप्त नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानव जाति पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इस तरह से ही परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

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